बुधवार, 21 जुलाई 2010

ये कौन आता है तन्हाईयों में जाम लिए.. मख़्दूम मोहिउद्दीन के लफ़्ज़ औ' आबिदा की पुकार..वाह जी वाह!

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९३

दिन से महीने और फिर बरस बीत गये
फिर क्यूं हर शब तन्हाई आंख से आंसू बनकर ढल जाती है
फिर क्यूं हर शब तेरे शे’र तेरी आवाज गूंजा करती है
फजाओं में आसमानों में
मुझे यूं महसूस होता है
जैसे तू हयात बन गया है
और मैं मर गया हूं।

अपने पिता "मख़्दूम मोहिउद्दीन" को याद करते हुए उनके जन्म-शताब्दी के मौके पर उनके पुत्र "नुसरत मोहिउद्दीन" की ये पंक्तियाँ मख़्दूम की शायरी के दीवानों को अश्कों और जज़्बातों से लबरेज कर जाती हैं। मैंने "मख़्दूम की शायरी के दीवाने" इसलिए कहा क्योंकि आज भी हममें से कई सारे लोग "मख़्दूम" से अनजाने हैं, लेकिन जो भी "मख्दूम" को जानते हैं उनके लिए मख़्दूम "शायर-ए-इंक़लाब" से कम कुछ भी नहीं। जिसने भी "मख़्दूम" की शायरी पढी या सुनी है, वह उनका दीवाना हुए बिना रह नहीं सकता। हैदराबाद से ताल्लुक रखने वाला यह शायर "अंग्रेजों" और "निज़ाम" की मुखालफ़त करने के कारण हमेशा हीं लोगों के दिलों में रहा है। उर्दू अदब में कई सारे ऐसे शायर हुए हैं, जिन्हें बस लिखने से काम था, तो कई ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने जहाँ अपनी लेखनी से आग लगाई, वहीं अपनी हरक़तों से "शासन" की नाक में दम तक कर दिया। "मख़्दूम" इसी दूसरी तरह के शायर थे। "तेलंगना" की माँग (यह माँग अभी तक चल हीं रही है) और "हैदराबाद" को "निज़ाम" से मुक्त कराने का जुनून इनकी आँखों में और इनके जज़्बो में बखूबी नज़र आता था। "तेलंगना" की स्त्रियों (जिन्हें तेलंगन कहा जाता है) को जगाने के लिए इनकी लिखी हुई यह नज़्म आज भी वही पुरजोर असर रखती है:

फिरने वाली खेत की मेड़ों पर बलखाती हुई,
नर्मो-शीरीं क़हक़हों के फूल बरसाती हुई,
कंगनों से खेलती, औरों से शरमाती हुई,

अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा,
हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा।

देखने आते हैं तारे शब में सुनकर तेरा नाम,
जलवे सुबह-ओ-शाम के होते हैं तुझसे हमकलाम,
देख फितरत कर रही है, तुझको झुक-झुककर सलाम,

अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा,
हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा।

ले चला जाता हूँ आँखों में लिए तस्वीर को,
ले चला जाता हूँ पहलू में छुपाए तीर को,
ले चला जाता हूँ फैला राग की तनवीर को,

अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा,
हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा।

मख़्दूम ऐसी आज़ादी का सपना देखते थे, जिसमें मज़दूरों का राज हो, जहाँ सही मायने में "स्वराज" हो। इस मुद्दे पर लिखी मख़्दूम की यह नज़्म "आजादी के मतवालों" के बीच बेहद मक़बूल थी, भले हीं गाने वालों को इसके "नगमानिगार" की जानकारी न हो:

वह जंग ही क्या वह अमन ही क्या
दुश्मन जिसमें ताराज़ न हो
वह दुनिया दुनिया क्या होगी
जिस दुनिया में स्वराज न हो
वह आज़ादी आज़ादी क्या
मज़दूर का जिसमें राज न हो

लो सुर्ख़ सवेरा आता है आज़ादी का आज़ादी का
गुलनार तराना गाता है आज़ादी का आज़ादी का
देखो परचम लहराता है आज़ादी का आज़ादी का

मख़्दूम का "बागी तेवर" देखकर आप सबको यह यकीन हो चला होगा कि ये बस इंक़लाब की हीं बोली जानते हैं.. इश्क़-मोहब्बत से इनका दूर-दूर का नाता नहीं। लेकिन ऐसा कतई नहीं है। दर-असल इश्क़े-मजाज़ी में इनका कोई सानी नहीं। प्यार-मोहब्बत की भाषा इनसे बढकर किसी ने नही पढी। कहने वाले यहाँ तक कहते हैं कि "मजाज़ लखनवी" "उर्दू अदब के कीट्स" न कहे जाते, अगर "मख्दूम" ने "मजाज़" के लिए "जमीन" न तैयार की होती। मजाज़ ने इश्क़िया शायरी के जलवे इन्हीं से सीखे हैं। इश्क़ में कोई कहाँ तक लिख सकता है, इसकी मिसाल मख़्दूम साहब का यह शेर है:

न माथे पर शिकन होती, न जब तेवर बदलते थे
खुदा भी मुस्‍कुरा देता था जब हम प्यार करते थे


मख़्दूम की इसी अनोखी अदा पर रीझ कर "ग़ालिब" के शागिर्द "मौलाना हाली" के नाती "ख्वाज़ा अहमद अब्बास" कहते हैं: ”मख्दूम एक धधकती ज्वाला थे और ओस की ठंडी बूंदे भी। वे क्रांतिकारी छापामार की बंदूख थे और संगीतकार का सितार भी। वे बारूद की गंध थे और चमेली की महक भी।”

मख़्दूम साहब की जन्म-शताब्दी के मौके पर नुसरत मोहिउद्दीन और "हिन्दी साहित्य संवाद" के संपादक शशिनारायण स्वाधीन के द्वारा संपादित की हुई पुस्तक "सरमाया - मख़्दूम समग्र" का विमोचन किया गया। इस पुस्तक में "बक़लम-मख़्दूम" नाम से एक अध्याय है,जिसमें मख़्दूम साहब ने "शेरो-शायरी" पर खुलकर चर्चा की है। खैर.. इस किताब की बात कभी बाद में करेंगे। वैसे क्या आपको पता है कि मख्दूम ने तेलंगाना में किसानों के साथ जो संघर्ष किया उसे लेकर उर्दू के महान उपन्यासकार कृषन चंदर ने ‘जब खेत जागे’ नाम का उपन्यास लिखा था, जिस पर गौतम घोष ने तेलुगू में ‘मां भूमि’ फिल्म बनाई। मख्दूम की प्रमुख कृतियों में सुर्ख सवेरा, गुल-ए-तर और बिसात-ए-रक्स हैं। इतना हीं नहीं, मख्दूम ने जार्ज बर्नाड शा के नाटक ‘विडोवर्स हाउस’ का उर्दू में ‘होष के नाखून’ नाम से और एंटन चेखव के नाटक ‘चेरी आर्चर्ड’ का ‘फूल बन’ नाम से रूपांतर किया। मख्दूम ने रवींद्रनाथ टैगोर और उनकी शायरी पर एक लंबा लेख भी लिखा। इसके अलावा मख़्दूम ने तीन कविताओं के अनुवाद किए, जिनमें एक कविता "तातरी शायर" जम्बूल जावर की है, तो दो कविताएँ अंग्रेजी कवयित्री इंदिरा देवी धनराजगीर की हैं। अगर जगह की कमी न होती, तो मैं आपका परिचय इन तीन कविताओं से जरूर करवाता।

बातें बहुत हो गईं, फिर भी कहने को कई सारी चीजें बची हैं। सब कुछ तो एक महफ़िल में समेटा नहीं जा सकता, इसलिए अगर आपकी जिज्ञासा शांत न हुई हो तो कृपया यहाँ और यहाँ हो आएँ। चलिए, अब आज की ग़ज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की ग़ज़ल एक तरह से बड़ी हीं खास है। एक तरह से क्यों. दोनों हीं तरह से खास है. और वो इसलिए क्योंकि इस ग़ज़ल में आवाज़ें हैं "मुज़फ़्फ़र अली" और "आबिदा परवीन" की। आवाज़ों का ये संगम इससे पहले और इसके अलावा कहीं और सुनने को नहीं मिलता। मुज़फ़्फ़र साहब के आवाज़ की शोखी और आबिदा की आवाज़ का मर्दानापन "ग़ज़ल" को किसी और हीं दुनिया में ले जाता है। तो तैयार हो जाईये, इस अनूठी ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाने को:

उसी अदा से, उसी बांकपन के साथ आओ,
फिर एक बार उसी अंजुमन के साथ आओ,
हम अपने एक दिल-ए-बेखता के साथ आएँ,
तुम अपने महशर-ए-दार-ओ-रसन के साथ आओ।

ये कौन आता है तन्हाईयों में जाम लिए,
दिलों में चाँदनी रातों का एहतमाम लिए।

चटक रही है किसी याद की कली दिल में,
नज़र में रक़्स-ए-बहारां की सुबहो-शाम लिए।

महक-महक के जगाती रही नसीम-ए-सहर,
लबों पे यार-ए-मसीहा नफ़स का नाम लिए।

किसी खयाल की खुशबू, किसी बदन की महक,
दर-ए-क़फ़स पे खड़ी है ____ पयाम लिए।

बजा रहा था कहीं दूर कोई शहनाई,
उठा हूँ आँखों में इक ख्वाब-ए-नातमाम लिए।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "क़यामत" और शेर कुछ यूँ था-

तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की

कई हफ़्तों के बाद महफ़िल में पहली हाज़िरी लगाई शरद जी ने और इसलिए उन्हें "शान-ए-महफ़िल" से नवाज़ा जा रहा है। शरद जी के बाद महफ़िल में चहल-कदमी करती हुई शन्नो जी नज़र आईं.. आपने अपने शेर कहने शुरू हीं किए थे कि "जाने-अनजाने" नीलम जी की कही एक बात आपको चुभ गई.. फिर आगे चलकर अवनींद्र जी ने कुछ कहा और उनके कहे पर आपने अपना एक शेर डाल दिया जिससे अवनींद्र जी कुछ उदास हुए और आप परेशान हो गईं। अरे भाईयों, दोस्तों.. ये हो क्या रहा है? हम फिर से वही गलतियाँ क्यों कर रहे हैं, जिनसे सब के सब तौबा कर चुके हैं। यहाँ पर मैं किसी एक पर दोष नहीं डाल रहा, लेकिन इतना तो कहना हीं चाहूँगा कि ये "बचकानी" हरकतें "महफ़िल" में सही नहीं लगती। मेरे अग्रजों एवं मेरी अग्रजाओं(चूँकि आप सब मुझसे बड़े हैं.. उम्र में) ज़रा मेरा भी तो ध्यान करो.. मैं महफ़िल सजाऊँ या फिर महफ़िल पर निगरानी रखूँ। मैं पहले हीं कह चुका हूँ कि महफ़िल आपकी है, इसलिए लड़ना-झगड़ना या महफ़िल छोड़कर जाना (या फिर जाने की सोचना) तो अच्छा नहीं। आपको किसी की बात बुरी लगे तो नज़र-अंदाज़ कर दीजिए... लेकिन उससे बड़ा मसला तो ये है कि ऐसी बात कहीं हीं क्यों जाए। कभी-कभी कहने वाले की मंशा बुरी नहीं होती, लेकिन चूँकि वो खुलकर कह नहीं पाता या फिर "बात" को "आधे" पर हीं रोक देता है, ऐसी स्थिति में अन्य लोग उसका कुछ भी मतलब निकाल सकते हैं.. और अगर मतलब "अहितकारी" हुआ तो "बुरा" भी मान सकते हैं। इसलिए ऐसी बातें करने से बचें। मैंने अभी तक जो भी कहा, वो कोई आदेश नहीं, बल्कि "एक छोटे भाई" का आग्रह-मात्र है। अगर आप मानेंगे तो आपका अनुज "सही से" महफ़िल का संचालन कर पाएगा। चँकि आज इतना कुछ कह दिया, इसलिए दूसरे मित्रों, अग्रजों एवं अग्रजाओं का जिक्र नहीं कर पा रहा हूँ। इस गुस्ताखी के लिए मुझे मुआफ़ कीजिएगा। मैं यकीन दिलाता हूँ कि अगली महफ़िल में सारी "टिप्पणियाँ" सम्मिलित की जाएँगी... बशर्ते ऐसी हीं कोई विकट समस्या उत्पन्न न हो जाए। और हाँ, मेरी तबियत अब ठीक है, आप सबने मेरा ख्याल रखा, इसके लिए आपका तहे-दिल से आभार!

और अब पेश हैं आप सबके शेर:

ग़र खुदा मुझसे कहे कुछ माँग अय बन्दे मेरे
मैं ये माँगू महफ़िलों के दौर यूँ चलते रहें ।
हमनिवाला, हमपियाला, हमसफ़र, हमराज़ हों,
ता कयामत जो चिरागों की तरह जलते रहें ॥ (शरद जी)

माना के तबाही में कुछ हाथ है दुश्मन का
कुछ चाल कयामत की अपने भी तो चलते हैं (नीलम जी)

सुमन जो सेज पर सजे थे .
उन्ही से कयामत की अर्थी सजाई गई . (मंजु जी)

जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे,
क्या ख़ूब ? क़यामत का है गोया कोई दिन और. (ग़ालिब)

ज़िंदगी की राहों में रंजो-ग़म के मेले हैं,
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं।

चेहरे पर झुर्रियों ने कयामत बना दिया
आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रहीं (ख़ुमार बाराबंकवी)

जो दिल को ख़ुशी की आदत न होती
रूह में भी इतनी सदाक़त न होती !
ज़माने की लय पे जिए जाते होते
तेरी बेरुखी भी क़यामत न होती !! (अवनींद्र जी)

मेरी गुस्ताखियों को खुदा माफ़ करना
कि इसके पहले कोई क़यामत आ जाये. (शन्नो जी)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

दो चमकती आँखों में कल ख्वाब सुनहरा था जितना.....आईये याद करें गीत दत्त को आज उनकी पुण्यतिथि पर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 443/2010/143

"दो चमकती आँखों में कल ख़्वाब सुनहरा था जितना, हाये ज़िंदगी तेरी राहों में आज अंधेरा है उतना"। गीता दत्त के गाए इस गीत को सुनते हुए दिल उदास हो जाता है क्योंकि ऐसा लगता है कि जैसे यह गीत गीता जी की ही दास्ताँ बता रहा है। "हमने सोचा था जीवन में कोई चांद और तारे हैं, क्या ख़बर थी साथ में इनके कांटें और अंगारे हैं, हम पे क़िस्मत हँस रही है, कल हँसे थे हम जितना"। उफ़! जैसे कलेजा निकाल दे! आज २० जुलाई, गीता जी का स्मृति दिवस है। उनकी सुर साधना को 'आवाज़' की तरफ़ से श्रद्धा सुमन! दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों जारी है लघु शृंखला 'गीत अपना धुन पराई'। आइए आज गीता जी की याद में उन्ही की आवाज़ में फ़िल्म 'डिटेक्टिव' का यही गीत सुनते हैं जो शायद उनके जीवन के आख़िरी दिनों की कहानी कह जाए! इस फ़िल्म के संगीतकार थे गीता जी के ही भाई मुकुल रॊय और इस गीत को लिखा शैलेन्द्र जी ने। 'डिटेक्टिव' बनी थी सन् १९५८ में। निर्देशक शक्ति सामंत ने तब तक 'इंस्पेक्टर', 'हिल स्टेशन' और 'शेरू' जैसी फ़िल्मों का निर्देशन कर चुके थे। १९५८ में उन्होने अमीय चित्र के बैनर तले बनी फ़िल्म 'डिटेक्टिव' का निर्देशन किया और इसी साल उन्होने अपनी निजी बैनर 'श्री शक्ति फ़िल्म्स' की भी नीव रखी। प्रदीप कुमार और माला सिन्हा अभिनीत 'डिटेक्टिव' के सभी गानें मशहूर हुए और मुकुल रॊय का जैसे क़िस्मत चमक उठा। लेकिन आश्चर्य की बात है कि इस फ़िल्म के बाद मुकुल रॊय ने किसी और फ़िल्म में संगीत नहीं दिया। इस फ़िल्म से संबंधित कुछ जानकारी हम आपको पहले दे चुके हैं जब गीता दत्त के जनमदिवस पर केन्द्रित १० गीतों की लघु शृंखला 'गीतांजली' के दौरान हमने आपको इसी फ़िल्म से गीता दत्त और हेमन्त कुमार का गाया "मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया" सुनवाया था। ख़ैर, फ़िल्हाल वक़्त आ गया है आपको यह बताने का कि आज का प्रस्तुत गीत किस विदेशी गीत से प्रेरीत है। यह गीत आधारित है हैरी बेलाफ़ोण्ट के "जमाइकन फ़ेयरवेल" पर।

"जमाइकन फ़ेयरवेल" एक मशहूर कैलीप्सो है जिसमें वेस्ट इण्डीज़ के द्वीपों की ख़ूबसूरती का वर्णन है। इस गीत को लिखा था लॊर्ड बुर्गेस (इरविंग् बुर्गी) ने। उनका जन्म न्यु यॊर्क के ब्रूकलीन में सन् १९२६ को हुआ था। उनकी माँ बारबाडॊस की थीं और उनके पिता वर्जिनिया से ताल्लुख़ रखते थे। इस गीत को पहली बार मुक्ति मिली थी गायक हैरी बेलाफ़ोण्ट के लोकप्रिय ऐल्बम 'कैलीप्सो' में। 'बिलबोर्ड पॊप चार्ट' में यह गीत चौदहवें पायदान तक चढ़ा था। दरसल यह एक पारम्परिक गीत है जो अलग अलग हिस्सों में अलग अलग तरीकों से गाया जाता था। बुर्गेस ने इन सभी हिस्सों का संग्रह किया और उन तमाम लोक रचनाओं के टुकड़ों को जोड़ कर एक नया गीत तैयार कर दिया। और कहना ज़रूरी है कि उन कैरिबीयन द्वीपों से बाहर लाकर इस गीत को लोकप्रिय बनाने में गायक हैरी बेलाफ़ोण्ट का बहुत बड़ा योगदान है। बेलाफ़ोण्ट के अलावा और जिन कलाकारों ने आगे चलकर इस गीत को गाया उनमें शामिल हैं सर लैन्सलोट, जिम्मी बफ़े, सैम कूक, नीना और फ़्रेडरिक, पट रोले, कार्ली सायमन और नटी। इस गीत को बहुत सारी भाषाओं में अनुवादित किया गया है। यहाँ पर बताना अत्यन्त आवश्यक है कि केवल बंगला में ही इस गीत के कई सारे अनुवाद मौजूद हैं, जिनमें से कुछ तो बहुत जाने माने हैं। इनमें से एक वर्ज़न का इस्तेमाल तो ७० के दशक के बंगाल के नक्सली क्रांतिकारी विद्रोह में ऐन्थेम के तौर पर किया गया था। तो लीजिए, 'गीत अपना धुन पराई' में "जमाइकन फ़ेयरवेल" की धुन पर आधारित फ़िल्म 'डिटेक्टिव' का यह गीत सुनें, और गीता दत्त जी को उनकी पुण्य तिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित करें।



क्या आप जानते हैं...
कि मुकुल रॊय ने केवल चार हिंदी फ़िल्मों में संगीत दिया था जिनके नाम हैं - भेद, दो बहादुर, सैलाब, और डिटेक्टिव।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. कल इनकी जयंती है, इनका नाम बताएं और ये किस रूप में जुड़े हैं इस गीत से ये भी - ३ अंक.
२. लता जी का साथ इस गीत में एक बेमिसाल पार्श्वगायक के सुपत्र ने दिया है, कौन हैं ये - २ अंक.
३. यह गीत स्वीडिश पॊप ग्रूप 'ए.बी.बी.ए' के गीत "आइ हैव अ ड्रीम" से प्रेरित है, संगीतकार बताएं - २ अंक.
४. युवाओं को केंद्रित इस बेहद सफल प्रेम कहानी की फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह, सब के सब फॉर्म में लौट आये हैं, शरद जी अवध जी और इंदु जी को ढेरों बधाईयां. जासूस के बारे में शरद जी आपको जल्दी ही कन्फर्म करते हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

बाई दि वे, ऑन दे वे, "आयशा" से हीं कुछ सुनते-सुनाते चले जा रहे हैं जावेद साहब.. साथ में हैं अमित भी

ताज़ा सुर ताल २७/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! 'ताज़ा सुर ताल' में आज हम जिस फ़िल्म के गीतों को लेकर आए हैं, उसके बारे में तो हमने पिछली कड़ी में ही आपको बता दिया था, इसलिए बिना कोई भूमिका बाँधे आपको याद दिला दें कि आज की फ़िल्म है 'आयशा'।

सुजॊय - अमित त्रिवेदी के संगीत से सजे फ़िल्म 'उड़ान' के गानें पिछले हफ़्ते हमने सुने थे, और आज की फ़िल्म 'आयशा' में भी फिर एक बार उन्ही का संगीत है। शायद अब तक हम 'उड़ान' के गीतों को सुनते नहीं थके थे कि एक और ज़बरदस्त ऐल्बम के साथ अमित हाज़िर हैं। मैं कल जब 'आयशा' के गीतों को सुन रहा था विश्व दीपक जी, मुझे ऐसा लगा कि 'देव-डी' और 'उड़ान' से ज़्यादा वरायटी 'आयशा' में अमित ने पैदा की है। इससे पहले कि वो ख़ुद को टाइप-कास्ट कर लेते और उनकी तरफ़ भी उंगलियाँ उठनी शुरु हो जाती, उससे पहले ही वे अपने स्टाइल में नयापन ले आए।

विश्व दीपक - 'आयशा' के गानें लिखे हैं जावेद अख़्तर साहब ने। पार्श्वगायक की हैसियत से में इस ऐल्बम में नाम शामिल हैं अमित त्रिवेदी, अनुष्का मनचन्दा, नोमान पिण्टो, निखिल डी'सूज़ा, रमण महादेवन, सम्राट कौशल, अनुषा मणि, ऐश किंग और तोची रैना की। दो एक नामों को छोड़ कर बाक़ी सभी नाम नए हैं। निखिल और नोमान की आवाज़ें हमने पिछले हफ़्ते की फ़िल्म 'उड़ान' में भी सुनी थी।

सुजॊय - अभी पिछले शनिवार की ही बात है, गायक अभिजीत 'ज़ी बांगला' के एक टॊक शो में पधारे थे। उसमें बातों बातों में जब आज के गीत संगीत की चर्चा छिड़ी, तो उन्होने कहा कि कुछ साल पहले तक लोग कुमार शानू, उदित नारायण, सोनू निगम, अभिजीत जैसी आवाज़ों को अलग अलग पहचानते थे, गीत सुन कर बोल देते थे कि किस संगीतकार की धुन है, लेकिन आज फ़िल्म संगीत ऐसा हो गया है कि गीत सुनने के बाद ना गायक के नाम का अनुमान लगाया जा सकता है और ना ही संगीतकार का। विश्व दीपक जी, आप बताइए, क्या आपको लगता है कि बहुत ज़्यादा फ़्रेश टैलेण्ट्स को अगर गायक के रूप में मौके दिए जाएँ तो फ़िल्मी गीतों की लोकप्रियता पर विपरीत असर पड़ेगा? मुझे कुछ कुछ ऐसा लगता है कि अत्यधिक नई आवाज़ें श्रोताओं को डिस्ट्रैक्ट करती है। किसी आवाज़ को लोगों के दिलों में बिठाने के लिए उससे कई गीत गवाने ज़रूरी हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं अभिजीत जी के बात से पूरी तरह सहमत नहीं। हाँ, इतना तो है कि हमें अपने स्थापित गायकों को मौका देते रहना चाहिए ताकि श्रोता भी उन स्थापित कलाकारों के नाम से खुद को जोड़ सकें। इससे गाने को भी लोकप्रियता हासिल होगी। लेकिन बस कुछ हीं कलाकारों के साथ काम करने से दूसरे प्रतिभावान गायकों की अनदेखी होने का खतरा है.. पुराने समय में इतनी सारी सुविधाएँ मौजूद नहीं थी इसलिए संगीतकारों के पास नए-नए लोग कम हीं आते थे.. पर अब "इंटरनेट बूम" के बाद अपनी आवाज़ को संगीतकार के पास पहुँचाने के हज़ार जरिये हैं और संगीतकार भी बस साज़ों के साथ प्रयोग करने तक हीं सीमित नहीं रहे, वे अब आवाज़ के साथ भी प्रयोग करना चाहते हैं। अब जब इतने सारे विकल्प उपलब्ध हैं तो वे एक हीं के साथ जुड़कर क्यों रहें? और फिर अगर किसी गायक में क्षमता है कि वो अपने आप को किसी संगीतकार के लिए "जरूरी" साबित कर दे तो संगीतकार भी दूसरे किसी विकल्प के बारे में नहीं सोचेगा। हर संगीतकार के पास ऐसे एक या दो गायक जरूर हीं होते है। आप "कैलाश खेर" , "सुखविंदर", "के के", "मोहित चौहान" या फिर "श्रेया घोषाल" को हीं देख लीजिए.. भले हीं हज़ार गायक हों, लेकिन इनकी आवाज़ अमूमन हर एलबम में सुनाई पड़ हीं जाती है। जहाँ तक "संगीत" सुनकर "संगीतकार" पहचानने की बात है तो अभी भी हर संगीतकार अपना एक स्पेशल टच जरूर हीं रखता है, जिसे सुनते हीं लोग संगीतकार का नाम जान लेते हैं। हाँ, कुछ गाने या फिर कुछ जौनर ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर संगीतकार के बारे में ठीक-ठीक जाना नहीं जा सकता, लेकिन मेरे हिसाब से यह अच्छी बात है। इससे साबित होता है कि हर संगीतकार आजकल आगे बढ रहा है, कोई भी एक जगह ठहरकर नहीं रहना चाहता। इसलिए सभी हर क्षेत्र में निपुण होने की कोशिश कर रहे हैं। यह "संगीत" के लिए अच्छी खबर है। नहीं तो पहले यह होता था कि अगर "ड्र्म्स" का इस्तेमाल सही हुआ है तो ये "एल-पी" हैं हैं। दूसरा कोई संगीतकार वैसा जादू तैयार कर हीं नहीं पाता था। आजकल टेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो गई है कि ऐसी किसी कमी की संभावना हीं खत्म हो गई है।

सुजॊय - विश्व दीपक जी, इस बहस को विराम देते हैं और सुनते हैं फ़िल्म 'आयशा' का पहला गीत जिसे गाया है अमित त्रिवेदी और ऐश किंग ने।

गीत: सुनो आएशा


विश्व दीपक - फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने सुना। एक पेपी नंबर, लेकिन जिन साज़ों का इस्तेमाल हुआ है, और ऒरकेस्ट्रेशन जिस तरह का किया गया है, अरेंजमेण्ट में एक नवीनता है। अमित का संगीत संयोजन किसी दूसरे संगीतकार से नहीं मिलता, यही उनकी ख़ासियत है। गाने का जो बेसिक रीदम पैटर्ण है, वो कुछ कुछ फ़िल्म 'दोस्ताना' के "जाने क्यों दिल चाहता है" गीत जैसा है, और कुछ कुछ "जब मिला तू" जैसा भी है। लेकिन ’आयशा' के इस गीत को इन गीतों से नर्म अंदाज़ में गाया गया है। ऐश किंग ने अमित का अच्छा साथ दिया है इस गीत में। आपको याद दिला दें कि ये वही ऐश किंग हैं जिन्होने पिछले साथ फ़िल्म 'दिल्ली-६' में "दिल गिरा दफ़्फ़तन" गाया था।

सुजॊय - आपने संगीत संयोजन का ज़िक्र किया, तो मैं इस बात पर प्रकाश डालना चाहूँगा कि इस गीत में सैक्सोफ़ोन का ख़ासा इस्तेमाल हुआ है, और इससे याद अया कि अभी हाल ही में जाने माने सैक्सोफ़ोनिस्ट मनोहारी सिंह, यानी कि मनोहारी दादा का देहावसान हो गया जो फ़िल्म इंडस्ट्री के मशहूर सैक्सोफ़ोनिस्ट और फ़्ल्युटिस्ट रहे हैं। तो इस गीत को हम अपनी तरफ़ से मनोहारी दादा के नाम डेडिकेट करते हुए उन्हे अपनी श्रद्धांजली अर्पित करते हैं।

विश्व दीपक - यह बहुत अच्छी बात कही आपने। 'ताजा सुर ताल' के ज़रिए गुज़रे ज़माने के अज़ीम फ़नकारों को श्रद्धांजलि से बढ़कर और अच्छी बात क्या हो सकती है! चलिए इस थिरकते गीत से जो सुरीली शुरुआत हुई है इस ऐल्बम की, अब आगे बढ़ते हैं और सुनते हैं फ़िल्म का दूसरा गीत तोची रैना की आवाज़ में।

गीत: गल मिठि मिठि (मीठी मीठी) बोल


सुजॊय - भई ऐसा कह सकते हैं कि 'आयशा' ऐल्बम में जो पंजाबी तड़का अमित त्रिवेदी ने लगाया है, उसी का स्वाद चख रहे थे हम। गीत के बोल भी पूरी तरह से पंजाबी हैं और पाश्चात्य रीदम और साज़ों के साथ फ़्युज़ किया गया है। बीट्स धीमी हैं और पंजाबी भंगड़े की तरह फ़ास्ट रीदम नहीं है। वैसे यह गीत आपको 'लव आजकल' के "आहुँ आहुँ" की याद दिला हीं जाता है। आपको याद दिला दें कि तोची रैना ने अमित त्रिवेदी के लिए "ओ परदेसी" गीत गाया था 'देव-डी' में जिसे ख़ूब सराहना मिली थी।

विश्व दीपक - युं तो आज के दौर में लगभग सभी फ़िल्मों में पंजाबी गीत होते ही हैं, लेकिन यह गीत लीक से हट के है। इस गीत में वो सब बातें मौजूद हैं जो इसे लोकप्रियता की पायदानों पे चढने में मदद करेंगे। देखते हैं जनता का क्या फ़ैसला होता है! और अब फ़िल्म का तीसरा गीत। यह है अमित त्रिवेदी और नोमान पिण्टो का गाया "शाम भी कोई जैसे है नदी"। जावेद साहब का शायराना अंदाज़ है इस गीत में, आइए सुनते हैं।

गीत: शाम भी कोई जैसे है नदी (बूम बूम बूम परा)


सुजॊय - यह गीत भी अपना छाप छोड़ हीं जाती है। अरेंजमेण्ट ऐसा है गाने का कि ऐसा लगता है जैसे कोई युवक हाथ में गीटार लिए आपके ही सामने बैठे गा रहा हो बिल्कुल लाइव! और यही बात आकर्षित करती है इस गीत की तरफ़। अमित और नोमान ने जिस नरमी और फ़ील के साथ गाने को गाया है, और धुन भी उतना ही मेलोडियस! एक कर्णप्रिय यूथ अपील इस गीत से छलकती है।

विश्व दीपक - हाँ, और यह तो बिल्कुल अमित त्रिवेदी टाइप का गाना है। इस गीत को रॉक शैली में भी बनाया जा सकता था, लेकिन उससे शायद फ़ील कम हो जाती। इस तरह के नरम बोलों के लिए इस तरह का म्युज़िक अरेंजमेण्ट बिलकुल सटीक है।

सुजॊय - अच्छा, हमने इस फ़िल्म के अभिनेताओं का ज़िक्र तो किया ही नहीं! फ़िल्म 'आयशा' में नायक हैं अभय देओल और नायिका हैं सोनम कपूर। यानी कि आयशा बनी हैं सोनम कपूर। सोनम भी फ़िल्म दर फ़िल्म अपने कैरियर की सीढ़ियाँ चढ़ती जा रही हैं। 'दिल्ली-६' और ' आइ हेट लव स्टोरीज़' में उनके अभिनय को सराहा गया, और शायद 'आयशा' में भी वो सफल रहेंगी। अभय देओल अपना एक लो-प्रोफ़ाइल मेनटेन करते हैं लेकिन तीनों भाइयों की अगर बात करें तो मुझे तो सनी और बॊबी से ज़्यादा अभय की ऐकटिंग ज़्यादा जँचती है। ख़ैर, पसंद अपनी-अपनी ख़याल अपना-अपना। लीजिए सुनिए 'आएशा' का चौथा गाना।

गीत: बहके बहके नैन


विश्व दीपक - बहके बहके अंदाज़ में यह गीत गाया है अनुष्का मनचन्दा, सम्राट कौशल और रमण महादेवन ने। पूरी तरह से कारनिवल फ़ील लिए हुए है। हिंदी और अंग्रेज़ी के बोलों का संतुलित संगम है यह गीत। सम्राट और रमण ने जहाँ अंग्रेज़ी बोलों के साथ पूरा न्याय किया है, वहीं अनुष्का भी अपनी गायकी का लोहा मनवाने में कामयाब रही हैं। जिस तरह की अदायगी, जिस तरह का थ्रो इस गाने में चाहिए था, अनुष्का ने उसका पूरा पूरा ख़याल रखा। ऐकॊरडिओन की ध्वनियाँ इस गीत में सुनने को मिलती है, और जो हमें याद दिलाती है शंकर जयकिशन की।

सुजॊय - पूरी तरह से एक डांस नंबर है यह गीत और जैसा कि आपने कहा कि कारनिवल गीत, तो कुछ इसी तरह के कारनिवल गीतों की याद दिलाएँ आप सब को। फ़िल्म 'धूम' में "सलामी", 'धूम-२' में "टच मी डोण्ट टच मी सोणीया", 'हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड' में "प्यार की ये कहानी सुनों", ये सभी इसी जौनर में आते हैं।

विश्व दीपक - हाँ, और इन सब गीतों में करीबीयन, अरबी और कुछ कुछ गोवन (पोर्चुगीज़) संगीत की छाप नज़र आती है। और ऐसे गीतों में लैटिन नृत्य शैली का ख़ास तौर से प्रयोग होता है। इस गीत से एक मूड बन गया है, तो इस मूड को थोड़ा सा बदलते हुए एक बिल्कुल ही अलग किस्म का गीत सुनते हैं।

गीत: लहरें


सुजॊय - "खोयी खोयी सी हूँ मैं, क्यों ये दिल का हाल है, धुंधले सारे ख़्वाब हैं, उलझा हर ख़याल है, सारी कलियाँ मुरझा गईं, लोग उनके यादों में रह गए, सारे घरोंदे रेत के, लहरें आईं लहरों में मिल गए" - एक बेहतरीन गीत, शब्दों के लिहाज़ से, संगीत के लिहाज़ से और गायकी के लिहाज़ से भी। अनुषा मणि की मुख्य आवाज़ थी इस गीत में जिसे उन्होने एक हस्की फ़ील के साथ गाया। नोमान पिण्टो और निखिल डी'सूज़ा ने वोकल बैकिंग दी।

विश्व दीपक - हर तरह से यह गीत इस ऐल्बम का सर्वश्रेष्ठ गीत है, और हो सकता है कि अनुषा मणि पिछले साल "इकतारा" के कविता सेठ की तरह इस बार फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार हासिल कर लें। अब तक इस फ़िल्म के जितने भी गानें हमने सुनें, किसी भी गीत से हताशा नहीं हुई और हर एक गीत में कुछ ना कुछ अच्छी बात दिल को छू गई। तो अब जो इस फ़िल्म का एक अंतिम गीत बचा है, उसे भी सुनते चलें।

सुजॊय - ज़रूर!

गीत: बाइ दि वे


सुजॊय - जिस तरह से ऐल्बम की सुरीली शुरुआत हुई थी "सुनो आयशा" गीत के साथ, उतना ही धमाकेदार समापन हुआ अनुष्का मनचन्दा और नोमान पिण्टो के गाए इस फ़ास्ट डान्स नंबर से। इस रॉक पॊप सॊंग में अनुष्का जिस तरह से बोलती भी हैं, हमें फ़िल्म 'गजनी' में सुज़ेन डी'मेलो के गाए "ऐ बच्चु तू सुन ले" गीत की झलक दिखा जाती है।

"उड़ान" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - कुल मुलाकर, इस ऐल्बम के बारे में मेरा तो यही ख़याल है कि 'उड़ान' से ज़्यादा वरायटी इस ऐल्बम में है और बहुत जल्द ही अमित त्रिवेदी पहले कतार के संगीतकारों में अपना स्थान पक्का कर लेंगे और उस राह पर वो बड़े पुख़्ता क़दमों से चल भी पड़े हैं। अनुष्का मनचन्दा को अगर इसी तरह से गाने के मौके मिलते रहें तो वो भी सुनिधि की तरह नाम कर सकती है ब-शर्ते कि वो अपनी वरसटायलिटी बनाए और इन तेज़ रफ़्तार रॉकक गीतों के बाहर भी दूसरे जौनर के गीतों को निभाने की कोशिश करे। अनुषा मणि के लिए शुभकामनाएँ कि आने वाले दिनों में वो अपनी क्षमता का और सबूत पेश करें। और अमित त्रिवेदी का संगीत जितना नवीन है, उनकी आवाज़ में भी वही ताज़गी है। और रही बात जावेद अख़्तर साहब, तो भई उनकी शान में और क्या कह सकते हैं, वो तो हैं ही नंबर वन!

विश्व दीपक - सुजॊय जी, सही कहा आपने। आयशा के गीतों के सुनने के बाद मुझे लग रहा है कि हमने पिछली दफ़ा जो "आयशा" के आने की घोषणा की थी तो हमारी वह उम्मीद पूरी तरह से सही हीं साबित हुई है। अमित के बारे में और क्या कहूँ, मैंने "उड़ान" के गीतों की समीक्षा के दौरान हीं अपना दिल खोल कर रख दिया था। हाँ, जावेद साहब की कही कुछ बातें आपसे जरूर बाँटना चाहूँगा। "आयशा" के "म्युजिक-रीलिज" के समय जावेद साहब ने हँसी-मज़ाक में हीं सही, लेकिन एक "गीतकार" की हालत जरूर बयान कर दी। उन्होने कहा कि आज का दिन मेरे लिए सबसे अच्छा दिन है, क्योंकि आज के बाद मुझे "रिया कपूर" (फिल्म की निर्माता और सोनम की छोटी बहन) के फोन नहीं आएँगे। आज के बाद कोई मुझसे यह नहीं कहेगा कि "मुखरा" बदल दीजिये या फिर "दूसरे अंतरा" की तीसरी पंक्ति "पुराने गानों" जैसी लग रही है, इसे हटाईये। जावेद साहब ने अपनी नानी/दादी का ज़िक्र करते हुए कहा कि वे मुझे डराने के लिए "भूत" का नाम लेती थीं और आजकल के निर्माता-निर्देशक मुझे डराने के लिए "यूथ" (युवा-पीढी) का नाम लेते हैं और कहते हैं कि यह "यूथ" की भाषा नहीं। आखिरकार जावेद साहब पूछ हीं बैठे कि भई यूथ की भाषा क्या है, उसकी कोई डिक्शनरी, उसका कोई ग्रामर तो होगा हीं। जिस किसी के पास वे किताबें हों, मुझे दे जाए, बड़ी हीं कृपा होगी। अगली फिल्म से मैं उस किताब को देखकर हीं गाने लिखूँगा। तो अगर यह हालत जावेद साहब की है, तो दूसरे गीतकारों के साथ क्या होता होगा। जब तक निर्माता, निर्देशक या दूसरा कोई और गीतकार के काम में दखल देना बंद नहीं करेगा, तब तक दिल को छूने वाले अच्छे गाने कहाँ से लिखे जाएँगें। जाते-जाते जावेद साहब ने गीतकार-संगीतकार के लिए बन रहे नए ऐक्ट की भी बात की, जिसमें गानों के राईट इन सबको भी हासिल होंगे। उन्होंने कहा कि जब गीतकार गाने का मालिक हो जाएगा तो फिर लोग उसे तुच्छ जीव समझने की भूल नहीं करेंगे। मुझे भी उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार है। खैर, बात तो समीक्षा की हो रही थी और मैं न जाने कहाँ बह निकला। तो वापस आते हैं "आयशा" पे। मुझे पक्का यकीन है कि आप सबों को इसके सारे गाने पसंद आएँगे। इसी उम्मीद के साथ हम आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। अगली दफ़ा ऐसी हीं कोई फिल्म होगी.. शायद "पिपली लाईव" या "खट्टा-मीठा" या फिर कोई और हीं फिल्म। अभी कह नहीं सकता, जानने के लिए अगले "ताज़ा सुर ताल" का हिस्सा जरूर बनें।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ७९- अमित त्रिवेदी के जोड़ीदार गीतकार रहे हैं अमिताभ भट्टाचार्य। इस फ़िल्म में जावेद अख़्तर का साथ अमित को मिला। तो बताइए कि इससे पहले जावेद साहब के लिखे किस गीत की धुन अमित त्रिवेदी ने बनाई थी?

TST ट्रिविया # ८०- हमने मनोहारी सिंह का ज़िक्र आज इस स्तंभ में किया। आपको बताना है कि मनोहारी दा ने सब से पहले किस हिंदी फ़िल्मी गीत में सैक्सोफ़ोन बजाया था?

TST ट्रिविया # ८१- गीतकार जावेद अख़्तर को आप फ़िल्म 'ठोकर' के मशहूर गीत "ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ" से कैसे जोड़ सकते हैं? (इस नज़्म का ज़िक्र हमने महफ़िल-ए-ग़ज़ल पर भी किया था)


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. कविता चौधरी।
२. 'यूं होता तो क्या होता'।
३. अमित त्रिवेदी (संगीतकार) और अमिताभ भट्टाचार्य (गीतकार) ने। (इस राज़ का पर्दाफ़ाश खुद अमित ने एक इंटरव्यु में किया था)।

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!
तीसरा नहीं भी पता था तो तुक्का मार देतीं.. क्योंकि तुक्के में इन्हीं दोनों कलाकारों के नाम आने की ज्यादा संभावनाएँ हैं।.. खैर कोई बात नहीं.. इस बार के सवालों पर नज़र दौड़ाईये।

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