बुधवार, 20 जनवरी 2010

एक धुंध से आना है एक धुंध में जाना है, गहरी सच्चाईयों की सहज अभिव्यक्ति यानी आवाज़े महेंदर कपूर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 320/2010/20

र आज हम आ पहुँचे हैं 'स्वरांजली' की अंतिम कड़ी में। गत ९ जनवरी को पार्श्वगायक महेन्द्र कपूर साहब की जयंती थी। आइए आज 'स्वरांजली' की अंतिम कड़ी हम उन्ही को समर्पित करते हैं। महेन्द्र कपूर हमसे अभी हाल ही में २७ सितंबर २००८ को जुदा हुए हैं। ९ जनवरी १९३४ को जन्मे महेन्द्र कपूर साहब के गाए कुछ गानें आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन चुके हैं। बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों में अक्सर हमने उनकी आवाज़ पाई है। साहिर लुधियानवी के बोल, रवि का संगीत और महेन्द्र कपूर की आवाज़ चोपड़ा कैम्प के कई फ़िल्मों मे साथ साथ गूंजी। इस तिकड़ी के हमने फ़िल्म 'गुमराह' के दो गानें सुनवाए हैं, "आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया" और "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों"। आज भी हम एक ऐसा ही गीत लेकर आए हैं, लेकिन यह फ़िल्म बी. आर. चोपड़ा की दूसरी फ़िल्मों से बिल्कुल अलग हट के है। यह है १९७३ की फ़िल्म 'धुंध' का शीर्षक गीत, "संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है, एक धुंध से आना है एक धुंध में जाना है"। साहिर लुधियानवी के क्रांतिकारी गीतों ने बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों को एक अलग ही दर्जे तक पहुँचाया है। और रवि के संगीत में और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में ये गानें बहुत खुलकर सामने आए हैं और कालजयी बन गए हैं। आज का प्रस्तुत गीत एक दार्शनिक गीत है जिसमें मनुष्य जीवन की क्षणभंगुरता के बारे में कहा गया है। एक सस्पेन्स थ्रिलर होने की वजह से फ़िल्म का नाम 'धुंध' रखा गया और साहिर साहब ने सस्पेन्स को बरक़रार रखते हुए कितनी ख़ूबी से जीवन दर्शन को सामने लाया है इस गीत के माध्यम से। मुझे नहीं लगता कि धुंध पर इससे बेहतर और इससे सरल कोई गीत लिखा जा सकता है!

'धुंध' १९७३ की फ़िल्म थी। बी. आर. चोपड़ा निर्मित और निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य कलाकार थे संजय ख़ान, ज़ीनत अमान, डैनी और नवीन निश्चल। यह फ़िल्म अगाथा क्रिस्टी के नाटक 'ऐन अन-एक्स्पेक्टेड गेस्ट' पर आधारित थी, जिसका हिंदी फिल्मीकरण किया लेखक अख्तर-उल-रहमान, अख़्तर मिर्ज़ा और सी. जे. पावरी ने। इस रोंगटे खड़े कर देने वाली मर्डर मिस्ट्री का प्लॊट कुछ इस तरह से था कि एक रात चन्द्रशेखर (नवीन निश्चल) की गाड़ी गहरे धुंद में ख़राब हो जाती है। कार की हेडलाइट से उन्हे सामने एक मकान नज़र आता है। दरवाज़े पर खटखटाने जाते हैं तो दरवाज़ा खुला हुआ ही पाते हैं। वो अंदर जाते हैं और देखते हैं कि कुर्सी पर एक आदमी बैठा हुआ है। उनसे वो एक टेलीफ़ोन करने की इजाज़त माँगते हैं। उस आदमी से कोई जवाब ना पाकर जैसे ही उन्हे हिलाते हैं तो वो आदमी (डैनी) नीचे गिर जाता है। दरअसल वो उस आदमी की लाश थी। चन्द्रशेखर सामने रखे टेलीफ़ोन से जैसे ही पुलिस को ख़बर करने के लिए आगे बढ़ता है तो अंधेरे से रानी रणजीत सिंह (ज़ीनत अमान, डैनी की पत्नी) हाथ में रिवोल्वर लिए उसके सामने आ जाती है। वो बताती है कि उसी ने अपने उस अत्याचारी पति का ख़ून किया है। चन्द्रशेखर रानी की तरफ़ आकर्षित भी होता है, उस पर दया भी आती है। दोनों मिल कर लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचता है। क्या होता है आगे चलकर? आख़िर क्या है इस ख़ून का राज़? कौन है ख़ूनी? यही है इस फ़िल्म की कहानी। बड़ी ज़बरदस्त फ़िल्म है, अगर आप ने अब तक नहीं देख रखी है, तो ज़रूर देखिएगा। मेरे अनुसार हिंदी सिनेमा के सस्पेन्स फ़िल्मों में यह एक अव्वल दर्जे का सस्पेन्स थ्रिलर है। ख़ैर, अब वापस मुड़ते हैं आज के गीत पर। 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में ममता सिंह ने जब महेन्द्र कपूर से पूछा था कि इस गीत को गाने के लिए क्या उन्हे कोई विशेष तैयारी करनी पड़ी थी, तो उनका जवाब था - "तब तक मैं बहुत गानें गा चुका था, इसलिए ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। इस गाने का मूड भी वही था जो "नीले गगन के तले" का था।" चलिए दोस्तों, महेन्द्र कपूर साहब की याद में सुनते हैं यह गीत और 'स्वरांजली' शृंखला को समाप्त करते हुए हम भी यही दोहराते हैं कि "संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है, एक धुंध से आना है, एक धुंध में जाना है"। धन्यवाद !



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

मेरी बेकरारियों का सबब मत पूछ,
आजमा मेरे सब्र को तू इस तरह,
रोये हैं मैंने खून के आंसू बरसों,
तेरे साथ को हूँ मैं तरसा इस तरह...

अतिरिक्त सूत्र - महिला संगीतकारों में इनका नाम अग्रिणी है

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह वाह अवध जी, आपको विजेता के रूप में पाकर आज बड़ी खुशी हो रही है, २ अंक मुबारक हो आपको...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

गजरा बना के ले आ... एक मखमली नज़्म के बहाने अफ़शां और हबीब की जुगलबंदी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६७

भी-कभी यूँ होता है कि आप जिस चीज से बचना चाहो, जिस चीज से कन्नी काटना चाहो, वही चीज आपकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा हो जाती है, आपकी पहचान बन जाती है। यह ज्यादातर इश्क़ में होता है और वो भी हसीनाओं के साथ। हसीनाएँ पहले-पहल तो आपको नज़र-अंदाज करती हैं, लेकिन धीरे-धीरे आप उनकी नज़र में बस जाते हैं। क्या आपने भी कभी यह महसूस किया है? किया हीं होगा... इश्क़ का यह नियम है। वैसे यहाँ पर मैं जिस कारण से इस मुद्दे को उठा रहा हूँ, उसकी जड़ में इश्क़ या हसीनाएँ नहीं हैं, बल्कि "आलस्य" है। अब आप सोचेंगे कि महफ़िल-ए-गज़ल में आलस्य की बातें.. तो जी हाँ, पिछली मर्तबा मैंने आलेख की लंबाई कम होने की वज़ह समय की कमी को बताया था, जो कि तब के लिए सच था, लेकिन वही ४५ मिनट वाला किस्सा आज फिर से दुहराया जा रहा है... और इस बार सबब कुछ और है। लेखक ने सामग्रियाँ समय पर जुटा लीं थीं, लेकिन उसी समय उसे(मुझे) आलस्य ने आ घेरा.. महसूस हुआ कि आलेख तो ४५ मिनट में भी लिखा जा सकता है और अच्छा लिखा जा सकता है, (जैसा कि सजीव जी की टिप्पणी से मालूम पड़ा) तो क्यों न सुबह उठकर हीं गज़ल की महफ़िल सजाई जाए....रात की नींद बरबाद करने का क्या फायदा। और फिर इस तरह आलस्य ने भागता फिरने वाला एक इंसान आलस्य की चपेट में आ गया। क्या कीजिएगा... ठंढ के मौसम में आलस्य का कोहरा कुछ ज्यादा हीं घना हो जाता है। है ना? लेकिन अगली मर्तबा से ऐसा न होगा... इस वादे के साथ हम आज की महफ़िल की शुरूआत करते हैं। इस महफ़िल में हम जो नज़्म लेकर हाज़िर हुए हैं, उसमें गाँव की सोंधी-सोंधी खुशबू छुपी है, शादी-ब्याह की अनगिनत यादें दर्ज हैं और सबसे बढकर एक नवविवाहिता की कोमल भावनाएँ अंकुरित हो रखी हैं। प्रेमिका/नवविवाहिता मालिन से यह गुहार कर रही है कि वह गजरा बना के ले आए, क्योंकि उसका प्रेमी/साजन उसे देखने आ रहा है। वह ऐसा गजरा पहनना चाहती है, जो उसके साजन की सुंदरता को टक्कर दे सके.... गजरे में वह ऐसी कलियाँ देखना चाहती हैं जिसका सारा चमन हीं दीवाना हो.. उन कलियों में उसके साजन के लबों की लाली हो..... वैसे इन पंक्तियों तक आते-आते इस बात का भी आभास होने लगता है कि कहीं एक प्रेमी तो नहीं मालिन से फरियाद कर रहा है। हो सकता है कि उसके मिलन की पहली रात हो और वह अपनी नूर-ए-जिगर, अपनी शरीक-ए-हयात यानि कि अपनी पत्नी के बालों में गजरा सजाना चाहता हो। यह नज़्म प्रेमिका के बजाय प्रेमी पर ज्यादा सटीक बैठती है क्योंकि कोई भी शायर किसी पुरूष के लबों की प्रशंसा नहीं करता.. आखिरकार एक पुरूष (शायर) दूसरे पुरूष की सुन्दरता पर क्योंकर टिप्पणी करे। हाँ किसी शायरा से इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि वह पुरूष के लबों की, पुरूष की सूरत की प्रशंसा में कुछ कसीदे पढ दे.. लेकिन ऐसा भी कम हीं देखने को मिलता है। आपने कहीं ऐसा पढा है कि "मेरे महबूब की सूरत चाँद से मिलती-जुलती है"... नहीं ना? अरे भाई, चाँद से नहीं तो तारा से हीं मिलती-जुलती कहने में कोई हर्ज़ है क्या....लेकिन कोई नहीं कहता। हाय रे पुरूष की सुन्दरता भी.. किसी काम की नहीं!!

हमने यह तो मान लिया कि किसी पुरूष की प्रशंसा कोई शायरा हीं कर सकती है.. नहीं तो कोई नहीं तो इस लिहाज से आज की नज़्म को किसी शायरा ने हीं लिखा होना चाहिए। और यहीं पर आकर हमारी गाड़ी रूक जाती है। अंतर्जाल पर हर जगह नगमानिगार के तौर पर "अफ़शां राणा" जी का नाम दर्ज है.. सुनने पर तो यह नाम किसी महिला का हीं लगता है लेकिन चूँकि इनका परिचय कहीं भी मौजूद नहीं, इसलिए ठीक-ठीक कहा नहीं जा सकता। फिर भी बस यह पता करने के लिए कि इनके लिए "श्रीमान" लिखा जाए या "श्रीमति" हमने घंटों अपना समय गूगल के नाम कर दिया। अंततोगत्वा हमें मालूम चला कि अस्सी के दशक में एक संगीतकार खासे लोकप्रिय हुआ करते थे जिनका नाम था "सोहैल राणा"। सोहैल राणा ने अफ़शां राणा के साथ कई सारे कार्यक्रम दिए जो कि इनकी बीवी थीं(हैं)। अगर यहाँ उसी अफ़शां राणा की बात की जा रही है तो हम सही रास्ते पर हैं..यानि कि अफ़शां राणा किसी शायर का नहीं बल्कि एक शायरा का नाम है। हमें इस खोज पर यकीन करने के अलावा कोई और चारा नहीं दिख रहा..फिर भी अगर आपको अफ़शां के बारे में कोई और जानकारी हासिल हो तो हमें जरूर बताईयेगा.. बस नाम जान लेना हीं काफ़ी नहीं है.... सबसे अजीब बात तो यह है कि अंतर्जाल पर इनके नाम के सामने बस एक हीं नज़्म दर्ज है और वह है आज की नज़्म "गजरा बना के ले आ"। आखिर इन्होंने कुछ और भी तो लिखा होगा। अब चूँकि इनकी लिखी कोई और रचना हमें मिली नहीं, इसलिए इस बार कई महिनों के बाद अपना हीं एक शेर कहने पर मैं आमादा हो रहा हूँ। पसंद न आए तब भी दाद जरूर दीजिएगा:
मैं तुम्हारे वास्ते कुछ और हीं हो जाऊँगा,
तू एक दफ़ा निहार ले मैं आदमी हो जाऊँगा|


शायरा के बाद अब वक्त है आज की नज़्म के गायक से रूबरू होने का। आज इनके संक्षिप्त परिचय से हीं काम चला लेते हैं। कुछ हीं हफ़्तों में हम ग़ालिब की एक ग़ज़ल लेकर हाज़िर होने वाले हैं जिनमें आवाज़ "हबीब वली मोहम्मद" साहब की हीं हैं। तब इनके बारे में विस्तार से बातें करेंगे। (सौजन्य: सुखनसाज़)हबीब वली मोहम्मद (जन्म १९२१) विभाजन पूर्व के भारतीय उपमहाद्वीप के प्रमुख लोकप्रिय ग़ज़ल गायकों में थे. कालेज के दिनों में उनके दोस्त उन्हें संगीत सम्राट तानसेन कहा करते थे. एम बी ए की डिग्री लेने के बाद वली मोहम्मद १९४७ में बम्बई जाकर व्यापार करने लगे. दस सालों बाद वे पाकिस्तान चले गए. वहीं उन्होंने बेहद सफल कारोबारी का दर्ज़ा हासिल किया. अब वे कैलिफ़ोर्निया में अपने परिवार के साथ रिटायर्ड ज़िन्दगी बिताते हैं. बहादुरशाह ज़फ़र की 'लगता नहीं है दिल मेरा' उनकी सबसे विख्यात गज़ल है. भारत में फ़रीदा ख़ानम द्वारा मशहूर की गई 'आज जाने की ज़िद न करो भी उन्होंने अपने अंदाज़ में गाई है. उस वक़्त के तमाम गायकों की तरह उनकी गायकी पर भी कुन्दनलाल सहगल की शैली का प्रभाव पड़ा. उनका एक तरह का सूफ़ियाना लहज़ा 'बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब, तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं' की लगातार याद दिलाता चलता है. हबीब साहब ज्यादातर ज़फ़र की हीं गज़लें गाते हैं। मेरे ख्याल से आज की नज़्म बड़ी हीं अनोखी है क्योंकि एक तो हबीब साहब की ऐसी कोई दूसरी नज़्म हमें सुनने को नहीं मिली और दूसरा यह कि ऐसी नज़्में आजकल बनती कहाँ है..। आप खुद हीं इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते होंगे.. । तो पेश है आज की नज़्म:

गजरा बना के ले आ मलनिया,
वो आए हैं घर में हमारे
देर न अब तू लगा।

सारा चमन हो जिनका दीवाना
ऐसी कलियाँ चुने के ला,
लाली हो जिन में उनके लबों की
उनको पिरो के ले आ,
गजरा बना के ले आ...मलनिया..

जो भी देखे उनकी ______
झुकी झुकी अंखियों से प्यार करे,
चंदा जैसा रूप है उनका
आंखों में रस है भरा,
गजरा बना के ले आ...मलनिया..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "पयाम" और शेर कुछ यूं था -

कोई तो आए नई रूतों का पयाम लेकर,
अंधेरी रातों में चाँद बनना कोई तो सीखे।

इस शब्द की सबसे पहले सही पहचान की सीमा जी ने। आपने ये सारे शेर पेश किए जिसमें "पयाम" शब्द का इस्तेमाल हुआ था:

पयाम आये हैं उस यार-ए-बेवफ़ाके मुझे
जिसे क़रार न आया कहीं भुला के मुझे (अहमद फ़राज़)

सितारों के पयाम आये बहारों के सलाम आये
हज़ारों नामा आये शौक़ मेरे दिल के नाम आये (अली सरदार जाफ़री)

उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
आपको देख के वह अहद-ए-वफ़ा याद आया (साहिर लुधियानवी)

सजीव जी और पी सिंह जी(माफ़ कीजिएगा, आपका पूरा नाम हमें मिल न सका), ग़ज़ल और ग़ज़ल पेश करने की अदा को पसंद करने के लिए आप दोनों का तहे-दिल से शुक्रिया। कभी कोई शेर भी महफ़िल में पेश करें!!!

शरद जी, बहुत खूब!! इस बार आप खुद के लिखे शेरों के साथ भले हीं नज़र नहीं आएँ, लेकिन हमें लता हया जी की गज़ल से मुखातिब करा गए... इस मेहरबानी के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। यह रहा वह शेर:

सुबह का पहला पयाम उर्दू
ढ्लती हुई सी जैसे शाम उर्दू (लता हया)

नीलम जी, यह क्या कह रही हैं आप? अगर दिग्गजों की हम सोचने लगें तब तो हमारी भी बिसात खतरे में आ जाएगी। अभी हममें भी ऐसी क्षमता नहीं आई कि दिग्गजों के सामने खड़े हो सकें.. लेकिन यही तो ज़िंदगी है.. हमें इन सब की परवाह नहीं करनी चाहिए.. और वैसे भी आप अपने आपको किसी दिग्गज से कम कैसे आँक सकती हैं..ज़रा हमारी नज़रों से देखें :)

मंजु जी और रजनीश जी... आप दोनों ने महफ़िल में स्वरचित शेरों का सूखा नहीं होने दिया.. यह बड़ी हीं खुशी की बात है। ये रहे आप दोनों के शेर. क्रम से:

कभी हवाओं से ,कभी मेघदुतों से वियोग का पयाम भेजा है ,
बेखबर -रूखे महबूब !रुसवाई की भनक भी हुई क्या ?

पयाम ज़िन्दगी ने दिया हज़ार बार संभल जाने का...
पर एक दिल था हमारा कि हर बात पर मचल गया...

अवध जी, "ज़फ़र" साहब को आपने महफ़िल में पुन: जिंदा कर दिया... क्या बात है!!

पयाम ले के सबा वां अगर पहुँच जाती
तो मिस्ले-बू-ए-गुल उड़ कर खबर पहुँच जाती.

आगे की महफ़िल को अकेले संभाला शामिख जी ने। चलिए हर बार की तरह आप देर से आए, लेकिन यह कह सकते हैं कि इस बार आप दुरूस्त आए (पिछली बार की तुलना में)। यह रही आपकी पेशकश:

ये पयाम दे गई है मुझे बादे- सुबहशाही
कि ख़ुदी के आरिफ़ों का है मक़ाम पादशाही (इक़बाल)

एक रंगीन झिझक एक सादा पयाम
कैसे भूलूँ किसी का वो पहला सलाम (कैफ़ी आज़मी)

हमारे ख़त के तो पुर्जे किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था (दाग दहलवी)

सबा यह उन से हमारा पयाम कह देना
गए हो जब से यहां सुबह-ओ-शाम ही न हुई (जिगर मुरादाबादी)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

तेरी राहों में खड़े हैं दिल थाम के...गीतकार कमर जलालाबादी को याद कीजिये स्वराजन्ली लता के स्वरों की देकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 319/2010/19

जनवरी २००३ को हम से बिछड़ गए थे फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार क़मर जलालाबादी और जैसे हर तरफ़ से उन्ही का लिखा हुआ गीत गूंज उठा कि "फिर तुम्हारी याद आई ऐ सनम, हम ना भूलेंगे तुम्हे अल्लाह क़सम"। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में क़मर साहब को हमारी 'स्वरांजली'। क़मर जलालाबादी की ख़ूबी सिर्फ़ गीत लेखन तक ही सीमीत नहीं रही। वो एक आदरणीय शायर और इंसान थे। फ़िल्म जगत की चकाचौंध में रह कर भी वो एक सच्चे कर्मयोगी का जीवन जीते रहे। १९५० के दशक में कामयाबी की शिखर पर पहुँचने के बाद भी उनकी सादगी पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उनकी संजीदगी उनके गीतों से छलक पड़ी। दोस्तो, क़मर साहब के साथ हुस्नलाल भगतराम और ओ. पी. नय्यर की अच्छी ट्युनिंग् जमी थी। बाद मे संगीतकार जोड़ी कल्याणजी आनंदजी के साथ तो एक लम्बी पारी उन्होने खेली और कई महत्वपूर्ण गानें इस जोड़ी के नाम किए। सन् १९६० में जिस फ़िल्म से क़मर साहब और कल्याणजी-आनंदजी की तिकड़ी बनी थी, वह फ़िल्म थी 'छलिया'। इस फ़िल्म के सभी गानें सुपर डुपर हिट हुए। उस समय शंकर जयकिशन और शैलेन्द्र-हसरत राज कपूर की फ़िल्मों का संगीत पक्ष संभालते थे। लेकिन इस फ़िल्म में इस नई तिकड़ी को मौका देना एक नया प्रयोग था जिसे इस तिकड़ी ने बख़ूबी निभाया। 'छलिया' के सफलता के बाद तो इस तिकड़ी ने बहुत सारे फ़िल्मों में एक साथ काम किया, जिनमें से महत्वपूर्ण नाम हैं पासपोर्ट, जोहर महमूद इन गोवा, हिमालय की गोद में, दिल ने पुकारा, उपकार, राज़, सुहाग रात, हसीना मान जाएगी, आंसू और मुस्कान, होली आई रे, घर घर की कहानी, प्रिया, सच्चा झूठा, पारस, जोहर महमूद इन हॊंग्‍कॊंग्, और एक हसीना दो दीवाने। लेकिन आज हमने जो गीत चुना है वह है फ़िल्म 'छलिया' से। लता जी की आवाज़ में एक बड़ा ही प्यारा सा गाना है "तेरी राहों में खड़े हैं दिल थाम के हाये, हम हैं दीवाने तेरे नाम के"। आमतौर पर इस तरह के गानें नायक गाता है नायिका के लिए, लेकिन इस गाने में नायिका ही नायक का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में लगी हुई हैं।

'छलिया' फ़िल्म का निर्माण किया था सुभाष देसाई ने और निर्देशित किया मनमोहन देसाई साहब ने। राज कपूर और नूतन अभिनीत इस फ़िल्म का गीत संगीत पक्ष काफ़ी मज़बूत था। गीतों को उस ज़माने के राज कपूर - शंकर जयकिशन वाले अंदाज़ में बनाया गया था। इस फ़िल्म में लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल कल्याणजी-आनदजी के सहायक थे। फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में उस साल इस फ़िल्म के लिए राज कपूर और नूतन का नाम मनोनीत हुआ था सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और अभिनेत्री के लिए, लेकिन ये पुरस्कार उन्हे नहीं मिले। अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीतमाला के वार्षिक कार्यक्रम में कुल १५ गीतों में से इसी फ़िल्म के दो गीतों को शामिल किया गया, १३-वीं पायदान पर "डम डम डिगा डिगा" और ९-वीं पायदान पर "छलिया मेरा नाम"। आज जो गीत हम सुनने जा रहे हैं, वह भी उत्कृष्टता में किसी से कम नहीं है। लता जी का शुरुआती आलाप ही हमें एक अलग ही दुनिया में ले जाता है। ऒर्केस्ट्रेशन भी अच्छा है, दूसरे अंतरे के इंटर्ल्युड में सैक्सोफ़ोन का अच्छा इस्तमाल हुआ है। तो दोस्तों, गीत सुनिए, अरे हाँ, मैं तो भूल ही गया, आख़िर क़मर साहब ने भी तो इस गीत का ज़िक्र किया था १९७९ में उनके द्वारा प्रस्तुत 'जयमाला' कार्यक्रम में! "डिरेक्टर मनमोहन देसाई की पहली फ़िल्म 'छलिया' अपने भाई सुभाष देसाई के लिए डिरेक्ट कर रहे थे। सुभाष देसाई ने संगीतकार के लिए कल्याणजी-आनंदजी का नाम चुना। सुभाष देसाई का नाम सुनते ही कल्याणजी भाग खड़े हुए। सुभाष देसाई ने उनका पीछा नहीं छोड़ा, उन्हे पकड़ कर उन्हे फ़िल्म का संगीतकार बनाकर ही दम लिया। लीजिए फ़िल्म 'छलिया' का गीत सुनिए मेरा लिखा हुआ। हाल ही में शायर क़तिल शिफ़ाई ने इस गीत की तारीफ़ की, मैं उनके इस क़द्रदानी का शुक्रगुज़ार हूँ।"



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

पलक झपकने को जी न चाहे,
काश ये पल गुजरे न,
ठहरी है सुबह उफक के मोड़ पर,
सुहाना ये नज़ारा बिखरे न....

अतिरिक्त सूत्र - ९ जनवरी को ही इस मशहूर पार्श्वगायक की जयंती भी है

पिछली पहेली का परिणाम-
रोहित जी, बहुत बधाई बहुत दिनों बाद आपकी आमद हुई....२ अंक संभालिए....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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