शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

सुनो कहानी: आग - असगर वजाहत

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में गोपाल प्रसाद व्यास का व्यंग्य "झूठ बराबर तप नहीं" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं असगर वजाहत की एक कहानी "आग", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "आग" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 14 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट गद्य कोश पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



रात के वक्त़ रूहें अपने बाल-बच्चों से मिलने आती हैं।
~ असगर वजाहत

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

आग प्रचंड थी। बुझने का नाम न लेती थी।
(असगर वजाहत की "आग" से एक अंश)


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#Sixty First Story, Aag: Asghar Wajahat/Hindi Audio Book/2010/6. Voice: Anurag Sharma

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी...ये गीत समर्पित है हमारे श्रोताओं को जिनकी बदौलत ओल्ड इस गोल्ड ने पूरा किया एक वर्ष का सफर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 350/2010/50

'प्योर गोल्ड' की अंतिम कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं। १९४० से शुरु कर साल दर साल आगे बढ़ते हुए आज हम आ पहुँचे हैं इस दशक के अंतिम साल १९४९ पर। फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की अगर हम बात करें तो सही मायने में इस दौर की शुरुआत १९४८-४९ के आसपास से मानी जानी चाहिए। यही वह समय था जब फ़िल्म संगीत ने एक बार फिर से नयी करवट ली और नए नए प्रयोग इसमें हुए, नई नई आवाज़ों ने क़दम रखा जिनसे यह सुनहरा दौर चमक उठा। 'बरसात', 'अंदाज़', 'महल', 'शायर', 'जीत', 'लाहौर', 'एक थी लड़की', 'लाडली', 'दिल्लगी', 'दुलारी', 'पतंगा', और 'बड़ी बहन' जैसी सुपर हिट म्युज़िकल फ़िल्मों ने एक साथ एक ऐसी सुरीली बारिश की कि जिसकी बूंदें आज तक हमें भीगो रही है। दोस्तों, हम चाहते तो इन फ़िल्मों से चुनकर लता मंगेशकर या मुकेश या मोहम्मद रफ़ी या फिर शमशाद बेग़म या गीता रॊय का गाया कोई गीत आज सुनवा सकते थे। लेकिन इस शृंखला में हमने कोशिश यही की है कि उन कलाकारों को ज़्यादा बढ़ावा दिया जाए जो सही अर्थ में ४० के दशक को रिप्रेज़ेंट करते हैं। इसलिए हमने चुना है एक ऐसी आवाज़ जिसके ज़िक्र के बग़ैर यह शृंखला अधूरी ही रह जाएगी। जी हाँ, ४० के दशक को समर्पित इस शृंखला की अंतिम कड़ी में पेश-ए-ख़िदमत है गायिका सुरैय्या की आवाज़ का जादू। फ़िल्म 'दिल्लगी', और इस गीत में सुरैय्या का साथ दिया है अभिनेता व गायक श्याम ने। याद है ना वह हिट गीत "तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी"? शक़ील बदायूनी के बोल और नौशाद साहब की तर्ज़। यह अब्दुल रशीद कारदार की फ़िल्म थी, जिन्होने इसी साल फ़िल्म 'दुलारी' का निर्माण भी किया था।

आज अगर फ़िल्म 'दिल्लगी' याद की जाती है तो केवल इसके सुरीले गीतों की वजह से। हम आपको बता दें कि आज के इस गीत के दो वर्ज़न बने थे, एक तो सुरैय्या और श्याम ने गाए, दूसरा वर्ज़न गाया श्याम और गीता रॊय ने। जी हाँ। सुरैय्या वाले गीत में नौशाद साहब ने बांसुरी का सुरीला इस्तेमाल किया है प्रिल्युड और इंटरल्युड में। दोनों गीतों के ऒर्केस्ट्रेशन में ही ना केवल फ़र्क है, बल्कि मेल-फ़ीमेल पोर्शन में भी काफ़ी फ़र्क है। जहाँ एक तरफ़ सुरैय्या और श्याम बारी बारी से और कभी कभी साथ में गाते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ गीता-श्याम वाले वर्ज़न में श्याम गीत की शुरुआत करते हैं जब कि गीता जी रिले रेस की तरह उनसे गीत अपने हाथ ले लेती है और अंत तक वोही गातीं हैं। जहाँ एक तरफ़ सुरैय्या की वज़नदार और परिपक्कव आवाज़, वहीं दूसरी तरफ़ कमसिन गीता रॊय का मोडुलेशन और रवानी भरा अंदाज़। वाक़ई यह बताना मुश्किल है कि कौन किससे बेहतर! नूरजहाँ के पाक़िस्तान चले जाने के बाद सुरैय्या फ़िल्म जगत की सब से ज़्यादा पारिश्रमिक पाने वाली नायिका बन गईं थीं। यह अलग बत है कि बहुत जल्द ही वो फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया, कुछ अपने व्यक्तिगत कारणों से और कुछ बदलते दौर की वजह से जिसमें उन्हे दूसरी नायिकाओं के लिए प्लेबैक करना गवारा नहीं हुआ। फ़िल्म 'दिल्लगी' में प्रस्तुत गीत के अलावा सुरैय्या के गाए कुछ और बेहद हिट गानें थे जैसे कि "मुरलीवाले मुरली बजा सुन सुन मुरली को नाचे जिया" और "तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा, उल्फ़त की ज़िंदगी को मिटाया ना जाएगा"। और भी गाने थे उनके गाए हुए इस फ़िल्म में जैसे कि "चार दिन की चांदनी थी फिर अंधेरी रात है", "निराला मोहब्बत का दस्तूर देखा", "लेके दिल चुपके से किया मजबूर हाए" और "दुनिया क्या जाने मेरा अफ़साना क्यों गाए दिल उल्फ़त का तराना"। हर गीत में उनका अलग अंदाज़ सुनने को मिला। मोहम्मद रफ़ी ने भी इस फ़िल्म में एक ग़मज़दा नग़मा गाया था "इस दुनिया में ऐ दिलवालों दिल का लगाना खेल नहीं"। तो दोस्तों, यह थी ४० के दशक के हर साल से चुन कर एक एक गीत इस ख़ास शृंखला 'प्योर गोल्ड' के अंतर्गत। हमें आशा है आपको पसंद आई होगी। और इसी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' ने पूरे किए ३५० अंक और साथ ही आज पूरा हुआ इस शृंखला का एक साल। २० फ़रवरी २००९ में शुरु हुई इस शृंखला को यहाँ तक लेकर आने में आप सब ने जो हमारी हौसला अफ़ज़ाई की है, उसके लिए हम आप के तहे दिल से शुक्रगुज़ार हैं। आगे भी इसी तरह का साथ बनाए रखिएगा, क्योंकि हमारा साथ चांद और चांदनी का है, राग और रागिनी का है। सुनते हैं "तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी, तू मेरा राग मैं तेरी रागिनी"।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

उम्मीद बुझ गयी सभी,
लेकिन ये कम तो नहीं,
हासिल हैं तेरी सोहबतें,
जीने को है आसरा तेरा...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. इस खूबसूरत ग़ज़ल को किस शायर/गीतकार ने लिखा है - सही जवाब को मिलेंगें २ अंक.
3. ग़ज़ल गायिकी के सरताज तलत साहब की इस ग़ज़ल को किसने स्वरबद्ध किया है- २ अंक.
4. तलत साहब ने अपने बांगला गीत किस नाम से गाये हैं - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी का स्कोर २० अंकों पर पहुँच चुका है. इंदु जी पहेली के नए संस्करण में पहली बार आई और उनका खाता खुला है २ अंकों से. बधाई...सही है इंदु जी आपकी बात. देखते हैं अभी कुछ समय और....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार...गुजरे ज़माने के एक मस्त मस्त गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 349/2010/49

साल १९४८ की शुरुआत भी अच्छी नहीं रही। ३० जनवरी १९४८ की सुबह महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई, जिसके बाद साम्प्रदायिक दंगे एक बार फिर से छिड़ गए और देश की अवस्था और भी नाज़ुक हो गई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजली स्वरूप गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने उन पर एक गीत लिखा जिसे हुस्नलाल भगतराम के संगीत में मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया। "सुनो सुनो ऐ दुनियावालों बापु की यह अमर कहानी" एक बेहद लोकप्रिय गीत साबित हुआ। ब्रिटिश राज के समाप्त हो जाने के बाद देश भक्ति फ़िल्मों के निर्माण पर से सारे नियंत्रण हट गए। ऐसे में फ़िल्मिस्तान लेकर आए 'शहीद', जो हिंदी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ देशभक्ति फ़िल्मों में गिनी जाती है। जहाँ एक तरफ़ दिलीप कुमार की अदाकारी, वहीं दूसरी तरफ़ मास्टर ग़ुलाम हैदर के संगीत में "वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हों" गीत ने तो पूरे देश को जैसे देश प्रेम के जज़्बे से सम्मोहित कर लिया। उधर हैदर साहब ने ही फ़िल्म 'मजबूर' में लता को अपना पहला हिट गीत दिया "दिल मेरा तोड़ा"। संगीत की दृष्टि से १९४८ की कुछ प्रमुख फ़िल्मों के नाम हैं 'अनोखी अदा', 'मेला', 'आग़', 'अनोखा प्यार', 'ज़िद्दी', 'प्यार की जीत' वगेरह। एक तरफ़ सुरैय्या, शमशाद बेग़म, जी. एम. दुर्रनी, ज़ोहराबाई, अमीरबाई जैसे गायक चमक रहे थे, वहीं दूसरी तरफ़ लता मंगेशकर, मुकेश, मोहम्मद रफ़ी, गीता रॊय, जैसे गायक अपने क़दम मज़बूत करने के प्रयास में जुटे हुए थे। दोस्तों, हमने उपर जो फ़िल्मों की फेहरिस्त दी है, या जिन फ़िल्मों का ज़िक्र किया है, आज का गीत उनमें से किसी भी फ़िल्म का नहीं है। बल्कि आज हम लेकर आए हैं एक ऐसा गीत जिसमें एक बेहद कमचर्चित गायिका की आवाज़ है। लेकिन साथ में रफ़ी साहब भी हैं। अब तो आप समझ ही चुके होंगे कि फ़िल्म 'नदिया के पार' का यह गीत है "मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार"। ललिता देओलकर और रफ़ी साहब की आवाज़ें, सी. रामचन्द्र का संगीत और गीतकार बी. ए. मोती के बोल। फ़िल्म 'नदिया के पार' के मुख्य कलाकार थे दिलीप कुमार और कामिनी कौशल (इन दोनों ने फ़िल्म 'शहीद' में भी साथ साथ काम किया था)। जिन्हे मालूम नहीं है, उनके लिए हम यहाँ बता दें कि आगे चल कर ललिता देओलकर संगीतकार सुधीर फड़के की धर्मपत्नी बनीं थीं।

दोस्तों, आज जब सी. रामचन्द्र और ललिता देओलकर की बातें एक साथ हो रही हैं, इसलिए मैंने एक ऐसा इंटरव्यू खोज निकाला है जिसमें प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रिकार्ड कलेक्टर डॊ. प्रकाश जोशी बता रहे हैं सी. रामचन्द्र से संबंधित एक क़िस्से के बारे में जिसे उन्हे बताया था ललिता जी ने। यह इंटरव्यू विविध भारती पर स्वर्णजयंती शृंखला 'जुबिली झंकार' के अंतरगत ३ जनवरी २००८ को प्रसारित किया गया था। डॊ जोशी ने बताया: "मुझे अभी भी याद है जब सुधीर फड़के और ललिता फड़के, ललिता देओलकर को हमारे यहाँ फ़ेलिसिटेट किया था, जिनका सत्कार किया था, तो उन्होने सी. रामचन्द्र जी के बारे में बहुत सी बातें बताई। जैसा 'नदिया के पार' करके एक फ़िल्म थी, तो उस ज़माने में रिकार्डिंग् जब होता था, तो वो कहती हैं कि रामचन्द्र जी को नोटेशंस बहुत अच्छा याद रहता था, और 'he was a quick music director', उनके जैसा 'fast music director' और कोई नहीं था। और वो जहाँ जहाँ जाते थे, मेले में अथवा कोई प्रोग्राम में, अच्छी कोई लोक धुन सुनी या अच्छा कोई टुक़आ मिला तो अपनी डयरी में नोटेशन तुरंत लिख के रखते थे। और एक रिकार्डिंग् था जब, बता रहीं थीं ललिता जी, कि वो बहुत अपसेट थे, वह रिकार्डिंग् जैसे तैसे पूरा किया, लेकिन गाना सुनने के बाद वो बिल्कुल गुमसुम बैठे रहे। तो ललिता जी रिकार्डिंग् के बाद गईं उनके पास कि 'अन्ना, हुआ क्या, आज इतना अपसेट क्यों हैं, तबीयत तो ठीक है ना?' ये सब उन्होने पूछा तो बेचारे रोने लगे और बताया कि आज किसी ने मेरी जेब काट दिया। बोले कि कितने भी नोट मेरे जाते, १०००, २०००, ५०००, मुझे कोई ग़म नहीं था, लेकिन मेरी नोटेशन वाली नोटबुक गई उसमें।" दोस्तों, इस तरह की कितनी ही नायाब और अनमोल जानकारियाँ विविध भारती के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ज़रिए इन जानकारियों को हम इंटरनेट से जुड़े लोगों तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास हम कर रहे हैं। आशा है आप इनसे लाभांवित हो रहे होंगे। आइए लोक रंग में रंगा हुआ यह गीत सुना जाए और सलाम करें १९४८ के उस सुरीले साल को।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

रुत मिलन की आई,
दिन चमकीले हुए,
धुप चमके खिल खिलाकर,
तेरा साथ पाकर महकी बहार...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. इस गीत के दो संस्करण थे, दोनों में गायक एक हैं उनका नाम बताएं -सही जवाब को मिलेंगें २ अंक.
3. इस युगल गीत के एक संस्करण में सुरय्या की आवाज़ है, दूसरे में किस गायिका की आवाज़ है बताएं - २ अंक.
4. कौन है इस गीत के संगीतकार - सही जवाब के मिलेंगें १ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी ३ अंक और आपके खाते में सुरक्षित, हैरानी है कि आपने गायिका का नाम दे दिया बावजूद इसके अन्य धुरंधर सही गीत नहीं खोज पाए.
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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