Saturday, April 24, 2010

सेन्शुअस गीतों को एक नयी परिभाषा दी ओ पी नय्यर साहब ने

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ०४

१९६८ में कमल मेहरा की बनायी फ़िल्म आयी थी 'क़िस्मत'। मनमोहन देसाई निर्देशित फ़िल्म 'क़िस्मत' की क़िस्मत बुलंद थी। फ़िल्म तो कामयाब रही ही, फ़िल्म के गीतों ने भी ख़ासा धूम मचाये। अपनी दूसरी फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी ओ. पी. नय्यर ने यह सिद्ध किया कि ६० के दशक के अंत में भी वो नयी पीढ़ी के किसी भी लोकप्रिय संगीतकार को सीधी टक्कर दे सकते हैं। इस फ़िल्म का वह हास्य गीत तो आपको याद है न "कजरा मोहब्बतवाला", जिसमें शमशाद बेग़म ने विश्वजीत का प्लेबैक किया था! फ़िल्म की नायिका बबिता के लिये गीत गाये आशा भोसले ने। इस फ़िल्म में नय्यर साहब की सबसे ख़ास गायिका आशाजी ने कई अच्छे गीत गाये जिनमें से सबसे लोकप्रिय गीत आज हम इस महफ़िल के लिए चुन लाये हैं। तो चलिये हुज़ूर, देर किस बात की, आपको सितारों की सैर करवा लाते हैं आज! "आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूँ, दिल झूम जाये ऐसी बहारों में ले चलूँ", यह एक पार्टी गीत है, जिसे नायिका शराब के नशे मे गाती हैं। और आपको पता ही है कि इस तरह के हिचकियाँ वाले नशीले गीतों को आशाजी किस तरह का अंजाम देती हैं। तो साहब, यह गीत भी उनकी गायिकी और अदायिगी से अमरत्व को प्राप्त हो चुका है। इस गीत में बबिता का मेक-अप कुछ इस तरह का था कि वो कुछ हद तक करिश्मा कपूर की ९० के दशक के दिनों की तरह लग रहीं थीं। इस फ़िल्म के सभी गीतों को एस. एच. बिहारी साहब ने लिखे थे सिवाय इस गीत के जिसे एक बहुत ही कमचर्चित गीतकार नूर देवासी ने लिखा था। दशकों बाद १९९४ में ओ.पी. नय्यर के संगीत से सजी एक फ़िल्म आयी थी 'ज़िद' जिसमें नूर देवासी साहब ने एक बार फिर उनके लिए गीत लिखे, जिसे मोहम्मद अज़िज़ ने गाया था "दर्द-ए-दिल की क्या है दवा"।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - आओ हुज़ूर तुमको
कवर गायन - कुहू गुप्ता




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कुहू गुप्ता
कुहू गुप्ता पेशे से पुणे में कार्यरत एक सॉफ्टवेर एन्जिनेअर हैं लेकिन इनका संगीत के साथ लगाव बचपन से ही रहा है. कहा जा सकता है कि इन्हें भगवान ने एक मधुर आवाज़ से नवांजा है और इनकी कोशिश यही है कि अपनी गायकी को हर दिन बेहतर बनाती जाएँ. इन्होने हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत कि शिक्षा ११ साल की उम्र से शुरू की और ४ साल तक सीखा. ज़ी टीवी के मशहूर प्रोग्राम सारेगामापा में ये २ बार अपनी गायकी दिखा चुकी हैं. इन्होने कुछ मूल रचनाएँ भी गई हैं, जिनमे से एक हिंद युग्म के काव्य नाद एल्बम का हिस्सा है और कुछ व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल हुई हैं. इनके गाये हुए हिन्दी फिल्मों के गानों के कवर्स आज कल इन्टरनेट डेक्कन रेडियो पर भी सुनाये जा रहे हैं. इन सब के साथ साथ ये स्टेज शोव्स भी करती हैं.


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

साईकिल की सवारी - पंडित सुदर्शन

सुनो कहानी: पंडित सुदर्शन की "साईकिल की सवारी"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार कमलेश्वर की पहली कहानी "कामरेड" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं हिंदी और उर्दू के अमर साहित्यकार पंडित सुदर्शन की प्रसिद्ध कहानी "साईकिल की सवारी", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने।

पंडित सुदर्शन की कालजयी रचना "हार की जीत", को सुनो कहानी में शरद तैलंग की आवाज़ में हम आपके लिए पहले ही प्रस्तुत कर चुके हैं. ।

कहानी "साईकिल की सवारी" का कुल प्रसारण समय 15 मिनट 17 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



“अब कोई दीन-दुखियों से मुँह न मोड़ेगा।”
~ सुदर्शन (मूल नाम: पंडित बद्रीनाथ भट्ट)
(1895-1967)


जम्मू में पांचवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में पहली बार "हार का जीत" पढी थी। तब से ही इसके लेखक के बारे में जानने की उत्सुकता थी। दुःख की बात है कि हार की जीत जैसी कालजयी रचना के लेखक के बारे में जानकारी बहुत कम लोगों को है। गुलज़ार और अमृता प्रीतम पर आपको अंतरजाल पर बहुत कुछ मिल जाएगा मगर यदि आप पंडित सुदर्शन की जन्मतिथि, जन्मस्थान (सिआलकोट) या कर्मभूमि के बारे में ढूँढने निकलें तो निराशा ही होगी। मुंशी प्रेमचंद और उपेन्द्रनाथ अश्क की तरह पंडित सुदर्शन हिन्दी और उर्दू में लिखते रहे हैं। उनकी गणना प्रेमचंद संस्थान के लेखकों में विश्वम्भरनाथ कौशिक, राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि के साथ की जाती है। लाहोर की उर्दू पत्रिका हज़ार दास्ताँ में उनकी अनेकों कहानियां छपीं। उनकी पुस्तकें मुम्बई के हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय द्वारा भी प्रकाशित हुईं। उन्हें गद्य और पद्य दोनों ही में महारत थी। पंडित जी की पहली कहानी "हार की जीत" १९२० में सरस्वती में प्रकाशित हुई थी। मुख्य धारा के साहित्य-सृजन के अतिरिक्त उन्होंने अनेकों फिल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे हैं. सोहराब मोदी की सिकंदर (१९४१) सहित अनेक फिल्मों की सफलता का श्रेय उनके पटकथा लेखन को जाता है। सन १९३५ में उन्होंने "कुंवारी या विधवा" फिल्म का निर्देशन भी किया। वे १९५० में बने फिल्म लेखक संघ के प्रथम उपाध्यक्ष थे। वे १९४५ में महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित अखिल भारतीय हिन्दुस्तानी प्रचार सभा वर्धा की साहित्य परिषद् के सम्मानित सदस्यों में थे। उनकी रचनाओं में तीर्थ-यात्रा, पत्थरों का सौदागर, पृथ्वी-वल्लभ, बचपन की एक घटना, परिवर्तन, अपनी कमाई, हेर-फेर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। फिल्म धूप-छाँव (१९३५) के प्रसिद्ध गीत तेरी गठरी में लागा चोर, बाबा मन की आँखें खोल आदि उन्ही के लिखे हुए हैं।
(निवेदक: अनुराग शर्मा)

बुरा समय आता है तो बुद्धि पहले ही भ्रष्ट हो जाती है।
(पंडित सुदर्शन की "साईकिल की सवारी" से एक अंश)


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#70th Story, Cycle ki Savari: Pt. Sudarshan/Hindi Audio Book/2010/15. Voice: Archana

Friday, April 23, 2010

राजकपूर की फ़िल्मी संवेदना और शंकर जयकिशन की संगीत अभिव्यक्ति

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ०३

१९५१ में राज कपूर और नरगिस की फ़िल्म 'आवारा' में हसरत जयपुरी का लिखा, शंकर जयकिशन का संगीतबद्ध किया, और लता मंगेशकर का गाया "आ जाओ तड़पते हैं अरमान अब रात गुज़रनेवाली है" बहुत बहुत लोकप्रिय हुआ था। "चांद की रंगत उड़ने लगी, वो तारों के दिल अब डूब गए, घबराके नज़र भी हार गई, तक़दीर को भी नींद आने लगी", अपने साथी के इन्तेज़ार की यह पीड़ा बिल्कुल जीवंत हो उठी थी हसरत साहब के इन शब्दों में। इस गीत का असर कुछ इस क़दर हुआ कि राज कपूर की अगली ही फ़िल्म 'आह' में भी उन्होने हसरत साहब से ऐसा ही एक गीत लिखवाया। इस बार गीत एकल नहीं बल्कि लताजी और मुकेश साहब की युगल आवाज़ों में था। और यही गीत आज पेश-ए-खिदमत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में। १९५३ की फ़िल्म 'आह' में राज कपूर के साथ नरगिस एक बार फिर नज़र आयीं। यह फ़िल्म 'आवारा' की तरह 'बौक्स औफ़िस' पर कामयाबी के झंडे तो नहीं गाढ़े लेकिन जहाँ तक इसके संगीत का सवाल है, तो इसके गाने गली गली गूंजे, और आज भी कहीं ना कहीं से अक्सर सुनाई दे जाते हैं। प्रस्तुत गीत "आजा रे अब मेरा दिल पुकारा" फ़िल्मी गीतों के इतिहास का वह मोती है जिसको अच्छे संगीत के क़द्र्दानों ने आज भी अपने दिलों में बसा रखा है, और आज ५५ साल बाद भी इस मोती की वही चमक बरक़रार है। इस गीत की खासियत यह है कि बहुत कम साज़ों का इस्तेमाल किया है शंकर जयकिशन ने, मुख्य रूप से मटके का सुंदर प्रयोग हुआ है। लताजी के गाए आलाप इस गीत को और भी ज़्यादा असरदार बना देते हैं। और जुदाई के दर्द को बयां करती हसरत साहब के बोलों के तो क्या कहने, बस गीत सुनिये और ख़ुद ही महसूस कीजिये।

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गीत - आजा रे अब मेरा दिल पुकारा...
कवर गायन - पारसमणी आचार्य और प्रदीप सोम सुन्दरन




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डाक्टर पारसमणी आचार्य
मैं पारसमणी राजकोट गुजरात से हूँ, पापा पुलिस में थे और बहुत से वाध्य बजा लेते थे, उनमें से सितार मेरा पसंदीदा था. माँ भी HMV और AIR के लिए क्षेत्रीय भाषा में पार्श्वगायन करती थी, रेडियो पर मेरा गायन काफी छोटी उम्र से शुरू हो गया था. मैं खुशकिस्मत हूँ कि उस्ताद सुलतान खान साहब, बेगम अख्तर, रफ़ी साहब और पंडित रवि शंकर जी जैसे दिग्गजों को मैंने करीब से देखा और उनका आशीर्वाद पाया. गायन मेरा शौक तब भी था और अब भी है, रफ़ी साहब, लता मंगेशकर, सहगल साहब, बड़े गुलाम अली खान साहब और आशा भोसले मेरी सबसे पसंदीदा हैं

प्रदीप सोमसुन्दरन
जो लोग टीवी पर म्यूजिकल शो देखने के शौक़ीन हैं, उन्होंने भारतीय टेलीविजन पर पहले सांगैतिक आयोजन 'मेरी आवाज़ सुनो' को ज़रूर देखा होगा। प्रदीप सोमसुंदरन को इसी कार्यक्रम में सन 1996 में सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक चुना गया था और लता मंगेशकर सम्मान से सम्मानित किया गया था। 26 जनवरी 1967 को नेल्लूवया, नेल्लूर, केरल में जन्मे प्रदीप पेशे से इलेक्ट्रानिक के प्राध्यापक हैं। त्रिचुर की श्रीमती गीता रानी से 12 वर्ष की अवस्था में ही प्रदीप ने कर्नाटक-संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दी थी और 16 वर्ष की अवस्था में स्टेज-परफॉर्मेन्स देने लेगे थे। प्रदीप कनार्टक शास्त्रीय गायन के अतिरिक्त हिन्दी, मलयालम, तमिल, तेलगू, अंग्रेज़ी और जापानी आदि भाषाओं में ग़ज़लें और भजन गाते हैं। इन्होंने कई मलयालम फिल्मी गीतों में अपनी आवाज़ दी है। और गैर मलयालम फिल्मी तथा गैर हिन्दी फिल्मी गीतों में ये काफी चर्चित रहे हैं।


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मन के बंद कमरों को लौट चलने की सलाह देता एक रॉक गीत कृष्ण राजकुमार की आवाज़ में

Season 3 of new Music, Song # 04


दोस्तों, आवाज़ संगीत महोत्सव, सत्र ३ के चौथे गीत की है आज बारी. बतौर संगीतकार- गीतकार जोड़ी में ऋषि एस और सजीव सारथी ने गुजरे पिछले दो सत्रों में सुबह की ताजगी, मैं नदी, जीत के गीत, और वन वर्ल्ड, जैसे बेहद चर्चित और लोकप्रिय गीत आपकी नज़र किये हैं. इस सत्र में ये पहली बार आज साथ आ रहे हैं संगीत का एक नया (कम से कम युग्म के लिए) जॉनर लेकर, जी हाँ रॉक संगीत है आज का मीनू, रॉक संगीत में मुख्यता लीड और बेस गिटार का इस्तेमाल होता है जिसके साथ ताल के लिए ड्रम का प्रयोग होता है, अमूमन इस तरह के गीतों में एक लीड गायक/गायिका को सहयोग देने को एक या अधिक बैक अप आवाजें भी होती हैं. रॉक हार्ड और सोफ्ट हो सकता है. सोफ्ट रॉक अक्सर एक खास थीम को लेकर रचा जाता है. फिल्म "रॉक ऑन" के गीत इसके उदाहरण हैं. इसी तरह के एक थीम को लेकर रचा गया आज का ये सोफ्ट रॉक गीत है कृष्ण राज कुमार की आवाज़ में, जिन्हें ऋषि ने खुद अपनी आवाज़ में बैक अप दिया है. कृष्ण राज कुमार बतौर संगीत/गायक युग्म में पधारे थे "राहतें सारी" गीत के साथ. काव्यनाद के लिए आयोजित प्रतियोगिताओं में इन्होने अपने संगीत और गायन का उन्दा उदाहरण सामने रखा हर बार, और हर बार ही किसी न किसी सम्मान के ये हक़दार बनें. काव्यनाद में इनकी आवाज़ में दो शानदार गीत हैं, जिन्हें खासी सराहना मिली है. "अरुण ये मधुमय देश हमारा" राष्ट्रीय एफ एम् चैनल "एफ एम् रेनबो" से बज चुका है. तो सुनिए आज की ये प्रस्तुति और अपने स्नेह सुझावों से इन कलाकारों का मार्गदर्शन करें.

गीत के बोल -

ये गलियां, रंग रलियाँ,
ये तेरी नहीं हैं,
तेरा नहीं है जो उसे अब छोड़ चल,
लौट चल...लौट चल...
इस शोर के जंगल से निकल,
रफ़्तार के दल दल में बस,
तन्हाईयाँ है, बेजारियां है,
इस दौड से मुंह मोड चल,
लौट चल...लौट चल...

तुने देखा है फलक को कफस से आज तक,
कभी पंख फैला और उड़ने की कोशिश तो कर,
जो ये जहाँ है, बस एक गुमाँ है,
सारे भरम अब तोड़ चल,
लौट चल...लौट चल...

तू बन्दा अपने खुदा का है, तेरा सानी कौन है,
एक मकसद है यहाँ हर शय का बेमानी कौन है,
उसका निशाँ है, तू जो यहाँ है,
खुद को खुदी से अब जोड़ चल,
लौट चल...लौट चल...

इस धूप के परे भी है एक आसमां,
एक नूर से रोशन है वो तेरा जहाँ,
एक आसमां है, तेरा जहाँ है,
अपनी जमीं को अब खोज चल,
लौट चल...लौट चल...
लौट चल...आ लौट चल



मेकिंग ऑफ़ "लौट चल" - गीत की टीम द्वारा

ऋषि एस- "लौट चल" एक और कोशिश है सामान्य रोमांटिक गीतों से कुछ अलग करने का, एक थीम और उसमें छुपे सन्देश को युवाओं की अभिरुचि अनुरूप रॉक अंदाज़ में इसे किया गया है

कृष्ण राजकुमार- ऋषि ने करीब ५-६ महीने पहले मुझे इस गीत के लिए संपर्क किया था, वो किसी रॉक संगीत मुकाबले के लिए इसे भेजना चाहते थे, मुझे शक था कि क्या मैं रॉक गीत को निभा पाऊंगा, पर ऋषि ने मुझे पर विश्वास किया. और ईश्वर की कृपा से मुझे लगता है कि कुछ हद तक मैं इस गीत के साथ न्याय कर पाया हूँ, बाकी तो आप श्रोता ही बेहतर बता सकते हैं. मैं ऋषि का शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने मुझे इस गीत के काबिल समझा.

सजीव सारथी-ये गीत लगभग ५-६ महीने पहले बना था, एक दिन ऋषि कहने लगे कि कुछ अलग करना चाहिए, उस दिन वो कुछ दार्शनिक जैसी बातें कर रहे थे, मैंने कहा गीत तो हमारे किसी भी एक खास ख़याल से पैदा हो सकता है, तो उन्होंने कहा कि फिर आप कोई नयी थीम पर लिखिए, मैंने कहा लीजिए आज हम जिस विषय पर बात कर रहे हैं इसी पर आपको कुछ लिख कर भेजता हूँ, अमूमन मेरी और ऋषि की जब भी बात होती है संगीत से सम्बंधित ही होती है उसी से फुर्सत नहीं मिलती कि कुछ और कहा सुना जाए, मगर उस दिन हम कुछ इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे, जो इस गीत का भी थीम है, दुनिया की दौड धूप जो शायद हमने खुद अपने ऊपर थोपी हुई है उससे अलग एक दुनिया है हमारे ही भीतर जिसे शास्त्रों में स्वर्ग जन्नत आदि नाम दिए गए हैं, जहाँ कविता है संगीत है रचनात्मकता है, और आप खुद है अपने वास्तविक स्वरुप में, तमाम वर्जनाओं से पृथक...खैर अब आप बताएं कि इस विषय पर आप क्या सोचते हैं और अपने इस गीत के माध्यम किस हद तक मैं इस बात को कहने में सफल हो पाया हूँ

ऋषि एस॰
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

कृष्ण राजकुमार
कृष्ण राज कुमार ने इस प्रतियोगिता की हर कड़ी में भाग लिया है। जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्रथम पुरस्कार, सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' के लिए द्वितीय पुरस्कार, महादेवी वर्मा के लिए भी प्रथम पुरस्कार। निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' के लिए भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय थी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'कलम! आज उनकी जय बोल' के लिए द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया। और इस बार भी इन्होंने पहला स्थान बनाया है। कृष्ण राज कुमार जो मात्र 22 वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले 14 सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

सजीव सारथी
हिन्द-युग्म के 'आवाज़' मंच के प्रधान संपादक सजीव सारथी हिन्द-युग्म के वरिष्ठतम गीतकार हैं। हिन्द-युग्म पर इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीत निर्माण का बीज सजीव ने ही डाला है, जो इन्हीं के बागवानी में लगातार फल-फूल रहा है। कविहृदयी सजीव की कविताएँ हिन्द-युग्म के बहुचर्चित कविता-संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में संकलित है। सजीव के निर्देशन में ही हिन्द-युग्म ने 3 फरवरी 2008 को अपना पहला संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी किया जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे। पूरी प्रोफाइल यहाँ देखें।
Song - Laut Chal
Voices - Krishna Raajkumar, Rishi S
Music - Rishi S
Lyrics - Sajeev Sarathie
Graphics - Samarth Garg


Song # 04, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

इस गीत का प्लेयर फेसबुक/ऑरकुट/ब्लॉग/वेबसाइट पर लगाइए

Thursday, April 22, 2010

पंचम, बख्शी साहब और किशोर दा का हो मेल तो गीत रचना हो जैसे खेल

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ०२

'ओल्ड इज़ गोल्ड' रिवाइवल की दूसरी कड़ी में आज सुनिए फ़िल्म 'शालिमार' का गीत "हम बेवफ़ा हरग़िज़ ना थे, पर हम वफ़ा कर ना सके"। आनंद बक्शी का लिखा और राहुल देव बर्मन का स्वरब्द्ध किया यह गीत है जिसे किशोर कुमार और साथियों ने गाया था। क्योंकि यह गीत बक्शी साहब, पंचम दा और किशोर दा की मशहूर तिकड़ी का है, तो आज हम दोहराव कर रहे हैं उन बातों का जिनसे आप यह जान पाएँगे कि यह तिकड़ी बनी किस तरह थी। १९६९ में जब शक्ति सामंत ने एक बड़ी ही नई क़िस्म की फ़िल्म 'आराधना' बनाने की सोची तो उसमें उन्होने हर पक्ष के लिए नए नए प्रतिभाओं को लेना चाहा। बतौर नायक राजेश खन्ना और बतौर नायिका शर्मीला टैगोर को चुना गया। अब हुआ युं कि शुरुआत में यह तय हुआ था कि रफ़ी साहब बनेंगे राजेश खन्ना की आवाज़। लेकिन उन दिनों रफ़ी साहब एक लम्बी विदेश यात्रा पर गए हुए थे। इसलिए शक्तिदा ने किशोर कुमार का नाम सुझाया। शुरु शुरु में सचिनदा बतौर गीतकार शैलेन्द्र को लेना चाह रहे थे, लेकिन यहाँ भी शक्तिदा ने सुझाव दिया कि क्यों ना सचिनदा की जोड़ी उभरते गीतकार आनंद बक्शी के साथ बनाई जाए। और यहाँ भी उनका सुझाव रंग लाया। जब तक रफ़ी साहब अपनी विदेश यात्रा से लौटते, इस फ़िल्म के करीब करीब सभी गाने रिकार्ड हो चुके थे सिवाय दो गीतों के, जिन्हे फिर रफ़ी साहब ने गाया। इस तरह से आनंद बक्शी को पहली बार सचिन देव बर्मन के साथ काम करने का मौका मिला। 'आराधना' के बाद आई शक्ति दा की अगली फ़िल्म 'कटी पतंग' जिसमें आनंद बक्शी की जोड़ी बनी सचिन दा के बेटे पंचम यानी राहुल देव बर्मन के साथ, और इस फ़िल्म ने भी सफलता के कई झंडे गाढ़े। 'कटी पतंग' की सफलता के जशन अभी ख़तम भी नहीं हुए थे कि शक्तिदा की अगली फ़िल्म 'अमर प्रेम' आ गयी १९७१ में और एक बार फिर से वही कामयाबी की कहानी दोहरायी गई। आनंद बक्शी, राहूल देव बर्मन और किशोर कुमार की अच्छी-ख़ासी तिकड़ी बन चुकी थी और इस फ़िल्म के गाने भी ऐसे गूंजे कि अब तक उनकी गूंज सुनाई देती है।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - हम बेवफा
कवर गायन - राकेश बोरो




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राकेश बोरो
बचपन में पहली बार किशोर जी की आवाज़ सुनी तब से उनकी आवाज़ से प्यार हो गया मुझे. तब से ज्यादातर उन्हीं के गाने सुनता और गाता आ रहा हूँ. वैसे रफ़ी साहब, लता जी और आशा जी के गाने भी बहुत पसंद हैं पर किशोर जी की आवाज़ का जादू सबसे हट के लगा मुझे. नए गायकों में उदित नारायण बेहतर है.


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Wednesday, April 21, 2010

खय्याम का संगीत था कुछ अलग अंदाज़ का, जिसमें शायरी और बोलों का भी होता था खास स्थान

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # 01

मस्ते दोस्तों! जैसा कि कल की कड़ी में हमने आपको यह आभास दिया था कि आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर होगा कुछ अलग हट के, तो अब वह घड़ी आ गई है कि आपको इस बदलाव के बारे में बताया जाए। आज से लेकर अगले ४५ दिनों तक आपके लिए होगा 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल'। इसके तहत हम कुल ४५ गीत आपको सुनवाएँगे। लेकिन जो ख़ास बात है वह यह कि हम इन गीतों के ऒरिजिनल वर्ज़न नहीं सुनवाएँगे, बल्कि वो वर्ज़न जिन्हे 'हिंद युग्म' के आप ही के कुछ जाने पहचाने दोस्तों ने गाए हैं। यानी कि गानें वही पर अंदाज़ नए। दूसरे शब्दो में उन गीतों का रिवाइवल। हम आपसे बस यही निवेदन करना चाहेंगे कि आप इन गीतों का इनके ऒरिजिनल वर्ज़न के साथ तुलना ना करें। यह बस एक छोटी सी कोशिश है कि उस गुज़रे ज़माने के महान कलाकारों की कला को श्रद्धांजली अर्पित करने की। इन गीतों के साथ साथ आलेख में जो अतिरिक्त जानकारी हम आपको देंगे, उनमें से हो सकता है कि कुछ बातें हमने पहले भी किसी ना किसी गीत के साथ बताए होंगे, और कुछ जानकारी नयी भी हो सकते हैं। यानी एक तरफ़ गीतों का रिवाइवल, और दूसरी तरफ़ जानकारियों का रीकैप। हम उम्मीद करते हैं कि आपको इस स्तंभ का यह नया रूप ज़रूर पसंद आएगा। तो आइए शुरु किया जाए 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' फ़िल्म 'कभी कभी' के शीर्षक गीत के साथ। साहिर लुधियानवी का लिखा और ख़य्याम साहब का स्वरबद्ध किया यह गीत मुकेश और लता मंगेशकर ने गाया था। १९४९ में शर्मा जी के नाम से ख़य्याम साहब ने पहली बार फ़िल्म 'परदा' में संगीत दिया था। इसी नाम से उन्होने १९५० की फ़िल्म 'बीवी' में भी एक गीत को स्वरबद्ध किया था। उस वक़्त के साम्प्रदायिक तनाव के चलते उन्होने अपना नाम बदलकर शर्माजी रख लिया था। लेकिन १९५३ मेरं ज़िया सरहदी की फ़िल्म 'फ़ूटपाथ' में ख़य्याम के नाम से संगीत देकर वो फ़िल्म संगीत संसार में छा गए। इसके कुछ सालों तक वो फ़िल्मों में संगीत तो देते रहे लेकिन कुछ बात नहीं बनी। १९५८ में फ़िल्म 'फिर सुबह होगी' उनके फ़िल्मी सफ़र में एक बार फिर से सुबह लेकर आई और उसके बाद उन्हे अपार शोहरत हासिल हुई। फ़िल्म 'कभी कभी' के बारे में और ख़ास कर इस प्रस्तुत गीत के बारे में पंकज राज अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में लिखते हैं - "सागर सरहदी के सशक्त यादगार संवादों को लिए उर्दू शायरी की तरह रूमानी और भावुक कथानक और निर्देशन के बीच अमिताभ की इंटेन्स शायराना अदाकारी लेकर आई इस फ़िल्म में शायर नायक के लिए साहिर के उस पुराने नज़्म को शामिल किया गया जिसे महेन्द्र कपूर पहले भी बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मी पार्टियों में गाया करते थे। पर इस बार धुन ख़य्याम की थी और इस लोकप्रिय नज़्म "कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है" को गाने वाले थे मुकेश और लता। शायराना रोमांस की नाज़ुकता को उभारने के लिए ख़य्याम ने फिर अपने पसंदीदा यमन का ही सहारा लिया और "कभी कभी मेरे दिल में..." यमन की कोमल स्वरलहरियों पर बेहद खूबसूरती से चलाया। और क्या चला था यह गीत! सालाना बिनाका की पहली पायदान और मुकेश को मरणोपरान्त सर्वश्रेष्ठ गायक के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिलाने का हकदार यही गीत बना। ख़य्याम को 'कभी कभी' के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार मिला।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - कभी कभी
कवर गायन - रश्मि नायर




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रश्मि नायर
इन्टरनेट पर बेहद सक्रिय और चर्चित रश्मि मूलत केरल से ताल्लुक रखती हैं पर मुंबई में जन्मी, चेन्नई में पढ़ी, पुणे से कॉलेज करने वाली रश्मि इन दिनों अमेरिका में निवास कर रही हैं और हर तरह के संगीत में रूचि रखती हैं, पर पुराने फ़िल्मी गीतों से विशेष लगाव है. संगीत के अलावा इन्हें छायाकारी, घूमने फिरने और फिल्मों का भी शौक है


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ज़ुल्मतकदे में मेरे.....ग़ालिब को अंतिम विदाई देने के लिए हमने विशेष तौर पर आमंत्रित किया है जनाब जगजीत सिंह जी को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८०

ज से कुछ दो या ढाई महीने पहले हमने ग़ालिब पर इस श्रृंखला की शुरूआत की थी और हमें यह कहते हुए बहुत हीं खुशी हो रही है कि हमने सफ़लतापूर्वक इस सफ़र को पूरा किया है क्योंकि आज इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी है। इस दौरान हमने जहाँ एक ओर ग़ालिब के मस्तमौला अंदाज़ का लुत्फ़ उठाया वहीं दूसरी ओर उनके दु:खों और गमों की भी चर्चा की। ग़ालिब एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें महज दस कड़ियों में नहीं समेटा जा सकता, फिर भी हमने पूरी कोशिश की कि उनकी ज़िंदगी का कोई भी लम्हा अनछुआ न रह जाए। बस यही ध्यान रखकर हमने ग़ालिब को जानने के लिए उनका सहारा लिया जिन्होंने किसी विश्वविद्यालय में तो नहीं लेकिन दिल और साहित्य के पाठ्यक्रम में ग़ालिब पर पी०एच०डी० जरूर हासिल की है। हमें उम्मीद है कि आप हमारा इशारा समझ गए होंगे। जी हाँ, हम गुलज़ार साहब की हीं बात कर रहे हैं। तो अगर आपने ग़ालिब पर चल रही इस श्रृंखला को ध्यान से पढा है तो आपने इस बात पर गौर ज़रूर किया होगा कि ग़ालिब पर आधारित पहली कड़ी हमने गुलज़ार साहब के शब्दों में हीं तैयार की थी, फिर तीसरी या चौथी कड़ी को भी गुलज़ार साहब ने संभाला था..... अब यदि ऐसी बात है तो क्यों न आज की कड़ी, आज की महफ़िल भी गुलज़ार साहब के शब्दों के सहारे हीं सजाई जाए। आज की महफ़िल में गुलज़ार साहब का ज़िक्र इसलिए भी लाज़िमी हो जाता है क्योंकि चचा ग़ालिब की जो गज़ल हम आज लेकर हाज़िर हुए हैं, उसे उस शख्स ने गाया है, जिसके गुलज़ार साहब के साथ हमेशा हीं अच्छे संबंध रहे हैं। वैसे भी गज़लों की दुनिया में उन्हें बादशाह हीं माना जाता है... समय आने पर हम उनके नाम का खुलासा जरूर करेंगे, उससे पहले क्यों न गुलज़ार साहब की किताब "मिर्ज़ा ग़ालिब- एक स्वानही मंज़रनामा" से चचा ग़ालिब की ज़िंदगी के कुछ और लम्हात परोसे जाएँ:

पुरानी दिल्ली में एक क़ातिब(वे जो क़िताबों को हाथ से लिखते थे) थे नज़मुद्दीन। नज़मुद्दीन ने मिर्ज़ा ग़ालिब के दीवान की क़िताबत सम्भाल ली थी। एक सुबह जब नज़मुद्दीन मिर्ज़ा ग़ालिब के दीवान की क़िताबत कर रहे थे, सामने एक कोने में उनकी बेगम ने क़िताबत की सियाही उबलने के लिए अँगीठी पर चढा रखी थी। नज़मुद्दीन एक ग़ज़ल की क़िताबत कर रहे थे, उन्होंने शेर पढा-

दाइम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं,
ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं।

नज़मुद्दीन ने दूसरा शेर पढा और अपनी बेगम की तरफ़ देखा-

क्यूँ गर्दिश मुदाम से घबरा न जाये दिल,
इंसान हूँ पियाला-ओ-सागर नहीं हूँ मैं।

बेगम ने गर्म-गर्म सियाही दवात में डालते हुए पूछा-
"किसका कलाम है, यूँ झूम-झूमकर पढ रहे हो?"

नज़मुद्दीन ने अगला शेर पढा-

या रब ज़माना मुझको मिटाता है किसलिए?
लौहे जहाँ पे हर्फ़े-मुकर्रर नहीं हूँ मैं।

"आ हा हा, क्या कमाल की बात कही है। इस जहाँ की तख़्ती पर मैं वह हर्फ़ नहीं जो दुबारा लिखा जा सके... या रब जमाना मुझको मिटाता है किसलिए। क्यूँ मिटाते हो यारों?"
बेगम हैरान हुईं। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था।
"पर ये हज़रत हैं कौन? बड़े दीवाने हो रहे हो उनके शेरों पर।"
नज़मुद्दीन अभी तक उसी नशे में सराबोर थे।
"और कौन हो सकता है? सिर्फ़ मिर्ज़ा हीं ये शेर कह सकते हैं।"
"अरे मिर्ज़ा ग़ालिब?"
बेगम ने माथा पीटा।
"उफ़ अल्लाह! किस कंगाल का काम ले लिया। फूटी कौड़ी भी न मिलेगी उनसे। क़िताबत तो दरकिनार, रोशनाई और क़लम के दाम भी नहीं निकलेंगे। जमाने भर के कर्ज़दार हैं, कुछ जानते भी हो।"
"ज़रा ये दीवान छप जाने दो, बेगम। ज़माना उनका कर्ज़दार न हो गया तो कहना। ऐसे शायर आसानी से पैदा न हीं होते।"
बेगम बड़बड़ाती हुई उठीं-
"हाँ, इतनी आसानी से मरते भी नहीं... रसोई के लिए कुछ पैसे हैं खीसे मैं?"
नज़मुद्दीन ने जेब में हाथ ड़ाला-
"अभी उस रोज़ तो दो रूपए दिए थे।"
"दो रूपए क्या महीने भर चलेंगे?"
"हफ़्ता भर तो चलते। ज़रा किफ़ायत से काम लिया करो।" नज़मुद्दीन ने कुछ रेज़गारी निकालकर दी।

यह वाक्या बहुत सारी बातें बयाँ करता है। अव्वल तो यह कि ग़ालिब के शेरों के शौकीन ग़ालिब की अहमियत जानते थे, लेकिन जिन्हें शेरों के अलावा दुनिया के और भी काम देखने हों उन्हें ग़ालिब से कटकर रहना हीं अच्छा लगता था। यह इसलिए नहीं कि ग़ालिब का बर्ताव बुरा था, बल्कि इसलिए कि ग़ालिब गरीबी के गर्त्त में अंदर तक धँसे हुए थे। और फिर एक गरीब दूसरे गरीब का क्या भला करेगा। वैसे नज़मुद्दीन ने बहुत हीं बारीक बात कही, जो गुलज़ार साहब ने इस किताब की भूमिका में भी कही थी-

"ज़माना उनका कर्ज़दार न हो गया तो कहना।" इस कर्ज़ की मियाद कितनी भी बढा क्यों न दी जाए, हममें इस कर्ज़ को चुकाने की कुवत नहीं।

एक और घटना जो ग़ालिब के अंतिम दिनों की है, जब अंग्रेज फ़ौज़ें दिल्ली का हुलिया बदलने में लगी थीं:

महरौली में पेड़ों से लटकी हुई लाशें झूल रही थीं। कुछ जगह चिताएँ जल रही थीं और चारों तरफ़ धुआँ हीं धुआँ था। कुछ लोग जो मरे हुए लोगों में अपने-अपने रिश्तेदारों को ढूँढ रहे थे। उनमें एक हाजी मीर भी थे। ज़ौक़ के चौक के पासवाले एक लड़के की लाश भी उनमें थी। अब उस धुएँ में ग़ालिब भी मौजूद थे। थोड़ी दूर पर हाफ़िज़ दिखाई दिया। उसके कपड़े तार-तार थे। ग़ालिब ने अपना दोशाला उसे ओढा दिया। हाफ़िज़ ने मिर्ज़ा का लिम्स पहचान लिया-
"मिर्ज़ा नौशा, आप यहाँ क्या कर रहे हैं?"
ग़ालिब ने जवाब में शेर कहा-

बनाकर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं।

"सब खैरियत तो है? आपका हाल क्या है?
"हमारा हाल अब हमसे क्या पूछते हो, हाफ़िज़ मियाँ। कुछ रोज़ बाद हमारे हमसायों से पूछना।"
ग़ालिब अब वहाँ से चल पड़े, बड़बड़ाते हुए-
"अब थक गया ज़िंदगी से- इन दिनों इतने जनाज़े उठाये हैं कि लगता है, जब मैं मरूँगा, मुझे उठानेवाला कोई न होगा।"
ग़ालिब दूर जाने लगे। धुएँ और रौशनी की पेड़ों से छनकर आती शुआएँ उन्हें छू-छूकर ज़मीन पर गिर रही थीं।

इसके ठीक दो साल बाद १५ फ़रवरी, १८६९ के रोज़ मिर्ज़ा ग़ालिब इंतक़ाल फ़र्मा गए। उन्हें चौसठ खम्बा के नज़दीक ख़ानदान लोहारू के कब्रस्तान में दफ़ना दिया गया।

और फिर इस तरह ग़ालिब हमस जुदा हो गए। वैसे ग़ालिब की रुखसती सिर्फ़ जहां-ए-फ़ानी से हुई है, हमारे दिलों से नहीं। दिलों में ग़ालिब उसी तरह जिंदा हैं, जिस तरह उनकी यह शायरी जिंदा है, उनके ये शेर साँसें ले रहे हैं:

वह नश्तर सही, पर दिल में जब उतर जावे
निगाह-ए-नाज़ को फिर क्यूं न आशना कहिये

सफ़ीना जब कि किनारे पे आ लगा 'ग़ालिब'
ख़ुदा से क्या सितम-ओ-जोर-ए-नाख़ुदा कहिये


ग़ालिब पर आधारित इस अंतिम कड़ी में अब वक्त आ गया है कि आखिरी मर्तबा हम उनका लिखा कुछ सुन लें। तो आज जो ग़जल लेकर हम आप सबों के बीच उपस्थित हुए हैं, उसे अपनी मखमली आवाज़ से सजाया है जनाब जगजीत सिंह जी ने। इनके बारे में और क्या कहना। महफ़िल-ए-गज़ल में कई कड़ियाँ इनके नाम हो चुकी हैं। इसलिए अच्छा होगा कि हम सीधे-सीधे ग़ज़ल की ओर रुख कर लें। तो यह रही वह गज़ल:

ज़ुल्मतकदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है
इक शम्मा है दलील-ए-सहर, सो ख़मोश है

दाग़-ए-फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-शब की जली हुई
इक शम्मा रह गई है सो वो भी ख़मोश है

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामी ____ में
"ग़ालिब" सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आतिश" और शेर कुछ यूँ था-

इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश "ग़ालिब"
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने

"आतिश" शब्द की सबसे पहले पहचान की "शरद जी" ने। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

मुझे आतिश समझ कर पास आने से वो डरते हैं
मिटाऊँ फ़ासला कैसे, यही किस्सा इधर भी है ।

जहां पिछली बार हमने "नदीम" को गायब करके लोगों को पशोपेश में डाल दिया था, वहीं इस बार बड़ा हीं आसान शब्द देकर हमने लोगों को अपनी खुशी जाहिर करने का मौका दिया। कौन-सा शब्द कितना सरल या कितना कठिन है,इस बात का अंदाजा हमें सीमा जी के शेरों को गिनकर लग जाता है, जैसे कि इस बार आपने पाँच शेर पेश किए जबकि पिछली बार आपके शेरों की कुल संख्या दो हीं थी। ये रहे उन पाँच शेरों में से हमारी पसंद के दो शेर:

चमक तेरी अयाँ बिजली में आतिशमें शरारेमें
झलक तेरी हवेदाचाँद में सूरज में तारे में (इक़बाल)

बच निकलते हैं अगर आतिह-ए-सय्याद से हम
शोला-ए-आतिश-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं (क़तील शिफ़ाई)

नीलम जी, चोरी तब तक जायज है जब तक कोई सुराग न मिले। कहते हैं ना कि "रिसर्च" उसी को कहते हैं जिसमें "ओरिजनल सोर्स" का पता न चले। अब चूँकि मुझे इस शेर के असल शायर का नाम पता नहीं, इसलिए आप बाइज़्ज़त बरी किए जाते हैं:

ए खुदा !ये क्या दिन मुक़र्रर किया है ,
क्यूंकर ढेर ए बारूद, आतिश से मिलने चल दिया है .

अवध जी, महफ़िल की सैर करने के लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। यह क्या... आपने जो शेर पेश किया (चचा ग़ालिब का) उसी शेर से "आतिश" शब्द हटाकर तो हमने सवाल पूछा था। आपने सवाल को हीं जवाब बना दिया... गलत बात!!! :)

पूजा जी, आपका शेर तो बड़ा हीं घुमावदार है। इसे समझने में मेरे पसीने छूट गए। खैर.. ३-४ मिनट की मेहनत के बाद मुझे सफ़लता मिल हीं गई। अब देखते हैं बाकी दोस्त इस शेर का कुछ अर्थ निकाल पाते हैं या नहीं:

रकाबत है या आतिश ज़ालिम,
तेरा आना फुरकत का पैगाम हुआ.

मंजु जी, आपकी ये पंक्तियाँ शेर होते-होते रह गईं। वैसे अच्छी बात ये है कि शेर लिखने में आपकी मेहनत साफ़ झलकती है। इस शेर में "सुलगा" और "उजाड़" में काफ़िया-बंदी नहीं हो पा रही। आगे से ध्यान रखिएगा:

जमाने ने नफरत ए आतिश को सुलगा दिया
दो दिलों के मौहब्बत के चमन को उजाड़ दिया .

शन्नो जी, इस बार तो आपने नीलम जी से इंतज़ार करवा लिया। ये आपकी कोई नई अदा है क्या? :) यह रहा आपका शेर:

कोई आतिश बन चला गया
जले दिल को और जला गया.

सुमित जी, इस बार भी कोई शेर नहीं. बहुत ना-इंसाफ़ी है.. इसकी सजा मिलेगी, बराबर मिलेगी..गब्बर साहिबा किधर हैं आप?

अवनींद्र जी, आपको पढना हर बार हीं सुकूनदायक होता है। आज भी वही कहानी है.. ये रही आपकी पंक्तियाँ:

रूह टटोली तो तेरी याद के खंज़र निकले
मय मैं डूबे तो तेरे इश्क के अंदर निकले
हम तो समझे थे होगी तेरी याद की चिंगारी
दिल टटोला तो आतिश के समंदर निकले

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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