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Sunday, July 7, 2013

‘बलमा मोरे तोरे संग लागली प्रीत...’ : राग बागेश्री का सौन्दर्य


स्वरगोष्ठी – 127 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 7

मन्ना डे ने बागेश्री के सुरों में गाया- ‘जा रे बेईमान तुझे जान गए...’



इन दिनों ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’। इस श्रृंखला की सातवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों की इस महफिल में उपस्थित हूँ और आपका अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपको राग-आधारित कुछ ऐसे फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं, जो छः दशक से भी पूर्व के हैं। रागों के आधार के कारण ये गीत आज भी सदाबहार गीत के रूप में हमारे बीच प्रतिष्ठित हैं। परन्तु इनके संगीतकार हमारी स्मृतियों में धूमिल हो गए हैं। इस श्रृंखला को प्रस्तुत करने का उद्देश्य ही यही है कि इन कालजयी, राग आधारित गीतों के माध्यम से हम उन भूले-बिसरे संगीतकारों को स्मरण करें। आज के अंक में हम 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘प्राइवेट सेक्रेटरी’ का राग बागेश्री पर आधारित एक मधुर फिल्मी गीत सुनेगे और इस गीत के संगीतकार डी. दिलीप का स्मरण करेंगे। इसके साथ ही सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर से इसी राग में निबद्ध एक मनमोहक बन्दिश भी सुनेगे। 



दिलीप ढोलकिया
पाँचवें से आठवें दशक तक हिन्दी और गुजराती फिल्मों के संगीत से जुड़े डी. दिलीप का वास्तविक नाम दिलीप ढोलकिया है। जूनागढ़, गुजरात में 15 अक्तूबर, 1921 में जन्में दिलीप ढोलकिया ने बचपन में ही बाँसुरी और पखावज वादन की शिक्षा प्राप्त की थी। उनके दादा जी पण्डित मणिशंकर ढोलकिया अपने समय के विख्यात कीर्तनकार थे। वे सात वर्ष की आयु से ही जूनागढ़ के स्वामीनारायण मन्दिर में अपने दादा जी के साथ कीर्तन मण्डली में गायन और तबला, पखावज वादन करने लगे थे। दिलीप ढोलकिया के पिता भोगीलाल ढोलकिया कुशल बाँसुरी वादक थे। समृद्ध सांगीतिक परिवेश पाले-बढ़े बालक दिलीप ने बाद में संगीतज्ञ पण्डित पाण्डुरंग अम्बेडकर से विधिवत संगीत सीखा, जो स्वयं विख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमान अली खाँ के शिष्य थे। संगीत से लगाव के कारण उन्होने 1944 में मुम्बई (तब बम्बई) का रुख किया। आरम्भ में दिलीप ढोलकिया ने रेडियो और एच.एम.वी. के लिए गीत गाये। 1944 की फिल्म ‘किस्मतवाला’ में शान्तिकुमार देसाई और रतन लाल के संगीत निर्देशन में और 1946 की फिल्म ‘लाज’ में रामचन्द्र पाल के संगीत निर्देशन में गीत गाये। बाद में संगीतकार चित्रगुप्त के सहायक हो गए और उनके संगीत निर्देशन में बनी फिल्म ‘भक्त पुण्डलीक’ में भी गीत गाये।

मन्ना डे
1951 में प्रदर्शित गुजराती फिल्म ‘दिवाद्दाण्डी’ में पहली बार पार्श्वगायन किया। 1951 से 1960 के दौरान उनकी पहचान सहायक संगीतकार के रूप में बनी। स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का पहला अवसर उन्हें 1956 में बनी फिल्म ‘बगदाद की रातें’ में मिला। परन्तु इस फिल्म का प्रदर्शन इसके निर्माण के छः वर्ष बाद हुआ। फिल्म में कर्णप्रिय संगीत के बावजूद दिलीप ढोलकिया को तत्काल कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। इस बीच 1960 में तेलुगू फिल्मों के सुप्रसिद्ध अभिनेता एन.टी. रामाराव अभिनीत फिल्म ‘भक्ति महिमा’ में स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का अवसर मिला। उन्होने इस फिल्म में 16 मोहक गीतों की संगीत रचना की थी। 1961 में फिल्म ‘सौगन्ध’ और ‘तीन उस्ताद’ के स्वरबद्ध गीत दिलीप ढोलकिया की प्रतिभा को रेखांकित करने में सफल रहे। 1962 में उनके संगीत से सजी सर्वाधिक उल्लेखनीय फिल्म ‘प्राइवेट सेक्रेटरी’ का प्रदर्शन हुआ। इस फिल्म के गीत अपनी मधुरता और रागों के आधार के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हुए। अशोक कुमार और जयश्री गडकर अभिनीत इस फिल्म के गीतों को मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। आज हमारी चर्चा में इसी फिल्म का एक गीत- ‘जा रे बेईमान तुझे जान लिया...’ है, जिसे दिलीप ढोलकिया ने राग बागेश्री के स्वरों में पिरोया था। प्रेम धवन के गीत को मन्ना डे ने एकताल और दादरा में अपने पूरे कौशल के साथ गाया है। आप पहले यह गीत सुनिए।
  
राग बागेश्री : फिल्म प्राइवेट सेक्रेटरी : ‘जा रे बेईमान तुझे जान लिया...’ : संगीत – दिलीप ढोलकिया



राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ लोग इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त है। इस राग को काफी थाट से सम्बद्ध माना जाता है। राग के वर्तमान प्रचलित स्वरूप के आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है। कुछ प्रयोक्ता आरोह में पंचम स्वर वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्यति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन आदर्श माना जाता है। इस राग में श्रृंगारपूर्ण रचनाएँ खूब फबतीं हैं।

मालिनी राजुरकर
अब हम आपको राग बागेश्री की एक मोहक बन्दिश का रसास्वादन कराते हैं। द्रुत तीनताल में प्रस्तुत इस खयाल रचना के बोल हैं- ‘बलमा मोरे तोरे संग लागली प्रीत...’। इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, उनके मधुर स्वर में सुनिए, राग बागेश्री में निबद्ध यह रचना और मुझे इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

   
राग बागेश्री : ‘बलमा मोरे तोरे संग लागली प्रीत...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 127वीं संगीत पहेली में हम आपको वाद्य संगीत का द्रुत लय में प्रस्तुत एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – संगीत के इस अंश में प्रयुक्त ताल का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 129वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 125वीं संगीत पहेली में हमने आपको छठें दशक की फिल्म ‘धूल का फूल’ के एक राग आधारित गीत से सितार वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग काफी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। पहेली में सुनवाए गए हिस्से में तीनताल का प्रयोग हुआ है, जबकि गीत के अगले हिस्से में कहरवा ताल का प्रयोग भी हुआ है। दोनों प्रश्नो के उत्तर हमारे नियमित प्रतिभागी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के अगले अंक में हम आपको एक और भूले-बिसरे संगीतकार का परिचय देते हुए उनका संगीतबद्ध एक मोहक गीत लेकर उपस्थित होंगे। आप भी हमारी आगामी कड़ियों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 

   
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र
 

Sunday, March 10, 2013

रागमाला के रंग एस एन त्रिपाठी के सुरों के संग



स्वरगोष्ठी – 111 में आज

रागमाला – 1

‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ : संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी जन्मशती पूर्णता पर विशेष



‘स्वरगोष्ठी’ की एक नई श्रृंखला- ‘रागमाला’ के नए अंक के साथ आज एक बार फिर मैं कृष्णमोहन मिश्र संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में उपस्थित हूँ। इस लघु श्रृंखला के लिए हमें अनेक संगीत-प्रेमियों के, विशेष रूप से संगीत की शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों की कई फरमाइशें प्राप्त हुई हैं। कुछ संगीत-प्रेमियों ने तो रागमाला के कुछ अपनी पसन्द के गीत भी भेजे हैं। उन सभी संगीत-प्रेमियों के प्रति आभार प्रदर्शित करते हुए हम यह आश्वासन देते हैं कि इस श्रृंखला में हम इन्हें उनके नाम के साथ प्रकाशित/प्रसारित करेंगे। श्रृंखला का आज के पहले अंक का रागमाला गीत लखनऊ के चार संगीत के विद्यार्थियों- गुंजा सिंह, आरती खत्री, यश शुक्ला और सैयद आमिर अली ने उपलब्ध कराया है और रागमाला श्रृंखला में शामिल करने का अनुरोध किया है। इनके अनुरोध पर आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का बेहद चर्चित रागमाला गीत।


फिल्म संगीत में मेलोडी से परिपूर्ण और राग आधारित गीतों की दृष्टि से पाँचवें दशक के उत्तरार्द्ध से लेकर सातवें दशक के पूर्वार्द्ध की अवधि महत्त्वपूर्ण है। इस अवधि में हजारों मधुर और कालजयी गीतों की रचना हुई। इसी अवधि में एक सफल संगीतकार के रूप में श्रीनाथ त्रिपाठी (एस.एन. त्रिपाठी) का नाम तेजी से उभरा। ऐतिहासिक और और पौराणिक फिल्मों के सर्वाधिक सफल संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने फिल्मों में संगीतकार के अलावा अभिनेता, निर्माता और निर्देशक के रूप में भी अपना योगदान किया था। 14 मार्च, 1913 को कला और संस्कृति की राजधानी काशी नगरी (वाराणसी) में जन्मे श्री त्रिपाठी का जन्मशती वर्ष आज से तीन दिन बाद ही पूर्ण हो रहा है। इस महान संगीतकार को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से स्वरांजलि अर्पित करने के उद्देश्य से ही हमने आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में उन्हीं का स्वरबद्ध किया गीत चुना है। एस.एन. त्रिपाठी के फिल्म जगत में प्रवेश के प्रसंग का उल्लेख फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने अपनी पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ में करते हुए लिखते हैं- “जीवन नैया’ में श्रीनाथ त्रिपाठी (जो बाद में एस.एन. त्रिपाठी के नाम से मशहूर संगीतकार हुए) को पहला मौका मिला गायक के रूप में। उन्होंने इस फ़िल्म में अभिनय भी किया और “ए री दैया लचक लचक चलत मोहन आवे, मन भावे...” गीत गाया। त्रिपाठी ने इलाहाबाद से बी.एससी की डिग्री पूरी करने के बाद मॉरिस म्यूजिक कॉलेज, लखनऊ (वर्तमान, भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। लखनऊ की ही मैना देवी से उन्होंने उपशास्त्रीय संगीत और लोक-संगीत की तालीम भी ली थी। मॉरिस कॉलेज से ‘संगीत विशारद’ और प्रयाग संगीत समीति से ‘संगीत प्रवीण’ की उपाधि प्राप्त करने के बाद त्रिपाठी बॉम्बे टॉकीज़ में वायलिन वादक के रूप में सरस्वती देवी के ऑरकेस्ट्रा में भर्ती हो गए और 1938 तक यहाँ रहे। इसके बाद उन्होंने अपनी स्वतंत्र संगीतकार की पारी शुरु की”। स्वतंत्र संगीत-निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म ‘चन्दन’ (1939) थी। लघु श्रृंखला ‘रागमाला’ के आज पहले अंक के लिए हमने एस.एन. त्रिपाठी के संगीत-निर्देशन में 1962 में बनी संगीत प्रधान फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का एक गीत चुना है।

शीर्षक के अनुरूप यह फिल्म संगीत सम्राट की उपाधि से अलंकृत तानसेन के जीवन पर आधारित इस फिल्म में एस.एन. त्रिपाठी ने रागों के विविध स्वरूप से प्रसंगों को सुसज्जित किया था। फिल्म का एक प्रसंग ऐसा है जिसमे तानसेन को उनके गुरु स्वामी हरिदास के आश्रम में संगीत का अभ्यास करते दिखाया गया है। एक के बाद एक कुल छह रागों के मेल से बने लगभग आठ मिनट के इस रागमाला गीत के माध्यम से तानसेन की बाल्यावस्था से लेकर युवावस्था तक के विकास को दिखाया गया है। प्रसंगों के क्रमशः उल्लेख में सरलता के लिए पूरे गीत को तीन भागों में बाँट कर हम प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले हम आपके लिए रागमाला गीत का पहला दो अन्तरा प्रस्तुत कर रहे हैं। गीत का आरम्भ राग बहार के स्वरों में गूँथे गीत- ‘टूट गई मेरे मन की वीणा...’ से होता है। इन पंक्तियों के दौरान बालक तन्ना (तानसेन) को संगीत का अभ्यास करते दिखाया गया है। राग बहार की पंक्तियाँ समाप्त होते ही राग बागेश्वरी अथवा बागेश्री का आलाप आरम्भ हो जाता है। गीत का अगला भाग- ‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ है, जिसके लिए संगीतकार ने राग बागेश्री के स्वरों का उपयोग किया है। गीत का यह हिस्सा आरम्भ होते ही बालक तन्ना किशोर हो जाता है। लीजिए, रागमाला गीत के इन आरम्भिक दो हिस्सों का आनन्द लीजिए।


राग बहार और बागेश्वरी : ‘टूट गई मेरे मन की वीणा...’ और ‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ : पूर्णिमा सेठ और पंढारीनाथ कोल्हापुरे




गीत के अगले भाग में राग यमन कल्याण का स्पर्श है। दरअसल रागमाला गीत का यह भाग एक प्राचीन ध्रुवपद रचना है। यह मान्यता है कि इस ध्रुवपद की रचना स्वामी हरिदास ने की थी। इस रचना में संगीत के प्राचीन सिद्धान्तों का उल्लेख किया गया है। फिल्म में गीत के इस भाग के आरम्भ में किशोर आयु के तानसेन को अपने गुरु स्वामी हरिदास के सम्मुख अभ्यास करते दिखाया गया है। इस ध्रुवपद के अन्तरे में ही किशोर तानसेन युवा (भारतभूषण) रूप में परिवर्तित होते हैं। वयस्क तानसेन की भूमिका अभिनेता भारतभूषण निभाई है, जिनके लिए पार्श्वगायन किया, सुप्रसिद्ध गायक मन्ना डे ने। गीत का अगला अर्थात चौथा भाग पारम्परिक गुरुवन्दना है, जो राग केदार के स्वरों पर आधारित है। फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के इस रागमाला गीत के तीसरे और चौथे भाग को अब हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग यमन कल्याण और केदार : ‘सप्तसुरन तीन ग्राम...’ और गुरुवन्दना : मन्ना डे और साथी


रागमाला गीत के अगले तीन अन्तरों में राग भैरव और मेघ मल्हार के स्वरों का प्रयोग किया गया है। इस प्रसंग में स्वामी हरिदास, तानसेन को विभिन्न रागों के लक्षण बताने का आदेश देते हैं। तानसेन पहले राग भैरव और फिर मेघ मल्हार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। तानसेन की इन प्रस्तुतियों से स्वामी हरिदास सन्तुष्ट हो जाते हैं राधाकृष्ण की प्रतिमा को नमन करने का आदेश देते हैं। गुरु और गोविन्द दोनों को एक साथ सम्मुख देख कर कुछ क्षणों तक तानसेन थोड़ा विचलित होते हैं, किन्तु गुरु के महत्त्व को सर्वोपरि रखते हुए अत्यन्त प्रचलित दोहा- ‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े...’ का गायन करते हुए स्वामी हरिदास के चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं। यह दोहा भी राग मेघ मल्हार के स्वरों में पिरोया गया है। आइए इस रागमाला गीत अन्तिम भाग भी सुनते हैं। इस रागमाला गीत में पारम्परिक रचनाओं के अलावा अन्य सभी गीतों की रचना गीतकार शैलेन्द्र ने की थी।



राग भैरव और मेघ मल्हार : लक्षण गीत और दोहा ‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े...’ : मन्ना डे 

 


आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ की 111वीं संगीत पहेली में हम आपको एक रागमाला फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह अंश किस राग पर आधारित है?

2 – प्रस्तुत संगीत के अंश के उत्तरार्द्ध में गायन के साथ एक वाद्य की जुगलबन्दी भी की गई है। आपको उस वाद्य का नाम बताना है।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 113वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ के 109वें अंक में हमने आपको फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ से मन्ना डे और लता मंगेशकर के गाये एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ललित और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, बैंगलुरु के पंकज मुकेश और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ यह श्रृंखला हमने अपने कई नियमित पाठकों के अनुरोध पर प्रस्तुत किया है। आज के अंक में प्रस्तुत किया गया रागमाला गीत का आडियो हमें लखनऊ के संगीत-विद्यार्थियों- गुंजा सिंह, आरती खत्री, यश शुक्ला और सैयद आमिर अली ने भेजा था। आगामी अंक में भी हम आपको एक फिल्मी रागमाला गीत सुनवाएँगे और उसमें सम्मिलित रागों पर आपसे चर्चा करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


कृष्णमोहन मिश्र


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