शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से...सुरैया और उमा देवी के युगल स्वरों में ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 392/2010/92

'सखी सहेली' की दूसरी कड़ी में आप सभी का एक बार फिर स्वागत है। महिला युगल गीतों की इस शृंखला में कल आप ने ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और शमशाद बेग़म का गाया एक बच्चों वाला गाना सुना था। आज हमने जिन दो गायिकाओं को चुना है वे हैं सुरैय्या और उमा देवी। बहुत ही दुर्लभ जोड़ी है, और इस जोड़ी की याद आते ही हमें झट से याद आती है १९४७ की फ़िल्म 'दर्द' का वही सुरीला गीत, याद है ना "बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से, जिस दिन से मेरा चांद छुपा मेरी नज़र से"। बहुत दिनों से आपने यह गीत नहीं सुना होगा, है ना? तो चलिए आज उन पुरानी यादों को एक बार फिर से ताज़ा कीजिए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत से जिसकी तर्ज़ बनाई थी नौशाद अली ने। फ़िल्म 'दर्द' का निर्माण व निर्देशन किया था अब्दुल रशीद कारदार ने, जिन्हे हम ए. आर. कारदार के नाम से बेहतर जानते हैं। श्याम, नुसरत, मुअव्वर सुल्ताना, सुरैय्या, बद्री प्रसाद, हुस्न बानो, प्रतिमा देवी प्रमुख अभिनीत इस फ़िल्म से ही शक़ील और नौशाद की जोड़ी शुरु हुई थी। इस फ़िल्म के कुछ गीत उमा देवी ने गाए, कुछ सुरैय्या ने, और शमशाद बेग़म की भी आवाज़ थी इस फ़िल्म में। मैं पूरी यक़ीन के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन जितना मैंने जाना है कि इस फ़िल्म में किसी पुरुष गायक की आवाज़ नहीं थी। इस फ़िल्म की जब भी बात चलती है तो सब से पहले उमा देवी का गाया "अफ़साना लिख रही हूँ" गीत ज़हन में आता है। इस गीत को हमने कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं पर केन्द्रित शृंखला 'हमारी याद आएगी' में हमने सुनवाया था। इस गीत का फ़िल्मांकन मुनव्वर सुल्तना पर हुआ था। अब क्योंकि इस फ़िल्म में सुरैय्या भी थीं, तो ज़ाहिर है कि उन पर फ़िल्माए गीत उन्होने ही गाए होंगे। आज का प्रस्तुत युगल गीत मुनव्वर सुल्ताना और सुरैय्या पर फ़िल्माया हुआ है, और ऐसा लगता है कि प्रेम त्रिकोण की कहानी रही होगी यह फ़िल्म, और ये दोनों नायिकाएँ अपने अपने दिल की बातें गीत के शक्ल में बयाँ कर रही हैं, लेकिन एक ही पुरुष के लिए। पहला और तीसरा अंतरा उमा देवी ने गाया है जब कि दूसरा अंतरा सुरैय्या की आवाज़ में है। हैरत की बात है कि इन दोनों की आवाज़ों में बहुत ज़्यादा कंट्रास्ट सुनाई नहीं देता इस गीत में। इस गीत की अदायगी जितनी प्यारी है, उतने ही सुंदर हैं शक़ील साहब के बोल, और नौशाद साहब ने भी क्या धुन बनाई है। गाने का जो मूल रीदम है, वह बंगाल के कीर्तन शैली की तरह सुनाई देता है।

१९९१ में उमा देवी विविध भारती पर तशरीफ़ लाई थीं और सुरैय्या के साथ उनके गाए हुए इस गीत को बजाया भी था और इसके बारे में बताया भी था। पेश है उस कार्यक्रम का वह अंश: "मेरे सज्जनों, मैं तुम्हे थोड़ी सी आप बीती सुनाती हूँ। मशहूर हीरोइन सुरैय्या, फ़िल्म स्टार सुरैय्या, हाय हाय हाय हाय, सुरैय्या के साथ मैंने फ़िल्म 'दर्द' का यह गाना गाया था। आप लोग ख़ूब सुनते हैं यह गाना। उसमें मैं भी उनके साथ खड़ी होकर, बिल्कुल उनसे लिपटी खड़ी गा रही थी, "बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से"। इसमे हम दोनों ने अपने अपने गाने की अदायगी की थी, ज़रा सुनिए तो..." और इस गीत के ख़त्म होते ही उमा जी कहती हैं, "क्यों, अच्छा लगा ना? मैं आपको अच्छी लगती हूँ ना? आप भी मुझे बड़े अच्छे लगते हैं। अरे, अगर आप यहीं सामने खड़े होते तो तुम्हे गले से चिपड चिपड कर जाने ही नहीं देती।" दोस्तों, क्योंकि उमा देवी उसके बाद टुनटुन बन चुकी थीं, इसलिए विविध भारती के उस 'जयमाला' कार्यक्रम में उनकी बातों का अंदाज़ टुनटुन जैसा था और जो गानें उन्होने सुनवाए, वो उमा देवी ने सुनवाए। बहुत ही प्रतिभाशाली अदाकारा थीं वो। भली ही गायन में बहुत दूर तक नहीं पहुँचीं, लेकिन अपने हास्य अभिनय से न जाने कितने हज़ारों लाखों लोगों की होठों पर मुस्कान बिखेरा है उन्होने। और किसी के चेहरे पर मुस्कान खिलाने से बेहतर और कोई दूसरी इबादत नहीं हो सकती। दोस्तों, आप सोच रहे होंगे कि हमने केवल उमा देवी के बारे में ही बातें कीं, और सुरैय्या को भूल गए। हम वादा करते हैं कि इसके बाद जिस किसी भी दिन सुरैय्या जी का गाया हुआ कोई गीत सुनवाएँगे, उस दिन उनके जीवन से जुड़ी कुछ और बातें आप तक ज़रूर पहुँचाएँगे, वैसे उनसे जुड़ी बहुत सारी बातें हम पहले भी बता चुके हैं। और क्यों कि आज अभी आप बेताब होंगे इस बेताबी भरे गीत को सुनने के लिए, इसलिए हम आज यहीं रुक जाते हैं, सुनिए यह प्यारा सा गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि युं तो लोग यही जानते हैं कि उमा देवी को पहली बार नौशाद साहब ने फ़िल्म 'दर्द' में गवाया था, लेकिन हक़ीक़त यह है कि १९४६ में उमा देवी ने 'वामिक़ अज़रा' नामक एक फ़िल्म में गीत गाया था जिसके संगीतकर थे ए.आर. क़ुरेशी।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"दुनिया", गीत बताएं -३ अंक.
2. दो गायिका बहनों ने गाया है इसे, एक लता है दूसरी का नाम बताएं- २ अंक.
3. निर्माता एस. एम. एस. नायडू की इस फिल्म के संगीतकार बताएं -२ अंक.
4. इस नटखट मस्ती भरी गीत के गीतकार कौन हैं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
क्या बात सब के सब चूके इस बार, पर शरद जी ने फिल्म का नाम सही बताया है, २ अंक जरूर मिलेंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

एक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ...नए संगीत के तीसरे सत्र की शुरूआत, नजीर बनारसी के कलाम और रफीक की आवाज़ से

Season 3 of new Music, Song # 01

दोस्तो, कहते है किसी काम को अगर फिर से शुरू करना हो, तो उसे वहीं से शुरू करना चाहिए जहाँ पर उसे छोड़ा गया था. आज आवाज़ के लिए ख़ास दिन है. 29 दिसंबर को हमने जिस सम्मानजनक रूप से नए संगीत को दूसरे सत्र को अलविदा कहा था, उसी नायाब अंदाज़ में आज हम स्वागत करने जा रहे हैं नए संगीत के तीसरे सत्र का. हमने आपको छोड़ा था रफीक भाई की सुरीली आवाज़ पर महकती एक ग़ज़ल पर, तो आज एक बार फिर संगीत के नए उभरते हुए योद्धाओं के आगमन का बिगुल बजाया जा रहा हैं उसी दमदार मखमली आवाज़ से. जी हाँ दोस्तों, सीज़न 3 आरंभ हो रहा है नजीर बनारसी के कलाम और रफीक शेख की जादू भरी अदायगी के साथ. रफीक हमारे पिछले सत्र के विजेता रहे हैं जिनकी 3 ग़ज़लें हमारे टॉप 10 गीतों में शामिल रहीं, और जिन्हें आवाज़ की तरफ से 6000 रूपए का नकद पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था, इस बार भी रफीक इस शानदार ग़ज़ल के साथ अपनी जबरदस्त शुरूआत करने जा रहे हैं नए सत्र में। नजीर बनारसी की ये ग़ज़ल उन्हें उनके एक मित्र के माध्यम से प्राप्त हुई है, नजीर साहब वो उस्ताद शायर हैं जिनके बोलों को जगजीत सिंह और अन्य नामी फनकारों ने कई-कई बार अपने स्वरों से सजाया है, याद कीजिये "कभी खामोश बैठोगे, कभी कुछ गुनगुनाओगे..." या फिर "एक दीवाने को ये आये हैं समझाने..." जैसी उत्कृष्ट ग़ज़लें. दुर्भाग्यवश नजीर साहब के बारे बहुत अधिक जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं, हम गुजारिश करेंगें कि यदि आप में से कोई श्रोता उनके बारे कोई जानकारी हमें दे सकतें हैं तो अवश्य दें. हालाँकि ये ग़ज़ल उनकी अनुमति के बिना ही संगीतबद्ध हो कर यहाँ प्रसारित हो रही है, पर हमें पूरा यकीन है कि इस ग़ज़ल को सुनने के बाद नजीर साहब या उनके चाहने वालों को इस गुस्ताखी पर शिकायत की बजाय ख़ुशी अधिक होगी। तो पेश है दोस्तों, ये ग़ज़ल "एक रात में ...."

ग़ज़ल के बोल -

एक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ,
मुफलिस का दीया हूँ मगर आंधी से लड़ा हूँ.

वो आईना हूँ कभी कमरे में सजा था,
अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ.

मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया,
सिर्फ इसलिए कतरा हूँ, समुन्दर से जुदा हूँ.

दुनिया से निराली है 'नजीर' अपनी कहानी,
अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ.




मेकिंग ऑफ़ "एक रात में..." - रफीक शेख (गायक/संगीतकार) के शब्दों में
मुझे ये ग़ज़ल रफीक सागर जी , जो रजा हसन के पिताजी हैं, उन्होंने दी थी. ये इतनी प्यारी ग़ज़ल है और बहुत ही सीधी भाषा में है जो सबको समझ में आएगी, इसके हर शेर ऐसा है कि सबको लगता है कि बस मेरी ही कहानी बोली जा रही है. कामियाबी पाना इतना आसान नहीं है, फिर भी जब हम किसी कामियाब इंसान को देखते हैं तो बड़ी आसानी से कहते हैं, कि 'भाई साहब आपके तो मजे हैं, गाडी बंगला सब कुछ है आपके पास', मगर हम ये नहीं जानते हैं कि उन चीजों को हासिल करने के लिए उस शख्स को क्या क्या करना पड़ा होगा....उसी को शायर इस अंदाज़ में कहता है कि "एक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ, मुफलिस का दिया हूँ मगर आंधी से लड़ा हूँ...". इस ग़ज़ल का हर शेर लाजावाब तो है ही, मगर जो मक्ता है उसका क्या कहना...बड़ी सीधी भाषा में शायर कहता है कि "दुनिया से निराली है 'नजीर' अपनी कहानी, अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ...", उम्मीद करता हूँ कि आप सब को ये पेशकश पसंद आएगी...."



रफ़ीक़ शेख
रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। बम्पर हिट एल्बम 'काव्यनाद' में इनके 2 कम्पोजिशन संकलित हैं।

Gazhal - Ek Raat Men...
Vocal - Rafique Sheikh
Music - Rafique Sheikh
Lyrics - Nazeer Banarasi


Song # 01, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

उड़न खटोले पर उड़ जाऊं.....बचपन के प्यार को अभिव्यक्त करता एक खूबसूरत युगल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 391/2010/91

युगल गीतों की जब हम बात करते हैं, तो साधारणत: हमारा इशारा पुरुष-महिला युगल गीतों की तरफ़ ही होता है। मेरा मतलब है वो युगल गीत जिनमें एक आवाज़ गायक की है और दूसरी आवाज़ किसी गायिका की। लेकिन जब भी युगल गीतों में ऐसे मौके आए हैं कि जिनमें दोनों आवाज़ें या तो पुरुष हैं या फिर दोनों महिला स्वर हैं, ऐसे में ये गानें कुछ अलग हट के, या युं कहें कि ख़ास बन जाते हैं। आज से हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु कर रहे हैं पार्श्वगायिकाओं के गाए हुए युगल गीतों, यानी कि 'फ़ीमेल डुएट्स' पर आधारित हमारी लघु शृंखला 'सखी सहेली'। इस शूंखला में हम १० फ़ीमेल डुएट्स सुनेंगे, यानी कि १० अलग अलग गायिकाओं की जोड़ी के गाए गीतों का आनंद हम उठा सकेंगे। ४० से लेकर ७० के दशक तक की ये जोड़ियाँ हैं जिन्हे हम शामिल कर रहे हैं, और हमारा विश्वास है कि इन सुमधुर गीतों का आप खुले दिल से स्वागत करेंगे। तो आइए शुरुआत की जाए इस शूंखला की। पहली जोड़ी के रूप में हमने एक ऐसी जोड़ी को चुना है जिनमें आवाज़ें दो ऐसी गायिकाओं की हैं जो ४० और ५० के दशकों में अपनी वज़नदार और नैज़ल आवाज़ों की वजह से जाने जाते रहे। ४० का दशक इस तरह की वज़नदार आवाज़ों का दशक था और उस दशक में कई इस तरह की आवाजें सुनाई दीं। तो साहब, आज जिन दो आवाज़ों को हम आज शामिल कर रहे हैं वो हैं ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और शमशाद बेग़म। युं तो इन दोनों ने साथ साथ कई युगल गीत गाए हैं, लेकिन मेरे ख़याल से इस जोड़ी का जो सब से मशहूर गीत रहा है वह है फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' का, और जिसके बोल हैं "उड़न खटोले पे उड़ जाऊँ, तेरे हाथ ना आऊँ"। दो बाल कलाकारों पर फ़िल्माया हुआ यह गाना है। १९४६ की यह फ़िल्म, तनवीर नक़वी का गीत और नौशाद अली का संगीत। युं तो इस फ़िल्म के दो और गीत हम आप तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पहुँचा चुके हैं, और फ़िल्म की तमाम बातें भी कह चुके हैं, इसलिए क्यों ना आज कुछ और बातें की जाए!

पार्श्वगायिकाओं की इस जोड़ी की अगर हम बात करें तो शम्शाद बेग़म जी के बारे में तो आप सभी को तमाम बातें मालूम होंगी, लेकिन बहुत कम ही ऐसे लोग होंगे जिन्हे ज़ोहराबाई अम्बालेवाली के बारे में अधिक जानकारी हो। इसलिए हमने सोचा कि क्यों ना आज के इस अंक के बहाने हम ज़ोहराबाई से आपका परिचय करवाएँ! 'ज़ोहरा जान ऒफ़ अम्बाला' नाम से सन् १९३७-३८ में ऒल इण्डिया रेडियो के दिल्ली, लाहौर, पेशावर केन्द्रों से गायन जीवन प्रारम्भ करने वाली ज़ोहराबाई से सन् १९३८ में संगीतकार अनिल बिस्वास ने सब से पहले सागर मूवीटोन कृत 'ग्रामोफ़ोन सिंगर' फ़िल्म के लिए गीत गवाया था। उसके बाद 'हम तुम और वह ('३८), 'बहूरानी' ('४०), 'हिम्मत' ('४१), 'रिटर्ण ऒफ़ तूफ़ान मेल' ('४२), 'तलाश' ('४३), 'विजयलक्ष्मी' ('४३) आदि फ़िल्मों में गीत गाए, लेकिन उन्हे असली कामयाबी जिस फ़िल्म से मिली, वह फ़िल्म थी 'रतन'। इस फ़िल्म का "अखियाँ मिलाके जिया भरमाके" गीत सब से ज़्यादा कामयाब रहा, जिसे हमने आपको इसी महफ़िल में भी सुनवाया था। नौशाद साहब ने 'रतन' के बाद भी अपनी कई फ़िल्मों में ज़ोहराबाई से गानें गवाए जैसे कि 'जीवन' ('४४), 'पहले आप' ('४४), 'सन्यासी' ('४५), 'अनमोल घड़ी' ('४६), 'एलान' ('४७), 'नाटक' ('४७) और 'मेला' ('४८)। हरमंदिर सिंह 'हमराज़' के प्रसिद्ध 'गीत कोश' के मुताबिक ज़ोहराबाई ने ४० के दशक में कुल १२२९ गीत गाए हैं। इस दशक के अधिकाँश ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स पर गीत गाने वाले पार्श्वगायकों के सही दिए जाने के बजाए पात्र का नाम दिए जाने की प्रथा लागू थी। अत: अनुमान है कि ज़ोहराबाई ने लगभग १५०० गीत गाए होंगे। उनके गाए गीतों की अनुमानित संख्या उन सभी पार्श्वगायिकाओं के गाए गीतों से अधिक हैं जो उस समय मशहूर थीं। दोस्तों, ये तमाम जानकारियाँ हमने बटोरी है 'लिस्नर्स बुलेटिन' अंक ८१ से, जो प्रकाशित हुआ था मई १९९० में। आप को यह भी बता दें कि ज़ोहराबी का २१ फ़रवरी १९९० को ६८ वर्ष की आयु में बम्बई में निधन हो गया था। तो चलिए दोस्तों, ज़ोहराबाई और शमशाद बेग़म के साथ साथ हम भी उड़न खटोले की सैर पे निकलते हैं और सुनते हैं यह यादगार गीत जो हमें याद दिलाती है उस पुराने दौर की जब ऐसी वज़नदार और नैज़ल आवाज़ वाली गायिकाओं का राज था।



क्या आप जानते हैं...
कि १९५३ की फ़िल्म 'तीन बत्ती चार रास्ते' के एक सहगान में जब ज़ोहराबाई अम्बालेवाली को केवल एकाध लाइन गाने का अवसर दिया गया तो उन्होने फ़िल्म जगत से सन्यास लेने में ही भलाई समझी।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"चाँद", गीत बताएं -३ अंक.
2. दो गायिकाओं ने जिन्होंने इस गीत को गाया है सुरैया और _____, बताएं कौन हैं ये- २ अंक.
3. ए आर कारदार निर्देशित इस फिल्म का नाम बताएं-२ अंक.
4. नौशाब साहब का था संगीत, गीतकार बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी, पाबला जी, इंदु जी, और पदम् जी को बधाई.....अवध जी आपका अंदाजा एकदम सही है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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