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सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

खिजां के फूल पे आती कभी बहार नहीं...जब दर्द में डूबी किशोर की आवाज़ को साथ मिला एल पी के सुरों का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 507/2010/207

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत से सजी फ़िल्मों के गानें उन्ही पर केन्द्रित लघु शृंखला 'एक प्यार का नग़मा है' के अंतर्गत। आज के अंक में आवाज़ किशोर कुमार की। सन् १९६९ में एक हिट फ़िल्म आयी थी 'दो रास्ते', जिसके गीतों ने भी ख़ूब धूम मचाये, और आज भी अक्सर कहीं ना कहीं से सुनाई दे जाते हैं। फ़िल्म के सभी गानें अलग अलग मूड के थे और हर गीत लोकप्रिय हुआ था। लता का गाया "बिंदिया चमकेगी" और "अपनी अपनी बीवी पे सबको ग़ुरूर है", लता-रफ़ी का "दिल ने दिल को पुकारा मुलाक़ात हो गई", रफ़ी का "ये रेश्मी ज़ुल्फ़ें", मुकेश का "दो रंग दुनिया के और दो रास्ते" जैसे गानों के साथ साथ एक ग़मज़दा नग़मा भी था किशोर दा का गाया हुआ। उन दिनों रफ़ी और मुकेश ही पार्श्वगायकों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। लेकिन किशोर कुमार तेज़ी से लोकप्रियता के पायदान चढ़ते जा रहे थे और ७० के दशक में जाकर पूरी तरह से छा गए और लगभग सभी समकालीन नायकों की आवाज़ बन गए। 'दो रास्ते' में किशोर दा का गाया गीत था "ख़िज़ाँ के फूल पे आती कभी बहार नहीं, मेरे नसीब में ऐ दोस्त तेरा प्यार नहीं"। फ़िल्म संगीत के इतिहास का यह एक यादगार ग़मगीन गीत है और ख़ास कर जब भी किशोर दा के गाए सैड सॊंग्स की बात चलती है तो इस गीत का ज़िक्र करना अनिवार्य हो जाता है। आनंद बक्शी साहब का ख़ास स्टाइल इस गीत के बोलों में महसूस किया जा सकता है। और रही बात एल.पी के संगीत की, तो जिस तरह से थिरकन और ज़बरदस्त ऒर्केस्ट्र्शन वाले गीतों से वो लोगों को झूमने और थिरकने पर मजबूर कर देते हैं, इस गीत के ज़रिए उन्होंने यह साबित किया कि इस तरह के ग़मज़दा गीतों से भी वो सुनने वालों को सम्मोहित कर सकते हैं। हास्य रस और ख़ुशी के गीत गाने वाले किशोर कुमार, ज़्यादातर प्यार और मिलन के अंदाज़ के गीत लिखने वाले आनंद बक्शी, और ज़्यादातर थिरकदार गानें कम्पोज़ करने वाले एल.पी, ये तीनों साथ में मिल कर प्रस्तुत गीत की रचना की जिसे हम अंग्रेज़ी में "a sad song par excellence" भी कह सकते हैं। यह गीत इन तीनों महान कलाकारों की वर्सेटाइल प्रतिभा का परिचय देता है।

दोस्तों, आइए आज फिर से एक बार रुख़ करें प्यारेलाल जी के उसी इंटरव्यु की तरफ़ और आज उस अंश को पढ़ें जिसमें आज के प्रस्तुत गीत का ज़िक्र छिड़ा है।

कमल शर्मा: किशोर दा से जुड़ी कोई ख़ास बात, किसी गाने की रेकॊर्डिंग से जुड़ी कोई बात याद है आपको?

प्यारेलाल: यह जो गाना है "ख़िज़ाँ के फूल पे आती कभी बहार नहीं, मेरे नसीब में ऐ दोस्त तेरा प्यार नहीं", इससे पहले हमने गाना रेकॊर्ड किया था उनका "फूल आहिस्ता फेंको", मुकेश जी गाये, और ये आये थे शाम को, इनको रात की फ़्लाइट पकड़नी थी। तो मुखड़ा बनाया हुआ था "ख़िज़ाँ के फूल", अंतरा नहीं बनाया था। तो वहीं बैठ के लक्ष्मी जी ने, मैं इधर बैठ कर म्युज़िक ये कर रहा था, वहाँ बैठे बैठे बक्शी जी ने अंतरा लिखा, वहीं अंदर बैठ कर लक्ष्मी जी कम्पोज़ कर रहे थे। और यह गाना रात को १२:३० बजे हमने, मतलब, ८:३० बजे शुरु किया और १२:३० बजे यह गाना खतम किया। तो आप देखिए यह गाना वण्डरफ़ुल बना है।

सचमुच, इतने कम समय में यह गाना बना, फिर भी कालजयी बन कर रह गया है। इसी से यह प्रमाणित होता है कि अच्छे काम के लिए वक़्त नहीं बल्कि प्रतिभा और सृजनशीलता का होना ज़्यादा ज़रूरी है। और फ़िल्म जगत को ऐसे गुणी और महान कलाकार मिले हैं समय समय पर, जिन्होंने इस सुरीले ख़ज़ाने को समृद्ध किया है आने वाली पीढ़ियों के लिए, सुनने वालों के लिए। लीजिए इस गीत का आनंद उठाइए किशोर दा की दर्द भरी आवाज़ में। फ़िल्म 'दो रास्ते' का यह गीत फ़िल्माया गया है अभिनेता राजेश खन्ना पर।



क्या आप जानते हैं...
कि लक्ष्मीकांत ने ५० के दशक के कई मशहूर गीतों में मैंडोलिन बजाया था, उदाहरण स्वरूप फ़िल्म 'लाजवन्ती' के "कोई आया धड़कन कहती है" में उनका बजाया मैंडोलिन आज तक हमें चमत्कृत कर देता है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०६ /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के पहले इंटर ल्यूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - गायिका हैं लता मंगेशकर

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम ऐसा है जिसके आने से बच्चों को बड़ा डर सताता है, नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म में थे विनोद खन्ना, अभिनेत्री बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह श्याम कान्त जी आगे निकल आये हैं....८ अंकों पर शरद जी हैं अभी भी ६ अंकों पर. अमित जी ३ अंकों पर आ गए हैं. पी सिंह जी ने भी एक अंक जोड़ लिया अपने खाते में....बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

रविवार, 17 अक्तूबर 2010

राम जी की निकली सवारी....आईये आज दशहरे के दिन श्रीराम महिमा गायें बख्शी साहब और एल पी के सुरों में डूबकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 506/2010/206

'आवाज़' के सभी दोस्तों को विजयदशमी और दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए हम शुरु कर रह रहे हैं इस सप्ताह के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का सफ़र। यह त्योहार अच्छाई का बुराई पर जीत का प्रतीक है। आज ही के दिन भगवान राम ने रावण का वध कर सीता को मुक्त करवाया था। नवरात्री का समापन और दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन से आज दुर्गा पूजा का भी समापन होता है। नवरात्रों में गली गली राम लीला का आयोजन किया जाता है और ख़ास आज के दिन तो रावण-मेघनाद-कुंभकर्ण के बड़े बड़े पुतले बनाकर उन्हें जलाया जाता है। वही बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक! दोस्तों, आज जब इस वक़्त चारों तरफ़ इस बेहद महत्वपूर्ण त्योहार की धूम मची हुई है, तो ऐसे में 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का भी कर्तव्य हो जाता है कि इसी त्योहार और हर्षोल्लास के वातावरण को ध्यान में रखते हुए कोई सटीक गीत चुनें। जैसा कि इन दिनों आप सुन रहे हैं कि हम सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के स्वरबद्ध गीतों की लघु शृंखला प्रस्तुत कर रहे हैं, तो ऐसे में आज के दिन फ़िल्म 'सरगम' के उस गीत के अलावा और कौन सा उपयुक्त गीत होगा! मोहम्मद रफ़ी साहब और साथियों की आवाज़ों में "राम जी की निकली सवारी, राम जी की लीला है न्यारी न्यारी, एक तरफ़ लछमन एक तरफ़ सीता, बीच में जगत के पालनहारी"। एक बार फिर आनंद बक्शी के साथ जमी थी एल.पी की जोड़ी इस फ़िल्म में और क्या जमी थी साहब, फ़िल्म का एक एक गीत सुपर-डुपर हिट। अगर यह कहा जाए कि इस फ़िल्म के गीत संगीत की वजह से ही यह फ़िल्म इतनी कामयाब रही तो शायद ग़लत ना होगा। जैसा फ़िल्म का शीर्षक है, इस शीर्षक का पूरा पूरा मान रखा है लक्ष्मी-प्यारे की सुरीली जोड़ी ने।

'सरगम' सन् १९७९ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण एन.एन. सिप्पी ने किया था। फ़िल्म के लेखक और निर्देशक थे दक्षिण के जाने माने के. विश्वनाथ। यह फ़िल्म दरअसल तेलुगु फ़िल्म 'सिरि सिरि मुव्वा' (१९७६) का रीमेक था, जिसने अभिनेत्री जया प्रदा को दक्षिण में स्टार बना दिया था। और 'सरगम' से ही जया प्रदा का हिंदी फ़िल्मों में भी पदार्पण हुआ और फिर हिंदी फ़िल्म जगत पर भी वो छा गईं। इस फ़िल्म में उनका किरदार एक गूंगी नृत्यांगना का था और उनके नायक थे ऋषी कपूर। अन्य चरित्रों में थे शशिकला (सौतेली माँ), श्रीराम लागू (पिता), असरानी (नृत्य शिक्षक), केष्टो मुखर्जी, शक्ति कपूर, अरुणा ईरानी और विजय अरोड़ा। इस फ़िल्म के संगीत के लिए लक्ष्मी-प्यारे को उस साल के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। फ़िल्म के सभी गानें रफ़ी साहब के गाये हुए थे, जिनमें से तीन गीतों में लता जी की आवाज़ थी ("डफ़ली वाले", "कोयल बोली", "पर्बत के इस पार")। फ़िल्म ने कुछ ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि बॊक्स ऒफ़िस पर १९७९ की तीसरी कामयाब फ़िल्म सिद्ध हुई थी 'सरगम'। ऋषी कपूर तो एक स्थापित नायक थे ही, इस फ़िल्म ने जया प्रदा को भी बम्बई में स्टार का स्टेटस दिलवा दिया। इस फ़िल्म को भले ही फ़िल्मफ़ेयर में एक ही पुरस्कार मिला हो, लेकिन नामांकन कई सारे मिले थे जैसे कि सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (असरानी) और सर्वश्रेष्ठ गीतकार (आनंद बक्शी - "डफ़ली वाले" गीत के लिए)। तो आइए दोस्तों, निकल पड़ते हैं राम जी की सवारी के साथ हम भी, आप सभी को एक बार फिर से दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ। हम यही कामना करते हैं कि हम सब के अंदर की बुराई का नाश हो, सब में अच्छाई पले, और यह संसार एक स्वर्गलोक में बदल जाए।



क्या आप जानते हैं...
कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को बतौर स्वतंत्र संगीतकार सन् १९६१ में फ़िल्म 'तुमसे प्यार हो गया' के लिये अनुबंधित किया गया था, लेकिन यह फ़िल्म आज तक डिब्बे में बंद पड़ी है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०५ /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के पहले इंटरल्यूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - गायक हैं किशोर कुमार

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म के नाम में एक अंक का नाम आता है, फिल्म बताएं - १ अंक
सवाल ३ - किस सुपर स्टार अभिनेता पर फिल्माया गया है ये गमजदा गीत - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
पहले तो एक भूल सुधार. गीत "गोरे गोरे चंद से मुख पर" राजा महदी अली खान साहब ने नहीं लिखा, जैसा कि आलेख में लिखा गया है और जैसा अमूमन समझा गया है. इसे आरज़ू लखनवी साहब ने लिखा है, हालाँकि बिट्टू जी ने सही जवाब दिया था, पर हमने प्रतिभा जी को अंक दे दिए थे. अवध जी ने भूल सुधार करवाई, जिसके लिए उनका आभार, पहली श्रृखला में कौन बाज़ी मारेगा, ये देखना दिलचस्प होगा. ५ एपिसोड्स के बाद स्कोर कुछ इस तरह है - शरद जी - ६, श्याम कान्त जी ६, बिट्टू और अमित जी २-२ पर, और पी सिंह, अवध, जी, प्रतिभा जी, और पवन कुमार जी १-१ अंक लिए हैं. सभी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

गोरे गोरे चाँद से मुख पर काली काली ऑंखें हैं ....कवितामय शब्द और सुंदर संगीत संयोजन का उत्कृष्ट मेल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 505/2010/205

'एक प्यार का नग़मा है', दोस्तों, सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के स्वरबद्ध गीतों से सजी यह लघु शृंखला इन दिनों आप सुन और पढ़ रहे हैं 'आवाज़' के सांध्य-स्तंभ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। एल.पी एक ऐसे संगीतकार जोड़ी हुए जिन्होंने इतने ज़्यादा फ़िल्मों में संगीत दिया है कि शायद ही कोई ऐसा समकालीन गायक होगा या होंगी जिन्होंने एल.पी के लिए गीत ना गाये होंगे। लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे और आशा भोसले को सुनने के बाद आज बारी है गायक मुकेश की। उधर गीतकारों की बात करें तो आनंद बक्शी साहब ने लक्ष्मी-प्यारे के लिए सब से ज़्यादा गीत लिखे हैं, इसलिए ज़ाहिर है कि इस शृंखला में बक्शी साहब के लिखे कई गीत शामिल होंगे, लेकिन हमने इस बात को भी ध्यान रखा है कि कुछ दूसरे गीतकारों को भी शामिल करें जिन्होंने कम ही सही लेकिन बहुत उम्दा काम किया है एल.पी के साथ। हमनें दो ऐसे गीतकारों की रचनाएँ आपको सुनवाई हैं - राजेन्द्र कृष्ण और भरत व्यास। आज हम लेकर आये हैं राजा मेहन्दी अली ख़ान का लिखा एक गीत फ़िल्म 'अनीता' से। आपको याद होगा कि इस फ़िल्म का एक गीत हम पहले ही इस स्तंभ में सुनवा चुके हैं "तुम बिन जीवन कैसे बीता पूछो मेरे दिल से"। आज प्रस्तुत है मुकेश की ही आवाज़ में इस फ़िल्म का एक और ख़ूबसूरत गीत "गोरे गोरे चाँद से मुख पर काली काली आँखें हैं, देख के जिनको नींद उड़ जाये वो मतवाली आँखें हैं"। जितने सुंदर बोल, उतना ही मीठा कम्पोज़िशन। दोस्तों, कुछ गानें ऐसे होते हैं जो अपने फ़िल्मांकन की वजह से भी याद रह जाते हैं। अब इस गीत को ही लीजिए, यह ना केवल फ़िल्म का पहला गीत है, बल्कि फ़िल्म का पहला सीन भी है। इसी गीत से फ़िल्म शुरु होती है। साधना अपने कमरे में बैठी होती हैं सज सँवरकर, और बाहर से कोई यह गीत गा उठता है। लेकिन उसे कोई नज़र नहीं आता। फिर धीरे धीरे मनोज कुमार को बगीचे में पेड़ के पीछे से दिखता है कैमरा। इस तरह से गीत के ख़त्म होते होते नायिका का पिता घर से बाहर निकल जाता है तो मनोज कुमार साधना के कमरे में दाख़िल हो जाते हैं।

राज खोसला की इस फ़िल्म की कहानी सस्पेन्स से भरी है जिसमें नायिका अनीता के कई चरित्र नज़र आते रहते हैं और पूरी फ़िल्म एक राज़ बना रहता है आख़िर तक। अब जब राज़ की बात छेड़ ही दी है तो चलिए जिन लोगों ने यह फ़िल्म नहीं देखी है, उनके लिए फ़िल्म की थोड़ी सी भूमिका हम दे दें। अमीर बाप की बेटी अनीता (साधना) और ग़रीब नीरज (मनोज कुमार) एक दूसरे से प्यार करते हैं। जब अनीता अपने पिता से नीरज को मिलवाती है तो उसके पिता नीरज को क़बूल नहीं करते, और अनीता को सख़्त निर्देश देते हैं कि वो अनिल शर्मा नामक एक धनवान युवक से शादी कर ले। उसके बाद जब नीरज ने अनीता से सम्पर्क करने की कोशिश की, अनीता ने ही मना कर दिया और आख़िरकार अनिल से शादी कर ली। टूटा हुआ दिल लेकर नीरज वह शहर ही छोड़ देता है, लेकिन फिर भी वो उसे भुला नहीं पाता और दिल के किसी कोने में अपने प्यार की लौ को जलाये रखता है। एक दिन एक सड़क दुर्घटना में अनीता की मौत हो जाती है। जब नीरज को इस बात का पता चलता है तो उसे ज़रबरदस्त धक्का पहुँचता है। फिर एक दिन उसे पता चलता है कि एक औरत जिसकी शक्ल हू-ब-हू अनीता जैसी है एक बड़े होटल में डान्सर है। जब नीरज उसे ढूंढ़ते हुए होटल में जाता है तो अनीता उसे पहचानने से इन्कार कर देती है। (इसी सिचुएशन पर वह गाना है "क़रीब आ कि नज़र फिर मिले मिले ना मिले")। उधर नीरज एक गेरुआ वस्त्र में लिपटी औरत से भी मिलता है जिसकी शक्ल भी हू-ब-हू अनीता से मिलता है। यह औरत किसी आश्रम में सन्यासिन है और वो भी नीरज को पहचानने से इन्कार कर देती है। नीरज को कुछ समझ नहीं आता कि आख़िर माजरा क्या है! नीरज इस रहस्य के तह तक जाने की कोशिश करता है और इसी कोशिश के दौरन उसे पता चलता है कि उसके साथ धोखा हुआ है, प्यार में धोखा, जो उसे मौत की तरफ़ लिए जा रहा है। फ़िल्म के क्लाइमैक्स में क्या होता है, यह तो आप ख़ुद ही देखिएगा कभी, यह फ़िल्म अक्सर 'सब टीवी' पर आती रहती है। फिलहाल आपको सुनवा रहे हैं राजा मेहन्दी अली ख़ान और एल.पी का अन-युज़ुअल कम्बिनेशन का यह गीत फ़िल्म 'अनीता' से, सुनिए।



क्या आप जानते हैं...
कि १९६७ ही वह पहला साल था कि जब लक्ष्मी-प्यारे ने लोकप्रिय गीतों की दौड़ में शंकर जयकिशन को पीछे छोड़ दिया था। एस.जे के 'दीवाना', 'छोटी सी मुलाक़ात', 'गुनाहों का देवता', 'अराउण्ड दि वर्ल्ड', 'हरे कांच की चूड़ियाँ' और 'रात और दिन' जैसी फ़िल्मों के मुक़ाबले एल.पी के 'अनीता', 'फ़र्ज़', 'मिलन', 'शागिर्द', 'नाइट इन लंदन', 'पत्थर के सनम' और 'तक़दीर' के गानें सर चढ़ कर बोले।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०४ /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के प्रिल्यूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - हिंदुस्तान की सबसे मशहूर पौराणिक गाथा का सुन्दर चित्रण है गीत में

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - इस फ़िल्म का एक लता-रफ़ी डुएट उस साल बिनाका गीतमाला का चोटी का गीत बना था। फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - इसी फ़िल्म के संगीत के लिए एल.पी को उस साल का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री का नाम बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह श्याम कान्त जी लगता है इस पहली शृंखला में आप शरद जी को अच्छी टक्कर देने वाले हैं, ४ अंक हुए आपके, प्रतिभा जी बहुत दिनों बाद लौटी हैं सही जवाब के साथ, स्वागत. अमित जी के भी १ अंक से खाता खुला है, बिट्टू जी चूक गए. सुकांत आपकी भावनाओं की हम कद्र करते हैं, धन्येवाद जो आपने इतना मान दिया, मगर अगर आप सारे सवालों के जवाब दे देंगें तो बाकी श्रोता फिर कुछ कह नहीं पायेंगें...बस यही दिक्कत है :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

खत लिख दे संवरिया के नाम बाबू....आशा की मासूम गुहार एल पी के सुरों में ढलकर जैसे और भी मधुर हो गयी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 504/2010/204

क्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीतबद्ध गीतों की शृंखला 'एक प्यार का नग़मा है' की चौथी कड़ी में आज आवाज़ आशा भोसले की। युं तो लक्ष्मी-प्यारे के ज़्यादातर गानें लता जी ने गाए हैं, आशा जी के इनके लिए गीत थोड़े कम हैं। लेकिन जितने भी गानें हैं, उनमें आज जो गीत हम आपको सुनवाने के लिए लाए हैं, वह एक ख़ास मुकाम रखता है। यह है फ़िल्म 'आये दिन बहार के' का गीत "ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू, वो जान जाएँगे, पहचान जाएँगे"। दोस्तों, एक ज़माना ऐसा था कि जब फ़िल्मों में चिट्ठी और ख़त पर गानें बना करते हैं। बहुत से गानें हैं इस श्रेणी के। यहाँ तक कि ९० के दशक में भी ख़त लिखने पर कई गीत बनें हैं, मसलन, फ़िल्म 'खेल' का गीत "ख़त लिखना है पर सोचती हूँ", फ़िल्म 'दुलारा' में "ख़त लिखना बाबा ख़त लिखना", फ़िल्म 'बेख़ुदी' में "ख़त मैंने तेरे नाम लिखा, हाल-ए-दिल तमाम लिखा", फ़िल्म 'जीना तेरी गली में' का "जाते हो परदेस पिया, जाते ही ख़त लिखना" आदि। लेकिन २००० के दशक के आते ही ईमेल क्रांति इस समाज पर ऐसे हावी हो गई कि लोग जैसे काग़ज़ पर ख़त लिखना ही भूल बैठे। ज़रा पीछे मुड़कर देखिए और याद कीजिए कि कब आपने काग़ज़ पर अंतिम बार किसी को पत्र लिखा था। मुझे याद है साल २००३ के बाद ना मैंने अपने किसी मित्र को पत्र लिखा और ना ही किसी रेडियो स्टेशन को, जो मैं बचपन से करता आया हूँ। और दोस्तों, क्योंकि हमारी फ़िल्में हमारे समाज का ही आइना होती हैं, इसलिए ख़तों का ज़िक्र फ़िल्मी गीतों से भी लुप्त हो गया। आज किसी फ़िल्म में ख़त लिखने की बात नहीं होती। दूसरे और पहलुओं की तरह यह कोमल और मासूम सा पहलु भी फ़िल्मी गीतों से ग़ायब हो गया। हमें यक़ीन है कि आज के इस गीत को सुनते हुए आपको वह ख़त लिखने का ज़माना ज़रूर याद आ जाएगा। इस गीत का शुरुआती शेर भी बड़ा ख़ूबसूरत है जिसमें गीतकार आनंद बक्शी साहब कहते हैं कि "अब के बरस भी बीत ना जाए ये सावन की रातें, देख ले मेरी ये बेचैनी और लिख दे दो बातें"।

आशा भोसले ने यह गीत पर्दे पर फ़िल्म की नायिका आशा पारेख के लिए गाया था। आशा जी की आवाज़ की जो ख़ास बातें हैं, जो लचक है, जो शोख़ी है, वो इस गीत में साफ़ साफ़ सुनाई देती है। गीत को सुनते हुए जैसे सचमुच ऐसा लगता है कि कोई गाँव की लड़की ही गीत को गा रही है। शायद उनकी इसी खासियत के लिए एल.पी ने यह गीत लता जी के बजाए आशा जी से गवाना बेहतर समझा। वैसे एल.पी आशा जी से थोड़े दूर दूर ही रहे हैं। लीजिए यही बात प्यारेलाल जी के शब्दों में ही जान लीजिए जो वो बता रहे हैं विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में।

कमल शर्मा: प्यारे जी, लता जी की बहन आशा जी, वो भी बहुत वर्सेटाइल, और उन्होंने भी बहुत योगदान दिया है फ़िल्म संगीत को। और उन्होंने भी गानें आपके संगीत निर्देशन में गाए हैं। आशा जी का कैसे मूल्यांकन करते हैं, कैसे उनकी प्रतिभा का?

प्यारेलाल: क्या बात है, दरअसल क्या है, देखिए, ये दो दो अक्षर जो हैं, ये बहुत कम होते हैं, ये लता जी जो हैं, ऐसे ही मैं आशा जी के लिए बात कर रहा हूँ, वैसे ही रफ़ी साहब। लता, दो अक्षर, आशा, दो अक्षर, रफ़ी, दो अक्षर, ऐसे नहीं, और भी हैं, लेकिन आशा जी की क्या बात है! वैसे हमें कम मौका मिला उनके साथ गाना करने का, और उनके गानें हम जो सुनते हैं, हमारे भी सुनते हैं और भी जो उन्होंने गाये हैं, वो भी सुनते हैं, तो उनमें कितनी ख़ूबियाँ हैं, सब गानें अच्छे, बहुत अच्छे गाये हैं। क्या है ना, हम लोग भी थोड़े से वो हैं, कि जो अच्छे गानें हैं लता जी को दे देते हैं, और जो ऐसे गानें हैं, वो हमारी ग़लती है, लेकिन हमारे लिए जैसे लता जी, वैसे आशा जी। आशा जी को मैं उतनी इज़्ज़त देता हूँ जितनी लता जी को देता हूँ, फ़रक इतना है कि हमने उनके साथ काम कम किया है, लेकिन अगर आप दोनों को तोलें तो दोनों १००% गोल्ड हैं। लता जी अगर लता जी हैं तो आशा जी आशा जी हैं। इतना है कि हम आशा जी से थोड़ा डरते हैं, बहुत ग़ुस्सेवाली हैं वो।

कमल शर्मा: प्यारे जी, कोई गाना जो उन्होंने आपके लिए गाया और आपको बहुत पसंद है?

प्यारेलाल: "ख़त लिख दे"

तो लीजिए दोस्तों, प्यारेलाल जी का फ़ेवरीट आशा नंबर हम सब मिलकर सुनते हैं। फ़िल्म 'आये दिन बहार के' के तमाम डिटेल्स हम पहले ही आपको उस दिन दे चुके हैं जिस दिन इस फ़िल्म का शीर्षक गीत आपको सुनवाया था कड़ी क्रमांक ३७० में। बस इतना बताते चलें कि यह गीत खमाज पर आधारित है।



क्या आप जानते हैं...
कि 'आये दिन बहार के' (१९६६) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत सफ़र की बड़े सितारों वाली पहली महत्वपूर्ण फ़िल्म थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०३ /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के पहले इंटरल्यूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र -१९६७ की फिल्म है ये, और गीत है मुकेश की आवाज़ में, और भी कुछ सूत्र हैं जो नीचे के प्रश्नों में छुपे हैं, ढूंढ निकालिए

सवाल १ - गीतकार वो हैं जिन्होंने मदन मोहन साहब के साथ बहुत अधिक काम किया है, नाम बताएं- १ अंक
सवाल २ - फिल्म का शीर्षक नायिका के नाम पर ही है, नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - नायक, नायिका के चाँद से चेहरे की तारीफ़ कर रहा है गीत में, किस अभिनेता पर फिल्माया गया है ये गीत - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
सुकान्त जी आपका महफ़िल में आना बेहद सुखद लगा, आपने पहेली से पहले कुछ जानकारियाँ भी बांटी, जिसकी हमें हर श्रोता से उम्मीद रहती है, बस जरा नियमों को पढ़ने में चूक कर गए. इस बार तो आपको अंक नहीं दे पायेंगें पर उम्मीद करेंगें कि आप आगे भी सही जवाब देकर हम सब का दिल जीत लेंगें, और शरद जी जो अब ६ अंकों पर हैं उन्हें टक्कर दे पायेंगें बिलकुल वैसे ही जैसे इस वक्त श्याम कान्त (२) जी व अन्य प्रतिभागी दे रहे हैं, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

तुम गगन के चन्द्रमा हो.....प्रेम और समर्पण की अद्भुत शब्दावली को स्वरबद्ध किया एल पी ने उसी पवित्रता के साथ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 503/2010/203

'एक प्यार का नग़मा है' - फ़िल्म संगीत जगत की सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के स्वरबद्ध गीतों से सजी इस लघु शृंखला की तीसरी कड़ी में हम आप सब का स्वागत करते हैं। आनंद बक्शी और राजेन्द्र कृष्ण के बाद आज जिस गीतकार के शब्दों को एल.पी अपने धुनों से सजाने वाले हैं, उस महान गीतकार का नाम है भरत व्यास, जो एक गीतकार ही नहीं एक बेहतरीन हिंदी के कवि भी हैं और उनका काव्य फ़िल्मी गीतों में भी साफ़ दिखाई देता है। व्यास जी ने शुद्ध हिंदी का बहुत अच्छा इस्तेमाल फ़िल्मी गीतों में भी किया और इस तरह से बहुत सारे स्तरीय गीत फ़िल्म जगत को दिए। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ जब उनकी बात चलती है तो एक दम से हमारे दिमाग़ में जिस फ़िल्म का नाम आता है, वह है 'सती सावित्री'। इस फ़िल्म के गानें तो भरत व्यास जी के गीतों की कड़ियों में बहुत बाद में दर्ज हुआ; सन् १९४९ में वे मिले संगीतकार खेमचंद प्रकाश से और इन दोनों ने लुभाना शुरु कर दिया अपने श्रोताओं को। 'ज़िद्दी', 'सावन आया रे', 'तमाशा' आदि फ़िल्मों में इन दोनों ने साथ साथ काम किया। ५० के दशक में भरत व्यास के धार्मिक और ऐतिहासिक फ़िल्मी गीत ख़ूब लोकप्रिय हुए जिनमें 'रानी रूपमती' और 'जनम जनम के फेरे' सब से उल्लेखनीय रहे। हिंदी के जटिल शब्दों को बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ में उन्होंने गीतों में ढाला और आम जनता में उन्हें लोकप्रिय कर दिखाया। १९६४ की फ़िल्म 'सती सावित्री' की बात करें तो इस फ़िल्म के गानें शास्त्रीय रंग लिए हुए हैं जिन्हें लक्ष्मी-प्यारे ने बड़े ही सुंदर तरीके से कॊम्पोज़ किए। इस फ़िल्म के तमाम सुमधुर गीतों में एक युगल गीत था लता मंगेशकर और मन्ना डे का गाया हुआ, जो शुद्ध कल्याण रूपक ताल पर आधारित एक बेहद सुंदर, कोमल, और निष्पाप प्रेम के भावनाओं से सराबोर गीत था। "तुम गगन के चन्द्रमा हो मैं धरा की धूल हूँ, तुम प्रणय के देवता हो मैं समर्पित फूल हूँ"। किसी फ़िल्मी गीत में प्रणय की अभिव्यक्ति का इससे सुंदर और काव्यात्मक उदाहरण और क्या हो सकता है भला!

'सती सावित्री' सन् १९६४ की फ़िल्म थी, यानी कि एल.पी के स्वतंत्र संगीतकर बनने के बाद शुरुआती सालों का एक फ़िल्म। शांतिलाल सोनी निर्देशित इस धार्मिक फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे महिपाल, अंजली देवी, जीवन, बी. एम. व्यास, रामायण तिवारी, अरुणा ईरानी, मोहन चोटी, निरंजन शर्मा आदि। युं तो ऐसा अक्सर देखा गया उस ज़माने में कि जिस कलाकार ने भी धर्मिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में काम किया, उस जौनर की मोहर उन पर लग गई और उसके बाद उस जौनर में से निकल पाना बेहद मुश्किल साबित हुआ। कल्याणजी-आनंदजी ने अपने करीयर के शुरु शुरु में ऐसे कई फ़िल्मों को ठुकरा दिया था इसी डर से। लेकिन लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने यह रिस्क लिया और 'सती सावित्री' में संगीत देने के लिए तैयार हो गए यह जानते हुए भी कि इस फ़िल्म का बाकी जो टीम है वह पूरा का पूरा माइथोलोजिकल जौनर का है। लेकिन शायद यह उनकी काबिलियत ही रही होगी कि वो इस जौनर में नहीं फँसे और अपने वर्सएटायलिटी को बरकरार रखा। और लीजिए अब प्यारेलाल जी के शब्दों में सुनिए आज के प्रस्तुत गीत के बनने की कहानी जो उन्होंने विविध भारती के उसी इंटरव्यू में कहे थे कमल शर्मा को। "एक बात कहूँ मैं, यह जो पिक्चर थी 'सती सावित्री', इसमें एक गाना है, एक पिक्चर बन रही थी भगवान मिस्त्री की, 'राम बाण', या कोई और, ठीक से याद नहीं मुझे, राम के उपर बड़ी पिक्चर बन रही थी, कलर पिक्चर, उसमें एक गाना था, उसमें म्युज़िक दे रहे थे वसंतराव देसाई, और भरत (व्यास) जी गाना लिख रहे थे। अब यह गाना जो है, "तुम गगन के चन्द्रमा हो", मैं इसलिए कह रहा हूँ, कि यह गाना जो है उन्होंने उस फ़िल्म के लिए लिखा था, जिसमें राम और सीता गाते हैं। तो वह गाना ना वहाँ पर हुआ, और एक जगह दे रहे थे भरत जी, वहाँ भी नहीं हुआ, उन्होंने हम लोगों से कहा कि 'बेटे, बहुत प्यार करते थे हम लोगों को, कहने लगे कि तुम लोग यह गाना कॊम्पोज़ करो। तो यह गाना हमने बाद में कॊम्पोज़ किया, लेकिन लिखा पहले है, धुन बाद में बनी।"

और दोस्तों, शायद इसी वजह से इस गीत में जान डल गई है। तो लीजिए पहले राम और सीता के किरदारों के लिए लिखा यह गीत, जो बाद में सावित्री सत्यवान के किरदारों पर फ़िल्माया गया, सुनते हैं लता जी और मन्ना दा की आवाज़ों में। इसे सुन कर एक अजीब सी शांति मिलती है मुझे, क्या आपको भी?



क्या आप जानते हैं...
कि १९६९ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को ईरान में बनने वाली एक फ़िल्म में संगीत देने के लिए अनुबंधित किया गया था। यह ना केवल उनकी उपलब्धि थी बल्कि पूरे देश के लिए गौरव की बात थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०३ /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के प्रीलियूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र -मुखड़े में "खत" शब्द है और नायिका परदेस में बैठे प्रेमी से वापस आने की गुहार कर रही है

सवाल १ - लोक रंग में रंगे इस गीत के गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल २ - गायिका बताएं - १ अंक
सवाल ३ - किस नायिका पर फिल्माया गया था ये गीत - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी सही जवाब, २ अंक और...अवध जी आपका अंदाजा एकदम सही है, बिट्टो जी, आपको भी १ अंक की बहुत बधाई. अमित जी और श्याम कान्त जी....लगे रहिये....शंकर लाल जी मुस्कुरा रहे हैं.....उम्मीद है आज का अतिरिक्त सूत्र आपकी दिक्कतें आसान कर देगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

जो उनकी तमन्ना है बर्बाद हो जा....राजेन्द्र कृष्ण और एल पी के साथ मिले रफ़ी साहब और बना एक बेमिसाल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 502/2010/202

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कल से हमने शुरु की है संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के धुनों से सजी लघु शृंखला 'एक प्यार का नग़मा है'। कल हमने गीतकार आनंद बख्शी की रचना सुनी थी लता मंगेशकर की आवाज़ में। और बख्शी साहब और लता जी, दोनों ने ही लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ अपना सब से ज़्यादा काम किया है। आज हम जिस गीत को लेकर उपस्थित हुए हैं, उसे लिखा है राजेन्द्र कृष्ण साहब ने। रफ़ी साहब की आवाज़ में फ़िल्म 'इंतक़ाम' का यह गीत है "जो उनकी तमन्ना है बरबाद हो जा, तो ऐ दिल मोहब्बत की क़िस्मत बना दे, तड़प और तड़प कर अभी जान दे दे, युं मरते हैं मर जानेवाले, दिखा दे जो उनकी तमन्ना है बरबाद हो जा"। इसमें कोई शक़ नहीं कि लक्ष्मी-प्यारे के इस गीत को रफ़ी साहब ने जिस अंदाज़ में गाया है, उससे गीत का भाव बहुत ख़ूबसूरत तरीक़े से उभरकर सामने आया है, लेकिन इस गीत को समझना थोड़ा मुश्किल सा लगता है। गीत के शब्दों को सुनते हुए दिमाग़ पर काफ़ी ज़ोर लगाना पड़ता है इसमें छुपे भावों को समझने के लिए। लेकिन इससे इस गीत की लोकप्रियता पर ज़रा सी भी आँच नहीं आई है और आज भी बहुत से लोगों का यह फ़ेवरीट रफ़ी नंबर है। यहाँ तक कि सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर का भी। जी हाँ, अभी हाल ही में रफ़ी साहब की पुण्य तिथि पर जब किसी ने लता जी को ट्विटर पर उनके फ़ेवरीट रफ़ी नंबर के बारे में जानना चाहा, तो उन्होंने इसी गीत का ज़िक्र किया था। ख़ैर, हम बात कर रहे थे इस गीत के बोलों का मतलब ना समझ पाने की। तो साहब, अगर बोलों को समझे बग़ैर भी गीत लोकप्रिय हो जाता है तो इसका श्रेय गीतकार को ही जाना चाहिए। राजेन्द्र कृष्ण एक अण्डर-रेटेड गीतकार रहे हैं। आज भी जब किसी भी कार्यक्रम में गुज़रे ज़माने के गीतकारों के नाम लिए जाते हैं, तब इनका नाम मुश्किल से कोई लेता है, जब कि इन्होंने न जाने कितने सुपर डुपर हिट गीत ५० से ७० के दशकों में लिखे हैं।

"जो उनकी तमन्ना है बरबाद हो जा" फ़िल्म के नायक संजय ख़ान पर फ़िल्माया गया गीत है, जो एक 'बार' में शराब के नशे में गा रहे होते हैं। १९६९ में प्रदर्शित 'इंतक़ाम' फ़िल्म का निर्माण शक्तिमान एण्टरप्राइज़ेस के बैनर तले हुई थी और इसका निर्देशन किया था आर. के. नय्यर ने। फ़िल्म के नायक का नाम तो हम बता ही चुके हैं, दूसरे मुख्य किरदारों में थे साधना, अशोक कुमार, और हेलेन। इस फ़िल्म के सभी गानें मक़बूल हुए थे, मसलन "हम तुम्हारे लिए तुम हमारे लिए", "आ जानेजाँ", "गीत तेरे साज़ का तेरी ही आवाज़ हूँ", "कैसे रहूँ चुप के मैंने पी ही क्या है होश अभी तक है बाक़ी" आदि। और आइए अब रुख़ किया जाए प्यारेलाल जी के उसी इंटरव्यू की तरफ़ जिसका एक अंश हमने कल पेश किया था। आज जिस अंश को हम पेश कर रहे हैं उसमें है रफ़ी साहब का ज़िक्र।

कमल शर्मा: रफ़ी साहब से म्युज़िक के अलावा, कभी जैसे किसी गाने की रेकॊर्डिंग् होनेवाली है, कभी जैसे थोड़ी सी फ़ुरसत मिली, बात वात होती थी कि नहीं?

प्यारेलाल: उनको ख़ुश करना हो तो हम दोनों क्या करते थे, कभी कभी आए तो चुप बैठे हैं, तो हमें उनको ख़ुश करना हो तो क्या है कि रफ़ी साहब चाय लेके आते थे, तो उनके लिए चाय जो बनती थी वह किसी को नही देते थे, वो ख़ुद पीते थे। वो थर्मस में आती थी, दो थर्मस। लेकिन वो कैसी चाय बनती थी मैं बताऊँ आपको, दूध को, दो सेर दूध के एक सेर बनाते थे जिसमें बदाम और पिस्ता डालते थे, और उसके बाद में चाय की पत्ती, कोई ख़ास पत्ती थी, वो उनकी बीवी बनाती थीं, और वो चाय लेकर आते थे। और अगर आप थोड़ी देर भी रखेंगे तो मलाई इतनी जम जाती थी। तो हम लोग क्या करते थे कि अगर ख़ुश करना है रफ़ी साहब को तो ख़ुश करने के लिए हम उनको बोलते थे 'थोड़ी चाय मिल जाएगी?' तो ऐसा करते थे कि जैसे कोई छोटा बच्चा है, तो अगर मस्ती कर रहा है कुछ, अरे भाई उसको चॊकलेट दे ना चॊकलेट, तो बोलने का एक स्टाइल होता है ना, तो उनका ज़हीर था उनका साला, 'अरे ज़हीर, चाय देना इनको चाय'। मतलब ये बच्चे लोग हैं ना चाय पिलाओ। बोलने का एक ढंग होता था और चाय पीने के बाद बोलना होता था 'वाह मज़ा आ गया', बस!

दोस्तों, हमने रफ़ी साहब के ख़ास चाय के बारे में जाना, लेकिन आज के गीत का जो आधार है, वह चाय नहीं बल्कि शराब है। रफ़ी साहब कभी शराब को हाथ नहीं लगाते थे, लेकिन जब भी किसी नशे में चूर किरदार के लिए कोई गीत गाते थे तो ऐसा लगता था कि जैसे वो ख़ुद भी शराब पीकर गा रहे हैं। यही तो बात है रफ़ी साहब जैसे महान गायक की। किसी भी मूड के गीत में कैसा रंग भरना है बहुत अच्छी तरह जानते और समझते थे रफ़ी साहब। तभी तो लक्ष्मी-प्यारे ने जब भी कोई ऐसा गीत बनाया जो उन्हें लगा कि सिर्फ़ रफ़ी साहब ही गा सकते हैं, उन्होंने कभी किसी दूसरे गायक से नहीं गवाया, कई बार तो निर्माता निर्देशक से भी बहस करने से नहीं चूके, और अगर रफ़ी साहब विदेश यात्रा पर रहते तो उनके आने का इंतज़ार करते थे कई दिनों तक, लेकिन किसी और से गवाना उन्हें मंज़ूर नहीं होता था। एल.पी की कई ऐसी फ़िल्में हैं जिनमें और बाक़ी गीत दूसरे गायकों ने गाये, लेकिन कोई ख़ास गीत सिर्फ़ और सिर्फ़ रफ़ी साहब से ही गवाया गया। पेश-ए-खिदमत है "जो उनकी तमन्ना है बरबाद हो जा"।



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'इंतक़ाम' का लता का गाया "कैसे रहूँ चुप कि मैंने पी ही क्या है" इतना लोकप्रिय हुआ था कि अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीतमाला का चोटी का गीत बना था। यही नहीं, लगातार चार वर्षों तक लक्ष्मी-प्यारे के गीत बिनाका गीतमाला के चोटी के पायदान पर विराजे जो अपने आप में एक रेकॊर्ड रहा है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०२ /शृंखला ०१
ये धुन उस गीत के प्रीलियूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र -पहले राम और सीता के किरदारों पर लिखा गया था यह युगल गीत, लेकिन वह फ़िल्म नहीं बनी। बाद में एक अन्य फ़िल्म में इसे शामिल किया गया।

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - लता हैं गायिका, गायक बताएं - १ अंक
सवाल ३ - इस धार्मिक फिल्म के नायक बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
दोस्तों, जब भी कोई नया बदलाव होता है, तो कुछ अजीब अवश्य लगता है, पर बदलाव तो नियम है, और केवल बदलाव ही शाश्वत है, हम समझते हैं कि आप में से बहुत से लोग अपने कम्पूटर पर सुन नहीं पाते हैं और अधिकतर हिंदी ब्लॉगर पढकर ही संतुष्ट हो जाते हैं, पर आवाज़ जैसा मंच तो सुनने सुनाने का ही है, तो यही समझिए कि पहेली की रूप रेखा में ये बदलाव सुनने की प्रथा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भी है, तो इंदु जी जल्दी से अपने स्पीकर को ठीक करवा लें, आप पढ़ने के साथ साथ श्रवण और दृश्य माध्यमों से भी जुड़ें, यही हमारे इस मंच की सफलता मानी जायेगी....खैर, हमें जवाब मिले हैं, सही जवाब....तो पहेली के ढांचा ठीक ही प्रतीत हो रहा है, अनाम जी ने लिखा है कि ऐसी कॉम्पटीशन से कोई फायदा नहीं जिसमे हर कोई PARTICIPATE ना कर सके. पर पार्टिसिपेट सभी कर सकते हैं, हाँ अगर आपकी समस्या इंदु जी जैसी कुछ है तो इसका समाधान तो फिलहाल आपको ही निकालना पड़ेगा...आपने दूसरी बात लिखी कि
और अगर कोई हर पहेली में अगर ४ अंक वाला आंसर भी दे तो १००वे एपिसोड तक ४०० ही अंक हुए, तो हम माफ़ी चाहेंगें कि ये लिखने में हुई भूल थी, जिससे आप शंकित हो गए, दरअसल पहेली अब ५०१ वें से १००० वें एपिसोड तक खुली है और इसमें जितनी मर्जी बार चाहें आप ५०० का आंकड़ा छू सकते हैं. भूल सुधार ली गयी है. और कोई श्रोता यदि इस विषय में अपनी राय देना चाहें तो जरूर दें. अब बात परिणाम की - शरद जी खाता खोला २ अंकों के साथ. श्याम कान्त जी और पी सिंह जी आप दोनों को भी १-१ अंकों की बधाई. मनु जी आप तनिक लेट हो गए जवाब देते देते, वैसे अंदाजा एकदम सही था. शंकर लाल जी (अल्ताफ रज़ा ?), बिट्टो जी, अमित जी और अंशुमान जी, better luck next time :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

भोर भये पनघट पे, मोहे नटखट श्याम सताए...ताल सुनिए इस गीत की जिसका ओर्केस्ट्रशन आज के किसी भी गीत को टक्कर दे सकता है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 501/2010/201

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत है आप सभी का फिर एक बार इस सुरीले सफ़र में। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ५०० अंक के पूर्ति पर आपने हमारी ख़ास प्रस्तुति का आनंद लिया होगा, और आज से हम फिर एक बार अपने सुरीले कारवाँ को आगे बढ़ाने के लिए कमर कस कर मैदान में उतर चुके हैं। गुज़रे ज़माने के इन सुरीले मीठे गानों से हमारा दिल कभी नहीं भरेगा, इसलिए यह कारवाँ भी चलता ही रहेगा जब तक उपरवाले को मंज़ूर होगा और जब तक आपका युंही हमें साथ मिलता रहेगा। सरगमी यादों के इस सुहाने सफ़र में आज से हम जो लघु शृंखला शुरु करने जा रहे हैं, वह केन्द्रित है एक संगीतकार जोड़ी पर। यह वो संगीतकार जोड़ी है दोस्तों जिनके गानें कोई रेडियो चैनल, कोई टीवी चैनल, कोई कैसेट - सीडी की दुकान नहीं होगी जहाँ इस जोड़ी के सैंकड़ों गीत मौजूद ना हों। इनके रचे सुरीले गानें गली गली ना केवल उस ज़माने में गूँजा करते थे, बल्कि आज भी हर रोज़ सुनाई देते हैं कहीं ना कहीं से। वक़्त के ग्रामोफ़ोन पर यह सुरीला एल.पी बरसों बरस घूम रहा है और हमारे तन मन के तारों को झंकारित कर रहा है। जी हाँ, जिस सुरीले एल.पी की हम बात कर रहे हैं वह और कोई नहीं बल्कि एल.पी ही हैं, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के असंख्य लोकप्रिय गीतों में से १० गीतों को छाँटना कितना मुश्किल काम है यह तो आप भी ज़रूर मानेंगे। फिर भी हमने कोशिश की है कि एल.पी के इस सुरीले अथाह समुंदर से दस मोतियों को चुनने की। तो लीजिए प्रस्तुत है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के धुनों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'एक प्यार का नग़मा है'।

दोस्तों, आज से हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सफ़र में निकल पड़े हैं अपनी १०००-वे पड़ाव की ओर। भले ही 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह महफ़िल शाम के वक़्त सजती है भारत में, लेकिन एक तरह से यह एक सुबह ही तो है। यह वह सुबह है कि जब हम अपने इस सुरी्ले कारवाँ को लेकर फिर एक बार चल पड़े हैं इन सुरीली राहों पर। इसीलिए हम इस शृंखला की शुरुआत भी भोर के एक गीत से कर रहे हैं। राज कपूर की फ़िल्म 'सत्यम शिवम सुंदरम' का एक बड़ा ही ख़ूबसूरत गीत जो कि आधारित है राज साहब के पसंदीदा राग भैरवी पर। लता जी के दैवीय आवाज़ में "भोर भये पनघट पे मोहे नटखट श्याम सताये" जो फ़िल्माया गया है ज़ीनत अमान पर। 'सत्यम शिवम सुंदरम' में तीन गीतकारों ने गीत लिखे हैं - पंडित नरेन्द्र शर्मा, विट्ठल भाई पटेल और आनंद बक्शी। बक्शी जी ने इस गीत को जितनी ख़ूबसूरती से लिखा है, उतना ही आकर्षक और सुमधुर संगीत से सजाया है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने। यहाँ तक कि इस गीत का जो रीदम है, जो ताल है, वह इतना संक्रामक है कि सुननेवालों को अपनी ओर खींचे रखता है। दोस्तों, क्योंकि यह शृंखला है एल.पी के गीतों की है तो ज़ाहिर है कि हम उन्ही से जुड़ी ज़्यादा बातें इसमें करेंगे। कुछ वर्ष पहले विविध भारती ने प्यारेलाल जी को आमंत्रित कर एक लंबा इंटरव्यू रेकॊर्ड किया था, उस लम्बे इंटरव्यू को जिन लोगों ने सुना होगा, उन्हें एल.पी के तमाम पहलुओं के बारे में जानकारी हासिल हुई होगी। इस शृंखला में हम उसी इंटरव्यू की तरफ़ बार बार रुख़ करेंगे। तो ये रहा आज का अंश...

कमल शर्मा: अच्छा प्यारे जी, अगर हम आप के म्युज़िक की बात करें, हर एक के म्युज़िक की ख़ास पहचान होती है, इन्स्ट्रुमेण्ट्स-वाइज़ होती है, रागों के हिसाब से, या कुछ अलग एक स्टाइल होता है। आप अपने म्युज़िक की पहचान क्या कहेंगे? किस तरह से उसको पहचाना जाए कि यह एल.पी का म्युज़िक है? उसकी सब से क्या ख़ास बात है?

प्यारेलाल: मैं बताऊँ आपको, बहुत ईज़ी है, मैं बहुत डायरेक्टली बोल रहा हूँ, हमारी ख़ास बात यह है कि आपको रीदम पैटर्ण से मालूम पड़ेगा कि यह एल.पी है। लेकिन हर एक गाना, हर एक पिक्चर का म्युज़िक आपको अलग मिलेगा। मनोज कुमार हों, सुभाष घई हों, राज कपूर साहब हों, आप समझे ना, कोई भी साउथ के हों, कोई भी एक पिक्चर का म्युज़िक आपको दूसरे पिक्चर में नहीं मिलेगा। अगर 'पारसमणि' की तो मतलब ख़तम कर दिया हमने। फिर जे. ओमप्रकाश जी के लिए काम किया, 'आया सावन झूम के', फिर राज खोसला जी हैं, आप देखिए, तो ज़्यादा कोशिश हम यह करते हैं कि भई जिसका म्युज़िक करें, वो लगे ऐसे कि जैसे आपने शायद ग़ौर किया कि नहीं, हमने एक पिक्चर की थी शक्ति सामंत जी की, 'अनुरोध', "आपके अनुरोध पे मैं यह गीत सुनाता हूँ", बिल्कुल अलग तरह का गाना था यह।

तो दोस्तों, इस इंटरव्यु के चुनिंदे अंश हम आगे भी आप तक पहुँचाते रहेंगे, लीजिए अब सुनिए लता जी की आवाज़ में "भोर भये पनघट पे"।



क्या आप जानते हैं...
कि 'सत्यम शिवम सुंदरम' से पहले इस फ़िल्म के लिए राज कपूर ने 'सूरत और सीरत' का शीर्षक चुना था, लेकिन बाद में उन्हें 'सत्यम शिवम सुंदरम' ही बेहतर लगा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, जी हाँ अब गूगल बाबा आपकी मदद को नहीं आ पायेंगें, अब तो बस आप को खुद ही खोलने पड़ेंगें इस पहेली के उलझे तार, हमें यकीं है कि पहेली का ये नया रूप आपके जेहन की खासी कसरत करवाएगा, और आप इसका भरपूर मज़ा भी ले पायेंगें... ठीक, तो आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. इस बार आपकी मंजिल ५०० अंकों की होगी, और जितनी बार चाहें आप इस आंकडे को छू सकते हैं हमारे १००० वें एपिसोड तक. और हाँ इस बार पुरस्कार नकद राशि होंगीं....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०१
ये धुन उस गीत के पहले इंटरल्यूड की है, सुनिए -


अतिरिक्त सूत्र - अभी हाल ही में लता जी ने ट्विट्टर पर लिखा कि ये इस गीत के गायक का गाया उनका सबसे पसंदीदा गीत है-

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - गायक बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

फूल अहिस्ता फैको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं....इसे कहते है नाराज़ होने, शिकायत करने का लखनवी शायराना अंदाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 498/2010/198

नौ रसों में कुछ रस वो होते हैं जो अच्छे होते है, और कुछ रस ऐसे हैं जिनका अधिक मात्रा में होना हमारे मन-मस्तिष्क के लिए हानिकारक होता हैं। शृंगार, हास्य, शांत, वीर पहली श्रेणी में आते हैं जबकि करुण, विभत्स और रौद्र रस हमें एक मात्रा के बाद हानी पहुँचाते हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार, 'रस माधुरी' शृंखला में आज बातें रौद्र रस की। जब हमारी आशाएँ पूरी नहीं हो पाती, तब हमें लगता है कि हमें नकारा गया है और यही रौद्र रस का आधार बनता है। यह ज़रूरी नहीं कि ग़ुस्से से हमेशा हानी ही पहुँचती है, कभी कभी रौद्र का इस्तेमाल सकारात्मक कार्य के लिए भी हो सकता है जैसे कि माँ का बच्चे को डाँटना, गुरु का शिष्य को डाँटना, मित्र का अपने मित्र को भलाई के मार्ग पर लाने के लिए डाँटना इत्यादि। लेकिन निरर्थक विषयों पर नाराज़ होना और बात बात पर नाराज़ होकर सीन क्रीएट कर लेना अपने लिए भी और पूरे वातावरण के लिए हानिकारक ही होता है। यह जानना बहुत ज़रूरी है कि ग़ुस्से से कोई भी समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि वह समस्या और विस्तारित होती है। मन अशांत होता है तो समस्या के समाधान के लिए उचित राह नहीं खोज पाता। रौद्र रस का एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है माँ दुर्गा का रौद्र का दानव महिषासुर का वध करना। यह पौराणिक कहानी हमें सिखाती है कि किस तरह से हम अपने अंदर के रौद्र रूपी दानव का वध कर सकते हैं अपने अच्छे और दैवीय शक्तियों, जैसे कि क्षमा, स्वीकारोक्ति, विनम्रता, और हास्य आदि के इस्तेमाल से। प्राकृतिक कारणो से रौद्र बहुत देर तक हमारे अंदर नहीं रहता, इसलिए अगर हम रौद्र का भरण-पोषण नहीं करेंगे तो थोड़े समय के बाद यह ख़ुद अपने आप ही ख़त्म हो जाता है। अलग अलग प्राणियों में देखा गया है कि किसी में यह रस बहुत ज़्यादा होता है तो किसी किसी में बहुत कम। निष्कर्ष यही है कि हम अपने अंदर जितना कम रौद्र रखेंगे, हमारी सेहत के लिए उतना ही बेहतर होगा। अब फ़िल्मी गीतों पर आते हैं। रौद्र रस पर आधारित कोई गीत याद आता है आपको? फ़िल्म 'नगीना' का "मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा, मैं नागिन तू सपेरा", या फिर फ़िल्म 'राम लखन' का "बेक़दर बेख़बर बेवफ़ा बालमा, ना मैं तुझको मारूँगी, ना मैं तुझको छोडूँगी...", या फिर 'मेरा गाँव मेरा देश' फ़िल्म का "मार दिया जाए के छोड़ दिया जाए", जैसे बहुत से गानें हैं। लेकिन हमने जिस गीत को चुना है, वह यकायक सुनने पर शायद रौद्र रस का ना लगे, लेकिन ध्यान से सुनने पर और शब्दों पर ग़ौर करने पर पता चलता है कि किस ख़ूबसूरती से, बड़े ही नाज़ुक तरीके से रौद्र को प्रकट किया गया है इस गीत में। फ़िल्म 'प्रेम कहानी' का युगल गीत "फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं"। लता-मुकेश की आवाज़ें, आनंद बख्शी के बोल और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत।

'प्रेम कहानी' १९७५ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया लेखराज खोसला ने और निर्देशन किया था राज खोसला ने और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे शशि कपूर, राजेश खन्ना, मुमताज़ और विनोद खन्ना। संवाद डॊ. राही मासूम रज़ा के थे और फ़िल्म के गानें लिखे आनंद बख्शी ने। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के धुनों से सजे इस फ़िल्म के सभी गानें ख़ूब सुने गए, ख़ास कर लता-किशोर के दो युगल गीत "प्रेम कहानी मे एक लड़का होता है" और "चल दरिया में डूब जाएँ"। लता और मुकेश की आवाज़ों में आज का प्रस्तुत गीत भी गली गली गूँजा करता था एक समय। दोस्तों, इस गीत में जिस तरह से नाराज़गी ज़ाहिर की गई है, उसे सही तरीक़े से महसूस करने के लिए हम इस गीत के पूरे बोल यहाँ पर लिख रहे हैं। इन्हें पढ़िए और ख़ुद ही महसूस कीजिए इस गीत में छुपे रौद्र रस को।

मुकेश:
कहा आपका यह वजह ही सही, के हम बेक़दर बेववा ही सही,
बड़े शौक से जाइए छोड़ कर, मगर सहर-ए-गुलशन से युं तोड़ कर,
फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,
वैसे भी तो ये बदक़िस्मत नोक पे कांटों की सोते हैं।

लता:
बड़ी ख़ूबसूरत शिकायत है ये, मगर सोचिए क्या शराफ़त है ये,
जो औरों का दिल तोड़ते हैं, लगी चोट उनको तो ये कहते हैं,
कि फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,
जो रुलाते हैं लोगों को, एक दिन ख़ुद भी रोते हैं।

मुकेश:
किसी शौख़ को बाग़ की सैर में, जो लग जाए कांटा कोई पैर में,
वफ़ा हुस्न फूलों से हो किसलिए, ये मासूम है बेख़ता इसलिए,
फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,
ये करेंगे कैसे घायल ये तो ख़ुद घायल होते हैं।

लता:
गुलों के बड़े आप हमदर्द हैं, भला क्यों ना हो आप भी मर्द हैं,
मुकेश:
हज़ारों सवालों का है एक जवाब, परे बेनज़र ये ना हो ऐ जनाब,
लता:
फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,
सब जिसे कहते हैं शबनम फूल के आँसू होते हैं।

मेरा ख़याल है कि बख्शी साहब के लिखे सब से ख़ूबसूरत गीतों में से एक है यह गीत। पता नहीं आप मुझसे सहमत होंगे या नहीं, लेकिन कहने को दिल चाहता है कि जिस तरह से मख़्दूम मोहिउद्दिन ने "फिर छिड़ी रात बात फूलों की" ग़ज़ल लिखी थी, ठीक वैसे ही फूल शब्द के इस्तेमाल में फ़िल्मी गीतों के जगत में यह गीत उसी तरह का मुक़ाम रखता है। आइए सुना जाए यह गीत जो आधारित है राग मिश्र शिवरंजनी पर।



क्या आप जानते हैं...
कि 'प्रेम कहानी' फ़िल्म में महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरु के फ़ूटेज दिखाए गए थे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. एक अमर प्रेमिक प्रेमिका की प्रेम कहानी पर बनी यह फ़िल्म थी सन् १९७१ की। गीतकार बताइए। ४ अंक।
२. इस गीतकार ने इस फ़िल्म के संगीतकार के साथ युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी एक बेहद चर्चित फ़िल्म में काम किया था। संगीतकार पहचानिए। ३ अंक।
३. गीत के मुखड़े में शब्द है "महफ़िल"। फ़िल्म का नाम बताएँ। २ अंक।
४. इस फ़िल्म के एक अन्य गीत के मुखड़े में, जिसे इसी गीत के गायक ने गाया है, शब्द है "कूचे"। गायक पहचानिए। १ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह बहुत खूब एकदम सही पहचाना आपने. अब रौद्र रस से बाहर आ जाईये जनाब....सोचिये आज की पहेली का जवाब....सभी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

नफरत की दुनिया को छोडकर प्यार की दुनिया में, खुश रहना मेरे यार.... करुण रस और रफ़ी साहब की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 495/2010/195

हास्य रस के बाद आज ठीक विपरीत दिशा में जाते हुए करुण रस की बारी। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार। 'रस माधुरी' शृंखला में आज ज़िक्र करुण रस का। करुण रस, यानी कि दुख, सहानुभूति, हमदर्दी, जो उत्पन्न होती है लगाव से, किसी वस्तु या प्राणी के साथ जुड़ाव से। जब यह लगाव हमसे दूर जाने लगता है, बिछड़ने लगता है, तो करुण रस से मन भर जाता है। करुण रस आत्म केन्द्रित होने का भी कभी कभी लक्षण बन जाता है। इसलिए शास्त्र में कहा गया है कि करुण रस को आत्मकेन्द्रित दुख से ज़रूरतमंदों के प्रति हमदर्दी जताने में परिवर्तित कर दिया जाए। किसी तरह के दुख के निवारण के लिए यह जान लेना ज़रूरी है कि दुख अगर आता है तो एक दिन चला भी जाता है। ज़रूरी नहीं कि किसी से जुदाई ही करुण रस को जन्म देती है। एकाकीपन भी करुण रस को जन्म दे सकता है। करुण रस मनुष्य के जीवन के हर पड़ाव में आता है। जवान होते बच्चों में देखा गया है कि जब वो उपेक्षित महसूस करते हैं तो दूसरों से हमदर्दी की चाह रखने लगते हैं। जब इंसान बूढ़ा होने लगता है तो अलग तरह का करुण रस होता है कि जिसमें उसे उसके जीवन भर का संचय भी बेमतलब लगने लगता है। मृत्यु के निकट आने पर करुण रस अपने चरम पर पहूँच जाता है। लेकिन अगर इंसान शाश्वत आत्मा में विश्वास रखता है तो इस समय भी वो करुण रस से बच सकता है और जीवन के अंतिम क्षण तक आनंद ले सकता है इस ख़ूबसूरत जीवन का। दोस्तों, हिंदी फ़िल्मों में करुण रस के गीतों की कोई कमी नहीं है। हमने जो गीत चुना है वह है मोहम्मद रफ़ी साहब का गाया फ़िल्म 'हाथी मेरे साथी' का "नफ़रत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में ख़ुश रहना मेरे यार"।

'हाथी मेरे साथी' १९७१ की फ़िल्म थी और उस समय के लिहाज़ से यह एक स्वप्न फ़िल्म थी ख़ास कर बच्चों के लिए, क्योंकि इस तरह से जानवरों को मुख्य भूमिका में लेकर कोई फ़िल्म पहले नहीं बनी थी। हाथियों से स्टण्ट्स बच्चों और बड़ों, सभी को ख़ूब अभिभूत किया था उस ज़माने में। युं तो फ़िल्म के अधिकतर गानें किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने गाए, जो ख़ुशरंग गानें थे, लेकिन फ़िल्म का अंतिम गीत एक बड़ा ही दुखद, करुण गीत था, जिसे रफ़ी साहब से गवाया गया था। दोस्तों, देखिए उम्र का इंसान के मिज़ाज पर, स्वाद पर कैसा प्रभाव होता है, जब मैं छोटा था और रेडियो में इस फ़िल्म के गानें सुना करता था, उन दिनों शायद यह गीत मुझे सब से कम पसंद आता था, जब कि लता और किशोर के "सुन जा ऐ ठण्डी हवा", "दिलबरजानी चली हवा मस्तानी" और "चल चल चल मेरे हाथी" जैसे गीत बहुत भाते थे। लेकिन अब मैं यह गर्व के साथ कह सकता हूँ कि रफ़ी साहब का गाया "नफ़रत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में" इस फ़िल्म का सर्वोत्तम गीत है। इंसानों के गुज़र जाने के सिचुएशन पर तो बहुत से गानें बनें हैं, लेकिन यह गीत फ़िल्म के असली नायक, एक हाथी के मर जाने पर उसका रखवाला (राजेश खन्ना) रोते हुए गाता है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने जिस तरह से अपने संगीत के माध्यम से इस गीत में करुण रस का संचार किया है, और आनंद बक्शी साहब ने जिस तरह के बोल लिखे हैं इस गीत में, इसे सुन कर शायद ही कोई होगा जिसकी आँखें नम ना हुई होंगी। यहाँ पर यह बताना अत्यंत आवश्यक है कि इस गीत के लिए Society for Prevention of Cruelty to Animals ने आनंद बक्शी को पुरस्कृत किया था, जो अपने आप में अकेला वाक्या है। इस क्रूर जगत की कितनी बड़ी सच्चाई है इन शब्दों में कि "जब जानवर कोई इंसान को मारे, कहते हैं दुनिया में वहशी उसे सारे, एक जानवर की जान आज इंसानों ने ली है, चुप क्यों है संसार"। लीजिए, करुण रस पर आधारित इस गीत को सुनिए और अपने इर्द गिर्द अगर आपको जानवरों पर अत्याचार की कोई घटना दिखाई दे तो नज़दीकी उचित सरकारी कार्यालय या किसी एन.जी.ओ को तुरंत इसकी जानकारी दें।



क्या आप जानते हैं...
कि 'हाथी मेरे साथी' हिंदी का पहला ऐल्बम था जिसने बिक्री के लिए विक्रय डिस्क जीता, जो था एच. एम. वी का रजत डिस्क।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. भयानक रस का उदाहरण है अगले अंक का गीत। गीत के मुखड़े में एक गीतकार का नाम भी आता है। संगीतकार बताएँ। ३ अंक।
२. साल १९६५ की इस फ़िल्म में एक सेन्सुअस युगल गीत भी है जिसमें आशा की नहीं, बल्कि किसी और ही गायिका की आवाज़ है। फ़िल्म का नाम बताएँ। १ अंक।
३. संगीतकार का नाम अगर समझ गए हैं तो गीतकार बताना ज़्यादा मुश्किल नहीं। कौन हैं इस गीत के गीतकार? ३ अंक।
४. फ़िल्म के निर्देशक कौन हैं? ३ अंक।


पिछली पहेली का परिणाम -
कल तो सभी प्रतिभागी खूब अच्छे मूड में दिखे, और जवाब भी सब सही दिए, लगता है हास्य रस में डूबे गीत का असर था ये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सोमवार, 6 सितंबर 2010

अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में....कव्वाली का एक नया अंदाज़ पेश किया एल पी और लता ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 477/2010/177

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में जारी है रमज़ान के मौके पर कुछ शानदार फ़िल्मी क़व्वालियों की ख़ास शृंखला 'मजलिस-ए-क़व्वाली'। क़व्वाली का जो मूल उद्देश्य है, उसे लोगों तक पहुँचाना क़व्वालों का काम है। अब जहाँ पर फ़ारसी भाषा का इस्तेमाल लोग आम बोलचाल में नहीं करते हैं, वहाँ पर क़व्वाली का अर्थ लोगों तक पहुँचाने के लिए संगीत और रीदम का सहारा लिया जाने लगा और उस रूप को, उस शैली को इतना ज़्यादा प्रभावशाली बनाया कि क़व्वाली सुनते हुए लोग ट्रान्स में चले जाने लगे। लोगों को सारे अल्फ़ाज़ भले ही समझ में ना आते हों, लेकिन संगीत और रीदम कुछ ऐसे सर चढ़ के बोलता है क़व्वालियों में कि सुनने वाला उसके साथ बह निकलता है और क़व्वाली के ख़त्म होने के बाद ही होश में वापस आता है। और इसी तरह से क़व्वाली का विकास हुआ और धीरे धीरे संगीत की एक महत्वपूर्ण धारा बन गई। पिछले पाँच दशकों में पाक़िस्तान में क़व्वालियों की शैलियों में बदलाव लाने वाले क़व्वाल गोष्ठियों में ६ नाम प्रमुख हैं और ये नाम हैं - उस्ताद फ़तेह अली व मुबारक अली ख़ान, उस्ताद करम दीन टोपई वाले, उस्ताद छज्जु ख़ान, उस्ताद मोहम्मद अली फ़रीदी, उस्ताद संतु ख़ान, उस्ताद बख़्शी सलामत, तथा उस्ताद मेहर अली ख़ान व उस्ताद शेर अली ख़ान। किसी भी क़व्वाली का मुख्य गायक, जिसे मोहरी कहते हैं, स्टेज के दाहिने तरफ़ बैठते हैं। अवाज़िआ उनके बाएँ तरफ़ और एक और अच्छा गायक अवाज़िआ के बाएँ तरफ़ बैठा करते हैं। इस दूसरे "बैक-अप" गायक का काम है मुख्य गायक को सहारा देना और आपातकाल में स्थिति को संभाल लेना। तबले को मध्य भाग में रखा जाता है। इस बैक-अप सिंगर का कॊनसेप्ट शायद जोड़ियों की वजह से जन्मा होगा, जैसे कि दो भाइयों की जोड़ी या पिता-पुत्र की जोड़ी। लेकिन दोस्तों, आज हम आपको जिस क़व्वाली से आपका मनोरंजन करने जा रहे हैं उसमें कोई बैक-अप सिंगर नहीं है। जी हाँ, लता जी ने अकेले ही शुरु से आख़िर तक इस क़व्वाली को सुरीला अंजाम दिया है। आज हम आपको सुनवा रहे हैं लता मंगेशकर और साथियों की गाई फ़िल्म 'मेरे हमदम मेरे दोस्त' की क़व्वाली "अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में, रूठे पल में न माने महीनों में"।

'मेरे हमदम मेरे दोस्त' १९६८ की फ़िल्म थी। फ़िल्म के निर्माता थे केवल कुमार और निर्देशक थे अमर कुमार। कहानी निर्मल कुमारी की, स्क्रीनप्ले अमर कुमार का, और संवाद राजिन्दर सिंह बेदी के। धर्मेन्द्र, शर्मिला टैगोर, मुमताज़, रहमान, ओम प्रकाश, अचला सचदेव और निगार सुल्ताना अभिनीत इस फ़िल्म के गानें लिखे मजरूह सुल्तानपुरी ने और संगीत था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का। लक्ष्मी-प्यारे के संगीत में अगर क़व्वाली की बात करें तो 'अमर अक़बर ऐन्थनी' की क़व्वाली "पर्दा है पर्दा" ही सब से लोकप्रिय मानी जाएगी, लेकिन 'मेरे हमदम मेरे दोस्त' की यह क़व्वाली भी बहुत ही प्यारी क़व्वाली है। बोल जितने प्यारे हैं, लक्ष्मी-प्यारे ने रीदम सेक्शन में ढोलक और तबले के ठेकों का इस ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया है कि दिल मचल उठता है इसे सुनते हुए। वैसे भी लक्ष्मी-प्यारे के गीत उनके ख़ास रीदम और ठेकों के लिए जाने जाते रहे हैं। फ़ास्ट और स्लो रीदम का जो ट्रान्ज़िशन इस क़व्वाली में होता है, वह कमाल का है और शायद इस क़व्वाली की खासियत भी। आपको यह बताते हुए कि यह क़व्वाली फ़िल्मायी गई है धर्मेन्द्र और शर्मिला टैगोर की एक पार्टी में जिसे गाती हैं मुमताज़, सुनते हैं यह क़व्वाली, जो मुझे बेहद पसंद है, और शायद आपको भी। है न!



क्या आप जानते हैं...
कि लता मंगेशकर का फ़ेवरीट आशा नंबर है फ़िल्म 'दिल ही तो है' की क़व्वाली "निगाहें मिलाने को जी चाहता है", ऐसा लता जी ने हाल ही में अपने ट्विटर पेज पर लिखा है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. एस एम् सागर निर्देशित इस फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
२. मुखड़े में शब्द है "राज़" संगीतकार बताएं - २ अंक.
३. गीतकार बताएं - ३ अंक.
४ प्रमुख आवाज़ है रफ़ी साहब की, किस अभिनेता पर फिल्माया गया है इसे - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
केवल ३ ही सही जबाव आये, इंदु जी, रोमेंद्र जी और दूसरी कोशिश में पवन जी, सभी को बधाई...मेहन्द्र जी और अनीता जी का आभार, अनीता जी कहाँ थे इतने दिन बहुत दिनों में इस महफ़िल की याद आई. अनाम जी अपना नाम तो बताईये, एक तरीका हम बता सकते हैं आपकी "उनको" मानाने का, एक अच्छा सा गीत सोचिये, और कुछ उनकी तारीफ़ में लिख कर हमें भेज दीजिए. शनिवार शाम जब वो गीत बजेगा तो वो यक़ीनन मान जायेंगीं, आजमा के देखिये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

घुंघटा गिरा है ज़रा घुंघटा उठा दे रे....जब गुलज़ार साहब बोले लता जी के बारे में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 463/2010/163

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में आप सभी का एक बार फिर हार्दिक स्वागत है। इन दिनों इस स्तंभ में जारी है गीतकार व शायर गुलज़ार साहब के लिखे गीतों पर आधारित लघु शृंखला 'मुसाफ़िर हूँ यारों'। जिस तरह से मुसाफ़िर निरंतर चलता जाता है, बस चलता ही जाता है, ठीक उसी तरह से गुलज़ार साहब के गानें भी चलते चले जा रहे हैं। ना केवल उनके पुराने गानें, जो उन्होंने ६०, ७० और ८० के दशकों में लिखे थे, वो आज भी बड़े चाव से सुनें जाते हैं, बल्कि बदलते वक़्त के साथ साथ हर दौर में उन्होंने ज़माने की रुचि का नब्ज़ सही सही पकड़ा, और आज भी "दिल तो बच्चा है जी", "इब्न-ए-बतुता" और "पहली बार मोहब्बत की है" जैसे गानों के ज़रिये आज की पीढ़ी के दिनों पर राज कर रहे हैं। हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में वो जिस तरह की हैसियत रखते हैं, शायद ही किसी और गीतकार, शायर और फ़िल्मकार ने एक साथ रखा होगा। आइए 'मुसाफ़िर हूँ यारों' शृंखला की तीसरी कड़ी में आज सुनें लता मंगेशकर की आवाज़ में फ़िल्म 'पलकों की छाँव में' से "घुंघटा गिरा है ज़रा घुंघटा उठा दे रे, कोई मेरे माथे की बिंदिया सजा दे रे"। फ़िल्म में संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का था। १९७७ की इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राजेश खन्ना, हेमा मालिनी, असरानी, फ़रीदा जलाल, कन्हैयालाल और लीला मिश्रा प्रमुख। कल के फ़िल्म 'सितारा' की तरह इस फ़िल्म को भी मेरज ने ही निर्देशित किया था। 'पलकों की छाँव में' की कहानी गुलज़ार साहब ने ख़ुद लिखी थी। अब क्योंकि गुलज़ार साहब पर ही शृंखला चल रही है और उन्ही की लिखी कहानी भी है, तो क्यों ना इस फ़िल्म की थोड़ी सी भूमिका आपको दे दी जाए! रवि (राजेश खन्ना) स्नातक बनने के बाद नौकरी ना मिलने पर एक दूर दराज़ के गाँव में डाकिये की नौकरी लेकर आ जाता है। यहाँ कई अलग अलग तरह के लोगों से उसकी मुलाक़ात होती है। यहीं उसे मोहिनी (हेमा मालिनी) भी मिलती है जिसके साथ उसकी दोस्ती तो होती है, लेकिन रवि इस रिश्ते कोई कुछ हद आगे तक ले जाने की बात सोचता है मन ही मन। और तभी उसे पता चलता है कि मोहिनी दरअसल किसी और से प्यार करती है। आर्मी का कोई जवान जो एक बार उस गाँव में ट्रेनिंग के लिए आया था। रवि मोहिनी और उसके प्रेमी को मिलाने की ठान लेता है, लेकिन बदक़िस्मती से रवि ही उस अर्मी जवान के शहीद हो जाने की ख़बर ले आता है। इस फ़िल्म की कहानी और पार्श्व कुछ हद तक हमें फ़िल्म 'ख़ुशबू' की याद भी दिला जाती है।

दोस्तों, इससे पहले कि आप इस गीत का आनंद लें, आज लता जी की तारीफ़ में कुछ वो बातें हो जाए जो गुलज़ार साहब ने कभी कहे थे विविध भारती पर। "लता जी के बारे में मैं कुछ कहना चाहता हूँ जो कभी किसी से आज तक नहीं कहा। लता जी के लिए मेरे दिल में बड़ी श्रद्धा है, कई सदियों में ऐसी आवाज़ कभी पैदा होती है। आगे आने वाली सदियों के लिए नहीं सोचता, वो उनकी आवाज़ को संभाल लेंगे, अफ़सोस तो उन सभी पर है जो उनकी आवाज़ सुने बग़ैर ही इस दुनिया से गुज़र गए"। दोस्तों, कितनी सच्चाई है गुलज़ार के इन शब्दों में! कितनी नीरस और बेजान रही होगी उन लोगों की ज़िंदगी जो लता जी की आवाज़ नहीं सुन पाए। ख़ैर, आज के गीत की बात करें तो लोक शैली में पिरोया हुआ गाना है। इस गीत में भी गुलज़ार साहब का यूनिक स्टाइल साफ़ झलकता है। आँखों में रात का काजल लगाना, आँगन में ठण्डे सवेरे बिछा देना, पैरों में मेहन्दी की अगन लगा देना जैसी तुलनाएँ व उपमाएँ एक वही तो देते आये हैं। अंतिम अंतरे में कितनी ख़ूबसूरती से वो लिखते हैं कि ना चिट्ठी आई ना संदेसा आया, कोई कम से कम झूट-मूट ही दरवाज़े की किवाडिया हिला दे ताकि किसी के आने की आस जगे! तो आइए सुना जाए आज का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि गुलज़ार साहब को ५ बार राष्ट्रीय पुरस्कार और १९ बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से नवाज़ा गया है। इन १९ फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में ९ पुरस्कार बतौर गीतकार उन्हें दिया गया जो कि किसी भी गीतकार के लिए सर्वाधिक है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस गीत में किस गायिका ने रफ़ी साहब के साथ आवाज़ मिलायी है - ३ अंक.
२. सुरेन्द्र मोहन निर्देशित इस फिल्म के नाम की एक मशहूर फिल्म पहले भी बन चुकी है जिसमें नूतन ने अभिनय किया था, फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
३. एक अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है "वादा". संगीतकार बताएं - २ अंक.
४. इस फिल्म के नायक कौन है - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
किशोर जी ३ अंक आपके बहुत बधाई. नवीन जी प्रतिभा जी और वाणी जी सही जवाब आप सब के. कुछ क्रेडिट इंदु जी को भी अवश्य दें जिन्होंने इटें अनोखे अंदाज़ में हिंट दिए. हमारे देसी धुरंधर सब कहाँ गायब हैं ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

रिमझिम के गीत सावन गाये....एल पी के संगीत में जब सुर मिले रफ़ी साहब और लता जी के तो सावन का मज़ा दूना हो गया

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 439/2010/139

रिमझिम के तरानों पर सवार होकर हम आज पहुंचे हैं इस भीगी भीगी शृंखला की अंतिम कड़ी पर। 'रिमझिम के तराने' में आज प्रस्तुत है संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की एक बेहतरीन रचना की। एल.पी ने सावन के कई हिट गीत हमें दिए हैं, जैसे कि "आया सावन झूम के", "कुछ कहता है यह सावन", "झिलमिल सितारों का आँगन होगा", और आज का प्रस्तुत गीत "रिमझिम के गीत सावन गाए हाए भीगी भीगी रातों में"। यह १९६९ की फ़िल्म 'अनजाना' का गीत है। बताना ज़रूरी है कि यह वही साल था जिस साल 'आराधना' में "रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना" जैसा सेन्सुअस गीत आया था जो एक नया प्रयोग था। उसके बाद से तो जैसे एक ट्रेण्ड सा ही बन गया कि बारिश से बचने के लिए हीरो और हीरोइन किसी सुनसान और खाली पड़े मकान में शरण लेते हैं, और वहाँ पर बारिश को सलाम करते हुए एक रोमांटिक गीत गाते हैं। तो एक तरह से इसे "रूप तेरा मस्ताना" जौनर भी कह सकते हैं। लता-रफ़ी की आवाज़ में फ़िल्म 'अनजाना' का यह गीत बेहद ख़ूबसूरत है हर लिहाज़ से। बोल जितने अच्छे हैं, संगीत भी उतना ही सुरीला। राजेन्द्र कुमार और बबिता पर फ़िल्माया गया यह गीत भी सेन्सुअस है जो भीगी भीगी रात में एक आग सी लगा देती है मन में। "मेरा दिल भी है दीवाना, तेरे नैना भी हैं नादान से, कुछ ना सोचा कुछ ना देखा, कुछ भी पूछा ना इस अनजान से, चल पड़े साथ हम कैसे, ऐसे बनके साथी राहों में, के रिमझिम के गीत सावन गाए हाए भीगी भीगी रातों में"।

दोस्तों, आज इस लघु शृंखला 'रिमझिम के तराने' की अंतिम कड़ी है। तो क्यों ना आज भी कुछ शायराना बातें हो जाए सावन पर। तो अर्ज़ किया है...

सावन की पहली बारिश में बचपन में नहाना याद है,
रिमझिम रिमझिम टप टप टप टप बारिश का गाना याद है।
वो बादलों के मजमे को देख कर वो हम सब का शोर मचाना,
वो भीग भीग कर नाच नाचना बन कर दीवाना याद है।
बादलों का गरजना बिजली का चमकना सावन की बरसात में,
कोयल का मीठा मीठा प्यारा प्यारा सुंदर तराना याद है।
मस्ती मे डूब जाना सब बंदिशें भूल ख़ुशियाँ मनाना,
ज़मीन पे गिरे पानी में सब दोस्तों को भीगाना याद है।
बारिश के पानी को चखना मौसम की पहली बरसात में,
सावन की पहली बारिश में बचपन में नहाना याद है।

दोस्तों, हम यह पता तो नहीं लगा पाए कि यह किसने लिखा है, लेकिन वाक़ई बचपन का वह ज़माना याद आ दिला दिया इन अल्फ़ाज़ों ने। उम्मीद है आपको भी अपने बचपन के बारिश के दिन याद आ गए होंगे, वो काग़ज़ की कश्तियाँ, वो बारिश का पानी! 'रिमझिम के तराने' शृंखला तो हो गई पूरी, लेकिन सावन का महीना जारी है, और इस रूमानीयत भरे भीगे मौसम में हमारी तरफ़ से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। सावन का आनंद लीजिए, हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर एक नई शृंखला के साथ फिर वापस आएँगे रविवार की शाम। तब तक के लिए अलविदा, लेकिन आप बने रहिए 'आवाज़' के साथ। धन्यवाद!



क्या आप जानते हैं...
कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ऐसे पहले संगीतकार बने जिन्होने लगातार चार साल (१९७८ से १९८१) सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता (अमर अकबर ऐंथनी, सत्यम शिवन सुंदरम, सरगम, कर्ज़)। इस कड़ी को तोड़ा ख़य्याम साहब ने १९८२ में फ़िल्म 'उमरावजान' के ज़रिए।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. डीन मार्टिन के एक अंग्रेजी गीत की धुन से प्रेरित है ये गीत, संगीतकार बताएं - ३ अंक.
२. नूतन ने सहयोग दिया है इस गीत में मूल गायक का, कौन हैं जिनकी आवाज़ ने इस गीत को एक अलग मुकाम दे दिया है- २ अंक.
३. फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
४. इस फिल्म के जरिये किस अभिनेत्री को लॉन्च किया गया था फिल्मों में - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इस सप्ताहांत भी शरद जी ने बढ़त बरकरार रखी है, आप हैं ५६ पर, अवध जी ४९ पर और इंदु जी हैं जरा पीछे २३ पर. वीकेंड का आनंद लीजिए. फिर मिलेंगें चलते चलते :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

बुधवार, 14 जुलाई 2010

सावन के महीने में.....जब याद आये मदन मोहन साहब तो दिल गा उठता है...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 438/2010/138

तीन दशक बीत चुके हैं, लेकिन जब भी जुलाई का यह महीना आता है तो कलेण्डर का पन्ना इशारा करती है १४ जुलाई के दिन की तरफ़ जिस दिन एक महान संगीतकार हम से बिछड़े थे। ये वो संगीतकार हैं जो जाते वक़्त हमसे कह गए थे कि "मेरे लिए ना अश्क़ बहा मैं नहीं तो क्या, है तेरे साथ मेरी वफ़ा मैं नहीं तो क्या"। कितनी सच बात है कि उनके गानें हमारे साथ वफ़ा ही तो करती आई है आज तक। कुछ ऐसा जादू है उनके गीतों में कि हम चाह कर भी उन्हे नहीं अपने दिल से मिटा सकते। दोस्तों, जुलाई और सावन का जब जब यह महीना आता है, संगीतकार मदन मोहन की सुरीली यादें भी जैसे छम छम बरसने लग पड़ती हैं। ऐसे में जब हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सावन के फुहारों की इन दिनों बातें कर रहे हैं तो आज के दिन मदन मोहन साहब के संगीत से आपको कैसे वंचित रख सकते हैं! आज हम इस कड़ी में सुनने जा रहे हैं मदन साहब की धुनों से सजी एक रिमझिम फुहारों भरा गीत। वैसे तो "रिमझिम" के साथ अगर मदन मोहन को जोड़ा जाए तो सब से पहले फ़िल्म 'वो कौन थी' का वही मशहूर गीत "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम, पिया तोरे आवन की आस" की ही याद आती है। यह गीत भले ही रिमझिम बारिश की याद दिलाती हो, लेकिन यह गीत बारिश का गीत नहीं है। इसलिए हमने आज जिस गीत को चुना है वह है सन् १९६५ की फ़िल्म 'शराबी' का गीत जिसे लिखा है राजेन्द्र कृष्ण ने और गाया है मोहम्मद रफ़ी ने। शराबी अंदाज़ में ही गाया हुआ यह नग़मा है "सावन के महीने में, एक आग सी सीने में, लगती है तो पी लेता हूँ, दो चार घड़ी जी लेता हूँ"। क्योंकि यह गीत शराब में चूर नायक गा रहे हैं, इसकी धुन और संगीत संयोजन भी उसी शराबी अंदाज़ का किया है मदन साहब ने।

प्रस्तुत गीत की खासियत यह है कि इसके दो वर्ज़न हैं। दोनों ही शराब पीकर गाने वाले नायक के। लेकिन एक में है मस्ती तो दूसरे में है ग़म। बात साफ़ है कि पहले में नायक ख़ुश होकर शराब पी कर गीत गा रहे हैं तो दूसरे में किसी दर्द भरी शाम में शराब और सावन को अपना साथी बनाकर यह गीत गा रहे हैं। पहले वर्ज़न में अगर पूरे रीदम और बीट्स के साथ वेस्टर्ण ऒरकेस्ट्रेशन का प्रयोग हुआ है तो दूसरे वर्ज़न में कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हुआ है और उसके अंतरों में तो बिलकुल ही बीट्स नहीं प्रयोग हुआ है। मदन मोहन के शब्दों में "संगीत रचना भी एक तरह का नशा है। सूरज ढल चुका था, सामने जाम था, मीना थीं, और फ़िल्म 'शराबी' की एक सिचुएशन। तो युंही जब जाम ख़ाली होने लगे, तो दो चार मिनटों में मस्तक से पाँव तक एक नग़मा बन चुका था। साज़िंदों के साज़ हाथों पर, और राजेन्द्र कृष्ण के होठों से गाने के बोल फुटते हुए, कुछ ऐसे..." तो लीजिए दोस्तों, पेश है यह गीत, सब से पहले आप सुनेंगे मदन मोहन की बोलती हुई आवाज़ में ये ही शब्द, उसके बाद रफ़ी साहब की आवाज़ में गीत के दोनों वर्ज़न, पहले दर्द भरे अंदाज़ में और फिर उसके बाद मस्ती भरे अंदाज़ में। सावन के महीने में इस नशीले गीत को सुनवाने से पहले हम अपनी तरफ़ से यही कहेंगे कि सावन का आनंद ज़रूर लीजिए लेकिन शराब के साथ नहीं। नशा करना ही है तो ज़िंदगी का नशा कीजिए, यकीन मानिए बड़ी नशीली है यह ज़िंदगी अगर आपने जीना सीख लिया है तो। चलते चलते संगीतकार मदन मोहन को 'आवाज़' की श्रद्धांजली।



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'वीर ज़ारा' का मशहूर गीत "तेरे लिए हम हैं जिए होठों को सिए" की धुन सब से पहले मदन मोहन ने फ़िल्म 'मौसम' के गीत "दिल ढूंढ़ता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन" के लिए तैयार किया था। उस वक्त यह धुन 'मौसम' के गीत में इस्तेमाल नहीं हुई और बरसों बाद उनके बेटे ने इसी धुन को 'वीर ज़ारा' में इस्तेमाल करवाया।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इसी माह में इस अभिनेता की जयंती भी है और पुण्य तिथि भी, जिन पर ये गीत फिल्माया गया है, हम किसकी बात कर रहे हैं - ३ अंक.
२. संगीतकार बताएं इस युगल गीत के- २ अंक.
३. रफ़ी लता के गाये इस गीत को किसने लिखा है - २ अंक.
४. १९६९ में आई इस सुपर हिट संगीतमयी फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर सही साबित हुए शरद जी और अवध जी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

शनिवार, 1 मई 2010

एक से एक हिट गीत दिए एल पी की जोड़ी ने, और वो भी अपनी शर्तों पर काम कर

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ११

ज 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' के तहत पेश है फ़िल्म 'दो रास्ते' का वही सदाबहार गीत "ये रेशमी ज़ुल्फ़ें, ये शरबती आँखें"। सन् २००५ में विविध भारती ने रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर कई विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया था। और इसी के तहत संगीतकार प्यारेलाल जी को आमंत्रित किया गया था रफ़ी साहब को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए फ़ौजी भाइयों की सेवा में 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए। इस कार्यक्रम में प्यारेलाल जी ने रफ़ी साहब के गाये उनके कुछ पसंदीदा गानें तो सुनवाये ही थे, उनके साथ साथ रफ़ी साहब से जुड़ी कुछ बातें भी कहे थे। और सब से ख़ास बात यह कि फ़िल्म 'दो रास्ते' का प्रस्तुत गीत भी उनकी पसंद के गीतों में शामिल था। प्यारेलाल जी ने कहा था - "आज आप से रफ़ी साहब के बारे में बातें करते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है। रफ़ी साहब का नेचर ऐसा था कि उन्होने सब को हेल्प किया, चाहे कोई भी जात का हो, या म्युज़िशियन हो, या कोई भी हो, सब को समान समझते थे। इससे मुझे याद आ रहा है फ़िल्म 'दोस्ती' का वह गाना "मेरा तो जो भी क़दम है वो तेरी राहों में है, के तू कहीं भी रहे तू मेरी निगाहों में है"। एक बात और बताऊँ आपको? जब राजेश खन्ना इंडस्ट्री में आये, तो उनके लिए कई आवाज़ों की बात चल रही थी। 'दो रास्ते' में गाना था "ये रेश्मी ज़ुल्फ़ें", हम ने कहा कि 'चाहे कुछ भी हो जाये, यह गाना रफ़ी साहब ही गायेंगे, इसे और कोई नहीं गा सकता।' सुनिए उन्होने क्या गाया है, नये लड़के इसे क्या गायेंगे! क्या शोख़पन है!" दोस्तों, क्योंकि यह रिवाइवल है पुराने ज़माने के सुनहरे गीतों का, इसलिए हम आज यह गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में नहीं बल्कि एक नयी आवाज़ में सुनेंगे। उम्मीद है आपको पसंद आएगा।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - ये रेशमी जुल्फें...
कवर गायन - हैरी चोप




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


हैरी चोप
रफ़ी साहब के बहुत बड़े फैन हैरी की कोई फोटो उपलब्ध नहीं है, संगीत इनका पैशन है, दिल्ली के एक रियल एस्टेट कंपनी में वित्तीय प्रबंध का काम देखने वाले हरीश अपने व्यस्त जीवन चर्या में भी संगीत और गायन के लिए समय निकाल ही लेते है


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

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