रविवार, 29 अप्रैल 2018

राग मारवा और सोहनी : SWARGOSHTHI – 367 : RAG MARAVA & SOHANI




स्वरगोष्ठी – 367 में आज


दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 6 : मारवा थाट


उस्ताद गायकों से राग मारवा में खयाल और सोहनी में फिल्म संगीत की रचना सुनिए





उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ
उस्ताद अमीर खाँ
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से छठा थाट मारवा है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे मारवा थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग मारवा में निबद्ध दो खयाल रचना उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही मारवा थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग सोहनी के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



आज के अंक में हम आपसे ‘मारवा’ थाट के विषय में कुछ चर्चा करते हैं। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग, म॑, प, ध, नि । अर्थात ‘मारवा’ थाट में ऋषभ स्वर कोमल, मध्यम स्वर तीव्र तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग मारवा, ‘मारवा’ थाट का आश्रय राग है, जिसमे ऋषभ कोमल और मध्यम तीव्र होता है किन्तु पंचम वर्जित होता है। यह षाड़व-षाड़व जाति का राग है। अर्थात आरोह और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग होते हैं। राग मारवा के आरोह स्वर हैं, सा, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), ध, नि, ध, सां तथा अवरोह के स्वर हैं, सां, नि, ध, म॑(तीव्र), ग, रे(कोमल), सा होता है। इसका वादी स्वर ऋषभ तथा संवादी स्वर धैवत होता है। इस राग का गायन-वादन दिन के चौथे प्रहर में उपयुक्त माना जाता है। अब हम आपको राग मारवा में निबद्ध दो खयाल सुनवा रहे हैं। उस्ताद अमीर खाँ ने इसे प्रस्तुत किया है। राग मारवा उदासी भाव का राग होता है। विलम्बित खयाल के बोल हैं- ‘पिया मोरा अनत देश...’ और द्रुत खयाल की बन्दिश है- ‘गुरु बिन ज्ञान न पावे...’। इस श्रृंखला में अब तक हमने उस्ताद अमीर खाँ द्वारा प्रस्तुत कई रचनाएँ सुनवाई है और आगे भी सुनवाएँगे। लीजिए, इस बार भी राग मारवा की दो रचनाएँ उस्ताद अमीर खाँ की आवाज़ में सुनिए।

राग मारवा : विलम्बित- ‘पिया मोरा...’ और द्रुत खयाल- ‘गुरु बिन ज्ञान...’ : उस्ताद अमीर खाँ




‘मारवा’ थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- पूरिया, साजगिरी, ललित, सोहनी, भटियार, विभास आदि। राग सोहनी इस थाट का बेहद लोकप्रिय राग है। सुप्रसिद्ध मयूरवीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने राग सोहनी के बारे में बताया कि राग सोहनी का प्रयोग खयाल और ठुमरी, दोनों प्रकार की गायकी में किया जाता है। ठुमरी अंग में इस राग का प्रयोग अधिक होता है। इस राग का प्रयोग दो प्रकार से किया जाता है। पहले प्रकार, औडव-षाड़व जाति के अन्तर्गत आरोह में ऋषभ और पंचम तथा अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं किया जाता। राग के दूसरे स्वरूप के आरोह में ऋषभ और अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं होता। राग सोहनी में उन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, जिनका राग पूरिया और मारवा में भी किया जाता है। किन्तु इसके प्रभाव और भावाभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर हो जाता है। राग सोहनी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। धैवत पीड़ा की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। ‘नी सां रें (कोमल) सां’ की स्वर संगति से तीव्र पुकार का वातावरण निर्मित होता है। संवादी गान्धार कुछ देर के लिए इस उत्तेजना को शान्त कर सुकून देता है। वास्तव में वादी और संवादी स्वर राग के प्राणतत्त्व होते हैं, जिनसे रागों के भावों का सृजन होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में राग सोहनी के भाव अधिक स्पष्ट होते हैं। इस राग में मींड़ एवं गमक को कसे हुए ढंग से मध्यलय में प्रस्तुत करने से राग का भाव अधिक मुखरित होता है। यह चंचल प्रवृत्ति का राग है। श्रृंगार के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराने में यह राग समर्थ है। राग सोहनी, कर्नाटक संगीत के राग हंसनन्दी के समतुल्य है। यदि राग हंसनन्दी में शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो यह ठुमरी अंग के राग सोहनी की अनुभूति कराता है। तंत्रवाद्य पर राग मारवा, पूरिया और सोहनी का वादन अपेक्षाकृत कम किया जाता है।

भारतीय फिल्मों के इतिहास में 1960 में प्रदर्शित, बेहद महत्त्वाकांक्षी फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’, एक भव्य कृति थी। इसके निर्माता-निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म की गुणबत्ता से कोई समझौता नहीं किया था। फिल्म के संगीत के लिए उन्होने पहले गोविन्द राम और फिर अनिल विश्वास को दायित्व दिया, परन्तु फिल्म-निर्माण में लगने वाले सम्भावित अधिक समय के कारण बात बनी नहीं। अन्ततः संगीतकार नौशाद तैयार हुए। नौशाद ने फिल्म में मुगल-सल्तनत के वैभव को उभारने के लिए तत्कालीन दरबारी संगीत की झलक दिखाने का हर सम्भव प्रयत्न किया। नौशाद और के. आसिफ ने तय किया कि अकबर के नवरत्न तानसेन की मौजूदगी का अनुभव भी फिल्म में कराया जाए। नौशाद की दृष्टि विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पर थी, किन्तु फिल्म में गाने के लिए उन्हें मनाना सरल नहीं था। पहले तो खाँ साहब ने फिल्म में गाने से साफ मना कर दिया, परन्तु जब दबाव बढ़ा तो टालने के इरादे से, एक गीत के लिए 25 हजार रुपये की माँग की। खाँ साहब ने सोचा कि एक गीत के लिए इतनी बड़ी धनराशि देने के लिए निर्माता तैयार नहीं होंगे। यह उस समय की एक बड़ी धनराशि थी, परन्तु के. आसिफ ने तत्काल हामी भर दी। नौशाद ने शकील बदायूनी से प्रसंग के अनुकूल गीत लिखने को कहा। गीत तैयार हो जाने पर नौशाद ने खाँ साहब को गीत सौंप दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने ठुमरी अंग की गायकी में अधिक प्रयोग किए जाने वाले राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध कर गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ को रिकार्ड कराया। रिकार्डिंग से पहले खाँ साहब ने वह दृश्य देखने की इच्छा भी जताई, जिस पर इस गीत को शामिल करना था। मधुबाला और दिलीप कुमार के उन प्रसंगों को देख कर उन्होने गायन में कुछ परिवर्तन भी किये। इस प्रकार भारतीय फिल्म-संगीत-इतिहास में राग सोहनी के स्वरों में ढला एक अनूठा गीत शामिल हुआ। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में पिरोया यह गीत के. आसिफ को इतना पसन्द आया कि उन्होने खाँ साहब को दोबारा 25 हजार रुपये भेंट करते हुए एक और गीत गाने का अनुरोध किया। खाँ साहब का फिल्म में गाया राग रागेश्री, तीनताल में निबद्ध दूसरा गीत है- ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’। ये दोनों गीत फिल्म संगीत के इतिहास के सर्वाधिक उल्लेखनीय किन्तु सबसे खर्चीले गीत सिद्ध हुए। लीजिए, आप उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में ढला यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग सोहनी : ‘प्रेम जोगन बन के...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : फिल्म – मुगल-ए-आजम




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 367वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बाँग्ला फिल्म से रागबद्ध हिन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।






1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 5 मई, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 369वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 365वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” से एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पूरिया धनाश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – उस्ताद अमीर खाँ

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की छठी कड़ी में आपने मारवा थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग मारवा में पिरोया दो खयाल सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही मारवा थाट के जन्य राग सोहनी में निबद्ध फिल्म “मुगल-ए-आजम” का एक फिल्मी गीत उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगली कड़ी में हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। हमारी नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेय 

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

चित्रकथा - 65: भीमसेन को श्रद्धांजलि - 40 वर्ष बाद भी प्रासंगिक है फ़िल्म ’घरौंदा’

अंक - 6५

फ़िल्मकार भीमसेन को श्रद्धांजलि

40 वर्ष बाद भी प्रासंगिक है फ़िल्म ’घरौंदा’ 






17 अप्रैल 2018 को जानेमाने फ़िल्मकार भीमसेन का 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। भारत में ऐनिमेशन के भीष्म-पितामह का दर्जा रखने वाले भीमसेन 70 के दशक में समानान्तर सिनेमा का आंदोलन छेड़ने वाले फ़िल्मकारों में भी एक सम्माननीय नाम हैं। मुल्तान (वर्तमान पाकिस्तान में) में वर्ष 1936 में जन्में भीमसेन खुराना देश विभाजन के बाद लखनऊ स्थानान्तरित हो गए थे। कलाकारों के परिवार से ताल्लुख़ रखने की वजह से संगीत और कला उन्हें विरासत में ही मिली। ललित कला और शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त करने की वजह से जीवन भर वो एक अच्छी जगह पर बने रहे। 1961 में भीमसेन ने बम्बई का रुख़ किया और Films Division में बैकग्राउंड पेन्टर की नौकरी कर ली। वहीं पर उन्होंने ऐनिमेशन कला की बारीकियाँ सीख ली। 1971 में भीमसेन स्वतंत्र रूप से फ़िल्म-निर्माण के कार्य में उतरे और अपनी पहली ऐनिमेटेड लघु फ़िल्म ’The Climb' बनाई जिसके लिए उन्हें Chicago Film Festival में "Silver Hugo award" से सम्मानित किया गया। इस फ़िल्म की कामयाबी से प्रेरित होकर उन्होंने ’Climb Films' के नाम से अपनी बैनर बनाई और फिर पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा। 1974 की उनकी ’एक अनेक एकता’ ऐनिमेशन फ़िल्म को आज भी भारत के लोकप्रियतम ऐनिमेटेड फ़िल्मों में गिना जाता है। अनगिनत लघु फ़िल्म, वृत्तचित्र, टीवी सीरीज़, और ऐनिमेटेड फ़िल्मों के साथ-साथ भीमसेन ने दो बॉलीवूड फ़िल्मों का भी निर्माण किया - 1977 में ’घरौंदा’ और 1979 में ’दूरियाँ’। 16 राष्ट्रपति प्रदत्त राष्ट्रीय पुरस्कारों व कई अन्तराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भीमसेन भारतीय फ़िल्म-निर्माण के एक लौहस्तंभ रहे हैं। आइए आज ’चित्रकथा’ में बातें करें फ़िल्म ’घरौंदा’ की। 40 वर्ष पूर्व निर्मित यह फ़िल्म आज के दौर में भी पूरी तरह से प्रासंगिक है। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है स्वर्गीय भीमसेन की पुण्य स्मृति को!



ज जब भी हम ऊंचे-ऊंचे निर्माणाधीन हाउसिंग् कॉमप्लेक्स के सामने से गुज़रते हैं, या जब भी अपना नया फ़्लैट ख़रीदने के बारे में सोचते हैं, तो यकायक हमें फ़िल्म ’घरौंदा’ याद आ जाती है। जहाँ अपने जीवन की सारी जमा पूंजी लगा देनी हो, वहाँ सावधानी बरतना बहुत ज़रूरी होता है। शायद इसीलिए फ़िल्म ’घरौंदा’ का वह दृश्य आँखों के सामने आ जाता है जिसमें बिल्डर फ़्लैट ख़रीदारों के सारे पैसे लेकर फ़रार हो जाता है और जिस वजह से कई ख़रीदार आत्महत्या भी कर लेते हैं। इस दृश्य का ख़याल आते ही जैसे पूरे शरीर में एक कंपन सी दौड़ जाती है। 40 साल पहले, 1977 में यह फ़िल्म बनी थी, उस समय यह फ़िल्म जितनी प्रासंगिक थी, शायद आजे के समय में इसकी प्रासंगिकता और भी ज़्यादा बढ़ गई है। आज इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक भीमसेन हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके जाने के बाद उनकी यह फ़िल्म बार बार याद आ रही है और आज की शहरी ज़िन्दगी की सच्चाई से हमारा एक बार फिर से परिचय करवा रही है।

’घरौंदा’ कहानी है मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुख़ रखने वाले एक लड़के और एक लड़की की। सुदीप (अमोल पालेकर) और छाया (ज़रीना वहाब) मुंबई में एक ही दफ़्तर में नौकरी करते हैं। छाया अपनी एक रूम के फ़्लैट में अपने छोटे भाई और बड़े भाई व भाभी के साथ रहती हैं। सुदीप तीन और लोगों के साथ एक भाड़े के कमरे में रहते हैं। सुदीप और छाया एक दूसरे से प्यार करते हैं और जल्दी ही शादी करके अपनी अलग नई दुनिया बसाना चाहते हैं। वो अपने नए घर का सपना देखने लगते हैं। अपनी अपनी तंख्वा से पैसे काट काट कर पैसे जमाते हैं और एक दिन दोनों मिल कर एक निर्माणाधीन बिल्डिंग् में अपने बजट के अनुसार एक फ़्लैट ख़रीद लेते हैं। जब जब वो अपने निर्माणाधीन फ़्लैट को देखने जाते हैं तो उसमें उन्हें अपना सुन्दर छोटा सा घर-संसार नज़र आने लगता है। लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर होता है। सारे ख़रीदारों के पैसे लेकर बिल्डर (या जाली बिल्डर) फ़रार हो जाता है। इस हादसे से सदमे में सुदीप के एक रूम पार्टनर (जिसने वहाँ फ़्लैट ले रखी थी) आत्महत्या कर लेता है। ना वो बिल्डिंग् बन पाती है और ना ही किसी को घर मिल पाता है। सुदीप और छाया हताश हो जाते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि अब क्या करें। इतने सारे पैसे डूब जाने के बाद फिर से शुरू से शुरू करना उनके लिए संभव नहीं। शादी के सपने को सपना ही रख कर वो फिर से अपनी अपनी नौकरी में लग जाते हैं। उन्हीं दिनों उनके दफ़्तर के मालिक मिस्टर मोदी (श्रीराम लागू) छाया की तरफ़ आकर्षित होते हैं और उन्हें विवाह का प्रस्ताव देते हैं। मोदी एक अमीर और अधेड़ उम्र के विधुर हैं, जो एक दिल के मरीज़ भी हैं। छाया को शादी का यह प्रस्ताव बिल्कुल अच्छा नहीं लगा, लेकिन सुदीप को इसमें एक बहुत बड़ी संभावना नज़र आई। सुदीप छाया को समझाते हैं कि मोदी दिल के गंभीर मरीज़ होने की वजह से उनकी आयु अब कुछ ही महीने की है। उनकी मृत्यु के बाद सुदीप और छाया शादी कर लेंगे और मोदी की सारी सम्पत्ति के मालिक भी बन जाएंगे। अपनी अनिच्छा के बावजूद छाया सुदीप की बात मान लेती हैं इस वजह से भी कि इससे उसे अपने भाई को स्थापित करने में मदद मिलेगी। छाया मोदी से विवाह कर लेती हैं। जल्द ही छाया एक ज़िम्मेदार पत्नी के रूप में उभर आती हैं। उधर सुदीप भी लगातार छाया से मिलते रहते हैं और मोदी के स्वास्थ्य की भी ख़बर रखते हैं। उसे धक्का पहुँचता है जब मोदी को वो स्वस्थ होते हुए देखता है। छाया से शादी के बाद मोदी ख़ुश रहने लगते हैं और इस वजह से उनकी शारीरिक बीमारी भी ठीक होने लगती है। लेकिन एक दिन जब छाया और सुदीप में बहस हो रही होती है, मोदी उनकी बात सुन लेते हैं और सदमे से उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता है। इससे सुदीप ख़ुश हो जाता है लेकिन छाया बड़े प्यार और अपनी पत्नी की ज़िम्मेदारी निभाते हुए मोदी को स्वस्थ कर देती हैं। छाया सुदीप को समझा देती है कि वो मोदी को धोखा नहीं दे सकती। सुदीप अपनी अलग राह पर चल निकलता है। बस इतनी सी है ’घरौंदा’ की कहानी।

1977 के गृष्मकाल में कई बड़े बैनरों की फ़िल्में प्रदर्शित हुई थीं। ’अमर अकबर ऐन्थनी’, ’परव्रिश’, ’हम किसी से कम नहीं’, ’चाचा भतीजा’, ’आदमी सड़क का’, ’दुल्हन वही जो पिया मन भाये’ और ’दूसरा आदमी’ जैसी चर्चित फ़िल्में धूम मचा रही थीं। समानान्तर सिनेमा में भी उस साल सत्यजीत रे की ’शतरंज के खिलाड़ी’ और श्याम बेनेगल की ’भूमिका’ जैसी फ़िल्में आ चुकी थीं। इन सब फ़िल्मों के बीच बड़ी ख़ामोशी से आई भीमसेन की फ़िल्म ’घरौंदा’। अख़्बारों और फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं ने भी ज़्यादा ग़ौर नहीं किया इस फ़िल्म पर। लेकिन फ़िल्म के प्रदर्शित होते ही दर्शकों की संख्या सिनेमाघरों में बढ़ने लगी और इस फ़िल्म 50 दिन (और फिर 100 दिन) पूरे किए। समीक्षकों ने इस फ़िल्म को "a realistic romance in urban India" कह कर संबोधित किया, या यूं कहें कि भीमसेन को सम्मानित किया। भीमसेन ने यह दिखा दिया कि बिना बड़े सितारों के, बिना बड़े निर्देशक के, और बिना बड़े संगीतकार के भी किस तरह से किसी फ़िल्म को आम दर्शकों में ख़ास बनाया जा सकता है! शहरीकरण और शहरी जीवन की कई समस्याओं को इस फ़िल्म में जगह दी गई जैसे कि बेरोज़गारी, अपने नए घर का सपना, पैसे कमाने के लिए नैतिक मूल्यों को भूल जाना, और सबकुछ गंवा कर आत्महत्या कर लेना। फ़िल्म के गीतों की बात करें तो इसमें बस तीन ही गाने थे लेकिन तीनों असरदार। सुदीप और छाया के घर ढूंढ़ने और अपनी नई दुनिया के सपने देखने को गुलज़ार ने बड़ी ख़ूबसूरती से "दो दीवाने शहर में, रात में और दोपहर में..." गीत के ज़रिए उभारा है। "आब-ओ-दाना" (पानी और रोटी/खाद्य) के फ़िल्मी गीत में इस पहले इस्तमाल से गीत में एक चमक आई है। इसी गीत का निराश संस्करण "एक अकेला इस शहर में..." सुदीप के अकेलेपन और हताशा को ज़ाहिर करता है। इस गीत में गुलज़ार लिखते हैं - "जीने की वजह तो कोई नहीं, मरने का बहाना ढूंढ़ता है..." जो कुछ हद तक शहरयार के लिखे "सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है" से मिलता-जुलता है जो अगले ही साल (1978 में) फ़िल्म ’गमन’ के लिए लिखा गया था। तीसरा गीत नक्श ल्यालपुरी का लिखा हुआ है - "तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीं है...", जो सुदीप और छाया की दोस्ती से लेकर प्यार तक की दूरी को मिटाने का काम करता है। जयदेव के संगीत में भूपेन्द्र और रुना लैला के गाए ये तीन गीत आज सदाबहार बन चुके हैं। वैसे ’घरौंदा’ के गीत फ़िल्म की कथानक के विपरीत भी सुनाई देते हैं। फ़िल्म के बाहर अगर इन गीतों को सुना जाए तो फ़िल्म के बारे में एक अलग ही धारणा बनती है। भीमसेन ने इस गीतों के लिए फ़िल्म में एक आसान सा रवैया रखा जिसमें कोई नाटकीयता नहीं, कोई आंत संबंधी अर्थ नहीं। 

’घरौंदा’ फ़िल्म की पूरी टीम पर ग़ौर करें तो यह ’छोटी सी बात’ और ’रजनीगंधा’ क़िस्म की फ़िल्म प्रतीत होती है। जिस फ़िल्म में अमोल पालेकर और ज़रीना वहाब हों, उस फ़िल्म से दर्शकों को एक "feel-good entertainment" की उम्मीद रहती है, जबकि ’घरौंदा’ की कहानी इसके विपरीत है। हाँ, फ़िल्म का पार्श्व ज़रूर ’छोटी सी बात’ या ’रजनीगंधा’ जैसा शहरी है, लेकिन कहानी बिल्कुल अलग। यह फ़िल्म वास्तविकता से हमारा परिचय कराता है, और यह बताता है कि यह दुनिया सिर्फ़ अच्छे लोगों से ही नहीं बना है, बल्कि अच्छे लोगों के भी  बुरे ख़यालात हो सकते हैं। शहर के लोग किस तरह से अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हुए भी महत्वाकांक्षी हो सकते हैं, या फिर भयभीत होते हुए भी क्रूर हो सकते हैं, यही सीख इस फ़िल्म से हमें मिलती है। दूसरों की ज़िन्दगी की परवाह किए बिना सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने बारे में सोचना, शायद यही आज शहरों की रवायत हो गई है। मुंबई जैसे एक बड़े आधुनिक शहर में क्रूर मानव इच्छाओं और जल्दी से कुछ बड़ा करने की उम्मीद करने वालों की एक अंधकार व निराशावादी कहानी है ’घरौंदा’ जो हमें श्याम बेनेगल या गोविन्द निहलानी जैसे फ़िल्मकारों की फ़िल्मों की याद दिला जाती है।

’घरौंदा’ फ़िल्म में बहुत सी चीज़ें अपरम्परागत हैं। फ़िल्म के नायक सुदीप का चरित्र भी मिला-जुला है। यह सच है कि वो छाया से सचमुच प्यार करता है, लेकिन उसका चरित्र धूध का धुला हुआ नहीं है। वो जिस कमरे में रहता है, उसका एक रूम-मेट आय दिन उस कमरे में वेश्या ले आता है। सुदीप भी जब पहली बार छाया को उस कमरे में ले आया था, तब उसके इरादे भी कुछ ख़ास नेक नहीं थे। उधर अधेड़ उम्र के मोदी का छाया के प्रति नज़रिया भी आपत्तिजनक माना जा सकता है इसलिए कि छाया उनकी बेटी की उम्र की लड़की है। ऐसा आमतौर पर नहीं देखा जाता हमारे समाज में। छाया का मोदी से विवाह के बाद सुदीप का पूरी दुनिया से मतभेद और अपने आप की उपेक्षा भी किसी साधारण हिन्दी फ़िल्मी नायक की छवि के विपरीत है। देवदास का शहरी संस्करण बने सुदीप और वेश्याओं के पास भी उसके जाने का उल्लेख फ़िल्म में मिलता है। उधर छाया का अपने पिता के उम्र के पति से इतनी जल्दी मित्रता और बिना किसी शिकायत के एक आदर्श पत्नी बन जाना भी फ़िल्म की कहानी की वास्तविकता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। इस तरह से फ़िल्म के तीनों मुख्य चरित्र संदिग्ध हैं और शायद यही वजह है जो इस फ़िल्म को अपने समय की एक अनोखी फ़िल्म बनाती है। सुदीप की भूमिका में अमोल पालेकर ने इस तरह का नकारात्मक चरित्र पहली बार निभा रहे थे, इसलिए दर्शकों को हज़म करने में थोड़ी दिक्कत हुई। फ़िल्म समालोचकों ने यह भी कहा कि ज़रीना वहाब की जगह शबाना आज़्मी छाया का किरदार बेहतर निभा सकती थीं। इसी तरह से लोगों का कहना था कि श्रीराम लागू की जगह संजीव कुमार या अमजद ख़ान मोदी के चरित्र को बेहतर साकार कर पाते। ख़ैर, ये होता तो ऐसा होता, वो होता तो वैसा होता, ये सब अब कोई मायने नहीं रखती। बस सच्चाई यही है कि भीमसेन ने ’घरौंदा’ के रूप में फ़िल्म जगत को एक अनमोल भेंट दी है जो आनेवाले समय में भी समानान्तर या बेहतर शब्दों में "middle of the road" सिनेमा के शौकीनों को चमत्कृत करती रहेगी और फ़िल्मकारों को अच्छी वास्तविक जीवन की फ़िल्में बनाने के लिए प्रेरित करती रहेगी। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ करती है स्वर्गीय भीमसेन को सलाम!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

आ लड़ाई आ - उपेन्द्रनाथ अश्क

बोलती कहानियाँ स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने पूजा अनिल की आवाज़ में वंदना अवस्थी दुबे की कहानी "डेरा उखड़ने से पहले" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम लेकर आये हैं उर्दू और हिंदी प्रसिद्ध के साहित्यकार उपेन्द्रनाथ अश्क की एक सधी हुई कहानी "आ लड़ाई आ, मेरे आंगन में से जा", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 5 मिनट 43 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



उर्दू के सफल लेखक उपेन्द्रनाथ 'अश्क' ने मुंशी प्रेमचंद की सलाह पर हिन्दी में लिखना आरम्भ किया। 1933 में प्रकाशित उनके दूसरे कहानी संग्रह 'औरत की फितरत' की भूमिका मुंशी प्रेमचन्द ने ही लिखी थी। अश्क जी को 1972 में 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।

हर सप्ताह सुनिए एक नयी कहानी

"लाला को जैसे बिजली का तार छू गया"
(उपेन्द्रनाथ "अश्क" की "आ लड़ाई आ" से एक अंश)



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#Ninth Story, Aa Ladai Aa: Upendra Nath Ashq/Hindi Audio Book/2018/9. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 22 अप्रैल 2018

राग पूर्वी और पूरिया धनाश्री : SWARGOSHTHI – 366 : RAG PURVI & PURIYA DHANASHRI




स्वरगोष्ठी – 366 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 5 : पूर्वी थाट

राग पूर्वी में ध्रुपद और पूरिया धनाश्री में फिल्म संगीत की रचना





उस्ताद अमीर खाँ
पण्डित अजय चक्रवर्ती
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पाँचवाँ थाट पूर्वी है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे पूर्वी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग पूर्वी में निबद्ध एक ध्रुपद रचना पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही पूर्वी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग पूरिया धनाश्री के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



आधुनिक भारतीय संगीत में प्रचलित थाट पद्धति पर हम पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित उन दस थाटों की चर्चा कर रहे हैं, जिनके माध्यम से रागों का वर्गीकरण किया जाता है। उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत की दोनों पद्धतियों में संगीत के सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल बारह स्वरों के प्रयोग में समानता है। दक्षिण भारत के ग्रन्थकार पण्डित व्यंकटमखी ने सप्तक में 12 स्वरों को आधार मान कर 72 थाटों की रचना गणित के सिद्धान्तों पर की थी। भातखण्डे जी ने इन 72 थाटों में से केवल उतने ही थाट चुन लिये, जिनमें उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण होना सम्भव हो। इस विधि से वर्तमान उत्तर भारतीय संगीत को उन्होने पक्की नींव पर प्रतिस्थापित किया। साथ ही उन सभी विशेषताओं को भी, जिनके आधार पर दक्षिण और उत्तर भारतीय संगीत पद्धति पृथक होती है, उन्होने कायम किया। भातखण्डे जी ने व्यंकटमखी के 72 थाटों में से 10 थाट चुन कर प्रचलित सभी रागों का वर्गीकरण किया। थाट सिद्धान्त पर भातखण्डे जी ने ‘लक्ष्य-संगीत’ नामक एक ग्रन्थ की रचना भी की थी।

आज हम पूर्वी थाट के विषय में थोड़ी जानकारी प्राप्त करेंगे। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे॒, ग, म॑, प ध॒, नि। इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र और ऋषभ तथा धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। पूर्वी थाट का आश्रय राग पूर्वी है। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग पूर्वी के आरोह के स्वर- सा, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, (कोमल), नि, सां और अवरोह के स्वर- सां, नि, (कोमल), प, म॑(तीव्र), ग, रे(कोमल), सा होते हैं। इस राग में कोई भी स्वर वर्जित नहीं होता। ऋषभ और धैवत कोमल तथा मध्यम के दोनों प्रकार प्रयोग किये जाते हैं। राग ‘पूर्वी’ का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है तथा इसे दिन के अन्तिम प्रहर में गाया-बजाया जाता है। आज हमारी चर्चा में थाट और राग पूर्वी है। इस राग का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए अब हम आपके समक्ष एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे पंडित अजय चक्रवर्ती ने प्रस्तुत किया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने राग पूर्वी की इस रचना को ध्रुपद के अन्दाज में प्रस्तुत किया है। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग पूर्वी की यह रचना। इस प्रस्तुति में सारंगी पर भारतभूषण गोस्वामी ने और पखावज पर माणिक मुण्डे ने संगति की है। कुछ विद्वान इस ध्रुपद को तानसेन की रचना मानते हैं।

राग पूर्वी : ‘कर कपाल लोचन त्रय...’ पण्डित अजय चक्रवर्ती


इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ प्रमुख राग हैं- ‘पूरिया धनाश्री’, ‘जैतश्री’, ‘परज’, ‘श्री’, ‘गौरी’, ‘वसन्त’ आदि। पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरिया धनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरिया धनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- नि, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, (कोमल), प, नि, सां और अवरोह के स्वर- रे(कोमल), नि, (कोमल), प, म॑(तीव्र), ग, म॑(तीव्र), रे(कोमल), ग, रे(कोमल), सा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग पूरिया धनाश्री के गायन-वादन का समय सायंकाल माना जाता है। आइए, अब आप राग पूरिया धनाश्री पर केन्द्रित एक गीत सुनिए। यह गीत हमने फिल्म ‘बैजू बावरा’ से लिया है। अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1952 में फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग पूरिया धनाश्री के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन को अपने महल में रियाज़ करते दिखाया गया था। यह फिल्म का शुरुआती प्रसंग है। इसी गीत पर फिल्म की नामावली प्रस्तुत की गई है। राग पूरिया धनाश्री में निबद्ध यह गीत सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमीर खाँ ने गाया है। फिल्म के संगीतकार नौशाद थे। इस रचना में भी तानसेन का नाम आया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पूरिया धनाश्री : ‘तोरी जय जय करतार...’ : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म - बैजू बावरा




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 366वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 अप्रैल 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 368वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 364वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म “संगीत सम्राट तानसेन” से एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – जोगिया, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – कमल बारोट और महेन्द्र कपूर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध अपने पता के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की पाँचवीं कड़ी में आपने पूर्वी थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग पूर्वी में पिरोया भक्तिरस से परिपूर्ण एक ध्रुपद सुविख्यात गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही पूर्वी थाट के जन्य राग पूरिया धनाश्री पर आधारित एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग पूर्वी और पूरिया धनाश्री : SWARGOSHTHI – 366 : RAG PURVI & PURIYA DHANASHRI : 22 Apr., 2018 

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

चित्रकथा - 64: हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-2)

अंक - 64

हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-2)

"प्यार है अमृत कलश अंबर तले..." 




’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! फ़िल्म जगत एक ऐसा उद्योग है जो पुरुष-प्रधान है। अभिनेत्रियों और पार्श्वगायिकाओं को कुछ देर के लिए अगर भूल जाएँ तो पायेंगे कि फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में ना के बराबर रही हैं। जहाँ तक फ़िल्मी गीतकारों और संगीतकारों का सवाल है, इन विधाओं में तो महिला कलाकारों की संख्या की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है। आज ’चित्रकथा’ में हम एक शोधालेख लेकर आए हैं जिसमें हम बातें करेंगे हिन्दी फ़िल्म जगत के महिला गीतकारों की, और उनके द्वारा लिखे गए यादगार गीतों की। पिछले अंक में इस लेख का पहला भाग प्रस्तुत किया गया था, आज प्रस्तुत है इसका दूसरा भाग।


त्रुटि सुधार

’हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार’ लेख के पहले भाग में हमने जद्दन बाई को प्रथम महिला संगीतकार होने की बात कही थी, जो सही नहीं है। सही नाम है इशरत जहाँ। इशरत जहाँ ने 1934 की फ़िल्म ’अद्ल-ए-जहांगीर’ में संगीत दिया था और जद्दन बाई ने 1935 की फ़िल्म ’तलाश-ए-हक़’ में। इस ग़लती की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए श्री शिशिर कृष्ण शर्मा जी को हम धन्यवाद देते हैं।



पिछले अंक में हमने जद्दन बाई, सरोज मोहिनी नय्यर, निरुपा रॉय, किरण कल्याणी, प्रभा ठाकुर, अमृता प्रीतम, गीतांजलि सिंह, आशा रानी और शबनम करवारी जैसे महिला गीतकारों की बातें की थी। पिछले अंक में शुरुआत जद्दन बाई से हुई थी। यह वह दौर था जब अधिकतर फ़िल्मी गीतों को ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड्स पर उतारे नहीं जाते थे। केवल फ़िल्म के परदे पर ही वो दिखाई व सुनाई देते। इसलिए शुरुआती कुछ वर्षों के बहुत से गीत उपलब्ध नहीं हैं। उस पर उस दौर के अधिकतर ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड्स के कवर पर गीतकार का नाम प्रकाशित नहीं किया गया। इन सब के चलते फ़िल्म संगीत के पहले दौर के गीतकारों के बारे में जानकारी अधूरी ही रह गई। इन्टरनेट के अज्ञात सूत्रों पर ध्यान दें तो महिला गीतकारों में मुन्नी बाई और मिस विमल का नाम दिखाई देता है। लेकिन उनके द्वारा लिखे किसी भी गीत की जानकारी नहीं मिल पायी है। अगर किसी पाठक के पास इन दो कलाकारों के लिखे गीतों की जानकारी हों तो टिप्पणी में अवश्य सूचित करें। 30 के दशक के आख़िर में भाग्यवती राम्या नामक गीतकार ने फ़िल्म ’अधूरी कहानी’ में दो गीत लिखे। वैसे इस फ़िल्म में बहुत से गाने थे जिन्हें जे. एस. कश्यप और प्यारेलाल संतोषी ने लिखे। ज्ञान दत्त के संगीत निर्देशन में भाग्यवती राम्या के लिखे दो गीत थे "मैं चटक मटक की चंदुरी..." और "शुभ घड़ी साहब घर आए जी आज..."। अफ़सोस की बात है कि इन्टरनेट पर फ़िल्म के बाकी सभी गीतों के गायकों की जानकारी दी गई है, केवल इन दो गीतों को छोड़ कर।

डोगरी भाषा की प्रथम आधुनिक कवयित्री पद्मा सचदेव ने हिंदी में भी काफ़ी काम किया है और आज वो एक प्रसिद्ध कवयित्री व उपन्यासकार के रूप में जानी जाती हैं। उनके कविता संग्रह ’मेरी कविता मेरे गीत’ के लिए उन्हें 1971 में ’साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। पद्मश्री, कबीर सम्मान व अन्य बहुत पुरस्कारों से सम्मानित पद्मा सचदेव ने कुछ हिन्दी फ़िल्मों के लिए गीत भी लिखे हैं। पहली बार उनका लिखा गीत 1973 की फ़िल्म ’प्रेम पर्बत’ में सुनाई दिया। वेद राही की इस फ़िल्म में संगीत जयदेव का था। हालांकि फ़िल्म का लोकप्रिय गीत था "ये दिल और उनकी निगाहों के साये" जिसे जाँ निसार अख़्तर ने लिखा था, पर पद्मा सचदेव का लिखा "मेरा छोटा सा घर बार मेरे अंगना में, छोटा सा चंदा छोटे-छोटे तारे, रात करे सिंगार मेरे अंगना में..." भी बेहद मधुर व कर्णप्रिय है। लोरी शैली में लिखा यह गीत जैसे एक आदर्श भारतीय नारी के दिल की पुकार है। एक महिला गीतकार से बेहतर इस तरह की रचना भला कौन लिख सकता है। इसके बाद 1978 में पद्मा सचदेव को फिर एक बार मौका मिला राजिन्दर सिंह बेदी निर्देशित फ़िल्म ’आखिन देखी’ में दो गीत लिखने का। फ़िल्म के कुल छह गीतों में शामिल थे एक पारम्परिक रचना, एक तुलसीदास रचना, एक कबीर की रचना, और एक गीत गीतकार राम मूर्ति चतुर्वेदी का लिखा हुआ। बाकी दो गीत पद्मा सचदेव के थे जिनमें से एक गीत फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ। मोहम्मद रफ़ी और सुलक्षणा पंडित की आवाज़ों में संगीतकार जे. कौशिक के संगीत में यह गीत "सोना रे तुझे कैसे मिलूं, कैसे कैसे मिलूं, अम्बुआ की बगिया झरना के नदिया कहाँ मिलूं, तुझे कैसे मिलूं..." आज भी आय दिन रेडियो पर फ़रमाइशी कार्यक्रमों में सुनाई दे जाता है। उनका लिखा दूसरा गीत सुलक्षणा पंडित की एकल आवाज़ में था - "जीने ना मरने दे हाय दैय्या रे, आफ़त जवानी सीने में धक धक करे हाय दैय्या रे, काफ़र जवानी जीने ना मरने दे..."। इसके बाद 1979 में पद्मा सचदेव ने गीतकार योगेश के साथ मिल कर फ़िल्म ’साहस’ के गीत लिखे जिन्हें स्वरबद्ध किया अमीन संगीत ने। भूपेन्द्र की आवाज़ में "नीला सजीला स अये आसमाँ, ख़्वाबों सी फैली हुई वादियाँ..." को एक कविता के रूप में लिखा गया है जिस पर प्रकृति की सुन्दरता पूरी तरह से हावी है। इसी तरह से दो और काव्यात्मक शैली में लिखे गीत हैं भूपेन्द्र और अनुराधा पौडवाल का गाया "अब तुम हो हमारे और हम भी तुम्हारे हैं, हमें जान से प्यारे मनमीत हमारे हैं..." और भूपेन्द्र व आशा भोसले का गाया "एक घर बनाएँ, सपने सजाएँ, हम यहाँ हम यहाँ, एक होके झूमें, एक होके गाएँ, हम यहाँ हम यहाँ...। दिलराज कौर की आवाज़ में "बाबूजी बाबूजी क्या लोगे, कुछ बोलो ना, ये दिल कब का तेरा हो गया है, बाबूजी बाबूजी क्या लोगे..." गीत को सुन कर ओ. पी. नय्यर के संगीत शैली की याद अ जाती है। एक उल्लेखनीय बात यह है कि 1981 में भी ’साहस’ शीर्षक से फ़िल्म आई थी जिसके संगीतकार थे बप्पी लाहिड़ी। संभवत: 1979 की ’साहस’ प्रदर्शित नहीं हो पायी थी और केवल गीतों को ही जारी कर दिया गया था। और इसी के साथ पद्मा सचदेव ने भी फ़िल्मी गीतकारिता से संयास लेकर अपना पूरा ध्यान साहित्य और काव्य पर लगा दिया। 

1976 में शबनम करवारी के साथ-साथ एक और महिला गीतकार के गीत सुनाई पड़े थे, ये हैं सई परांजपे। ये वो ही पद्मभूषण से सम्मानित सई परांजपे हैं जिनकी ’स्पर्श’, ’कथा’, ’चश्म-ए-बद्दूर’, ’दिशा’, ’पपीहा’ और ’साज़’ जैसी फ़िल्में दर्शकों के दिलों को छू गई थीं। इन सभी फ़िल्मों की वो निर्देशिका थीं। बतौर फ़िल्म निर्देशिका, उनकी पहली फ़िल्म थी ’जादू का शंख’ जो बनी थी 1975 में। इसके अगले ही साल आई फ़िल्म ’सिकंदर’ जो एक बाल-फ़िल्म थी। यह फ़िल्म चार बच्चों की कहानी थी जिन्हें एक कुत्ते के पिल्ले से प्यार हो जाता है। वो उन्हें घर ले आते हैं पर उनके अभिभावक इसकी अनुमति नहीं देते। फिर वो चार बच्चे किस तरह से छुप-छुप कर उसे पालते हैं, यही है इस फ़िल्म की कहानी। इस बाल-फ़िल्म के लिए सई परांजपे ने दो गीत लिखे थे जिन्हें स्वरबद्ध किया भास्कार चंदावरकर ने। सूदेश महाजन और सुरेश वाघ की आवाज़ों में "चार कलंदर एक मुचंदर हम सब का..." और विनीता जोगलेकर का गाया "हुण ला अच्छे बच्चे नहीं जागते..." सई परांजपे के लिखे फ़िल्म के दो गीत रहे। यह सच है कि इसके बाद सई परांजपे ने फिर कभी किसी फ़िल्म के लिए गीत नहीं लिखे जिस वजह से उनके लिखे ये दो फ़िल्मी बाल-गीत बहुत महत्वपूर्ण बन जाते हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि अगर उन्होंने सामाजिक फ़िल्मों के लिए भी गीत लिखे होते, वे बेहद अर्थपूर्ण ही होते। सई परांजपे के साथ जिस महिला गीतकार का नाम लिया जाना चाहिए, वो हैं इंदु जैन। इंदु जैन ने सई परांजपे की कई फ़िल्मों में गीत लिखे हैं। पहला गीत 1981 की फ़िल्म ’चश्म-ए-बद्दूर’ में लिखा था "कहाँ से आए बदरा, घुलता जाए कजरा...", जो आज एक सदाबहार नग़मा बन चुका है। राजमकल के संगीत में जेसुदास और हेमन्ती शुक्ला की गायी राग वृंदावनी सारंग पर आधारित इस रचना के शब्द इतने सुन्दर हैं कि इस गीत को जितनी बार भी सुनें, आनन्द की ही अनुभूति होती है। इस फ़िल्म के अन्य गीतों में एक और उल्लेखनीय गीत रहा है "काली घोड़ी द्वार खड़ी" जिसे भूपेन्द्र और सुलक्षणा पंडित ने गाया है। शास्त्रीयता के साथ साथ हास्य रस भी है इस गीत में। शैलेन्द्र सिंह और हेमन्ती शुक्ला का गाया "इस नदी को मेरा आइना मान लो, कि मोहब्बत का बहता नशा जान लो..." भी एक सुन्दर रचना है लेकिन ताज्जुब की बात है कि इस गीत को अब लोग भुला चुके हैं। इसके बाद 1983 की सई परांजपे की फ़िल्म ’कथा’ के गीत भी इंदु जैन ने ही लिखे। इस फ़िल्म में भी राजकमल का ही संगीत था। हास्य रस पर आधारित फ़िल्म में दो अनोखे गीत थे। अनोखे इस लिहाज़ से कि इन दोनों गीतों को कुल नौ गायकों ने गाया है। सुषमा श्रेष्ठ, हरिहरन, पिनाज़ मसानी, घन्श्याम वासवानी, प्रीति चावला, विराज उपध्याय, नरेन्द्र भंसाली, बद्री पवार और उषा रेगे के गाए ये दो गीत हैं "कौन आया कौन आया" और "क्या हुआ क्या हुआ"। इन दोनों गीतों में मध्यमवर्गीय परिवारों में दूसरों के जीवन और दिनचर्या के प्रति अत्यधिक कौतुहल को हास्य के माध्यम से साकार किया है इंदु जैन ने। फ़िल्म का तीसरा गीत किशोर कुमार की आवाज़ में है - "मैंने तुमसे कुछ नहीं मांगा..." जो अपने समय का हिट गीत रहा है। फ़िल्म का चौथा व अंतिम गीत "तुम सुंदर हो, तुम चंचल हो" में नायिका की ख़ूबसूरती का बेहद ख़ूबसूरती से वर्णन मिलता है। इस गीत को राजकमल, प्रीति सागर और विनी जोगलेकर ने गाया है। ख़ास बात यह भी है कि राजकमल वाला अंश भारतीय शैली में है जबकि प्रीति सागर वाला हिस्सा पश्चिमी रंग का है। गीत के तीसरे अंश में राजकमल और विनी जोगलेकर का एक साथ पश्चिमी नृत्य शैली पर गाया अंश इस गीत को एक अनोखा गीत बना दिया है। सई परांजपे की राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित 1984 की फ़िल्म ’स्पर्श’ के गीत भी इंदु जैन ने ही लिखे। कानु रॉय के संगीत में सुलक्षणा पंडित ने फ़िल्म के सभी तीन गाए। "खाली प्याला धुंधला दर्पण खाली खाली मन, बुझता सूरज जलता चन्दा पतझरी सावन..." में जैसे इंदु जैन ने मनमोहक काव्य की छटा बिखेर दी हों। इसी गीत का विस्तार है "प्याला छलका उजला दर्पण, जगमग मन आंगन..."। और तीसरे गीत के रूप में है बाल-गीत "गीतों की दुनिया में सरगम है हम, फूलों में ख़ुशबू के पर्चम है हम, चलते हैं कदमों में मंज़िल भरे, मुट्ठी में ख़ुशियों की पुंजी धरे, तूफ़ान भी आए कश्ती हैं हम, ताज़ी हवाओं के झोंके हैं हम..."। इस फ़िल्म के बाद इंदु जैन का लिखा कोई भी गीत फ़िल्मों में सुनने को नहीं मिला। यह आश्चर्य की ही बात है कि अब तक जितने भी महिला संगीतकारों की बात हमने की है, वो सभी दो चार फ़िल्मों के बाद फ़िल्मी गीतकारिता से संयास ले लिया। क्या वजह रही होंगी?

हिन्दी साहित्य में महादेवी वर्मा का नाम कौन नहीं जानता! छायावाद के चार लौहस्तंभों में एक हैं महादेवी वर्मा (अन्य तीन स्तंभ हैं सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’, जयशंकर प्रसाद और सुमित्रानंदन पंत)। उनकी कालजयी काव्य कृतियों में ’यामा’ सर्वोपरि है। उनकी पशुभक्ति का मिसाल हमें ’नीलकंठ’ और ’गौरा’ जैसी सच्ची कहानियों में मिलता है। ’मेरे बचपन के दिन’, ’मधुर मधुर मेरे दीपक जल’ और ’गिल्लु’ सहित उनकी बहुत सी रचनाओं को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। महादेवी वर्मा के प्रशंसकों ने उन्हें ’आधुनिक युग की मीरा’ नाम से नवाज़ा है। पद्मभूषण, पद्मविभूषण, साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप और ज्ञानपीठ जैसे उच्चस्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित महादेवी वर्मा ने बस एक फ़िल्म में एक गीत लिखा है। 1986 की यह फ़िल्म थी ’त्रिकोण का चौथा कोण’ जिसका निर्माण व निर्देशन मधुसुदन ने किया था। जयदेव के संगीत से सजी इस फ़िल्म के चार गीतों में से दो गीत महादेवी वर्मा ने लिखे। इनमें से एक गीत है "प्यार है अमृत कलश अंबर तले, प्यार बाँटा जाए जितना बाँट ले..." जिसे शोभा जोशी ने गाया है। बहुत ही सुन्दर रचना और संयोग की बात यह है कि अमृता प्रीतम के लिखे गीत "अंबर की एक पाक सुराही" में भी उसी "अंबर" का उल्लेख है। महादेवी वर्मा का लिखा फ़िल्म का दूसरा गीत रिकॉर्ड तो हुआ था लेकिन फ़िल्माया नहीं गया। छाया गांगुली की आवाज़ में यह गीत है "कैसे उनको पाऊँ आली", जो एक कविता है। जितनी सुन्दरता से जयदेव ने इस सुंदर कविता को सुरों में पिरोया है, उतनी ही ख़ूबसूरती से छाया गांगुली ने इसे गाया है। दरसल इस गीत को पहले आशा भोसले ने एक ग़ैर-फ़िल्मी ऐल्बम के लिए गाया था जिसे जयदेव ने ही स्वरबद्ध किया था। ’त्रिकोण का चौथा कोण’ के निर्माण के समय जयदेव ने महादेवी वर्मा से इस गीत को इस फ़िल्म के लिए भी रिकॉर्ड करने की अनुमति माँगी। महादेवी वर्मा अपनी कविताओं को फ़िल्मों में इस्तमाल के लिए राज़ी नहीं होती थीं, लेकिन इस बार के लिए वो मान गईं। और इस तरह से फ़िल्म संगीत के धरोहर को उनकी इन दो रचनाओं ने समृद्ध किया। 

फ़िल्म ’त्रिकोण का चौथा कोण’ में महादेवी वर्मा के अलावा एक और महिला गीतकार ने एक गीत लिखा। माया गोविंद का लिखा यह गीत है "किया पिया पे क्या जादू"। छाया गांगुली की आवाज़ में "हौले हौले रस घोले बोले मुझसे जिया, किया पिया पे क्या जादू, पर मैंने क्या किया..." में "जिया", "पिया" और "किया" के सुंदर काव्यात्मक प्रयोग न इस गीत को फ़िल्म-संगीत के धरोहर का एक अनोखा गीत बना दिया है। वैसे माया गोविंद की लिखी यह पहली फ़िल्मी रचना नहीं है। कवयित्री, नर्तकी, स्टेज आर्टिस्ट, गायिका, फ़िल्म निर्माता और गीतकार माया गोविंद बहुमुखी प्रतिभा की धनी रही हैं। लखनऊ में जन्मीं माया गोविंद ने अपना पहला फ़िल्मी गीत सीरू दरयानानी की फ़िल्म ’कश्मकश’ के लिए लिखा जो 1973 की फ़िल्म थी। कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत में यह फ़िल्म का शीर्षक गीत है "कश्मकश छोड़ दे, दिल से दिल जोड़ दे"। एक कामोत्तेजक गीत के रूप में यह गीत श्रोताओं के दिलों को छू नहीं सका। इसी साल लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत में फ़िल्म ’जलते बदन’ के सभी चार गीत लिखे माया गोविंद ने। इस फ़िल्म का लता-रफ़ी की युगल आवाज़ों में "वादा भूल ना जाना, हो जानेवाले लौट के आना" अपने ज़माने का मशहूर गीत रहा है, और इस तरह से इसे माया गोविंद का लिखा पहला हिट गीत माना जा सकता है। ’जलते बदन’ रामानन्द सागर की फ़िल्म थी। माया गोविंद की प्रतिभा को निर्माता-निर्देशक आत्मा राम ने भी सराहा, और उन्हें अपनी अगली फ़िल्म ’आरोप’ के गीत लिखने का मौका दिया। इस फ़िल्म में उनके लिखे दो गीत बहुत लोकप्रिय हुए। भूपेन हज़ारिका की धुन पर "नैनों में दर्पण है, दर्पण में कोई, देखूँ जिसे सुबह शाम" गीत को ख़ूब ख्याति मिली। फ़िल्म का एक अन्य गीत "जब से तूने बंसी बजाई रे, बैरन निन्दिया चुराई, मेरे ओ कन्हाई" भी एक बेहद कर्णप्रिय भक्ति रचना है। भूपेन हज़ारिका ने इसे असम के कीर्तन शैली में स्वरबद्ध किया है। इस फ़िल्म में माया गोविंद ने सभी आठ गीत लिखे थे। आत्मा राम ने 1975 में अपनी अगली फ़िल्म ’क़ैद’ के लिए भी माया गोविंद को ही गीतकार चुना और संगीत के लिए बनवाई नितिन-मंगेश की जोड़ी। इस फ़िल्म का किशोर कुमार और साथियों का गाया "ये तो ज़िन्दगी है, कभी ख़ुशी कभी ग़म..." बहुत हिट हुआ था। इसके बाद 1979 में सावन कुमार की फ़िल्म ’सावन को आने दो’ में कई गीतकारों ने गीत लिखे जैसे कि इंदीवर, गौहर कानपुरी, फ़ौक़ जामी, मदन भारती, पूरन कुमार ’होश’ और अभिलाष। एक गीत माया गोविंद ने भी लिखा था इस फ़िल्म में; सुलक्षणा पंडित और येसु दास की आवाज़ों में राजकमल के संगीत में दर्द भरा गीत "ये मत जानियो तुम बिछुड़े मोहे चैन, जैसे बन की लकड़ी सुलगती हो दिन रैन, कजरे की बाती असुवन के तेल में, आली मैं हार गई अँखियों के खेल में..." एक सुन्दर रचना है। 1980 में राजकमल और माया गोविंद की जोड़ी ने फ़िल्म ’पायल की झंकार’ के सभी गीत रचे जो ख़ूब पसन्द किए गए। 1982 में संगीतकार ख़य्याम के साथ काम करते हुए माया गोविंद ने फ़िल्म ’बावरी’ के सभी गीत लिखे जो बहुत पसन्द किए गए। "अब चराग़ों का कोई काम नहीं" (लता- येसु दास), "हे अम्बिके जगदम्बिके हे माँ" (आशा) और "मोरे नैनों में श्याम समाये" (लता) जैसे गीत फ़िल्म संगीत के बदलते मिज़ाज वाले दौर में सुरीले हवा के झोंकों की तरह आए। 1983 में राम लक्ष्मण के संगीत में ’हमसे है ज़माना’ फ़िल्म के लिए भी उन्होंने एक गीत लिखे। 1980 में ’एक बार कहो’ फ़िल्म में बप्पी लाहिड़ी के संगीत में माया गोविंद ने एक गीत लिखे। येसु दास की आवाज़ में यह गीत "चार दिन की ज़िन्दगी है, प्यार के ये दिन, दो गए तेरे मिलने से पहले, दो गए तेरे बिन..." अपने ज़माने की एक बेहद लोकप्रिय रचना है जिसे आज भी बड़े चाव से सुना जाता है। माया गोविंद और बप्पी लाहिड़ी का साथ आगे भी जारी रहा। 1986 की फ़िल्म ’झूठी’ में रबीन्द्र संगीत की छाया लिए लता-किशोर का "चंदा देखे चंदा, तो वो चंदा शरमाये" एक अत्यन्त कर्णप्रिय गीत है। 1993 में ’दलाल’ फ़िल्म में "गुटुर गुटुर" गीत ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुआ, लेकिन विवादित भी रहा दोहरे अर्थ की वजह से। 90 और 2000 के दशकों में माया गोविंद के गीतों के स्तर में भारी गिरावट दिखाई दी। "गुटुर गुटुर" के विवाद के बाद फ़िल्म ’नाजायज़’ का "दरवाज़ा खुला छोड़ आई नींद के मारे", ’डिस्को डान्सर’ का "लौंडा बदनाम हुआ" और ’हम तुम्हारे हैं सनम" का "गले में लाल टाई" जैसे सस्ते गीत उनकी झोली से निकले। 2001 में संगीतकार भूपेन हज़ारिका ने बरसों बाद फिर एक बार माया गोविंद से गीत लिखवाए फ़िल्म ’दमन’ में। "सुन सुन गोरिया क्या बोले मेरा कंगना" असमीया लोक धुन पर आधारित सुन्दर रचना है जिसे माया गोविंद ने सुन्दर शब्दों से सजाया। माया गोविंद की लिखी इस दौर की कुछ और लोकप्रिय गीत हैं - "यार को मैंने मुझे यार ने सोने ना दिया" (शीशा), "आँखों में बसे हो तुम, तुम्हे दिल में छुपा लूंगा" (टक्कर), "टहरे हुए पानी में कंकर ना मार सांवरे" (दलाल), "मेरा पिया घर आया ओ राम जी" (याराना), "चुन लिया मैंने तुम्हें" (बेक़ाबू), "आएगी वो आएगी दौड़ी चली आएगी" (अनमोल), "प्यार कर दीदार कर जो चाहे करले, हल्ले हल्ले" (आर या पार), और "मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी" (शीर्षक गीत)। फ़िल्म संगीत के शुरुआती दौर से लेकर 90 के दशक तक जितने भी महिला गीतकार आए, उनमें सबसे अधिक गीत माया गोविंद ने ही लिखे।

यहाँ आकर पूरी होती है ’हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार’ लेख की दूसरी कड़ी। इस लेख का तीसरा व अंतिम भाग ’चित्रकथा’ के आने वाले अंक में प्रकाशित की जाएगी।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

डेरा उखड़ने से पहले - वंदना अवस्थी दुबे

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में मुंशी प्रेमचंद की एक प्रेरक कथा पञ्च परमेश्वर सुनी थी।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं वंदना अवस्थी दुबे की एक कथा डेरा उखड़ने से पहले जिसे स्वर दिया है पूजा अनिल ने।

प्रस्तुत कथा का गद्य "सेतु द्वैभाषिक पत्रिका" पर उपलब्ध है। "डेरा उखड़ने से पहले" का कुल प्रसारण समय 26 मिनट 22 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


वंदना अवस्थी दुबे
पाँच वर्षों तक आकाशवाणी छतरपुर में अस्थायी उद्घोषिका के रूप में कार्य करने के बाद "दैनिक देशबंधु"- सतना में उप सम्पादक/फ़ीचर सम्पादक के रूप में बारह वर्षीय कार्यानुभव वर्तमान में निजी विद्यालय का संचालन, स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन कार्य। 

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"झट से फोन पटक दिया आभा जी ने, जैसे किसी अपवित्र करने वाली चीज़ को छू लिया हो।”
(वंदना अवस्थी दुबे कृत "डेरा उखड़ने से पहले" से एक अंश)


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डेरा उखड़ने से पहले MP3

#Eighth Story, Dera Ukhadane Se Pahle: Vandana Awasthi/Hindi Audio Book/2018/8. Voice: Pooja Anil

रविवार, 15 अप्रैल 2018

राग भैरव और जोगिया : SWARGOSHTHI – 365 : RAG BHAIRAV & JOGIYA




स्वरगोष्ठी – 365 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 4 : भैरव थाट 


राग भैरव और जोगिया के स्वरों में शिव की आराधना




डॉ.प्रभा अत्रे
महेन्द्र कपूर और कमल बारोट
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से चौथा थाट भैरव है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे भैरव थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग भैरव में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। साथ ही भैरव थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग जोगिया के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



श्रृंखला की आज की कड़ी में हम भैरव थाट और इसके आश्रय राग पर चर्चा करेंगे। पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्तमान में प्रचलित थाट पद्धति पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित है। भातखण्डे जी ने गम्भीर अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि तत्कालीन प्रचलित राग-वर्गीकरण की जितनी भी पद्धतियाँ उत्तर भारतीय संगीत में प्रचार में आईं और उनके काल में अस्तित्व में थीं, उनके रागों के वर्गीकरण के नियम आज के रागों पर लागू नहीं हो सकता। गत कुछ शताब्दियों में सभी रागों में परिवर्तन एवं परिवर्द्धन हुए हैं, अतः उनके पुराने और नए स्वरूपों में कोई समानता नहीं है। भातखण्डे जी ने तत्कालीन राग-रागिनी प्रणाली का परित्याग किया और इसके स्थान पर जनक मेल और जन्य प्रणाली को राग वर्गीकरण की अधिक उचित प्रणाली माना। उन्हें इस वर्गीकरण का आधार न केवल दक्षिण में, बल्कि उत्तर में ‘राग-तरंगिणी’, ‘राग-विबोध’, ‘हृदय-कौतुक’, और ‘हृदय-प्रकाश’ जैसे ग्रन्थों में मिला।

आज हमारी चर्चा का थाट है- ‘भैरव’। इस थाट में प्रयोग किये जाने वाले स्वर हैं- सा, रे॒(कोमल), ग, म, प, ध॒(कोमल), नि । अर्थात ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। थाट ‘भैरव’ का आश्रय राग ‘भैरव’ ही है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग ‘भैरव’ में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। राग में आरोह के स्वर- सा, रे(कोमल), ग, म, प, (कोमल), नि, सां तथा अवरोह के स्वर- सां, नि, (कोमल), प, म, ग, रे(कोमल), सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग भैरव के स्वर समूह भक्तिरस का सृजन करने में समर्थ हैं। इस राग का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए अब हम आपको विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे के स्वरों में राग भैरव का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत करते हैं। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में संलग्न प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल में निबद्ध है।

राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिव शंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे


‘भैरव’ थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग होते हैं- अहीर भैरव, गौरी, नट भैरव, वैरागी, रामकली, गुणकली, कलिंगड़ा, जोगिया, विभास आदि। आज हम आपको राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी गीत भी सुनवा रहे हैं। राग जोगिया औड़व-षाड़व जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। अर्थात, यह औड़व-षाड़व जाति का राग है। आरोह में गान्धार और निषाद तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा, रे(कोमल), म, प, (कोमल), सां और अवरोह के स्वर हैं- सां, नि, (कोमल), प, (कोमल), म, रे(कोमल), सा। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल होता है। राग जोगिया के स्वरों का सार्थक प्रयोग 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के एक गीत में संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने किया था। यह गीत वास्तव में शिव वन्दना है। अनेक विद्वानो का मत है कि इसकी गीत और संगीत रचना स्वयं तानसेन ने की थी। फिल्म में यह गीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर की आवाज़ में है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग जोगिया : ‘हे नटराज गंगाधर...’ : कमल बारोट और महेन्द्र कपूर : फिल्म - संगीत सम्राट तानसेन



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 365वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 21 अप्रैल 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 367वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 363वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1977 में प्रदर्शित फिल्म “भूमिका” से एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – सितारखानी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – प्रीति सागर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। हमारे एक नए प्रतिभागी जीतेन्द्र शेटे ने पहेली के तीन में से दो सही उत्तर दिया है। हम उनका हार्दिक स्वागत कराते हुए उन्हें दो अंक प्रदान कर रहे है। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध अपने पता के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की चौथी कड़ी में आपने भैरव थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग भैरव में पिरोया भक्तिरस से परिपूर्ण एक खयाल सुविख्यात गायिका विदुषी प्रभा अत्रे के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही भैरव थाट के जन्य राग जोगिया पर आधारित एक फिल्मी भक्तिगीत कमल बारोट और महेन्द्र कपूर के युगल स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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