मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

रसिया रे मन बसिया रे तेरे बिना जिया मोरा लागे ना...एक गीत मीना कपूर को समर्पित

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 333/2010/33

फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ख़ास लघु शृंखला 'हमारी याद आएगी' की तीसरी कड़ी में आज बातें गायिका मीना कपूर की। जी हाँ, वही मीना कपूर जो एक सुरीली गायिका होने के साथ साथ सुप्रसिद्ध संगीतकार अनिल बिस्वास जी की धर्मपत्नी भी हैं। अनिल दा तो नहीं रहे, मीना जी आजकल दिल्ली में रहती हैं। दोस्तों, आप में से कई पाठक हर मंदिर सिंह 'हमराज़' के नाम से वाकिफ होंगे जिन्होने फ़िल्मी गीत कोश का प्रकाशन किया एक लम्बे समय से शोध कार्य करने के बाद। इस शोध कार्य के दौरान वे फ़िल्म जगत के तमाम कलाकारों से ख़ुद जा कर मिले और तमाम जानकारियाँ बटोरे। उनकी निष्ठा और लगन का ही नतीजा है कि १९३१ से लेकर ८० के दशक तक के सभी फ़िल्मों के सभी गीतों के डिटेल्स उनके बनाए गीत कोश में दर्ज है। तो एक बार वे दिल्ली में अनिल दा के घर भी गए थे। आइए उन्ही की ज़बानी में सुनें उस मुलाक़ात के बारे में जिसमें अनिल दा के साथ साथ मीना जी से भी उनकी भेंट हुई और मीना जी के गाए शुरु शुर के गीतों के बारे में कुछ दुर्लभ बातें पता चली। 'हमराज़' जी 'लिस्नर्स बुलेटिन' पत्रिका के सम्पादक भी हैं और उस मुलाक़ात को उन्होने इस पत्रिका के ६८-वें अंक में सन् १९८७ में प्रकाशित किया था, प्रस्तुत है। "२५ नवंबर १९८६ को दिल्ली में अनिल दा के घर पर उनकी १९३५ से १९४० तक हिंदी फ़िल्मों के गीतों के गयकों की जानकारी प्राप्त करने के लिए जब मेरी बातचीत चल रही थी तो एकाएक गायिका मीना कपूर जी आ गईं। तब उनके गाए गीतों की बात चल पड़ी। मीना जी ने बताया कि सब से पहला गीत उन्होने संगीतकार नीनू मजुमदार के निर्देशन में फ़िल्म 'पुल' में सन् १९४७ में गाया था - "नाथ तुम जानत हो सब गट की"। इसके बाद की २-३ फ़िल्मों के लिए भी नीनू मजुमदार जी ने ही उनसे गीत गवाए थे - जेलयात्रा ('४७), गड़िया ('४७ - "सुंदर सुंदर प्यारे प्यारे", "रात की गोदी में" , "निंदिया देश चलो री"), कुछ नया ('४८) इत्यादि।"

मीना कपूर ने अनिल दा के संगीत निर्देशन में भी बहुत से फ़िल्मों में गानें गाए हैं, लेकिन बहुत बार ऐसा हुआ कि फ़िल्म के पर्दे पर तो उनकी आवाज़ रही, लेकिन ग्रामोफ़ोन रिकार्ड के लिए उन्ही गीतों को लता जी से गवाया गया। और क्योंकि रिकार्ड वाले वर्ज़न ही श्रोताओं को सुनने को मिलता है, इस तरह से मीना जी के गाए तमाम गानों से उनके चाहने वाले वंचित रह गए। १९४८ की एक ऐसी ही फ़िल्म थी 'अनोखा प्यार', जिसमें अनिल दा ने नरगिस के लिए मीना जी की आवाज़ को चुना था। लेकिन बाद में जब रिकर्ड पर लता जी की आवाज़ सुनाई दी तो ऐसा कहा गया कि उस वक़्त मीना जी बीमार थीं जिसकी वजह से लता जी ने रिकार्ड के लिए वो गीत गाएँ। वैसे लता जी ने इस फ़िल्म में नलिनी जयवंत के लिए पार्श्वगायन किया था। मीना जी के गाए हिट गीतों में चितलकर के साथ उनका गाया "आना मेरी जान संडे के संडे" ख़ासा लोकप्रिय हुआ था। ५० के दशक में भी अनिल दा के कुछ फ़िल्मों में उनके गाए गीत ख़ूब पसंद किए गए जैसे कि फ़िल्म 'परदेसी', 'छोटी छोटी बातें', और 'चार दिल चार राहें'। आज के लिए हमने चुना है १९५७ की फ़िल्म 'परदेसी' का एक बड़ा ही दिल को छू लेने वाला गीत, "रसिया रे, मन बसिया रे, तेरे बिना जिया मोरा लागे ना"। यह फ़िल्म पहली इंडो रशियन को-प्रोडक्शन फ़िल्म थी, जिसका निर्माण रूस में हुआ था। कहानी ख्वाजा अहमद अब्बास व मारिया स्मिर्नोवा की थी, तथा निर्देशन अब्बास साहब और वसिलि प्रोनिन का था। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे डेविड अब्राहम, इया अरेपिना, विताली बेलियाकोव, पी. जयराज, पृथ्वीराज कपूर, श्तीफ़न कायुकोव, मनमोहन कृष्णा, नरगिस, वरवरा ओबुखोवा, पद्मिनी, अचला सचदेव, बलराज साहनी, ओलेग स्ट्रिज़ेनोव प्रमुख। उस साल के फ़िमफ़ेयर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन के लिए एम. आर. आचरेकर को पुरस्कार मिला था इस फ़िल्म के लिए। जहाँ तक संगीत पक्ष का सवाल है, अनिल दा का संगीत था और प्रेम धवन के बोल। दोस्तों, आज अनिल दा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी जीवन संगिनी मीना जी का गाया हुआ यह गीत जैसे आज पुकार पुकार कर उन्हे आवाज़ दे रहा है कि "तेरे बिना जिया मोरा लागे ना"। जानेवाले तो कभी वापस नहीं आते, लेकिन ऐसे कलाकार जाकर भी नहीं जाते। गुज़रे ज़माने के ये अनमोल तराने हमेशा हमेशा उन्हे हमारे बीच मौजूद रखेंगे। मीना कपूर जी को उत्तम स्वास्थ्य और लम्बी आयु के लिए शुभकामनाएँ देते हुए आइए सुनते हैं उनका गाया यह सुरीला नग़मा।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

इबादत में उठे हैं आज फिर हाथ मेरे,
खुदा मिटा दे उसके दिल से हर गिला,
वो मेरा सनम जो दूर हो गया नज़रों से,
है जुस्तजू जिसकी उससे दे मुझे मिला...

अतिरिक्त सूत्र- साहिर लुधियानवीं का लिखा है ये गीत

पिछली पहेली का परिणाम-
जी शरद जी आपने हमारी गलती पर सही ध्यान दिलाया. पर आपको बधाई...क्या वाकई आपको ये सभी गाने जुबानी याद हैं :), ग्रेट
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

अमन का सन्देश भी है "खान" के सूफियाना संगीत में...

ताज़ा सुर ताल 05/ 2010

सजीव - सुजॊय, वेल्कम बैक! उम्मीद है छुट्टियों का तुमने भरपूर आनंद उठाया होगा!

सुजॊय - बिल्कुल! और सब से पहले तो मैं विश्व दीपक तन्हा जी का शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होने मेरी अनुपस्थिति में 'ताज़ा सुर ताल' की परंपरा को बरक़रार रखने में हमारा सहयोग किया।

सजीव - निस्सन्देह! अच्छा सुजॊय, आज फरवरी का दूसरा दिन है, यानी कि साल २०१० का एक महीना पूरा हो चुका है, लेकिन अब तक एक भी फ़िल्म इस साल की बॊक्स ऒफ़िस पर अपना सिक्का नहीं जमा पाया है। पिछले हफ़्ते 'वीर' रिलीज़ हुई थी, और इस शुक्रवार को 'रण' और 'इश्क़िया' एक साथ प्रदर्शित हुई हैं। 'वीर' ने अभी तक रफ़्तार नहीं पकड़ी है, देखते हैं 'रण' और 'इश्क़िया' का क्या हश्र होता है। 'चांस पे डांस', 'प्यार इम्पॊसिबल', और 'दुल्हा मिल गया' भी पिट चुकी है।

सुजॊय - मैंने सुना है कि 'इश्क़िया' के संवदों में बहुत ज़्यादा अश्लीलता है। विशाल भारद्वाज ने 'ओम्कारा' की तरह इस फ़िल्म के संवादों में भी काफ़ी गाली गलोच और अश्लील शब्द डाले हैं। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि फ़ैमिली ऒडियन्स को यह फ़िल्म थियटरों में खींच पाएगी। देखते हैं! और आपने ठीक ही कहा है कि इस साल अभी तक कोई फ़िल्म हिट नहीं हुई है। और '३ इडियट्स' अब भी सिनेमाघरों में हाउसफ़ुल चल रही है।

सजीव - लेकिन लगता है बहुत जल्द ही आमिर ख़ान को टक्कर देनेवाले हैं शाहरुख़ ख़ान, क्योंकि अगले हफ़्ते रिलीज़ हो रही है 'माइ नेम इज़ ख़ान', जिसका लोग बहुत दिनों से बड़े ही बेसबरी से इंतज़ार कर रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या 'माइ नेम...' '३ इडियट्स' को बॊक्स ऒफ़िस पर मात दे सकेगी या नहीं।

सुजॊय - जहाँ तक गीत संगीत का सवाल है, जहाँ एक तरफ़ अब भी "ऒल इज़ वेल" काउण्ट डाउन शोज़ में नंबर-१ पर चल रही है, वहीं यह भी देखना है कि 'माइ नेम...' का "सजदा" कामयाबी के कितने पायदान चढ़ता है। चलिए आज हम समीक्षा करें 'माइ नेम इस ख़ान' के गीत संगीत का।

सजीव - जब तुमने "सजदा" का ज़िक्र छेड़ ही दिया है तो चलो जल्दी से यह गीत सुन लेते हैं, उसके बाद इस फ़िल्म की बातों को आगे बढ़ाएँगे।

गीत - सजदा....sajda (MNIK)


सुजॊय - राहत फ़तेह अली ख़ान, शंकर महादेवन और रीचा शर्मा के गाए इस गीत को फ़िल्म का सर्वश्रेष्ठ गीत माना जा रहा है। इस फ़िल्म के लगभग सभी गानें सुफ़ीयाना अंदाज़ के हैं।

सजीव - आजकल एक ट्रेंड सी जैसे चल पड़ी है सुफ़ी संगीत को फ़िल्मों में इस्तेमाल करने की। और क्योंकि यह फ़िल्म का पार्श्व अमेरीका में बसे एक मुस्लिम परिवार से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस तरह का संगीत इस फ़िल्म में सार्थक बन पड़ा है। कुछ कुछ क़व्वाली के अंदाज़ में यह गीत सुनने के बाद देर तक ज़हन में बसा रहता है। तबला और ढोलक के ठेकों का बहुत ही ख़ूबसूरत इस्तेमाल इस गीत में सुनने को मिलता है।

सुजॊय - और राहत फ़तेह अली ख़ान और रीचा शर्मा के सुफ़ीयाना अंदाज़ से तो श्रोता बहुत दिनों से ही परिचित हैं, इस गीत में भी इन दोनों ने अपना बेस्ट दिया है। और संगीतकार तिकड़ी शंकर अहसान लॊय ने फिर एक बार साबित किया कि उन्हे सिर्फ़ रॊक में नहीं बल्कि हर प्रकार के संगीत में महारथ हासिल है।

सजीव - तो कुल मिलाकर हम यह कहें कि हमें इस गीत का सजदा करना चाहिए?

सुजॊय - बेशक़!

सजीव - अच्छा, अब जो दूसरा गाना हम सुनेंगे उसे भी तीन गायकों ने गाया है। ये हैं अदनान सामी, शंकर महादेवन और श्रेया घोषाल, और गीत है "नूर-ए-ख़ुदा"। यह एक नर्मोनाजुक गीत है, जिसमें अदनान और शंकर की आवाज़ें ही ज़्यादा सुनाई देती है। श्रेया की एन्ट्री अंत के तरफ़ होती है, लेकिन उतनी ही मिठास के साथ।

सुजॊय - गीत के ऒर्केस्ट्रेशन में गीटार का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है। चलिए शोर्ताओं को भी इस गीत को सुनने का मौका देते हैं।

गीत - नूर-ए-ख़ुदा...NOOR-E-KHUDA (MNIK)


सजीव - आप सभी को मालूम ही होगा कि 'माइ नेम इज़ ख़ान' करण जोहर की फ़िल्म है, जिसमें शाहरुख़ ख़ान के अलावा काजोल, शीतल मेनन, जिम्मी शेरगिल, ज़रीना वहाब हैं, और ढेर सारे अमरीकी कलाकार भी आपको इस फ़िल्म में नज़र आएँगे। करण ने ही फ़िल्म का निर्देशन भी किया है। कहानी लिखी है शिवानी बथिजा ने। संवाद शिवानी के साथ साथ नीरंजन अय्यंगर ने लिखे हैं।

सुजॊय - अच्छा, नीरंजन अय्यंगर ने इस फ़िल्म के गानें भी लिखे हैं ना?

सजीव - हाँ, वैसे तो नीरंजन एक संवाद लेखक ही हैं, जिन्होने 'जिस्म', 'कल हो ना हो', 'पाप', 'रोग', 'कभी अल्विदा ना कहना', 'आइ सी यू', 'क्या लव स्टोरी है', 'फ़ैशन', 'वेक अप सिड' और 'कुरबान' जैसी फ़िल्मों में संवाद लिख चुके हैं।

सुजॊय - और कुछ फ़िल्मों में गानें भी लिखे हैं। अभी हाल ही में फ़िल्म 'क़ुर्बान' का हिट गीत "शुक्रान अल्लाह" भी तो उन्ही का लिखा हुया है।

सजीव - हाँ, और 'माइ नेम...' में तो सभी गानें उन्ही के लिखे हुए हैं। लगता है इस फ़िल्म से वो फ़िल्मी गीतकारों की मुख्य धारा में शामिल हो जाएँगे। जिस तरह से जावेद अख़्तर एक संवाद लेखक से गीतकार बन गए थे, हो सकता है कि नीरंजन भी वही रास्ता इख़्तियार करे।

सुजॊय - और उस राह पर नीरंजन ने मज़बूत क़दम रख ही दिया है 'माइ नेम...' के गीतों के ज़रिए।

सजीव - बिल्कुल! तो अब कौन सा गीत सुनवाओगे?

सुजॊय - तीसरा गाना है शफ़ाक़त अमानत अली का गाया हुआ, "तेरे नैना"। शंकर अहसान लॊय ने जिनसे 'कभी अल्विदा ना कहना' में सुपरहिट गीत "मितवा" गवाया था। इस गीत में भी वही सुफ़ीयाना अंदाज़ इस तिक़ई ने बरक़रार रखा है, लेकिन "मितवा" जैसा असर शायद नहीं कर सका है यह गीत। लेकिन अपने आप में गीत बहुत अच्छा है।

सजीव - गीत का मुख्य आकर्षण यह है कि गीत के बीचों बीच इस गीत में क़व्वाली का रंग आ जाता है। नीरंजन अय्यंगर के बोल स्तरीय हैं।

गीत - तेरे नैना...TERE NAINA (MNIK)


सुजॊय - 'माइ नेम इज़ ख़ान' में कुल ६ ऒरिजिनल गीत हैं, जिनमें से ५ गानें हम यहाँ पर आपको सुनवा रहे हैं। तीन गानें आप सुन चुके हैं, इससे पहले कि हम चौथा गाना बजाएँ, सजीव, क्या आप इस फ़िल्म की थोड़ी सी भूमिका अपने पाठकों को बताना चाहेंगे?

सजीव - ज़रूर! वैसे यह फ़िल्म इतनी चर्चा में है कि लगभग सभी को फ़िल्म के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी तो ज़रूर होगी, फिर भी हम बता रहे हैं। रिज़्वान ख़ान (शाहरुख़ ख़ान) मुंबई के बोरीवली का रहनेवाला एक मुस्लिम लड़का जो पीड़ित है Asperger syndrome नामक बिमारी से, जिसके चलते लोगों के साथ बातचीत करने में, यानी कि सोशियलाइज़ करने में उसे दिक्कत आती है। युवा रिज़्वान अमेरीका के सैन फ़्रान्सिस्को में एक हिंदु तलाक़शुदा महीला मंदिरा (काजोल) शादी करता है। ९/११ के आतंकी हमलों के बाद रिज़्वान को अमरीकी पुलिस अपने गिरफ़्त में ले लेती है और उसके विकलांगता को वो संदेह की नज़र से देखते हैं। रिज़्वान के गिरफ़्तारी के बाद उसकी मुलाक़ात राधा (शीतल मेनन) से होती है जो एक थेरपिस्ट हैं, जो उसकी मदद करती है। उसके बाद रिज़्वान अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा से मिलने की यात्रा शुरु करता है उसके नाम पर लगे धब्बे को मिटाने के लिए। फ़िल्म में ओबामा का किरदार निभाया है क्रिस्टोफ़र बी. डंकन ने।

सुजॊय - सजीव, अभी कुछ महीने पहले शाहरुख़ ख़ान को अमरीका के एयरपोर्ट में कई घंटों तक सिर्फ़ इसलिए रोका गया था क्योंकि उनकी पदवी ख़ान है, और एक ऐसी हवा पश्चिम में चल रही है कि जिसके चलते हर मुसलमान को शक़ की निगाह से देखा जा रहा है। तो हो ना हो इस फ़िल्म की प्रेरणा शाहरुख़ और करण को उसी हादसे से मिली होगी!

सजीव - हो सकता है! अच्छा बातें तो बहुत हो गई, अब एक और गीत की बारी। अगला गीत भी सूफ़ी अंदाज़ का, लेकिन अब की बार एक धार्मिक रचना, एक प्रार्थना, "अल्लाह ही रहम"। राशिद अली और साथियों की आवाज़ों में इस गीत को सुनते हुए आप आध्यात्मिक जगत में पहुँच जाएँगे। इस गीत के बारे में ज़्यादा कहने की आवश्यक्ता नहीं है, बस सुनिए और महसूस कीजिए एक पाक़ शक्ति को!

गीत - अल्लाह ही रहम...ALLAH HI RAHAM (MNIK)


सुजॊय - सजीव, शंकर अहसान लॊय ने इस फ़िल्म में कम से कम एक गीत तो रॊक शैली में ज़रूर बनाया है। इन सूफ़ी गीतों के बाद अब एक रॊक अंदाज़ का गाना जिसे शंकर महादेवन और सूरज जगन ने गाया है। "रंग दे" एक ऐसा गीत है जिसमें संदेश है अमन का, ख़ुशी का, जोश का।

सजीव - हाँ, एक रिफ़्रेशिंग् गीत जिसे हम कह सकते हैं। सुनते हैं यह गीत, लेकिन सुजॊय एक बात बताओ, तुमने अभी थोड़ी देर पहले कहा था कि इस फ़िल्म में ६ गानें हैं, छ्ठा गीत कौन सा है?

सुजॊय - नहीं, दरअसल छठा गीत एक इन्स्ट्रुमेन्टल पीस है जिसे 'स्ट्रिंग्स' बैण्ड ने बजाया है, और जिसका शीर्षक रखा गया है 'ख़ान थीम'।

सजीव - अच्छा, तो चलो अब अमन और शांति का संदेश हम भी फैलाएँ और सुनें आज के 'ताज़ा सुर ताल' का अंतिम गीत। श्रोताओ और पाठकों से हमारा सविनय निवेदन है कि इस फ़िल्म के गीत संगीत की समीक्षा यहाँ टिप्पणी पर ज़रूर करें। कौन सा गीत आपको सब से ज़्यादा अच्छा लगा, किस चीज़ की कमी लगी, आप के नज़र में इस फ़िल्म के संगीत की क्या जगह है आप के दिल में। ज़रूर बताएँ।

गीत - रंग दे...RANG DE (MNIK)


"माई नेम इस खान" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
शंकर एहसान लॉय तिकड़ी से हमेशा ही अच्छे संगीत की उम्मीद की जाती है, और अमूमन ये निराश भी नहीं करते, और ये भी मानना पड़ेगा कि करण जौहर के पास संगीत की ऐसी श्रोतामई समझ है जो एक सफल फिल्मकार में होनी चाहिए. सजदा और तेरे नैना फिल्म के बहतरीन गीत हैं...नूरे खुदा फिल्म रीलिस होने के बाद बेहद मशहूर होने वाला है, और रंग दे जो फिल्म के थीम को सही तरह से सामने लाता है वो भी खूब गुनगुनाया जायेगा ऐसी उम्मीद है...कुल मिलाकर एल्बम एक अच्छी खरीदारी साबित होगी संगीत प्रेमियों के लिए...हाँ संगीत में "क्लासी" टच ज्यादा है, जिस कारण आम लोगों में ये गीत उतने कामियाब शायद नहीं होंगें पर ये कहना गलत नहीं होगा कि इस संगीतकार तिकड़ी इस साल एक बेहतर शुरूआत की है इस अल्बम से

अब पेश है आज के तीन सवाल-

TST ट्रिविया # १३ एक बेहद मशहूर गीत के अंतरे के बोल हैं "पल्कों पे झिलमिल तारे हैं, आना भरी बरसातों में"। इस गीत की 'माइ नेम इज़ ख़ान' के किसी गीत के साथ समानता बताइए।

TST ट्रिविया # १४ बतौर संगीतकार शंकर अहसान लॊय की पहली फ़िल्म जो थी वो फ़िल्म रिलीज़ नहीं हुई थी, लेकिन उसका संगीत ज़रूर रिलीज़ हुआ था। बताइए उस फ़िल्म का नाम।

TST ट्रिविया # १५ करण जोहर की किस फ़िल्म में अभिषेक बच्चन एक नर्स की भूमिका में नज़र आए थे?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछली पहेली में पहला सवाल अनुत्तरित रह गया था, रामू ने नाना पाटेकर से इंस्पेक्टर कुरैशी का किरदार करवाया था फिल्म भूत में, बहरहाल अन्य दो जवाब तो सीमा जी सही दिए हैं बधाई

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

अफसाना लिख रही हूँ....उमा देवी की आवाज़ में एक खनकता नगमा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 332/2010/32

मारी याद आएगी' शृंखला की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है। दोस्तों, यह शृंखला समर्पित है उन कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं के नाम जिन्होने फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर में कुछ बेहद सुरीले और मशहूर गीत गाए हैं, लेकिन उनका बहुत ज़्यादा नाम न हो सका। आज एक ऐसी गायिका का ज़िक्र जिन्होने दो दो पारियाँ खेली हैं इस फ़िल्म जगत में। जी हाँ, पार्श्व गायिका के रूप में अपना करीयर शुरु करने के बाद जब उन्हे लगा कि इस क्षेत्र में वो बहुत ज़्यादा कामयाब नहीं हो पाएँगी, तो उन्होने अपनी प्रतिभा को अभिनय के क्षेत्र में आज़माया। और एक ऐसी हास्य अभिनेत्री बनीं कि वो जिस किसी फ़िल्म में भी आतीं लोगों को हँसा हँसा कर लोट पोट कर देतीं। गायन के क्षेत्र में तो उनका बहुत ज़्यादा नाम नहीं हुआ लेकिन उनके हास्य अभिनय से सजे अनगिनत फ़िल्में और फ़िल्म जगत की बेहतरीन कॊमेडियन के रूप में उनका नाम आज भी सम्मान से लिया जाता है। आप समझ ही चुके होंगे कि आज हम बात कर रहे हैं गायिका उमा देवी, यानी कि हम सब की चहेती टुनटुन की। उत्तर प्रदेश के एक खत्री परिवार में जन्मे उमा देवी को अभिनय से ज़्यादा गायकी का शौक था। लेकिन एक रूढ़ीवादी पंजाबी परिवार में होने की वजह से उनको अपने परिवार से कोई बढ़ावा ना मिल सका। उन्होने अपनी मेहनत से हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी में शिक्षा प्रात की और महज़ १३ वर्ष की उम्र में ही बम्बई आ पहुँचीं। सन्‍ १९४७ में उमा देवी को अपना पहला एकल गीत गाने का मौका मिला जिसके लिए उन्हे २०० रुपय की मेहनताना मिली। उन्हे नौशाद आहब का संगीत इतना पसंद था कि उनके बार बार अनुरोध करने पर आख़िरकार नौशाद साहब ऒडिशन के लिए तैयार हो गए। और उनकी गायन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। और फ़िल्म 'दर्द' में पहली बार उमा देवी ने गानें गाए और पहला गीत ही सुपर डुपर हिट। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इसी गीत की बारी।

नौशाद साहब उन दिनों जिन जिन फ़िल्मों में संगीत दे रहे थे, उन सब में उन्होने उमा देवी को कम से कम एक गीत गाने का मौका ज़रूर दिया। पर यह सिलसिला बहुत ज़्यादा दिनों तक नहीं चली। धीरे धीरे उन्हे गानें मिलने बंद हो गए। इसका एक कारण था दूसरी गायिकाओं का और ज़्यादा प्रतिभाशाली होना जो ऊँची आवाज़ में गा सकते थे। उमा देवी को अपनी सीमाओं का पूरा अहसास था। दूसरे, उनका मोटापा भी उन्हे चुभ रही थी जो उनकी गायकी पर असर डाल रहा था। ऐसे उनके राखी भाई नौशाद साहब ने उन्हे फ़िल्मों में हास्य चरित्रों के रूप में काम करने का सुझाव दिया, और इस प्रकार आरंभ हुई उमा देवी की दूसरी पारी, जिन्हे हम टुनटुन के नाम से जानते हैं। उनकी यह दूसरी पारी सब को इतनी पसंद आई कि उमा देवी सब के दिल में आज तक टुनटुन के नाम से ही बसी हुईं हैं और हमेशा रहेंगी। दोस्तों, आज उमा जी को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए हमने उनका गाया सब से हिट गीत चुना है, १९४७ की फ़िल्म 'दर्द' का - "अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का, आँखो में रंग भर के तेरे इंतज़ार का"। दोस्तों, फ़िल्म 'दर्द' का यह गीत एक और दृष्टि से भी बेहद ख़ास है कि इस गेत से ही शुरु हुआ था गीतकार शक़ील बदायूनी और संगीतकार नौशाद का साथ, जिस जोड़ी ने इतिहास कायम किया सदाबहार नगमों की दुनिया में। शक़ील बदायूनी पर केन्द्रित विविध भारती के एक कार्यक्रम में यूनुस ख़ास कहते हैं कि "दिलचस्प बात यह है कि शायरी की दुनिया से आने के बावजूद शक़ील ने फ़िल्मी गीतों के व्याकरण को फ़ौरन समझ लिया था। उनकी पहली ही फ़िल्म के गाने एक तरफ़ सरल और सीधे सादे हैं तो दूसरी तरफ़ उनमें शायरी की ऊँचाई भी है। इसी गाने में शक़ील साहब ने लिखा है कि "आजा के अब तो आँख में आँसू भी आ गए, सागर छलक उठा है मेरे सब्र-ओ-क़रार का, अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का"। किसी के इंतज़ार को जितने शिद्दत भरे अलफ़ाज़ शक़ील ने दिए, शायद किसी और गीतकार ने नहीं दिए।" तो आइए दोस्तों, उमा देवी की शिद्दत भरी आवाज़ में सुनते हैं फ़िल्म 'दर्द' का यह नग़मा।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

लोक लाज तज दिया मैंने,
मन को तुझ संग बाँध के,
जागते हैं बस याद में तेरी,
रात रात हम संग चाँद के

अतिरिक्त सूत्र- एक मशहूर संगीतकार की पत्नी भी हैं ये कम्चार्चित सुरीली गायिका

पिछली पहेली का परिणाम-
अवध जी बधाई एकदम सही है जवाब
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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