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Thursday, March 18, 2010

न बोले तुम न मैंने कुछ कहा....फिर भी श्रोताओं और ओल्ड इस गोल्ड में बन गया एक अटूट रिश्ता

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 377/2010/77

मानांतर सिनेमा के गानें इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर बजाए जा रहे हैं और हमें पूरी उम्मीद है कि इन लीग से हट कर गीतों का आप भरपूर आनंद उठा रहे होंगे। विविध भारती पर प्रसारित विशेष कार्यक्रम 'सिने यात्रा की गवाह विविध भारती' में यूनुस ख़ान कहते हैं कि ६० के दशक के उत्तरार्ध में एक नए क़िस्म का सिनेमा अस्तित्व में आया जिसे समानांतर सिनेमा का नाम दिया गया। इनमें कुछ कलात्मक फ़िल्में थीं तो कुछ हल्की फुल्की आम ज़िंदगी से जुड़ी फ़िल्में। इसकी शुरुआत हुई मृणाल सेन की फ़िल्म 'भुबोन शोम' और बासु चटर्जी की फ़िल्म 'सारा आकाश' से। ७० के दशक मे समानांतर सिनेमा ने एक आंदोलन का रूप ले लिया। उस दौर में श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, एम. एस. सथ्यु, मणि कौल, जब्बर पटेल और केतन मेहता जैसे फ़िल्मकारों ने 'उसकी रोटी', 'अंकुर', 'भूमिका', 'अर्ध सत्य', 'गरम हवा', 'मिर्च मसाला' और 'पार्टी' जैसी फ़िल्में बनाई। लेकिन यह भी सच है कि ७० के दशक के मध्य भाग तक हिंदी सिनेमा अमिताभ बच्चन के ऐंग्री यॊंग् मैन की छवि से पूरी तरह प्रभावित हो चला था। मोटे तौर पर अब सिर्फ़ दो तरह की फ़िल्में बन रही थी, एक तरफ़ 'शोले', 'दीवार', 'अमर अकबर ऐंथनी', 'त्रिशोल', 'डॊन' जैसी स्टारकास्ट वाली भारी भरकम फ़िल्में, और दूसरी तरफ़ कम बजट की वो फ़िल्में जो आम ज़िंदगी से जुड़ी हुई थी। अमुमन इन हल्की फुल्की फ़िल्मों में नायक के रूप में नज़र आ जाते थे हमारे अमोल पालेकर साहब। उनका भोलापन, नैचरल अदाकारी, और एक आम नौजवान जैसी सूरत इस तरह की फ़िल्मों को और भी ज़्यादा नैचरल बना देती थी। आज हम '१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में सुनने जा रहे हैं अमोल पालेकर की ही फ़िल्म 'बातों बातों में' का एक बड़ा ही प्यारा सा युगल गीत आशा भोसले और अमित कुमार की आवाज़ों में "ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा"। बासु चटर्जी निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म में अमोल पालेकर के अलावा मुख्य किरदारों में थे टिना मुनीम, असरानी, डेविड, लीला मिश्र, पर्ल पदमसी, टुनटुन और अर्वैंद देशपाण्डेय। राजेश रोशन का रुमानीयत से भरा संगीत था और गीत लिखे अमित खन्ना ने।

फ़िल्म की कहानी जहाँ एक तरफ़ एक आम परिवार की कहानी थी, वहीं दूसरी तरफ़ कई हास्यप्रद किस्सों का सहारा लिया गया कहानी के किरदारों में जान डालने के लिए। मूल कहानी कुछ ऐसी थी कि रोज़ी परेरा (पर्ल पदमसी) एक ज़रूरत से ज़्यादा उत्साही विधवा है औरत हैं जो अपने गीटार पागल बेटे सावी और एक सुंदर बेटी नैन्सी (टिना मुनीम) के साथ रहती है। वह चाहती है कि नैन्सी की शादी एक अमीर लड़के के साथ हो जाए। रोज़ी की मदद करने के लिए उनके पडो़सी अंकल टॊम (डेविड) नैन्सी की मुलाक़ात टोनी ब्रगेन्ज़ा (अमोल पालेकर) से करवाते हैं सुबह ९:१० की बान्द्रा से चर्चगेट की लोकल ट्रेन में। अंकल टॊम के कहने पर नैन्सी टोनी को अपनी मम्मी से मिलवाती है। रोज़ी को शुरु शुर में तो यह जानकर टोनी पसंद नहीं आया कि उसकी तंख्व केवल ३०० रुपय है जब कि नैन्सी की तंख्वा ७०० रुपय है। लेकिन जब उसे पता चलता है कि जल्द ही टोनी की तंख्वा १००० रुपय होने वाली है, तो वह मान जाती है और नैन्सी और टोनी के मिलने जुलने पर पाबंदियाँ ख़त्म कर देती है। नैन्सी अपनी मम्मी के कहे अनुसार टोनी से शादी कर लेना चाहती है, लेकिन टोनी को अभी शादी नहीं करनी है। और इस ग़लतफ़हमी से दोनों में अनबन हो जाती है। इधर रोज़ी नए लड़के की तलाश में जुट जाती है, उधर टोनी अपने फ़ैसले पर अटल रहता है। बीच में नैन्सी दोराहे पर खड़ी रहती है। यही है 'बातों बातों में' की भूमिका। इस फ़िल्म का पार्श्व इसाई परिवारों से जुड़ा हुआ है, इसीलिए इसके गानें भी उसी अंदाज़ में बनाए गए हैं। राजेश रोशन ने कहानी के पार्श्व के साथ पूरी तरह से न्याय करते हुए कुछ ऐसे गानें बनाए हैं कि एक ऒफ़बीट फ़िल्म होते हुए भी इसके गानें ज़बरदस्त हिट हुए और आज भी बड़े चाव से सुने जाते हैं। आज का प्रस्तुत गीत जितना संगीत के लिहाज़ से सुरीला है, उतने ही कैची हैं इसके बोल। अमित खन्ना ने किस ख़ूबसूरती के साथ छो्टे छोटे शब्दों को फ़ास्ट म्युज़िक पर कामयाबी से बिठाया है। "ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा, मगर न जाने ऐसा क्यों लगा, कि धूप में खिला है चांद दिन में रात हो गई, कि प्यार की बिना कहे सुने ही बात हो गई"। आइए सुनते हैं। अमित कुमार की आवाज़ पहली बार गूंज रही है 'ओल इज़ गोल्ड' की महफ़िल में आज!



क्या आप जानते हैं...
कि 'बातों बातों में' फ़िल्म के गीत "उठे सब के क़दम त र रम पम पम" में पर्ल पदमसी का प्लेबैक किया था लता मंगेशकर ने जब कि लीला मिश्र का प्लेबैक किया था पर्ल पदमसी ने। है ना मज़ेदार!

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. गीत में एक जगह कई फूलों के नाम हैं जिसमें मोगरे का भी जिक्र है, गीत पहचानें-३ अंक.
2. जगजीत कौर और पामेला चोपडा के गाये इस समूह गीत की धुन किसने बनायीं है- २ अंक.
3. समान्तर सिनेमा के सभी बड़े कलाकार मौजूद थे इस फिल्म में, कौन थे निर्देशक-२ अंक.
4. फिल्म की किस अभिनेत्री को उस वर्ष कि सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री का फिल्म फेयर प्राप्त हुआ था -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
चलिए अब ज़रा स्कोर कार्ड पर नज़र डालें - शरद जी हैं ६५, इंदु जी ४५ और अवध जी हैं ३५ अंकों पर. पदम जी तेज़ी से चलकर २१ पर आ चुके है. अनुपम जी ८ रोहित जी ७ और संगीता जी ४ अंकों पर हैं, सभी को शुभकामनाएं
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, March 9, 2010

आई झूम के बसंत....आज झूमिए बसंत की इन संगीतमयी बयारों में सब गम भूल कर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 368/2010/68

संत ऋतु की धूम जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर और इन दिनों आप सुन रहे हैं इस स्तंभ के अन्तर्गत लघु शृंखला 'गीत रंगीले'। आज जिस गीत की बारी है वह एक ऐसा गीत है जिसे बजाए बिना अगर हम इस शृंखला को समाप्त कर देंगे तो यह शृंखला एक तरह से अधूरी ही रह जाएगी। बसंत के आने की ख़ुशी को जिस धूम धाम से इस गीत में सजाया गया है, यह गीत जैसे बसंत पंचमी के दिन बजने वाला सब से ख़ास गीत बना हुआ है आज तक। "आई झूम के बसंत झूमो संग संग में"। फ़िल्म 'उपकार' के लिए इस गीत की रचना की थी गीतकार इंदीवर और संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी ने। युं तो ऐसे गीतों में दो मुख्य गायकों के साथ साथ गुमनाम कोरस का सहारा लिया जाता है, लेकिन इस गीत की खासियत है कि बहुत सारी मुख्य आवाज़ें हैं और कुछ अभिनेताओं की आवाज़ें भी ली गई हैं। इस गीत में आप आवाज़ें सुन पाएँगे मन्ना डे, आशा भोसले, शमशाद बेग़म, मोहम्मद रफ़ी, महेन्द्र कपूर, सुंदर, शम्मी की। कल्याणजी-आनंदजी ने कई अभिनेताओं को गवाया है, यही बात जब विविध भारती पर आनंदजी से पूछा गया था तब उनका जवाब था - "इत्तेफ़ाक़ देखिए, शुरु शुर में पहले ऐक्टर ही गाया करते थे। एक ज़माना वह था जो गा सकता था वही हीरो बन सकता था। तो वो एक ट्रेण्ड सी चलाने की कोशिश कि जब जब होता था, जैसे राईटर जितना अच्छा गा सकता है, अपने शब्दों को इम्पॊर्टैन्स दे सकता है, म्युज़िक डिरेक्टर नहीं दे सकता। जितना म्युज़िक डिरेक्टर दे सकता है, कई बार सिंगर नहीं दे सकता। एक्स्प्रेशन-वाइज़, सब कुछ गाएँगे, अच्छा करेंगे, लेकिन ऐसा होता है कि वह सैटिस्फ़ैक्शन कभी कभी नहीं मिलता है कि जो हम चाहते थे वह नहीं हुआ। तो यह हमने कोशिश की जैसे कि बहुत से सिंगरों से गवाया, कुछ कुछ लाइनें ऐक्टर्स से गवाए, बहुत से कॊमेडी ऐक्टर्स ने गानें गाए, लेकिन बेसिकली जो पूरे गानें गाए वो अमिताभ बच्चन जी थे, "मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"। दादामुनि अशोक कुमार जी ने 'कंगन' फ़िल्म में "प्रभुजी मेरे अवगुण चित ना धरो" गाया। हेमा मालिनी ने 'हाथ की सफ़ाई में गाया "पीनेवालों को..."। 'चमेली की शादी' का टाइटल म्युज़िक अनिल कपूर ने गाया, महमूद ने 'वरदान' में गाया। 'महावीरा' में राजकुमार जी ने संवाद बोले सलमा आग़ा के साथ। रूना लैला ने गाया था फ़िल्म 'एक से बढ़कर एक' में।"

इसी इंटरव्यू में आगे आनंदजी ने ख़ास इस गीत का ज़िक्र करते हुए कहा - "सुंदर जी से गवाया था 'उपकार' में "हम तो हीरे हैं अनमोल, हमको मिट्टी में ना तोल"। और शम्मी जी भी थीं, सब से गवाया। सब से गवाया, बहुत से चरित्र थे और डायरेक्टर भी साथ में थे, मनोज जी, तो उन्होने भी हिम्मत की कि एक एक लाइन सब से क्यों नहीं गवाएँ! इसमें एक चार्म भी है कि नैचरल लगता है, हर कोई आदमी सुर में होता भी नहीं है न, लेकिन वह, ऐसा ही रखो तो और भी अच्छा लगता है कभी कभी। जैसे बच्चा एक तुतला बोलता है तो कितना प्यारा लगता है, बड़ा कोई बोले तो अच्छा नहीं लगेगा। शुरु शुरु में बीवी अच्छी लगती है, बाद में उसकी मिठास भी चली जाती है, माफ़ करना बहनों :)!" तो दोस्तों, आनंदजी के इन्ही शब्दों के साथ आज के आलेख को विराम देते हुए आइए सुनते हैं, अजी सुनते हैं क्या, बल्कि युं कहना चाहिए कि आइए झूम उठते हैं, नाच उठते हैं इस कालजयी बसंती समूह गीत के संग, "आई झूम के बसंत"!



क्या आप जानते हैं...
कि वर्ष १९९२ में पद्मविभूषण के लिए चुना गया था स्व: वी. शान्ताराम को। पद्मभूषण के लिए नौशाद, तलत महमूद, बी. सरोजा देवी, गिरीश कारनाड, और हरि प्रसाद चौरसिया को चुना गया था। और पद्मश्री के लिए चुना गया था आशा पारेख, मनोज कुमार, जया बच्चन, और कल्याणजी-आनंदजी को

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. गीत के मुखड़े में शब्द है "ताल", गीत बताएं -३ अंक.
2. श्रीमति शशि गोस्वामी की मूल कहानी पर आधारित इस फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.
3. इस बेहद खूबसूरत गीत के गीतकार का लिखा ये पहला गीत था, उनका नाम बताएं-२ अंक.
4. लता और महेंद्र कपूर के साथ एक और गायक ने अपनी आवाज़ मिलायी थी इस गीत में उनका नाम बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी और पदम जी ने ३-३ अंकों को अपनी झोली में डाला तो अवध जी और शरद जी भी २-२ अंक कमाने में कामियाब रहे, पारुल आपको गीत पसंद आया, इसे अपनी आवाज़ में गाकर भेजिए कभी :)
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, March 3, 2010

लाई है हज़ारों रंग होली...और हजारों शुभकामनाएं संगीतकार रवि को जन्मदिन की भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 362/2010/62

'गीत रंगीले' शृंखला की दूसरी कड़ी में आप सभी का एक बार फिर स्वागत है। दोस्तों, आप ने बचपन में अपनी दादी नानी को कहते हुए सुना होगा कि "उड़ गया पाला, आया बसंत लाला"। ऋतुराज बसंत के आते ही शीत लहर कम होने लग जाती है, और एक बड़ा ही सुहावना सा मौसम चारों तरफ़ छाने लगता है। थोड़ी थोड़ी सर्दी भी रहती है, ओस की बूँदों से रातों की नमी भी बरकरार रहती है, ऐसे मदहोश कर देने वाले मौसम में अपने साजन से जुदाई भला किसे अच्छा लगता है! तभी तो किसी ने कहा है कि "मीठी मीठी सर्दी है, भीगी भीगी रातें हैं, ऐसे में चले आओ, फागुन का महीना है"। ख़ैर, हम तो आज बात करेंगे होली की। होली फागुन महीने की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता, और आम तौर पर फागुन का महीना ग्रेगोरियन कलेण्डर के अनुसार फ़रवरी के मध्य भाग से लेकर मार्च के मध्य भाग तक पड़ता है। और यही समय होता है बसंत ऋतु का भी। दोस्तों, आज हमने जो गीत चुना है इस रंगीली शृंखला में, वह कल के गीत की ही तरह एक होली गीत है। और क्योंकि आज संगीतकार रवि जी का जनमदिन है, इसलिए हमने सोचा कि क्यों ना उन्ही का स्वरबद्ध किया हुआ वह मशहूर होली गीत सुनवा दिया जाए जिसे आशा भोसले और साथियों ने फ़िल्म 'फूल और पत्थर' के लिए गाया था, "लाई है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिए, कोई मन के लिए"!

'फूल और पत्थर' १९६६ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण व निर्देशन ओ. पी. रल्हन ने किया था। मीना कुमारी, धर्मेन्द्र और शशिकला के अभिनय से सजी यह फ़िल्म बेहद सराही गई थी। इस फ़िल्म के लिए इन तीनों कलाकारों का नाम फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों के लिए क्रम से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री के लिए नामांकित किया गया था। लेकिन इस फ़िल्म के लिए जिन दो कलाकारों ने पुरस्कार जीते, वो थे शांति दास (सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन) तथा वसंत बोरकर (सर्वश्रेष्ठ एडिटिंग्)। इस फ़िल्म में शक़ील बदायूनी और रवि ने मिलकर कुछ कालजयी गानें हमें दिए हैं, जैसे कि "सुन ले पुकार आई आज तेरे द्वार", "शीशे से पी या पयमाने से पी", "ज़िंदगी में प्यार करना सीख ले" और आज का होली गीत। दोस्तों, जैसा कि हमने बताया कि यह होली गीत शक़ील साहब का लिखा हुआ है, तो मुझे एकाएक यह ख़याल आया कि शक़ील साहब ने अपने करीयर में कुछ बेहद महत्वपूर्ण होली गीत हमारी फ़िल्मों को दे गए हैं। आइए कम से कम दो ऐसे गीतों का उल्लेख यहाँ पर किया जाए। फ़िल्म 'कोहिनूर' में उन्होने लिखा था "तन रंग लो जी आज मन रंग लो", जिसका शुमार सर्वोत्तम होली गीतों में होनी चाहिए। फ़िल्म 'मदर इंडिया' में भी एक ऐसा ही मशहूर होली गीत शक़ील साहब ने लिखा था जो आज भी होली के अवसर पर उसी ताज़गी से सुनें और सराहे जाते हैं। याद है ना शम्शाद बेग़म का गाया "होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बांसुरी"! 'फूल और पत्थर' के अलावा शक़ील और रवि के जोड़ी की एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म है 'चौधवीं का चाँद', 'दो बदन', 'घराना', 'घुंघट', और 'दूर की आवाज़' प्रमुख। तो दोस्तों, आइए रवि साहब को एक बार फिर से जनमदिन की शुभकानाएँ देते हैं, आप दीर्घायु हों, उत्तम स्वास्थ्य लाभ करें, और ख़ुशियों के सभी रंग आपकी ज़िंदगी को रंगीन बनाए रखे बिल्कुल आपके गीतों की तरह, और ख़ास कर के आप की बनाई हुई आज के इस प्रस्तुत होली गीत की तरह।



क्या आप जानते हैं...
कि गुरु दत्त साहब के अनुरोध पर शक़ील बदायूनी ने पहली बार नौशाद साहब के बग़ैर फ़िल्म 'चौधवीं का चाँद' में संगीतकार रवि के लिए गीत लिखे, काम शुरु करने से पहले शक़ील ने रवि से कहा था कि "मैंने बाहर कहीं काम नहीं किया है, मुझे संभाल लेना"।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है "उमरिया", गीत बताएं -३ अंक.
2. इस अनूठे गीत के संगीतकार का नाम बताएं - ३ अंक.
3. इस फिल्म के नाम में दो बार एक संख्या का नाम आता है, फिल्म का नाम बताएं- २ अंक.
4. मीना कपूर की आवाज़ में इस गीत के गीतकार कौन हैं -सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी आपका जवाब तो सही है, पर बाकी दुरंधर कहाँ गए, लगता है होली का रंग उतरा नहीं अभी :)
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, January 16, 2010

चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया...यही शिकायत रही ओ पी को ताउम्र

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 316/2010/16

ज १६ जनवरी, संगीतकार ओ. पी. नय्यर साहब का जन्मदिवस है। जन्मदिन की मुबारक़बाद स्वीकार करने के लिए वो हमारे बीच आज मौजूद तो नहीं हैं, लेकिन हम उन्हे अपनी श्रद्धांजली ज़रूर अर्पित कर सकते हैं उन्ही के बनाए एक दिल को छू लेने वाले गीत के ज़रिए। नय्यर साहब के बहुत सारे गानें अब तक हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में सुनवाया है। आज हम जो गीत सुनेंगे वो उस दौर का है जब नय्यर साहब के गानों की लोकप्रियता कम होती जा रही थी। ७० के दशक के आते आते नए दौर के संगीतकारों, जैसे कि राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि, ने धूम मचा दी थी। ऐसे में पिछले पीढ़ी के संगीतकार थोड़े पीछे ही रह गए। उनमें नय्यर साहब भी शामिल थे। लेकिन १९७२ की फ़िल्म 'प्राण जाए पर वचन न जाए' में उन्होने कुछ ऐसा संगीत दिया कि इस फ़िल्म के गानें ना केवल सुपरहिट हुए, बल्कि जो लोग कहने लगे थे कि नय्यर साहब के संगीत में अब वो बात नहीं रही, उनके ज़ुबान पर ताला लगा दिया। आशा भोसले की आवाज़ में इस फ़िल्म का "चैन से हमको कभी आप ने जीने ना दिया, ज़हर जो चाहा अगर पीना तो पीने ना दिया" एक कालजयी रचना है जिसे लिखा था एस. एच. बिहारी साहब ने और धुन जैसा कि हमने बताया नय्यर साहब का। बड़ा ही नर्मोनाज़ुक संगीत है। नय्यर साहब का आम तौर पर जिस तरह का जोशीला और थिरकता हुआ संगीत रहता था, उसके बिल्कुल विपरीत अंदाज़ का यह गाना है। बहुत ही मीठा है और इसके बोल तो दिल को चीर कर रख देते हैं। आज सुनिए इसी कालजयी रचना को, इस बेमिसाल तिकड़ी, यानी कि एस. एच. बिहारी, ओ. पी. नय्यर, और आशा भोसले को सलाम करते हुए।

ओ. पी. नय्यर और आशा भोसले ने साथ साथ फ़िल्म संगीत में एक लम्बी पारी खेली है। करीब करीब १५ सालों तक एक के बाद एक सुपर डुपर हिट गानें ये दोनों देते चले आए हैं। कहा जाता है कि प्रोफ़ेशनल से कुछ हद तक उनका रिश्ता पर्सनल भी हो गया था। ७० के दशक के आते आते जब नय्यर साहब का स्थान शिखर से डगमगा रहा था, उन दिनों दोनों के बीच भी मतभेद होने शुरु हो गए थे। दोनों ही अपने अपने उसूलों के पक्के। फलस्वरूप, दोनों ने एक दूसरे से किनारा कर लिया सन् १९७२ में। इसके ठीक कुछ दिन पहले ही इस गीत की रिकार्डिंग् हुई थी। दोनों के बीच चाहे कुछ भी मतभेद चल रहा हो, दोनों ने ही प्रोफ़ेशनलिज़्म का उदाहरण प्रस्तुत किया और गीत में जान डाल दी। फ़िल्म के रिलीज़ होने के पहले ही इस फ़िल्म के गानें चारों तरफ़ छा गए। ख़ास कर यह गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हो गया था कि फ़िल्मफ़ेयर पत्रिका ने आशा भोसले को उस साल के अवार्ड फ़ंकशन के लिए 'सिंगर ऒफ़ दि ईयर' चुन लिया। लेकिन दुखद बात यह हो गई कि आशा जी नय्यर साहब से कुछ इस क़दर ख़फ़ा हो गए कि वो ना केवल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड लेने नहीं आईं, बल्कि इस फ़िल्म से यह गाना भी हटवा दिया जब कि गाना रेखा पर फ़िल्माया जा चुका था। फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड फ़ंकशन में नय्यर साहब ने आशा जी का पुरस्कार ग्रहण किया, और ऐसा कहा जाता है कि उस फ़ंकशन से लौटते वक़्त उस अवार्ड को गाड़ी से बाहर फेंक दिया और उसके टूटने की आवाज़ भी सुनी। कहने की आवश्यकता नहीं कि आशा और नय्यर के संगम का यह आख़िरी गाना था। समय का उपहास देखिए, इधर इतना सब कुछ हो गया, और उधर इस गीत में कैसे कैसे बोल थे, "आप ने जो है दिया वो तो किसी ने ना दिया", "काश ना आती अपनी जुदाई मौत ही आ जाती"। ऐसा लगा कि आशा जी नय्यर साहब के लिए ही ये बोल गा रही हैं। बहुत अफ़सोस होता है यह सोचकर कि इस ख़ूबसूरत संगीतमय जोड़ी का इस तरह से दुखद अंत हुआ। ख़ैर, सुनिए यह मास्टरपीस और सल्युट कीजिए ओ. पी. नय्यर की प्रतिभा को!



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

जिस राह हम बिछड़े थे,
उस मोड़ पे कभी मिलना,
ये धूप छाया बन जाएगी,
मत पूछना कहाँ,साथ चलना...

अतिरिक्त सूत्र - कल इस बहतरीन गीतकार का जन्मदिन भी है जिन्होंने इस गीत को लिखा है

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी आपने टक्कर दे रखी शरद जी को तगड़ी....२ अंकों के लिए बधाई...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, January 2, 2010

ओ हसीना जुल्फों वाली....जब पंचम ने रचा इतिहास तो थिरके कदम खुद-ब-खुद

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 302/2010/02

'पंचम के दस रंग' शृंखला की दूसरी कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। कल आपने पहली कड़ी में सुनें थे पंचम के गीत में भारतीय शास्त्रीय संगीत की मधुरता। आज इसके बिल्कुल विपरीत दिशा में जाते हुए आप के लिए हम लेकर आए हैं एक धमाकेदार पाश्चात्य धुनों पर आधारित गीत। फ़िल्म 'तीसरी मंज़िल' राहुल देव बर्मन की पहली सुपरहिट फ़िल्म मानी जाती है, जिसमें कोई संशय नहीं है। इसी फ़िल्म में वो अपने नए अंदाज़ में नज़र आए और जिसकी वजह से उन्हे पाँच क्रांतिकारी संगीतकारों में जगह मिली। (बाक़ी के चार संगीतकार हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचंद्र, ओ. पी. नय्यर, और ए. आर. रहमान)। इन नामों को पढ़कर आप ने यह ज़रूर अंदाज़ा लगा लिया होगा कि इन्हे क्रांतिकारी क्यों कहा गया है। तो फ़िल्म 'तीसरी मंज़िल' पंचम की कामयाबी की पहली मंज़िल थी। इस फ़िल्म से फ़िल्म संगीत जगत में उन्होने जो हंगामा शुरु किया था, वह हंगामा जारी रखा अपने अंतिम समय तक। रफ़ी साहब पर केन्द्रित शृंखला के अन्तर्गत इस फ़िल्म से "दीवाना मुझसा नहीं" गीत हमने सुनवाया था और फ़िल्म की जानकारी भी दी थी। आज बस यही कहेंगे कि मजरूह साहब के लिखे इस गीत को गाया रफ़ी साहब और आशा जी ने और गाना फ़िल्माया गया शम्मी कपूर और हेलेन पर। जी हाँ, भले ही आशा पारेख फ़िल्म की हीरोइन थीं पर यह कल्ब सोंग हेलेन पर फ़िल्माया गया था। अब तक आप के ज़हन में इस गानें के दॄश्य ज़रूर उभर चुके होंगे।

आइए आज कुछ बातें करें राहुल देव बर्मन की, और क्योंकि गाना शम्मी कपूर साहब पर फ़िल्माया हुआ है तो क्यों ना जानें शम्मी साहब क्या कहते हैं इस अनोखे संगीतकार के बारे में! इस अंश में वो केवल पंचम के बारे में ही नहीं बल्कि 'तीसरी मंज़िल' से जुड़ी कुछ और यादों को भी पुनर्जीवित कर रहे हैं (सौजन्य: विविध भारती - उजाले उनकी यादों के)। "नासिर मेरा बड़ा क़रीब और जिगरी दोस्त है। पहली पिक्चर डिरेक्ट की थी 'तुमसा नहीं देखा', जिसका मैं हीरो था। फिर 'दिल देके देखो' में भी मैं हीरो था। फिर उसने देव आनंद को ले लिया 'जब प्यार किसी से होता है' में। बहुत ही बढ़िया म्युज़िक था उस पिक्चर का। ख़ैर, एक अरसे के बाद हम फिर साथ में आए, नासिर और मैं, 'तीसरी मंज़िल' के लिए। तो नासिर ने कहा कि इस फ़िल्म के लिए एक नया म्युज़िक डिरेक्टर लेते हैं। मैंने कहा अच्छी बात है। उन्होने कहा कि मुझे भी शौक है, तुझे भी शौक है, 'why should we take Shankar Jaikishan only?' बोले कि आर. डी. बर्मन को लेते हैं। तो एक दिन हम सब सिटिंग् पे बैठे। पंचम ने गाना शुरु किया "दीवाना मुझसा नहीं इस अंबर के नीचे", और मैं भी गा उठा "ए कांचा मलाइ सुनको तारा खसाई देओ ना"। वो पागल हो गया, उठके भाग गया वहाँ से। कहने लगा कि मैं म्युज़िक नहीं दूँगा। मैने यह गाना दार्जिलिंग में सुना था, इसलिए मुझे याद रह गया था। बहुत सारी यादें हैं उस पिक्चर के साथ, इस पिक्चर का पहला गाना पिक्चराइज़ कर रहे थे "ओ हसीना ज़ुल्फ़ोंवाली", और वह गाना ख़त्म किया ही था कि 'my wife fell sick'. Geeta fell sick', और फिर मैं घर चला आया था यहाँ पे, 'and she died'. वह पिक्चर रुक गई, शूटिंग् रुक गई, नासिर ने सेट लगाए रखा महबूब स्टुडियो में तीन महीने तक। और तीन महीनों तक मैने शूटिंग् नहीं की। 'I was not in that mental state', और फिर जब मैं ठीक हो गया, मुझे लगा कि अब मैं शूटिंग् कर सकता हूँ, मैं गया सेट पे और तब वह गाना पिक्चराइज़ होना था "तुमने मुझे देखा हो कर महरबाँ"।" दोस्तों, ये तो थीं कुछ खट्टी मीठी यादें शम्मी कपूर जी के फ़िल्म 'तीसरी मंज़िल' से जुड़ी हुई। अब गीत का आनंद उठाने से पहले ज़रा पंचम दा की भी तो सुन लीजिए कि उनका क्या कहना है इस गीत के बारे में (सौजन्य: जयमाला, विविध भारती): "उसके बाद ('छोटे नवाब' के बाद) मेरी जो बड़ी फ़िल्म, बड़ी यानी कि जिसका स्टार कास्ट बड़ा हो, वह फ़िल्म थी 'तीसरी मंज़िल'। इस फ़िल्म से मुझे नाम और रिकाग्निशन मिला, सब लोग बोलने लगे कि ये अलग टाइप का म्युज़िक देता है,मोडर्न टाइप का। इस फ़िल्म का पहला गाना बना कर मैं आशा जी और रफ़ी साहब के घर गया, उनसे कहा कि यह गाना प्रोड्युसर, डिरेक्टर, शम्मी कपूर, सभी को बहुत पसंद है। रफ़ी साहब को कहा कि आप को इसमें शम्मी कपूर के स्टाइल में गाना पड़ेगा। दोनों ने गाना सुन कर कहा कि इस गाने के लिए तो ४/५ रिहर्सल देने पड़ेंगे। यह सुन कर मैं बहुत प्राउड फ़ील करने लगा कि इतने बड़े सिंगर्स लोग कह रहे हैं कि मेरे गीत के लिए ४/५ रिहर्सल्स देने पडेंगे।" तो सुनिए यह गाना।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

हाथ साफ़ रख हर सौदे में,
न ईमान डिगा दुनिया के डर से,
चलना पड़े अकेला बेशक,
गिर तू कभी अपनी नज़र से...

पिछली पहेली का परिणाम-


खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, October 28, 2009

इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने...."अदा" के तखल्लुस से गज़ल कह रहे हैं शहरयार साहब

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५७

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं सीमा जी की पसंद की आखिरी गज़ल लेकर। सीमा जी की पसंद औरों से काफ़ी अलहदा है। अब आज की गज़ल को हीं ले लीजिए। लोग अमूमन मेहदी हसन साहब, गुलाम अली साहब या फिर जगजीत सिंह जी की गज़लों की फ़रमाईश करते हैं, लेकिन सीमा जी ने जिस गज़ल की फ़रमाईश की है, उसे आशा ताई ने गाया है। इस गज़ल की एक और खासियत है और खासियत यह है कि आज की गज़ल और आज से दो कड़ी पहले पेश की गज़ल (जिसकी फ़रमाईश सीमा जी ने हीं की थी) में दो समानताएँ हैं। दो कड़ी पहले हमने आपको "गमन" फिल्म की गज़ल सुनाई थी और आज हम "उमराव जान" फिल्म की गज़ल लेकर आप सबके सामने हाज़िर हैं। इन दोनों फ़िल्मों का निर्माण मुज़फ़्फ़र अली ने किया था और इन दोनों गज़लों के गज़लगो शहरयार हैं। ऐसा लगता है कि मुज़फ़्फ़र अली हमारी महफ़िल के नियमित मेहमान बन चुके हैं। अब चूँकि मुज़फ़्फ़र अली और शहरयार के बारे में हम बहुत कुछ कह चुके हैं, इसलिए क्यों न आज आशा ताई के बारे में बातें की जाएँ। ८ सितम्बर १९३३ को जन्मी आशा ताई अब ७६ साल की हो चुकी हैं, लेकिन उन्हें सुनकर उनकी उम्र का तनिक भी भान नहीं होता। वैसे शायद आपको पता हो कि इसी साल इनके एलबम "प्रीसियश प्लैटीनम" को विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ एलबम की सूची में ३७ वाँ स्थान मिला है। इस बारे में पूछने पर वो कहती हैं: मैं उस समय कोलकाता में थी। वहाँ मेरा एक बंगाली एलबम रिलीज़ हो रहा था। पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया, क्योंकि यहाँ अपने देश में तो इस एलबम को लोगों ने सुना भी नहीं है ठीक से। वैसे भी अपने देश से बाहर संगीत को सुनने वाले और सराहने वाले श्रोता बहुत हैं। अपने देश में तब उस संगीत को सराहा जाता है जब विदेश में उसको पसंद किया जाता है। आशा ताई की बात में सच्चाई तो है। अगर हमसे पूछें तो हमने भी अभी तक इस एलबम को नहीं सुना है, हाँ लेकिन फ़ख्र तो होता है कि हमारी एक धरोहर धीरे-धीरे विश्व की धरोहर बनती जा रही है। आज के संगीतकारों में शंकर-एहसान-लाय और मोंटी शर्मा को पसंद करने वाली आशा ताई नए गायक-गायिकाओं में किसी को खास पसंद नहीं करतीं। लता मंगेशकर उन्हें अब भी सबसे प्रिय हैं। इस मामले में उनका कहना है: लता मंगेशकर. हम ४५ साल से एक घर में रहते हैं. मां, हम पाँच भाई-बहन सब साथ रहते थे. जहाँ तक लोगों की बात है तो ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना.’

कब तक गाती रहेंगी..यह पूछने पर वो मजाकिया अंदाज़ में कहती हैं: मैं आखिरी साँस तक गाना चाहती हूँ. एक ज्योतिषी ने मुझे बताया था कि मैं ८ साल और जीवित रहूँगी लेकिन गाने के बारे में पूछने पर उन्होंने कुछ नहीं कहा तो समझ लीजिए कम से कम आठ साल अभी और गाऊँगी. पिछले ६५ सालों से गा रहीं आशा ताई को अब तक ८ बार फिल्म-फ़ेयर अवार्ड मिल चुका है। इस दौरान उन्होंने १४ से भी ज्यादा भाषाओं में १२००० से भी ज्यादा गानें गाए हैं। पहली फिल्म कैसे मिली..इस बाबत उनका कहना था: दीदी एक मराठी फ़िल्म माझा बाड़ में काम कर रही थी. उसमें गाने का मौका मिला. यह फ़िल्म १९४४ में बनी थी. उसके बाद ‘अंधों की दुनिया’ में वसंत देसाई ने मौके दिया. हंसराज बहल ने मुझे हिंदी फ़िल्म में पहली बार किसी अभिनेत्री के लिए गाने का मौका दिया. मेरा पहला गाना हिट हुआ १९४८ में, जिसके बोल थे- गोरे गोरे हाथों में. आज के दौर का संगीत पहले के संगीत से काफ़ी अलग है...इस बात पर जोर देते हुए वह कहती है: मैं उस वक्त को याद करती हूं, जब कलाकार बिना पैसा लिए कार्यक्रम देने के लिए आ जाते थे। मैंने उस वक्त उस्ताद विलायत खान को सुना था। प्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद विलायत खान द्वारा संगीतबद्ध १९७६ की फिल्म ‘कादंबरी' में मैंने गाया था। उस दौरान कुछ संगीतकार ऐसे थे, जो कार्यक्रम देने के पहले तैयारी करते थे, जबकि कुछ संगीतकार अचानक कार्यक्रम देते थे। उस्ताद विलायत खान दोनों तरह के संगीतकार थे। जब मैंने गाना शुरू किया था तब और आज के संगीत के परिदृश्य में काफी बदलाव आ गया है। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे उस्ताद अली अकबर खान, उस्ताद विलायत खान, पंडित रविशंकर और शिव हरि ‘पंडित शिवकुमार शर्मा और पंडित हरि प्रसाद चौरसिया' जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला। वक्त के साथ संगीत में काफी फर्क आया है. ‘नया दौर’ से लेकर ‘रंगीला’ के बीच में संगीत में तकनीक का दखल काफी बढ़ गया है और वर्तमान समय का फिल्मी संगीत बिना रूह के इनसान की तरह हो गया है. आजकल का फिल्मी संगीत सुनकर ऐसा लगता है कि संगीत अपनी रूह को खोज रहा है. बेताल को ताल में ढाला जा रहा है और बेसुरे को सुर में ढाला जा सकता है लेकिन भावनाएँ किसी भी सूरत में नहीं ढाली जा सकती हैं. एक जमाने में सुख और दुख, विरह और मिलन एवं वक्त के मुताबिक गीत लिखे जाते थे और उसी भावना से गाए भी जाते थे, लेकिन अब तो फिल्मी गीतों से कोई भाव निकालना बेहद मुश्किल हो गया है। आजकल ज्यादातर गीतों के बोल अच्छे नहीं होते। हालांकि, लिखने वालों की कमी नहीं है, आज भी गुलजार, जावेद अख्तर और समीर जैसे कई अच्छे गीतकार बॉलीवुड में है।

आशा ताई की बात हो और ओ०पी०नैय्यर साहब और पंचम दा का ज़िक्र न हो, यह कैसे संभव है। इन दोनों को याद करते हुए आशा ताई अतीत के पन्नों में खो-सी जाती हैं: मुझे लोकप्रियता नैयर साहब का साथ मिलने के बाद मिली..यह बात कुछ हद तक सही है. उस जमाने में सी रामचंद्र के गाने भी बहुत हिट हुए. ईना-मीना-डीका बहुत हिट रहा. मैं सिर्फ़ आर डी बर्मन का नाम भी नहीं लूँगी. हर संगीत निर्देशक का मेरे करियर में योगदान रहा है. मसलन मदन जी का ‘झुमका गिरा रे’, रवि साहब का ‘आगे भी जाने न तू’, शंकर जयकिशन का ‘पर्दे में रहने दो’. आर डी बर्मन मेरे पहले भी पसंदीदा संगीतकार थे आज भी हैं और कल भी रहेंगे. ये बात सिर्फ़ मेरे लिए नहीं बल्कि सबके लिए है. सभी संगीत निर्देशक, गायक आज महसूस करते हैं कि उनके जैसा संगीत कोई नहीं दे सकता. उनका गाना सिखाने का तरीका सबसे अलग था. वह गायक को नर्वस नहीं होने देते थे. उन्हें पता था कि गायक को किस तरह गंवाना चाहिए और बड़े ही प्यार से गायक से गीत गवा लेते थे. मुझे उनके गाने गाने में बहुत मजा आता था. वैसे भी मुझे नई चीज़ें करना अच्छा लगता था. बहुत मेहनत से गाते थे. बर्मन साहब को भी अच्छा लगता था कि मैं कितनी मेहनत करती हूँ. तो कुल मिलाकर अच्छी आपसी समझदारी थी. तो मैं कहूँगी कि हमारे बीच संगीत से प्रेम बढ़ा, न कि प्रेम से हम संगीत में नजदीक आए. आजकल जब कोई उनके पुराने गानों को तोड़-मरोड़कर गाता है, उससे दुख होता है. ‘चुरा लिया है तुमने’ को बाद में जिस तरह से गाया गया. उससे मुझे और बर्मन साहब को बहुत दुख हुआ था. अब अगर घर में हीं संगीत-शिरोमणि विराजमान हों तो तुलना होना लाजिमी है। इस बाबत वह कहती हैं: गुलज़ार भाई ने कहा था कि लोग कहते हैं कि आशा नंबर वन है, लता नंबर वन है. उनका कहना था कि अंतरिक्ष में दो यात्री एक साथ गए थे, लेकिन जिसका क़दम पहले पड़ा नाम उसका ही हुआ. मुझे खुशी है कि पहला क़दम दीदी का पड़ा और मुझे इस पर गर्व है. वैसे भी किसी को अच्छा कहने के लिए किसी और को ख़राब कहना ज़रूरी नहीं है. १६ आने खड़ी बात की है आशा ताई ने। तो चलिए आशा ताई के बारे में हमने आपको बहुत सारी जानकारी दे दी, अब हम आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। उससे पहले "शहरयार" साहब का एक बेमिसाल शेर पेश-ए-खिदमत है:

हमराह कोई और न आया तो क्या गिला
परछाई भी जब मेरी मेरे साथ न आयी...


क्या बात है!!! पढकर ऐसा लगता है कि मानो कोई हमारी हीं कहानी सुना रहा हो। आप क्या कहते हैं?

अब पेश है वह गज़ल जिसके लिए आज की महफ़िल सजी है। हमें पूरा यकीन है कि यह आपको बेहद पसंद आएगी। तो लुत्फ़ उठाने के लिए तैयार हो जाईये, हाँ ध्यान देने की बात यह है कि फिल्म उमराव जान में नायिका का नाम "अदा" था, इसलिए शहरयार साहब ने "अदा" तखल्लुस का इस्तेमाल किया है:

जुस्तजू जिस की थी उस को तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने

तुझको रुसवा न किया ख़ुद भी _____ न हुये
इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने

कब मिली थी कहाँ बिछड़ी थी हमें याद नहीं
ज़िन्दगी तुझको तो बस ख़्वाब में देखा हमने

ऐ "अदा" और सुनाये भी तो क्या हाल अपना
उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तन्हा हमने




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बुनियाद" और शेर कुछ यूं था -

आज जो दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन ये थी कि बुनियाद हिलनी चाहिए....

दुष्यंत कुमार के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना शामिख फ़राज़ ने। आपने "बुनियाद" शब्द पर यह शेर पेश किया:

मुनव्‍वर मां के आगे यूं कभी खुलकर नहीं रोना
जहां बुनियाद हो इतनी नमी अच्‍छी नहीं होती। (मुनव्वर राणा)

इनके बाद महफ़िल की शोभा बनीं सीमा जी। यह रही आपकी पेशकश:

गहे रस्न-ओ-दार के आग़ोश में झूले
गहे हरम-ओ-दैर की बुनियाद हिला दी (अहमद फ़राज़)

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी (साहिर लुधियानवी)

शामिख जी और सीमा जी के बाद महफ़िल में नज़र आए शरद जी। आपने पहली मर्तबा खुद के लिखे शेर नहीं कहे। चलिए कोई बात नही...यह भी सही। चाहे यह शेर आपका न हो, लेकिन क्या खूब कहा है:

हम वो पत्थर हैं जो गहरे गढ़े रहे बुनियादों में,
शायद तुमको नज़र न आए इसीलिए मीनारों में। (आर.सी.शर्मा ’आरसी’)

निर्मला जी, आप आतीं कैसे नहीं...आना तो था हीं, आखिर महफ़िल का सवाल है। बस कभी ऐसा हो कि आपके साथ कुछ शेर भी आ जाएँ तो मज़ा आ जाए।
राकेश जी, महफ़िल में आपका स्वागत है। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

डिग नहीं सकती कभी नीयत सरे बाज़ार में.
शर्त इतनी है कि बस बुनियाद पक्की चाहिए.

इन सब के बाद महफ़िल में आईं मंजु जी। यह रहा आपका अपने हीं अंदाज़ का स्वरचित शेर(जिसे पिछली बार शरद जी ने शेरनी घोषित कर दिया था :) ):

हम तो बुनियाद के बेनाम पत्थर हैं ,
जिस पर महल खड़ा .

महफ़िल में आखिरी शेर कहा कुलदीप जी ने। हुजूर, इस बार आपने बड़ी देर लगा दी। अगली बार से समय का ध्यान रखिएगा। आपने मीराज़ साहब का यह शेर महफ़िल में पेश किया:

हम भी हैं तामीले वतन में बराबर के शरीक
दरो दीवार अगर तुम हो तो बुनियाद हैं हम

दिशा जी और सुमित जी, आप दोनों कहाँ रह गए। महफ़िल में आने के बाद शेर कहने की परम्परा है, पता है ना!

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, October 15, 2009

दाता सुन ले- "बावरे फकीरा" के नेट लॉन्च के साथ नमन करते हैं शिरडीह साईं बाबा को, साथ ही जानिए कि कैसा है लता की दिव्य आवाज़ में नए दौर का "जेल" भजन

ताजा सुर ताल TST (30)

दोस्तों, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर के एपिसोडों से लगभग अगले 20 एपिसोडों तक, जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में आये एक नए प्रतिभागी महिलाओं को चुनौती देने. चलिए हमारे कहने का असर हुआ, और विश्व दीपक तन्हा जी भी मैदान में कूद पड़े, पर 3 में से 2 जवाब सही दिए, एक जगह चूक कर गए. और उनकी भूल का फायदा उठा कर सीमा जी फिर 2 अंक चुरा लिए. सीमा जी का स्कोर हुआ है अब 12, तन्हा जी ने शानदार शुरुआत की 4 अंकों के साथ. दिशा जी अभी भी 2 अंकों पर जमी है, सभी को आज के लिए शुभकामनायें.

सजीव - सुजॉय, आज का TST ख़ास है कुछ, लेकिन इससे पहले कि मैं ये बताऊं क्यों, मेरी तरफ से और पूरे युग्म परिवार की तरफ से आवाज़ के सबसे लोकप्रिय होस्ट को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएँ दे देता हूँ, जी हाँ दोस्तों आज सुजॉय का जन्मदिन है, मुबारक हो सुजॉय :)

सुजॉय - धन्यवाद सजीव, और मेरे सभी साथियों का....शुक्रिया.

सजीव - जानते हैं आज के दिन का एक और बहुत बड़ा महत्त्व है. शिरडी के साईं बाबा ने आज ही दिन देह त्याग कर स्वर्ग के लिए पलायन किया था. उनकी स्तुति का ये दिन बेहद ख़ास है देश विदेश में फैले बाबा के असंख्य भक्तों के लिए, आज हम भी TST पर बाबा सो नमन करते हुए एक ऐसा गीत सुनवाने जा रहे हैं, जो नेट पर आज पहली बार बजेगा.

सुजॉय - दोस्तो, आभास जोशी एक उभरते हुए गायक हैं जिन्होंने वॉइस ऑफ़ इंडिया प्रतियोगिता में विशेष जूरी सम्मान हासिल किया, बेहद कम उम्र में उनके गायन के चर्चे मशहूर हो चुके है और अब जल्दी ही बॉलीवुड में भी उनकी दस्तक गूँजेगी...

सजीव - आभास जिन दिनों प्रतियोगिता का हिस्सा थे ये एल्बम "बावरे फकीरा" बाज़ार में आ चुकी थी, इस एल्बम के गीतकार गिरीश बिल्लोरे जी ने हमें बताया कि इस एल्बम की बिक्री से अर्जित आय को विकलांग बच्चों के लिए कार्य कर रही एक संस्था को दान कर दिया गया, यानी कि संगीत माध्यम से समाज के उद्धार का एक अच्छा उदहारण है ये....

सुजॉय - यकीनन, पर इससे पहले कि आज इस एल्बम के शीर्षक गीत को पहली बार नेट पर सुनें, स्वागत करें इस भजन के रचेता गिरीश बिल्लोरे और युवा गायक आभास जोशी का, जो आज हमारे बीच हैं....स्वागत है आप दोनों का TST में...

सजीव - गिरीश जी आपने आभास के उत्थान में अहम भूमिका निभाई है, जहाँ तक मेरी जानकारी है ये आभास का पहला एल्बम है, तो क्या ये एल्बम आपने प्लान की आभास के लिए?

गिरीश -सजीव जी,सबसे पहले हिन्द-युग्म परिवार का हार्दिक आभारी हूँ कि आपने "साईं-बाबा के बताए अध्यात्मिक चिंतन पर केंद्रित एलबम "बावरे-फ़कीरा" के इन्टर-नेट संस्करण की लांचिंग का कार्य किया है" जहां तक आभास के उत्थान में मेरे अवदान को आपने रेखांकित किया है यह आप का बडप्पन है। वास्तव में आभास को सेलिब्रिटि खुद आभास की मेहनत बाबा के आशीर्वाद ने बनाया। मैनें तो बस जो किया स्वर्गीया सव्यसाची मां प्रमिला देवी की प्रेरणा से किया. उसका लाभ आभास को मिला यह मेरा सौभाग्य है.

बावरे-फ़कीरा एलबम की प्लानिग की ज़िम्मेदार दो घटनाएं हैं। शहर के एक सिंगर ने मेरे गीत फेंक दिए थे यह कह कर ये भी कोई गीत हैं। फिर गीत मैनें कम्पोज़ीशन मेरे करीबी परिचित संगीतकार ने गीतों को घर की पुताई में खो दिए कुल मिला कर उपेक्षा का शिकार मेरे भजन पांच साल तक गोया आभास का इंतज़ार कर रहे थे .... 2006 में श्रेयास जोशी ने संगीतबद्ध कर आभास के सुरों को सौंप दिये ये गीत। सजीव जी, मां के निर्देश पर साहित्य से मुझे रोटी नहीं कमाना था सो मैंने अपने एलबम पीड़ित मानवता की सेवा को समर्पित किया जाना उचित समझा।

सुजॉय - आभास आप और तोशी उस मुकाबले में "वाईल्ड कार्ड एंट्री" से आये, निर्णायकों की ख़ास पसंद बने थे आप, इन सब का अब तक आप को क्या फायदा मिलता है जब आप किसी संगीतकार से संपर्क में आते हैं, 2007 में हुए उस मुकाबले से लेकर अपने अब तक के सफ़र के बारे में संक्षेप में हमारे श्रोताओं को बताएं?

आभास -एक अदभुत दौर था। मैं क्या हममें से कोई भी भुला नहीं पा रहा है दर्शकों का प्यार करतें। निर्णायकों की महत्वपूर्ण टिप्पणियां, जो हमारे कैरियर के लिए सहयोगी ही साबित हुईं हैं। सुजॉय जी, 2007 में संग-ए-मरमर के शहर जबलपुर से मायानगरी गया आभास मुम्बई का ही हो गया है। बमुश्किल चार दिन का वक्त मिला है "जबलपुर" आकर दादी का दुलार पाने के लिये। सच मुझे वाइल्ड कार्ड एंट्री और निर्णायकों की पसंद बनने से लाभ ही हुआ है। काम मिला है दो फ़िल्में, बावरे-फ़कीरा के बाद दो और एलबम देश-विदेश में स्टेज़ शोज, कुल मिला कर कम समय में बाबा ने बहुत कुछ दिया सच साई दो दो हाथों से देने वाला दाता है।

सजीव - क्या आपके बाकी प्रतिभागी साथी अभी भी संपर्क में हैं?, इश्मित की मौत का यकीनन आप सब को सदमा होगा ...

आभास -सजीव जी, सभी नेट, फ़ोन के ज़रिये संपर्क में तो हैं..... किन्तु सभी भाग्यशाली हैं यानी सभी व्यस्त हैं अत: मुलाकातें कम ही हो पातीं हैं। इश्मीत की याद आते ही वो दिन इतने याद आतें हैं कि अपने आप को रोकना मुश्किल हो जाता है। कोई न कोई बात आंखों को भिगो ही देती है। 29 जुलाई को इश्मीत जी की पहली पुण्यतिथि पर हम सभी लुधियाना गए थे। मोम से बनाए इश्मीत जी के स्टैच्यू देख कर लगा बस अब इश्मीत उठेंगें और छेड देंगे तान। ईश्वर इश्मीत को एक बार और हमारे बीच भेजे।

सुजॉय - गिरीश जी जैसा की आपने बताया कि आपके एल्बम का एक सामाजिक पक्ष भी था, क्या आगे भी आभास के साथ मिलकर आपकी ऐसी कोई योजना है जिससे संगीत माध्यम से समाज के कल्याण में योगदान हो सके।

गिरीश - जी हां, सच है बाबा के आशीर्वाद से मध्य-प्रदेश राज्य सरकार में बाल विकास परियोजना अधिकारी हूँ। रोज़गार मेरी समस्या नहीं है। सव्यसाची ने कहा था "तुम्हारी कविता समाज का कल्याण करे" सो इस एलबम से प्राप्त आय जबलपुर में आयी लाइफ़ लाइन एकस्प्रेस की व्यवस्था हेतु जिला प्रशासन को दी गई है। आगे भी जो लाभ होगा उससे पोलियो-ग्रस्त बच्चों की मदद जारी रहेगी जिसका ज़िम्मा सव्यसाची कला ग्रुप को सौंपा है। आगे भी मेरा प्लान नेत्रहीन-भिक्षुक के तम्बूरे से बिखरी संगीत रचनाओं को आपके समक्ष लाना यह प्रोजेक्ट भी अब मेरे पास है शीघ्र ही सबके हाथों होगा जिसकी आय नेत्रहीन व्यक्तियों की मदद हेतु होगी।

सजीव - आभास आपकी आवाज़ में एक अलग सी ही कशिश है, हम तो यही दुआ करेंगें कि जल्दी आप हिंदी सिनेमा के जाने माने पार्श्व गायकों की कतार में शामिल हो जाएँ, आपको और गिरीश जी को हमारी शुभकामनाएं।

आभास - उन दिनों जब मैं वी ओ आई का प्रतिभागी था मेरे जितेन्द्र चाचा और गिरीश चाचा ने हिन्द-युग्म की साईट खोल कर बताया था कि आपने मुझे कितना संबल दिया। सच, हिंद-युग्म ने एक ये और काम किया कि नेट पर मेरे गाए एलबम को ज़गह दी, आभार के शब्द कम पड़ रहे हैं। बस कृतज्ञ हूँ कह पा रहा हूँ।

गिरीश - हिन्द-युग्म ने "बावरे-फ़कीरा" के नेट संस्करण की लांचिंग का जो कार्य किया है उसका हार्दिक आभारी हूँ।

बावरे फकीरा (आभास जोशी)
आवाज़ रेटिंग - लागू नहीं.



TST ट्रिविया # 10-जिस प्रतियोगिता में आभास को जूरी सम्मान मिला उस प्रतियोगिता में एक फीमेल प्रतिभागी को भी विशेष जूरी सम्मान ने नवाजा गया था, क्या है इस गायिका का नाम?

सुजॉय - सजीव, आज का 'ताज़ा सुर ताल' बेहद बेहद ख़ास है! एक तो ये की हमारे कार्यक्रम में दूसरी बार कोई गायक मेहमान बन कर आये, और अब दूसरा और तीसरा गीत भी कुछ बेहद ख़ास होने वाला है।

सजीव - वह कैसे भला?

सुजॉय - आज हम दो ऐसी आवाज़ें लेकर आए हैं जिनके बारे में हम इतना कह सकते हैं कि आज यही दो ऐसी आवाज़ें हैं जिनका जादू 'ओल्ड इज़ गोल्ड' और 'ताज़ा सुर ताल', दोनों पर चल सकती है।

सजीव - यानी कि विविध भारती के कार्यक्रमों के संदर्भ में अगर कहे तो 'भूले बिसरे गीत' और 'चित्रलोक' दोनों में ये आवाज़ें बज सकती हैं?

सुजॉय - जी बिल्कुल!

सजीव - तब तो ये लता जी और आशा जी के अलावा कोई और हो ही नहीं सकता।

सुजॉय - ठीक कहा आपने, लेकिन इस जवाब के लिए कोई अंक नहीं मिलेंगे आपको! :-)

सजीव - इसका मतलब सुजॉय कि आज हम मधुर भंडारकर की नई फ़िल्म 'जेल' का गीत सुनने जा रहे हैं लता जी की आवाज़ में?

सुजॉय - जी बिल्कुल! जैसा कि भंडारकर साहब ने कुछ दिन पहले कहा था कि लता जी का गाया यह 'जेल सॉन्ग' एक 'नए दौर का जेल सॉन्ग‍' होगा, जो हमें याद दिलाएगा वी. शांताराम की फ़िल्म 'दो आँखें बारह हाथ' का भजन "ऐ मालिक तेरे बंदे हम"।

सजीव - मैने 'जेल' का यह गीत "दाता सुन ले, मौला सुन ले" सुना है, लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि मधुर साहब की बात में शायद उतना वज़न नहीं है। इसमें कोई शक़ नहीं कि 80 साल की उम्र में भी लता जी ने जिस आवाज़ का परिचय दिया है, सुनने वाला हैरत में पड़े बिना नहीं रह सकता। लेकिन मुझे इस गीत के संगीतकार शमीर टंडन से यही शिकायत रहेगी कि इस गीत को उन्होने करीब करीब फ़िल्म 'पुकार' के गीत "एक तू ही भरोसा एक तू ही सहारा" की तरह ही कम्पोज़ किया है। उन्हें कुछ अलग करना चाहिए था। क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता?

सुजॉय - मैं आपसे सोलह आने सहमत हूँ। इससे बेहतर मुझे 'पेज ३' का गीत अच्छा लगा था "कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पे"। ख़ैर, हमें लता जी की आवाज़ सुनने को मिली है किसी फ़िल्म में एक अरसे के बाद, हम तो भई उसी से ख़ुश हैं। और मेरा ख़याल है कि इस गीत को अंक देने की गुस्ताख़ी मैं नहीं कर सकता। क्योंकि हम उस लायक नहीं कि लता जी के गाए गीत का आकलन कर सके। इसलिए बेहतर यही होगा कि कम से कम इस गीत के लिए हम अंकों की तरफ़ न जाएँ, लता जी इन सब से परे हैं।

सजीव- ठीक है बाकी फैसला श्रोताओं पे छोड़ते हैं...

दाता सुन ले (जेल)
आवाज़ रेटिंग - लागू नहीं



TST ट्रिविया # 11- शमीर टंडन के निर्देशन में किस मशहूर क्रिकटर ने अपनी आवाज़ का जलवा दिखाया है?

सजीव - लता जी की आवाज़ तो हम सब ने सुन ली, अब आशा जी का गाया कौन सा तरो ताज़ा गीत सुनवा रहे हो 'आवाज़' के शैदाईयों को?

सुजॉय - यह एक ग़ैर फ़िल्मी गीत है जिसे आशा जी ने अपने पोते चिंटु (Chin2) के साथ गाया है, चिंटु के ही संगीत निर्देशन में। इस ऐल्बम का नाम है 'सपने सुहाने', और पूरे ऐल्बम में आशा जी बस यही एकमात्र गीत गाया है, बाक़ी सभी गानें चिंटु की ही आवाज़ में है।

सजीव - यानी कि एक 'X-factor' लाने के लिए ही आशा जी से यह गीत गवाया गया है। पिछले साल आशा जी का अपना एक सोलो ऐल्बम आया था 'प्रीशियस प्लैटिनम', जिसे Amazon World Music Chart में टॊप ४० में चुना गया था। और इस साल उन्होने अपने पोते के इस ऐल्बम में अपनी आवाज़ मिलाई, एक ही गीत में सही। सुजॉय, क्या ये चिंटु, आशा जी के बड़े बेटे हेमन्त का बेटा है?

सुजॉय - हाँ, हेमन्त भोसले, जिन्होने दो एक फ़िल्मों में संगीत भी दिया था, जैसे कि फ़िल्म 'जादू टोना', जिसमें उन्होने ना केवल आशा जी को गवाया बल्कि अपनी बहन वर्षा भोसले को भी गवाया था। और अब उनके बेटे चिंटु की बारी है अपनी दादी को गवाने का।

सजीव - यह वही चिंटु है जो यहाँ की पहले पहली बॉय बैंड 'A Band of Boys' का एक सदस्य हुआ करता था। इसके बाद वो गुमनामी में चला गया और कई रेडियो स्टेशन्स पर जॉकी का काम किया, एम. बी. ए होने की वजह से कई कंपनियों में नौकरी भी की। लेकिन संगीत की जो परंपरा उसके परिवार में थी, वही उसे एक बार फिर से खींच लाई, करीब करीब ११ साल बाद इस 'सपने सुहाने' एल्बम के ज़रिए।

सुजॉय- और यह गीत सुनने से पहले आप सभी को बता दें कि इस ऐल्बम का विमोचन किया गया था आशा जी के जन्मदिन की पूर्वसंध्या, यानी कि ७ सितंबर को। तो आइए सुनते हैं रॉक एन् रोल स्टाइल में "प्यार ख़ुशनसीब"। और देते हैं चिंटु को एक उज्ज्वल भविष्य की ढेरों शुभकामनाएँ।

प्यार खुशनसीब (सपने सुहाने)
आवाज़ रेटिंग -लागू नहीं



TST ट्रिविया # 09 -चिंटू भोसले का वास्तविक नाम क्या है ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Tuesday, September 15, 2009

बज उठेंगीं हरे कांच की चूडियाँ....आशा की आवाज़ में एक चहकता नग्मा...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 203

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' जी के फ़रमाइशी नग़में। आज बारी है उनके पसंद का तीसरा गीत सुनने की। आशा भोंसले की आवाज़ में यह गीत है फ़िल्म 'हरे कांच की चूड़ियाँ' का शीर्षक गीत "बज उठेंगी हरे कांच की चूड़ियाँ"। यह गीत बहुत ज़्यादा प्रचलित गीतों में नहीं गिना जाता है, और शायद हम में से बहुत लोगों को यह गीत कभी कभार ही याद आता होगा। ऐसे में इस सुंदर गीत का ध्यान हम सब की ओर आकृष्ट करने के लिए हम अदा जी का शुक्रिया अदा किए बग़ैर नहीं रह सकते। 'हरे कांच की चूड़ियाँ' १९६७ की फ़िल्म थी। नायिका प्रधान इस फ़िल्म में नैना साहू ने मुख्य भूमिका निभायी और उनके साथ में थे विश्वजीत, नासिर हुसैन, सप्रू, और राजेन्द्र नाथ प्रमुख। फ़िल्म की मूल कहानी कुछ इस तरह की थी कि मोहिनी (नैना साहू) प्रोफ़ेसर किशनलाल (नासिर हुसैन) की बेटी है। मोहिनी मेडिकल की छात्रा है जो सभी के साथ खुले दिल से मिलती जुलती है। एक बार वो बेहोश हो जाने के बाद जब डाक्टरी जाँच करायी जाती है तो डाक्टर उसे गर्भवती करार देता है। किशनलाल की जैसे दुनिया की उलट जाती है। कहानी उस ज़माने के लिहाज़ से थोड़ी प्राप्त वयस्क थी, जिसकी वजह से शायद यह उतनी कामयाब नहीं रही। लेकिन हमें यहाँ तो मतलब है बस अच्छे अच्छे गानें सुनने से, जो कि इस फ़िल्म में भी थे। किशोर साहू ने इस फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन किया था। अब नैना साहू उनके क्या लगते हैं, यह मैं आप पर छोड़ता हूँ, पता कर के मुझे भी ज़रूर बताइएगा, मैं इंतज़ार करूँगा! शंकर जयकिशन का इस फ़िल्म में संगीत था और इस गीत को लिखा शैलेन्द्र ने।

दोस्तों, यह गीत उन गीतों में से हैं जिनमें मुखड़ा और अंतरा एक जैसा ही होता है। चलिए कुछ उदाहरण दिया जाए। महेन्द्र कपूर की आवाज़ मे फ़िल्म 'हमराज़' का गीत "नीले गगन के तले धरती का प्यार पले", और 'फिर सुबह होगी' का शीर्षक गीत "वो सुबह कभी तो आएगी" में मुखड़ा और अंतरे एक ही मीटर पर, एक ही धुन पर लिखा गया है। ठीक वैसे ही 'हरे कांच की चूड़ियाँ' फ़िल्म के इस गीत में भी वही बात है। "धानी चुनरी पहन, सज के बन के दुल्हन, जाउँगी उनके घर, जिन से लागी लगन, आयेंगे जब सजन, जीतने मेरा मन, कुछ न बोलूँगी मैं, मुख न खोलूँगी मैं, बज उठेंगी हरे कांच की चूड़ियाँ, ये कहेंगी हरे कांच की चूड़ियाँ"। कुछ कुछ श्रृंगार रस पर आधारित इस गीत में एक लड़की के नये नये ससुराल में प्रवेश के समय का वर्णन हुआ है, कि किस तरह से वो अपने पति और नये परिवार के लोगों के दिलों को जीत लेंगी। क्योंकि ज़ाहिर सी बात है कि नयी दुल्हन ससुराल के पहले पहले दिनों में शर्म-ओ-हया के चलते अपने मुख से कुछ नहीं बोलती, इसलिए वो अपने जज़्बातों और तमन्नाओं को अपने नये परिवार वालों तक पहुँचाने का दायित्व अपने हरे कांच की चूड़ियों पर छोड़ती है। बहुत ही सुंदर शब्दों में पिरो कर शैलेन्द्र ने चूड़ियों का मानवीकरण किया है। तो लीजिए पेश है हरे कांच की चूड़ियों की कहानी आशा जी की ज़बानी।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. गीतकार इन्दीवर का लिखा एक शानदार गीत.
२. फिल्म में राजेश खन्ना और शर्मीला टैगोर की प्रमुख भूमिकाएं थी.
३. अंतरे में ये शब्द आता है -"कविता".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी २८ अंकों पर आने की बधाई....लगता है आप ही सबसे पहले मंजिल पर पहुंचेंगीं...पराग जी, सबसे पहली बात, आवाज़ मंच किसी एक कलाकार या किसी ख़ास युग को समर्पित नहीं है, यहाँ संगीत विशेषकर हिंदी फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी संगीत पर चर्चा होती है. आनंद बक्शी पहले गीतकार नहीं है आवाज़ पर जिनकी तारीफ़ हुई हो, शायद ही आपने ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय जी के आलेख में कभी किसी कलाकार की बुराई पायी हो, किसी की भी तारीफ करने का अर्थ दूसरे को बुरा कहना हरगिज़ नहीं है, फिल्म संगीत में आप आनंद बक्शी साहब के योगदान को कहीं से भी कमतर नहीं आंक सकते, यकीनन वो सबसे अधिक सफल गीतों को लिखने वाले गीतकार हैं, यो तो तथ्य है जिससे न आप इनकार कर सकते हैं न हम मुकर सकते हैं. आपने जिन महान गीतकारों की चर्चा की उन पर आलेख लिखेंगें तो हमें यकीनन बहुत ख़ुशी होगी, पर कृपया ये निवेदन हमारा सभी संगीत प्रेमियों से है कि यदि हम ए आर रहमान की तारीफ़ करें तो उसे नौशाद साहब की बुराई न समझा जाए....दोनों का अपना महत्त्व है...अपना क्लास है....ये सभी संगीत के विविध रूप हैं और ये अच्छा ही है कि हमारे पास ऐसी विविधता है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, September 10, 2009

ये काफिला है प्यार का चलता ही जायेगा....मुकेश और आशा ने किया था अपने श्रोताओं से वादा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 198

युं तो आशा भोंसले और मुकेश ने अलग अलग असंख्य गीत गाए हैं, लेकिन जब इन दोनों के गाए हुए युगल गीतों की बात आती है तो हम बहुत ज़्यादा लोकप्रिय गीतों की फ़ेहरिस्त बनाने में असफल हो जाते हैं। हक़ीकत यह है कि मुकेश ने ज़्यादातर लता जी के साथ ही अपने मशहूर युगल गीत गाए हैं। लेकिन फिर भी आशा-मुकेश के कई युगल गीत हैं जो यादगार हैं। ख़ास कर राज कपूर की उन फ़िल्मों में जिनमें लता जी की आवाज़ मौजूद नहीं हैं, उनमें हमें आशा जी के साथ मुकेश के गाए गानें सुनने को मिले हैं, जैसे कि 'फिर सुबह होगी', 'मेरा नाम जोकर', वगेरह। राज कपूर कैम्प से बाहर निकलें तो आशा-मुकेश के जिन गीतों की याद झट से आती है, वे हैं 'एक बार मुस्कुरा दो' फ़िल्म के गानें और फ़िल्म 'तुम्हारी क़सम' का "हम दोनो मिल के काग़ज़ पे दिल के चिट्ठी लिखेंगे जवाब आएगा"। आज हमने जिस युगल गीत को चुना है वह इन में से कोई भी नहीं है। बल्कि हम जा रहे हैं बहुत पीछे की ओर, ४० के दशक के आख़िर में। १९४८ में हंसराज बहल के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'चुनरिया' से शुरुआत करने के बाद १९४९ में आशा भोंसले ने फ़िल्म 'लेख' में मुकेश के साथ एक युगल गीत गाया था। आज आप को सुनवा रहे हैं वही भूला बिसरा गीत जो आज फ़िल्म संगीत के धरोहर का एक अनमोल और दुर्लभ नग़मा बन गया है। कृष्ण दयाल के संगीत में यह गीत है "ये काफ़िला है प्यार का चलता ही जाएगा, जी भर के हँस ले गा ले ये दिन फिर न आएगा"। युं तो आशा जी को हिट गानें देकर मशहूर ओ.पी. नय्यर ने ही किया था, लेकिन आशा जी ने एक बार कहा था कि वो नय्यर साहब से भी ज़्यादा शुक्रगुज़ार हैं उन छोटे और कमचर्चित संगीतकारों के, जिन्होने उनके कठिन समय में उन्हे अपनी फ़िल्मों में गाने के सुयोग दिए, जिससे कि उनके घर का चूल्हा जलता रहा। दोस्तों, उन दिनों आशा जी अपने परिवार के खिलाफ़ जा कर शादी कर लेने की वजह से मंगेशकर परिवार से अलग हो गईं थीं, लेकिन उनका विवाहित जीवन भी जल्द ही दुखद बन गया था। कोख में पल रहे बच्चे की ख़ातिर उन्हे काम करना पड़ा, और इन्ही दिनों इन छोटे संगीतकारों और कम बजट की फ़िल्मों में उन्होने गानें गाए। तो फिर कैसे भूल सकती हैं आशा जी उन संगीतकारों को! अगर नय्यर और पंचम ने आशा को शोहरत की बुलंदियों तक पहुँचाया है, तो इन कमचर्चित संगीतकारों ने उन्हे दिया है भूख और गरीबी के दिनों में दो वक़्त की रोटी। अब आप ही यह तय कीजिए कि किन संगीतकारों का योगदान आशा जी के जीवन में बड़ा है।

फ़िल्म 'लेख' बनी थी सन् १९४९ में लिबर्टी आर्ट प्रोडक्शन्स के बैनर तले, जिसे निर्देशित किया था जी. राकेश ने। मोतीलाल, सुर‍य्या, सितारा देवी, और कुक्कू ने फ़िल्म में अभिनय किया था। सितारा देवी फ़िल्म में सुरय्या की माँ बनीं थीं, जिसमें उन्होने एक नृत्यांगना की भूमिका निभाई थी, जो अपना असली परिचय छुपाती है ताकि उसकी बेटी का किसी इज़्ज़तदार घराने में शादी हो सके। लेकिन नियती और हालात उन्हे अपनी ही बेटी की शादी के जल्से में नृत्य करने के लिए खींच लायी। यही थी 'लेख' की कहानी, भाग्य का लेख, नियती का लेख, जिसे कोई नहीं बदल सकता। इस फ़िल्म के गानें लिखे थे अमर खन्ना और क़मर जलालाबादी ने। प्रस्तुत गीत क़मर साहब का लिखा हुआ है। 'काफ़िला' शब्द का फ़िल्मी गीतों में प्रयोग उस ज़माने में बहुत ज़्यादा नहीं हुआ था और ना ही आज होता है। इस शब्द का सुंदर प्रयोग क़मर साहब ने इस दार्शनिक गीत में किया था। भले ही यह गीत आशा और मुकेश की आवाज़ों में है, लेकिन यह उन दोनों के शुरूआती दौर का गीत था, जिसमें उस ज़माने के गायकों के अंदाज़ का प्रभाव साफ़ झलकता है। इस गीत को सुनते हुए मुझे, पता नहीं क्यों, अचानक याद आया १९९९ की फ़िल्म 'सिलसिला है प्यार का' का शीर्षक गीत "ये सिलसिला है प्यार का ये चलता रहेगा"। तो लीजिए दोस्तों, कृष्ण दयाल के साथ साथ उस ज़माने के सभी कमचर्चित संगीतकारों को सलाम करते हुए, जिन्होने आशाजी को निरंतर गाने के अवसर दिए थे कठिनाइयों के उन दिनों में, सुनते हैं फ़िल्म 'लेख' से आशा और मुकेश का गाया यह युगल गीत।



गीत के बोल:
मुकेश: ये क़ाफ़िला है प्यार का चलता ही जाएगा
जी भर के हँस ले गा ले ये दिन फिर न आएगा
आशा: ये क़ाफ़िला है प्यार ...

मुकेश: इस क़ाफ़िले के साथ हँसी भी है अश्क़ भी
गाएगा कोई और कोई आँसू बहाएगा
आशा: इस क़ाफ़िले के साथ ...
ये क़ाफ़िला है प्यार ...

मुकेश: राही गुज़र न जाएं मुहब्बत के दिन कहीं
आँखें तरस रही हैं कब आँखें मिलाएगा
आशा: राही गुज़र न जाएं ...
ये क़ाफ़िला है प्यार ...

मुकेश: ( इस क़ाफ़िले में ) \-२ वस्ल भी है और जुदाई भी
तू जो भी माँग लेगा तेरे पास आएगा
आशा: ( इस क़ाफ़िले में ) \-२ ...
ये क़ाफ़िला है प्यार ...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. अगले गीत में आशा के साथ निभायेंगें सी रामचंद्र.
२. गीतकार हैं कमर जलालाबादी.इसी फिल्म में आशा ने "ईना मीना डीका" की तर्ज पर एक मस्त गाना गाया था.
३. मुखड़े में शब्द है -"जॉनी".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी २४ अंकों के साथ अब आप सबसे आगे निकल आई हैं, बधाई...हमें यकीं है पराग जी समय से जागेंगें अब :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, September 9, 2009

सब कुछ करना इस दुनिया में, प्यार न करना भूल के...चेता रहे हैं आशा और एस डी बतीश साहब

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 197

ज है '१० गायक और एक आपकी आशा' की सातवीं कड़ी। इस शृंखला में हम आप को सुनवा रहे हैं आशा भोंसले के साथ १० अलग अलग गायकों के गाये फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के १० युगल गीत। इन गायकों में से कुछ गायक हैं अपने ज़माने के मशहूर गायक, और कुछ हैं थोड़े से कम जाने पहचाने, जिन्हे हम कह सकते हैं कमचर्चित। आज ऐसे ही एक कमचर्चित गायक की बारी। ये गायक भी हैं और संगीतकार भी। फ़िल्म संगीत में ये कमचचित ज़रूर हो सकते हैं लेकिन संगीत के क्षेत्र में इनका नाम एक चमकता हुआ सितारा है जिन्होने संगीत के विकास में, संगीत के प्रचार में बेहद सराहनीय योगदान दिया है। ये हैं शिव दयाल बतीश, जिन्हे हम एस. डी. बतीश के नाम से भी जानते हैं, और जिन्होने कई गीत सिर्फ़ बतीश के नाम से भी गाए हैं। हम बतीश जी पर थोड़ी देर में आते हैं, आइए उससे पहले चलते हैं ५० के दशक के शुरुआती साल में। १९५१ में एक फ़िल्म आयी थी 'अदा'. १९५० में देवेन्द्र गोयल की फ़िल्म 'आँखें' से शुरुआत करने के बाद इसके अगले ही साल संगीतकार मदन मोहन को अपना पहला बड़ा ब्रेक मिला शेखर और रेहाना अभिनीत देवेन्द्र गोयल साहब की ही फ़िल्म 'अदा' में। मदन मोहन लता जी को 'आँखें' में गवाना चाहते थे लेकिन बात नहीं बनी थी। पर 'अदा' से शुरु हुई लता-मदन मोहन की जोड़ी, जिसने आगे चलकर क्या रूप धारण किया यह शायद बताने की ज़रूरत नहीं। इस जोड़ी की बातें तो हम करते ही रहते हैं, चलिए आज बात की जाए मदन मोहन और आशा भोंसले की। मदन साहब अपनी इस दूसरी छोटी बहन आशा के बारे में बता रहे हैं, मौका वही, आशा भोंसले के फ़िल्मी गायन के २५ वर्ष पूरे हो जाने का जश्न, "मेरी अच्छी सी, छोटी सी बहन आशा के गानें के करीयर की सिल्वर जुबिली मनाई जा रही है, मुझे इतनी ख़ुशी हो रही है कि बयान नहीं कर सकता। ज्यों ज्यों वक़्त गुज़रता जाता है, आशा की आवाज़ और गाने का अंदाज़ और रोशन होते जाते हैं। याद्दाश्त ऐसी है कि जवाब नहीं, और आवाज़ का जादू बयान से बाहर। दिल बिल्कुल बच्चों के दिल की तरह है, बहुत साफ़ और बिल्कुल ईमोशनल। हाल ही में मेरे यहाँ रिहर्सल करने के लिए आयीं, और मैने और किसी का गाया हुआ गाना सुना दिया। बच्चों की तरह रोना शुरु कर दिया और कहने लगीं कि 'अब मुझसे और रिहर्सल नहीं हो सकेगी'। यह एक बहुत ही अजीब फ़नकार की निशानी है। और अगर ग़ौर से देखा जाए तो गुज़रे कई बरसों से आशा के गाने का निखार बढ़ता ही जाता है। दुआ है कि यह निखार युंही बढ़ता रहे और मेरी छोटी बहन हमेशा शोख़ और चुलबुली बनी रहे क्योंकि शोख़ी और चुलबुलापन इसके गाने की ख़ूबी है, और (हँसते हुए) मुझसे ज़रा कम लड़ा करे।"

फ़िल्म 'अदा' में लता जी के गाए "प्रीतम मेरी दुनिया में दो दिन तो रहे होते" और "साँवरी सूरत मन भायी रे पिया तोरी" जैसे गीत बेहद मशहूर हुए थे। आशा जी और एस. डी. बतीश ने 'अदा' में एक युगल गीत गाया था "सब कुछ करना इस दुनिया में प्यार न करना भूल के"। युं तो इस फ़िल्म में कई गीतकारों ने गीत लिखे जैसे कि राजा मेहंदी अली ख़ान, प्रेम धवन, बेहज़ाद लखनवी, लेकिन आशा-बतीश के गाए इस प्रस्तुत गीत को लिखा था सरस्वती कुमार 'दीपक' ने। दीपक जी ने इस फ़िल्म में गीता राय का गाया एक और गीत भी लिखा था "सच्ची बातें बताने में कैसी शर्म, हुए मेरे बलम हुए मेरे बलम"। दोस्तों, आइए आज शिव दयाल बतीश जी के फ़िल्म संगीत की थोड़ी से चर्चा की जाए। बतौर गायक उनके जो गीत लोकप्रिय हुए थे वे कुछ इस प्रकार हैं - "पगड़ी सम्भाल जट्टा" (गवाण्डी, १९४२), "ख़ामोश निगाहें ये सुनाती हैं कहानी" (दासी, १९४४), "मेरी मिट्टी की दुनिया निराली" (शाम सवेरा, १९४६), "क्या हमसे पूछते हो किधर जा रहे हैं हम" (आरसी, १९४७), "आँखें कह गईं दिल की बात" (लाडली, १९४९), "देख लिया तूने ग़म का तमाशा" (बेताब, १९५२), "जलाकर आग दिल में ज़िंदगी बरबाद करते हैं" (तूफ़ान, १९५४), इत्यादि। जुलाई १९४७ में पार्श्वगायक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके बतीश जी ने संगीतकार के रूप में कार्य शुरु किया और उनके संगीत से सज कर जो फ़िल्में आईं उनकी सूची इस प्रकार हैं। १९४८ - चुपके चुपके, बलमा, पतझड़ (ग़ुलाम हैदर के साथ); १९४९ - ख़ुश रहो; १९५२ - बहू बेटी, बेताब; १९५४ - अमर कीर्तन, हार जीत, तूफ़ान; १९५५ - दीवार; १९५८ - हम भी कुछ कम नहीं; १९५९ - एक अरमान मेरा, साज़िश, टीपू सुल्तान; १९६० - ज़ालिम तेरा जवाब नहीं। यह आशा जी पर केन्द्रित शृंखला है, इसलिए मुझे बतीश जी के संगीत निर्देशन में आशा जी का गाया एक गीत याद आ रहा है फ़िल्म 'एक अरमान मेरा' का, "ओ मेरे चांद तुम कहाँ"। राहिल गोरखपुरी के लिखे इस गीत में बड़ी ही वेदना भरी आवाज़ में आशा जी गाती हैं "ये उदास आसमान रात ये धुआँ धुआँ, ओ मेरे चांद तुम हो कहाँ, थक गई मेरी ज़ुबान आ गई लबों पे जान, ओ मेरे चांद तुम हो कहाँ"। वैसे आज का जो प्रस्तुत गीत है वह विरह और वेदना से कोसों दूर, एक हल्का फुल्का गीत है जिसमें नायिका प्यार न करने की बात करती है, जबकि नायक प्यार का वकालत करता है। यह गीत हमें फ़िल्म 'आर पार' के उस गीत की याद दिला देता है कि "मोहब्बत कर लो जी भर लो अजी किसने रोका है, पर बड़े गजब की बात है इसमें भी धोखा है"। सुनिए गीत और ख़ुद ही इस बात को महसूस कीजिए।



गीत के बोल-

सब कुछ करना इस दुनिया में
प्यार न करना भूल के
कभी किसी से अपनी आँखें
चार न करना भूल के
जी प्यार न करना भूल के
बतीश: सब कुछ कहना ये मत कहना
प्यार न करना भूल के
नज़रें मिला के उल्फ़त से
इन्कार न करना भूल के
आशा: जी प्यार न करना भूल के

आशा: प्यार किया था परवाने ने
शमा ने उसको जला दिया
बतीश: जलने का ही नाम है मिलना
प्यार ने उनको मिला दिया
आशा: मिलने की इस रीत को तुम
अख़्त्यार न करना भूल के
कभी किसी से अपनी आँखें
चार न करना भूल के
जी प्यार न करना भूल के
प्यार करोगे पछताओगे
ये दुनिया बदनाम करेगी
बदनाम करेगी
बतीश: लाख करे बदनाम मोहब्बत
अपना ऊँचा नाम करेगी \-2
आशा: ऐसे ऊँचे नाम का तुम
ब्योपार न करना भूल के
कभी किसी से अपनी आँखें
चार न करना भूल के
जी प्यार न करना भूल के
बतीश: प्यार करेंगे नहीं डरेंगे
बिना प्यार के दुनिया क्या है
दुनिया क्या है
आशा: बिना प्यार की दुनिया सच्ची
प्यार की दुनिया में धोखा है
बतीश: प्यार में धोखे की बातें
सरकार न करना भूल से
आशा: कभी किसी से

बतीश: सब कुछ कहना ये मत कहना
प्यार न करना भूल के
आशा: नज़रें मिला के उल्फ़त से
इन्कार न करना भूल के \-2

बतीश+आशा: सब कुछ कहना ये मत कहना
प्यार न करना भूल के
नज़रें मिला के उल्फ़त से
इन्कार न करना भूल के....


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल होंगें मुकेश साहब, आशा के साथ एक और युगल गीत में.
२. गीतकार हैं कमर जलालाबादी.
३. मुखड़े में शब्द है -"काफिला".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी २२ अंकों पर पहुँचने के लिए आपको भी बधाई...अब आप भी पराग जी और रोहित के टक्कर में कड़ी हैं, वाह क्या रोचक मुकाबला है...मुझे उम्मीद है शरद जी और स्वप्न जी इसका पूरा आनंद ले रहे होंगे...पाबला जी महफिल की शान हैं इसमें कोई शक नहीं....सभी प्यारे श्रोताओं का आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, September 7, 2009

तू हुस्न है मैं इश्क हूँ, तू मुझमें है मैं तुझमें हूँ....साहिर, रवि, आशा और महेंद्र कपूर वाह क्या टीम है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 195

शा भोंसले ने जिन जिन पार्श्व गायकों के साथ सब से ज़्यादा लोकप्रिय गानें गाये हैं, उनमें किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी के बाद, मेरे ख़याल से महेन्द्र कपूर का नाम आना चाहिए। बी. आर. चोपड़ा कैम्प के सदस्यों में संगीतकार रवि और गीतकार साहिर लुधियानवी के साथ साथ आशा भोंसले और महेन्द्र कपूर ने भी एक लम्बे समय तक काम किया है। आशा जी और महेन्द्र कपूर के गाए युगल गीतों में 'नवरंग', 'धूल का फूल', 'हमराज़', 'गुमराह', 'आदमी और इंसान', 'वक़्त', 'पति पत्नी और वो', और 'दहलीज़' जैसी मशहूर फ़िल्मों के गानें रहे हैं। आज हम जिस गीत को आप तक पहुँचा रहे हैं वह है फ़िल्म 'हमराज़' का, "तू हुस्न है मैं इश्क़ हूँ, तू मुझ में है मैं तुझ में हूँ"। करीब करीब ७ मिनट २७ सेकन्ड्स के इस गीत में इतिहास की मशहूर प्रेम कहानियों को बड़ी ही ख़ूबसूरती से साहिर साहब ने ज़िंदा किया है। सोहनी-महिवाल, सलीम-अनारकलि तथा रोमियो जुलियट की दास्तान का बयान हुआ है इस गीत में। १९६७ में बनी फ़िल्म 'हमराज़' बी. आर. चोपड़ा की एक मशहूर फ़िल्म रही है। फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी १६ अक्टुबर के दिन। राज कुमार, सुनिल दत्त और विम्मी अभिनीत इस फ़िल्म के गीतों ने ख़ूब शोहरत पायी थी। रवि और साहिर की जोड़ी उन दिनों कामयाबी की ऊँचाइयाँ छू रही थी। यहाँ पर रवि जी से की गयी बातचीत का एक अंश प्रस्तुत करता हूँ जिसमें उन्होने साहिर साहब के सेन्स औफ़ ह्युमर के बारे में टिप्पणी की थी - "साहिर साहब बड़े ही सिम्पल किस्म के थे। वो गम्भीर से गम्भीर बात को भी बड़े आसानी से कह डालते थे। एक किस्सा आप को सुनाता हूँ। उन दिनों हम ज़्यादातर बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों के लिए काम करते थे। तो शाम के वक़्त हम मिलते थे, बातें करते थे। तो एक दिन साहिर साहब ने अचानक कहा 'देश में इतने झंडे क्यों है? और अगर है भी तो उन सब में डंडे क्यों है?" यह सुनकर वहाँ मौजूद सभी ज़ोर से हँस पड़े।"

दोस्तों, आशा जी पर केन्द्रित इस शृंखला में शामिल हो रहे गीतों के बारे में जानकारी तो हम देते ही जा रहे हैं, साथ ही जहाँ तक संभव हो रहा है, हम आशा जी से जुड़ी बातें भी आप तक ज़्यादा से ज़्यादा पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं। आज क्योंकि महेन्द्र कपूर के साथ गाया हुआ आशा जी का गीत बज रहा है, तो क्यों न जान लें कि महेन्द्र कपूर ने आशा जी के बारे में विविध भारती को क्या कहा था।

प्र: आशा जी के साथ आप ने बहुत सारे गानें गाए हैं, तो उन से जुड़ी कोई ख़ास बात आप बताना चाहेंगे?

"आशा जी बहुत फ़्रैंक हैं, अगर कोई मिस्टेक हो जाए तो कहती हैं कि 'भ‍इया, इसको ऐसे नहीं, ऐसे गाओ, बहुत हेल्प करती थीं, दोनों बहनें, बहुत हेल्प करती थीं, हँसी मज़ाक भी करती थीं।"

प्र: गले के लिए आप किन चीज़ों से परहेज़ करते हैं?

"मैं तो सब खाता हूँ, चाट, मैने पहले भी बताया था, चौपाटी से, बांद्रा के ऐल्कोम मार्केट से मँगवा कर खाते हैं। चाट खाने के बाद गरम चाय पी लो तो फिर सब ठीक है, यह मुझे आशा दीदी ने बताया था।"

तो दोस्तों, आइए आप और हम मिल कर सुनते हैं प्यार करने वाले अमर प्रेमियों की दास्तान आशा भोंसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल होंगें आशा के साथ तान मिलते अपने किशोर दा.
२. इस फिल्म के एक गीत में किशोर के लिए रफी साहब ने पार्श्वगायन किया था.
३. मुखड़े में दो प्रान्तों के लोगों को बुलाये जाने वाले नाम है....उनमें से एक मद्रास है...

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित जी २२ अंकों के साथ अब आप भी शीर्ष पर विराजमान हो गए हैं पराग जी के साथ....बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, September 5, 2009

रे मन सुर में गा...फ़िल्मी गीतों में भी दिए हैं मन्ना डे और आशा ने उत्कृष्ट राग गायन की मिसाल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 193

फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के पार्श्वगायकों में एक महत्वपूर्ण नाम मन्ना डे साहब का रहा है। भले ही उन्हे नायकों के पार्श्व गायन के लिए बहुत ज़्यादा मौके नहीं मिले, लेकिन उनकी गायकी का लोहा हर संगीतकार मानता था। शास्त्रीय संगीत में उनकी मज़बूत पकड़ का ही नतीजा था कि जब भी किसी फ़िल्म में शास्त्रीय संगीत पर आधारित, या फिर दूसरे शब्दों में, मुश्किल गीतों की बारी आती थी तो फ़िल्मकारों और संगीतकारों को सब से पहले मन्ना दा की ही याद आ जाती थी। आज '१० गायक और एक आपकी आशा' की तीसरी कड़ी में आशा भोंसले का साथ निभाने के लिए हमने आमंत्रण दिया है इसी सुर गंधर्व मन्ना डे साहब को! युं तो मन्ना दा ने लता मंगेशकर के साथ ही अपने ज़्यादातर लोकप्रिय युगल गीत गाए हैं, लेकिन आशा जी के साथ भी उनके गाए बहुत सी सुमधुर रचनाएँ हैं। आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में छा रहा है शास्त्रीय संगीत का रंग मन्ना दा और आशा जी की आवाज़ों में। फ़िल्म 'लाल पत्थर' का यह गीत है "रे मन सुर में गा"। क्या गाया है इन दोनों ने इस गीत को! कोई किसी से कम नहीं। इस जैसे गीत को सुन कर कौन कह सकता है कि फ़िल्मी गायक गायिकाएँ पारंपरिक शास्त्रीय गायकों के मुक़ाबले कुछ कम है! शास्त्रीय गायन की इस पुर-असर जुगलबंदी ने फ़िल्म संगीत के मान सम्मान को कई गुणा बढ़ा दिया है। 'लाल पत्थर' एफ़. सी. मेहरा की एक मशहूर और चर्चित फ़िल्म रही है जिसमें राज कुमार, हेमा मालिनी, राखी और विनोद मेहरा जैसे बड़े सितारों ने जानदार भूमिकाएँ निभायी। निर्देशक थे सुशील मजुमदार। फ़िल्म की कहानी प्रशांत चौधरी की थी, संवाद लिखे ब्रजेन्द्र गौड़ ने, और स्कीनप्ले था नबेन्दु घोष का। १९७१ में जब यह फ़िल्म बनी थी तब जयकिशन इस दुनिया में नहीं थे। शंकर ने अकेले ही फ़िल्म का संगीत तैयार किया, लेकिन 'शंकर जयकिशन' के नाम से ही। जयकिशन के नाम को हटाना उन्होने गवारा नहीं किया। इस फ़िल्म के गानें लिखे हसरत जयपुरी, नीरज और नवोदित गीतकार देव कोहली ने। देव कोहली ने इस फ़िल्म में किशोर कुमार का गाया "गीत गाता हूँ मैं" लिख कर रातों रात शोहरत की बुलंदी को छू लिया था। वैसे आज का प्रस्तुत गीत नीरज जी का लिखा हुआ है। इस गीत के लिए आशा जी और मन्ना डे की तारीफ़ तो हम कर ही चुके हैं, शंकर जी की तारीफ़ भी हम कैसे भूल सकते हैं, शुरु से ही वो शास्त्रीय रंग वाले ऐसे गीतों को इसी तरह का सुखद सुरीला अंजाम देते आ रहे हैं।

'लाल पत्थर' १९७१ की फ़िल्म थी। इसके ठीक एक साल बाद १९७२ में बंबई के एक होटल के एक शानदार हौल में मनाया गया था आशा भोंसले के फ़िल्मी गायन के २५ वर्ष पूरे हो जाने पर एक जश्न। बड़े बड़े सितारे आए हुए थे उस 'सिल्वर जुबिली' की पार्टी में, और उस मौके के लिए देश के कई महान संगीतकारों ने बधाई संदेश रिकार्ड किए थे आशा जी के लिए। इनमें से कई ऐसे हैं जो ख़ुद अब ज़िंदा नहीं हैं, मगर उनका संगीत हमेशा हमेशा रहेगा। ऐसे ही एक संगीतकार थे शंकर जयकिशन की जोड़ी। तो उस आयोजन में शंकर जी ने क्या कहा था आशा जी के बारे में, ज़रा आगे पढ़िए - "आशा जी की आवाज़ में इतना रस है, इतना सेक्स है, कि कोई भी दिलवाला झूम जाए, कि जब आवाज़ में इतना सेक्स है तो आवाज़वाली तो बहुत ख़ूबसूरत होंगी! आशा जी ख़ुद भी ख़ूबसूरत हैं और इनका दिल भी इतना ख़ूबसूरत है जैसे भोले बच्चे का होता है। गाने का कमाल ऐसा कि दादरा, ठुमरी, ग़ज़ल, गीत, क्लासिकल और माडर्न, किस स्टाइल की तारीफ़ करें! बिल्कुल १००% सोना। मेरी भगवान से यही प्रार्थना है कि आशा जी की एक नहीं कई 'जुबिली' हों, हर 'जुबिली' पर मुझे बड़ी ख़ुशी होगी।" दोस्तों, शंकर जी की ये बातें हमें अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'संगीत के सितारों की महफ़िल' कार्यक्रम के सौजन्य से प्राप्त हुई। तो लीजिए शंकर जयकिशन, आशा भोंसले और मन्ना डे के नाम करते हैं आज का यह गीत जो कि आधारित है राग कल्याण पर। खो जाइए मधुरता के समुंदर में, और ज़रा सोचिए कि क्या इससे ज़्यादा मधुर कोई और चीज़ हो सकती है!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल के गीत में आशा के सहगायक हैं "जगमोहन बख्शी".
२. इस फिल्म में आशा जी ने पहली बार बर्मन दा सीनियर के लिए गाया था.
३. मुखड़े में शब्द है - "हसीना".

पिछली पहेली का परिणाम -
रोहित जी बिलकुल सही जवाब देकर आपने कमाए दो अंक और और आपका कुल स्कोर हुआ २०. बधाई...मनु जी सर मोहर ही न लगते रहिये...कभी समय से भी आ जाया कीजिये.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, September 4, 2009

चल बादलों के आगे ....कहा हेमंत दा ने आशा के सुर से सुर मिलाकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 192

'१० गायक और एक आपकी आशा' की पहली कड़ी में कल आप ने आशा भोसले और तलत महमूद का गाया फ़िल्म 'इंसाफ़' का युगल गीत सुना था। आज भी कल जैसा ही एक नर्म-ओ-नाज़ुक रोमांटिक युगल गीत लेकर हम हाज़िर हुए हैं। आज के गायक हैं हेमंत कुमार। इससे पहले की हम आज के गीत की चर्चा करें, क्योंकि यह शृंखला केन्द्रित है आशा जी पर, तो आशा जी के बारे में पहले कुछ बातें हो जाए! आशा जी ने फ़िल्म जगत में अपना सफ़र शुरु किया था बतौर बाल कलाकार। 'बड़ी माँ' और 'आई बहार' जैसी फ़िल्मों में उन्होने अभिनय किया था। बतौर पार्श्वगायिका उन्हे पहला मौका दिया था संगीतकार हंसराज बहल ने, फ़िल्म थी 'चुनरिया' और साल था १९४८। लेकिन यह फ़िल्म नहीं चली और उनका गाना भी नज़रंदाज़ हो गया। शोहरत की ऊँचाइयों को छूने के लिए उन्हे करीब करीब १० साल संघर्ष करना पड़ा. १९५७ के कुछ फ़िल्मों से वो हिट हो गयीं और १९५८ में बनी 'हावड़ा ब्रिज' के "आइए मेहरबान" गीत से तो वो लोगों के दिलों पर राज करने लगीं। १९४८ की 'चुनरिया' से लेकर १९५८ की 'हावड़ा ब्रिज' तक जिन जिन प्रमुख फ़िल्मों में आशा जी ने गीत गाए, उन पर एक नज़र डालते चलें।

१९४९ - लेख, रुमाल
१९५० - मुक़द्दर, बावरे नन
१९५१ - सब्ज़ बाग़, लचक, जोहरी, मुखड़ा
१९५२ - जलपरी, संगदिल, अलादिन और जादुई चिराग़
१९५३ - परिनीता, एक दो तीन, छम छमा छम, रंगीला, चाचा चौधरी, हुस्न का चोर, गौहर, आग का दरिया, नौलखा हार, शमशीर, पापी
१९५४ - इल्ज़ाम, अलिबाबा और ४० चोर, बूट पालिश, अधिकार, चक्रधारी, धूप छाँव, दुर्गा पूजा, तुल्सीदास, मस्ताना
१९५५ - मधुर मिलन, श्री नकद नारायण, लुटेरा, मुसाफ़िरखाना, इंसानीयत, जशन, नवरात्री, मस्तानी, शिव भक्त, राजकन्या, रेल्वे प्लेट्फ़ार्म, तातर का चोर, हल्लागुल्ला, जल्वा, प्यारा दुश्मन
१९५६ - छू मंतर, कर भला, पैसा ही पैसा, इंद्रसभा, राम नवमी, सबसे बड़ा रुपया, हम सब चोर हैं, क़िस्मत, समुंदरी डाकू, इंसाफ़, गुरु घंटाल, फ़ंटुश, भागमभाग, जल्लाद
१९५७ - नौ दो ग्यारह, तुम सा नहीं देखा, संत रघु दुश्मन, जौनी वाकर, क़ैदी, अभिमान, पेयिंग्‍ गेस्ट, कितना बदल गया इंसान, बड़े सरकार, बंदी, बड़ा भाई, उस्ताद, मिस्टर एक्स, देख कबीरा रोया, एक झलक।

हेमंत कुमार के साथ आशा जी के गाये तमाम गीतों में से आज सुनिए १९५७ की फ़िल्म 'एक झलक' का एक बड़ा ही मधुर गीत "चल बादलों से आगे कुछ और ही समां है, हर चीज़ है निराली हर ज़िंदगी जवाँ है"। उन दिनों हेमंत कुमार अभिनेता प्रदीप कुमार के स्क्रीन वायस हुआ करते थे। दोनों ने अपने अपने बंबई के करीयर की शुरुआत १९५२ की फ़िल्म 'आनंदमठ' से की थी। उसके बाद 'अनारकली' और 'नागिन' जैसी ब्लौक्बस्टर फ़िल्में आईं। १९५७ में भी इस जोड़ी का सिलसिला जारी रहा। दीप खोंसला के साथ मिल कर प्रदीप कुमार ने 'दीप ऐंड प्रदीप प्रोडक्शन्स' की स्थापना की और इस बैनर के तले पहली फ़िल्म का निर्माण किया 'एक झलक'। ज़ाहिर सी बात है कि हेमंत कुमार से वो अपना पार्श्वगायन करवाते। लेकिन संगीत निर्देशन का भी दायित्व हेमंतदा को ही सौंपा गया। प्रदीप कुमार, वैजयंतीमाला और राजेन्द्र कुमार अभिनीत इस फ़िल्म में हेमंत दा ने नायिका के लिए आशा जी की आवाज़ चुनी और गीतों को लिखा एस. एच. बिहारी ने। गीता दत्त के साथ गाए युगल गीत "आजा ज़रा मेरे दिल के सहारे" के अलावा, हेमंत दा ने आशा जी के साथ कम से कम दो ऐसे युगल गीत गाए जो बेहद बेहद पसंद किए गए। उनमें से एक तो आज का प्रस्तुत गीत है, और दूसरा गीत था "ये हँसता हुआ कारवाँ ज़िंदगी का न पूछो चला है किधर"। इन दोनों गीतों में पाश्चत्य संगीत का असर है, लेकिन मेलडी को बरक़रार रखते हुए। यही तो बात थी उस ज़माने की। पाश्चात्य संगीत को अपनाना कोई बुरी बात नहीं है, जब तक वो गीत की मधुरता, शब्दों की गहराई और हमारी शोभनीय संस्कृति के साथ द्वंद न करने लग जाए। हेमंत दा ने जब कभी भी पाश्चात्य संगीत का इस्तेमाल अपने गीतों में किया है, हर बार इन चीज़ों को ध्यान में रखा है। तो चलिए सुनते हैं आज का यह गीत। कल जो बोनस १० अंकों वाला सवाल हमने पूछा था, उसका सही जवाब हम ऐसे नहीं बताएँगे, बल्कि हर रोज़ धीरे धीरे राज़ पर से परदा उठता जाएगा, जैसे जैसे गीत पेश होते जाएँगे।



गील के बोल:
हेमंत: (चल बादलों से आगे
कुछ और ही समा है
हर चीज़ है निराली
हर ज़िंदगी जवाँ है ) \- 2

आशा: (जिसे देखने को मेरी
आँखें तरस रही हैं ) \- 2
वो जगह जहाँ से हरदम
उजला बरस रही है
मेरी ख़्वाब की वो दुनिया
बतलाओ तो कहाँ है
हर चीज़ है निराली
हर ज़िंदगी जवाँ है

हेमंत: चल बादलों से आगे ...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल के गीत आशा के साथ होंगें "मन्ना डे".
२. इस मशहूर फिल्म के नाम में एक रंग का नाम शामिल है.
३. शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस गीत को लिखा है नीरज ने.

पिछली पहेली का परिणाम -
हर बार की तरह पराग जी फिर आगे निकल आये हैं २२ अंकों के साथ. बधाई....१० बोनुस अंकों के लिए आप सब ने अच्छी कोशिश की, पर सही जवाब किसी के पास नहीं मिला....खैर ऐसे मौके हम आपको आगे भी देते रहेंगें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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