Monday, August 28, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ 04 || आनंद बक्षी

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 04
Anand Bakshi 

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के चौथे एपिसोड में सुनिए कहानी आनंद बक्षी साहब की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -
किशोर कुमार
शैलेन्द्र 
संजीव कुमार 

Sunday, August 27, 2017

उपशास्त्रीय कजरी : SWARGOSHTHI – 332 : KAJARI SONGS



स्वरगोष्ठी – 332 में आज

पावस ऋतु के राग – 7 : कजरी गीतों का उपशास्त्रीय स्वरूप

पण्डित बड़े रामदास की कजरी रचना को चार प्रख्यात कलासाधकों से सुनिए




पण्डित  बड़े  रामदास  मिश्र
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज हम आपसे कजरी गायन शैली पर चर्चा करेंगे। कजरी अथवा कजली मूलतः लोक संगीत की विधा है, किन्तु इसके कुछ विशेष गुणों के कारण यह उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी यह प्रतिष्ठित हुई। आज के अंक में हम कजरी गीतों के उपशास्त्रीय रूप की चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपके लिए काशी के मूर्धन्य विद्वान बड़े रामदास की एक कजरी रचना को विदुषी गिरिजा देवी, पण्डित रवि किचलू, पण्डित छन्नूलाल मिश्र और पण्डित विद्याधर मिश्र जैसे सुप्रसिद्ध गायक कलाकारों के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे।


(बाएँ से) विदुषी गिरिजा देवी, पं.रवि किचालू, पं.छन्नूलाल मिश्र और पं.विद्याधर मिश्र

कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित रवि किचलू
कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : पण्डित छन्नूलाल मिश्र
कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : पण्डित विद्याधर मिश्र




संगीत पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 332वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक वाद्यसंगीत की धुन का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह कौन सा संगीत-वाद्य है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल अथवा तालों के नाम बताइए।

3 – इस वाद्य-संगीत को किस सुविख्यात वादक ने बजाया है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 2 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 334वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 330वीं कड़ी की पहेली में हमने आपसे 1976 में प्रदर्शित फिल्म “शक” से राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – जयन्त मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – आशा भोसले

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” जारी है। इस श्रृंखला में ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया जा रहा है। आज की इस कड़ी में हमने आपके लिए कजरी गीत का उपशास्त्रीय स्वरूप से साक्षात्कार कराया और बनारस संगीत घराने के सुप्रसिद्ध विद्वान बड़े रामदास महाराज की एक कजरी रचना को चार सुविख्यात कलासाधकों के स्वरों में प्रस्तुत किया। आगामी अंक में भी हम वर्षा ऋतु में गायी जाने वाली इस विशेष संगीत शैली पर चर्चा करेंगे और इस संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी जारी श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, August 26, 2017

चित्रकथा - 33: ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में मुकेश के गाए गीत

अंक - 33

ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में मुकेश के गाए गीत


"ऊपर जाकर याद आई नीचे की बातें.." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



कल 27 अगस्त फ़िल्म जगत की दो महान हस्तियों की पुण्यतिथि है। सदाबहार फ़िल्मों के सुप्रसिद्ध निर्देशक और निर्माता ॠषिकेश मुखर्जी, तथा सुनहरे दौर के महान पार्श्वगायक मुकेश, दोनों ने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा था 27 अगस्त के दिन; मुकेश 1976 में और ऋषी दा 2006 में। अपनी अपनी विधा के इन दो महान कलाकारों को एक साथ याद करने के लिए आज के ’चित्रकथा’ में प्रस्तुत है उन गीतों की बातें जिन्हें मुकेश ने ॠषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में गाया है। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है इन दो महान फ़नकारों की याद को।




30 सितंबर 1922 को जन्मे ॠषिकेश मुखर्जी ने अपने पूरे फ़िल्मी सफ़र में 42 फ़िल्में निर्देशित की और कई फ़िल्मों का निर्माण भी किया। 40 के दशक के अन्त में कलकत्ता में बी. एन. सरकार के ’न्यु थिएटर्स’ में एक कैमरामैन के रूप में अपना फ़िल्मी सफ़र शुरु करने के बाद वो बम्बई चले आए और बिमल रॉय के साथ फ़िल्म एडिटर व सहायक निर्देशक के रूप में अपना नया सफ़र शुरु किया। बिमल रॉय की कालजयी फ़िल्मों, ’दो बिघा ज़मीन’ और ’देवदास’, में ऋषी दा का भी महत्वपूर्ण योगदान था। 1957 में ऋषी दा ने स्वतन्त्र रूप से अपनी पहली फ़िल्म ’मुसाफ़िर’ का निर्माण व निर्देशन किया। फ़िल्म तो कुछ ख़ास नहीं चली पर फ़िल्म निर्माण में उनकी दक्षता को सब ने देखा और स्वीकारा। नतीजा यह हुआ कि 1959 की बी. लछमन की फ़िल्म ’अनाड़ी’ को निर्देशित करने का मौका उन्हें मिल गया। राज कपूर - नूतन अभिनीत यह फ़िल्म ज़बरदस्त हिट हुई। उधर गायक मुकेश राज कपूर का स्क्रीन वॉयस थे और इस फ़िल्म से मुकेश और ऋषी दा का साथ भी शुरु हुआ। और मज़े की बात देखिए कि इसी फ़िल्म के गीत "सबकुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी" के लिए मुकेश को अपना पहला फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला। और उधर ऋषी दा को भी इस फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों के तहत माननीय राष्ट्रपति के हाथों रजत मेडल मिला। इस फ़िल्म में मुकेश के गाए तीन गीत थे। शीर्षक गीत का उल्लेख कर चुके हैं, अन्य दो गीत हैं "किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार... जीना इसी का नाम है" और लता मंगेशकर के साथ गाया "दिल की नज़र से, नज़रों की दिल से..."। शंकर-जयकिशन के संगीत में शैलेन्द्र के सहज-सरल शब्दों में लिखे ये सभी गीत आज कालजयी बन चुके हैं। फ़िल्म-संगीत के इतिहास में ये गीत मील के पत्थर की तरह हैं और मुकेश के गाए गीतों में ये अहम जगह रखते हैं। 

’अनाड़ी’ के बाद मुकेश और ऋषिकेश मुखर्जी का एक बार फिर साथ हुआ 1961 की ऋषी दा निर्मित व निर्देशित फ़िल्म ’मेम दीदी’ में। फ़िल्म के संगीतकार थे सलिल चौधरी और गीत लिखे एक बार फिर शैलेन्द्र ने। सलिल दा के संगीत में मुकेश ने समय-समय पर एक से बढ़ कर एक गीत गाए हैं जिनमें से कई गीत ऋषी दा की फ़िल्मों के लिए हैं। ’मेम दीदी’ मुकेश-सलिल-ऋषी की तिकड़ी की पहली फ़िल्म है। इस फ़िल्म में कुल छह गीत हैं, लेकिन मुकेश की आवाज़ बस एक ही गीत में है लता मंगेशकर के साथ "मैं जानती हूँ तुम झूठ बोलते हो..."। केसी मेहरा और तनुजा पर फ़िल्माया यह गीत ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ, इसकी वजह शायद फ़िल्म का फ़्लॉप होना है। लेकिन इसी साल ए. वी. मय्यप्पम निर्मित और ऋषीकेश मुखर्जी निर्देशित फ़िल्म आई ’छाया’ जिसके गीतों ने लोकप्रियता की सारी सीमाएँ पार कर दी। सलिल चौधरी के संगीत में राजेन्द्र कृष्ण के लिखे गीत हर रेडियो स्टेशन से बजने लगे। हालाँकि लता और तलत महमूद का गाया "इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा" फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा, पर लता और मुकेश का गाया "दिल से दिल की डोर बांधे चोरी चोरी जाने हम तुम तुम हम संग संग चले आज कहाँ" भी ख़ूब सुना गया। इस गीत की धुन पर बनने वाला मूल बांग्ला गीत "दुरन्तो गुर्निर एइ लेगेछे पाक" हेमन्त मुखर्जी (हेमन्त कुमार) ने गाया था।


1962 में ऋषि दा को विजय किशोर दुबे व बनी रिउबेन निर्मित फ़िल्म ’आशिक़’ को निर्देशित करने का मौक़ा मिला। राज कपूर, पद्मिनी और नन्दा अभिनीत इस फ़िल्म के गीत-संगीत का भार शैलेन्द्र-हसरत-शंकर-जयकिशन पर था। लता और मुकेश ने फ़िल्म के गीतों को अंजाम दिया जो बेहद चर्चित हुए। मुकेश की एकल आवाज़ में कुल चार गीत थे - "तुम जो हमारे मीत न होते, गीत ये मेरे गीत न होते", "तुम आज मेरे संग हँस लो", "ये तो कहो कौन हो तुम", और फ़िल्म का शीर्षक गीत "मैं आशिक़ हूँ बहारों का, फ़िज़ाओं का, नज़ारों का..."। और लता मंगेशकर के साथ इस फ़िल्म में मुकेश के गाए दो गीत थे - "ओ शमा मुझे फूंक दे" और "महताब तेरा चेहरा किस ख़्वाब में देखा था"। ये सभी गीत अपने ज़माने के मशहूर नग़में रहे हैं और आज भी आए दिन रेडियो पर सुनने को मिल जाते हैं। इस फ़िल्म के बाद ऋषी दा और मुकेश जी का साथ कई बरसों के बाद हुआ। 1966 की फ़िल्म ’बीवी और मकान’ का निर्माण किया था गायक-संगीतकार हेमन्त कुमार ने। ज़ाहिर सी बात है कि फ़िल्म का संगीत उन्होंने स्वयम् ही तैयार किया तथा फ़िल्म के निर्देशन के लिए ऋषीकेश मुखर्जी को साइन किया और फ़िल्म में गीत लिखवाए नवोदित गीतकार गुलज़ार से। फ़िल्म में कुल ग्यारह गीत थे और फ़िल्म के चरित्रों को ध्यान में रखते हुए कई गायक-गायिकाओं ने फ़िल्म के गीत गाए। मुकेश की आवाज़ फ़िल्म के दो गीत में थी। पहला गीत है "अनहोनी बात थी हो गई है, बस मुझको मोहब्बत हो गई है", इसमें मुकेश के साथ तलत महमूद, मन्ना डे, हेमन्त कुमार और जोगिन्दर की आवाज़ें भी शामिल हैं। यह एक हास्य गीत है जिसमें मुकेश ने आशिष कुमार का प्लेबैक किया है और मन्ना डे ने महमूद का। औरत बने बिस्वजीत और बद्री प्रसाद का पार्श्वगायन किया जोगिन्दर और हेमन्त कुमार ने। मुकेश इसमें अपने पहले गीत "दिल जलता है तो जलने दो" की लाइन भी गाई। और दूसरा गीत भी एक हास्य गीत है "आ था जब जनम लिया था पी होके मर गई" जिसमें मुकेश, हेमन्त कुमार और मन्ना डे की आवाज़ें हैं। समय के साथ-साथ फ़िल्मों और फ़िल्म-संगीत की धाराएँ भी बदलीं और नई नई धाराएँ इसमें मिलती चली गईं। 60 के दशक के अन्तिम सालों में संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल तेज़ी से उपर चढ़ रहे थे। 1969 की ऋषीकेश मुखर्जी निर्देशित फ़िल्म ’सत्यकाम’ में एल.पी का संगीत था और फ़िल्म के तीनों गीत लिखे कैफ़ी आज़मी ने। दो गीत लता की एकल आवाज़ में और तीसरा गीत है मुकेश, किशोर कुमार और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में एक जीवन दर्शन आधारित ख़ुशमिज़ाज गीत जिसे बस में सवार दोस्तों की टोली गाता है। "ज़िन्दगी है क्या बोलो" गीत में धर्मेन्द्र का पार्श्वगायन किया है मुकेश ने जबकि किशोर कुमार बने असरानी की आवाज़। महेन्द्र कपूर ने अन्य कलाकारों का प्लेबैक दिया।

1971, ऋषि दा के करीअर का शायद सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म, ’आनन्द’। ऋषी दा द्वारा निर्मित व निर्देशित ’आनन्द’ ने इतिहास रचा तथा राजेश खन्ना व अमिताभ बच्चन के फ़िल्मी सफ़र के भी मील के पत्थर सिद्ध हुए। फ़िल्म के सभी चार गीत सदाबहार नग़में हैं; मुकेश के गाए दो गीत "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" (योगेश) और "मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने" (गुलज़ार) उनके गाए 70 के दशक की दो बेहद महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं। "कहीं दूर जब दिन ढल जाये, सांझ की दुल्हन बदन चुराये, चुपके से आये, मेरे ख़यालों के आंगन में कोई सपनों के दीप जलाये, दीप जलाये" - योगेश, सलिल चौधरी और मुकेश की तिकड़ी ने कई बार साथ में अच्छा काम किया है, पर शायद यह गीत इस तिकड़ी की सबसे लोकप्रिय रचना है। इस गीत से जुड़ा सबसे रोचक तथ्य यह है कि यह गीत इस सिचुएशन के लिए तो क्या बल्कि इस फ़िल्म तक के लिए नहीं लिखा गया था, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस गीत में फ़िल्म 'आनन्द' का पूरा सार छुपा हुआ है। इस गीत को गाने वाला आनन्द नाम का युवक यह जानता है कि मौत उसके घर के दरवाज़े पर दस्तक देने ही वाला है, आज नहीं तो बहुत जल्द, और दुनिया की कोई भी दवा उसे नहीं बचा सकती। फिर भी वो अपनी बची-खुची ज़िन्दगी का हर एक दिन, हर एक लम्हा पूरे जोश और उल्लास के साथ जीना चाहता है, और उसके आसपास के लोगों में भी ख़ुशियाँ लुटाना चाहता है। आनन्द अपनी प्रेमिका के जीवन से बाहर निकल जाता है क्योंकि वो नहीं चाहता कि उसकी मौत के बाद वो रोये। मौत के इतने नज़दीक होकर भी अपनों के प्रति प्यार लुटाना और आसपास के नये लोगों से उसकी दोस्ती को दर्शाता है "कहीं दूर जब दिन ढल जाये"। इस गीत के बोलों को पहली बार सुनते हुए समझ पाना बेहद मुश्किल है। हर एक पंक्ति, हर एक शब्द अपने आप में गहरा भाव छुपाये हुए है, और गीत को बार-बार सुनने पर ही इसके तह तक पहुँचा जा सकता है। यह गीत दरसल 1972 की फ़िल्म 'अन्नदाता' के लिए योगेश ने लिखा था। 'अन्नदाता' के निर्माता थे एल. बी. लछमन। 'अन्नदाता' के संगीतकार सलिल दा ही थे। एक दिन सलिल दा के यहाँ फ़िल्म 'अन्नदाता' के लिए इसी गीत की सिटिंग्‍ हो रही थी। एल. बी. लछमन, योगेश, सलिल चौधरी और मुकेश मौजूद थे। उसी दिन वहाँ फ़िल्म 'आनन्द' के लिए भी सिटिंग्‍ होनी थी। पहली सिटिंग्‍ चल ही रही थी कि 'आनन्द' की टीम आ पहुँची। निर्माता-निर्देशक ॠषिकेश मुखर्जी तो थे ही, साथ में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन भी। जैसे ही इन तीनों ने यह गीत सुना, गीत इन्हें पसन्द आ गई। ऋषी दा ने लछमन साहब का हाथ पकड़ कर कहा कि यह गीत आप मुझे दे दीजिए! लछमन जी तो चौंक गए कि ये यह क्या माँग रहे हैं। अपनी फ़िल्म के लिए बन रहा गीत किसी अन्य निर्माता तो वो कैसे दे देते? उन्होंने ऋषी दा को मना कर दिया और माफ़ी माँग ली। पर ऋषी दा और राजेश खन्ना आसानी से कहाँ छोड़ने वाले थे? वो अनुरोध करते रहे, करते ही रहे। ऋषी दा ने यह भी कहा कि इस गीत के बोल उनकी फ़िल्म 'आनन्द' के एक सिचुएशन के लिए बिल्कुल सटीक है। इतने अनुनय विनय को देख कर न चाहते हुए भी लछमन जी ने कहा कि पहले आप मुझे वह सिचुएशन समझाइये जिसके लिए आप इस गीत को लेना चाहते हैं, अगर मुझे ठीक लगा तो ही मैं यह गीत आपको दे दूँगा। ऋषी दा ने इतनी सुन्दरता से सिचुएशन को लछमन साहब की आँखों के सामने उतारा कि लछमन जी काबू हो गये और उन्होंने यह गीत ऋषी दा को दे दी यह कहते हुए कि वाकई यह गीत आप ही की फ़िल्म में होनी चाहिए। यह बहुत बड़ी बात थी। दो निर्माताओं के बीच में साधारणत: प्रतियोगिता रहती है, ऐसे में लछमन साहब का ऋषी दा को अपना इतना सुन्दर गीत दे देना वाकई उनका बड़प्पन था। गीत तो 'अन्नदाता' की झोली से निकल कर 'आनन्द' की झोली में आ गया, पर लछमन साहब ने भी योगेश और सलिल चौधरी के सामने यह शर्त रख दी कि बिल्कुल ऐसा ही एक ख़ूबसूरत गीत वो 'अन्न्दाता' के लिए भी दोबारा लिख दें। कुछ-कुछ इसी भाव को बरकरार रखते हुए योगेश ने फ़िल्म 'अन्नदाता' के लिए फिर से गीत लिखा - "नैन हमारे सांझ सकारे, देखें लाखों सपने, सच ये कहीं होंगे या नहीं, कोई जाने ना, कोई जाने ना, यहाँ"। इन दोनों गीतों के भावों का अगर तुलनात्मक विश्लेषण किया जाये तो दोनों में समानता महसूस की जा सकती है।


’आनन्द’ के बाद मुकेश और ऋषी दा का अगला साथ हुआ 1974 की फ़िल्म ’फिर कब मिलोगी’ में जिसमें संगीतकार थे राहुल देव बर्मन। इस फ़िल्म में मुकेश ने बस एक गीत गाया लता के साथ "कहीं करती होगी वो मेरा इन्तज़ार..."। यह फ़िल्म फ़्लॉप थी और फ़िल्म के अन्य गीत भी ख़ास नहीं चले, पर इस गीत को काफ़ी मक़बूलियत मिली और आगे चल कर इस गीत का गायिका अनामिका ने रीमिक्स वर्ज़न भी बनाया और यह रीमिक्स वर्ज़न भी हिट हुआ। 1975 में ऋषी दा ने ’चुपके चुपके’ फ़िल्म का निर्माण किया। इसमें उन्होंने संगीत का भार सचिन देव बर्मन को दिया। फ़िल्म के कुल चार गीतों में एक गीत मुकेश और लता की युगल स्वरों में था - "बाग़ों में कैसे ये फूल खिलते हैं" जो धर्मेन्द्र और शर्मिला टैगोर पर फ़िल्माया गया था। 1976 में अचानक मुकेश की मृत्यु हो जाने से ऋषीकेश मुखर्जी की आने वाली फ़िल्मों से उनके गीत ग़ायब हो गए। लेकिन एक गीत जो पहले रेकॉर्ड हो चुका था, उसे 1978 की फ़िल्म ’नौकरी’ में शामिल किया गया और फ़िल्म की नामावली में "लेट मुकेश" लिखा गया। फ़िल्म के नायक थे राजेश खन्ना जिनका प्लेबैक दिया किशोर कुमार ने जबकि राज कपूर का प्लेबैक दिया मुकेश ने, शायद आख़िरी बार के लिए। आश्चर्य की बात है कि इस अन्तिम गीत का मुखड़ा था "उपर जाकर याद आई नीचे की बातें, होठों पे आई दिल के पीछे की बातें"। गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे मुकेश उपर जा कर अपने अज़ीम दोस्त राज कपूर के लिए यह गीत गा रहे हैं, और परदे पर भी इसे राज कपूर ही अदा कर रहे हैं। इसी गीत के साथ मुकेश का साथ राज कपूर और ऋषीकेश मुखर्जी से ख़त्म होता है। कल 27 अगस्त, मुकेश और ऋषीकेश मुखर्जी की याद का दिन है, और यह दिन हमें याद दिलाती है उन तमाम गीतों की जो इन दोनों के संगम से उत्पन्न हुई थी। मुकेश और ऋषीकेश मुखर्जी को सलाम करती है ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Friday, August 25, 2017

गीत अतीत 27 || हर गीत की एक कहानी होती है || चढ़ता सूरज धीरे धीरे || मुज्तबा अज़ीज नाज़ा || अनु मालिक || मधुर भंडारकर || कैसर रत्नगिरि

Geet Ateet 27
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Chadhta Sooraj Dheere Dheere
Indu Sarkar
Mujtaba Aziz Naza
Also featuring Aziz Naza, Anu Malik & Kaiser Ratnagiri


"आप चाहे तो जिसे भी बेहतर समझे चुन लें पर इसे परदे पर मुझसे बेहतर कोई निभा नहीं सकता " -    मुज्तबा अजीज़ नाज़ा  

चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता है ढल जायेगा...दोस्तों शायद ही कोई संगीत प्रेमी होगा जिसने ये कल्ट क्लास्सिक क़वाल्ली इसके मूल गायक अजीज़ नाज़ा की आवाज़ में न सुनी होगी, अभी हाल ही में कैसर रत्नगिरि रचित इस यादगार क़वाल्ली दुबारा रीक्रेअट किया गया, अजीज़ नाज़ा के बेटे मुज्तबा अजीज़ नाज़ा द्वारा. फिल्म के संगीतकार अनु मालिक ने इस काम में उनका साथ दिया. सुनिए मुज्तबा भाई से आज इसी कवाल्ली के दुबारा बनने की कहानी, प्ले पर क्लीक करें और सुनें अपने दोस्त अपने साथी सजीव सारथी के साथ....



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

Monday, August 21, 2017

फिल्मी चक्र संजीव गोस्वामी के साथ || एपिसोड 03 || संजीव कुमार

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 03
Sanjeev Kumar

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के तीसरे एपिसोड में सुनिए कहानी संजीव कुमार की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....






फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -
किशोर कुमार
शैलेन्द्र 

Sunday, August 20, 2017

राग जयन्त मल्हार : SWARGOSHTHI – 331 : RAG JAYANT MALHAR





स्वरगोष्ठी – 331 में आज

पावस ऋतु के राग – 6 : राग जयन्त मल्हार

पण्डित विनायक राव पटवर्धन और आशा भोसले से राग जयन्त मल्हार की रचनाएँ सुनिए





विनायक राव  पटवर्धन
आशा भोसले
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की छठी कड़ी में हम मल्हार अंग के राग जयन्त मल्हार पर चर्चा करेंगे। यह राग जयजयवन्ती और मल्हार अंग के मेल से बनता है। वैसे राग जयजयवन्ती स्वतंत्र रूप से भी वर्षा ऋतु के परिवेश को रचने में समर्थ है। परन्तु जब राग जयजयवन्ती के साथ मल्हार अंग का मेल हो जाता है तब इस राग से अनुभूति और अधिक मुखर हो जाती है। आज हम आपको राग जयन्त मल्हार पर आधारित एक मोहक फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं। गायिका आशा भोसले की आवाज़ में यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है। इसके साथ ही राग जयन्त मल्हार का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक और शिक्षक पण्डित विनायक राव पटवर्धन के स्वर में एक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं।

राग जयन्त मल्हार : ‘मेहा बरसने लगा है आज...’ : आशा भोसले : फिल्म – शक
राग जयन्त मल्हार : ‘ऋतु आई सावन की...’ : पण्डित विनायक राव पटवर्धन




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 331वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्षा ऋतु में प्रचलित एक विशेष गायन शैली के लोकप्रिय गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह वर्षा-ऋतु में गायी जाने वाली कौन सी संगीत शैली है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुविख्यात गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 26 अगस्त, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 333वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 329वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1979 में प्रदर्शित फिल्म “मीरा” से राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – मीरा मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा / तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – वाणी जयराम

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में हमारी एक नई प्रतिभागी, लखनऊ से मीरा पन्त, भी विजेता हैं। हम उनका हार्दिक स्वागत करता हैं। पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” जारी है। इस श्रृंखला में ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया जा रहा है। आज की इस कड़ी में हमने आपके लिए राग जयन्त मल्हार पर चर्चा की। आगामी अंक में हम वर्षा ऋतु में गायी जाने वाली एक विशेष संगीत शैली पर चर्चा करेंगे और इस संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी जारी श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, August 19, 2017

चित्रकथा - 32: अभिनेता इन्दर कुमार को श्रद्धांजलि

अंक - 32

अभिनेता इन्दर कुमार को श्रद्धांजलि


"तुमको ना भूल पायेंगे.." 



इन्दर कुमार (26 अगस्त 1973 - 28 जुलाई 2017)




पिछले 28 जुलाई 2017 को अभिनेता इन्द्र कुमार की मात्र 43 वर्ष की आयु में असामयिक मृत्यु बेहद अफ़सोसजनक रही। इन्द्र कुमार उन अभिनेताओं में शामिल हैं जिन्होंने ना तो बहुत ज़्यादा फ़िल्में की और ना ही ज़्यादा कामयाब रहे, लेकिन जितना भी काम किया, अच्छा किया और उनके चाहने वालों ने उन गिने-चुने फ़िल्मों की वजह से उन्हें हमेशा याद किया। चोकोलेटी हीरो से लेकर खलनायक की भूमिका निभाने वाले इन्द्र कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी वह प्यारी मुस्कान, उनका सुन्दर चेहरा और शारीरिक गठन, और उनकी सहज अदाकारी उनाकी फ़िल्मों के ज़रिए सदा हमारे साथ रहेगी। आइए आज ’चित्रकथा’ के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित करें स्वर्गीय इन्द्र कुमार की पुण्य स्मृति को। आज का यह अंक उन्ही को समर्पित है।


कहते हैं कि एक इंसान मर सकता है पर कला और कलाकार कभी नहीं मरते। एक कलाकार अपनी कला से अमर हो जाता है। शरीर नश्वर है, लेकिन कला और कलाकृति की आभा युगों युगों तक रोशनी बिखेरती रहती है। मात्र 43 साल की उम्र में अभिनेता इन्दर कुमार इस फ़ानी दुनिया को छोड़ गए। पत्नी पल्लवी और मात्र तीन साल की नन्ही बेटी भावना को अकेला छोड़ इन्दर कुमार अपनी अनन्त यात्रा पर गत 28 जुलाई को निकल पड़े। अगले ही सप्ताह 26 अगस्त को इन्दर कुमार अपनी 44-वीं वर्षगांठ मनाने वाले थे, लेकिन किसे ख़बर थी कि काल के क्रूर हाथ इतनी जल्दी इस हँसमुख इंसान को इतनी दूर लेकर चला जाएगा। जयपुर के एक मारवाड़ी परिवार में जन्मे इन्दर कुमार सरफ़ की शिक्षा मुंबई के सेन्ट ज़ेवियर’स हाइ स्कूल और सरदार वल्लभ भाई पटेल विद्यालय में हुई। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद केवल 23 वर्ष की उम्र में उन्हें उनकी पहली फ़िल्म में बतौर हीरो अभिनय करने का सौभाग्य मिल गया। ऐसा सुनहरा मौक़ा बहुत कम नवोदित कलाकारों को मिल पाता है। इस दिशा में इन्दर के मेन्टर रहे फ़िल्म पब्लिसिस्ट राजू करिया जिनकी मदद से इन्दर को कई फ़िल्म निर्माताओं से मिलने का मौका मिला। 1996 में उन्हे उनका पहला ब्रेक मिला फ़िल्म ’मासूम’ में। आयेशा जुल्का के साथ उनकी यह फ़िल्म तो बॉक्स ऑफ़िस पर ज़्यादा टिक नहीं सकी, लेकिन फ़िल्म के गीतों, ख़ास तौर से उन्हीं पर फ़िल्माया "ये जो तेरी पायलों की छम छम है" और आदित्य नारायण का मशहूर "छोटा बच्चा जान के हमको आँख न दिखाना रे", की वजह से इस फ़िल्म को लोगों ने पसन्द किया। इसी साल इन्दर कुमार ने अक्षय कुमार, रेखा, रवीना टंडन अभिनीत फ़िल्म ’खिलाड़ियों का खिलाड़ी’ में अक्षय कुमार के बड़े भाई अजय का किरदार निभाया जो फ़िल्म की कहानी का एक महत्वपूर्ण चरित्र था। फिर इसके अगले ही साल 1997 में बतौर नायक उनकी दूसरी फ़िल्म आई ’एक था दिल एक थी धड़कन’, जो नाकामयाब रही। लेकिन फिर एक बार फ़िल्म के गीतों ने धूम मचाई। ख़ास तौर से "रेशम जैसी हैं राहें, खोले हैं बाहें" और "एक था दिल एक थी धड़कन" को काफ़ी समय तक रेडियो पर सुनाई देते रहे। फ़िल्में नाकामयाब होने के बावजूद एक चोकोलेटी हीरो के रूप में इन्दर कुमार की दर्शकों में और ख़ास कर युवा वर्ग में काफ़ी लोकप्रिय होने लगे थे। काउन्ट-डाउन शोज़ में ’मासूम’ और ’एक था दिल...’ के गीत चार्टबस्टर्स रहे। 1997 में ’घुंघट’ के भी वो नायक रहे लेकिन बदक़िस्मती से उनकी यह फ़िल्म भी नहीं चली। हाँ, फिर एक बार गाने ज़रूर चले। 1998 की फ़िल्म ’दंडनायक’ भी फ़्लॉप ही रही। नायक की भूमिका में एक के बाद एक तीन लगातार फ़िल्मों के फ़्लॉप हो जाने की वजह से इन्दर कुमार को एकल नायक वाली फ़िल्में मिलना बन्द हो गया, लेकिन चरित्र अभिनेता के किरदार मिलते रहे। 1999 में ’तिरछी टोपीवाले’ में उन्होंने चरित्र भूमिका निभाई।


वर्ष 2000 इन्दर कुमार के करीयर का सुनहरा वर्ष था। नायक के रूप में ना सही, लेकिन चरित्र भूमिकाओं में उन्हें कई बड़े कलाकारों के साथ स्क्रीन शेयर करने का मौका मिला। गोविन्दा अभिनीत ’कुंवारा’ और संजय दत्त अभिनीत ’बाग़ी’ तो थे ही, साथ ही एम. एफ़. हुसैन की चर्चित फ़िल्म ’गजगामिनी’ में कामदेव की भूमिका के लिए इन्दर कुमार को चुना गया। सुन्दर देव तुल्य मुखमंडल और सुदृढ़ शारीरिक गठन के धनी इन्दर कुमार ने कामदेव के इस चरित्र भूमिका को सुन्दर तरीके से निभाया। उनके इस रोल को देख कर ऐसा लगा जैसे पौराणिक चरित्रों, जैसे कि विष्णु, श्रीकृष्ण आदि, में वो ख़ूब जचेंगे। ख़ैर, वर्ष 2000 की इन्दर कुमार की सबसे बड़ी उपलब्धि रही सलमन ख़ान की बड़ी फ़िल्म ’कहीं प्यार ना हो जाए’ में राहुल का किरदार निभाना। एक अमीर घराने के बेटे राहुल का किरदार इन्दर ने इस क़दर निभाया कि ख़ुद सलमन ख़ान ही इन्दर के फ़ैन हो गए। इतना ही नहीं, सलमन ख़ान और इन्दर कुमार इस फ़िल्म से बहुत अच्छे दोस्त भी बन गए। केवल फ़िल्म मेकिंग् ही नहीं, बल्कि बॉडी बिल्डिंग् (शारीरिक गठन) भी एक ही ट्रेनर से करवाने लगे। सलमन ख़ान के पारिवारिक परिवेश के बारे में तो सभी जानते हैं। इन्दर कुमार का भी उनके परिवार में स्वागत हुआ और सलमन के साथ-साथ उनके परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ भी इन्दर काफ़ी घुल-मिल गए। एक समय में इन्दर और सलमन की दोस्ती-यारी इतनी गहरी हो चुकी थी कि सलमन ने अपनी अगले कई फ़िल्मों में इन्दर को अच्छे किरदार ऑफ़र किए। 2002 की फ़िल्म ’तुमको ना भूल पायेंगे’ के लिए सलमन ख़ान ने इन्दर कुमार को एक चोकोलेटी हीरो से बना दिया एक ख़ूँख़ार खलनायक। इस फ़िल्म की कहानी के अनुसार सलमन और इन्दर, दोनों को एक मज़बूत माँस पेशियों वाले शारीरिक गठन की आवश्यक्ता थी। इसलिए सलमन ख़ान ने ख़ुद बीड़ा उठाते हुए ख़ुद की और इन्दर की बॉडी-बिल्डिंग् का ज़िम्मा अपने सर लिया। फ़िल्म के क्लाइमैक्स सीन में दोनों की खुले बदन में मारपीट होती है। इस अकेले सीन के लिए कहा जाता है कि सलमन और इन्दर ने साथ में कड़ी मेहनत की थी अपने बदन को पर्फ़ेक्ट शेप देने के लिए। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यही सीन फ़िल्म का यादगार सीन बना। फ़िल्म तो ज़्यादा नहीं चली, लेकिन एक नए अवतार में इन्दर कुमार के अभिनय की काफ़ी चर्चा हुई। फ़िल्म के गाने सुपरहिट हुए। सलमन और इन्दर की दोस्ती और गहरी हुई।


2002 में इन्दर कुमार टेलीविज़न पर उतरे उस समय के सर्वाधिक लोकप्रिय धारावाहिक ’सास भी कभी बहू थी’ में मिहिर विरानी का रोल अदा किया कुछ समय तक। 2002 में ही इन्दर कुमार तीन और फ़िल्मों में नज़र आए - ’माँ तुझे सलाम’, ’हथियार’ और ’मसीहा’। इसी ’मसीहा’ फ़िल्म की शूटिंग् के दौरान इन्दर कुमार उस वक़्त हेलिकॉप्टर से नीचे गिर गए जब वो एक स्टन्ट सीन ख़ुद ही कर रहे थे बिना किसी डबल का सहारा लेते हुए। यह निर्णय उनके करीयर के लिए काफ़ी महंगा सौदा साबित हुआ। रीढ़ की हड्डी टूट जाने की वजह से वो पूरे पाँच सालों तक बिस्तर पर पड़े रहे। एक तरह से उनका करीयर ख़त्म हो गया। अस्वस्थता के दौरान ही इन्दर ने 2003 में अपने मेन्टर राजू करिया की बेटी सोनल से विवाह कर ली। दोनों के शारीरिक मिलन से सोनल गर्भवती तो हो गईं लेकिन दोनों का मानसिक मिलन नहीं हो पाया, और विवाह के केवल पाँच माअह के भीतर ही दोनों एक दूसरे से अलग हो गए। तलाक़ के बाद सोनल ने इन्दर की बेटी खुशी को जन्म दिया। 2004 तक इन्दर काफ़ी मुश्किलों से गुज़रे, शारीरिक अक्षमता तो थी ही, आर्थिक समस्या भी आन पड़ी और वो मानसिक अवसाद और ड्रग्स तक के शिकार होने लगे। दोस्त सलमन ख़ान और डॉली बिन्द्रा ने उनका हौसला बढ़ाने की कोशिशें की और उनकी मदद भी की। 2005 में इन्दर कुमार ने दोबारा ज़िन्दगी की तरफ़ मुड़ कर देखा बांग्ला फ़िल्म ’अग्निपथ’ से। यह फ़िल्म तो ख़ास चली नहीं, लेकिन इन्दर कुमार का फ़िल्मी सफ़र फिर एक बार शुरु हुआ जो उस हादसे की वजह से ठहर गया था। ज़िन्दगी और प्रेम की तरफ़ रुख़ करते हुए इन्दर कुमार की घनिष्ठता बढ़ी अभिनेत्री इशा कोपीकर से और दोनों एक लम्बे समय तक डेटिंग् करते रहे। इसी दौरान 2006 में उनकी अगली हिन्दी फ़िल्म आई ’आर्यन’ जिसमें उन्होंने सुनील शेट्टी के साथ अभिनय किया। वर्ष 2009 में इशा कोपीकर से उनका ब्रेक-अप होने के बाद उन्होंने कमलजीत कौर से शादी की लेकिन यह विवाह भी दो महीने से ज़्यादा टिक नहीं सकी। ख़ैर, 2009 में उनके पुराने दोस्त सलमन ख़ान ने उन्हे फिर एक बार मौका दिया अपनी बड़ी फ़िल्म ’वान्टेड’ में अभिनय का। इस फ़िल्म में इन्दर बने सलमन के दोस्त। फ़िल्म ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई लेकिन यह फ़िल्म इन्दर कुमार के करीयर को पुनर्जीवित करने में कुछ ख़ास कारगर साबित नहीं हुई। इसी वर्ष निर्मित फ़िल्म ’पेयिंग् गेस्ट्स’ में भी इन्दर कुमार नज़र आए एक ताज़े किरदार में, लेकिन उनके बाक़ी फ़िल्मों की ही तरह यह फ़िल्म भी एक असफल फ़िल्म रही। नतीजा, इन्दर कुमार हिन्दी फ़िल्म जगत से दूर होते गए। वर्ष 2010 में इन्दर कुमार ने फिर से प्रादेशिक फ़िल्मों में क़िस्मत आज़माने के लिए तेलुगू फ़िल्म ’यागम’ में अभिनय किया। 2011 में हिन्दी फ़िल्म ’ये दूरियाँ’ में आदित्य के किरदार में उनका अभिनय क़ाबिल-ए-तारीफ़ रहा, लेकिन फ़िल्मों का दौर बदल चुका था और इतने सारे नए चेहरे इस इंडस्ट्री में आ चुके थे कि इन्दर कुमार के अभिनय का जादू कुछ ख़ास चल नहीं पाया।

2011 के बाद इन्दर कुमार फ़िल्मों से जैसे ग़ायब ही हो गए। 2013 में उन्होंने तीसरी शादी की पल्लवी सरफ़ के साथ और 2014 में उनकी बेटी भावना का जन्म हुआ। इसी दौरान इन्दर कुमार ने टेलीविज़न शो ’फ़ीअर फ़ाइल्स’ में भी भाग लिया। टेलीविज़न में काम करते हुए इन्दर कुमार की मुलाक़ात एक नई संघर्षरत युवती से हुई जो मॉडलिंग् और अभिनय जगत में क़दम रखने के लिए इन्दर कुमार का सहारा चाहती थी। इस युवती ने इन्दर कुमार की पत्नी पल्लवी के ज़रिए इन्दर तक पहुँची। लेकिन उस युवती का इरादा कुछ और ही था। वह इन्दर को अपनी ओर शारीरिक रूप से आकर्षित करने में सफल हुई और इन्दर बहक गए। कुछ दिनों तक उस युवती के घर में रहने के बाद जब इन्दर कुमार का संभोग का नशा उतरा, तब उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हुआ और उस युवती को छोड़ वो अपने घर लौट गए। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बदला लेने के लिए युवती ने इन्दर कुमार के ख़िलाफ़ बलात्कार का मामला दर्ज कर दिया और 25 अप्रैल 2014 को इन्दर कुमार गिरफ़्तार हो गए। इन्दर कुमार ने यह स्वीकारा कि दोनों के बीच शारीरिक संबंध उस युवती की मर्ज़ी से ही हुआ और जब अदालत को यह मालूम हुआ कि उस युवती ने बलात्कार का झूठा केस दर्ज कराया है और उसके ख़िलाफ़ और भी एक केस चल रहा है, तब इन्दर कुमार को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया। लेकिन जो नुकसान होना था, वह हो चुका था। सामाजिक रूप से इन्दर कुमार शर्म की वजह से स्व-बहिष्कृत हो चुके थे। इंडस्ट्री के लोगों ने भी उनसे किनारा कर लिया और उन्हें काम मिलना बिल्कुल बन्द हो गया। यहाँ तक कि उनके चहेते यार सलमन ख़ान ने भी उन्हें अपनी फ़िल्मों में लेना उचित नहीं समझा। तीन साल तक कोई भी काम ना मिलने की वजह से इन्दर कुमार आर्थिक संकट से भी गुज़रे। 

दीये के बुझने से पहले उसकी लौ जगमगा उठती है, यह कहावत इन्दर कुमार के जीवन पर फ़िट बैठती है। इसी वर्ष, 2017 में उन्हें तीन फ़िल्मों में काम करने का मौका मिला। ये फ़िल्में हैं ’Who is the First Wife of My Father?', ’छोटी सी गुज़ारिश’ और ’फ़टी पड़ी है यार’। मौत एक ऐसी चीज़ है जिसका अंदेशा शायद आदमी को कई बार हो जाता है कि उसका अन्त क़रीब है। इन्दर कुमार के साथ भी शायद ऐसा ही हुआ था। पिछले तीन साल से वो अपनी पहली पत्नी से हुई उनकी बेटी खुशी से मिलने की कोशिशें कर रहे थे पर उन्हें सफलता नहीं मिली। जिस पत्नी को उन्होंने गर्भावस्था में ही छोड़ दिया, वो कैसे इतने सालों बाद अपनी बेटी को उनसे मिलने देती। इन्दर के लगातार प्रयासों के बावजूद वो अन्त तक अपनी बड़ी बेटी से मिल नहीं सके और क़िस्मत का मज़ाक देखिए कि जिस दिन इन्दर कुमार इस दुनिया को छोड गए, उसके अगले ही दिन खुशी की तेरहवीं सालगिरह थी। इन्दर चले गए केवल 43 वर्ष की आयु में। पारिवारिक, सामाजिक और कार्य-क्षेत्र में जिस मानसिक स्थिति से वो गुज़र रहे थे, उनके दिल-ओ-दिमाग़ पर अत्यधिक दबाव होना लाज़मी था। और इस दबाव की वजह से ही शायद उन्हें वह भयानक दिल का दौरा पड़ा और नींद में ही वो बहुत दूर निकल गए। सलमन ख़ान, माधुरी दीक्षित, वैजयन्तीमाला, करीना कपूर और मैडोना के फ़ैन इन्दर कुमार को भले फ़िल्म जगत में बहुत अधिक सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने जिस जिस फ़िल्म में भी अभिनय किया, उनके अभिनय पर कभी कोई प्रश्न-चिन्ह नहीं उठा। यह ज़रूरी नहीं कि हर कलाकार सुपरस्टार बन सके, लेकिन उस कलाकार की कला अमर रहती है। इन्दर कुमार भी हमारे दिलों पर राज करेंगे। उनकी मीठी मुस्कुराहट और सरल-सहज अभिनय हमेशा हमें सुकून देती रहेगी।




आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Friday, August 18, 2017

गीत अतीत 26 || हर गीत की एक कहानी होती है || तेरी ज़मीन || राग देश || रेवंत शेरगिल || तिन्ग्मंशु धुलिया

Geet Ateet 26
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
(Independence week special Episode)
Teri Zameen
Raag Desh
Revant Shergill
Also featuring Sidharth Pandit & Shriya Parikh 


"जब हम ये गीत लेकर तिन्ग्मंशु धुलिया सर के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा कि फिल्म तो पूरी हो चुकी है " -    रेवंत शेरगिल  

कदम कदम बढाए जा गीत के आस पास लिखा और स्वरबद्ध किया गया फिल्म "राग देश" का गीत 'तेरी ज़मीन' के बनने की कहानी लेकर आज हम आये है गीत अतीत पर, गायक गीतकार रेवंत शेरगिल के साथ. गायन में रेवंत का साथ दिया है है श्रिया पारीख ने और संगीतबद्ध किया है सिद्धार्थ पंडित ने. लीजिये सुनिए की कैसे अंतिम दौर में आकस्मिक रूप से ही ये गीत फिल्म का हिस्सा बन गया....प्ले पर क्लिक करें और सुनें अपने दोस्त अपने साथ सजीव सारथी के साथ आज का गीत अतीत.



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

Monday, August 14, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ - शैलेन्द्र


Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 02
Shailendra 

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के दूसरे एपिसोड में सुनिए कहानी शैलन्द्र की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....


Sunday, August 13, 2017

राग मीरा और रामदासी मल्हार : SWARGOSHTHI – 330 : RAG MIRA & RAMDASI MALHAR




स्वरगोष्ठी – 330 में आज

पावस ऋतु के राग – 5 : राग मीरा और रामदासी मल्हार

उस्ताद अमीर खाँ से रामदासी और वाणी जयराम से मीरा मल्हार की रचनाएँ सुनिए




उस्ताद अमीर  खाँ
वाणी जयराम
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में हम मल्हार अंग के दो रागों मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार और रामदासी मल्हार पर चर्चा करेंगे। कुछ राग अपने युग के महान संगीतज्ञों, कवियों के नाम पर प्रचलित है। ऐसे ही दो उल्लेखनीय राग है- भक्त कवयित्री मीराबाई द्वारा रचित राग मीरा मल्हार और संगीत-नायक रामदास द्वारा रचित राग रामदासी मल्हार। इन ऋतु प्रधान रागों में निबद्ध रचनाओं में पावस ऋतु के सजीव चित्रण का गुण तो होता ही है, श्रृंगार, विरह और भक्तिरस के भावों को सम्प्रेषित करने की क्षमता भी होती है। आज हम आपको सबसे पहले राग मीरा मल्हार के स्वरों में निबद्ध 1979 में प्रदर्शित फिल्म “मीरा” से गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में कवयित्री मीराबाई का ही एक पद प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग रामदासी मल्हार का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में एक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग मीरा मल्हार : ‘बादल देख डरी...’ : वाणी जयराम : संगीत – पं. रविशंकर : फिल्म – मीरा
राग रामदासी मल्हार : ‘छाए बदरा कारे कारे...’ : उस्ताद अमीर खाँ 



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 330वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1976 में प्रदर्शित एक हिन्दी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह मल्हार अंग का कौन सा राग है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 19 अगस्त, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 332वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 328वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1967 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ से राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – सूर मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में तीन में से दो प्रश्नों का सही उत्तर देकर लखनऊ की विनुषी कारीढाल ने पूरे दो अंक अर्जित किये हैं। पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” जारी है। इस श्रृंखला ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया जा रहा है। आज की इस कड़ी में हमने आपके लिए राग मीरा मल्हार और रामदासी मल्हार पर चर्चा की। आगामी अंक में हम मल्हार अंग के किसी और राग पर चर्चा करेंगे और इस राग में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी जारी श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


Saturday, August 12, 2017

चित्रकथा - 31: इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 4)

अंक - 31

इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 4)


"अपनी  प्रेम कहानी का तू हीरो है.." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



हर रोज़ देश के कोने कोने से न जाने कितने युवक युवतियाँ आँखों में सपने लिए माया नगरी मुंबई के रेल्वे स्टेशन पर उतरते हैं। फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर स्टार बनने का सपना लिए छोटे बड़े शहरों, कसबों और गाँवों से मुंबई की धरती पर क़दम रखते हैं। और फिर शुरु होता है संघर्ष। मेहनत, बुद्धि, प्रतिभा और क़िस्मत, इन सभी के सही मेल-जोल से इन लाखों युवक युवतियों में से कुछ गिने चुने लोग ही ग्लैमर की इस दुनिया में मुकाम बना पाते हैं। और कुछ फ़िल्मी घरानों से ताल्लुख रखते हैं जिनके लिए फ़िल्मों में क़दम रखना तो कुछ आसान होता है लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कुछ बात होती है। हर दशक की तरह वर्तमान दशक में भी ऐसे कई युवक फ़िल्मी दुनिया में क़दम जमाए हैं जिनमें से कुछ बेहद कामयाब हुए तो कुछ कामयाबी की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। कुल मिला कर फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है यहाँ टिके रहने के लिए। ’चित्रकथा’ में आज से हम शुरु कर रहे हैं इस दशक के नवोदित नायकों पर केन्द्रित एक लघु श्रॄंखला जिसमें हम बातें करेंगे वर्तमान दशक में अपना करीअर शुरु करने वाले शताधिक नायकों की। प्रस्तुत है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रॄंखला की चौथी कड़ी।



आदित्य रॉय कपूर और आदित्य सील
स दशक में फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने वाले नायकों की लम्बी फ़ेहरिस्त के चौथे भाग में आज हम बातें करेंगे कुछ ऐसे नवयुवकों की जिन्होंने अपने अभिनय और अपनी अलग अंदाज़ के ज़रिए बहुत ही कम समय में लोगों के दिलों पर छा गए हैं। शुरुआत करते हैं आदित्य नाम के दो नायकों से। आदित्य रॉय कपूर मुंबई में ही जन्में और फिर 10 वर्ष के लिए अमरीका चले गए थे। उनके दादा रघुअपत रॉय कपूर एक फ़िल्म निर्माता थे और आदित्य के बड़े भाई सिद्धार्थ रॉय कपूर UTV Motion Pictures के CEO हैं। आदित्य के मझले भाई कुणाल रॉय कपूर भी एक अभिनेता हैं। इस तरह से अभिनय और फ़िल्म का स्वाद आदित्य को घर में ही मिला। मुंबई विश्वविद्यालय के St. Xavier's College से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद आदित्य जो उन दिनों एक VJ की नौकरी कर रहे थे, उसी में वो ख़ुश थे और कभी सोचा भी ना था कि वो एक फ़िल्म हीरो बन जाएंगे। स्कूल के दिनों वो एक क्रिकेटर का बनने का सपना देखा करते थे। लेकिन जब ’लंदन ड्रीम्स’ फ़िल्म के वसीम ख़ान के किरदार की ऑडिशन के लिए उन्हें बुलाया गया और उसमें वो पास हो गए, उनकी जीवन धारा ही बदल गई। हालाँकि विपुल शाह की यह फ़िल्म सलमन ख़ान और अजय देवगन जैसे दिग्गजों के होते हुए भी ख़ास चली नहीं, लेकिन आदित्य का फ़िल्मी सफ़र शुरु हो चुका था। अगले ही साल वो विपुल शाह की ही एक और फ़िल्म ’ऐक्शन रिप्ले’ में नज़र आए अक्षय कुमार और ऐश्वर्या राय के साथ। यह फ़िल्म भी फ़्लॉप रही। फिर 2010 में संजय लीला भंसाली की फ़िल्म ’गुज़ारिश’ में हृतिक रोशन और ऐश्वर्या के साथ काम किया लेकिन दुर्भाग्यवश यह फ़िल्म भी पिट गई। एक नायक के रूप में आदित्य को पहला और बहुत बड़ा ब्रेक मिला 2013 की मोहित सुरी की फ़िल्म ’आशिक़ी 2’ में जिसमें उनके साथ नायिका बनीं श्रद्धा कपूर। इस फ़िल्म को भारी सफलता मिली और उस साल की शीर्ष की कामयाब फ़िल्मों में से रही। फिर इसके बाद आदित्य को पीछे मुड़ कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। 2013 में ही रणबीर कपूर - दीपिका पडुकोणे अभिनीत फ़िल्म ’ये जवानी है दीवानी’ में आदित्य के अभिनय को बहुत पसन्द किया गया जबकि फ़िल्म को मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ मिली थी। यहाँ तक कि आदित्य कि फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों के तहत ’बेस्ट सपोर्टिंग् ऐक्टर’ का नामांकन भी मिला था। इस फ़िल्म को भी व्यावसायिक तौर पर काफ़ी सफलता मिली। 2014 में आदित्या रॉय कपूर और परिनीति चोपड़ा की हबीब फ़ैसल की गुदगुदाने वाली फ़िल्म आई ’दावत-ए-इश्क़’। इस फ़िल्म को मध्यवर्गीय दर्शकों ने ख़ूब पसन्द किया लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर असफल रही। कटरीना कैफ़ के साथ उनकी फ़िल्म ’फ़ितूर’ भी फ़्लॉप रही, लेकिन उनके अभिनय क्षमता पर किसी ने भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया। और यही कारण है कि आदित्य को एक के बाद एक फ़िल्में मिलती चली जा रही हैं। 2016 की फ़िल्म ’डियर ज़िन्दगी’ में उनका अतिथि किरदार रहा, और 2017 के शुरु में एक बार फिर श्रद्धा कपूर के साथ उनकी फ़िल्म ’ओके जानु’ चर्चा में रही। 2016 में आदित्य ने वरुण धवन, सिद्धार्थ मल्होत्रा, आलिया भट्ट और परिनीति चोपड़ा के साथ मिल कर "Dream Team Bollywood" नामक म्युज़िक टूर पर गए और अमरीका के कई शहरों में परफ़ॉर्म किया। आने वाले समय में आदित्य रॉय कपूर से और भी बहुत सी अच्छी फ़िल्मों की उम्मीदें हैं। अब आते हैं दूसरे आदित्य पर। मॉडल और अभिनेता आदित्य सील ने फ़िल्मों में पदार्पण मात्र 14 वर्ष की आयु में ही कर लिया था। 2002 की वह ऐडल्ट फ़िल्म थी ’एक छोटी सी लव स्टोरी’ जिसमें वो मनीषा कोइराला के साथ नज़र आए। इतनी कम आयु में ऐसे बोल्ड किरदार निभाने की वजह से उस समय वो काफ़ी चर्चा में रहे। उनके अभिनय क्षमता की तारीफ़ें भी हुईं और सभी को यह समझ में आ गया था कि आने वाले समय में वो एक मंझे हुए अभिनेता बन कर उभरेंगे। 2006 में 18 वर्ष की आयु में वो फिर एक बार ’वी आर फ़्रेन्ड्स’ फ़िल्म में नज़र आए, लेकिन सही मायने में एक नायक के रूप में वो पहली बार नज़र आए 2014 की फ़िल्म ’पुरानी जीन्स’ में जिसमें उनके सह-कलाकार थे तनुज विरवानी और इज़ाबेल। जिस फ़िल्म ने उन्हें सबसे ज़्यादा कामयाबी दी, वह है 2016 की ’तुम बिन 2’। शेखर के किरदार को आदित्य ने इतना अच्छा निभाया कि समीक्षकों से उन्हें अच्छी प्रतिक्रियाएँ ही मिली जबकि फ़िल्म को निराशावादी प्रतिक्रियाएँ ही मिली। आदित्य एक विश्व ताएक्वोन्दो चैम्पियन हैं और उनकी आने वाली फ़िल्म है ’गल्ली बॉय’ जो 2018 में बन कर तैयार होगी। फ़िल्हाल यही कह सकते हैं कि आदित्य सील के हुनर का अभी तक सही मूल्यांकन नहीं हो पाया है। भविष्य में यही उम्मीद करेंगे कि उन्हें ऐसे किरदार निभाने को मिले जिनसे उनकी प्रतिभा का परिचय दर्शकों को मिल सके।


अली ज़फ़र और फ़वाद ख़ान
अब ज़िक्र दो पाक़िस्तान मूल के नायकों का। गायक और अभिनेता अली ज़फ़र का जन्म लाहौर में हुआ और उनके वालिद-वालिदा प्रोफ़ेसर थे। लाहौर से ही पढ़ाई पूरी करने के बाद अली ज़फ़र ने अपना करीयर बतौर स्केच आर्टिस्ट शुरु किया लाहौर के ’पर्ल कॉन्टिनेन्टल होटल’ में। साथ ही साथ वो टेलीविज़न धारावाहिकों में अभिनय भी करने लगे। ’कॉलेज जीन्स’, ’काँच के पार’ और ’लांदा बाज़ार’ जैसी पाक़िस्तानी धारावाहिकों में वो नज़र आए। 2003 से लेकर 2010 के दर्मियाँ अली ज़फ़र पाक़िस्तान में एक बेहद लोकप्रिय और सफ़ल गायक के रूप में उभरे और उनके ऐल्बम्स दुनिया भर में ख़ूब बिके और पसन्द किए गए। कई जाने माने म्युज़िक अवार्ड्स भी उन्हें मिले और पाक़िस्तान के सर्वाधिक लोकप्रिय गायक के रूप में वो स्थापित हुए। हिमेश रेशम्मिया और प्रीतम पर अली ज़फ़र के गीतों की धुनों को चुराने का आरोप भी लगा है। ख़ैर, 2010 में अली ज़फ़र ने बॉलीवूड में क़दम रखा, फ़िल्म थी अभिषेक शर्मा की ’तेरे बिन लादेन’। यह फ़िल्म ओसामा बिन लादेन पर कुछ हद तक आधारित होने की वजह से इसे पाक़िस्तान में बैन कर दिया गया। अली ज़फ़र ने इसमें एक पाक़िस्तानी रिपोर्टर का किरदार निभाया जो ओसामा का एक फ़ेक विडियो बनाता है अमरीका जाने के लिए। भारत में इस फ़िल्म को ज़बरदस्त कामयाबी मिली और अली ज़फ़र को भी इस फ़िल्म में अभिनय के लिए बहुत से पुरस्कार मिले। ’बेस्ट मेल डेब्यु’ का नामांकन उन्हें IIFA, Screen Awards, Zee Cine Awards और Filmfare Awards की तरफ़ से मिला। वो पहले पाक़िस्तानी अभिनेता हैं जिन्हें 2011 के इन्डियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में निमंत्रण मिला अपनी इस फ़िल्म के लिए। ’तेरे बिन लादेन’ की कामयाबी के चलते उन्हें भारत की कई और फ़िल्मों में अभिनय के मौक़े मिलते चले गए। ’लव का दि एन्ड’ में उनका अतिथि किरदार था जिसमें वो "फ़न फ़ना" गीत गाते नज़र आए। ’लव में ग़म’ फ़िल्म का शीर्षक गीत भी उन्होंने ही गाया था। तारा डी’सूज़ा की फ़िल्म ’मेरे ब्रदर की दुल्हन’ दो नायकों वाली फ़िल्म थी जिसमें अली ज़फ़र के साथ इमरान ख़ान नज़र आए। 2011 में प्रदर्शित यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर बहुत ज़्यादा हिट न रही हो लेकिन इसके गीतों की वजह से काफ़ी चर्चा में रही। इमरान और अली ज़फ़र का ट्युनिंग् भी कमाल का था इस फ़िल्म में। इस फ़िल्म में अभिनय के लिए अली ज़फ़र को ’बेस्ट न्यु टैलेन्ट - मेल’ का ’दादा साहब फाल्के’ अवार्ड मिला। स्टारडस्त अवार्ड्स के तहत ’सुपरस्टार फ़ॉर टुमोरो - मेल’ का ख़िताब भी उन्हें ही दिया गया। 2012 की फ़िल्म ’लंदन पैरिस न्युयॉर्क’ में उन्होंने न केवल अभिनय किया बल्कि फ़िल्म का संगीत भी उन्होंने ही तैयार किया। 2013 में ’चश्मे बद्दूर’, 2014 में ’टोटल सियापा’ और ’किल दिल’ तथा 2016 में ’तेरे बिन लादेन: डेड ऑर अलाइव’ और ’डियर ज़िन्दगी’ में अली ज़फ़र नज़र आए। आज अली ज़फ़र एक बहुत ही व्यस्त अभिनेता व गायक हैं। बॉलीवूड के अलावा वो पाक़िस्तान के फ़िल्मों और टेलीविज़न से भी जुड़े हैं तथा दुनिया भर में उनके गीतों के शोज़ होते रहते हैं। अली ज़फ़र की ही तरह एक और पाक़िस्तान मूल के गायक-अभिनेता हैं फ़वाद ख़ान। फ़वाद का जन्म कराची में हुआ और शुरुआती उम्र में ऐथेन्स, दुबई, रियाध, मैनचेस्टर होते हुए 13 वर्ष की आयु में लाहौर आकर सेटल हुए। 20 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते फ़वाद ने गीटार, बेस और ड्रम्स में महारथ हासिल कर ली थी और ’एन्टाइटी पैराडिम’ नामक बैन्ड के लीड विकलिस्ट भी बने। लाहौर से कम्प्युटर साइन्स में इंजिनीयरिंग् की डिग्री प्राप्त की लेकिन उनका मन संगीत की तरफ़ की रहता था। 1994 से 2012 तक बैन्ड में गाने-बजाने का सिलसिला चलता रहा और उन्हें इसमें सफलता भी मिली। लेकिन अभिनय के क्षेत्र में अपनी क़िस्मत को आज़माने के लिए फ़वाद जुड़े पाक़िस्तानी टेलीविज़न से और 2007 की पाक़िस्तानी फ़िल्म ’ख़ुदा के लिए’ में अभिनय भी किया। इसके बाद पाक़िस्तानी फ़िल्मों और धारावाहिकों में वो छाए रहे। कहा जाता है कि उनकी पहली पाकिस्तानी फ़िल्म ’ख़ुदा के लिए’ के बाद 2008 में उन्हें बॉलीवूड से न्योता मिला था, लेकिन उन दिनों भारत-पाक़िस्तान के बीच तनाव के मद्देनज़र यह संभव नहीं हो सका। फ़वाद ख़ान का बॉलीवूड में पाँव पड़े 2014 में जब शशांक घोष की कॉमेडी-ड्रामा फ़िल्म ’ख़ूबसूरत’ में उन्हें सोनम कपूर का नायक बनने का अवसर मिला। बॉक्स ऑफ़िस की परिभाषा में यह फ़िल्म हिट रही और फ़वाद के अभिनय की भी ख़ूब चर्चा हुई। 2016 की फ़िल्म ’कपूर ऐण्ड सन्स’ में फ़वाद ने एक समलैंगिक बेटे और बड़े भाई का किरदार अदा किया। ॠषी कपूर, रजत कपूर, रत्ना पाठक शाह, सिद्धार्थ मल्होत्रा और आलिया भट्ट जैसे कलाकारों के बीच भी फ़वाद अपनी अलग छाप बनाने में कामयाब रहे। 2016 में ही करण जोहर की फ़िल्म ’ऐ दिल है मुश्किल’ में फ़वाद का छोटा सा रोल था लेकिन उन्हीं दिनों उरि में आतंकवादी हमले के चलते सभी पाक़िस्तानी कलाकारों का बहिष्कार कर दिया गया। 


अमित साध और अरुणोदय सिंह
1983 में जन्में अमित साध टेलीविज़न का एक जानामाना नाम रहे हैं। फ़िल्मों में भले अमित साध ने इस दशक में क़दम रखे हों, टेलीविज़न में वो 2002 में ही आ गए थे। बारहवीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी अभिनय जगत में दाख़िल होने के लिए। ’क्यों होता है प्यार’ धारावाहिक से उनका अभिनय सफ़र शुरु हुआ था। इसमें आदित्य भारगव की भूमिका में वो काफ़ी लोकप्रिय हुए। नीना गुप्ता प्रोडक्शन्स की इस धारावाहिक ने उन्हें बहुत कम समय में घर घर तक पहुँचा दिया था। फिर इसके बाद 2004 में ’गन्स ऐन्ड रोज़ेस’ नामक शो में वो दिखे। इसी धारावाहिक की शूटिंग् के दौरान उनकी मुलाक़ात नीरु बजवा से हुई और आगे चल कर दोनों ने शादी कर ली। 2005 में ’कोहिनूर’ धारावाहिक में करण सक्सेना के किरदार में भी वो बख़ूबी ढल गए। रियल्टी शोज़ का दौर शुरु हो चुका था। अमित साध ने भी इस क्षेत्र में अपनी क़िस्मत आज़मानी चाही। 2005 के ’नच बलिये’ में उन्होंने भाग लिया। लोकप्रिय शो होने की वजह से वो चर्चा में रहे और अगले ही साल ’बिग बॉस 1’ में भाग लेने के लिए उन्हे निमंत्रण मिला। इन दोनों प्रतियोगिताओं में अमित विजेता तो नहीं बन पाए लेकिन वो छोटे परदे पर छाए ज़रूर रहे। 2007 में ’Fear Factor: ख़तरों के खिलाड़ी’ में भी उन्होंने भाग लिया था। नया दशक उनकी ज़िन्दगी में कई बदलाव लेकर आया। जहाँ एक तरफ़ पत्नी नीरु बजवा से उनका रिश्ता टूट गया, दूसरी तरफ़ उन्हें छोटे परदे से बड़े परदे पर उतरने का मौका मिल गया। फ़िल्म थी 2010 की हॉरर फ़िल्म ’फूंक 2’। रॉनी के किरदार में उन्होंने हॉरर फ़िल्म के लिए जिस तरह का अभिनय चाहिए, वैसा ही अभिनय किया। 2012 में ’मैक्सिमम’ फ़िल्म वो नज़र आए लेकिन यह फ़िल्म नहीं चली। 2013 की मशहूर फ़िल्म ’काइ पो चे’ में ओमी शास्त्री की भूमिका में अमित साध ने अच्छा अभिनय किया जो अब तक लोगों को याद है। 2015 में ’गुड्डु रंगीला’ में अमित गुड्डू के रोल में और अरशद वारसी रंगीला के रोल में नज़र आए और दर्शकों को ख़ूब गुदगुदाया। 2016 की सलमन ख़ान की फ़िल्म ’सुल्तान’ में अमित साध एक बिज़नेसमैन अक्षय ओबेरोय के रोल में नज़र आए थे। ’अकीरा’ और ’रनिंग् शादी’ जैसी फ़िल्मों के बाद अमित एक बार फिर 2017 की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म ’सरकार 3' में नज़र आए शिवाजी नागरे की भूमिका में। 2018 में ’गोल्ड’ में वो अक्षय कुमार और कुणाल कपूर के साथ नज़र आएंगे। अमित साध की तरह 1983 में एक और अभिनेता का जन्म हुआ था। मध्य प्रदेश में जन्मे अरुणोदय सिंह मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पोते हैं। कोडाइकनाल के बोर्डिंग् स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद अरुणोदय ने अपनी उच्च शिक्षा Brandeis University से हासिल की। स्कूल के दिनों में वो नाटकों में भाग लिया करते थे और वहीं से उनमें अभिनय की रुचि उत्पन्न हुई थी। एक साक्षात्कार में अरुणोदय ने बताया था कि एक अभिनेता बनने की ख़्वाहिश उनमें अभिनेता मारलन ब्रैन्डो की 1954 की फ़िल्म ’On the Waterfront’ को देखने के बाद जागी। स्नातक की पढ़ाई पूरी कर अरुणोदय New York Film Academy में अभिनय के कुछ कोर्सेस किए और न्यु यॉर्क के ही Acting Studio में भर्ती हो गए। और उस दौरान वहाँ के कई नाटकों में अभिनय किया। इन तमाम कोर्सेस के पूरे होते ही वो भारत लौट आए और जगह जगह ऑडिशन्स देने लगे। और उनकी मेहनत रंग लाई सन् 2009 में जब फ़िल्म ’सिकन्दर’ में उनका चुनाव हो गया। पीयुष झा निर्देशित इस फ़िल्म में अरुणोदय को एक कश्मीरी स्वाधीनता सेनानी का किरदार निभाने का मौका मिला। इस किरदार को उन्होंने बहुत ख़ूब निभाया और उनके अभिनय की चर्चा भी हुई। उनकी दूसरी फ़िल्म थी अनिल कपूर की फ़िल्म ’आइशा’ जिसमें अरुणोदय ने सोनम कपूर के साथ अभिनय किया। यह फ़िल्म जेन ऑस्टेन की उपन्यास ’एमा’ पर आधारित थी। 2010 की इस फ़िल्म के बाद इसी साल अरुणोदय विनय शुक्ला की फ़िल्म ’मिर्च’ में भी नज़र आए जो एक लिंग और लैंगिकता विषय की फ़िल्म थी। इस फ़िल्म में उन्होंने एक संघर्षरत फ़िल्म निर्देशक की भूमिका निभाई। 2011 की फ़िल्म ’ये साली ज़िन्दगी’ में उन्होंने ऐसा अभिनय किया कि उस वर्ष के स्क्रीन अवार्ड्स में श्रेष्ठ सह-अभिनेता के पुरस्कार के लिए उनका नाम नामांकित हुआ। 2012 में सनी लीयोन और रणदीप हूडा की सेक्स फ़िल्म ’जिस्म 2’ में अरुणोदय सह-नायक की भूमिका में नज़र आए। 2013 का वर्ष उनके लिए अच्छा नहीं रहा और उनकी एकमात्र फ़िल्म ’एक बुरा आदमी’ के बुरे सपने ही की तरह आया और गुज़र गया। 2014 में अरुणोदय की तीन फ़िल्में आईं। हास्य फ़िल्म ’मैं तेरा हीरो’ में अंगद नेगी की भूमिका में उन्होंने मज़ेदार अभिनय किया और डेविड धवन की इस फ़िल्म में वरुण धवन के साथ-साथ उन्होंने भी दशकों को ख़ूब हँसाया। इसी साल सुपरनैचरल थ्रिलर फ़िल्म ’पिज़्ज़ा’ में मिस्टर घोस्ट की भूमिका में उन्होंने क्या ख़ूब अभिनय किया। हर फ़िल्म में अलग तरह का किरदार निभाते चले आए हैं अरुणोदय सिंह। 2014 में ही एक और फ़िल्म ’उंगली’ में वो नज़र आए जिसमें इमरान हाशमी और रणदीप हूडा भे रहे। 2015 में ’मिस्टर एक्स’ अरुणोदय ने ACP भारद्वाज का रोल निभाया। 2016 में भी दो फ़िल्मों में वो नज़र आए - ’बुड्ढा इन ए ट्रैफ़िक जैम’ और ’मोहेन्जो दारो’। ’मोहेन्जो दारो’ जैसी पीरियड फ़िल्म में महम के बेटे मूंजा के किरदार में बड़ा ही प्राकृतिक अभिनय किया अरुणोदय ने। 2017 में अब तक किसी हिन्दी फ़िल्म में अरुणोदय नज़र तो नहीं आए, लेकिन एक अंग्रेज़ी और एक मलयालम फ़िल्म में उन्होंने अभिनय किया है। अंग्रेज़ी फ़िल्म ’Viceroy's House' अरुणोदय सिंह के करीयर की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म है जिसकी कहानी देश के बटवारे के बाद 1947 के वायसरॉय हाउस के अन्दर की कहानी है। 1971 के ’बांग्लादेश वार’ की पृष्ठभूमि पर बनी मलयालम फ़िल्म ’1971: Beyond Borders' में भी अभिनय करने का मौका उन्हें मिला है। इस तरह के फ़िल्मों में मौका मिलना इसी बात की ओर संकेत करता है कि अरुणोदय की अभिनय क्षमता वर्सेटाइल है और हर तरह के किरदार में वो खरे उतरते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आने वाले समय में अरुणोदय सिंह के और भी बहुत सी यादगार फ़िल्में आने वाली हैं।


कार्तिक आर्यन और शशांक अरोड़ा
नई दिल्ली में जन्में शशांक अरोड़ा सिर्फ़ एक अभिनेता ही नहीं बल्कि एक लेखक और म्युज़िशियन भी हैं। फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कारों में बेस्ट डेब्यु के लिए नामांकित शशांक उन गिने चुने भारतीय अभिनेताओं में से हैं जिनकी फ़िल्में कान और संडैन्स जैसे फ़िल्म उत्सवों में शिरकत की हैं। बचपन से ही संगीत और थिएटर में आग्रही शशांक हाइ स्कूल की पढ़ाई पूरी कर मोन्ट्रिएल कनाडा चले गए थे सिनेमा और संगीत की पढ़ाई के लिए। 2008 में वो भारत लौटे और मुंबई में फिर से दो वर्ष के लिए अभिनय सीखा। 2012 में वो पहली बार बड़े परदे पर नज़र आए बतौर सह-अभिनेता, फ़िल्म थी ’म्योहो’। फिर 2015 में फ़िल्म ’तितली’ में मुख्य किरदार निभाया और इस फ़िल्म को उस वर्ष के कान फ़िल्म उत्सव में भारत की आधिकारिक स्वीकृति मिली। 2016-17 में शशांक के अभिनय से सजी कई फ़िल्में आईं जैसे कि ’दि सॉंग् ऑफ़ स्कॉरपियोन्स’, ’रॉक ऑन 2’, ’ब्राह्मण नमन’, ’लिप्स्टिक अंडर माइ बुरखा’, ’मन्टो’, ’ज़ू’, ’मूथोन’ और ’अंडरवाटर’। शशांक एक सच्चे कलाकार हैं और इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाले समय में वो अपने चाहने वालों के लिए क्वालिटी सिनेमा लेकर आएँगे। डॉक्टरों के परिवार से ताल्लुख़ रखने वाले कार्तिक आर्यन के लिए अभिनेता बनना आसान नहीं था। वो कभी अपने डॉक्टर माता-पिता से यह नहीं कह सके कि उन्हें एक ऐक्टर बनना है। और ग्वालियर जैसे शहर में रह कर मुंबई में फ़िल्मस्टार बनने का सपना देखना भी ग़लत है, ऐसा कार्तिक ने बताया एक साक्षात्कार में। उपर से अभिनय का कोई अनुभव नहीं था उन्हें। अपने माँ-बाप को यह कह कर कि वो मुंबई उच्चशिक्षा के लिए जा रहे हैं, कार्तिक ग्वालियर से मुंबई आ गए। एन्ट्रैन्स परीक्षा में 23-वाँ स्थान प्राप्त कर DY Patil College में बायोटेक्नोलोजी लेकर पढ़ाई करने लगे। साथ ही साथ ग्लैमर वर्ल्ड की ख़बर रखने लगे। और जब एक बार फ़िल्म ’प्यार का पंचनामा’ के लिए फ़ेसबूक पर ऐड देखा तो उन्होंने ऐप्लाई किया और ऑडिशन के लिए पहुँच गए। इस तरह से कार्तिक आर्यन ने 2011 की हास्य फ़िल्म ’प्यार का पंचनामा’ से अपना फ़िल्मी सफ़र शुरु किया। उनके द्वारा एक शॉट में पाँच मिनट के संवाद को फ़िल्म इतिहास का सबसे लंबा शॉट माना जाता है। यह फ़िल्म हिट हुई और कार्तिक के अभिनय को भी सराहना मिली। 2013 में वो नज़र आए ’आकाशवाणी’ में और 2014 में सुभाष घई की फ़िल्म ’कांची’ में वो नायक बने। फ़िल्म नहीं चली, लेकिन अगले ही साल ’प्यार का पंचनामा 2’ फिर एक बार चल पड़ा और इस फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठा हास्य अभिनेता का स्टारडस्ट पुरस्कार भी मिला। इस फ़िल्म में उन्होंने आठ मिनट का एक शॉट दिया था और अपने ही रेकॉर्ड को उन्होंने तोड़ा। आजकल कार्तिक ’गेस्ट इन लंदन’ फ़िल्म की शूटिंग् कर रहे हैं।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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