बुधवार, 22 अप्रैल 2009

सन्डे के सन्डे....एक सदाबहार मस्ती से भरा गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 59

फ़िल्म संगीत के जानकारों को पता होगा कि ऐसे ५ संगीतकार हैं जिन्हें फ़िल्म संगीत के क्रांतिकारी संगीतकार का ख़िताब दिया गया है। ये ५ संगीतकार हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर, आर. डी. बर्मन, और ए. आर. रहमान। इन्हें क्रांतिकारी संगीतकार इसलिए कहा गया है क्यूँकि इन्होंने अपने नये अंदाज़ से फ़िल्म संगीत की धारा को नई दिशा दी है। यानी कि इन्होंने फ़िल्म संगीत के चल रहे प्रवाह को ही मोड़ कर रख दिया था और अपने नये 'स्टाइल' को स्वीकारने पर दुनिया को मजबूर कर दिया। इनमें से जिस क्रांतिकारी की बात आज हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कर रहे हैं वो हैं सी. रामचन्द्र। सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म संगीत में पाश्चात्य संगीत की धारा को इस तरह से ले आए कि उसने फ़िल्मी गीतों के रूप रंग को एक निखार दी, और लोकप्रियता के माप-दंड पर भी खरी उतरी। और यह सिलसिला शुरू हुआ था सन १९४७ की फ़िल्म 'शहनाई' से। इस फ़िल्म में "आना मेरी जान मेरी जान सन्डे के सन्डे" एक 'ट्रेन्ड-सेटर' गीत साबीत हुआ। और यही मशहूर गीत आज आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में।

'शहनाई' १५ अगस्त १९४७ को बम्बई के नोवेल्टी थिएटर में प्रदर्शित हुई थी जब पूरा देश स्वाधीनता की ख़ुशियां मना रहा था। शहनाई की वो पाक़ तरंगें और इस फ़िल्म का शीर्षक गीत "हमारे अंगना आज बजे शहनाई" चारों तरफ़ गूंज रहे थे। पी. एल. संतोषी निर्देशित एवं रेहाना और नासिर ख़ान अभिनित यह फ़िल्म फ़िल्मिस्तान के बैनर तले बनी थी। कहा जाता है कि फ़िल्मिस्तान के शशधर मुखर्जी को शुरू में यह गीत पसंद नहीं आया और इस गीत को फ़िल्म में रखने के वो ख़िलाफ़ थे। लेकिन संतोषी साहब ने गाने का फ़िल्मांकन किया और यह गीत पूरे फ़िल्म का सब से कामयाब गीत सिद्ध हुआ, और फ़िल्म की कामयाबी के पीछे भी इस गाने का बड़ा हाथ था। चितलकर यानी कि सी. रामचन्द्र और मीना कपूर का गाया यह गीत हास्य गीतों की श्रेणी में एक इज़्ज़तदार मुक़ाम रखता है। पश्चिमी ऑर्चेस्ट्रेशन और संगीत संयोजन के अलावा इस गीत की एक और ख़ास बात यह है कि इस गीत में फ़िल्म संगीत के इतिहास में पहली बार सीटी यानी कि व्हिस्‍लिंग (whistling) का इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद कई गीतों में इस शैली का प्रयोग हुया जैसे कि "तुम पुकार लो (ख़ामोशी)", "ये हवा ये नदी का किनारा (घर संसार)", "हम हैं राही प्यार के हम से कुछ ना बोलिये (नौ दो ग्यारह)", "मैं खो गया यहीं कहीं (12 O'Clock)", "नख़रेवाली (न्यू डेल्ही)", "जीना इसी का नाम है (अनाड़ी)" वगेरह। अब शायद आपको अंदाज़ा हो गया होगा कि क्यूँ सी. रामचन्द्र को कांतिकारी संगीतकार का दर्जा दिया गया है। तो चलिये सी. रामचन्द्र की गायिकी और संगीत को नमन करते हुए फ़िल्म 'शहनाई' का यह सदाबहार गीत सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इस फिल्म का एक गीत पहले भी बजाया जा चूका है.
२. नौशाद का संगीत रफी साहब की आवाज़.
३. मुखड़े में शब्द है - "मिलन"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी लौटे सही जवाब के साथ और मनु ने मोहर लगायी...शाबाश भाई....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


एक मुलकात यूफोरिया के पलाश सेन से

हिंद युग्म की सबसे बड़ी सफलता रही है कि जब से ये सफ़र शुरू हुआ है, इसके बहाव में नयी प्रतिभाएं जुड़ती चली जा रही हैं, और हर आती हुई लहर बहाव को एक नए रंग से भर जाती है. हिंद युग्म के इस रंगीन परिवार में दो नए नाम और जुड़ गए हैं. दरअसल ये दो होते हुए भी एक हैं, एक सी कद काठी, चेहरा मोहरा, और व्यवसाय भी एक है इन जुड़वां भाईयों का. जामिया स्नातक अकबर और आज़म कादरी के रूप में हिंद युग्म को मिले हैं दो नए युवा निर्देशक. जालौन, बुदेलखंड जैसे छोटे क़स्बे में उनका बचपन बीता. बारहवीं पास कर, आँखों में आसमान छूने के सपने लेकर दोनों भाई दिल्ली आये. बचपन से ही थिएटर से जुडाव तो था ही, जामिया में मॉस मीडिया की पढाई के दौरान ये शौक और परवान चढा. २००५ में इनके द्वारा निर्देशित एक लघु फिल्म आई "मैसेल्फ़ संदीप" जिसमें संगीत था रॉक बैंड यूफोरिया का. किसानों की आत्महत्या विषय पर एक नाटक लिखा जिसका शीर्षक दिया गया "मौसम को जाने क्या हो गया है". जब इस नाटक का मंचन हुआ तो दर्शकों में शामिल थे ओक्सफेम इंडिया के कुछ सदस्य. चूँकि ओक्सफेम भारत में गरीबी उन्मूलन और जलवायु परिवर्तन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पिछले कई सालों से कार्यरत है उन्हें अकबर और आज़म संभावनाएं नज़र आई.
पलाश के साथ अकबर कादरी और आज़म कादरी
अकबर और आज़म ने ने ओक्सफाम में एक प्रोजेक्ट पेश किया, आईडिया ये था कि किसी लोकप्रिय माध्यम से पर्यावरण सम्बंधित समस्याओं, खतरों और उनके निवारण में जन भागीदारी के सन्देश को आम से आम आदमी तक प्रेषित किया जाए. ताकि ये वातानुकूलित कमरों की चर्चा बन कर ही न रह जाए. जाहिर है संगीत से अधिक लोकप्रिय और सरल माध्यम और क्या हो सकता था, तो इस तरह शुरआत हुई एक सार्थक संगीत प्रोजेक्ट की. यूफोरिया के पलाश सेन आगे आये, और गीत बना "ज़मीन" (पायेंगें ऐसा जहाँ...), जिसे मुक्तलिफ़ लोकेशनों पर शूट किया अकबर और आज़म ने. ओक्सफेम ने निर्माण का जिम्मा उठाया और निर्मित हुआ एक सशक्त गीत और एक बेहद उत्कृष्ट विडियो, जो ५.३० मिनट की छोटी अवधि में वो सब कह देता है, जो कहा तो पिछले कई सालों से जा रहा है पर शायद अभी भी जन साधारण समस्या की गंभीरता से वाकिफ नहीं हो पाया है. मुझे लगता है कि ये प्रयास तो बस एक शुरुआत भर है, इस तरह के और भी आयोजन होने चाहिए और ओक्सफेम और उन जैसी अन्य संस्थाओं को जनप्रिय माध्यमों का सहारा लेकर अपने सन्देश लोगों तक पहुचने का बीडा उठाना चाहिए. बहरहाल हम बात कर रहे थे अकबर और आज़म की. "ज़मीन" गीत और उसके विडियो को ओक्सफेम एक भव्य समारोह में लॉन्च करने जा रहा था. इसी समारोह का निमत्रण लेकर अकबर और आज़म मेरे कार्यालय में आकर मुझसे मिले. उनसे मिलकर और उनके विचार जानकर मुझे लगा कि आने वाले समय में मीडिया जगत इस युवा लेखक-निर्देशक जोड़ी से बहुत सी उम्मीदें कर सकता है. हम अकबर और आज़म के बारे में आपको और जानकारी देंगें उनको आपके रूबरू भी लेकर आयेंगे बहुत जल्दी, साथ ही दिखायेंगे उनका नया विडियो भी. ओक्सफेम और उनके उद्देश्यों के बारे में भी विस्तार से चर्चा करेंगें, पर आज बात करते हैं उस "लौन्चिंग" समारोह की, पलाश की और यूफोरिया की.

शुक्रवार १७ अप्रैल दिल्ली के फिक्की सभगार में होना था ये कॉन्सर्ट. निखिल आनंद गिरी चुनावी व्यस्तताओं के चलते आने में असमर्थ थे (हालाँकि अकबर और आज़म को हिंद युग्म का परिचय इन्होने ही दिया था), तो मैं, शैलेश भारतवासी और छायाकार कवि (मैं इन्हें इसी तरह संबोधित करना पसंद करता हूँ) मनुज मेहता पहुंचे समारोह का आनंद लेने. इरादा ये भी था कि लगे हाथों पलाश से कुछ सवाल भी पूछ लिए जाएँ. मनुज ने कुछ सवाल तैयार कर रखे थे, आपसी सलाह से उसमें कुछ नए सवाल जोड़ दिए गए और कुछ हटा दिए गए और करीब १० सवालों की एक सूची तैयार हो गयी. हॉल लगभग पूरा भर चूका था, और जैसा कि उम्मीद थी युवाओं की संख्या इनमें ज्यादा थी. ओक्सफेम जिन ग्रामीण इलाकों में कार्यरत है वहां से भी कुछ किसान प्रतिनिधि आये थे जिन्होंने अपनी समस्याओं को रखा और उनके निवारण के लिए ओक्फेम द्वारा किये जा रहे प्रयत्नों का भी उन्होंने जिक्र किया. उसके बाद मंच पर आये ओक्सफेम के एम्बेसडर अभिनेता राहुल बोस. राहुल बोस की छवि एक बुद्धिजीवी ऐक्टर की है, और उन्होंने अपने छोटे मगर बेहद प्रभावशाली संवाद में चेताया कि जिस जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिन्ग का असर देश के ७० प्रतिशत लोगों पर होगा उससे बचे हुए ३० प्रतिशत भी भी अछूते नहीं रह पायेंगें. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब समय महज बातों का नहीं काम का है और हम सब को वो सब कुछ करना चाहिए जो हम कर सकते हैं, जैसे उर्जा की खपत कम करना, छोटी दूरी के सफ़र के लिए पेट्रोल युक्त वाहन की उपेक्षा करना, पर्यावरण सहयोगी थैलों का इस्तेमाल करना, बारिश के पानी को सहेजना आदि.

राहुल बोस ने इस विषय पर एक हस्ताक्षर आन्दोलन का भी शुभारम्भ किया, जिसमें स्वस्थ मंत्री डाक्टर किरण वालिया ने भी अपने हस्ताक्षर कर मुद्दे की गंभीरता पर अपनी चिंता की मोहर लगायी. उसके बाद लोकार्पण हुआ उस शानदार विडियो का जिसका जिक्र हमने उपर किया. विडियो को जम कर सराहना मिली और तालियों की गडगडाहट के बीच मंच पर उतरे यूफोरिया के संगीत कर्मी. "वक्र्तुंडा महाकाय सूर्याकोटि समप्रभा.." की ध्वनि से सभागार गूँज उठा और अवतरित हुए पलाश सेन. उनके आते ही जैसे समां बदल गया, और अपने पहले ही गाने "रोक सको तो रोक लो" से ही उन्होंने श्रोताओं से खुद को जोड़ लिया, फिर "धूम पिचक" ने तो धूम ही मचा दी. आज लगभग १० साल बाद इस गाने की चमक फीकी नहीं हुई है. उसके बाद कुछ धीमे गीतों से दर्शकों का उत्साह कुछ ठंडा देखा तो पलाश ने फैका अपने तुरुप का इक्का- "मायी री.." इस गीत के बाद जो तूफ़ान उठा वो फिर थमा ही नहीं...एक के बाद एक फरमाईशें और उन फरमाईशों को पूरा करते उर्जा से भरे पलाश. बीच बीच में अपना जौहर दिखा रहे थे उनके बैंड के अन्य सितारे भी पर बागडोर पूरी तरह से पलाश के हाथों में ही थी.

१९९८ से अपना कारवाँ लेकर चले पेशे से डॉक्टर पलाश सेन ने यूफोरिया में बहुत कुछ बदलते देखा है, पर कुछ है जो नहीं बदला, वो था यूफोरिया का मूल मन्त्र -समय के साथ बदलकर कुछ अच्छा और नया करने की चाहत. यूफोरिया को हिदुस्तान में रॉक बैंड का अगुवा माना जा सकता है. दस साल तक कवर वर्ज़न करने के बाद पलाश ने महसूस किया कि जब तक हिंदुस्तान में रॉक को हिद्नुस्तानी भाषा में प्रस्तुत नहीं किया जायेगा तब तक कुछ भी विशेष हासिल नहीं किया जा सकेगा. और यूँ खुला रास्ता "धूम" का. धूम की धूम ने इंडी रॉक संगीत को एक नयी पहचान दी. हाल ही में आई फरहान अख्तर की "रॉक ऑन" की कमियाबी ने साबित कर दिया है कि अच्छे संगीत को हिन्दुस्तानी श्रोता सर आँखों पर बिठाएंगे ही. वैसे हिंदुस्तान के मुकाबले पाकिस्तान जैसे छोटे देश में रॉक बैंड अधिक है और उन्हें यहाँ भी खूब सराहा जाता है. दरअसल यूफोरिया वाला फार्मूला अभी यहाँ के अन्य रॉक बैंड शायद समझ नहीं पाए हैं. वापस आते हैं कॉन्सर्ट पर जहाँ पलाश जब अपने सभी हिट गीत गा चुके तो कुछ फ़िल्मी और कवर वर्ज़न भी सुनाने लगे थे, मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि अब पलाश और उनकी टीम को हर कॉन्सर्ट में केवल अपने ही गाने गाने चाहिए. खैर आयोजन का अंतिम गीत था -"ज़मीन". यूफोरिया के इस सबसे नए गाने को बहुत खूब लिखा और संगीत से संवारा गया है. इस इस गाने के बाद पलाश ने ओक्सफेम की सहयोगी टीम और विडियो निर्देशक अकबर-आज़म का मंच पर आमंत्रित किया साथ ही परिचय करवाया अपने उन साथियों का भी जिनसे मिलकर बनता है -"यूफोरिया".

शो के समापन के बाद बधाईयों का सिलसिला शुरू हुआ, मैंने भी अकबर को गले लग कर बधाई दी, तो अकबर ने हिंद युग्म की टीम को ग्रीन रूम का दरवाज़ा दिखला दिया, जहाँ अपने "अति-उर्जामय" प्रदर्शन के बाद कुछ पल चैन की साँस ले रहे थे पलाश और यूफोरिया के अन्य सदस्य. शैलेश रिकॉर्डर साथ लाये ही थे, मनुज ने संभाला जिम्मा सवाल दागने का. तो लीजिये आप भी सुनिए, उस छोटी सी मुलाकात की ये रिकॉर्डिंग-




देखिए 17 अप्रैल 2009 को फिक्की सभागार में हुए यूफोरिया के जीवंत प्रदर्शन की स्लाइडशो




मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

लागी नाही छूटे रामा...लता तलत का गाया एक मधुर भोजपुरी गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 58

जकल भारी तादाद में भोजपुरी फ़िल्में बन रही हैं। अगर हम ज़रा इतिहास में झांक कर देखें तो पता चलता है कि भोजपूरी फ़िल्मों का इतिहास भी बड़ा पुराना है। 'लागी नाही छूटे राम' एक बहुत ही मशहूर भोजपुरी फ़िल्म रही है जो सन् १९६३ में बनी थी। यह फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' के साथ साथ रिलीज़ होने के बावजूद भी उत्तर और पूर्वी भारत में सुपरहिट रही। १९७७ की फ़िल्म 'नदिया के पार' भी एक कालजयी भोजपुरी फ़िल्म रही है। एक ज़माने में हिन्दी फ़िल्म जगत की बहुत मशहूर हस्तियाँ भोजपूरी सिनेमा से जुड़ी रही हैं। कुंदन कुमार निर्देशित इस फ़िल्म में नायक बने थे नासिर हुसैन साहब। हिन्दी फ़िल्म जगत के ऐसे दो मशहूर संगीतकार उस ज़माने मे रहे हैं जिनका भोजपुरी फ़िल्म संगीत में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये थे एस. एन. त्रिपाठी और चित्रगुप्त। फ़िल्म 'लागी नाही छूटे राम' में चित्रगुप्त का संगीत था। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इसी फ़िल्म से एक बहुत ही मीठा गाना हम आपके लिए चुनकर लाए हैं। हमें पूरी पूरी उम्मीद है कि इस गीत को सुनने के बाद यह गीत आपके दिलोदिमाग़ में पूरी तरह से घर कर जाएगा, और इसकी मधुरता एक लम्बे अरसे तक आपके कानों में रस घोलती रहेगी। लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज़ों में यह है मजरूह सुल्तानपूरी की गीत रचना और यह इस फ़िल्म का शीर्षक गीत भी है। "जा जा रे सुगना जा रे, कही दे सजनवा से, लागी नाही छूटे रामा चाहे जिया जाये, भयी ली आवारा सजनी, पूछ ना पवनवा से, लागी नाही छूटे रामा चाहे जिया जाये".

बिहार के लोक-संगीत में जो मिठास है, जो मधुरता है, उसका एक छोटा सा उदाहरण है यह गीत। दोस्तों, यह तो हमने आपको बता दिया कि इस गीत के संगीतकार हैं चित्रगुप्त, लेकिन क्या आपको यह पता है कि उनके दो संगीतकार बेटे आनंद और मिलिन्द ने जब फ़िल्म संगीत संसार में क़दम रखा तो अपने शुरूआती दौर की मशहूर फ़िल्म 'क़यामत से क़यामत तक' में एक गीत ऐसा बनाया जो हू-ब-हू इस भोजपूरी गीत की धुन पर आधारित था! अगर याद नही आ रहा तो मैं ही याद दिलाये देता हूँ, वह गीत था अल्का याग्निक का गाया "काहे सताये, काहे को रुलाये, राम करे तुझको नींद न आये"। केवल दो मिनट का वह गाना था और वह भी बिना किसी साज़ों का सहारा लेते हुए। कहिये, याद आ गया ना? तो चलिए पिता-पुत्र की संगीत साधना को सलाम करते हुए सुनते हैं आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड'। यह गीत मुझे भी बेहद पसंद है!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सी रामचंद्र का एक ट्रेंड सेट्टर गीत.
२. फिल्म का शीर्षक एक वाध्य यंत्र पर है जिसे शादियों में ख़ास तौर पर बजाया जाता है.
३. मुखड़े में शब्द है -"मुर्गी".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
बेहद मुश्किल था पर मनु जी आपकी याद्दाश्त को सलाम. एक दम सही पकडा आपने....बहुत बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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