रविवार, 18 जनवरी 2009

लेकिन दुनिया में कोई दूसरा 'सहगल' नहीं आया...

कुंदनलाल सहगल की ६२ वीं पुण्यतिथि पर विशेष
१८ जनवरी १९४७ —१८ जनवरी २००९, पूरे बासठ साल हुए उस आवाज़ को ख़ामोश हुए जिसका नाम कुंदनलाल सहगल है । आज तक उनके बारे में कई बार लिखा गया है, कई सुनायी गयी बातें जो उनके दोस्तों, सहकर्मियों ने, रिश्तेदारों ने सुनायी । उनका हाथ का लिखा हुआ कुछ या उनका इन्टरव्यु जैसी कोई सामग्री मौजुद नहीं जिनसे उनकी शख्सियत को पूरी तरह जाना जा सके । उनके साथ रहे लोग भी कितने बचे हैं अब ? नौशाद, केदार शर्मा, के एन सिंह जैसे कुछ सहकर्मियों ने वक्त वक्त पर उनके साथ बिताये गये समय का ज़िक्र किया है लेकिन उनके अपने आत्मकथन के बिना इस महान अदाकार के ज़िंदगी के सोये हुये पहलू कभी सामने नहीं आ सके । जगदीश सेठी, पृथ्वी राज कपूर उनके मित्रों में से थे । गुज़रे वक्त में प्रसार माध्यमों की गैर मौजूदगी की वजह से हमारे चालीस व पचास के दशक के ढ़ेर से फनकारों की जीवन संघर्ष की कहानियां हम तक कभी नहीं पहुंची । मोतीलाल, चन्द्रमोहन, ज़ोहरा बाई, अमीर बाई जैसे अनगिनत कलाकार, गायक हैं जिनके साक्षात्कार, व उनकी कोई तसवीर के लिये पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी तरसते हैं ।

सहगल अपने गाये करीब ढ़ाई सौ गानों के ज़रिये अवाम में आज भी ज़िंदा हैं । जब तक अच्छा संगीत सुननेवाले इस दुनिया में रहेंगे तब तक सहगल की आवाज़ हमेशा फ़ज़ा में गुंजेगी । अपने छोटे से जीवनकाल –04 अप्रैल 1904 से 18 जनवरी 1947– यानी गायकी जीवन के पंद्रह से भी कम सालों में गिनी चुनी फिल्में और इतने कम गानों के साथ अपने समय में वे लोकप्रियता की हद तक पहुंचे ।

आम आदमी राग रागिनी, सुरताल को नहीं पहचानता फिर भी उसे 'झूलना झुलाओ…' और 'राधे रानी दे डारो ना…' जैसे गानों के भीतर डूबता देखा गया है । संगीत की कोई बाकायदा तालीम न लेते हुए गलियों के गायकों, सुफि़यों के संग गाने वाले इस सहज पर बुलंद आवाज़ के धनी ने भजन और ग़ज़लें एक से सातत्य से गायीं हैं । उनका पसंदीदा राग भैरवी था । भैरवी ही संगीतकार नौशाद व शंकर जयकिशन का भी पसंदीदा राग था ।

उनकी ग़ज़लें स्पष्ट भाषाई उच्चारण व अदा के नमूने हैं । ग़ालिब —'दिल से तेरी निगाह जीगर तक उतर गयी…', 'इश्क मुजको नहीं वहशत ही सही…', 'आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक…' सीमाब —'ऐ बेख़बरी दिल को दीवाना बना देना…', और ज़ौक़ —'लायी हयात आए कज़ा ले चली चले…' को अपनी आवाज़ के जादू से सहगल ने घर घर तक पहुंचाया । ग़ालिब उनके पसंदीदा शायर थे जिसकी मज़ार की मरम्मत भी उन्होंने करवायी थी । उनकी ग़ज़ल गायकी की एक ख़ासियत थी कि वे ग़ज़ल को एक अनूठी तीव्रता से गाते थे । वे प्राय: तीन मिनट की ग़ज़ल में मुखड़े के साथ 5 या 6 शेर गा देते थे, सब कुछ एक बेहतरीन मिटर और सिमेट्री के साथ । एक निधार्रित तबले की उठी हुयी गति, एक निधार्रित बजाने वाले के संग ही वे गाते थे । यहाँ पर आप याद कर लें :

ग़ालिब की ग़ज़ल - आह को चाहिए...


इश्क मुझको नही...


उस मस्त नज़र पर पड़ी - फ़िल्म - परवाना- ये सहगल की अन्तिम प्रर्दशित फ़िल्म है


जब दिल ही टूट गया - फ़िल्म - शाह जहाँ


गम दिये मुश्तकिल - फ़िल्म - शाह जहाँ


दिया जलो जग में - फ़िल्म - तानसेन


एक बंगला बने न्यारा - फ़िल्म - प्रेजिडेंट


एक और नायब गैर फिल्मी ग़ज़ल - रहमत पे तेरी


या फ़िर स्ट्रीट सिंगर का ये गीत कानन देवी के साथ गाया हुआ - बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए...
(सहगल ने इस गीत को लाइव रिकॉर्ड किया था. गीत का फिल्मांकन ऐसे हुआ था कि सहगल कैमरे के सामने लाइव गाते हुए जा रहे थे और साजिन्दे पीछे चल रहे थे बजाते हुए, कैमरे की आंख बचा कर. कानन देवी वाला संस्करण कभी रिकॉर्ड पर नही आया)


झूलना झुलाओ - शायद उनका गाया हुआ ये पहला गीत था.


दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर टाइमकीपर, फिर टाइपराइटर मशीन के सेल्समॅन रहने के अलावा चमड़े की फॅक्टरी में भी उन्होंने काम किया । जम्मू में जन्मे और कलकत्ता में रेडियो स्टेशन पर गाना गाते आर सी बोराल ने उनको न्यू थियेटर्स के लिये चुना । फिल्म 'पूरन भगत' —1932 में दो गानों 'राधे रानी दे डारो ना…' व 'भजुं मैं तो भाव से श्री गिरधारी…' को गाने के लिये उन्हें 25 रुपये मिले पर उसके रेकॉर्डस् हज़ारों में बिके, तब ग्रामोफोन कंपनी को लगा कि सहगल के साथ यह अन्याय हुआ है तब रॉयल्टी के आधार पर उनसे गवाने की दरख़्वास्त रखी गयी । सहगल बहुत भोले थे, बोले –अगर मेरा गाना नहीं चला तो आपके पच्चीस रुपये भी डूब जाएंगे– यहाँ सहगल ने कंपनी से मौखिक करार किया और यहीं से रॉयल्टी की प्रथा भी शुरु हुई । 1940–1941 में न्यू थियेटर्स में आग लगी जिसमें उनकी शुरु की असफल फिल्में –मुहब्बत के आंसू ,ज़िन्दा लाश, सुबह का सितारा, जल गयीं ।

न्यू थियेटर्स की 'चंडीदास' लोकप्रियता की पहली सीढ़ी थी ।बाद में भारी सफल फिल्म 'देवदास' से वे बतौर गायक–एक्टर इतने मशहूर हुए कि लोकचाहना के शिखर तक पहुंच गये ।'बालम आए बसो मोरे मन में…' और 'अब दिन बितत नाहीं, दुख के…' जैसे श्री केदार शर्मा के लिखे गानों ने शरतचंद्र के एक नाकाम, निराश प्रेमी की छवि को अमर बना दिया । देवकी बोस के निर्देशन में इस पहली पूर्ण सामाजिक फिल्म से स्वर्गीय बिमल रॉय भी जुड़े थे । एक निरंतर चली आती असफल, दुखदायी प्यार की दास्तान को जिस तरह पेश किया गया था उससे आहत हुए बिमल रॉय ने बाद में 1955 में अपने निर्देशन में 'देवदास' बनाकर इसी वेदना को दोहराया ।'प्रसीडेंट', 'दुश्मन', 'ज़िंदगी', 'स्ट्रीट सींगर', 'सूरदास', 'मेरी बहन' ऐसी फिल्में हैं जो उन्हों ने अपने फिल्म जीवन के मध्यान्ह के समय कीं, और ज़ाहिर है, इन फिल्मों के गानों की गूंज न सिर्फ उस समय परंतु आज भी और आने वाले सालों तक सुनी जाएगी । बंबई में, उनकी बाद की फिल्में रणजीत की 'तानसेन', और 'भँवरा', कारदार की 'शाहजहाँ' थी ।'तदबीर' और 'परवाना' में उस समय की उभरती गायिका–अदाकारा सुरैया के साथ नायक बने ।'शाहजहाँ' व 'परवाना' उनकी अंतिम फिल्में थीं ।'ऐ दिले बेकरार झूम…', 'जन्नत ये बनायी है मोहब्बत के सहारे…' —शाहजहाँ और 'मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पाई जाती है…', 'कहीं उलझ न जाना…' —परवाना फिल्मों के यह गाने गा कर उन्हों ने साबित कर दिया कि उनकी न्यू थियेटर्स की शुरु की गायकी —1933–34— और आख़िरी —1947— की गायकी की उत्तमता में कोई फ़र्क नहीं आया था ।

जितनी सहजता से वे अपनी मातृभाषा पंजाबी में गाते थे उतनी ही मीठास से वे बंगला गाने गाते थे ।पंजाबी एक या दो जब कि बंगला के कई गाने उनके उपलब्ध हैं ।हिंदी में उन्हों ने कृष्ण भजन बहुतेरे गाये हैं —भजुं मैं तो भाव से श्री गिरधारी, —राधे रानी दे डारो ना, —सुनो सुनो हे कृष्ण काला, फिल्म 'सूरदास' व 'चंडीदास' आदि के भजन भी कृष्ण भजन में शामिल हैं, पर उनका कोई राम भजन जेहन में नहीं आ रहा है ।

यह सत्य भी सभी जानते हैं कि हमारे सभी नामी गायक जैसे मुकेश, लता मंगेशकर, किशोर कुमार किस तरह अपने शुरूआती दौर में सहगल की नकल किया करते थे, इस बात का ज़िक्र उन्हों ने ख़ुद हमेशा किया है । लताजी ने सहगल के 'सो जा राजकुमारी…' को कॅसेट में भी गाया है । मुकेश का 'दिल जलता है तो जलने दे…' पहली नज़र व किशोर कुमार का 'मरने की दुआएं क्यूँ मांगू…' —ज़िददी— दोनों गीत इस बात की मिसाल हैं कि सहगल की तान उन पर किस कदर हावी थी ।किशोर कुमार इस कदर सहगल के दीवाने थे कि वे अपने घर में निरंतर, लगातार ज़िंदगी के आख़िर दिनों तक उनके गाने सुना करते थे,यह बात उनकी पत्नी लीना चंदावरकार ने बतायी । सुना है कि महान कालाकार प्रेमनाथ भी हर समय, फिल्म शूटिंग के दौरान भी, सहगल के गानों की कसॅट सुन करते थे ।पिछली पीढ़ी के अदाकार जो कि एक गहरी साहित्यिक और भाषाई —हिंदी, उर्दू —की समझ, ज्ञान रखते थे, सहगल की गायकी के कायल रहे हैं जिनमें कला के महान स्तंभ अशोक कुमार, प्राण, राज खोसला जैसे अनगिनत नाम हैं । सहगल के लहज़े की नकल उस दौर के व बाद के हर गायक ने कहीं न कहीं की । सहगल के गैर फिल्मी गीतों–ग़ज़लों की गायकी परंपरा को सी एच आत्मा, तलत मेहमूद, जगमोहन जैसे कलाकारों ने आगे बढ़ाया ।

संगीतकार नौशाद जिन्हों ने उनकी आख़िर की फिल्म 'शाहजहाँ' में संगीत दिया था बताते रहे कि कुंदन लाल सहगल को यह वहम हो गया था कि वे बिना शराब पिये नहीं गा सकते । जब नौशाद साहब ने शराब के साथ और बिना शराब के इस तरह एक ही गाना दो बार रेकॉर्ड करवा कर उन्हें सुनाया तो सहगल को वही गाना अच्छा लगा जो बिना शराब पीये गाया गया था । नौशाद से असलियत सुन कर उन्हें ताज्जुब हुआ । इस पर नौशाद साहब ने कहा कि —जिन लोगों ने आप से कहा कि आप बिना शराब पीये अच्छा नहीं गा सकते वे आपके दुश्मन होंगे, दोस्त नहीं । तब सहगल बोले कि —काश कुछ समय पहले आप यह कह देते तो कुछ दिन और जी लेता पर अब बहुत देर हो चुकी है ।नौशाद ने सहगल की मृत्यु के बाद जालंधर में मनायी गयी उनकी बरसी पर लिखा था —संगीत के माहिर तो बहुत आए हैं लेकिन दुनिया में कोई दूसरा 'सहगल' नहीं आया ।

- श्रीमती वी एन पुरोहित
(सौजन्य - नोसटोलोजिया )

क्या भुलूँ क्या याद करूँ का स्वरबद्ध रूप

आज महान गीतकार, कवि, लेखक हरिवंश राय बच्चन की छठवीं पुण्यतिथि है। कुछ देर पहले हमने आपको अमिताभ बच्चन की आवाज़ में बच्चन जी की कविताएँ (मधुशाला से इतर) सुनवाई, साथ में शोभा महेन्द्रू का विशेष आलेख भी पढ़वाया। अब बारी है सबसे ख़ास पेशकश की।

लेडी श्रीराम कॉलेज, नई दिल्ली में हिन्दी की प्राध्यापिका डॉ॰ प्रीति प्रकाश प्रजापति हिन्दी कविताओं से विशेष अनुराग रखती हैं। इन्होंने निराला, पंत आदि महाकवियों की रचनाओं को स्वरबद्ध भी किया है। जब हमने इनसे निवेदन किया कि हरिवंश राय बच्चन की कविता 'क्या भुलूँ क्या याद करूँ' को कम्पोज करें, तो इन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। तबला वादक मौजी बाबू के साथ मिलकर हारमोनियम की धुन पर यह कविता कम्पोज हुई।

प्रीति प्रकाश ने कम्पोज करने के साथ हिन्द-युग्म को बताया- "मुझे बच्चन जी की इस कविता को गाकर बहुत सुकूँ मिला, मैं चाहती हूँ कि इनकी ढेरों रचनाएँ कम्पोज करूँ और एक संपूर्ण एल्बम बनाऊँ"

अभी तो हमने ऐसे ही साधारण mp3 रिकॉर्डर से यह कविता रिकॉर्ड की है। भविष्य में पूरा एल्बम लेकर उपस्थित होंगे। तब तक सुनते हैं-




मधुशाला ' का प्रथम सस्वर पाठ दिसम्बर १९३३ में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शिवाजी हाल में हुआ था ! तब श्री अक्षय कुमार जैन ,सम्पादक ,नवभारत टाईम्स ,वहां उपस्थित थे !वे २३ जनवरी १९५९ के लाल किले के कवी सम्मलेन में भी मौजूद थे जिसकी परिसमाप्ति `मधुशाला ,के पाठ से हुई थी ! उन्हीं के द्वारा लिखा ये संस्मरण आपके सम्मुख है !



कितनी शक्लों को रखेगा

याद भला भोला साकी ,

कितनी पीनेवालों में है

एक अकेली मधुशाला !



इस कविता ने जो लोक स्वीकृति और जनप्रियता प्राप्त की है ,उसे देखते हुए आज कोई भी व्यक्ति इस बात को याद कर कि वह `मधुशाला'के सर्वप्रथम काव्यपाठ में मौजूद था ,थोडा गर्व किये बगैर नहीं रह सकता !यह अवसर मेरे जीवन की मधुर स्मृतियों में है

वह शाम मुझे अच्छी तरह याद है जब मैं कशी हिन्दू विश्वविद्यालय का छात्र था और छात्रावास के मेरे कमरे के साथ वाले कमरे में एक युवक धीमे स्वर में कोई कविता गुनगुना रहा था !मैं उन्हें छिप कर सुन रहा था और दूसरे दिन विशाल शिवाजी हाल में उसने उन्मुक्त कंठ से कविता पाठ किया !वह युवक कवी थे भाई बच्चन और उन्होने जिस कविता का पाठ किया था ,वह थी `मधुशाला' जिसकी पुन्क्तियों को वहां पर मौजूद हजारों सुनने वालों ने उनके साथ दोहराया था !

उस वक़्त की भावना को कुछ शब्दों में बता पाना कठिन है !बस यही लग रहा था कि वे जो कुछ कह रहे हैं वह हम सब कहना चाहते थे ,पर न हमारे पास शब्द थे ,और न हममें साहस !उनके शब्दों से जैसे हमारे मन के बंधन खुल रहे थे !

नवयुवक तो पागल थे ,पर बड़ों में एक दूसरे प्रकार की प्रतिक्रिया भी हो रही थी !प्रो.मनोरंजन्प्रसाद सिंह ने उस कवी सम्मलेन का सभापतित्व किया था और उन्होने वहीँ बैठे बैठे मधुशाला की कई रुबाइयों की पैरोडी लिख डाली और सुनाई भी ! तब तक मधुशाला पुस्तक रूप में प्रकाशित नहीं हुई थी !पहले दिन तृप्ति नहीं हुई तो दूसरे दिन फिर `मधुशाला ' का काव्य पाठ कराया गया और लोग लिखने का सामान लेकर आये और सुन सुन कर बहुतसी रुबाइयाँ लिख ले गए !

`मधुशाला 'के प्रति जो दो प्रकार की प्रतिक्रियाएं पहले दिन दिखलाई पड़ी थीं वे पुस्तक प्रकाशित होने के बाद भी बहुत दिन चलीं !कुछ उसे पढ़ सुन कर झूमते रहे ,तो कुछ उसको और उसके लेखक को बुरा भला कहते रहे !आलोचकों का स्वर तो अब प्राय: मंद पद चूका था ,पर उस पर झूमने वाले आज भी मौजूद हैं !



कितने साकी अपना अपना

काम ख़त्म कर दूर हुए

कितने पीनेवाले आये

किन्तु वही है मधुशाला !



और एक और द्रश्य अभी हाल में 23 जनवरी 1959 का मेरे सामने है जब बच्चन जी ने लाल किले के सम्मलेन में मधुशाला का पाठ किया! उसमें मेरा तरुण पुत्र कुछ उसी मुद्रा में बैठा जिसमें 25 साल पहले मैं बैठा था ,तन्मयता से उनका काव्य पाठ सुन रहा था और उन्ही के साथ उनकी पंक्तियाँ गुनगुना रहा था ! तभी मैंने बच्चन से कहा कि आपकी मधुशाला और उनके साकी दोनों पर समय के थपेडों का प्रभाव नहीं पढ़ा ! जितने आकर्षक और मनमोहक आप पिताओं को लगते थे उतने ही पुत्रों को भी लगते हैं !

किसी कवि सम्मलेन में जब बच्चन जी अपनी कविता सुना रहे थे ,मेरे पास बैठे एक वृद्ध से सज्जन कह रहे थे ,"क्या ये बच्चन जी हैं ! इनकी कविता सुनते सुनते हम बूढे हो गए और इनके स्वर में वही जवानी है !"

मधुशाला की लोकप्रियता का रहस्य किसमें है ,बच्चन जी की कविता में या उनके कविता पाठ में ? मैं समझता हूँ दोनों में ;एक ने उन्हे कवि सम्मेलनों में आकर्षण का केंद्र बनाया है तो दूसरी ने उनकी कृति की पचास हज़ार से अधिक प्रतियाँ जनता के बीच पहुंचाई हैं ! जिस दिन इसका विश्लेषण वैज्ञानिक ढंग से किया जायेगा उस दिन इस युग , इस समाज , इस युग समाज के काव्य प्रतियों की मनोवृति - सब पर नया प्रकाश पड़ेगा !



इस बात को ले कर एक समय गर्म बहस होती थी कि बच्चन जी ने मधुशाला पी कर लिखी है या बगैर पिए ! आज शायद ही कोई यह मानता हो कि बच्चन जी ने मदिरा का प्रचार करने के लिए ` मधुशाला ' लिखी है ! इस सम्बन्ध में जब उनसे सीधे प्रश्न किये जाते थे तो वे कहते थे ,"मैंने तुम्हें मदिरा की कविता नहीं दी , मैंने तुम्हे कविता की मदिरा दी है !"



`कवि साकी बनकर आया है

भर कर कविता का प्याला !'



अपनी भावों , विचारों को प्रकट करने के लिए उन्होने मधुशाला का रूपक अपनाया है ! मेरी शुभकामना है कि ` मधुशाला ' जैसे जैसे पुरानी हो वैसे वैसे उसका नशा बढ़ता जाए और समय कवि की इस उक्ति को सत्य सिध्ध करे —



है बढती तासीर सुरा की

साथ समय के इससे ही ,

और पुरानी हो कर मेरी

और नशीली मधुशाला !







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