रविवार, 28 मई 2017

राग खमाज : SWARGOSHTHI – 319 : RAG KHAMAJ




स्वरगोष्ठी – 319 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 5 : राग खमाज का रंग

राग खमाज में उस्ताद उस्ताद निसार हुसैन खाँ से खयाल और मुहम्मद रफी से गीत सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की पाँचवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में आज हमने 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘आरती’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग खमाज के स्वरों में पिरोया है। यह गीत मुहम्मद रफी की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही इसी राग में निबद्ध एक खयाल सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद निसार हुसैन खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



मुहम्मद रफी
ठे दशक के अन्तिम वर्षों में रोशन के संगीत में उत्कृष्टता के साथ-साथ लोकप्रियता का गुण भी आ चुका था। दशक के अन्त तक रोशन का संगीत वास्तव में सफलता की ओर अग्रसर हो चला था। पिछले अंक में प्रस्तुत किया गया फिल्म ‘बाबर’ का गीत और फिल्म के अन्य गीत रोशन के संगीत की उत्कृष्टता के उदाहरण थे। 1960 में बनी फिल्म ‘बरसात की रात’ का संगीत व्यावसायिक दृष्टि से रोशन का सफलतम संगीत माना जाएगा। फिल्म ‘बरसात की रात’ में कव्वालियों की धूम थी। इस फिल्म की कव्वाली –“ना तो कारवाँ की तलाश है...” और –“ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़...” भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास की सर्वश्रेष्ठ और लोकप्रिय कव्वालियों में से एक है। इस ऐतिहासिक कव्वाली की रिकार्डिंग 29 घण्टे में पूरी हुई थी। इसी फिल्म में रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों की चाशनी में डूबे गीत –“गरजत बरसत सावन आयो री...” को भी शामिल किया था। इस गीत की संगीत रचना की कहानी भी अत्यन्त रोचक है। दरअसल यह गीत राग गौड़ मल्हार की एक पारम्परिक बन्दिश पर आधारित है, जिसके बोल हैं –“गरजत बरसात भीजत आई लो...”। रोशन ने थोड़े शाब्दिक हेर-फेर के साथ इस बन्दिश को इस्तेमाल किया था। मजे की बात यह है कि रोशन ने इस बन्दिश और संगीत रचना का प्रयोग लगभग एक दशक पहले 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘मल्हार’ में कर चुके थे, किन्तु तब फिल्म न चलने के कारण गीत भी अनसुना रह गया था। एक दशक बाद फिर गीतकार साहिर लुधियानवी द्वारा थोड़े शब्दों के फेरबदल से फिल्म ‘बरसात की रात’ का यह गीत रोशन का सदाबहार गीत बन गया। फिल्म ‘बरसात की रात’ के बाद के दौर में फिल्म संगीत समीक्षकों की दृष्टि में रोशन गीतों की लोकप्रियता की ओर अधिक ध्यान देने लगे थे। इस दौर के गीतों में लोकप्रियता के साथ-साथ माधुर्य भी बरकरार था। राग आधारित मधुर गीतों और लोकप्रियता की कसौटी पर समान रूप से खरे उतरे संगीत से सजी 1962 में फिल्म ‘आरती’ प्रदर्शित हुई था। इस फिल्म के गीतों में रागों का मजबूत आधार था। फिल्म के गीतों में राग खमाज और पहाड़ी का स्पर्श किया गया है। लता मंगेशकर की आवाज़ में राग पहाड़ी की छाया लिये गीत –“कभी तो मिलेगी, कहीं तो मिलेगी, बहारों की मंज़िल राही...” फिल्म का बेहद लोकप्रिय गीत है। फिल्म में आशा भोसले और मुहम्मद रफी की आवाज़ में एक कव्वाली –“वो तीर दिल पे चला...” भी शामिल थी। राग खमाज के स्वरों का स्पर्श करते दो गीत मधुरता और लोकप्रियता की कसौटी खरे उतरते हैं। लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी के स्वरों में युगलगीत -"बार बार तोहें क्या समझाएँ पायल की झंकार...” और मुहम्मद रफी की एकल आवाज़ में –“अब क्या मिसाल दूँ मैं तुम्हारे शबाब की...” में राग खमाज का मधुर स्पर्श था। आज हमने आपके लिए राग खमाज पर आधारित, मुहम्मद रफी का गाया और मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा गीत –“अब क्या मिसाल दूँ मैं तुम्हारे शबाब की...” चुना है। अब आप रोशन की इस मनमोहक रचना का रसास्वादन कीजिए।

राग खमाज : “अब क्या मिसाल दूँ मैं तुम्हारे शबाब की...” : मुहम्मद रफी : फिल्म – आरती



उस्ताद निसार हुसैन खाँ  (दाहिने)
आज का राग खमाज इसी नाम से प्रचलित खमाज थाट से सम्बन्धित माना जाता है। खमाज थाट के स्वर होते हैं- सा, रे ग, म, प ध, नि॒(कोमल)। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग ‘खमाज’ कहलाता है। ‘खमाज’ राग में थाट के अनुकूल निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध नि सां और अवरोह में सां, नि(कोमल), ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है।

राग खमाज का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हमने रामपुर सहसवान घराने के प्रमुख स्तम्भ उस्ताद निसार हुसेन खाँ (1909-1993) द्वारा प्रस्तुत एक दुर्लभ बन्दिश का चुनाव किया है। राग खमाज की यह अनमोल रचना 1929 में रिकार्ड की गई थी। उस्ताद निसार हुसेन खाँ को अपने पिता और गुरु उस्ताद फिदा हुसेन खाँ से संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। बहुत छोटी आयु में उन्हें बड़ौदा के महाराज सयाजी राव गायकवाड़ के दरबारी संगीतज्ञ होने का गौरव प्राप्त हुआ था। आगे चलकर खाँ साहब ‘आकाशवाणी’ से भी जुड़े। 1977 में आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी, कोलकाता में प्रधान गुरु नियुक्त किया गया। यहाँ रह कर उन्होने उस्ताद राशिद खाँ सहित अनेक योग्य शिष्यो को तैयार किया। भारत सरकार द्वारा 1970 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ सम्मान से विभूषित किया गया। इसके अलावा खाँ साहब को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान सहित गन्धर्व महाविद्यालय से डाक्टरेट की उपाधि से भी नवाजा गाय था। आइए गायकी के इस शिखर-पुरुष की आवाज़ में सुनते हैं, राग खमाज की यह बन्दिश। आप इस बन्दिश का रसास्वादन कीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग खमाज : ‘कोयलिया कूक सुनावे...’ : उस्ताद निसार हुसेन खाँ




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 319वें अंक की पहेली में आज हम आपको वर्ष 1962 में प्रदशित एक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत के इस अंश में आपको किस राग का आधार परिलक्षित हो रहा है?

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

3 – यह किस मशहूर पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 3 जून, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 321वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 317वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बाबर’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – कल्याण अथवा यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – सुधा मल्होत्रा

इस अंक की पहेली में हमारे चार नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस पाँचवें अंक में हमने आपके लिए राग खमाज पर आधारित फिल्म ‘आरती’ से रोशन के एक गीत और इस राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक परम्परागत उदाहरण उस्ताद निसार हुसैन खाँ के स्वरों में प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 27 मई 2017

चित्रकथा - 20: रीमा लागू की शुरुआती फ़िल्मी भूमिकाएँ

अंक - 20

रीमा लागू को श्रद्धांजलि

रीमा लागू की शुरुआती फ़िल्मी भूमिकाएँ 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


18 मई 2017 को सुप्रसिद्ध अभिनेत्री रीमा लागू का मात्र 59 वर्ष की आयु में निधन हो गया। इतनी जल्दी उनके दुनिया-ए-फ़ानी से चले जाने से अभिनय जगत को जो क्षति पहुँची है उसकी भरपाई हो पाना असंभव है। 35 सालों से उपर के अभिनय सफ़र में रीमा जी ने दर्शकों के दिलों पर राज किया; कभी गुदगुदाया, कभी रुलाया, और कभी अपने अभिनय से हमें भाव-विभोर कर दिया। आइए आज ’चित्रकथा’ में नज़र डालें उनके शुरुआती सालों की फ़िल्मों पर। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है स्वर्गीया रीमा लागू की पुण्य स्मृति को!



रीमा लागू (21 जून 1958 - 18 मई 2017)


ऑन-स्क्रीन माँ के किरदार में फ़िल्म इतिहास में बहुत सी अभिनेत्रियों ने बुलंदी हासिल किए हैं जिनमें वो नाम जो सबसे पहले याद आते हैं, वो हैं निरुपा रॉय, कामिनी कौशल, सुलोचना, दुर्गा खोटे, अचला सचदेव, और बाद के वर्षों में नज़र आने वाली अभिनेत्रियों में एक प्रमुख नाम रीमा लागू का है। ’क़यामत से क़यामत तक’, ’मैंने प्यार किया’, ’आशिक़ी’, ’हिना’, ’साजन’, ’हम आपके हैं कौन’, ’जुड़वा’, ’येस बॉस’, ’कुछ कुछ होता है’, ’हम साथ-साथ हैं’, ’वास्तव’, ’मैं प्रेम की दीवानी हूँ’, ’कल हो न हो’, ’रंगीला’ जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्मों में माँ की सफल भूमिका निभा कर रीमा लागू दर्शकों के दिलों में एक अपना अलग ही मुकाम बना चुकी थीं। उनके परदे पर आते ही जैसे एक रौनक सी छा जाती। उन्होंने फ़िल्मी माँ के किरदार को एक दुखियारी औरत से बाहर निकाल कर एक ग्लैमरस महिला में परिवर्तित किया। लेकिन आज भले उन्हें हम उनकी माँ की भूमिका वाली फ़िल्मों के लिए याद करते हैं, हक़ीकत यह है कि 1988 में ’क़यामत से क़यामत तक’ के आने से पहले उन्होंने कई फ़िल्मों में कई तरह के चरित्र निभाए जिनकी तरफ़ हमारा ध्यान यकायक नहीं जाता।

21 जून 1958 को जन्मीं रीमा लागू का असली नाम नयन भडभडे था। उनकी माँ मन्दाकिनी भडभडे मराठी स्टेज ऐक्ट्रेस थीं और उन्हीं से शायद अभिनय की बीज नयन में भी अंकुरित हुई। उनके अभिनय क्षमता से उनका स्कूल वाक़िफ़ था। माध्यमिक स्तर की पढ़ाई पूरी करते ही वो पेशेवर तौर पर अभिनय करना शुरु किया। विवेक लागू से विवाह के पश्चात् नयन भडभडे बन गईं रीमा लागू। 1979 से लेकर 1988 तक वो यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया में नौकरी भी की और साथ ही साथ टेलीविज़न और फ़िल्मों में अभिनय भी जारी रखा। 1988 के बाद उनका फ़िल्मी सफ़र तेज़ हो जाने की वजह से उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इन्हीं दस वर्षों यानी कि 1979 से 1988 के बीच उन्होंने कई फ़िल्मों में तरह तरह के किरदार निभाए। रीमा लागू का फ़िल्मी सफ़र शुरु हुआ 1979 की मराठी फ़िल्म ’सिंहासन’ से जिसमें नीलू फुले, श्रीराम लागू, नाना पाटेकर, और मोहन अगाशे जैसे दिग्गज कलाकार थे। हिन्दी फ़िल्मों में रीमा लागू प्रथम नज़र आईं 1980 की फ़िल्म ’आक्रोश’ में। इस फ़िल्म में उन्होंने एक नौटंकी नर्तकी का किरदार निभाया था। गोविंद निहलानी निर्देशित इस कलात्मक फ़िल्म को उस वर्ष के बहुत से फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिले। नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल और अमरीश पुरी जैसे दिग्गज कलाकारों की इस फ़िल्म में नवोदित रीमा लागू का छोटा सा लावणी डान्सर का किरदार सराहनीय था। फ़िल्म में केवल तीन गीत थे जिनमें एक गीत रीमा लागू पर फ़िल्माया गया। "तू ऐसा कैसा मर्द" एक लावणी गीत है जिस पर रीमा लागू ने लावणी नृत्य किया और माधुरी पुरंदरे की गायी इस लावणी पर लिप-सिंक किया। अक्सर इस तरह के लावणी में थोड़ा बहुत अश्लीलता आ ही जाती है, पर रीमा लागू इस गीत में इतनी ग्रेसफ़ुल और सुन्दर लगती हैं कि उन्हें इस रूप में देखने का मज़ा ही कुछ अलग है। गोविन्द निहलानी जैसे फ़िल्मकार ने अगर उन्हें इस किरदार के लिए चुना था तो ज़रूर उनकी अभिनय प्रतिभा को देख कर ही चुना होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। 

1980 की एक और फ़िल्म में रीमा लागू नज़र आईं। गोविन्द निहलानी के बाद अब बारी थी श्याम बेनेगल की। शशि कपूर निर्मित फ़िल्म ’कलयुग’ में शशि कपूर के अलावा रेखा, राज बब्बर, विक्टर बनर्जी, सुषमा सेठ, कुलभूषण खरबन्दा और अनन्त नाग जैसे मंझे हुए अभिनेता थे। श्याम बेनेगल की फ़िल्म में रीमा लागू जैसी नई अभिनेत्री को अभिनय का मौका मिलना बहुत बड़ी बात थी। साथ ही इतने बड़े बड़े अभिनेताओं के साथ एक ही सीन में अभिनय करना और अपनी एक पहचान बना पाना आसान काम नहीं था। महाभारत की कहानी का आधुनिक रूप था ’कलयुग’ की कहानी। इसमें कुलभूषण खरबन्दा की पत्नी का किरदार रीमा ने निभाया। दो परिवारों के बीच के द्वन्द की कहानी है ’कलयुग’ जिसमें रीमा लागू के बेटे का ऐक्सिडेन्ट में मृत्यु हो जाती है। अपने बेटे का शव देख कर एक माँ की क्या हालत होती है, रीमा लागू के अभिनय से सजी इस सीन को देख कर अपनी आँसू रोक पाना मुमकिन नहीं। हालाँकि किरण के इस किरदार में रीमा लागू को कुलभूषण खरबन्दा के साथ कुछ इन्टिमेट सीन्स भी करने पड़े हैं, लेकिन बेटे की मृत्यु का वह सीन दिलो-दिमाग़ पर छाया रहता है। रीमा लागू ने संतान के जाने के दर्द को यूं उभारा है कि मन से यह दुआ निकलती है कि भगवान कभी किसी दुश्मन से भी उसका संतान न छीने! ’कलयुग’ के बाद 1983 में फ़िल्म ’चटपटी’ में एक छोटा किरदार निभाया रीमा लागू ने। देवेन वर्मा निर्मित इस फ़िल्म में स्मिता पाटिल शीर्षक भूमिका में थीं और साथ में थे राज किरण, श्रीराम लागू और सुधीर दलवी। फ़िल्म बुरी तरह फ़्लॉप होने की वजह से यह फ़िल्म भुला दी गई।

फिर 1985 में फ़िल्म आई ’नासूर’ जिसमें फिर एक बार रीमा लागू को समानान्तर सिनेमा के कुछ दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। अशोक चोपड़ा निर्देशित इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में थे ओम पुरी, प्रिया तेन्दुलकर, सदाशिव अमरापुरकर, अच्युत पोद्दार, के. के. रैना और अरुण बक्शी। रीमा लागू ने इस फ़िल्म में सदाशिव अमरापुरकर की पुत्रवधु का चरित्र निभाया। हालाँकि रीमा लागू का रोल लम्बा नहीं है, लेकिन छोटी सी भूमिका में भी वो अपना छाप छोड़ जाती हैं। जिस अस्पताल में डॉ. सुनिल गुप्ता (ओम पुरी) गाइनोकोलोजिस्ट हैं, उसी में मंत्री रावसाहेब (सदाशिव) की गर्भवती पुत्रवधु मंजुला (रीमा लागू) का दाख़िला होता है डेलिवरी के लिए। लेकिन ऑपरेशन टेबल पर डॉ. गुप्ता को पता चलता है कि माँ और बच्चे में से किसी एक को ही बचाया जा सकता है और वो ख़ुद निर्णय लेते हुए माँ को बचाते हैं। अपने बच्चे को खोने का दर्द फिर एक बार रीमा लागू के अभिनय में फूट पड़ती है। संयोग की बात देखिए कि कुछ कुछ इसी तरह का दृश्य पिछली फ़िल्म ’कलयुग’ में भी रीमा लागू ने अदा की थी। 

1986 और 87 में रीमा लागू की कोई फ़िल्म नहीं आई, पर 1988 का वर्ष उनके करीअर का टर्निंग् पॉइन्ट सिद्ध हुआ। अरुणा राजे लिखित, निर्मित और निर्देशित विवादास्पद फ़िल्म ’रिहाई’ में कई दिग्गज कलाकारों के साथ स्क्रीन शेयर किया रीमा लागू ने। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि गुजरात के एक दूर दराज़ के गाँव से सारे जवान मर्द रोज़ी रोटी के लिए शहर चले गए हैं और गाँव में केवल औरतें, बच्चें और वृद्ध-वृद्धा रह गए हैं। गाँव की महिलाएँ दिन भर खेतों खलिहानों में अटूट परिश्रम करती हैं, बच्चे पालती हैं, और रात में तन्हाइयाँ ओढ़ कर सो जाती हैं। गाँव की इन महिलाओं की भूमिकाओं में जिन अभिनेत्रियों ने अभिनय किया, वो हैं हेमा मालिनी, नीना गुप्ता, इला अरुण और रीमा लागू। तभी गाँव में मनसुख (नसीरुद्दीन शाह) की वापसी होती है जो दुबई में सालों काम कर अपने गाँव लौटा है। कुछ औरतें मनसुख के तरफ़ आकर्षित होती हैं, ख़ास तौर से नीना गुप्ता और रीमा लागू द्वारा निभाये किरदार, और दोनों ही उसके साथ शारीरिक संबंध बनाती हैं। दो बच्चों की माँ रीमा लागू ने इस विवादास्पद चरित्र को बहुत ही स्वाभाविक तरीके से निभाया है। यह एक ऐसी औरत का किरदार है जो मुंहफट है, जो कुछ भी कहने से पहले सोचती नहीं, जिसकी बातों में निडरता के साथ-साथ थोड़ी अश्लीलता भी है। हेमा मालिनी जैसी सुपरस्टार अभिनेत्री के साथ सीन शेअर किया रीमा लागू ने और कुछ संवाद भी दोनों के बीच में हैं। इतना ही नहीं एक गीत में आशा भोसले ने हेमा मालिनी का पार्श्वगायन किया है तो अनुपमा देशपांडे ने रीमा लागू का। पहली फ़िल्म ’आक्रोश’ में रीमा लागू पर गीत फ़िल्माया गया था और उनका डान्स भी था, ’रिहाई’ के उस गीत में भी रीमा लागू नृत्य करती नज़र आती हैं। ’रिहाई’ में हेमा मालिनी के अलावा इला अरुण और नीना गुप्ता के चरित्रों को रीमा लागू के चरित्र से ज़्यादा प्रॉमिनेन्स दिया गया है, लेकिन रीमा लागू का स्क्रीन प्रेसेन्स भी कमाल का रहा। उनकी अच्छी बात यह रही कि जो भी रोल उन्हें दिया गया, चाहे छोटा या बड़ा, उन्होंने हर एक में जान फूंक दी।

हिन्दी फ़िल्म जगत में नायक-नायिका की जोड़ियाँ ख़ूब जमी हैं। लेकिन माँ और पिता की जोड़ियों की अगर बात करें तो सबसे पहले जो जोड़ी याद आती है, वह है रीमा लागू और आलोक नाथ की। फ़िल्म ’मैंने प्यार किया’ से इस जोड़ी की शुरुआत ज़रूर हुई थी, पर जिस फ़िल्म में रीमा लागू और आलोक नाथ एक साथ पहली बार नज़र आए थे, वह फ़िल्म थी 1988 की ’हमारा ख़ानदान’। इस फ़िल्म में एक गाइनोकोलोजिस्ट की भूमिका में नज़र आईं रीमा लागू। डॉ. जुली के किरदार में अमरीश पुरी और आशा पारेख के साथ उन्होंने स्क्रीन शेअर किया। किसी बच्चे के लिंग निर्धारण में माँ की नहीं बल्कि पिता के क्रोमोज़ोम की भूमिका होती है, यह संदेश इस फ़िल्म में रीमा लागू के चरित्र के माध्यम से दी गई। अब तक उनके निभाए किरदारों में यह किरदार सबसे दीर्घ रही। फिर इस वर्ष के आख़िर में प्रदर्शित हुई ’मैंने प्यार किया’ जिसमें सूरज बरजात्या ने रीमा लागू को एक ऐसे अवतार में उतारा कि बाकी इतिहास है। एक ग्लैमरस पर घरेलु माँ का इमेज इस फ़िल्म से उनकी बनी जो बेहद हिट सिद्ध हुई और इस फ़िल्म के बाद एक के बाद एक फ़िल्मों में उन्हें हमने इसी अवतार में देखा। इस दौर के समस्त सुपरस्टार हीरो-हीरोइन्स की माँ बन चुकी हैं रीमा लागू और आज की पीढ़े उन्हें इसी रूप में याद करती रहेंगी। लेकिन ’मैंने प्यार किया’ से पहले उनके द्वारा निभाए गए किरदारों में उनके अभिनय की विविधता महसूस की जा सकती है। चाहे ’आक्रोश’ के लावणी डान्सर का किरदार हो या ’कलयुग’ के बिज़नेसमैन घराने की बहू का चरित्र, ’नासूर’ में गर्भवती औरत जिसका बच्चा डेलिवरी के समय मर जाता है, ’हमारा ख़ानदान’ में गाइनोकोलोजिस्ट की दमदार अदायगी या फिर ’रिहाई’ में एक अनपढ़, कामुक, दो बच्चों की माँ की वह विवादास्पद रोल, हर चरित्र में रीमा लागू ढल गईं और इन फ़िल्मों को अपने अभिनय से सजाया, सँवारा, उनमें अपनी सहज स्वाभाविक अदायगी से जान डाली। रीमा लागू आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हिन्दी व मराठी सिनेमा, थिएटर और टेलीविज़न पर उनकी अमिट छाप सदा बनी रहेगी। सहज, सरल अभिनय और हर तरह के चरित्र में बड़ी आसानी से ढल जाना ही रीमा लागू की सबसे बड़ी ख़ासियत थी और इसी बात की पुष्टि उनके द्वारा निभाए गए शुरुआती फ़िल्मों के किरदारों से होती है। रीमा लागू की प्रतिभा और योगदान को ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ करती है शत शत नमन!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शुक्रवार, 26 मई 2017

गीत अतीत 14 || हर गीत की एक कहानी होती है || धीमी || ट्रैप्ड || अलोकानंदा दासगुप्ता

Geet Ateet 14

Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Deemi
Trapped
(Tejas Menon, Rajeshwari Dasgupta)
Alokananda Dasgupta- Composer

प्रसिद्द कवि एवं फिल्म निर्देशक बुद्धादेव दासगुप्ता की बेहद प्रतिभावान सुपुत्री अलोकानंदा दासगुप्ता ने बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनायीं फिल्म "बी ए पास" से, अभी हाल ही में प्रदर्शित राजकुमार राव अभिनीत फिल्म "ट्रैप्ड" में उनका संगीत लीक से बहुत हटकर है, इसी फिल्म के गीत "धीमी" के बनने की सुनिए कहानी आज स्वयं अलोकानंदा की जुबानी...धीमी को लिखा है उन्हीं की बहन राजेश्वरी दासगुप्ता ने, और गाया है तेजस मेनन ने, तो प्ले का बटन दबाएँ और सुनें ये पॉडकास्ट....




डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -

मंगलवार, 23 मई 2017

प्रेमचंद की 'बड़े भाई साहब' ऑडियो

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। इस शृंखला में पिछली बार आपने पूजा अनिल के स्वर में  प्रमिला वर्मा की लघुकथा कारा मत नापो मिन्नी का वाचन सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं प्रेमचंद की कहानी बड़े भाई साहब, जिसे स्वर दिया है अर्चना चावजी ने।

प्रस्तुत अंश का कुल प्रसारण समय 24 मिनट 50 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

मुंशी प्रेमचंद हिंदी और उर्दू के प्राख्यात कथाकार हैं।

मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ... मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर सप्ताह सुनिए हिन्दी में एक नयी कहानी

मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था।
(प्रेमचंद की 'बड़े भाई साहब' से एक अंश)



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बड़े भाई साहब MP3

#Eighth Story, Bade Bhai Sahab; Premchand; Hindi Audio Book/2017/8. Voice: Archana Chaoji

रविवार, 21 मई 2017

राग कल्याण : SWARGOSHTHI – 318 : RAG KALYAN




स्वरगोष्ठी – 318 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 4 : राग कल्याण में गजल

राग कल्याण अथवा यमन में उस्ताद राशिद खाँ से खयाल और सुधा मल्होत्रा से गजल सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की चौथी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हमने 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बाबर’ की एक गजल चुना है, जिसे रोशन ने राग कल्याण अथवा यमन के स्वरों में पिरोया है। यह गीत सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही इसी राग में निबद्ध एक खयाल सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



सुधा मल्होत्रा
ता मंगेशकर, अनेक संगीतकारों के साथ-साथ रोशन की भी प्रिय गायिका रही हैं। इसी प्रकार रोशन भी लता मंगेशकर के प्रिय संगीतकार थे। इस श्रृंखला की शुरुआती तीन कड़ियों में हमने आपको छठे दशक के आरम्भिक दौर की रोशन के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर के तीन गीत लगातार सुनवाए हैं। लता मंगेशकर की पारखी संगीत दृष्टि ने बहुत पहले ही रोशन की प्रतिभा को पहचान लिया था। रोशन को लता मंगेशकर का साथ हमेशा मिलता रहा। रोशन की शुरुआती दौर की कई फिल्में व्यावसायिक दृष्टि से असफल हो जाने के बावजूद जब लता मंगेशकर ने स्वयं अपनी निर्माण संस्था की फिल्म ‘भैरवी’ की घोषणा की तो उस फिल्म के संगीत निर्देशक रोशन ही थे। रोशन के लिए यह एक ऐसा सम्मान था, जिसको पाने के लिए उस समय के कई सफल संगीतकार लालायित थे। लता मंगेशकर द्वारा संगीतकारों के एक बड़े समूह में से किसे चुना जाएगा, इस अटकल का निदान करते हुए रोशन का चुना जाना वास्तव में यह सिद्ध करता है कि उनको रोशन की संगीत प्रतिभा पर कितना भरोसा था। 50 के दशक में रोशन ने लता मंगेशकर के स्वर में अनेक लोकप्रिय गीत स्वरबद्ध किये। इस दशक में रोशन ने पाश्चात्य संगीत, लोक संगीत और राग आधारित गीतों के साथ-साथ कव्वाली स्वरबद्ध करनी भी शुरू कर दी थी। आगे चल कर उन्हें कव्वालियों का विशेषज्ञ माना गया था। 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘अजी बस शुक्रिया’ में लता मंगेशकर के गाये गीतों के माध्यम से रोशन ने रचनात्मकता के साथ-साथ लोकप्रियता के शिखर को स्पर्श कर लिया था। इस फिल्म में रोशन का स्वरबद्ध किया गीत –“सारी सारी रात तेरी याद सताए...” लोकप्रियता के मानक स्थापित करता है। दशक के अन्त तक आते-आते सफलता रोशन के कदम चूमने लगी थी। 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बाबर’ में एक से बढ़ कर एक राग आधारित गीत शामिल थे। आज के अंक में हमने इसी फिल्म का एक गीत चुना है। फिल्म ‘बाबर’ में ही रोशन ने मोहम्मद रफी, मन्ना डे, सुधा मल्होत्रा, आशा भोसले और साथियों की आवाज़ में एक कव्वाली –“हसीनों के जलवे परेशान रहते...” स्वरबद्ध कर अपनी क्षमता का परिचय भी दिया था। इसी फिल्म में राग शिवरंजनी पर आधारित मोहम्मद रफी की आवाज़ में गीत –“तुम एक बार मुहब्बत का इम्तिहान तो लो...” अपनी सरल धुन के कारण खूब लोकप्रिय हुआ था। फिल्म ‘बाबर’ में ही गायिका सुधा मलहोत्रा के स्वर में राग खमाज पर आधारित गीत –“पयाम-ए-इश्क़ मुहब्बत हमें पसन्द नहीं...” और राग यमन का स्पर्श करते गीत –“सलाम-ए-हसरत कबूल कर लो...” शामिल था। सुधा मल्होत्रा ने यह दोनों गीत अत्यन्त भावपूर्ण ढंग से गाया है। इसी फिल्म में रोशन का साथ गीतकार साहिर लुधियानवी से हुआ थ। आगे चल कर इस जोड़ी ने अनेक लोकप्रिय गीतों को जन्म दिया था। अब आप साहिर लुधियानवी का लिखा, राग यमन के स्वरो को आधार बना कर रोशन का स्वरबद्ध किया और सुधा मल्होत्रा का गाया फिल्म ‘बाबर’ का गीत सुनिए।

राग कल्याण अथवा यमन : “सलाम-ए-हसरत कबूल कर लो...” : सुधा मल्होत्रा : फिल्म – बाबर



उस्ताद राशिद खाँ
राग कल्याण अथवा यमन, कल्याण थाट का ही आश्रय राग है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग में मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग कल्याण अथवा यमन का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय गोधूलि बेला, अर्थात रात्रि के पहले प्रहर का पूर्वार्द्ध काल होता है। इस राग का प्राचीन नाम कल्याण ही मिलता है। मुगल काल में राग का नाम यमन प्रचलित हुआ। वर्तमान में इसका दोनों नाम, कल्याण और यमन, प्रचलित है। यह दोनों नाम एक ही राग के सूचक हैं, किन्तु जब हम ‘यमन कल्याण’ कहते हैं तो यह एक अन्य राग का सूचक हो जाता है। राग यमन कल्याण, राग कल्याण अथवा यमन से भिन्न है। इसमें दोनों मध्यम का प्रयोग होता है, जबकि यमन में केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है। राग कल्याण अथवा यमन के चलन में अधिकतर मन्द्र सप्तक के निषाद से आरम्भ होता है और जब तीव्र मध्यम से तार सप्तक की ओर बढ़ते हैं तब पंचम स्वर को छोड़ देते हैं। राग कल्याण के कुछ प्रचलित प्रकार हैं; पूरिया कल्याण, शुद्ध कल्याण, जैत कल्याण आदि। राग कल्याण गंभीर प्रकृति का राग है। इसमे ध्रुपद, खयाल तराना तथा वाद्य संगीत पर मसीतखानी और रजाखानी गतें प्रस्तुत की जाती हैं। राग की यथार्थ प्रकृति और स्वरूप का उदाहरण देने के लिए अब हम आपको इस राग की एक श्रृंगारपरक् बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के विश्वविख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ हैं। आप यह बन्दिश सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग कल्याण अथवा यमन : ‘ऐसो सुगढ़ सुगढ़वा बालमा...’ : उस्ताद राशिद खान




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 318वें अंक की पहेली में आज हम आपको संगीतकार रोशन द्वारा स्वरबद्ध सातवें दशक के आरम्भिक दौर की एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 27 मई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 320वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 316वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ के एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – भीमपलासी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और इस सप्ताह के विजेता बने हैं। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस अंक में हमने आपके लिए राग कल्याण अथवा यमन पर आधारित रोशन के एक गीत और राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 20 मई 2017

चित्रकथा - 19: 2017 के मार्च और अप्रैल में प्रदर्शित फ़िल्मों का संगीत

अंक - 19

2017 के मार्च और अप्रैल में प्रदर्शित फ़िल्मों का संगीत

"होली खेले बृज की हर बाला..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



फ़िल्म-संगीत की धारा, जो 1931 में शुरु हुई थी, निरन्तर बहती चली जा रही है, और इस वर्ष भी यह सुरीली धारा रसिकों के दिलों से गुज़रती हुई बहे चली जा रही है। आइए आज ’चित्रकथा’ में चर्चा करें मार्च और अप्रैल 2017 में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्मों के गीत-संगीत की। 





मार्च और अप्रैल के महीने, यानी कि वसन्त और होली के रंगों का संगम। हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री भी इन रंगों से बच नहीं सकी और एकाधिक होली गीत पिछले दो महीनों में जारी हुए। लेकिन फ़िल्मी गीतों की समीक्षा शुरु करने से पहले दो ग़ैर फ़िल्मी गीतों का उल्लेख करना चाहूंगा जिन्हें लिखा है ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के हमारे प्यारे साथी सजीव सारथी ने। पहला गीत एक होली गीत है "रंग" शीर्षक से जिसे अरविन्द तिवारी ने गाया है और चाणक्य शुक्ला ने संगीत से सँवारा है। "इस होरी डारो ऐसो रंग रे..." एक ऐसा होली गीत है जिसमें पारम्परिक स्वाद भी है और आधुनिक अंदाज़ का ज़ायका भी; गायकी में सूफ़ियाना रंग भी है और भारतीय शास्त्रीय संगीत की छटा भी। जितनी ख़ूबसूरत गायकी अरविन्द की है, वैसा ही है पीयुष अम्भोरे और सुबोध पाण्डे के शास्त्रीय आलाप और ताल गायन। और सजीव सारथी के शब्दों के तो कहने ही क्या। उपर उपर सुनने पर भले ही यह एक होली गीत लगे, पर ग़ौर करने पर पता चलता है कि दरसल यह एक एकतामूलक गीत है जो हमें साम्प्रदायिक एकता का पाठ पढ़ाता है जो आज के समय में सर्वाधिक आवश्यक है। इस गीत में हर एक रंग में प्यार का रंग भरने की बात है; हर एक इंसान अलग है, हर एक की अलग पहचान है, अलग धर्म है, अलग दिनचर्या है, लेकिन ऐसा कुछ करें कि एक इंसान में दूसरे इंसान की छवि मिले, अर्थात् हर इंसान भगवान की रचना है, इसलिए हर कोई सबसे पहले एक ही इंसान सूत्र में बंधा हुआ है, उसके बाद उसका धर्म, उसकी जाति वगेरह आते हैं। जिस तरह से होली में सब रंग एक साथ मिल कर एक रंग बन जाते हैं, उसी तरह हर इंसान को भी सिर्फ़ इंसान बने रहना चाहिए। सजीव सारथी का लिखा दूसरा गीत है "बेख़ुद" जिसे गाया है लन्दन में बसे देसी कलाकार बिस्वजीत नन्दा और सुप्रसिद्ध गायिका हेमा सरदेसाई ने और इसे कृष्ण राज ने स्वरबद्ध किया है। "बेख़ुद वेख़ुद सारा आलम" एक आधुनिक शैली का गीत है जिसमें रॉक फ़्लेवर भी है, बॉलीवूड संगीत की मस्ती भी, और हेमा सरदेसाई की वही "आवारा भँवरे" वाली चुलबुली अंदाज़ भी है। और अंगूठी का नगीना है बिस्वजीत के अरबी शैली में आलाप। इस गीत को सुनते हुए हम इसके साथ कनेक्ट हो जाते हैं और गीत ख़त्म होने पर दोबारा सुनने का मन करता है, यहाँ तक कि लूप में सुनते ही रहने का मन होता है।

अब आते हैं फ़िल्म संगीत पर। मार्च का महीना शुरु हुआ ’कमांडो 2’ के प्रदर्शन से। इस फ़िल्म के कुल सात गीतों में केवल तीन मूल गीत हैं। इसकी प्रीकुएल फ़िल्म ’कमांडो’ में लोक और राग आधारित गीत थे, लेकिन ’कमांडो’ में शहरी रंग साफ़ झलकती है। संगीतकार प्रीतम के 2007 की मशहूर फ़िल्म ’भूल भूलैया’ के हिट गीत "हरे कृष्णा हरे राम" को गौरव-रिशिन ने ’कमांडो 2’ के लिए रीक्रिएट किया है। अरमान मलिक, रितिका और रफ़्तार की आवाज़ें होने के बावजूद इस गीत का स्तर मूल गीत के आसपास भी नहीं है। ऐल्बम के अगले तीन गीतों के संगीतकार हैं मन्नन शाह। कुमार और आतिश कापड़िया ने बोल लिखे जैं। अरमान मलिक की आवाज़ में "तेरे दिल में क्या है" एक नर्म रॉक-पॉप शैली का रोमान्टिक गीत है। लाइव 16-पीस ऑरकेस्ट्रा द्वारा स्ट्रिंग् सेक्शन का प्रयोग इस गीत की ख़ासियत है। इसी गीत का एक निरर्थक ’क्लब मिक्स’ संस्करण भी है। "बुल्लेया" के गायक अमित मिश्रा की आवाज़ में "सीधा साधा दिल मेरा कम है तेरा ज़्यादा" भी एक रॉक आधारित रचना है जिसमें दिलचस्प प्रधान-गौण स्तर परिवर्तन हैं। अमित मिश्रा की रॉक अंदाज़ में प्रबल गायकी ने गीत को न्याय दिलाया है। इसी गीत के अन्य संस्करण में जुबिन नौटियाल की नर्मो-नाज़ुक गायकी उतना असरदार नहीं बन सका। ’कमांडो 2’ फ़िल्म के शीर्षक गीत के दो संस्करण हैं - हिन्दी और अंग्रेज़ी। दोनों संसकरण अदिति सिंह शर्मा ने गाया है। उनकी सशक्त गायकी से गीत का मक़्सद हासिल हो गया है, लेकिन फ़िल्म के बाहर इस गीत की कोई अहमियत नहीं है। कुल मिलाकर ’कमांडो 2’ का संगीत चार्टबस्टर बनने लायक नहीं है। मन्नन शाह को अपनी अगली फ़िल्म में इससे बेहतर प्रदर्शन का प्रयास करना चाहिए।

3 मार्च के दिन एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई - ’जीना इसी का नाम है’। पाँच संगीतकार वाले इस फ़िल्म में कुल सात गीत हैं। फ़िल्म का शीर्षक गीत केके की आवाज़ में है। दीपक अगरवाल के लिखे व स्वरबद्ध किए इस गीत को सुन कर शैलेन्द्र के लिखे इसी मुखड़े के गीत की याद आ गई। निस्संदेह यह गीत लिखते समय दीपक अगरवाल के उपर भी शैलेन्द्र के लिखे गीत की वजह से एक तनाव बनी होगी। "दर्द में कोई मुस्कुरा कर रहे, और कहे हवा हवा है ज़िन्दगी का खेल, वक़्त का है क्या आज है या है कल, दिन गुज़र भी जाएगा तू रखना ताल में, इतनी भी फ़िकर तू कर ना इस क़दर, दम है बहुत अभी जो तेरे पास है, जो हुआ हुआ तू रुक ना हार कर, बस यही तेरा इम्तिहान है, जीना इसी का नाम है, जीना इसी का नाम है..." - केके की उसी जाने-पहचाने अंदाज़ में यह ठहराव से भरे गीत को सुनते हुए हम इससे जैसे जुड़ जाते हैं। ऐल्बम का दूसरा गीत है ऐश किंग् और शिल्पा राव का गाया "क़ुबूल है" जिसे लिखा है आशिष पंडित ने और स्वरबद्ध किया है विशु मुखर्जी ने। तेज़ जैज़ शैली पर आधारित इस पेप्पी गीत में वो सब ख़ूबियाँ हैं जो आपको झूमने पर मजबूर कर देती है। माउथ ऑरगन का सुंदर प्रयोग अन्तरालों में सुनाई देती है। अंग्रेज़ी शब्दों के हास्यास्पद प्रयोग ने गीत को और भी मज़ेदार बना दिया है। तीसरा गीत है "मुझको तेरे इश्क़ में भिगा दे" (गीतकार कुँवर जुनेजा, संगीतकार हैरी आनन्द) जिसे अंकित तिवारी ने फिर से अपने उसी दिलकश अंदाज़ में गा कर सिद्ध कर दिया है कि इस दौर के वो अग्रणी गायकों में से एक है। और निस्संदेह यह गीत इस साल के श्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों में चुना जाएगा। अन्तरालों में रॉक संगीत गीत में विविधता लाती है। सिद्धांत माधव के संगीत में कुंवर जुनेजा का ही लिखा स्वाति शर्मा का गाया गीत "सोचती हूँ आसमाँ का रंग मैं बदल दूँ" मूड को आगे बढ़ाता है। ओंकार मिन्हास के संगीत में इस फ़िल्म में दो गीत हैं; पहला गीत है आकृति का गाया "लट्टू" एक बच्चों वाला गीत जो "अक्कड़ बक्कड़ बॉम्बे बो" से शुरु होता है और पूरे गीत में तरह तरह के बच्चों वाले जुमले शामिल है। पर अफ़सोस की बात है कि गीत केन्द्रित है "लट्टू भी पी के टल्ली हुआ है" भाव पर। बच्चों वाले गीत में "टल्ली" होने जैसे शब्द समाज को क्या संदेश दे रहा है, सोचने वाली बात है। महेश शर्मा की यह गीत रचना है। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "कागज़ सी है ज़िन्दगी" जो ऐल्बम के शीर्षक गीत का ही विस्तार है। ओंकार मिनहास के संगीत में फ़तेह शेर्गिल का लिखा ओंकार मिनहास, रानी हज़ारिका और यूवी का गाया यह गीत दार्शनिक है और यूवी की आवाज़ में जो दर्द है वह इस कम्पोज़िशन को बेहतर बनाती है। लेकिन "गूगल पे ढूंढ़ेगा तुझको ज़माना" जैसे बोल गीत को दर्शन से हास्य की तरफ़ ले जाता है और गीत के मूड और उद्येश्य को ख़तम कर देता है। इस गीत का एक धीमा संस्करण है जिसे नज़ीम के अली ने गाया है जो ज़्यादा अर्थपूर्ण और संजीदा है। कुल मिला कर इस ऐल्बम के गाने बहुत ज़्यादा काबिल-ए-तारीफ़ न होते हुए भी अपने नएपन की वजह से सुनने लायक हैं।


मार्च की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही ’बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ जो 10 तारीख़ को प्रदर्शित हुई। वरुण धवन - आलिआ भट्ट की हिट जोड़ी की इस फ़िल्म में इन दोनों की केमिस्ट्री और भी ज़्यादा निखर कर सामने आई। इससे पहले वरुण-आलिआ की ’हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ हिट रही और उसके गाने भी सुपरहिट रहे जैसे कि "सैटरडे सैटरडे", "लकी तू लकी मी", "मैं तैनु समझावाँ कि", "इमोशनल फ़ूल" आदि। अब ’बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ का गीत-संगीत भी मज़ेदार है। ऐल्बम का पहला गीत है "जो भिड़ा तेरे नैनों से टांका तो आशिक़ सरेन्डर हुआ"। संगीतकार-गायक अमाल मलिक और गायिका श्रेया घोषाल की मस्ती भरी आवाज़ों ने इस कैची थिरकते गीत को युवाओं के होठों तक पहुँचा ही दिया। वरिष्ठ गीतकार शब्बीर अहमद के मस्ती भरे बोलों का भी उतना ही योगदान है। इस गीत में 90 के दशक के गोविन्दा शैली के गीतों की झलक मिलती है। बरसों बाद इस तरह का यह गीत एक ताज़े हवा के झोंके की तरह आया। दूसरा गीत है "रोके ना रुके नैना"। अमाल के संगीत और कुमार के बोलों से सजा अरिजीत सिंह की आवाज़ में यह गीत बेहद ख़ूबसूरत है और भारतीय पारम्परिक साज़ों जैसे कि सारंगी के प्रयोग से संगीत-संयोजन बहुत सुन्दर बन पड़ा है। स्तर की बात करें तो निस्संदेह यह इस फ़िल्म का श्रेष्ठ गीत है। तीसरे गीत के रूप में गीतकार-संगीतकार-गायक अखिल सचदेवा का "हमसफ़र" एक प्रेम कथागीत है। संगीत से ज़्यादा बोलों पर ज़ोर होने की वजह से गीत अर्थपूर्ण बन पड़ा है। अखिल के साथ मनशील गुजराल ने भी आलापों में अपनी आवाज़ मिलाई है। फ़िल्म का शीर्षक गीत "बद्री की दुल्हनिया" लोक शैली में कम्पोज़ किया हुआ एक होली गीत है। तनिश्क बागची द्वारा स्वरबद्ध और शब्बीर अहमद के बोलों से सजा यह गीत यू.पी. के मशहूर लोकगीत "काहे को जिया ललचाये गई रे मदमाती चिड़ैया" की धुन पर आधारित है। इसी नौटंकी धुन पर ’तीसरी क़सम’ का गीत "चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे" भी आधारित था। "तुझको बना कर के ले जाएँगे बद्री की दुल्हनिया" में आवाज़ें हैं देव नेगी, नेहा कक्कर, मोनाली ठाकुर, इक्का सिंह, रजनीगंधा शेखावत और साथियों की। ऐल्बम का समापन धमाके के साथ होता है "तम्मा तम्मा अगेन" से जो बप्पी लाहिड़ी और अनुराधा पौडवाल के गाए मशहूर गीत "तम्मा तम्मा लोगे" का रीमिक्स वर्ज़न है। इंदीवर के बोलों को ही रखा गया है और बप्पी-अनुराधा की आवाज़ें भी बरकरार हैं। बस बीच बीच में बादशाह का रैप और सोने पे सुहागा अमीन सायानी के ’बिनाका गीतमाला’ से कुछ कुछ लाइनें ली गई हैं। कुल मिला कर ’बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ एक दिलचस्प ऐल्बम है।

17 मार्च को तीन फ़िल्में रिलीज़ हुईं। पहली फ़िल्म ’आ गया हीरो’। गोविन्दा द्वारा निर्मित व अभिनीत यह फ़िल्म बुरी तरह पिटी और इसका गीत-संगीत भी बेकार है। मीत ब्रदर्स, शमिर, विक्की-हार्दिक और अर्घ्य बनर्जी जैसे संगीतकारों के होते हुए भी एक भी गीत क़ायदे का नहीं बना है। फ़िल्म के सातों गीत ("आ गया हीरो", "पुलिस वाला डॉन", "यूपी की डॉन", "लोहे दा लिवर", "डर्टी फ़्लर्टी", "लो होइगवा", "माहिया") में से कोई भी गीत चर्चायोग्य नहीं है। दूसरी फ़िल्म है ’ट्रैप्ड’ जो एक थ्रिलर है। थ्रिलर फ़िल्म में गीतों की गुंजाइश कम होती है। इस फ़िल्म में दो गीत हैं। संगीतकार अलोकानन्द दासगुप्ता और गीतकार राजेश्वरी दासगुप्ता ने दो गीत और दो थीम्स की रचना की है। तेजस मेनन की आवाज़ में "धीमी" एक प्रेम गीत है जिसमें एक अच्छी लगने वाली बात है। फ़िल्मांकन में अपने दफ़्तर में अपने क्रश के उपर जासूसी करने, मरीन ड्राइव में टैक्सी में सैर करने, देर रात के पावभाजी, ये सब हैं इस गीत में। दूसरा गीत है "है तू" जिसमें अलग हट कर आवाज़ है गौरी जयकुमार की। फ़िल्म का विषय अलग हट के होने की वजह से बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाब नहीं रही और इस वजह से ये गीत भी अनसुने ही रह गए। 17 मार्च की तीसरी फ़िल्म रही ’मशीन’। अब्बास-मस्तान निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म में अब्बास साहब के पुत्र मुस्तफ़ा बर्मावाला को लौंच किया गया है। फ़िल्म के संगीतकार हैं तनिश्क बागची और डॉ. ज़ेउस जिन्होंने चार गीतों की धुनें बनाई है। पहला गीत आराफ़ात महमूद का लिखा हुआ यासिर देसाई और साशा तिरुपति का गाया हुआ है "इतना तुम्हें चाहा है ना सोच सकोगी" जिसकी पहली लाइन हू-ब-हू "आख़िर तुम्हें आना है ज़रा देर लगेगी" (यलगार) गीत जैसी है। इस पहली लाइन के अलावा दोनों गीतों में कोई समानता नहीं है। नर्मोनाज़ुक रोमान्टिक गीतों की श्रेणी में यह गीत है। यासिर की दिलकश आवाज़ में हिन्दी के बोल हैं जबकि साशा अंग्रेज़ी पंक्तियाँ गाती हैं। कुल मिलाकर एक कर्णप्रिय रचना। दूसरा गीत है "एक चतुर नार" जो फ़िल्म ’पड़ोसन’ के गीत से प्रेरित है। नकश अज़ीज़ और साशा तिरुपति की आवाज़ों में इसके बोलों को निकेत पांडे ने लिखे हैं। इक्का के रैप से सजा यह गीत बस एक मस्ती भरे गीत से ज़्यादा और कुछ नहीं है। जसमीन सैन्डलस और राजवीर सिंह की आवाज़ों में "ब्रेक ऐन फ़ेल" डॉ. ज़ेउस की संगीत रचना है जो जसमीन के फ़िल्म ’किक’ के हिट गीत "यार ना मिले तो मरजावाँ" से मिलती-जुलती है और इस हिन्दी-पंजाबी गीत में कोई नई या उल्लेखनीय बात नज़र नहीं आई। तनिश्क-आराफ़ात-यासिर की तिकड़ी का "तू ही तो मेरा" जैसे "इतना तुम्हें चाहा है" का ही विस्तार है। इस गीत का संगीत संयोजन आकर्षक है। फ़िल्म का अन्तिम गीत है "तेरा जुनून है सर पे चढ़ा" जो जुबिन नौटियाल की आवाज़ में है। जुबिन नौटियाल पिछले कुछ समय से सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं। कर्णप्रिय आवाज़ के धनी जुबिन ने इस गीत को भी अच्छा अंजाम दिया है। आराफ़ात के लिखे इस गीत के बोलों में मोहम्मद इरफ़ान का भी योगदान है। इस फ़िल्म में "तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त" गीत को रिक्रीएट किया गया है। विजु शाह के मूल संगीत को तनिश्क बागची ने मिक्स किया है जबकि आनन्द बक्शी के मूल बोलों पर शब्बीर अहमद ने नए बोल लिखे हैं। मूल गीत में उदित नारायण और कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ें थीं, इस संस्करण में उदित नारायण और नेहा कक्कर की आवाज़ें हैं। इस तरह से ’मशीन’ में तीन प्रेम गीत और कुछ डान्स नंबर्स के होने के बावजूद इस ऐल्बम में जैसे पंच की कमी है। कुल मिला कर ऐल्बम बुरा नहीं है पर बहुत ज़्यादा दूर तक जाने की संभावना कम है।

24 मार्च को तीन फ़िल्में प्रदर्शित हुईं - ’फिल्लौरी’, ’भँवरे’, और ’अनारकली ऑफ़ आरा’। अंशई लाल की पहली निर्देशित फ़िल्म ’फिल्लौरी’ में लोगों की अनुष्का शर्मा के एक भूत के रूप में देखने की उत्सुक्ता के साथ-साथ फ़िल्म के ताज़े गीत-संगीत से भी आशाएँ रही। नवोदित संगीतकार शास्वत सचदेव और गायक रोमी ने इस फ़िल्म में "दम दम" और "साहिबा" जैसे गीतों में जादू रचए। इन दोनों गीतों में लोकशैली का प्रभाव है। रोमी ने दोनों गीतों में अपनी दिलकश आवाज़ से रूह डाल दी है और गीतों के ख़त्म हो जाने के बाद भी उनकी आवाज़ और सुर जैसे कानों में गूंजते रहते हैं। ये दोनों गीत अन्विता दत्त गुप्तन ने लिखा है और इनमें उनकी परिपक्वता साफ़ दिखाई देती है, ख़ास कर जब वो लिखती हैं "तेरे बिन साँस काँच सी काटे रे"। "दम दम" में रोमी के साथ आवाज़ विवेक हरिहरन की है और "साहिबा" में उनका साथ दिया है पावनी पांडे ने। "दम दम" का एक पंजाबी संस्करण भी है जिसके पंजाबी बोल शेली ने लिखे हैं। यह आश्चर्य की बात है कि दिलजीत दोसंझ, जिन पर ये गीत फ़िल्माये गए हैं, वो एक गायक होने के बावजूद इन गीतों में उनकी आवाज़ नहीं ली गई है। हालाँकि रोमी भी एक अच्छे गायक हैं, लेकिन फिर भी एक खटका सा लगता है। वैसे "दम दम" के एक और संस्करण में दिलजीत दोसंझ की आवाज़ है, लेकिन यह गीत फ़िल्म की कहानी में नहीं है। जसलीन कौर रॉयल ने इस फ़िल्म में दो गीत कम्पोज़ किए हैं। उन्हीं की आवाज़ में नीरज राजावत के लिखे "दिल शगना दा" एक मीठी लोरी से कम नहीं है। हाँ, यह गीत एक नवविवाहित दुल्हन के दिल की पुकार है जिसमें बेचैनी भी है और उत्तेजना भी। जसलीन द्वारा स्वरबद्ध "व्हाट्स अप" फ़िल्म के तीन डान्स नंबरों में से एक है। मिका की आवाज़ में यह पंजाबी थिरकता गीत बारात का गीत है, इसलिए कोई शक़ नहीं कि इसे सुनते हुए आप भी थिरक उठेंगे। लोक शैली में डान्स नंबर "बजाके तुम्बा" भी एक भंगड़ा/गिद्दा शैली का गीत है जिसमें शास्वत सचदेव के रेंज का पता चलता है जिन्होंने इस ऐल्बम में विविधता ले आए हैं - संजीदे गीत, लोक शैली का डान्स नंबर, आइटम गीत। दिलजीत दोसंझ, नकश अज़ीज़, शिल्पि पॉल और अनुष्का शर्मा की आवाज़ों में "नॉटी बिल्लो" भी पंजाबी रीदम का गीत है जिसमें कोई अलग हट के बत नहीं है। शोर-शराबे के अलावा इस गीत में कुछ नहीं है। ’फिल्लौरी’ के ऐल्बम में विविधता होते हुए भी हर गीत पंजाबी शैली का होने की वजह से ग़ैर-पंजाबी ऑडिएन्स इसे कैसे ग्रहण करेगी कह नहीं सकते। ’भँवरे’ फ़िल्म के गाने भी पंजाबी शैली के हैं। सौरभ चटर्जी और गौरव रत्नाकर के संगीत में इस फ़िल्म के गीत "पेन चोड़" में दोहरे अर्थ के बोलों की वजह से इसे कचरे के डब्बे में डाल दिया जा सकता है। 

स्वरा भास्कर अभिनीत ’अनारकली ऑफ़ आरा’ एक कामोत्तेजक गीतों की गायिका की कहानी है। इसलिए ज़ाहिर सी बात है कि फ़िल्म के संगीत में लोक शैली का रंग है और साथ ही गीतों के बोल ऐसे हैं जो परिवार के साथ मिल बैठ कर नहीं सुने जा सकते। रोहित शर्मा स्वरबद्ध इस फ़िल्म के गीतों में दोहरे अर्थ की पंक्तियाँ  भर भर कर डाली गई हैं। स्वाति शर्मा, पावनी पांडे और इन्दु सोनाली के गाए इस तरह के गीतों के अलावा एक स्तरीय गीत भी है रेखा भारद्वाज की आवाज़ में जिसमें शास्त्रीय संगीत की छटा बिखरती है। यह गीत है "बदनाम जिया दे गारी" जिसमें उस नर्तकी के दर्द की वर्णना की गई है। कम्पोज़िशन मेलडी प्रधान होते हुए दर्दीला है। उस पर वायलिन, सितार, सारंगी और तबले के संगीत ने इसे एक आकर्षक गीत बना दिया है। सोनू निगम की दिलकश आवाज़ में "मिट्टी जिस्म की गीली हो चली, ख़ुशबू इसकी रूह तक घुली, इक लम्हा बनके आया है, सब ज़ख़मों का वैध, मन बेक़ैद हुआ" भी एक सुन्दर रचना है। कुल मिला कर इस फ़िल्म के गाने ऐसे हैं कि फ़िल्म की कहानी के हिसाब से अनुकूल हैं पर फ़िल्म के बाहर इन्हें सुनना शायद कर्णप्रिय न लगे। 31 मार्च को तापसी पन्नु, अक्षय कुमार, मनोज बाजपयी अभिनीत फ़िल्म ’नाम शबाना’ प्रदर्शित हुई। निर्मल पाण्डे ’बेबी’ के बाद लेकर आए ’नाम शबाना’। ’बेबी’ में ग़लत जगह पर फ़्लैशबैक सॉंग् के बाद ’नाम शबाना’ में चार गीत लेकर आए जिनका फ़िल्म की कहानी से कोई वास्ता नहीं। ये सारी बातें माफ़ की जा सकती थीं अगर ये चार गीत कमाल के होते। पर अफ़सोस कि बेहद साधारण क़िस्म के ये गीत ऐल्बम और फ़िल्म की शान नहीं बढ़ा सके। चार गीतों में तीन गीत संगीतकार रोचक कोहली और गीतकार मनोज मुन्तशिर के हैं जबकि चौथा गीत है मीत ब्रदर्स और कुमार का। पहला गीत "रोज़ाना" में श्रेया घोषाल की आवाज़ मधुर है पर रोचक ने वही घिसे पिटे धुन में इसे पिरो चर सारी रोचकता ख़त्म कर दी है। गीत समाप्त होने पर यह दिमाग़ से निकल जाता है, आपके साथ नहीं रह पाता। सुनिधि चौहान की आवाज़ में ऐल्बम का दूसरा गीत "ज़िन्दा" में भी वही "रोज़ाना" वाली बात। इससे तो ’इक़बाल’ फ़िल्म का "आशाएँ खिले दिल की" एक बार और सुन लेना बेहतर है। पुराने गीतों की रीमिक्स की नवोदित परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस ऐल्बम का तीसरा गीत है "ज़ुबि ज़ुबि ज़ुब्बी"। संगीतकार बप्पी लाहिड़ी - गायिका अलिशा चिनॉय के मूल गीत का रीमेक किया रोचक कोहली और सुकृति कक्कर ने। कहना ज़रूरी है कि सुकृति की आवाज़ में अलिशा वाली मादकता के न होने से इस गीत से वह चमक ग़ायब है। ऐल्बम का समापन मीत ब्रदर्स और जसमीन सैन्डलस के गाए "बेबी बेशरम" से होता है। हाल ही में जसमीन ने बिल्कुल ऐसा ही एक गीत फ़िल्म ’मशीन’ में गाया था जिसके बोल थे "ब्रेक एन फ़ेल", जो ’किक’ फ़िल्म के "मुझे यार ना मिले तो मर जावाँ" से मिलता जुलता है। यानी कि नए पैकेट में वही पुरानी दाल। इन चारों में से कोई भी गीत ऐसा नहीं जो फ़िल्म की कहानी को आगे बढ़ाए। कुल मिलाकर भुला देने वाला ऐल्बम!

31 मार्च को ही सलीम-सुलेमान के संगीत में फ़िल्म प्रदर्शित हुई ’पूर्णा’ जो एक बायोपिक है सबसे कम उम्र में माउन्ट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली मलवत पूर्णा की। इस फ़िल्म के गीतों की सबसे अच्छी बात यह है कि कोई भी रीमिक्स संस्करण नहीं है और ऐल्बम में कुल तीन गीत हैं। प्रेरणादायक फ़िल्म होने की वजह से एक गीत "आशाएँ खिले दिल की" जैसा होना लाज़मी है। अरिजीत सिंह की आवाज़ में "कुछ पर्बत हिलाएँ तो बात है" ऐसा ही एक गीत है जिसे अमिताभ भट्टाचार्य के बोलों ने सजाया है। पता नहीं क्यों गीत सुनते हुए के.के की याद आ गई। इसी गीत का एक और संस्करण है सलीम मर्चैन्ट की आवाज़ में। सलीम ने इसमें उम्दा गायकी का परिचय दिया है। पार्श्व में नर्म गीटार की ध्वनियों से गीत और सुन्दर बन पड़ा है। राज पंडित और विशाल ददलानी की आवाज़ों में "है पूरी क़ायनात तुझमें कहीं" में शास्त्रीय संगीत की छाया मिलती है। सॉफ़्ट रॉक के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत और भारतीय वाद्यों के फ़्युज़न से और राज पंडित के शास्त्रीय अंदाज़ में गायकी ने इसे एक ख़ूबसूरत जामा पहनाया है। विशाल ददलानी के सशक्त सहयोग ने भी गीत में चार चाँद लगाया है। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए"। इस कालजयी रचना को फिर से गाना साहस का काम है और अरिजीत सिंह ने इस दर्द भरे गीत को बेहद सुन्दरता से गाया है। सलीम-सुलेमान ने इस गीत का भार अरिजीत पर डाल कर ग़लती नहीं की और अरिजीत ने भी अपना ज़िम्मा निभाया। अपने सीधे सच्चे शास्त्रीय हरकतों से अरिजीत ने इस दर्दीले गीत में जान फूँक दी है।

अप्रैल का महीना शुरु हुआ ’लाली की शादी में लड्डू में दीवाना’ फ़िल्म से। बेगानी शादी में अब्दुल्लाह दीवाना मुहावरे से प्रेरित इस शीर्षक वाले फ़िल्म की कहानी का पार्श्व शादी का है। इसलिए इस फ़िल्म के गीतों के साथ कई तरह के प्रयोग करने का मौक़ा था। फ़िल्म के तीन संगीतकार विपिन पतवा, रेवन्त सिद्धार्थ और अर्को ने इसी की कोशिश की है। सात गीतों वाले ऐल्बम का पहला गीत फ़िल्म का शीर्षक गीत है सुखविन्दर सिंह और साथियों की आवाज़ों में। फ़िल्म की मूड के मुताबिक इस गीत को लिखा है फ़िल्म के निर्देशक मनीष हरिशंकर ने। पंजाबी प्रभाव वाले इस गीत को सुखविन्दर सिंह के श्रेष्ठ गीतों में नहीं गिना जा सकता। के.के की सशक्त आवाज़ में "बेज़ुबाँ" बेहतर नग़मा है। गीटार के जोशिले पीसेस और के.के की दमदार आवाज़ ने गीत में जोश भर दिया है। अंकित तिवारी और अर्को की आवाज़ों में "रिश्ता" एक गंभीर रोमान्टिक गीत है और अंकित तिवारी तो अब पैशन वाले गीतों के राजा बन ही चुके हैं। इस गीत में भी उनका पैशन छलक पड़ा है। "रोग जाने" के दो संस्करण हैं। पहले में पलक मुछाल - राहत फ़तेह अली ख़ान, तो दूसरे में पलक मुछाल - मोहित लालवानी। सुन्दर मुखड़ा और ढेर सारी भारतीय वाद्यों से गीत कर्णप्रिय बना है लेकिन अन्तरों तक पहुँचते पहुँचते हम इसके आकर्षण से बाहर निकल जाते हैं। पता नहीं पलक क्यों श्रीया की तरह गाने की कोशिशें कर रही हैं! मालिनी अवस्थी की आवाज़ में "मानो या ना मानो" तो जैसे ’चाँदनी’ फ़िल्म की "मैं ससुराल नहीं जाऊँगी" जैसी रचना है, लेकिन ऐसी कुछ ख़ास बात नहीं है जिसके बारे में लिखा जाए। ऐल्बम का आख़िरी नग़मा है मोहम्मद इरफ़ान और विपिन पतवा की आवाज़ों में। "नैनो के पोखर" एक दर्द भरा गीत है। जैसा कि कहा जाता है कि दर्द भरे गीत ज़्यादा मीठे लगते हैं, इस गीत के साथ भी यही बात है। बाँसुरी की तानों से सजा यह गीत एक कर्णप्रिय रचना है। कुल मिला कर यह ऐल्बम बुरा नहीं है, पर ज़्यादा रीकॉल वैल्यु भी नहीं है। 7 अप्रैल को एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई ’ए डेथ इन दि गंज’, जो कोनकोना सेन शर्मा निर्देशित एक फ़ेस्टिवल फ़िल्म है। इस फ़िल्म में कोई गीत नहीं है। 14 अप्रैल को प्रदर्शित होने वाली फ़िल्म ’रिश्तों की साँझ’ हिन्दी और हिमाचली, दो भाषाओं में निर्मित फ़िल्म है। पवित्र चारी और मोहित चौहान की आवाज़ों में गौरव गुलेरिआ के संगीत में "पूछे अम्मा मेरी..." एक दिल को छू लेने वाली रचना है जिसमें है इन्तज़ार का दर्द। मोहित की पहाड़ी आवाज़ में यह हिमाचली लोक शैली का गीत दिल को छू लेता है। संगीतकार गौरव गुलेरिआ भी हिमाचल के धरमशाला के रहने वाले हैं, इसलिए इस गीत के संगीत से उसी मिट्टी की ख़ुशबू आ रही है। इस फ़िल्म के बाक़ी गाने इन्टरनेट पर उपलब्ध ना होने की वजह से हम उन पर चर्चा कर पाने में असमर्थ हैं।


अप्रैल की एक चर्चित फ़िल्म रही ’बेगम जान’। अनु मलिक के संगीत का जलवा एक अन्तराल के बाद सुनने को मिला। कौसर मुनीर के बोलों से सजे इस फ़िल्म के गीत कुछ अलग मिज़ाज के ज़रूर हैं। पहला गीत है आशा भोसले की आवाज़ में "प्रेम में तोहरे ऐसी पड़ी मैं पुराना ज़माना नया हो गया" एक ग़ज़लनुमा नग़मा है। माफ़ी चाहता हूँ पर इसे अगर आशा जी की जगह किसी और से गवाया जाता तो और सुन्दर बन पड़ता। आशा जी को पूरा सम्मान देते हुए कहूँगा कि अब उन्हें फ़िल्मी गीतों से संयास ले लेना चाहिए। कम्पोज़िशन की बात करें तो अनु मलिक ने उम्दा काम किया है "मोह मोह के धागे" की तरह। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि यह गीत 1967 की फ़िल्म ’अनीता’ के लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत में मुकेश के गाए गीत "गोरे गोरे चाँद से मुख पर काली काली आँखें हैं" से प्रेरित है? ख़ैर, "प्रेम में तोहरे" का एक और संस्करण है कविता सेठ की आवाज़ में और उनकी अलग और ख़ास अंदाज़ में। राहत फ़तेह अली ख़ान और सोनू निगम की "आज़ादियाँ" में देश विभाजन का दर्द साफ़ झलक पड़ा है। कौसर मुनीर के असरदार बोल रोंगटे खड़े कर देते हैं। शुरुआत में ढोल और शहनाई की ध्वनियाँ गीत के मूड को स्थापित करती हैं और फिर राहत और सोनू की गायकी तो बस लाजवाब है। कल्पना पटवारी और अल्तमश फ़रीदी का गाया "ओ रे कहारो" एक दर्द भरा गीत है जो कोठों पर काम करने वाली लड़कियों की दुर्दशा सुनाता है। इस गीत में 90 के दशक के फ़िल्मी गीतों की जानी पहचानी शैली और स्वरूप सुनाई देती है। ऐल्बम का अन्तिम गीत एक होली गीत है "होली खेले बृज की हर बाला" श्रीया घोषाल और अनमोल मलिक की आवाज़ों में। शास्त्रीय संगीत आधारित यह नृत्य प्रधान गीत निस्संदेह एक अरसे के बाद आने वाले स्तरीय होली गीतों में से एक है। श्रेया की मधुर आवाज़ और अनमोल के रैप शैली के अन्तरे गीत को मज़ेदार बनाते हैं। कुल मिला कर ’बेगम जान’ के गीत हमें निराश नहीं करते, लेकिन अनु मलिक से हमें उम्मीदें इससे अधिक हैं। 

21 अप्रैल को तीन फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। पहली फ़िल्म थी ’नूर’ जिसमें सोनाक्षी सिंहा एक चुलबुली सी लड़की है, जो एक पत्रकार भी है। इस वजह से अमाल मलिक ने पूरी कोशिशें की हैं कि कुछ दिलचस्प गाने इस फ़िल्म के लिए कम्पोज़ करें। बताना ज़रूरी है कि बतौर एकल संगीतकार यह उनकी दूसरी फ़िल्म है। ऐल्बम की शुरुआत अरमान मलिक की ताज़ी आवाज़ में "उफ़ ये नूर" से होती है, जिसमें एक जीवन्त पार्श्व संगीत और बीच बीच में तालियों ने इसे और भी ज़्यादा पेप्पी बना दिया है। दूसरा गीत है "गुलाबी 2.0", जो रफ़ी साहब के गाए "गुलाबी आँखें जो तेरी देखी" गीत का रीमेक है जिसमें कुमार ने अतिरिक्त बोल डाले हैं। अमाल मलिक, तुल्सी कुमार और यश नार्वेकर की मस्ती भरे अंदाज़ ने इस गीत को एक पार्टी गीत की शक्ल दी है। बादशाह का लिखा व स्वरबद्ध किया "मूव योर लक" एक और क्लब नंबर है जिसमें बादशाह के साथ-साथ सोनाक्षी सिंहा और दिलजीत दोसंझ भी स्वर मिलाते हैं। "जिसे कहते प्यार है" भी एक ताज़गी भरा प्रेम गीत है जिसमें नूर को अहसास होता है कि उसे प्यार हो गया है। सुकृति कक्कर की आवाज़ में यह गीत सुकून देता है। अमाल के सादगी भरे इस कम्पोज़िशन में साज़ों से ज़्यादा गायकी पर ज़ोर दिया गया है जिस वजह से इसे सुनना ज़्यादा अच्छा लग रहा है। प्रकृति कक्कर की गायी "कभी कभी यह भी है ज़रूरी" एक उदासी भरा गीत है पर मनोज मुन्तशिर के असरदार बोलों से यह गीत हमें अपनी तरफ़ खींचता है। उचित मात्रा में ऑरकेस्ट्रेशन और परक्युशन और झंकारों के सही उतार-चढ़ाव से गीत और भी ज़्यादा आकर्षक बन पड़ा है। इसमें कोई भी शक़ नहीं कि अमाल मलिक इस दौर के श्रेष्ठ संगीतकार बनने की राह पर चल पड़े हैं। 21 अप्रैल को जारी होने वाली दूसरी फ़िल्म है ’मातृ’ जिसमें संगीतकार हैं पाक़िस्तानी सूफ़ी रॉक बैण्ड - फ़्युज़ोन। फ़िल्म का एकमात्र गीत "ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी" राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में है। फ़िल्म की कहानी के मुताबिक एस. के. ख़लिश का लिखा यह गीत एक माँ के संघर्ष की कहानी बयाँ करती है। कुल 7 मिनट 45 सेकन्ड्स अवधि का यह गीत कुछ समय के बाद उक्ता देने वाला जैसा लगता है। 21 अप्रैल को प्रदर्शित होने वाली तीसरी फ़िल्म थी ’अजब सिंह की गजब कहानी’ जो एक अपाहिज IRS अफ़सर के संघर्ष की कहानी पर बनी फ़िल्म है। फ़िल्म के मुख्य संगीतकार हैं वेद शर्मा, और कुछ और संगीतकारों ने भी एक एक गीत का योगदान दिया है जैसे कि तन्मय पाहवा, यू. वी. निरंजन और पृथ्वी राज सिंहदेव। ऐल्बम में कुल छह गीत हैं जो फ़िल्म की कहानी में फ़िट होते हैं। पहले वेद शर्मा के गीतों की बात करते हैं। उन्हीं का लिखा कृष्णा बेउरा का गाया "रहमनिया मन ही मन रे थम जा तू, विपदा भले ही लाखों आए रे" ऐल्बम का पहला गीत है। हल्की रॉक शैली की छाया तले यह सूफ़ीयाना गीत सुनने में अच्छा लगता है। आशावादी ख़यालों से भरा यह गीत जीवन में हार न मानने की सीख देता है। वेद शर्मा का लिखा व स्वरबद्ध किया दूसरा गीत है शबाब साबरी का गाया "है प्रचण्ड आग आज यह ज़रा तू जान ले" तेज़ रफ़्तार वाला एक और आशावादी जोशिला गीत है। गीत के मूड को देखते हुए इसका ऑरकेस्ट्रेशन भी इसके अनुसार किया गया है। वेद शर्मा का लिखा, स्वरबद्ध किया और उन्हीं का गाया गीत है "ख़ुदा तू ये सुन ले, कहते हालात जो..."। पिछले दो गीतों के बाद यह गीत ऑरकेस्ट्रेशन की दृष्टि से नर्मोनाज़ुक है, लेकिन भाव कम-ज़्यादा वही है। वेद शर्मा के संगीत में अनिन्द्य चक्रवर्ती और वेद शर्मा का लिखा तथा इन दोनों की आवाज़ों में "मतलबी दुनिया बड़ी... शुनले शोन नोय्तो फ़ोट" एक हिन्दी-बांग्ला गीत है जिसका संगीत हार्ड रॉक शैली में निबद्ध है। अनिन्द्य ने बांग्ला बोलों को लिखा व गाया है जबकि वेद ने हिन्दी वाली पंक्तियाँ संभाली है। दो भाषाओं के समावेश से गीत में एक अनोखापन आया है। इस ऐल्बम का अगला गीत है तन्मय पाहवा के संगीत में, संजीव चतुर्वेदी का लिखा व तरन्नुम मलिक का गाया "मेरे ब्लाउज़ का बटन खुला रह गया"। मस्ती भरे अंदाज़ की वजह से गीत लोकप्रिय हुआ है लेकिन इसके बोलों पर ग़ौर करने पर इसे सुनने का भी मन नहीं होता। हमारे फ़िल्मी गीत और कितना नीचे गिर सकते हैं यह भविष्य ही बताएगी। यू. वी. निरंजन के संगीत में राजेश वर्मा का लिखा रोहित अखौरी का गाया "आँख बन्द करके लोगों की ना सुन के, आसमाँ पे आज उड़ा है एक परिन्दा" रोहित की कमाल ख़ान जैसी आवाज़ की वजह से आकर्षक बन पड़ा है, पर गीत का भाव फिर एक बार आशावादी हौसला अफ़ज़ाई करने वाला है। ऐल्बम का अन्तिम गीत सन्त कबीर की एक भक्ति रचना है जिसे स्वरबद्ध किया व गाया है पृथ्वी राज सिंहदेव ने। बस हारमोनिअम और तबले ्के सुरों और तालों में निबद्ध यह भजन "ना लेना ना देना मगन रहना, भजन करना रे भजन करना" निस्संदेह इस ऐलब्म की श्रेष्ठ रचना है।

अप्रैल माह की अन्तिम फ़िल्म आई ’बाहूबली 2’। 28 अप्रैल को प्रदर्शित इस महत्वाकांक्षी फ़िल्म का संगीत तैयार किया एम. एम. क्रीम ने। अक्सर यह देखा गया है कि दक्षिण के गीतों के हिन्दी संस्करण हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाते। लेकिन इस फ़िल्म के संगीत के साथ एम. एम. क्रीम ने जो प्रयोग किए हैं, उससे भारत के हर क्षेत्र के श्रोताओं को अपनी तरफ़ खींचने का प्रबन्ध हुआ है। मनोज मुन्तशिर के हिन्दी बोलों ने भी दक्षिणी संगीत को उचित हिन्दी जामा पहनाया है। पाँच गीतों वाले इस ऐल्बम का पहला गीत है फ़िल्म का शीर्षक गीत "जियो रे बाहूबली"। दलेर मेहन्दी, संजीव चिम्मल्गी और राम्या बेहरा का गाया यह गीत ऐल्बम का मूड सेट कर देता है। एम. एम. क्रीम वायलिन के लिए जाने जाते हैं और इस गीत में भी वायलिन का अद्भुत प्रयोग सुनाई देता है। "वीरों के वीर आ" एक रोमान्टिक गीत है जिसमें अदिति पॉल और दीपू की आवाज़ों के बीच बीच में परक्युशन का सुन्दर समन्वय है। एक अरसे के बाद मधुश्री की मधुर आवाज़ में "कान्हा सो जा ज़रा" को सुनना एक सुखद अनुभूति है। शास्त्रीय शैली में स्वरबद्ध यह गतिमय लोरी लोरी से ज़्यादा होली गीत प्रतीत होता है, लेकिन बाँसुरी, वीणा और मृदंग की धुनों से सुसज्जित यह गीत इतना कर्णप्रिय है कि गीत के शुरु से ही मन मोह लेता है। कोरस का भी सुन्दर योगदान रहा इस गीत में। कैलाश खेर की खुली हुई आवाज़ में "जय जयकारा" को सुनना आनन्ददायक है। इस गीत की ध्वनियाँ वाकई मनमोहक है। शीर्षक गीत ही की तरह यह गीत भी अचानक ख़त्म हो जाता है। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "शिवम" को गाया है एम. एम. क्रीम के साहबज़ादे काल भैरव ने। धीमी लय वाली यह रचना गीत कम और मंत्रोच्चारण ज़्यादा प्रतीत होता है। कुल मिला कर ’बाहूबली’ का गीत-संगीत आकर्षक है। मनोज मुन्तशिर और एम. एम. क्रीम को थ्री चियर्स!


तो मित्रों, यह थी मार्च और अप्रैल के महीनों में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्मों के गीत-संगीत की समीक्षा। आशा है आपको पसन्द आई होगी।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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