सोमवार, 22 जून 2009

बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी...ओल्ड इस गोल्ड के सभी श्रोताओं को समर्पित ये गीत.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 119

हाल ही में हमने आपको एस. एच. बिहारी के बारे में विस्तार से बताया था कि किस तरह से उन्हे एस. मुखर्जी ने १९५४ की फ़िल्म 'शर्त' में पहला बड़ा ब्रेक दिया था। आगे चलकर उनकी कई और फ़िल्मों में बिहारी साहब ने गीत लिखे, और सिर्फ़ लिखे ही नहीं, उन्हे कामयाबी की बुलंदी तक भी पहुँचाया। ऐसी ही एक फ़िल्म थी 'एक मुसाफ़िर एक हसीना'. जॉय मुखर्जी और साधना अभिनीत इस फ़िल्म में ओ. पी. नय्यर का संगीत था। आशा भोंसले और रफ़ी साहब के गाये इस फ़िल्म के तमाम युगल गीतों में तीन गीत जो सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हुए, वो थे "मैं प्यार का राही हूँ", "आप युँही अगर हम से मिलती रहीं, देखिये एक दिन प्यार हो जायेगा", और तीसरा गीत था "बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी, मेरी ज़िंदगी में हुज़ूर आप आये". यूँ तो एस. एच. बिहारी ने ही इस फ़िल्म के अधिकतर गानें लिखे, लेकिन "आप युँही अगर" वाला गीत राजा मेहंदी अली ख़ान ने लिखा था। आज इस महफ़िल में सुनिये तीसरा युगल गीत। फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह थी कि शादी की रात साधना के घर आतंकवादियों का हमला होता है, जिससे दुल्हन बनी साधना को शादी से पहले ही अपनी रक्षा के लिए घर से भाग जाना पड़ता है। भटकते हुए उसे मिल जाता है एक नौजवान लड़का (जॉय मुखर्जी) जो पीड़ित है ऐम्नेसिया, यानी कि याद्दाश्त जाने की बीमारी से। साधना उसे कई विपत्तियों से बचाती है जिससे कि वो उस पर पूरी तरह से निर्भर हो जाता है, और तभी फ़िल्म में यह गीत आता है कि "बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी, मेरी ज़िंदगी में हुज़ूर आप आये"। दोनों में प्यार होता है और इस तरह से फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ती है। लेकिन क्या होता है जब नायक की याद्दाश्त वापस आ जाती है तो? यह तो आप ख़ुद ही देख लीजिएगा इस फ़िल्म में।

प्रस्तुत गीत का जो भाव है इस भाव पर समय समय पर कई गीत हमारे गीतकारों ने लिखे हैं। फ़िल्म 'हमसाया' में ही नय्यर साहब ने ऐसा ही एक गीत काम्पोज़ किया था शेवन रिज़्वी का लिखा हुआ और आशा-रफ़ी का ही गाया हुआ, "तेरा शुक्रिया के तूने गले फिर लगा लिया है, मैने दिल के टुकड़े चुन कर नया दिल बना लिया है"। इसके बाद भी कई फ़िल्मों में शुक्रिया और मेहरबानी पर गानें शामिल हुए हैं, लेकिन इनमें से जो सबसे ज़्यादा 'हिट' हुआ था, वह था शाहरूख़ ख़ान की फ़िल्म 'डुप्लीकेट' का गीत "मेरे महबूब मेरे सनम, शुक्रिया मेहरबानी करम"। दोस्तों, हम भी आज के इस प्रस्तुत गीत के बहाने आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करते हैं कि आप इतने दिनों से इस शृंखला को पसंद कर रहे हैं, इसमें सक्रीय रूप से भाग ले रहे हैं, और दिन-ब-दिन इसे आगे बढ़ाते जा रहे हैं। अगर इस शृंखला को और भी ज़्यादा बेहतर और लोकप्रिय बनाने के लिए आपके दिल में कोई विचार या सुझाव हो तो बेझिझक हमसे कहिएगा। फिलहाल सुनिये आज का यह 'गोल्डन' गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. एक बहतरीन दर्दीला नगमा.
२. इसी फिल्म के एक अन्य गीत में "बरेली" का जिक्र हुआ है.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"शाम".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी ने १८ अंक प्राप्त कर बढ़त बरकरार रखी है, बधाई हो जनाब, पर स्वप्न जी आप भी बिलकुल पीछे नहीं है. जम कर मुकाबला कीजिये. दिशा जी आप शायद पहली बार आई हैं, जवाब तो सही है पर ज़रा इन धुरंधरों से अधिक फुर्ती दिखाईये तो बात बने. राज जी और निर्मला जी आपके लिए बस यही कहेंगें -"रहना तू है जैसा तू...". शरद जी आपने सही कहा, इन गीतों का नशा ही ऐसा है, हम तो यही चाहेंगें कि ये खुमार कभी न उतरे.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

आप निराला की कौन सी कविता संगीतबद्ध करवाना चाहेंगे

श्रोताओं के प्यार, प्रोत्साहन और समर्थन की बदौलत हम मई माह से प्रत्येक माह महान कवियों की कविताओं को संगीतबद्ध/सुरबद्ध करने की गीतकास्ट प्रतियोगिता आयोजित कर रहे हैं। इस आयोजन की शुरूआती कड़ियों में हम छायावादी युग के स्तम्भ कवियों की कविताओं को संगीतबद्ध/सुरबद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले महीने हमने जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' को संगीतबद्ध करवाया, जिसे आप लोगों ने बहुत सराहा भी।

इस माह की गीतकास्ट प्रतियोगिता में हम सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' को संगीतबद्ध/सुरबद्ध करवाने की कोशिश कर रहे हैं। 30 जून 2009 तक प्रविष्टियाँ आमंत्रित की गई हैं।

लेकिन आज हम आपके सुझाव और आपकी फरमाइश लेने के लिए यह पोस्ट लिख रहे हैं। हम जुलाई महीने की गीतकास्ट प्रतियोगिता में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता संगीतबद्ध करवाना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि कृपया आप बतायें कि हम कौन सी कविता को कम्पोज करवायें। नीचे दिये गये फॉर्म में निराला की अपनी पसंद की अधिकतम चार कविताएँ बतायें (केवल शीर्षक या पहली पंक्ति) और सुझाव फील्ड में इन कविताओं के संगीतबद्ध करवाने के कारण भी। कृपया अपना नाम और ईमेल पता बिलकुल ठीक-ठीक भरें, क्योंकि यदि हम आप द्वारा सुझाई गई कविता चुनते हैं तो आपसे कविता के पूरे शब्द और बीच-बीच में इससे संबंधित सुझाव लेते रहेंगे। कृपया 30 जून 2009 तक अपनी पसंद ज़रूर जमा करा दें।

रविवार, 21 जून 2009

चाँद आहें भरेगा, फूल दिल थाम लेंगें, हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगें

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 118

नायिका की सुंदरता का बयाँ करने वाले गीतों की कोई कमी नहीं है हमारे फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने में। हर दौर मे, हर युग मे, हमारे गीतकारों ने ऐसे ऐसे ख़ूबसूरत से ख़ूबसूरत गीत हमें दिये हैं जिन्होने नायिका की ख़ूबसूरती को चार चाँद लगा दिये हैं। फ़िल्म सगीत के समुंदर में डुबकी लगाकर आज हम ऐसा ही मोती बाहर निकाल लाये हैं इस महफ़िल को रोशन करने के लिए। १९६३ की फ़िल्म 'फूल बने अंगारे' में मुकेश ने एक ऐसा ही गीत गाया था जिसमें फ़िल्म की नायिका माला सिंहा की ख़ूबसूरती का ज़िक्र हो रहा है। गीतकार आनंद बक्शी के शब्दों ने चाँद को आहें भरने पर मजबूर कर दिया था इस गीत में दोस्तों। जी हाँ, "चाँद आहें भरेगा, फूल दिल थाम लेंगे, हुस्न की बात चली तो, सब तेरा नाम लेंगे"। इससे बेहतर और कैसे करे कोई अपनी महबूबा की सुंदरता की तारीफ़! आनंद बख्शी साहब को अगर फ़िल्मी गीतों का 'ऑल राउंडर' कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ती नहीं होगी। ज़िंदगी की ज़ुबान का इस्तेमाल करते हुए उन्होने अपने गीतों को सरल, सुंदर और कर्णप्रिय बनाया। उनके गीतों की अपार सफलता और लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है। जहाँ एक तरफ़ बोलचाल की भाषा का बेहिसाब इस्तेमाल बख्शी साहब ने किया है, वहीं कई कई बार उन्होने प्रस्तुत गीत की तरह अपने शायराना अंदाज़ का प्रमाण भी दिया है। इसी गीत के एक अंतरे को ले लीजिये जिसमें वो लिखते हैं कि "आँख नाज़ुक सी कलियाँ, बात मिसरी की डलियाँ, होंठ गंगा के साहिल, ज़ुल्फ़ें जन्नत की गलियाँ, तेरी ख़ातिर फ़रिश्ते सर पे इल्ज़ाम लेंगे, हुस्न की बात चली तो, सब तेरा नाम लेंगे।"

जब दर्द भरे गीतों की बात आती है तो मुकेश के आवाज़ की कोई सानी दूर दूर तक दिखाई नहीं देती है। लेकिन अगर ग़ौर करें तो हम यह पाते हैं कि मुकेश ने रोमांटिक गानें भी बड़े ही पुर-असर तरीके से गाये हैं। जब उनकी आवाज़ महबूबा की ख़ूबसूरती का बयान कर रही होती है, तो उसमें से एक अजीब सी इमानदारी, एक सच्चाई, एक अनोखा अपनापन छलकती है, जिन्हे सिर्फ़ गीत को सुनते हुए ही महसूस किया जा सकता है। इस गीत को भी मुकेश ने वही अंजाम दिया है। संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी की यह रचना है और जैसा कि हमने 'सरस्वती चंद्र' फ़िल्म का गीत "चंदन सा बदन" के सिलसिले में यह कहा था कि कल्याणजी-आनंदजी हमेशा यह कोशिश करते थे कि मुकेश के गाये जानेवाले गीतों में ज़्यादा से ज़्यादा 'न' शब्द या 'न' ध्वनि का इस्तेमाल हो क्यूंकि मुकेश की नेसल आवाज़ में यह ध्वनि बहुत ही सुदर सुनाई देती है, तो साहब, प्रस्तुत गीत में भी यथा संभव इसका प्रयोग हुआ है। कहाँ कहाँ हुआ है ये तो आप ख़ुद ही गीत को सुनते हुए अनुभव कीजिये।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. जॉय मुखर्जी और साधना पर फिल्माया गया गीत.
२. एस एच बिहारी का लिखा गीत.
३. मुखड़े में शब्द है - "हुज़ूर".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
धीरे धीरे कदम बढाती स्वप्न मंजूषा जी शरद जी के करीब पहुँचने को है, १२ अंकों तक पहुँचने की बधाई, शरद जी जाने क्यों आये और बिना कुछ कहे चले गए. स्वप्न जी और पराग जी, हौंसला अफजाई के लिए धन्येवाद. आप सब का प्यार ही हमारी प्रेरणा है. स्वप्न मंजूषा जी आप जवाब के साथ फिल्म के प्रदर्शन का वर्ष भी लिखती हैं, कहीं आप जवाब गूगल सर्च का इस्तेमाल कर तो नहीं दे रहीं है न ? शरद जी ने ये बात स्वीकारी है. वैसे तो हम आपको नहीं रोक सकते. पर कोशिश करें कि जवाब अपनी याददाश्त से ही दें ताकि रोचकता बनी रहे, तो ये निर्णय कि जवाब कैसे देना है हम आप पर ही छोड़ते हैं :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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