मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

शुद्ध भारतीय संगीत को फिल्मी परदे पर साकार रूप दिया दादू यानी रविन्द्र जैन ने

अब तक आपने पढ़ा


वर्ष था १९८२ का. कवियित्री दिव्या जैन से विवाह बंधन में बंध चुके हमारे दादू यानी रविन्द्र जैन साहब के संगीत जीवन का चरम उत्कर्ष का भी यही वर्ष था जब "ब्रिजभूमि" और "नदिया के पार" के संगीत ने सफलता की सभी सीमाओं को तोड़कर दादू के संगीत का डंका बजा दिया था. और यही वो वर्ष था जब दादू की मुलाकात राज कपूर साहब से एक विवाह समारोह में हुई थी. हुआ यूँ कि महफ़िल जमी थी और दादू से गाने के लिए कहा गया. दादू ने अपनी मधुर आवाज़ में तान उठायी- "एक राधा, एक मीरा, दोनों ने श्याम को चाहा, अन्तर क्या दोनों की चाह में बोलो, एक प्रेम दीवानी एक दरस दीवानी...".राज साहब इसी मुखड़े को बार बार सुनते रहे और फ़िर दादू से आकर पुछा -"ये गीत किसी को दिया तो नही". दादू बोले- "दे दिया", चौंक कर राज साहब ने पुछा "किसे", दादू ने मुस्कुरा कर कहा "राजकपूर जी को".सुनकर राज साहब ने जेब में हाथ डाला पर सवा रूपया निकला टी पी झुनझुनवाला साहब की जेब से (टी पी साहब दादू के संगी और मार्गदर्शक रहे हैं कोलकत्ता से मुंबई तक). और यहीं से शुरू हुआ दादू से सफर का वो उत्कृष्ट दौर. फ़िल्म राम तेरी गंगा मैली की भी एक दिलचस्प कहानी है. राज साहब की उलझन थी की उन्होंने ही फ़िल्म "जिस देश में गंगा बहती है" बनाई थी, अब वही कैसे कहे "राम तेरी गंगा मैली". गंगा दर्शन को गए दादू और राज साहब जब गंगा किनारे बैठ इसी बात पर विचार कर रहे थे, दादू पर अचानक माँ सरस्वती की कृपा हुई, बाजा हाथ में था तो गाने लगे- "गंगा हमारी कहे बात ये रोते रोते...राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते धोते..". सुनकर राज साहब कुछ ऐसे प्रसन्न हुए जैसे किसी बालक को खेलने के लिए चन्द्र खिलौना मिल जाए, आनंदातिरेक में कहने लगे "बात बन गयी...अब फ़िल्म भी बन जायेगी". और ये हम सब जानते हैं की ये फ़िल्म कितनी बड़ी हिट थी, आगे बढ़ने से पहले लता जी की दिव्य आवाज़ में इस फ़िल्म का शीर्षक गीत अवश्य सुनेंगें.



इस फ़िल्म के दौरान ही अगली फ़िल्म "हिना" पर भी चर्चा शुरू हो चुकी थी हालाँकि राज साहब ये फ़िल्म ख़ुद पूरी नही कर पाये पर इस फ़िल्म का लाजवाब संगीत उन्हीं की निगरानी में रिकॉर्ड हुआ था. इसके बाद दादू ने कुछ और भी कामियाब फिल्में की जैसे "मरते दम तक", "जंगबाज़", "प्रतिघात" आदि पर उनकी अगली बड़ी कामियाबियाँ छोटे परदे से आई.महा धारावाहिक "रामायण" में उनका काम अलौकिक था. हर धारावाहिक में उन्होंने थीम के अनुसार यादगार संगीत दिया, फ़िर चाहे वो हेमा मालिनी कृत नृत्य आधारित नुपुर हो, या अद्भुत कथाओं की अलिफ़ लैला या फ़िर साईं बाबा का न भूलने वाला संगीत. जितने अच्छे संगीतकार हैं दादू उतने ही या कहें उससे कहीं बड़े गीतकार, कवि और शायर भी हैं वो, अपने अधिकतर गीत उन्होंने ख़ुद लिखे पर कभी कभी अन्य संगीतकारों के लिए भी गीतकारी की. कल्याण जी आनंद जी के साथ "जा रे जा ओ हरजाई..."(कालीचरण), उषा खन्ना के लिए "गड्डी जांदी है छलांगा मार दी" (दादा) आदि उन्हीं के लिखे गीत हैं. सुनते चलें दादू के दो और शानदार गीत -

पहला गीत दादू की अपनी ही आवाज़ में फ़िल्म "अखियों के झरोखों से".



दूसरा गीत सुनिए महेंद्र कपूर के स्वर में फ़िल्म "फकीरा" से.



एक और बड़ा श्रेय दादू को जाता है, इंडस्ट्री को गायकों और गायिकाओं से नवाजने का. आरती मुख़र्जी को उन्होंने कोलकत्ता से बुलाया फ़िल्म गीत गाता चल के "श्याम तेरी बंसी पुकारे.." के लिए तो इसी फ़िल्म जसपाल सिंह के रूप में उन्होंने एक नया गायक भी दिया. हेमलता, येसुदास और सुरेश वाडेकर ने भी उन्हीं की छात्र छाया में ही ढेरों कमाल के गीत गाये. गायक सुरेश वाडेकर मानते हैं कि आज वो जो भी हैं उसका पूरा श्रेय दादू को है. एक संगीत प्रतियोगिता के विजेता थे सुरेश और दादू निर्णायक. सुरेश की आवाज़ से प्रभावित दादू ने उन्हें फ़िल्म में मौका देने का वादा किया जो उन्होंने निभाया भी, सुरेश से फ़िल्म "पहेली" में गवा कर. दादू की और बातें करेंगे फ़िर कभी पर कल हम आपको मिलवायेंगे इस बेहद जबरदस्त गायक सुरेश वाडेकर से, फिलहाल हम छोड़ते हैं आपको सुरेश के गाये उस पहले गीत पर. फ़िल्म "पहेली" का ये गीत सुनिए और दादू के संगीत की मधुर मिठास का आनंद लीजिये.
"विष्टि पड़े टापुर टुपुर..."



रविन्द्र जैन पर हमारी इस श्रृंखला में सुनवाये गए सभी गीत और कुछ अन्य गीत भी आप इस प्लेयर पर सुन सकते हैं बिना रुके.


सोमवार, 1 दिसंबर 2008

एक चित का चोर जो गायक भी है, गीतकार भी और संगीतकार भी....- रविन्द्र जैन


हमने आपको सुनवाया था येसुदास का गाया रविन्द्र जैन का स्वरबद्ध किया एक अनमोल गीत. चलिए अब बात करते हैं एक बेहद अदभुत संगीत निर्देशक, गीतकार और गायक रंविन्द्र जैन की, जिन्हें फ़िल्म जगत प्यार से दादू के नाम से जानता है. स्वर्गीय के सी डे के बाद वो पहले संगीत सर्जक हैं जिन्होंने चक्षु बाधा पर विजय प्राप्त कर अपनी प्रतिभा को दक्षिण एशिया ही नही, वरन संसार भर में फैले समस्त भारतीय परिवारों तक बेहद सफलता के साथ पहुंचाया. दादू के संगीत में अलीगढ की सामासिक संस्कृति, बंगाल के माधुर्य और हिंदू जैन परम्परा का अदभुत मिश्रण है. २८ फरवरी १९४४ में जन्में रविन्द्र जैन की फिल्मी सफर शुरू हुआ १४ जनवरी १९७२ के दिन जब कोलकत्ता से मुंबई पहुंचे दादू ने फ़िल्म सेण्टर स्टूडियो में अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया, गायक थे मोहम्मद रफी साहब. रफी साहब को जब ज्ञात हुआ की दादू अलीगढ से हैं तो उनसे ग़ज़ल सुनाने का आग्रह किया तो दादू ने पेश किया ये कलाम-
गम भी हैं न मुक्कमल, खुशियाँ भी हैं अधूरी,
आंसू भी आ रहे हैं, हंसना भी है जरूरी,
ग़ज़ल का मत्तला सुनते ही रफी साहब ने कहा की देखिये मास्टर जी, देखिये मेरे बाल खड़े हो गए...तब से दादू की हर रिकॉर्डिंग के बाद रफी साहब उसी ग़ज़ल को सुनाने की फरमाईश करते.
आगे बढ़ने से पहले क्यों न रफी साहब का गाया और दादू का स्वरबद्ध किया फ़िल्म "कांच और हीरा" का ये लाजवाब गीत -
"नज़र आती नही मंजिल...."



जिस फ़िल्म के लिए रफी साहब का गाया हुआ पहला गीत रिकॉर्ड किया, वह एक शायर की आत्मकथा थी, बाद में शायर की जगह चोर ने ले ली, और फ़िल्म का नाम हो गया "चोर मचाये शोर". चोर ने कुछ यूँ शोर मचाया की बेचारा शायर यह कहकर खामोश हो गया कि घुंघुरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं. गीत चूँकि सबको बहुत पसंद था तो फ़िल्म में उसकी सिचुएशन न होने पर भी उसे शामिल कर लिया गया. यह किशोर दा का पहला गाना था दादू के निर्देशन में. किशोर दा बड़े बड़े संगीतकारों को दाव दे जाते थे फ़िर रविन्द्र जैन तो एक नए नाम थे. सिप्पी साहब ने बंगाल की दुहाई देते हुए किशोर दा को फ़ोन किया "किशोरदा एक बार गाना सुन तो लो फ़िर निर्णय तुम्हारा है". जिस दिन स्टूडियो बुक था रिकॉर्डिंग के लिए उस दिन दादू का किशोर दा से संपर्क नही हो पा रहा था, तभी अचानक वहां किशोर दा अवतरित हो गए और बिना किसी औपचारिकता के सीधी आज्ञा दी कि "आगे गान सुनाओ". दादू अभी स्टूडियो पहुंचे ही थे, साजिंदों को आना था, गीत को संगीत से सजाना था. पर जैसे तैसे दादू ने किशोर दा को गीत सुनना शुरू किया पहली ही पंक्ति से किशोर दा उसे दोहराने लगे. दादू ने कहा "अभी तो समय लगेगा संगीत की ट्यूनिंग में." तब किशोर दा ने दादू की पीठ ठोंकी और कहा "तुम इत्मीनान से काम करो, मुझे कोई जल्दी नही है" शायद उन्हें भी कुछ ऐसा मिल गया था जिसे गाकर उन्हें बेहद आत्मसंतोष मिलने वाला था. तभी तो उन्होंने फ़ोन कर किसी अन्य संगीतकार की रिकॉर्डिंग कैंसल कर गाया फ़िल्म "चोर मचाये शोर" का वो अमर गीत. सुनते हैं -



किशोर दा ने उनके संगीत निर्देशन में एक और गजब का गीत गाया फ़िल्म "तपस्या" के लिए -"जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना रे". मन्ना डे का भी साथ मिला दादू को जब उन्होंने फ़िल्म सौदागर के लिए "दूर है किनारा" गीत गाया. राजश्री फ़िल्म के साथ उनका गठ बंधन बेहद कामियाब रहा. फ़िल्म सौदागर में लता जी ने गाया "तेरा मेरा साथ रहे..." तो वहीँ इसी फ़िल्म का एक और गीत था जिसे आशा ने बहुत खूबसूरत अंदाज़ में गाया. गीत अपनी आलंकारिक भाषा के लिए प्रसिद्ध हुआ- जिसमें एक शब्द के दो अर्थ थे- "सजना है मुझे सजना के लिए...". क्या हम कल्पना कर सकते हैं किसी और के स्वर में इस गीत की...सुनिए -



फ़िल्म "चोर मचाये शोर", "सौदागर" और "दो जासूस" के बाद दादू का सिक्का संगीत जगत में चल निकला. "चितचोर" के मधुर गीतों ने सब के चित चुरा लिए तो "फकीरा" और "दुल्हन वही जो पिया मन भाये" जैसी फिल्मों के संगीत ने उन्हें खासी ख्याति दी.

फिर दादू को साथ मिला राजकपूर का जिसका जिक्र पढ़िए-सुनिए अगले अंक में।

"मैं उस दिन गाऊंगा जिस दिन आप धारा प्रवाह हिन्दी बोल कर दिखायेंगे..."- प्रसून जोशी

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (५)

साहित्य और संगीत एक एल्बम में

हिंद युग्म का पहला एल्बम "पहला सुर" कई मायनों में अनोखा था. इसमें पहली बार साहित्य और संगीत को एक धागे में पिरोकर प्रस्तुत किया गया था. बेशक ये बहुत बड़े पैमाने पर नही था पर सोच अपने समय से आगे की थी. इस बात की पुष्टि करता है टाईम्स म्यूजिक का नया एल्बम "द म्यूजिक ऑफ़ सुपरस्टार इंडिया". जो कि शोभा डे की लिखी पुस्तक "सुपरस्टार इंडिया" से प्रेरित है.संगीत का मोर्चा संभाला है मिति अधिकारी और नील अधिकारी ने जो मिलकर बनते हैं MANA. बंगाल के बाउल और राजस्थान के लंगास के मन लुभावने संगीत के बीचों बीच आप सुन सकते हैं शोभा की आवाज़ में पुस्तक के अंश भी. इन पारंपरिक गीतों को MANA ने बहुत आधुनिक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है, यहाँ लाउंज भी है, रेग्गे भी, ट्रांस भी और क्लब भी, जो शायद हर पीढी को संगीत का आनंद भरपूर दे पायेगी. दुर्लभ संगीत अल्बम्स के संकलन के शौकीन संगीत प्रेमी इसे अवश्य खरीदें.


"सॉरी भाई" ये मेरा गाना है...

संगीत की चोरी का मामला एक बार फ़िर प्रकाश में हैं, आपको याद होगा किस प्रकार संगीतकार राम सम्पंथ ने निर्देशक राकेश रोशन को अदालत का दरवाज़ा दिखलाया था जब संगीतकार राजेश रोशन ने राम सम्पथ की धुन चुरा कर फ़िल्म "क्रेजी ४" में इस्तेमाल किया था. पॉप और सूफी गायक रब्बी ने आरोप लगाया है फ़िल्म 'सॉरी भाई' के एक गाने की धुन उनकी रचना की हुबहू नक़ल है. फ़िल्म के संगीतकार हैं गौरव दयाल. अदालत ने फ़िल्म के प्रदर्शन पर से तो रोक हटा ली है पर निर्माता वाशु भगनानी से जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया है. वाशु का कहना है कि उन्हें इस बाबत जानकारी नही थी. उन्हें गौरव ने धुन अपनी कह कर सुनवाई थी, पर वो रब्बी को जरूरी मुहवाजा देने को तैयार हैं, यदि उनकी बात सही पायी गई तो. आए दिन आने वाली चोरी की इन खबरों से संगीत जगत स्तब्ध है.


प्रसून एक गायक भी

गीतकार प्रसून के लिखे गीतों से हम सब वाकिफ हैं, पर बहुत कम लोग जानते है कि वो उन्होंने उस्ताद हफीज अहमद खान से शास्त्रीय संगीत की दीक्षा भी ले रखी है.उनके उस्ताद उन्हें ठुमरी गायक बनाना चाहते थे. उन दिनों को याद कर प्रसून बताते हैं कि उनके पास रियाज़ का समय नही होता था, तो बाईक पर घर लौटते समय गाते हुए आते थे और उनका हेलमेट उनके लिए "अकॉस्टिक" का काम करता था. प्रसून संगीत को अपना उपार्जन नही बना पाये. उनके पिता उन्हें प्रशासन अधिकारी बनाना चाहते थे पर ये उनका मिजाज़ नही था, तो MBA करने के बाद आखिरकार विज्ञापन की दुनिया में आकर उनकी रचनात्मकता को जमीन मिली. बचपन से उन्हें हिन्दी और उर्दू भाषा साहित्य में रूचि थी. उनके शहर रामपुर के एक पुस्तकालय में उर्दू शायरों का जबरदस्त संकलन मौजूद था. मात्र १७ साल की उम्र में उनका पहला काव्य संकलन आया. कविता अभी भी उनका पहला प्रेम है. प्रसून मानते हैं कि यदि संगीत के किसी एक घटक की बात की जाए जो आमो ख़ास सब तक पहुँचता हो और जहाँ हमने विश्व स्तर की निरंतरता बनाये रखी हो तो वो गीतकारी का घटक है. ५० के दशक से आज तक फ़िल्म जगत के गीतकारों ने गजब का काम किया है. "हम तुम", "फ़ना" और "तारे जमीन पर" जैसी फिल्मों के गीत लिख कर फ़िल्म फेयर पाने वाले प्रसून तारे ज़मीन पर के अपने सभी गीतों को अपनी बेटी ऐश्निया को समर्पित करते हैं, और बताते हैं कि किस तरह एक ८० साल के बूढे आदमी ने उनके लिखे "माँ" गीत की तारीफ करते हुए उनसे कहा था कि वो अपनी माँ को बचपन में ही खो चुके थे, गाने के बोल सुनकर उन्हें उनका बचपन याद आ गया. ऐ आर रहमान के साथ गजिनी में काम कर रहे प्रसून से जब रहमान गीत को आवाज़ देने की "गुजारिश" की तो प्रसून ने बड़ी आत्मीयता से कहा कि जिस दिन आप धाराप्रवाह हिन्दी बोलने लगेंगे उस दिन मैं आपके लिए अवश्य गाऊंगा.देखते हैं वो दिन कब आता है.


मैं ऐक्टर तो नही....मगर...

लीजिये एक और गायक /संगीतकार का काम अब एक्टिंग की दुनिया से जुड़ने वाला है. विश्वास कीजिये हमारे बप्पी दा यानी कि मशहूर संगीतकार और गायक बप्पी लहरी अब फिल्मों में अभिनय करते नज़र आयेंगे. "इट्स रोक्किंग दर्द ऐ डिस्को" नाम से बन रही इस फ़िल्म में बप्पी दा प्रमुख किरदार निभा रहे हैं साथ ही गायन और संगीत भी उन्हीं का है. इसके अलावा वो सलमान और करीना की आने वाली फ़िल्म "मैं और मिसेस खन्ना" में भी एक प्रमुख रोल में नज़र आयेंगे. चौकिये मत अभी ये सूची और लम्बी होने वाली है. इंडियन आइडल अभिजीत सावंत नज़र आयेंगें आने वाली फ़िल्म "लूटेरे" में, तो आनंद राज आनंद और सुखविंदर के भी बारे में भी ख़बर आई है कि वो भी जल्द ही फिल्मों अपना अभिनय कौशल दिखलायेंगे. लगता है हमारे संगीत सितारों को "हिमेशिया सरूर" हो गया है

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