Saturday, February 20, 2010

भरम तेरी वफाओं का मिटा देते तो क्या होता...तलत की आवाज़ पर साहिर के बोल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 351/2010/51

ज है २० फ़रवरी। याद है ना आपको पिछले साल आज ही के दिन से शुरु हुई थी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह शृंखला। आज से इस शृंखला का दूसरा साल शुरु हो रहा है। आपको याद है इस शॄंखला की पहली कड़ी में कौन सा गीत बजा था? चलिए हम ही याद दिलाए देते हैं। वह पहला पहला गीत था फ़िल्म 'नीला आकाश' का, "आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है"। ख़ैर, उसके बाद तो एक के बाद एक कुल ३५० गीत इस शृंखला में बज चुके हैं, और इन सभी कड़ियों में हमने जितना हो सका है संबम्धित जानकारियाँ भी देते आए हैं। आज से हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अंतर्गत एक नया स्तंभ जोड़ रहे हैं और यह स्तंभ है 'क्या आप जानते हैं?' मुख्य आलेख, ऒडियो, और पहेली प्रतियोगिता के साथ साथ अब आप इस स्तंभ का भी आनंद ले पाएँगे जिसके तहत हम आपको रोज़ फ़िल्म संगीत से जुड़ी एक अनोखे तथ्य से रु-ब-रु करवाएँगे। ये तो थीं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के स्वरूप से संबम्धित बातें, आइए अब आज का अंक शुरु किया जाए। दोस्तों, २४ फ़रवरी को मख़मली आवाज़ के जादूगर तलत महमूद साहब का जन्मतिथि है। अत: आज से लेकर १ मार्च तक आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनने जा रहे हैं तलत साहब के गाए ग़ज़लों पर आधारित हमारी ख़ास पेशकश 'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़'। युं तो तलत साहब ने कई तरह के मूड के गानें गाए हैं, लेकिन सब से ख़ास जो उनका अंदाज़ रहा है, वह है ग़ज़ल गायकी का। और इसीलिए हम इस शृंखला में उनकी गाई हुई ग़ज़लें ही चुनकर लाए हैं। अपनी ख़ास आवाज़ से, अपनी अलग अंदाज़ से लाखों, करोड़ों दिलों को जीतने में माहिर तलत महमूद साहब की गयकी उस सुगंधित धूप की तरह है जिसकी ख़ुशबू से महक रहा है फ़िल्म संगीत संसार। उनके गाए लाजवाब गीतों और ग़ज़लों की फ़ेहरिस्त इतनी लम्बी है कि इस शृंखला के लिए केवल १० ग़ज़लों को चुनना एक मुश्किल कार्य बन कर रह गया था। फिर भी हमने जिन १० लाजवाब ग़ज़लों को चुना है, हमें उम्मीद है कि आपको वे पसंद आएंगे। तो आइए शुरु करें, पहली ग़ज़ल इस शृंखला की फ़िल्म 'अरमान' से है, "भरम तेरी वफ़ाओं का मिटा देते तो क्या होता, तेरे चेहरे से हम पर्दा उठा देते तो क्या होता"।

१९५३ में संगीतकार सचिन देव बर्मन और गीतकार साहिर लुधियानवी ने दो फ़िल्में की - 'अरमान' और 'बाबला'। इन दोनों ही फ़िल्मों में तलत महमूद ने गानें गाए। फ़िल्म 'बाबला' का एक मशहूर गीत था "जग में आए कोई, कोई जाए रे, आनेवाले आते जाएँ, जानेवाले लौट ना पाएँ"। यह फ़िल्म तो कमचर्चित रही, लेकिन फ़िल्म 'अरमान' की चर्चा ज़रूर हुई। देव आनंद और मधुबाला अभिनीत 'अरमान' के गानें मशहूर हुए थे। आज की प्रस्तुत ग़ज़ल के अलावा तलत साहब और आशा भोसले का गाया "चाहे कितना मुझे तुम बुलायो जी, नहीं बोलूँगी नहीं बोलूँगी" उन दिनों हिट हुआ था। इन दोनों गीतों की खासियत यह है कि इनमें रिदम का इस्तेमाल नहीं हुआ है। कम से कम साज़ों के इस्तेमाल से भी सचिन दा ने ऐसे कॊम्पोज़िशन्स बनाए हैं कि इन गीतों में ऒर्केस्ट्रेशन की कमी महसूस ही नहीं होती। और जहाँ तक तलत साहब के गायन का सवाल है, उनकी कोमल आवाज़ ऐसे बिना साज़ वाले गीतों में और भी ज़्यादा खुल कर बाहर आती है। और दर्द में डूबे हुए नग़मों के लिए तो तलत साहब के आवाज़ की कोई सानी ही नहीं है। उन्होने ही एक बार विविध भारती पर कहा था कि "मेरे जीवन की सब से बड़ी त्रासदी है कि मैं सैड गानें गाता हूँ। उसी हिसाब से फ़िल्म 'पतिता' के लिए एक गीत मैंने ख़ुद शैलेन्द्र को सजेस्ट किया था, "हैं सब से मधुर वह गीत जिन्हे हम दर्द के सुर में गाते हैं"। यह गीत आज तक मक़बूल है।" और दोस्तों, सिर्फ़ यही गीत क्यों, तलत साहब के गाए तमाम ऐसे गीत और ग़ज़लों को आज भी रसिक अपने दिल से लगाए हुए हैं। तो आइए तलत साहब को सलाम करते हुए इस शृंखला की पहली ग़ज़ल सुनी जाए फ़िल्म 'अरमान' से, लेकिन उससे पहले ये रहे इस ग़ज़ल के तीन शेर:

भरम तेरी वफ़ाओं का मिटा देते तो क्या होता,
तेरे चेहरे से हम पर्दा उठा देते तो क्या होता।

मोहब्बत भी तिजारत हो गई है इस ज़माने में,
अगर यह राज़ दुनिया को बता देते तो क्या होता।

तेरी उम्मीद पर जी लेते हासिल कुछ नहीं लेकिन,
अगर युं भी ना दिल को आसरा देते तो क्या होता।




क्या आप जानते हैं...
- कि तलत महमूद ने बंगला गानें तपन कुमार के नाम से गाए हैं। तपन कुमार के नाम से उन्होने लगभग १५० बंगला रचनाएँ गायीं हैं।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

1. तलत की गाई इस ग़ज़ल का सबसे पहला शब्द है- "आंसू", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. कमाल अमरोही की इस अनूठी फिल्म में गुलाम हैदर के सहायक रहे एक संगीतकार के गीत रचे, इनका नाम - सही जवाब को मिलेंगें २ अंक.
3. हालाँकि इसे एक गीत के प्रारूप में लिखा गया है पर गायन का अंदाज़ गज़लनुमा ही है, गीतकार का नाम बताएं- २ अंक.
4. तलत साहब के बेटे जो खुद भी एक गायक हैं उनका नाम क्या है- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
रोहित जी दो अंक आपको मिले हैं, पर गीत कोई क्यों नहीं बूझ पाया :)
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सुनो कहानी: आग - असगर वजाहत

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में गोपाल प्रसाद व्यास का व्यंग्य "झूठ बराबर तप नहीं" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं असगर वजाहत की एक कहानी "आग", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "आग" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 14 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट गद्य कोश पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



रात के वक्त़ रूहें अपने बाल-बच्चों से मिलने आती हैं।
~ असगर वजाहत

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

आग प्रचंड थी। बुझने का नाम न लेती थी।
(असगर वजाहत की "आग" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#Sixty First Story, Aag: Asghar Wajahat/Hindi Audio Book/2010/6. Voice: Anurag Sharma

Friday, February 19, 2010

तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी...ये गीत समर्पित है हमारे श्रोताओं को जिनकी बदौलत ओल्ड इस गोल्ड ने पूरा किया एक वर्ष का सफर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 350/2010/50

'प्योर गोल्ड' की अंतिम कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं। १९४० से शुरु कर साल दर साल आगे बढ़ते हुए आज हम आ पहुँचे हैं इस दशक के अंतिम साल १९४९ पर। फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की अगर हम बात करें तो सही मायने में इस दौर की शुरुआत १९४८-४९ के आसपास से मानी जानी चाहिए। यही वह समय था जब फ़िल्म संगीत ने एक बार फिर से नयी करवट ली और नए नए प्रयोग इसमें हुए, नई नई आवाज़ों ने क़दम रखा जिनसे यह सुनहरा दौर चमक उठा। 'बरसात', 'अंदाज़', 'महल', 'शायर', 'जीत', 'लाहौर', 'एक थी लड़की', 'लाडली', 'दिल्लगी', 'दुलारी', 'पतंगा', और 'बड़ी बहन' जैसी सुपर हिट म्युज़िकल फ़िल्मों ने एक साथ एक ऐसी सुरीली बारिश की कि जिसकी बूंदें आज तक हमें भीगो रही है। दोस्तों, हम चाहते तो इन फ़िल्मों से चुनकर लता मंगेशकर या मुकेश या मोहम्मद रफ़ी या फिर शमशाद बेग़म या गीता रॊय का गाया कोई गीत आज सुनवा सकते थे। लेकिन इस शृंखला में हमने कोशिश यही की है कि उन कलाकारों को ज़्यादा बढ़ावा दिया जाए जो सही अर्थ में ४० के दशक को रिप्रेज़ेंट करते हैं। इसलिए हमने चुना है एक ऐसी आवाज़ जिसके ज़िक्र के बग़ैर यह शृंखला अधूरी ही रह जाएगी। जी हाँ, ४० के दशक को समर्पित इस शृंखला की अंतिम कड़ी में पेश-ए-ख़िदमत है गायिका सुरैय्या की आवाज़ का जादू। फ़िल्म 'दिल्लगी', और इस गीत में सुरैय्या का साथ दिया है अभिनेता व गायक श्याम ने। याद है ना वह हिट गीत "तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी"? शक़ील बदायूनी के बोल और नौशाद साहब की तर्ज़। यह अब्दुल रशीद कारदार की फ़िल्म थी, जिन्होने इसी साल फ़िल्म 'दुलारी' का निर्माण भी किया था।

आज अगर फ़िल्म 'दिल्लगी' याद की जाती है तो केवल इसके सुरीले गीतों की वजह से। हम आपको बता दें कि आज के इस गीत के दो वर्ज़न बने थे, एक तो सुरैय्या और श्याम ने गाए, दूसरा वर्ज़न गाया श्याम और गीता रॊय ने। जी हाँ। सुरैय्या वाले गीत में नौशाद साहब ने बांसुरी का सुरीला इस्तेमाल किया है प्रिल्युड और इंटरल्युड में। दोनों गीतों के ऒर्केस्ट्रेशन में ही ना केवल फ़र्क है, बल्कि मेल-फ़ीमेल पोर्शन में भी काफ़ी फ़र्क है। जहाँ एक तरफ़ सुरैय्या और श्याम बारी बारी से और कभी कभी साथ में गाते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ गीता-श्याम वाले वर्ज़न में श्याम गीत की शुरुआत करते हैं जब कि गीता जी रिले रेस की तरह उनसे गीत अपने हाथ ले लेती है और अंत तक वोही गातीं हैं। जहाँ एक तरफ़ सुरैय्या की वज़नदार और परिपक्कव आवाज़, वहीं दूसरी तरफ़ कमसिन गीता रॊय का मोडुलेशन और रवानी भरा अंदाज़। वाक़ई यह बताना मुश्किल है कि कौन किससे बेहतर! नूरजहाँ के पाक़िस्तान चले जाने के बाद सुरैय्या फ़िल्म जगत की सब से ज़्यादा पारिश्रमिक पाने वाली नायिका बन गईं थीं। यह अलग बत है कि बहुत जल्द ही वो फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया, कुछ अपने व्यक्तिगत कारणों से और कुछ बदलते दौर की वजह से जिसमें उन्हे दूसरी नायिकाओं के लिए प्लेबैक करना गवारा नहीं हुआ। फ़िल्म 'दिल्लगी' में प्रस्तुत गीत के अलावा सुरैय्या के गाए कुछ और बेहद हिट गानें थे जैसे कि "मुरलीवाले मुरली बजा सुन सुन मुरली को नाचे जिया" और "तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा, उल्फ़त की ज़िंदगी को मिटाया ना जाएगा"। और भी गाने थे उनके गाए हुए इस फ़िल्म में जैसे कि "चार दिन की चांदनी थी फिर अंधेरी रात है", "निराला मोहब्बत का दस्तूर देखा", "लेके दिल चुपके से किया मजबूर हाए" और "दुनिया क्या जाने मेरा अफ़साना क्यों गाए दिल उल्फ़त का तराना"। हर गीत में उनका अलग अंदाज़ सुनने को मिला। मोहम्मद रफ़ी ने भी इस फ़िल्म में एक ग़मज़दा नग़मा गाया था "इस दुनिया में ऐ दिलवालों दिल का लगाना खेल नहीं"। तो दोस्तों, यह थी ४० के दशक के हर साल से चुन कर एक एक गीत इस ख़ास शृंखला 'प्योर गोल्ड' के अंतर्गत। हमें आशा है आपको पसंद आई होगी। और इसी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' ने पूरे किए ३५० अंक और साथ ही आज पूरा हुआ इस शृंखला का एक साल। २० फ़रवरी २००९ में शुरु हुई इस शृंखला को यहाँ तक लेकर आने में आप सब ने जो हमारी हौसला अफ़ज़ाई की है, उसके लिए हम आप के तहे दिल से शुक्रगुज़ार हैं। आगे भी इसी तरह का साथ बनाए रखिएगा, क्योंकि हमारा साथ चांद और चांदनी का है, राग और रागिनी का है। सुनते हैं "तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी, तू मेरा राग मैं तेरी रागिनी"।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

उम्मीद बुझ गयी सभी,
लेकिन ये कम तो नहीं,
हासिल हैं तेरी सोहबतें,
जीने को है आसरा तेरा...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. इस खूबसूरत ग़ज़ल को किस शायर/गीतकार ने लिखा है - सही जवाब को मिलेंगें २ अंक.
3. ग़ज़ल गायिकी के सरताज तलत साहब की इस ग़ज़ल को किसने स्वरबद्ध किया है- २ अंक.
4. तलत साहब ने अपने बांगला गीत किस नाम से गाये हैं - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी का स्कोर २० अंकों पर पहुँच चुका है. इंदु जी पहेली के नए संस्करण में पहली बार आई और उनका खाता खुला है २ अंकों से. बधाई...सही है इंदु जी आपकी बात. देखते हैं अभी कुछ समय और....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, February 18, 2010

मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार...गुजरे ज़माने के एक मस्त मस्त गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 349/2010/49

साल १९४८ की शुरुआत भी अच्छी नहीं रही। ३० जनवरी १९४८ की सुबह महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई, जिसके बाद साम्प्रदायिक दंगे एक बार फिर से छिड़ गए और देश की अवस्था और भी नाज़ुक हो गई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजली स्वरूप गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने उन पर एक गीत लिखा जिसे हुस्नलाल भगतराम के संगीत में मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया। "सुनो सुनो ऐ दुनियावालों बापु की यह अमर कहानी" एक बेहद लोकप्रिय गीत साबित हुआ। ब्रिटिश राज के समाप्त हो जाने के बाद देश भक्ति फ़िल्मों के निर्माण पर से सारे नियंत्रण हट गए। ऐसे में फ़िल्मिस्तान लेकर आए 'शहीद', जो हिंदी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ देशभक्ति फ़िल्मों में गिनी जाती है। जहाँ एक तरफ़ दिलीप कुमार की अदाकारी, वहीं दूसरी तरफ़ मास्टर ग़ुलाम हैदर के संगीत में "वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हों" गीत ने तो पूरे देश को जैसे देश प्रेम के जज़्बे से सम्मोहित कर लिया। उधर हैदर साहब ने ही फ़िल्म 'मजबूर' में लता को अपना पहला हिट गीत दिया "दिल मेरा तोड़ा"। संगीत की दृष्टि से १९४८ की कुछ प्रमुख फ़िल्मों के नाम हैं 'अनोखी अदा', 'मेला', 'आग़', 'अनोखा प्यार', 'ज़िद्दी', 'प्यार की जीत' वगेरह। एक तरफ़ सुरैय्या, शमशाद बेग़म, जी. एम. दुर्रनी, ज़ोहराबाई, अमीरबाई जैसे गायक चमक रहे थे, वहीं दूसरी तरफ़ लता मंगेशकर, मुकेश, मोहम्मद रफ़ी, गीता रॊय, जैसे गायक अपने क़दम मज़बूत करने के प्रयास में जुटे हुए थे। दोस्तों, हमने उपर जो फ़िल्मों की फेहरिस्त दी है, या जिन फ़िल्मों का ज़िक्र किया है, आज का गीत उनमें से किसी भी फ़िल्म का नहीं है। बल्कि आज हम लेकर आए हैं एक ऐसा गीत जिसमें एक बेहद कमचर्चित गायिका की आवाज़ है। लेकिन साथ में रफ़ी साहब भी हैं। अब तो आप समझ ही चुके होंगे कि फ़िल्म 'नदिया के पार' का यह गीत है "मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार"। ललिता देओलकर और रफ़ी साहब की आवाज़ें, सी. रामचन्द्र का संगीत और गीतकार बी. ए. मोती के बोल। फ़िल्म 'नदिया के पार' के मुख्य कलाकार थे दिलीप कुमार और कामिनी कौशल (इन दोनों ने फ़िल्म 'शहीद' में भी साथ साथ काम किया था)। जिन्हे मालूम नहीं है, उनके लिए हम यहाँ बता दें कि आगे चल कर ललिता देओलकर संगीतकार सुधीर फड़के की धर्मपत्नी बनीं थीं।

दोस्तों, आज जब सी. रामचन्द्र और ललिता देओलकर की बातें एक साथ हो रही हैं, इसलिए मैंने एक ऐसा इंटरव्यू खोज निकाला है जिसमें प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रिकार्ड कलेक्टर डॊ. प्रकाश जोशी बता रहे हैं सी. रामचन्द्र से संबंधित एक क़िस्से के बारे में जिसे उन्हे बताया था ललिता जी ने। यह इंटरव्यू विविध भारती पर स्वर्णजयंती शृंखला 'जुबिली झंकार' के अंतरगत ३ जनवरी २००८ को प्रसारित किया गया था। डॊ जोशी ने बताया: "मुझे अभी भी याद है जब सुधीर फड़के और ललिता फड़के, ललिता देओलकर को हमारे यहाँ फ़ेलिसिटेट किया था, जिनका सत्कार किया था, तो उन्होने सी. रामचन्द्र जी के बारे में बहुत सी बातें बताई। जैसा 'नदिया के पार' करके एक फ़िल्म थी, तो उस ज़माने में रिकार्डिंग् जब होता था, तो वो कहती हैं कि रामचन्द्र जी को नोटेशंस बहुत अच्छा याद रहता था, और 'he was a quick music director', उनके जैसा 'fast music director' और कोई नहीं था। और वो जहाँ जहाँ जाते थे, मेले में अथवा कोई प्रोग्राम में, अच्छी कोई लोक धुन सुनी या अच्छा कोई टुक़आ मिला तो अपनी डयरी में नोटेशन तुरंत लिख के रखते थे। और एक रिकार्डिंग् था जब, बता रहीं थीं ललिता जी, कि वो बहुत अपसेट थे, वह रिकार्डिंग् जैसे तैसे पूरा किया, लेकिन गाना सुनने के बाद वो बिल्कुल गुमसुम बैठे रहे। तो ललिता जी रिकार्डिंग् के बाद गईं उनके पास कि 'अन्ना, हुआ क्या, आज इतना अपसेट क्यों हैं, तबीयत तो ठीक है ना?' ये सब उन्होने पूछा तो बेचारे रोने लगे और बताया कि आज किसी ने मेरी जेब काट दिया। बोले कि कितने भी नोट मेरे जाते, १०००, २०००, ५०००, मुझे कोई ग़म नहीं था, लेकिन मेरी नोटेशन वाली नोटबुक गई उसमें।" दोस्तों, इस तरह की कितनी ही नायाब और अनमोल जानकारियाँ विविध भारती के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ज़रिए इन जानकारियों को हम इंटरनेट से जुड़े लोगों तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास हम कर रहे हैं। आशा है आप इनसे लाभांवित हो रहे होंगे। आइए लोक रंग में रंगा हुआ यह गीत सुना जाए और सलाम करें १९४८ के उस सुरीले साल को।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

रुत मिलन की आई,
दिन चमकीले हुए,
धुप चमके खिल खिलाकर,
तेरा साथ पाकर महकी बहार...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. इस गीत के दो संस्करण थे, दोनों में गायक एक हैं उनका नाम बताएं -सही जवाब को मिलेंगें २ अंक.
3. इस युगल गीत के एक संस्करण में सुरय्या की आवाज़ है, दूसरे में किस गायिका की आवाज़ है बताएं - २ अंक.
4. कौन है इस गीत के संगीतकार - सही जवाब के मिलेंगें १ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी ३ अंक और आपके खाते में सुरक्षित, हैरानी है कि आपने गायिका का नाम दे दिया बावजूद इसके अन्य धुरंधर सही गीत नहीं खोज पाए.
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, February 17, 2010

मार कटारी मर जाना ये अखियाँ किसी से मिलाना न....अमीरबाई कर्नाटकी की आवाज़ में एक अनूठा गाना

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 348/2010/48

१९४७ का साल भारत के इतिहास का शायद सब से महत्वपूर्ण साल रहा होगा। इस साल के महत्व से हम सभी वाकिफ हैं। १५ अगस्त १९४७ को इस देश ने पराधीनता की सारी ज़ंजीरों को तोड़ कर एक स्वाधीन वातावरण में सांस लेना शुरु किया था। एक नए भारत की शुरुआत हुई थी इस साल। हालाँकि आज़ादी की ख़ुशी १५ अगस्त के दिन आई थी, लेकिन इस साल की शुरुआत एक बेहद दुखद घटना से हुई थी। और यह दुखद घटना थी हिंदी सिनेमा के पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल का निधन। १८ जनवरी १९४७ को वो चल बसे और एक पूरा का पूरा युग उनके साथ समाप्त हो गया। उनके अकाल निधन से फ़िल्म संगीत को जो क्षति पहुँची, उसकी भरपाई हो सकता है कि अगली पीढ़ी ने कर दी हो, लेकिन दूसरा सहगल फिर कभी नहीं जन्मा। एक तरफ़ सहगल का सितारा डूब गया, तो दूसरी तरफ़ से एक ऐसी गायिका का उदय हुआ इस साल जो फ़िल्म संगीत का सब से उज्वल सितारा बनीं और ६ दशकों तक इस इंडस्ट्री पर राज करती रहीं। लता मंगेशकर। जी हाँ, १९४७ में ही लता जी का गाया पहला एकल प्लेबैक्ड सॊंग् "पा लागूँ कर जोरी रे" फ़िल्म 'आप की सेवा में' में सुनाई दी थी। १९४७ में ही देश का बंटवारा हो गया और यह देश हिंदुस्तान और पाक़िस्तान में विभाजित हो गया। लाखों की तादाद में लाशें गिरी, सरहद के दोनों तरफ़ साम्प्रदायिक दंगे, मार काट और लूट मच गई, पाक़िस्तान से हिंदू भाग कर हिंदुस्तान आने लगे, तो यहाँ से मुसलमान अपनी जान बचाकर उधर को दौड़ पड़े। फ़िल्म इंडस्ट्री भी इस अफ़रा-तफ़री से बच नहीं पाई। नतीजा यह हुआ कि यहाँ के कई बड़े बड़े कलाकार हमेशा के लिए पाक़िस्तान चले गए, और लाहौर फ़िल्म उद्योग के कई कलाकार भारत आ गए। जानेवालों में शामिल थे नूरजहाँ, ख़ुरशीद, मास्टर ग़ुलाम हैदर, फ़िरोज़ निज़ामी, उस्ताद अमानत अली ख़ान, रोशनारा बेग़म, जी. ए. चिश्ती, वगेरह। एक तरफ़ इन कलाकारों का इस देश को छोड़ कर जाना, और दूसरी तरफ़ नई पीढ़ी के कलाकारों का आगमन, इन दोनों के एक साथ घटने से फ़िल्म संगीत ने करवट लिया और ४० के दशक के आख़िर से फ़िल्मी गीतों के स्वरूप में, गायकी में, ऒर्केस्ट्रेशन में बहुत से बदलाव आए, और ५० के दशक के आते आते फ़िल्म संगीत पर जैसे उसका यौवन आ गया।

५० के दशक की बातें तो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चलती ही रहती है, आज केवल १९४७ की बातें होंगी। दोस्तों, क्यों ना १९४७ के साल को रिप्रेज़ेंट करने के लिए एक ऐसे किसी फ़िल्म के गीत को चुना जाए जो १५ अगस्त के दिन ही रिलीज़ हुई थी! जी हाँ, फ़िल्म 'शहनाई' १५ अगस्त १९४७ को बम्बई के 'नोवेल्टी थिएटर' में रिलीज़ हुई थी जब पूरा देश आज़ादी के जश्न मना रहा था। शहनाई की मंगल ध्वनियाँ इस देश की हवाओं में मिठास घोल रही थी और साथ ही शामिल था इस फ़िल्म का शीर्षक गीत "हमारे अंगना आज बजे शहनाई"। पी. एल. संतोषी निर्देशित और रेहाना, नज़ीर ख़ान, इंदुमती, मुमताज़ अली, दुलारी अभिनीत यह फ़िल्म असल में एक म्युज़िकल कॊमेडी फ़िल्म थी, जो एक ट्रेरंडसेटर फ़िल्म साबित हुई। निर्देशक-गीतकार पी. एल. संतोषी और संगीतकार सी. रामचन्द्र की जोड़ी ने फ़िल्मी गीतों का एक नया ट्रेंड चालू किया इस फ़िल्म से जो बाद के कई सालों तक चलती रही। "आना मेरी जान मेरी जान सण्डे के सण्डे" गीत ख़ूब बजा, जिसे हम भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर बहुत पहले ही सुनवा चुके हैं। इसी फ़िल्म में गायिका अमीरबाई कर्नाटकी की आवाज़ में एक गीत था जिसने भी शोहरत की बुलंदियों को छुआ। आज इसी गीत को हम यहाँ बजा रहे हैं और गीत है "मार कटारी मर जाना, ये अखियाँ किसी से मिलाना ना"। अमीरबाई के सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीतों में इस गीत का शुमार होता है। मशहूर अदाकारा गौहर कर्नाटकी की बहन अमीरबाई 'कन्नड़ कोकिला' के नाम से जानी जाती थीं। १९ फ़रवरी १९१९ को कर्नाटक के बीजापुर ज़िले के बिल्गी गाँव में एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मीं अमीरबाई ने माध्यमिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और १५ वर्ष की आयु में ही बम्बई आ गईं। उनकी किसी क़व्वाली से प्रभावित होकर एच. एम. वी ने उस क़व्वाली का ग्रामोफ़ोन रिकार्ड निकाला। गौहर की मदद से उन्हे ओरिएंटल टॊकीज़ की फ़िल्म 'विष्णु भक्ति' में काम करने का मौका मिला सन् १९३४ में। उसके बाद अनिल बिस्वास ने उन्हे नोटिस किया और ईस्टर्ण आर्ट्स व दर्यानी प्रोडक्शन्स की फ़िल्मों में मौके दिलवाए। १९३७ के आते आते अमीरबाई ने कई फ़िल्मों में अभिनय व गायन कर ली, जिनमें शामिल थे 'भारत की बेटी', 'यासमीन', 'फ़िदा-ए-वतन', 'प्रतिमा', 'प्रेम बंधन', 'दुखियारी', 'जेन्टलमैन डाकू', और 'ईंसाफ़'। इन सभी फ़िल्मों में अनिल दा का ही संगीत था। आगे की दास्तान हम फिर किसी दिन बताएँगे, आइए अब आज का गीत सुना जाए जिसमे अखियाँ ना मिलाने की सलाह दे रही हैं अमीरबाई कर्नाटकी।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

बिक गए बिन मोल ही,
चले सब बीते दिन बिसार,
कोई जादू था जीवन,
जिसके सम्मोहन में, बीत गए जन्म हज़ार...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. एक कमचर्चित गायिका ने इस गीत में रफ़ी साहब का साथ दिया था, उनका नाम ?- सही जवाब को मिलेंगें 3 अंक.
3. ये फिल्म का शीर्षक गीत है, फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
4. इस गीत के गीतकार कौन हैं - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
मनु जी, बहुत दिनों बाद आपकी आमद हुई, बेहद अच्छा लगा
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता.. चलिए याद करें हम ग़म-ए-रोज़गार से खस्ताहाल चचा ग़ालिब को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७१

होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने
शायर तो वो अच्छा है प' बदनाम बहुत है।

इस शेर को पढने के बाद आप समझ हीं गए होंगे कि आज की महफ़िल किसकी शान में सजी है। आज से बस दो दिन पहले यानि कि १५ फरवरी को इस महान शायर की मौत की १४१वीं बरसी थी। संयोग देखिए कि उससे महज़ दो दिन पहले यानि कि १३ फरवरी को इस शायर के सच्चे और एकमात्र उत्तराधिकारी फैज़ अहमद फ़ैज़ की भी बरसी थी.. फ़र्क बस इतना था कि फ़ैज़ ने १३ फ़रवरी को जन्म लिया था तो १५ फ़रवरी को ग़ालिब ने अपनी अंतिम साँसें ली थीं। आज हमारे बीच फ़ैज़ भी नहीं हैं। इसलिए हम आज अपनी महफ़िल की ओर से इन दोनों महान शायरों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

आपने शायद यह गौर किया हो कि हमारी महफ़िल में आज से पहले फ़ैज़ की चार गज़लें/नज़्में शामिल हो चुकी हैं, लेकिन हमने आज तक ग़ालिब की एक भी गज़ल महफ़िल में पेश नहीं की है। अब यह तो हो हीं नहीं सकता कि कोई महफ़िल सजे, सजती रहे और सजते-सजते सत्तर रातें गुजर जाएँ लेकिन उस महफ़िल में उस शायर का नाम न लिया जाए जिसके बिना महफ़िल क्या, शायरी की छोटी-सी गुफ़्तगू भी अधूरी है। और फिर अगर ऐसा हमारी महफ़िल में हो जाए तब तो जरूर हीं कुछ पोशीदा है, जरूर हीं कुछ ऐसा है जिसने अब तक हमें इस सिम्त बढने से रोके रखा था। कुछ न कुछ खास कारण तो जरूर है। तो लीजिए हम हीं वो कारण, वह सबब, वह मंसूबा बताए देते हैं। जैसा कि हमने बातों हीं बातों में पिछली किसी कड़ी में यह बात छेड़ी थी कि कुछ हीं दिनों में हम ग़ालिब पर एक अंक नहीं, बल्कि अंकों की एक श्रृंखला लेकर हाज़िर होने वाले हैं, तो वायदे के अनुसार आज से लेकर अगली नौ कड़ियों तक हमारी महफ़िलें ग़ालिब के नाम से रोशन होती रहेंगी। और बस यही एक वज़ह थी कि हमने अभी तक ग़ालिब को छुपाकर रखा हुआ था.. हम यह नहीं चाहते थे कि पाठकों के प्यासे दिलों पर ग़ालिब फुहार बनकर गिरें और गायब हो जाएँ, बल्कि हमारी यह मंशा थी कि ग़ालिब जब भी आएँ तो यूँकर बरसें कि बारिश सदियों तक खत्म हीं न हों। तो चलिए हम बारिश की शुरूआत करते हैं........

ग़ालिब के बारे में कुछ भी कहने के लिए गुलज़ार साहब से बेहतर और कौन हो सकता है। गुलज़ार साहब अपनी तामीर की हुई "मिर्ज़ा ग़ालिब" में ग़ालिब का परिचय कुछ इस कदर देते हैं:

गली क़ासिम जान ...

सुबह का झटपटा, चारों तरफ़ अँधेरा, लेकिन उफ़्क़ पर थोङी सी लाली। यह क़िस्सा दिल्ली का, सन १८६७ ईसवी, दिल्ली की तारीख़ी इमारतें। पराने खण्डहरात। सर्दियों की धुंध - कोहरा - ख़ानदान - तैमूरिया की निशानी लाल क़िला - हुमायूँ का मकबरा - जामा मस्जिद।

एक नीम तारीक कूँचा, गली क़ासिम जान - एक मेहराब का टूटा सा कोना -

दरवाज़ों पर लटके टाट के बोसीदा परदे। डेवढी पर बँधी एक बकरी - धुंधलके से झाँकते एक मस्जिद के नकूश। पान वाले की बंद दुकान के पास दिवारों पर पान की पीक के छींटे। यही वह गली थी जहाँ ग़ालिब की रिहाइश थी। उन्हीं तसवीरों पर एक आवाज़ उभरती है -

बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कङ पे बटेरों के क़सीदे
गुङगुङाते हुई पान की वो दाद-वो, वाह-वा
दरवाज़ों पे लटके हुए बोसिदा से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमयाने की आवाज़ !
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों से मुँह जोङ के चलते हैं यहाँ
चूङी वालान के कङे की बङी बी जैसे
अपनी बुझती हुई सी आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अँधेरी सी गली क़ासिम से
एक तरतीब चिराग़ॊं की शुरू होती है
असद उल्लाह ख़ान ग़ालिब का पता मिलता है।


ग़ालिब के बारे में जितना और जिस तरह का गुलज़ार साहब ने लिखा और कहा है, उतना कभी किसी और के मुँह से सुनने को नहीं मिला। गुलज़ार साहब ग़ालिब के साथ एक अलग तरह का रिश्ता रखते हैं। यही वज़ह है कि ग़ालिब पर सीरियल बनाने की बस उन्हें हीं सूझी। दूसरे लोग ऐसी हिम्मत और ऐसी हिमाकत करने से कतराते रहे और आज तक कतरा रहे हैं। इस बारे में गुलज़ार साहब का कहना है:

ग़ालिब पर किसी तहक़ीक़ का दावा नहीं मुझे, हाँ ग़ालिब के साथ एक लगाव का दावा ज़रूर करता हूँ।

स्कूल में मौलवी मुजीबुर्रहमान से उर्दू पढी और उन्हीं की बदौलत ग़ालिब, ज़ौक़, ज़फ़र, मोमिन , नासिख़ और दूसरे शोरा से तारूफ़ हुआ। बड़े-बड़े शायर और बड़ी-बड़ी शख्सियतें, उनकी स्वानही उमरी भी पढीं। लेकिन ग़ालिब की स्वानही उमरी पढते हुए, एक अजीब-ओ-ग़रीब अपनेपन का एहसास होता था। शायद इसीलिए हमारे मौलवी साहब भी उन्हें "चचा ग़ालिब" कहकर ख़ताब करते थे। ऐसा कोई ख़ताब किसी और शायर के नाम के साथ कभी नहीं लगाया था। ऐसा होता है, कुछ बड़ी-बड़ी शख़्सियतों से आप रोब खा जाते हैं, कुछ से डरते हैं और कुछ बुजुर्ग ऐसे भी होते हैं जो बुजुर्ग कम और दोस्त ज़्यादा लगते हैं। मौलवी साहब जब-जब ग़ालिब पढाते थे तो ग़ालिब पढते हुए इसी तरह का एहसास होता था।

मैं अक्सर कहा करता हूँ कि ग़ालिब के तीन मुलाज़िम थे, जो हमेशा उनके साथ रहे। एक कल्लू थे, जो आख़िर दम तक उनके साथ रहा, दूसरी वफ़ादार थीं, जो तुतलाती थीं और तीसरा मैं था। वे दोनों तो अपनी उम्र के साथ रेहाई पा गए , मैं अभी तक मुलाज़िम हूँ।

ग़ालिब की शख़्सियत में एक ज़मीन से जुड़ा हुआ मिज़ाज मिलता है.. एक आम इंसान का, जो बड़ी आसानी से ग़ालिब से आइडेंडिफ़ाई करा देता है। ग़ालिब का उधार लेना, उधार न चुका सकने के लिए पुरमज़ह बहाने तलाशना, फिर अपनी ख़फ़्त का इज़हार करना, जज़बाती तौर पर मुझे ग़ालिब के क़रीब ले जाता है। काश मेरी हैसियत होती और मैं ग़ालिब के सारे कर्ज़ चुका देता। अब हाल यह है कि मैं और मेरी नस्ल उसकी कर्ज़दार है।

’चचा ग़ालिब’ कहते हैं तो लगता है, महसूस किया है। सिर्फ़ सोचकर नहीं कह दिया। ज़िंदगी के हर मौके के लिए क़ोटेशन मुहैया कर देते हैं। ग़ालिब की शख़्सियत में मुझे कोई बात ओढी हुई नहीं लगती। शायद इसीलिए ग़ालिब की शख़्सियत इतना मुत्तास्सर करती है और ग्यारह बरस में जो भी मवाद जमा हुआ मेरे पास उससे मैंने ग़ालिब की ज़िंदगी पर एक सीरियल बनाया।

अब आप हीं बताएँ, मैंने ग़ालिब की ’ज़िंदगी बनाई’ या ग़ालिब ने मेरी ज़िंदगी बना दी।

हम भी आप से यही पूछते हैं कि किसने किसकी ज़िंदगी बनाई। वैसे हमारा तो यह मानना है कि दोनों ने हम सबकी ज़िंदगी बना दी है। क्या कहते हैं आप?

चलिए अब ग़ालिब का एक संक्षिप्त परिचय दिए देते हैं। अह्ह्हा. ये क्या, किसी ने हमसे पहले हीं "आवाज़" के इस मंच पर ग़ालिब का परिचय दे रखा है। यकीन नहीं होता तो यहाँ जाईये। परिचय देखकर आपने जान हीं लिया होगा कि आख़िर ग़ालिब कौन-सी बला थे। अगर अब भी मन मे कोई शक़-ओ-शुबह हो तो इन शेरों पर नज़र दौड़ा लीजिए... खुद-ब-खुद जान जाएँगे:

ग़ालिबे ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
रोईए ज़ार ज़ार क्या, कीजिए हाए हाए क्यों

हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पे कहना कि यूँ होता तो क्या होता


अभी तो ग़ालिब के बारे में बात करने को ९ कड़ियाँ पड़ी हैं। हम आपको यकीन दिलाते हैं कि ग़ालिब से जुड़ी कोई भी बात नहीं छूटेगी। आपको ग़ालिब की गज़लों से सराबोर न कर दिया तो कहियेगा। जब गज़ल की बात आ हीं गई है तो क्यों न आज की गज़ल से रूबरू हो लिया जाए। आज की गज़ल को अपनी आवाज़ से सजाया है उस्ताद असद अमानत अली खान साहब ने। हमने आपको इनके अब्बाजान की गाई हुई गज़ल "इंशा जी उठो" सुनवाई थी और उस गज़ल से जुड़ी कुछ कहानियों का भी ज़िक्र किया था। हमने उस दौरान "असद" साह्ब की भी कुछ बातें की थीं। अगर याद न हो तो एक बार वहाँ से हो आएँ। आज चूँकि हम ग़ालिब की गलियों में हीं खोए रह गए, इसलिए असद साहब का ध्यान हीं नहीं रहा। खैर कोई बात नहीं.. आज नहीं तो अगली बार सही। बात नहीं हुई तो क्या हुआ, हम इनकी मीठी आवाज़ का मज़ा तो ले हीं सकते हैं। वैसे मीठी आवाज़ में दर्द भरी गज़ल सुनने का लुत्फ़ कैसा होता है, यह कहने की ज़रूरत नहीं.. आप खुद दर्द के शौकीन हैं.. आप से क्या कहना! :

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता

तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जानां
के ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये _____ कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

कहूँ किस से मैं के क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्योँ न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तस्वीर" और पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं -

ऐ ’हश्र’ देखना तो ये है चौदहवीं का चाँद,
या आसमां के हाथ में तस्वीर यार की।

पिछली महफ़िल में गैर-मौजूदगी के बाद सीमा जी इस बार सही समय पर आई, मतलब कि महफ़िल की शुरूआत में हीं। अब आ गई हैं तो आगे से गायब मत होईयेगा। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर:

दिल खिंच रहा है फिर उसी तस्वीर की तरफ़.
हो आयें चलिए मीर तकी मीर की तरफ़. (ज़ैदी जाफ़र रज़ा )

तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती
एक ख़्वाब सा देखा है ताबीर नहीं बनती (ख़ुमार बाराबंकवी )

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते (गुलज़ार )

शरद जी, कहते हैं ना कि "जो बात तुझमें है, तेरी तस्वीर में नहीं".. उसी तरह जो बात आपके लिखे हुए शेर में होती है, वो और कहाँ! यह रहे आपके दो स्वरचित शेर और वो भी अलग-अलग अंदाज़ में:

मिली तस्वीर इक दिन बाप की जो उस के बेटे को
तो बोला ’आप भी डैडी कभी क्या खूब लगते थे’ ।

शीशा-ए-दिल में छुप है ओ सितमगर तेरा प्यार
जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली तस्वीर-ए-यार ।

शन्नो जी, आपके आने से महफ़िल में एक जान-सी आ गई है। बस आप नीलम जी को भी खोज कर ले आएँ तो बात बने। यह रहा आपका लिखा हुआ शेर:

जब-जब शीशा-ए-दिल में एक तस्वीर सी उभरती है
पत्थरों का अहसास भी तभी आ जाता है ख्याल में.

मंजु जी, आपमें यह खासियत है कि हम चाहे कैसा भी शब्द दे दें, आप हर बार अपने हीं लिखे शेर के साथ हाज़िर होती हैं। हमें पसंद है आपकी यह अदा:

ख्यालों के रंगों से रंगी तस्वीर तेरी ,
बेकरारी से मिलन का इंतजार बाकी है .

अवनींद्र साहब, तो आप जान गए ना कि हमारी महफ़िल की शोभा बनने के लिए क्या करना होता है। बस आप सही शब्द की पहचान करें और उस शब्द पर शेर कह दें। आपके पेश किए हुए सारे शेर कमाल के हैं, किन्हीं को भी छोड़ने का मन नहीं कर रहा:

ज़रा-सी देर में जल के राख हो गया,
तेरी तस्वीर को कलेज़े से लगाकर देखा (शायर ? )

मेरे सामने ही कर दिए मेरी तस्वीर के टुकड़े
मेरे बाद उन्ही टुकड़ों को जोड़ कर रोई (अज्ञात)

ग़मों का शोर उठा है या तसव्वुर कि शाम आई
याद जब भी तेरी आई लेके अश्के -जाम आई
तेरे सामने जब भी बैठकर रोना चाहा
तेरी कसम तेरी तस्वीर बहुत काम आई (स्वरचित) वाह! क्या बात है!

सुमित जी, आपने नया शेर तो पेश किया, लेकिन यह नहीं बताया कि इसके शायर कौन हैं। यह रहा वो शेर:

मेरी तस्वीर में रंग किसी और का तो नहीं,
घेर लेते हैं मुझे सब, मैं तमाशा तो नहीं?

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, February 16, 2010

आवाज़ दे कहाँ है...ओल्ड इस गोल्ड में पहली बार बातें गायक/अभिनेता सुरेन्द्र की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 347/2010/47

४० का दशक हमारे देश के इतिहास में राष्ट्रीय जागरण के दशक के रूप में याद किया जाता है। राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से इस दौर ने इस देश पर काफ़ी असरदार तरीके से प्रभाव डाला था। द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होते ही फ़िल्म निर्माण पर लगी रोक को उठा लिया गया जिसके चलते फ़िल्म निर्माण कार्य ने एक बार फिर से रफ़्तार पकड़ ली और १९४६ के साल में कुल १५५ हिंदी फ़िल्मों का निर्माण किया गया। लेकिन सही मायने में जिन दो फ़िल्मों ने बॊक्स ऒफ़िस पर झंडे गाढ़े, वो थे 'अनमोल घड़ी' और 'शाहजहाँ'। एक में नूरजहाँ - सुरैय्या, तो दूसरे में के. एल. सहगल। लेकिन दोनों फ़िल्मों के संगीतकार नौशाद साहब। वैसे हमने इन दोनों ही फ़िल्मों के गानें 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बजाए हैं, लेकिन जब इस साल का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी गीत को चुनने की बात आती है तो इन्ही दो फ़िल्मों के नाम ज़हन में आते हैं, और आने भी चाहिए। क्योंकि हमने 'शाहजहाँ' फ़िल्म के दो गीत सुनवाएँ हैं, तथा सहगल साहब और इस फ़िल्म से जुड़ी तमाम बातें भी बता चुके हैं, तो क्यों ना आज फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' का एक दोगाना सुन लिया जाए, जिससे कि एक और ऐसे गायक का ज़िक्र छिड़ जाएगा जिनका अभी तक हम ने इस मंच पर कभी ज़िक्र नहीं किया है। हमारा इशारा है गायक और अभिनेता सुरेन्द्र की ओर, जिन्होने इस फ़िल्म में नूरजहाँ के साथ मिलकर एक बेहद मशहूर युगल गीत गाया था "आवाज़ दे कहाँ है, दुनिया मेरी जवाँ है, आबाद मेरे दिल की उम्मीद का जहाँ है"। 'नजमा', 'तक़दीर', और 'हुमायूं' जैसे कम ख्याति वाले फ़िल्मों के निर्माण के बाद महबूब ख़ान लेकर आए 'अनमोल घड़ी' और इसी फ़िल्म ने एक बार फिर से उन्हे पहली पंक्ति के फ़िल्मकारों के बीच ला खड़ा किया। यह फ़िल्म एक प्रेम-त्रिकोण थी नूरजहाँ, सुरैय्या और सुरेन्द्र के बीच। नौशाद का संगीत और तनवीर नक़वी के गीतों ने वो असर किया कि आज ६५ साल बाद भी ये गानें बिल्कुल ताज़े लगते हैं।

आइए आज कुछ सुरेन्द्रनाथ की बातें की जाए। सुरेन्द्रनाथ का जन्म ११ नवंबर १९१० को पंजाब के बटाला में हुआ था। फ़िल्मों की चाहत उन्हे बम्बई खींच लाई। उनकी फ़िल्मी यात्रा शुरु हुई १९३६ में फ़िल्म 'डेक्कन क्वीन' से जिसमें वे हीरो बनें और दो गानें भी गाए। उनका गाया पहला गीत था "बिरहा की आग लगी"। दरअसल उन दिनों सहगल साहब न्यु थिएटर्स की फ़िल्मों में काफ़ी धूम मचा रहे थे। ऐसे में सागर मूवीटोन के महबूब ख़ान ने सुरेन्द्र को खोज निकाला और सहगल साहब को टक्कर देने के लिए उन्हे इस बैनर की फ़िल्मों (डेक्कन क्वीन, मनमोहन) में लॊंच किया। सुरेन्द्र साहब के गानें तो बहुत मशहूर हुए लेकिन वे वो मकाम कभी हासिल नहीं कर पाए जो मकाम सहगल साहब ने हासिल किया था। ख़ैर, सुरेन्द्र की कुछ जानी मानी फ़िल्में हैं 'डेकन क्वीन', 'मनमोहन', 'भारतरी', 'अनमोल घड़ी', 'अनोखी अदा', 'ऐलान', 'मेरी कहानी', 'हरियाली और रास्ता', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'बैजु बावरा', 'सरस्वतीचन्द्र'। बतौर गायक उनकी अंतिम फ़िल्म थी 'गवैया'। आज का प्रस्तुत गीत राग पहाड़ी पर आधारित है और इसे प्रस्तुत करते हुए अपने 'जयमाला' कार्यक्रम में सुरेन्द्र ने कहा था - "इसी फ़िल्म में मेरा और नूरजहाँ का एक डुएट गीत है "आवाज़ दे कहाँ है"। इसके साथ कई भूली बिसरी यादें जुड़ी हुई हैं, कभी दोस्तों की शकलें आँखों के सामने आ जाते हैं तो कभी शबाब का वो रंगीन ज़माना। मैं उन दिनों को आवाज़ देता हूँ और आपको यह गीत सुनाता हूँ।"



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

दुनिया की कोई रीत हमें रास आती नहीं,
और क्या कहें जिंदगी भी हमें भाती नहीं,
नींद तो आँखों से रूठ गयी कब की,
ये जान कमबख्त क्यों जाती नहीं...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. कन्नड़ कोकिला के नाम से जानी जाने वाली इस गायिका का नाम बताएं- सही जवाब को मिलेंगें 3 अंक.
3. ये फिल्म ठीक १५ अगस्त १९४७ को प्रदर्शित हुई थी, नाम बताएं - २ अंक.
4. इस गीत के संगीतकार कौन हैं - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी ने एक बार फिर सही जवाब देकर २ अंक कमाए, अवध जी कल भी आपकी मेल मिली, जिया सरहदी वाले सही जवाब के लिए आपके खाते में भी २ अंक जोड़ दिए गए हैं. रोहित जी आप फिर कहाँ गुम हो गए, और इंदु जी ?
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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