रविवार, 19 सितंबर 2010

जुल्मी नैना बलम के मार गए....फिल्म असफल रही तो भुला दिया गया लता के ये दुर्लभ गीत भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 486/2010/186

ता मंगेशकर के गाए हुए १० बेहद दुर्लभ गीतों की इस शृंखला 'लता के दुर्लभ दस' में इन दिनों एक के बाद एक हम आपको साल १९५० के पाँच गीत सुनवा रहे हैं। पिछले हफ़्ते आपने 'छोटी भाभी' और 'अनमोल रतन' फ़िल्मों के गानें सुने थे। आइए इसी लड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज सुनते हैं १९५० की फ़िल्म 'बावरा' का एक बड़ा ही दुर्लभ गीत। इस ख़ुशरंग गीत के बोल हैं "जुल्मी नैना बलम के मार गए, तुम जीते सजन हम हार गए"। श्री दुर्गा पिक्चर्स के बैनर तले इस फ़िल्म का निर्माण हुआ था जिसका निर्देशन किया था जी. राकेश ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राज कपूर, निम्मी, ललिता पवार, के. एन. सिंह, हीरालाल, सुंदर और रतन कुमार। १९४९ में 'बरसात' की सफलता के बाद १९५० में राज कपूर ने आर. के फ़िल्म्स के बैनर तले तो कोई फ़िल्म नहीं बनाई लेकिन दूसरे फ़िल्मकारों की कई फ़िल्मों में नायक की भूमिका अदा की। 'बावरा' का ज़िक्र तो कर चुके हैं, बाक़ी की फ़िल्में थीं - किदार शर्मा की फ़िल्म 'बावरे नैन', जिसमें उनकी नायिका बनी गीता बाली; ए. आर. कारदार की फ़िल्म 'दास्तान' (सुरैया के साथ); फ़ाली मिस्त्री की फ़िल्म 'जान पहचान' (नरगिस के साथ); वी. एम. व्यास निर्देशित 'प्यार' जिसमें एक बार फिर नरगिस के साथ उनकी जोड़ी बनीं; तथा फ़िल्मिस्तान की पी. एल. संतोषी निर्देशित फ़िल्म 'सरगम' जिसमें राज साहब की नायिका थीं रेहाना। इन तमाम फ़िल्मों में शायद 'बावरा' ही सब से बुरी तरह से पिटने वाली फ़िल्म साबित हुई थी और शायद यही वजह रही होगी कि इस फ़िल्म के गानें नज़रंदाज़ हो गए, कहीं खो गए, जो आज कहीं से भी सुनाई नहीं देते। लेकिन लता जी के पुराने गानों के अनन्य भक्त अजय देशपाण्डेय जी के सहयोग से इस फ़िल्म का यह दुर्लभ गीत हम आप के साथ आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बाँट पा रहे हैं। सही में अजय जी के प्रयासों ने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को चार चाँद लगा दिया है, जिसके लिए हम उनके तहे दिल से आभारी हैं।

'बावरा' के संगीतकार थे कृष्ण दयाल। फ़िल्म जगत के एक और कमचर्चित संगीतकार। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कृष्ण दयाल के संगीत में एक गीत हमने आपको सुनवाया था आशा भोसले के गाए युगल गीतों की शृंखला 'दस गायक और एक आपकी आशा' के तहत कड़ी नं-१९८ में। यह गीत था फ़िल्म 'लेख' का "ये काफ़िला है प्यार का चलता ही रहेगा"। 'लेख' १९४८-४९ की फ़िल्म थी, लेकिन यह कृष्ण दयाल की पहली फ़िल्म नहीं थी। सन् १९४७ में उन्होंने फ़िल्म 'ज़ंजीर' में संगीत दिया था जो नहीं चली। लेकिन 'लेख' के गानें चल पड़े थे। कुल १५ मधुर गीतों से सजी 'लेख' कृष्ण दयाल के करीयर की शायद सब से उल्लेखनीय फ़िल्म रही। ऐसा बहुत से संगीतकारों के साथ हुआ है कि किसी फ़िल्म की अपार कामयाबी के बावजूद उन्हें फिर कभी उस शानदार कामयाबी का नज़ारा देखने को नहीं मिला। कृष्ण दयाल भी एक ऐसे ही कमचर्चित संगीतकार थे। 'लेख' के बाद अगली फ़िल्म 'बावरा' में भी उन्होंने कुछ बहुत ही सुंदर कॊम्पोज़िशन्स हमें दिए। लता जी के गाए प्रस्तुत लोक शैली के अंदाज़ के गीत के अलावा इस फ़िल्म में एक और बेहद दुर्लभ गीत था, दुर्लभ इसलिए कि इसमें आवाज़ें थीं मोहम्मद रफ़ी, गीता रॊय और लता मंगेशकर की, और यह गीत था "शमा जलती है तो परवाने चले आते हैं"। गीता रॊय की आवाज़ में राग भैरवी पर आधारित गीत "मेरी दुनिया की शायद हर ख़ुशी कम होती जाती है" भी बड़ा ख़ूबसूरत गीत था; लेकिन अफ़सोस कि ये गानें व्यवसायिक रूप से नहीं चल पाए। चार साल बाद, १९५४ में कृष्ण दयाल के संगीत से सजी दो फ़िल्में आई थीं - 'मलिका सलोनी' और 'विजयगढ़'। इन फ़िल्मों के गानें भी नहीं चले और कृष्ण दयाल ने फ़िल्म संगीत संसार से किनारा कर लिया, और इस तरह से एक और कमचर्चित लेकिन अत्यंत प्रतिभाशाली संगीतकार का अस्त हो गया। तो लीजिए कृष्ण दयाल की सुरीली स्मृति में सुनिए लता मंगेशकर की कमसिन आवाज़ में फ़िल्म 'बावरा' का गीत। इस गीत को लिखा है रघुपत राय ने। इस गीत की तरह और इसके संगीतकार की तरह ही ये गीतकार भी आज भूले बिसरे बन चुके हैं। तो आइए इस विस्मृत गीतकार-संगीतकार जोड़ी की यह दुर्लभ रचना सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि ६० के दशक में लता मंगेशकर के घर का कोई नौकर उनके खाने में कुछ मिलावट कर रहा था, जिसकी वजह से लता जी की तबीयत बहुत खराब हो गई थी और लम्बे समय तक वो नहीं गा सकीं। जैसे ही इस बात का पता चला कि उन्हे खाने के ज़रिए ज़हर दिया जा रहा है, उस दिन के बाद से उस नौकर का कहीं नामो निशान नहीं मिला।

विशेष सूचना:

लता जी के जनमदिन के उपलक्ष्य पर इस शृंखला के अलावा २५ सितंबर शनिवार को 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में होगा लता मंगेशकर विशेष। इस लता विशेषांक में आप लता जी को दे सकते हैं जनमदिन की शुभकामनाएँ बस एक ईमेल के बहाने। लता जी के प्रति अपने उदगार, या उनके गाए आपके पसंदीदा १० गीत, या फिर उनके गाए किसी गीत से जुड़ी आपकी कोई ख़ास याद, या उनके लिए आपकी शुभकामनाएँ, इनमें से जो भी आप चाहें एक ईमेल में लिख कर हमें २० सितंबर से पहले oig@hindyugm.com के पते पर भेज दें। हमें आपके ईमेल का इंतज़ार रहेगा।


अजय देशपांडे जी ने लता जी के दुर्लभ गीतों को संगृहीत करने के उद्देश्य से एक वेब साईट का निर्माण किया है, जरूर देखिये यहाँ.

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. यह उस फ़िल्म का गीत है जिसके फ़िल्म के नाम के आगे अगर "दो" लगा दिया जाए तो उस फ़िल्म का नाम बनता है जिसमें एक गीत था जिसमें यार से यारी होने की बात कही गई है। कल के गीत की फ़िल्म का नाम बताएँ। २ अंक।
२. इस गीत को लिखा है विनोद कपूर ने, संगीतकार बताएँ। ४ अंक।
३. फ़िल्म के निर्देशक बताएँ। ३ अंक।
४. गीत के मुखड़े में शब्द है "पवन"। मुखड़ा बताएँ। १ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
अंक सिर्फ प्रतिभा जी और किशोर जी को मिलेंगें...यानी की कनाडा टीम फिर बाज़ी मर गयी है....बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

शनिवार, 18 सितंबर 2010

ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने - जब १९५२ में लता ने जनमदिन की बधाई दी थी नूरजहाँ को

ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। इस साप्ताहिक स्तंभ में हम आप तक हर हफ़्ते पहूँचाते हैं आप ही के ईमेल में लिखी हुई आप ही की यादें। और आज है इस सिलसिले की आठवीं कड़ी। दोस्तों, आज हम जिस ईमेल को शामिल करने जा रहे हैं, उसे हमें किसने भेजा है यह तो हम भी नहीं जानते। दरअसल ना तो उन्होंने अपना नाम लिखा है और ना ही उनके ईमेल आइ.डी से उनके नाम का पता चल पाया है। लेकिन ज़रूरी बात यह कि जिन्होंने भी यह ईमेल भेजा है, बड़ा ही कमाल का और दुर्लभ तोहफ़ा हमें दिया है जिसके लिए "धन्यवाद" शब्द भी फीका पड़ जाए। दोस्तों, इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित कड़ियों में आप लता मंगेशकर पर केन्द्रित शृंखला का आनंद ले रहे हैं। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए इस शख़्स ने हमें यह ईमेल भेजा जिसमें 'स्क्रीन' पत्रिका के एक बहुत ही पुराने अंक से खोज कर लता जी का एक लेख है भेजा है जिसमें लता जी ने मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ जी को बड़े शिद्दत के साथ याद करते हुए उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएँ दी थीं। आज १८ सितंबर है और २१ सितंबर को नूरजहाँ जी का जन्मदिवस है। ऐसे में आज की कड़ी में इस लेख को शामिल कर पाना हम सब के लिए सौभाग्य की बात है। जिन्होंने भी हमें यह ईमेल भेजा है, उन्हें हम तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। लीजिए इस लेख को आप भी पढ़िए। 'टीयर्स ऒफ़ जॊय' के शीर्षक से यह लेख प्रकाशित हुई थी 'स्क्रीन' पत्रिका के २६ सितंबर १९५२ के अंक में, यानी कि आज से लगभग ६० साल पहले।

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TEARS OF JOY

(Screen, 26th Sept. 1952)

SEPTEMBER 21 was Noor Jehan's birthday and I, who consider myself her bosom friend and disciple, today pay tribute to her genius through the columns of 'Screen'.

They say, absence makes the heart grow fonder. I only know that our separation has given me great pain and even now, when I reminisce about the time we spent together, my mind rebels against the conditions that have erected a barrier between us.

Noor Jehan's innumerable fans console themselves by listening to her records and I also have to content myself with them. But when the desire to hear her in person grows too strong, I seek help of a telephone and we come together over a distance of hundreds of miles.

To see her again after years of separation, I undertook a journey to Jullunder (Jalandhar) not long ago and we met with cries of joy on the border line between India and Pakistan. I shall ever cherish those moments when tears coursed down her cheeks as she embraced me, tears that spoke of her affection for me.

People have wondered at our deep attachment, perhaps because they think we ought to share a professional rivalry. To them, I want to say that Noor jehan is like an elder sister to me (indeed I address her as 'didi'), that she is in a sense my "Guru" for I have always kept her enchanting voice as my ideal.

Even now as I pen these lines of homage to her, whom I deem my ideal, the greatest of them all, I find mere words inadequate. I pray to God that Noor jehan be blessed with happiness and prosperity and live to see many more birthdays.

Lata Mangeshkar.

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आज के इस ईमेल के बाद अब बारी आती है गीत सुनवाने की। कौन सा गाना सुनवाएँ आपको? लता जी से कुछ चाहनेवालों ने ट्विटर पर पूछा था कि उन्हें नूरजहाँ जी का गाया कौन सा गीत सब से ज़्यादा पसंद है। इसका उन्होंने यही जवाब दिया था कि उन्हें उनके सभी गानें बेहद पसंद है। साथ ही लता जी ने यह भी कहा था कि नूरजहाँ जी को लता जी का गाया जो गीत सब से ज़्यादा पसंद था, वह है फ़िल्म 'रज़िया सुल्तन' का "ऐ दिल-ए-नादान"। तो दोस्तों, क्योंकि आज लता जी और नूरजहाँ जी की एक साथ बात चली है, तो क्यों ना नूरजहाँ जी का पसंदीदा लता नंबर हो जाए! जाँनिसार अख़्तर का लिखा, ख़य्याम साहब का स्वरबद्ध किया हुआ गीत है। पिछले साल आइ.बी.एन-७ पर जावेद अख़्तर साहब ने जब लता जी को उनका सब से पसंदीदा गीत कौन सा है पूछा था, तब शुरु शुरु में तो लता जी यह कह कर सवाल को टाल दिया कि कोई एक गीत बताना मुश्किल है, लेकिन जावेद साहब के ज़ोर डालने पर उन्होंने इसी गीत का उल्लेख किया यह सोचे बग़ैर कि इसे जावेद साहब के पिताजी ने लिखा है। जावेद साहब ने कहा था, "लता जी, आप ने अपने हज़ारों गीतों में से एक गीत को चुना, और वह गीत मेरे वालिद साहब का लिखा हुआ है"। यह सुनते ही लता जी भी चौंक उठीं क्योंकि शायद उन्होंने जवाब देते हुए इस ओर ध्यान नहीं दिया था कि इसके गीतकार जाँनिसार साहब हैं।

और अब ख़य्याम साहब बता रहे हैं इसी गीत के बारे में विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में - "रज़िया सुल्तान आज से ७०० या ७५० बरस पुराना क़िस्सा है। और रज़िया सुल्तान और उनके वालिद, दि एम्पेरर, अल्तमश, ये लोग तुर्की से आए थे यहाँ हिंदुस्तान में। तो ये तारीख़ ने हमें बताया कि ये तुर्की से आए थे यहाँ, यूरोप से। वो किस रास्ते से आए, पहले मैंने यह मार्क किया। इराक़ है, इरान है, उसके बाद ये सेन्ट्रल एशिया, जो पहले रूस में थी, और उसके बाद ये आए दर-ए-ख़ाइबर के रास्ते। ज़ाहिर है उस ज़माने में ना हवाई जहाज़ था, मा मोटर गाड़ी थी, तो कारवाँ चलता था, या काफ़िले चलते थे। तो ५० माइल या ४० माइल चलते होंगे, उसके बाद पड़ाव डालते होंगे। तो रात को कुछ दिल बहलाने की बातें भी होती ही होंगी। तो वो किस साज़ और अंदाज़ गाने का, ये सब वहाँ से, और ये जो दर-ए-ख़ाइबर (ख़ाइबर पास) से होते हुए, यानी पेशावर से होते हुए, उस रास्ते से हमारे भारत में आए। भारत में आके, इन लोगों को भारत इतना अच्छा लगा कि इन्होंने अपना वतन बना लिया इसको। तो इन लोगों के जो जो साज़ होते हैं, कुछ टर्किश, कुछ अरबी, इरानी और हमारे भारत के साज़। तो उनका ब्लेण्डिंग् है ये। तो ब्लेण्डिंग्‍ ऐसी हुई, जो ऒर्केस्ट्रेशन ऐसी हुई, जो सुर ऐसे लगे इस धुन में भी। जैसे गाते हैं, तो वो अनोखापन इसमे, और लता जी की आवाज़, और फिर बहुत ज़हीन हैं लता जी, और तो क्या कहने, जो सुप्रीमो लफ़्ज़ है वह भी छोटा सा है उनके लिए। और ये जाँनिसार अख़्तर साहब का लिखा हुआ नग़मा है। और कमाल अमरोही साहब के क्या कहने जिन्होंने राइटिंग् की है। और मेकिंग् में कोई कॊम्प्रोमाइज़ नहीं की उन्होंने। जितनी किताबें उन्होंने पढ़ी, सब मुझे दी उन्होंने और उतनी ही स्टडी मैंने भी की। तब जाके यह बात आई।"

गीत - ऐ दिल-ए-नादान (रज़िया सुल्तान)


ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। हमें पूरी उम्मीद है कि आपको भाया होगा। आपको 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का यह साप्ताहिक विशेषांक कैसा लग रहा है, इसे हम और भी बेहतर और दिलचस्प किस तरह से बना सकते हैं, इसके लिए आप अपने विचार और सुझाव हमें oig@hindyugm.com पर लिख सकते हैं। हमें आपके ईमेल का इंतेज़ार रहेगा। इस स्तंभ को युंही बरकरार रखने के लिए हमें सब से ज़्यादा सहयोग आप ही मिल सकता है। अपने जीवन के यादगार घटनाओं को हमारे साथ बाँटिए इस स्तंभ में। इसी उम्मीद के साथ कि आप दोस्तों के ईमेलों से हमारा मेल बॊक्स भर जाएगा, आज के लिए हम विदा लेते हैं, लता जी के गाए एक बेहद दुर्लभ गीत के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' आपकी सेवा में फिर हाज़िर होगा कल शाम भारतीय समयानुसार ६:३० बजे। नमस्कार!


प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

गुलेलबाज़ लड़का - भीष्म साहनी

सुनो कहानी: भीष्म साहनी की "गुलेलबाज़ लड़का"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ।

पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में रामचन्द्र भावे की कन्नड कहानी छिपकली आदमी का पॉडकास्ट सुना था।

आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध लेखक, नाट्यकर्मी और अभिनेता श्री भीष्म साहनी की एक प्रसिद्ध कहानी "गुलेलबाज़ लड़का" जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। आशा है आपको पसंद आयेगी।

कहानी का कुल प्रसारण समय 12 मिनट 23 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



भीष्म साहनी (1915-2003)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी
पद्म भूषण भीष्म साहनी का जन्म आठ अगस्त 1915 को रावलपिंडी में हुआ था।

"चलो बाहर निकल चलो।"
("गुलेलबाज़ लड़का" से एक अंश)


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#One hundred third Story, Gulelbaz Ladka: Bhisham Sahni/Hindi Audio Book/2010/35. Voice: Archana Chaoji

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