गुरुवार, 30 मार्च 2017

गीत अतीत 06 || हर गीत की एक कहानी होती है || हौले हौले || साहिल सुल्तानपुरी


Geet Ateet 06
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Haule Haule 
Sahil Sultanpuri - Lyricist

हरिहरन के स्वरबद्ध किये और साहिल सुल्तानपुरी के लिखे इस गैर फ़िल्मी गीत को गाया है साधना जेजुरिकर ने, जिसका नाम है "हौले हौले", आईये आज सुनें इस गीत के गीतकार साहिल सुल्तानपुरी की जुबानी, इस नए गीत के बनने की कहानी, प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



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सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -

रविवार, 26 मार्च 2017

फाल्गुनी गीत : SWARGOSHTHI – 310 : SONGS OF FAGUN




स्वरगोष्ठी – 310 में आज


फागुन के रंग – 2 : राग काफी में कुछ और गीत


पण्डित जसराज से सुनिए -“परमानन्द प्रभु चतुर ग्वालिनी तज रज तक मोरी जाए बलाए...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखला “फागुन के रंग” की दूसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम आपसे फाल्गुनी संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ऋतु के अनुकूल गायन-वादन का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। इस ऋतु में राग बसन्त और राग बहार आदि का गायन-वादन किया जाता है। होलिका दहन के साथ ही रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। दो सप्ताह पूर्व ही हमने हर्षोल्लास से होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों का पर्व मनाया था। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। पिछले अंक में हमने इस राग में ठुमरी और टप्पा प्रस्तुत किया था। आज के अंक में हम राग काफी में खयाल, तराना और भजन प्रस्तुत करेंगे। पहले विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के मनमोहक स्वर में एक द्रुत खयाल, उसके बाद राग काफी का एक तराना पण्डित कुमार गन्धर्व के दिव्य स्वरों में और अन्त में पण्डित जसराज की आवाज़ में राग काफी में पिरोया एक भक्तिगीत भी प्रस्तुत करेंगे। 



अश्विनी भिड़े  देशपाण्डे
पिछले अंक में हमने राग काफी के स्वरूप पर चर्चा करते हुए निवेदन किया था कि राग काफी, इसी नाम से पहचाने जाने वाले काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी में धमार गायकी से लेकर खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, टप्पा और भजन आदि रचनाएँ आकर्षक लगती हैं। चंचल प्रकृति के इस राग में निबद्ध रचनाओं के माध्यम से उल्लास और उमंग का भाव सहज ही सृजित किया जा सकता है। ठुमरियों में प्रायः मिश्र काफी का रूप मिलता है। रस और भाव में विविधता के लिए राग काफी के स्वर-संगतियों में प्रयोग की अपार सम्भावनाएँ हैं। राग का ऐसा ही एक रूप आज के इस अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। राग के इस रूप को काफी कान्हड़ा के नाम से पहचाना जाता है। राग काफी कान्हड़ा में आरोह के स्वर काफी के अनुसार प्रयोग होते है, जबकि अवरोह के स्वर कान्हड़ा अंग में प्रयोग किए जाते हैं। राग काफी की प्रवृत्ति चंचल होती है और कान्हड़ा की प्रवृत्ति गम्भीर होती है। राग काफी कान्हड़ा में परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न करने का प्रयास होता है। अब हम आपको राग काफी कान्हड़ा में आपको द्रुत खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे।

 डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया था। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग काफी कान्हड़ा का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।

राग काफी कान्हड़ा : ‘कान्ह कुँवर के कर-पल्लव पर मानो गोवर्धन नृत्य करे...’ : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे



पण्डित कुमार गन्धर्व 
 लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। गायन की सभी विधाओं में तराना एक ऐसी विधा है जिसमें स्पष्ट सार्थक शब्द नहीं होते। इसलिए रागानुकूल परिवेश रचने में स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अब हम आपको राग काफी का एक तराना सुनवा रहे है, जिसे भारतीय संगीत जगत के शीर्षस्थ साधक पण्डित कुमार गन्धर्व ने स्वर दिया है। कुमार गन्धर्व भारतीय संगीत की एक नई प्रवृत्ति और नई प्रक्रिया के पहले कलासाधक थे। घरानों की पारम्परिक गायकी की अनेक शताब्दी पुरानी जो प्रथा थी उसमें संगीत तो जीवित रहता था, किन्तु संगीतकार के व्यक्तित्व और प्रतिभा का विसर्जन हो जाता था। कुमार गन्धर्व ने पारम्परिक संगीत के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत ही कलासाधक की सम्भावना को स्थापित किया। 8 अप्रैल, 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत-प्रेमी परिवार में एक बालक का जन्म हुआ था, जिसका माता-पिता का रखा नाम तो था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत-जगत ने उसे कुमार गन्धर्व के नाम से पहचाना। कुमार गन्धर्व ने जब संगीत-जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर-संवेदना से एकाकी ही संघर्षरत हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन-शैली विकसित की, जो हमें भक्ति-पदों के आत्म-विस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती थी। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण-प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। कुमार गन्धर्व ने अपने समय में गायकी की बँधी-बँधाई लीक से अलग हट कर अपनी एक भिन्न शैली का विकास किया। 1947 से 1952 तक वे फेफड़े के रोग से ग्रसित हो गए। चिकित्सकों ने घोषित कर दिया की स्वस्थ हो जाने पर भी वे गायन नहीं कर सकेंगे, किन्तु अपनी साधना और दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर संगीत-जगत को चमत्कृत करते हुए संगीत-मंचों पर पुनर्प्रतिष्ठित हुए। अपनी अस्वस्थता के दौरान कुमार गन्धर्व, मालवा अंचल के ग्राम्य-गीतों का संकलन और प्राचीन भक्त-कवियों की विस्मृत हो रही रचनाओं को पुनर्जीवन देने में संलग्न रहे। आदिनाथ, सूर, मीरा, कबीर आदि कवियों की रचनाओं को उन्होने जन-जन का गीत बनाया। वे परम्परा और प्रयोग, दोनों के तनाव के बीच अपने संगीत का सृजन करते रहे। आज के अंक में हम आपको इस महान संगीतज्ञ के स्वरों में राग काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। आप यह तराना सुनिए और राग काफी की प्रत्यक्ष रसानुभूति कीजिए।
राग काफी : तीनताल में निबद्ध तराना : पण्डित कुमार गन्धर्व



पण्डित जसराज
 खयाल और तराना के बाद अब हम आपको राग काफी में एक भजन सुनवाते है। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज। जसराज जी का जन्म 28 जनवरी 1930 को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पण्डित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। पण्डित जसराज को संगीत के संस्कार अपने परिवार से मिले। जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। उनके बाद परिवार के भरण-पोषण का दायित्व जसराज जी के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पण्डित मणिराम जी पर आ गया। इन्हीं की छत्र-छाया में जसराज जी की संगीत शिक्षा आगे बढ़ी। मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परन्तु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी हेय दृष्टि से देखा जाता था। संगति कलाकारों के साथ इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में दक्ष नहीं हो जाते, वे अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवन्त सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत को आत्मसात किया। पण्डित जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की खयाल शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के मार्गदर्शन में हवेली संगीत विधा पर व्यापक अनुसन्धान कर अनेक नवीन बन्दिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन पद्यति पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में दो भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पण्डित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। आज के अंक में हम पण्डित जसराज के द्वारा राग काफी के स्वरों में पिरोया एक भक्तिगीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे हमने उनके अल्बम ‘बिहरत रंग लाल गिरधारी’ से लिया है। आप भक्तिरस से अभिसिंचित इस गीत का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग काफी : भजन : ‘कहा करूँ वैकुण्ठ ही जाए...’ : पण्डित जसराज




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिख भेजिए।

3 – यह किस महान गायक की आवाज़ है? 
आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 1 अप्रैल, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 312वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 308वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वाद्य संगीत की राग आधारित रचना का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, वाद्य – गिटार

इस अंक के तीनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीन में से दो प्रश्न का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी है; हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। इन सभी चार प्रतिभागियों को 2-2 अंक मिलते हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने एक प्रश्न का ही सही उत्तर दिया है; अतः इन्हें एक अंक ही मिलेगा। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला ‘फागुन के रंग’ का यह दूसरा अंक था। इस अंक में भी हमने राग काफी में प्रयोग खयाल, तराना और भजन की रचनाओं की चर्चा की है। इस श्रृंखला में हम बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जो अगले अंक में भी जारी रहेगा। आगामी अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। आगामे श्रृंखला के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 25 मार्च 2017

चित्रकथा - 11: 1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण


अंक - 11

1997 की तीन फ़िल्मों में तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण

अपने देस में हम हैं परदेसी कोई ना पहचाने...



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 

हिन्दी फ़िल्मों में तीसरे लिंग का चित्रण दशकों से होता आया है। अफ़सोस की बात है कि ऐसे चरित्रों को सस्ती कॉमेडी के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं या फिर घृणा की नज़रों से देखा जाता है। बार-बार वही घिसा-पिटा रूढ़ीबद्ध रूप दिखाया गया है। फ़िल्मी गीतों में भी उनका मज़ाक उड़ाया गया है। कई बार तो सामान्य चरित्र किन्नर/हिजड़े जैसा मेक-अप लेकर दर्शकों को हँसाने की कोशिशें करते रहे हैं। समय के साथ-साथ इस तरह का बेहुदा हास्य कम हुआ है और तीसरे लिंग का मज़ाक उड़ाया जाना फ़िल्मों में कम हुआ है। पिछले कुछ दशकों में कुछ संवेदनशील फ़िल्मकारों ने तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण अपनी फ़िल्मों में किया है, जिनकी वजह से आज हमारे समाज में तीसरे लिंग की स्वीकृति को काफ़ी हद तक बढ़ावा मिला है। आइए आज ’चित्रकथा’ में चर्चा करें 1997 में प्रदर्शित तीन फ़िल्मों की जिनमें हमें मिलता है तीसरे लिंग का सकारात्मक चित्रण।




स दुनिया में यह रवायत है कि जो संख्यलघु में आता है, उसे दुनिया अलग-थलग कर देती है। तीसरे
लिंग के व्यक्तियों के साथ भी यही हुआ। सामाजिक स्वीकृति न मिलने की वजह से ये लोग अपनी अलग की समुदाय बना ली। हमारी फ़िल्मों की कहानियों में अक्सर तीसरे लिंग को पैसा वसूली करते हुए, शादी-व्याह और बच्चे के जनम पर नाचते-गाते हुए या फिर किसी हास्यास्पद तरीके से दिखाया जाता है। लेकिन कुछ संवेदनशील फ़िल्मकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने इस विषय को गंभीरता और संवेदनशीलता से अपनी फ़िल्मों में साकार किया। आज बातें 1997 की तीन ऐसी ही फ़िल्मों की। सबसे पहले बातें फ़िल्म ’तमन्ना’ और निर्देशक महेश भट्ट की। इस फ़िल्म में हिजड़ा-संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का चित्रण किया गया है। यह फ़िल्म सहानुभूति और सकारात्मक नज़रिए से देखती है तीसरे लिंग को, और इस फ़िल्म ने ऐसी सीमाएँ पार की जो इससे पहले भारतीय सिनेमा ने नहीं की थी। किसी भी फ़िल्मकार ने इससे पहले इस तरह के विषय पर फ़िल्म बनाने की नहीं सोची थी। ’तमन्ना’ एक सत्य घटना और सत्य कहानी पर आधारित फ़िल्म है। कहानी परेश रावल अभिनीत हिजड़ा चरित्र पर केन्द्रित है और इसमें इस समुदाय द्वारा झेले जाने वाले तमाम समस्याओं पर रोशनी डाली गई है। 1975 के पार्श्व की यह कहानी तमन्ना नामक एक लड़की की कहानी है जिसे टिकू नामक हिजड़ा पाल पोस कर बड़ा करता है। टिकू औरतों जैसी पोशाक नहीं पहनता और ना ही हिजड़ा समुदाय में रहता है, बल्कि वो पुरुषों से भरे समाज में ही रहता है। इस तरह से महेश भट्ट ने यह साबित करने की कोशिश की कि तीसरे लिंग के लोग भी ’साधारण’ लोगों के बीच रह सकते हैं। टिकू अपने सबसे अच्छे दोस्त सलीम के साथ रहता है जिसे वो भाई कह कर बुलाता है। टिकू और सलीम के बीच किसी तरह का यौन संबंध ना दिखा कर भट्ट साहब ने यह सिद्ध किया कि आम तौर पर हिजड़ों द्वारा किसी पुरुष को अपने पास रखने के पीछे यौन संबंध होने का कारण समझने का कोई वजूद नहीं है। टिकू एक भावुक इंसान है और कई बार उसका नारीत्व उभर कर सामने आता है। उदाहरण के तौर पर टिकू तमन्ना को एक पिता की तरह नहीं बल्कि माँ की तरह पालता है। एक दृश्य में टिकू नन्ही तमन्ना के लिए लड़कियों की तरह नृत्य करता दिखाई देता है। वैसे तमन्ना टिकू को अब्बु कह कर ही बुलाती है। टिकू एक मेक-अप आर्टिस्ट है और वो अपने समुदाय के दूसरे लोगों की तरह शादी-ब्याह या बच्चे के जनम पर पैसे माँगने नहीं जाता और ना ही वेश्यावृत्ति करता है। बस फ़िल्म के अन्त में टिकू को आर्थिक मजबूरी के कारण हिजड़े के पारम्परिक रूप में सज कर नृत्य करना पड़ता है।

फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण दृश्य है जब तमन्ना को पता चलता है कि टिकू एक हिजड़ा है। हिजड़ों के प्रति जो आम सामाजिक मान्यताएँ हैं, वो सब तमन्ना के मन में भी घर की हुई है। उसे यह पता है कि अगर हिजड़ा किसी को आशिर्वाद दे सकता है तो वो अभिषाप भी दे सकता है। यह समाज मानता है कि हिजड़ों के अभिषाप से व्यक्ति बांझ या नामर्द बन सकता है। ऐसी मानसिकता की वजह से जब तमन्ना को टिकू के बारे में पता चला तो उसके मन में टिकू के लिए घृणा उत्पन्न हुई और वो भूल गई कि किस तरह से लाड़-प्यार से टिकू ने उसे पाल-पोस कर बड़ा किया है। हिजड़े की जो छवि तमन्ना के दिल में बसी हुई है, उससे वो बाहर नहीं निकल सकी। महेश भट्ट ने इस फ़िल्म में हिजड़ों के प्रचलित रूप को दर्शाने के लिए हिजड़ों के एक दल को रंगीन साड़ियों और ज़ेवरों में तालियाँ बजाते, नृत्य करते दिखाया है, और साथ में यह भी दिखाया है कि टिकू इन जैसा नहीं है। फ़िल्म में यह भी दिखाया गया है कि बाकी हिजड़े किस तरह से टिकू का मज़ाक उड़ाते हैं यह कहते हुए कि आम समाज में रहने से वो सामान्य इंसान नहीं बन जाएगा और ना ही वो अपने लैंगिक भिन्नता वाले वजूद को भूला या मिटा पाएगा। महेश भट्ट ने हिजड़ों के प्रति रूढ़ीवादी नज़रिए को तोड़ने का साहस किया। भट्ट साहब ने समाज को दिखाया कि एक हिजड़ा एक अच्छा अभिभावक और एक अच्छा मित्र भी हो सकता है, और वो एक बच्चे को पाल पोस कर बड़ा कर सकता है। भले वो ख़ुद गर्भ धारण नहीं कर सकते पर प्यार लुटाने की क्षमता रखते हैं।

1997 में ही अमोल पालेकर लेकर आए ’दाएरा’ जो एक सुन्दर कहानी पर बनी फ़िल्म थी जिसमें प्रेम,
वासना और लिंग को बड़े सुन्दर तरीके से उभारा गया। पालेकर साहब के साहसिक और समझ की दाद देनी पड़ेगी कि तीसरे लिंग का इतना सुन्दर चित्रण इस फ़िल्म में उन्होंने किया। स्वर्गीय निर्मल पाण्डेय ने इस चरित्र को इतनी सरलता से उभारा कि फ़िल्म के अन्त तक आपके मन में उस चरित्र के लिए भावनाएँ जाग उठेंगी। ’दाएरा’ हमें एक भावुक यात्रा पर ले जाती है क्योंकि इस फ़िल्म के तमाम चरित्र भी एक जटिल यात्रा के सहयात्री होते हैं जो पारम्परिक लैंगिकता, सामाजिक रवैये और प्रचलित फ़िल्मी परम्परा को धराशायी कर देते हैं। इस फ़िल्म के लिए अमोल पालेकर को कई पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म की कहानी एक अभिनेता (निर्मल पाण्डे) जो एक तीसरे लिंग का व्यक्ति है। एक रात वो एक लड़की (सोनाली कुलकर्णी) को बचाता है जिसका शादी से पहले अपहरण और बलात्कार हो जाता है। आगे की कहानी इन दोनों के संबंध के इर्द-गिर्द घूमती है। मानव लैंगिकता पर इस फ़िल्म की पहुँच सशक्त है और नारीशक्ति को सकारात्मक दृष्टि से दिखाया गया है। और तो और यह फ़िल्म उन अल्पसंख्यक लोगों के अधिकारों का भी मंथन करती है जो समाज के मुख्यधारा का अंग नहीं हैं, जैसे कि समलैंगिक स्त्री-पुरुष। यह फ़िल्म ऐसे लोगों के मन की गहराई तक जाता है जिन्हें इस समाज से सिर्फ़ तिरस्कार ही मिलते हैं बिना कोई गुनाह किए।

1997 में तो तीसरे लिंग पर आधारित सकारात्मक फ़िल्मों की कतार ही लग गई थी। ’तमन्ना’ और
’दाएरा’ के बाद इसी वर्ष प्रदर्शित हुई ’दर्मियाँ’। कल्पना लाजमी एक ऐसी फ़िल्मकार हैं जिन्होंने समय समय पर ऐसे ऐसे मुद्दों पर फ़िल्में बनाई हैं जिन मुद्दों पर दूसरे फ़िल्मकार फ़िल्म बनाने से पहले सौ बार सोचते होंगे। ’दर्मियाँ’ में उन्होंने एक पैदाइशी हिजड़ा लड़के की कहानी को केन्द्र में रख कर एक ऐसी फ़िल्म बनाई है जो सीधे दिल को छू जाती है। ’दर्मियाँ’ कहानी है सिंगिंग् स्टार ज़ीनत बेगम (किरोन खेर) की। यह 40 के दशक का पार्श्व है। इन्डस्ट्री की सबसे महँगी स्टार होने के अलावा वो एक नाजायज़ रिश्ते से उत्पन्न एक बच्चे की माँ भी है। इम्मी नाम का वह बच्चा जन्म से हिजड़ा है। शर्म से कहिए या स्टार होने की वजह से कहिए, ज़ीनत समाज के सामने यह स्वीकार नहीं करती कि इम्मी उसका बेटा है, वो उसे अपना भाई कह कर दुनिया के सामने पेश करती है। नन्हे इम्मी को इस बात का पता है कि ज़ीनत उसकी बड़ी बहन नहीं बल्कि माँ है पर वो किसी से कुछ नहीं कहता। वो अपनी नानी को ही माँ कहता है। ज़ीनत और इम्मी एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। तभी तो जब उस इलाके की हिजड़ा समुदाय की नेत्री चम्पा (सायाजी शिन्डे) इम्मी को उसे सौंप देने के लिए ज़ीनत और उसकी माँ पर ज़ोर डालती है तो ज़ीनत उसे धक्के मार कर घर से बाहर निकाल देती है। इम्मी भी उसके साथ नहीं जाना चाहता। जब चम्पा कहती है कि एक हिजड़ा केवल अपने समुदाय में ही इज़्ज़त से जी सकता है और ज़ीनत के साथ रहने पर इम्मी कहीं का नहीं रहेगा, तब ज़ीनत यह स्वीकारने से भी मना कर देती है कि उसका बेटा हिजड़ा है। नन्हे इम्मी के मन में अपने वजूद को लेकर कश्मकश चलती रहती है। दिन गुज़रते जाते हैं, इम्मी एक युवक (आरिफ़ ज़कारिया) में परिवर्तित होता है और वो ज़ीनत के साथ शूटिंग् पे जाता है, उसके साथ-साथ रहता है। ज़ीनत बेगम शोहरत और कामयाबी की बुलन्दी पर पहुँचती है, उसे एक युवा अभिनेता इन्दर कुमार भल्ला (शहबाज़ ख़ान) से प्यार हो जाता है, पर समय बदलते देर नहीं लगती। ज़ीनत का करियर ढलान पर आ जाता है, और इन्दर कुमार भी एक नई अदाकारा चित्रा (तब्बु) से प्यार करने लगता है। ज़ीनत अपने आप को शराब और जुए में डुबो कर सब कुछ हार जाती है। उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। ज़ीनत के बरबाद हो जाने पर उधर इम्मी के साथ भी लोग बदतमीज़ी से पेश आते, उसे उसके वजूद को लेकर भला-बुरा कहते। अपने और अपनी माँ का पेट पालने के लिए इम्मी को आख़िर चम्पा के पास जाना पड़ता है। हिजड़े का पोशाक पहन कर इम्मी भी नाचता है, और जब एक रात वो एक वेश्या बन कर किसी अमीर आदमी के घर जाता है, तब वहाँ मौजूद उस आदमी के दोस्त लोग उसका बलात्कर कर उसे ज़ख़्मी बना देते हैं। इम्मी चम्पा के वहाँ से भाग जाता है। वो समझ जाता है कि वो ना आम समाज में जी सकता है और ना ही हिजड़ा समाज में। 

घर की तरफ़ लौटते हुए उसे वीराने में एक नवजात शिशु मिलता है, जिसे वो घर ले आता है और ज़ीनत
को दिखाता है। मानसिक संतुलन खोने की वजह से ज़ीनत उस बच्चे को नन्हा इम्मी समझती है और उसके लिंग को देख कर चिल्ला-चिल्ला कर कहती है कि उसका इम्मी हिजड़ा नहीं है, उसका इम्मी हिजड़ा नहीं है। खुशी से वो नाचने लगती है। बरसों से एक हिजड़ा को जन्म देने का जो दर्द ज़ीनत के मन में पलता रहा है, वह बाहर आ जाता है। इम्मी को भी उस बच्चे में अपने जीने का मक़सद नज़र आता है। उसका नाम वो मुराद रखता है। उसे पाल पोस कर बड़ा करना ही इम्मी के जीवन का मकसद बन जाता है। पर समाज को यह भी मनज़ूर कहाँ? जैसे ही चम्पा को इसका पता चलता है, वो बच्चे को चुरा कर ले जाती है और उसे हिजड़ा बनाने का अनुष्ठान शुरु कर देती है। लेकिन ऐन वक़्त पर इम्मी वहाँ पहुँच जाता है और बच्चे को बचा लेता है। साथ ही पहली बार एक हिजड़े की तरह चम्पा को बद-दुआ देता है कि "मैं एक पैदाइशी हिजड़े की ताक़त से तुझे बद दुआ देता हूँ चम्पा कि तू हर जनम हिजड़ा ही जन्मेगी"। यह सुन कर चम्पा टूट जाती है, विध्वस्त हो जाती है और चीख उठती है यह कहते हुए, "अपनी काली ज़ुबान से फिर हिजड़ा पैदा होने की बद-दुआ मत दे मुझे। एक बार हिजड़ा होके बड़ी मुश्किल से कटी है यह ज़िन्दगी, नफ़रत की कड़वी घूंट पी के, सबसे लड़ के, अपने आप जैसे तैसे ज़िन्दा रही हूँ मैं, फिर से हिजड़ा बनने की ताकत नहीं है मुझमें, मुझे हिजड़ा बनना नहीं है, मुझे हिजड़ा बनना नहीं है।" उधर इम्मी को समझ आ जाती है कि उसके लिए उस बच्चे को पालना नामुमकिन है। और यह भी समझ जाता है कि वो अब ना तो आम समाज का है और ना ही हिजड़ा समाज का। वो उस बच्चे को लेकर अपने जैविक पिता के जायज़ संतान, यानी अपने भाई के पास जाता है, पर वो उस बच्चे को नहीं अपनाता और उसे अपमानित कर बाहर निकाल देता है। तब वो आख़िरी उम्मीद के साथ इन्दर कुमार और चित्रा के पास जाते हैं। नर्म दिल और ज़ीनत को इज़्ज़त करने वाली चित्रा से इम्मी कहता है, "देखिए चित्रा जी, इस बच्चे की तरफ़, इसे भी जीने का हक़ है ना? जब मुझे यह बच्चा मिला, तब मैंने इसमें अपने आप को देखा, पर अब आपको इसे मुझसे दूर ही रखना है। मैं एक पैदाइशी हिजड़ा हूँ पता है आपको? मुराद मेरे जैसा नहीं है चित्रा जी, वो मेरे जैसा नहीं है। मुझे तो हमेशा से बस यही सिखाया गया था कि एक हिजड़ा सबसे अलग होता है, वो कभी बाकियों की तरह ज़िन्दगी नहीं गुज़ार सकता।" आरिफ़ ज़कारिया के जानदार और अद्वितीय अभिनय ने इस सीन को ऐसा अनजाम दिया है कि कोई भी दर्शक अपनी आँसू नहीं रोक सकता। चित्रा इम्मी से कहती है कि वो और इन्दर मिल कर इम्मी और ज़ीनत की ज़िन्दगी को बसा देंगे। जवाब में इम्मी कहता है, "मेरी ज़िन्दगी अब कोई मायने नहीं रखती चित्रा जी, मैं तो बस यह चाहता हूँ कि मुराद को ज़िन्दगी में वो तमाम ख़ुशियाँ हासिल हो जो मुझे कभी ना मिल पायी। पता है एक हिजड़े की ज़िन्दगी होती ही मनहूस है चित्रा जी। आपा को मेरे पैदा होते ही हिजड़ों को दे देना चाहिए था, पर अब ना तो मेरी जगह इस दुनिया में है, न ही हिजड़ों की दुनिया में। दोनों के दर्मियाँ हूँ मैं! दोनों के दर्मियाँ हूँ मैं!" इन्दर कुमार के ना करने की बावजूद चित्रा बच्चे को अपना लेती है। इम्मी वहाँ से चला जाता है यह कहते हुए कि वो चित्रा की ज़िन्दगी में फिर कभी नहीं आएगा। घर वापस आकर वो ज़हर पी लेता है अपनी माँ को भी पिला देता है। अन्तिम दृश्य में इम्मी ज़ीनत से (जिसे वो ज़िन्दगी भर आपा कहता आया है) कहता है, "हम आप से बहुत प्यार करते हैं अम्मी जान"! ज़ीनत के मुंह से निकलता है "मेरा बेटा!" चारों तरफ़ ख़ामोशी। दोनों चले गए हमेशा के लिए।

’दर्मियाँ’ एक ऐसी फ़िल्म है जिसे देख कर दिल उदास हो जाता है, तीसरे लिंग के लोगों के लिए मन सहानुभूति से भर उठता है। कल्पना लाजमी ने हिजरा समाज और फ़िल्म के मुख्य पात्र इम्मी का जो चित्र प्रस्तुत किया है, उससे हिजड़ों के प्रति जो आमतौर पर दुर्व्यवहार होता आया है, निस्सन्देह लोगों के दिलों में उनके लिए आदर ना सही पर सहानुभूति ज़रूर उत्पन्न होगी। ’दर्मियाँ’ में जावेद अख़्तर ने बेहद दिल को छू लेने वाला गीत लिखा है जो फ़िल्म का सार भी है और तीसरे लिंग के लोगों के दिल की पुकार भी। भूपेन हज़ारिका के संगीत और आवाज़ में यह गीत दिल को चीर कर रख देता है। गीत के बोल पेश कर रहे हैं...

भाग-1:

(दृश्य: दोस्तों द्वारा चिढ़ाने और चम्पा के डराने के बाद बालक इम्मी अपनी आपा (हक़ीक़त में माँ) के गोदी में सर छुपा कर रो रहा है। और माँ लाचार है, उसके पास कोई जवाब नहीं, किसी से कुछ नहीं कह सकती। अपने बेटे को बेटा नहीं कह सकती।)

कैसा ग़म है क्या मजबूरी है, पास है जो उनसे भी दूरी है
दिल यूं धड़के जैसे कोई गूंगा बोलना चाहे, लेकिन सब हैं अनजाने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-2:

(दृश्य: मानसिक रूप से विध्वस्त ज़ीनत अपने बहनोई से यह चुनौती ले लेती है कि उसका बेटा हिजड़ा नहीं है, और अपने बात को साबित करने के लिए वो एक वेश्या लड़की को अपने बेटे के कमरे में भेज देती है। वेश्या को जैसे ही पता चलता है कि इम्मी हिजड़ा है, वो उसका अपमान कर चली जाती है। युवा इम्मी अपनी माँ के पास आकर रोने लगता है।)

कोई बता दे हम क्यों ज़िन्दा हैं, हम क्यों ख़ुद से भी शर्मिन्दा हैं
अपनी ही आँखों से गिरे हैं बनके हम एक आँसू, माने कोई या नहीं माने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-3:

(दृश्य: बलात्कार से ज़ख़्मी होकर हिजड़ा समाज को हमेशा के लिए छोड़ आते समय जब मौत के अलावा इम्मी के लिए कुछ और नहीं बचा, तभी उसे एक अनाथ शिशु मिला, जिसे गोद में लेकर उसमें उसे अपने जीने का बहाना दिखा।)

कोई तो जीने का बहाना हो, कोई वादा हो जो निभाना हो
कोई सफ़र कोई तो रस्ता कोई तो मंज़िल हो, सुन ले ऐ दिल दीवाने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

भाग-4:

(दृश्य: अन्तिम दृश्य में ख़ुद ज़हर पी कर अपनी माँ को ज़हर पिला रहा है इम्मी।)

सोचा है अब दूर चले जाएँ, अपने सपनों की दुनिया पाएँ
उस दुनिया में प्यार के फूल और ख़ुशियों के मोती हैं जो न दिए इस दुनिया ने
अपने देस में हम हैं परदेसी, कोई न पहचाने
दुनिया परायी लोग यहाँ बेगाने
दिल पर जो बीते वो दिल ही जाने

1997 के तीन फ़िल्मों की चर्चा हमने की। ये फ़िल्में हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्यों हम इतने उदासीन हैं तीसरे लिंग के प्रति? क्यों हम उनका सामाजिक तिरस्कार करते हैं? ईश्वर के लिए सभी जीव-जन्तु समान हैं, जब हम जानवरों से प्यार कर सकते हैं, तो ये तो इंसान हैं हमारी आपकी तरह। क्या हम इन्हें थोड़ा सा प्यार, थोड़ी सी स्वीकृति नहीं दे सकते? क्या यह वाक़ई इतना कठिन है? मु तो नहीं लगता, और आपको?


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में हमने "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" गीत के इतिहास से आपको अवगत करवाया था। हमारी एक पाठिका काव्या सरिता जी ने इस गीत के हमारे दिए बोलों में एक ग़लती ढूंढ़ निकाला और हमें सूचित किया। हमने इस ग़ौर किया और अपने आलेख में सुधार कर ली। काव्या जी को हमारा धन्यवाद। आप सभी इतने मनोयोग से हमारा आलेख पढ़ते हैं, यह देख कर हमें बेहद ख़ुशी हुई। हमारे एक और नियमित पाठक श्री पंकज मुकेश ने टिप्पणी की है - "प्रस्तुत लेख द्वारा आगामी शहीद दिवस 23 मार्च 2017 पर देश के तीन वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि है। अमर शहीद!!!" बिल्कुल सही कहा आपने पंकज जी। और इस अंक की अब तक की कुल रीडरशिप 165 है। आगे भी आप सब बने रहिए ’चित्रकथा’ के साथ। धन्यवाद!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

गीत अतीत 05 || हर गीत की एक कहानी होती है || सनशाईन || अनुराग मोहन ||


Geet Ateet 05
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Sunshine
Anurag Mohn- Singer & Composer

आज के गैर फ़िल्मी गीत की बारी, गायक संगीतकार अनुराग मोहन सुना रहे हैं अपने नए गीत "सनशाईन" के बनने की दिलचस्प कहानी, इस गीत को स्वरबद्ध किया है खुद अनुराग ने और शब्द लिखे हैं अमित घरावी और श्रद्धा भिलावे ने, प्ले पर क्लिक करें और आनंद लें....



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -

गुरुवार, 23 मार्च 2017

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में.. मादर-ए-वतन से दूर होने के ज़फ़र के दर्द को हबीब की आवाज़ ने कुछ यूँ उभारा

महफ़िल ए कहकशाँ 20


बहादुर शाह ज़फ़र 

दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की लिखी मशहूर गज़ल "लगता नहीं जी मेरा उजड़े दयार में" हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में| 


मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी



रविवार, 19 मार्च 2017

राग काफी : SWARGOSHTHI – 309 : RAG KAFI




स्वरगोष्ठी – 309 में आज

फागुन के रंग – 1 : राग काफी गाने-बजाने का परिवेश

विदुषी परवीन सुलताना से सुनिए -‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की एक नई श्रृंखला “फागुन के रंग” के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम आपसे फाल्गुनी संगीत पर चर्चा करेंगे। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ऋतु के अनुकूल गायन-वादन का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। इस ऋतु में राग बसन्त और राग बहार आदि का गायन-वादन किया जाता है। होलिका दहन के साथ ही रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। पिछले सप्ताह ही हमने हर्षोल्लास से होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों का पर्व मनाया है। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से होली के रस-रंग को अभिव्यक्त करने के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। आज के अंक में हम पहले इस राग में एक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे, जिसे परवीन सुल्ताना ने स्वर दिया है। इसके साथ ही डॉ. कमला शंकर का गिटार पर बजाया राग काफी की ठुमरी भी सुनेगे। आज की तीसरी प्रस्तुति डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा है।



विदुषी परवीन  सुलताना
राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन मास में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। आज की पहली प्रस्तुति राग काफी की ठुमरी है। यह ठुमरी विख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना ने प्रस्तुत किया है। खयाल, ठुमरी और भजन गायन में सिद्ध विदुषी परवीन सुल्ताना का जन्म 14 जुलाई, 1950 असम के नौगांव जिलान्तर्गत डाकापट्टी नामक स्थान पर एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता इकरामुल मजीद और दादा मोहम्मद नजीब खाँ से प्राप्त हुई। बाद में 1973 से कोलकाता के सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से उन्हें संगीत का विधिवत मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। पटियाला घराने के गायक उस्ताद दिलशाद खाँ से भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सीखने का अवसर मिला। आगे चल इन्हीं दिलशाद खाँ से उनका विवाह भी हुआ। परवीन सुल्ताना ने पहली मंच-प्रस्तुति 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में दी थी। 1965 से ही उनके ग्रामोफोन रेकार्ड बनने लगे थे। उन्होने कई फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया है। फिल्म दो बूँद पानी, पाकीजा, कुदरत और गदर के गाये गीत अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे। 1976 में मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाजा गया। 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ में गाये गीत के लिए परवीन जी को श्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1986 में उन्हें तानसेन सम्मान और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। इस वर्ष (2014) उन्हें ‘पद्मभूषण’सम्मान के लिए चुना गया है। परवीन जी के गायन में उनकी तानें तीनों सप्तकों में फर्राटेदार चलती हैं। आइए इनकी आवाज़ में सुनते हैं राग मिश्र काफी की कृष्ण की छेड़छाड़ से युक्त, श्रृंगार रस प्रधान एक मोहक ठुमरी।

ठुमरी मिश्र काफी : ‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’ : विदुषी परवीन सुल्ताना



डॉ.कमला शंकर
अभी आपने राग काफी की ठुमरी का रसास्वादन किया। गायन में स्वर संयोजन के साथ ही गीत के शब्द भी रस उत्पत्ति में सहयोगी होते है। किन्तु वाद्य संगीत में शब्द नहीं होते। राग काफी श्रृंगार रस के परिवेश को रचने में पूर्ण समर्थ है, इसे प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए अब हम आपको राग मिश्र काफी की ठुमरी का वादन सुनवाते हैं, वह भी पाश्चात्य संगीत वाद्य हवाइयन गिटार पर। दरअसल आज का पाश्चात्य हवाइयन गिटार प्राचीन भारतीय तंत्रवाद्य विचित्र वीणा का परिवर्तित रूप है। पिछले कुछ दशकों से कई भारतीय संगीतज्ञों ने गिटार में संशोधन कर उसे भारतीय संगीत के अनुकूल बनाया है। सुपरिचित संगीत विदुषी डॉ. कमला शंकर ने भारतीय संगीत के रागों के अनुकूल गिटार वाद्य में कुछ संशोधन किए हैं। कमला जी का गिटार बिना जोड़ की लकड़ी का बना हुआ है। इसमें स्वर और चिकारी के चार-चार तार तथा तरब के बारह तार लगे हैं। डॉ. कमला शंकर का जन्म 1966 में तमिलनाडु के तंजौर नामक जनपद में हुआ था। संगीत की पहली गुरु स्वयं इनकी माँ थीं। बाद में वाराणसी के पण्डित छन्नूलाल मिश्र से खयाल और ठुमरी की शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध सितारवादक विमलेन्दु मुखर्जी से कमला जी ने तंत्रवाद्य की बारीकियाँ सीखी। कमला जी हैं पहली महिला कलाकार हैं जिन्हें भारतीय संगीत के सन्दर्भ में पीएच डी की उपाधि मिली है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और विचित्र वीणा वादक डॉ. गोपाल शंकर मिश्र के निर्देशन में उन्होने अपना शोधकार्य किया। गिटार वादन के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ की आज की कड़ी में हम उनका गिटार पर बजाया राग मिश्र काफी की ठुमरी प्रस्तुत कर रहे हैं।

ठुमरी मिश्र काफी : गिटार वादन : डॉ. कमला शंकर


डॉ.सोमा घोष
भारतीय उपशास्त्रीय संगीत की एक शैली है, टप्पा। अब हम आपको राग काफी का एक टप्पा सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, पूरब अंग की सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. सोमा घोष। बनारस (वाराणसी) में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुम्बई में रह रही सोमा एक समय के महान फिल्मकार नवेन्दु घोष की पुत्रवधू है। संगीत की दुनिया में भी सोमा प्राचीन वाद्यों को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए संघर्षरत है। उन्हें आज जो प्रतिष्ठा मिली है, उसके लिए वह डॉ. राजेश्वर आचार्य से मिली प्रेरणा को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है। विश्वविख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ सोमा जी की प्रतिभा से प्रभावित होकर अपनी दत्तक पुत्री बना लिया था। वर्ष 2001 के एक सांगीतिक आयोजन में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने सोमा जी का गायन सुना और बड़े प्रभावित हुए। तभी उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ जुगलबन्दी करोगी। मुझे बतौर बेटी अपनाने के पहले उन्होंने अपने पूरे परिवार को बताया और सबकी अनुमति ली। इसके बाद ही उन्होंने इसकी घोषणा की। खाँ साहब ने सोमा जी को अपनी कला विरासत का उत्तराधिकारी बनाया था। सोमा जी ने संगीत की शिक्षा सेनिया घराने के पण्डित नारायण चक्रवर्ती और बनारस घराने की विदुषी बागेश्वरी देवी जी से ली। वर्ष 2002 में मुंबई के एक समारोह में सोमा जी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की ऐतिहासिक जुगलबन्दी हुई थी। उस आयोजन में सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन जी सपत्नीक टिकट लेकर आए थे। नौशाद साहब पहली पंक्ति के श्रोताओं में थे। सोमा जी ने खयाल गायकी को बिलकुल नई दिशा दी है और ठुमरी, होरी जैसी विधाओं को तो नई पीढ़ी के लिए नए ढंग से लोकप्रिय बनाया है। लीजिए, अब आप डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश की सार्थक अनुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

टप्पा राग काफी : ‘वीरा दे जानियाँ रबी...’ : डॉ. सोमा घोष



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 309वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत के इस अंश में आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस प्रस्तुति-अंश को सुन रचना में प्रयोग किए गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह भारतीय संगीत की कौन सी शैली है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 25 मार्च, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 311वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 307वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म “चाचा ज़िन्दाबाद” के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा गया था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – ललित, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर तथा मन्ना डे

इस अंक के प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, और वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से हमारी नई श्रृंखला ‘फागुन के रंग’ की शुरुआत हो रही है। इस श्रृंखला में हम बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा कर रहे हैं। अगले अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 



शनिवार, 18 मार्च 2017

चित्रकथा - 10: हिन्दी फ़िल्मों में शहीद भगत सिंह का प्रिय देशभक्ति गीत


अंक - 10

हिन्दी फ़िल्मों में शहीद भगत सिंह का प्रिय देशभक्ति गीत

मेरा रंग दे बसंती चोला...



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 

23 मार्च का दिन हर भारतीय के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आज ही के दिन सन् 1931 में सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को शहीदी प्राप्त हुई थी। 1919 में जलियाँवाला बाग़ के जघन्य हत्याकांड की दर्दनाक यादें बालपन से भगत सिंह के मन में घर कर गई थी। और 1928 में जब लाला लाजपत राय की ब्रिटिश लाठीचार्ज की वजह से मृत्यु हो गई तब भगत सिंह और उनके साथियों का ख़ून खौल उठा। अपने देशवासियों को न्याय दिलाना उनके जीवन का एकमात्र मक्सद बन गया। जेनरल सौन्डर्स को गोलियों से भून कर इन तीन जवानों ने देश के अपमान का बदला लिया। अमर शहीद हो गए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ आप तीनों अमर शहीदों को करती है झुक कर सलाम। आज ’चित्रकथा’ में प्रस्तुत है शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह के मनपसन्द देशभक्ति गीत "मेरा रंग दे बसंती चोला" का इतिहास और एक नज़र डालें उन हिन्दी फ़िल्मों पर जिनमें इस गीत को शामिल किया गया है।




स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में 'काकोरी काण्ड' के बारे में तो आपने ज़रूर सुना ही होगा। 9 अगस्त
1925 में पंडित राम प्रसाद बिसमिल और उनके क्रान्तिकारी साथियों ने मिल कर शाहजहानपुर-लखनऊ ट्रेन लूटने की घटना को 'काकोरी काण्ड' के नाम से जाना जाता है। सभी 19 क्रान्तिकारी पकड़े गए, जेल हुई। इसके करीब दो साल बाद की बात है। अर्थात्‍ साल 1927 की बात। बसन्त का मौसम था। लखनऊ के केन्द्रीय कारागार (Lucknow Central Jail) के 11 नंबर बैरक में ये 19 युवा क्रान्तिकारी एक साथ बैठे हुए थे। इनमें से किसी ने पूछा, "पंडित जी, क्यों न हम बसन्त पर कोई गीत बनायें?" और पंडित जी और साथ बैठे सारे जवानों ने मिल कर एक ऐसे गीत की रचना कर डाली जो इस देश के स्वाधीनता संग्राम का एक अभिन्न अंग बन कर रह गया। और वह गीत था "मेरा रंग दे बसन्ती चोला, माये रंग दे", मूल लेखक पंडित राम प्रसाद बिसमिल। सह-लेखक की भूमिका में उनके मित्रगण थे जिनमें प्रमुख नाम हैं अश्फ़ाकुल्लाह ख़ान, ठाकुर रोशन सिंह, सचिन्द्र नाथ बक्शी और राम कृष्ण खत्री। अन्य 14 साथियों के नाम तो उपलब्ध नहीं हैं, पर उनका भी इस गीत की रचना में अमूल्य योगदान अवश्य रहा होगा! इस गीत के मुखड़े का अर्थ है "ऐ माँ, तू हमारे चोले, या पगड़ी को बासन्ती रंग में रंग दे"; इसका भावार्थ यह है कि ऐ धरती माता, तू हम में अपने प्राण न्योछावर करने की क्षमता उत्पन्न कर। बासन्ती रंग समर्पण का रंग है, बलिदान का रंग है। बिसमिल ने कितनी सुन्दरता से बसन्त और बलिदान को एक दूसरे से मिलाकार एकाकार कर दिया है! इस गीत ने आगे चल कर ऐसी राष्ट्रीयता की ज्वाला प्रज्वलित की कि जन-जागरण और कई क्रान्तिकारी गतिविधियों का प्रेरणास्रोत बना। यहाँ तक कि शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह का पसन्दीदा देशभक्ति गीत भी यही गीत था, और 23 मार्च 1931 के दिन फाँसी की बेदी तक पैदल जाते हुए वो इसी गीत को गाते चले जा रहे थे। आश्चर्य की बात है कि वह भी बसन्त का ही महीना था। भले ही इस गीत को राम प्रसाद बिसमिल ने लिखे हों, पर आज इस गीत को सुनते ही सबसे पहले शहीद भगत सिंह का स्मरण हो आता है। 

हिन्दी सवाक्‍ फ़िल्मों का निर्माण भी उसी वर्ष से शुरू हो गया था जिस वर्ष भगत सिंह शहीद हुए थे। पर
ब्रिटिश शासन की पाबन्दियों की वजह से कोई भी फ़िल्मकार भगत सिंह के जीवन पर फ़िल्म नहीं बना सके। देश आज़ाद होने के बाद सन्‍ 1948 में सबसे पहले 'फ़िल्मिस्तान' ने उन पर फ़िल्म बनाई 'शहीद', जिसमें भगत सिंह की भूमिका में नज़र आये दिलीप कुमार। पर इस फ़िल्म में "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" गीत को शामिल नहीं किया गया। फ़िल्म का एकमात्र देश भक्ति गीत था राजा मेहन्दी अली ख़ाँ का लिखा "वतन की राह में वतन के नौजवाँ शहीद हों"। फ़िल्म के अन्य सभी गीत नायिका-प्रधान गीत थे। इसके बाद 1954 में जगदीश गौतम निर्देशित फ़िल्म बनी 'शहीद-ए-आज़म भगत सिंह' जिसमें प्रेम अदीब, जयराज, स्मृति बिस्वास प्रमुख ने काम किया। इस फ़िल्म में भी "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" गीत के शामिल होने की जानकारी नहीं है, हाँ, बिसमिल के लिखे "सरफ़रोशी की तमन्ना..." को ज़रूर इसमें शामिल किया गया था रफ़ी साहब की आवाज़ में। इसके बाद सन्‍ 1963 में बनी के. एन. बनसल निर्देशित 'शहीद भगत सिंह' जिसमें नायक की भूमिका में शम्मी कपूर नज़र आये। फ़िल्म के गीत लिखे क़मर जलालाबादी और ज्ञान चन्द धवन ने तथा संगीत दिया हुस्नलाल भगतराम ने। फ़िल्म के सभी गीत देशभक्ति थे, और बिसमिल के लिखे दो गीत शामिल किये गये - "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" और "मेरा रंग दे बसन्ती चोला"। दोनों गीत मोहम्मद रफ़ी और साथियों की आवाज़ों में थे। इस फ़िल्म को सफलता नहीं मिली, पर इसके ठीक दो साल बाद, 1965 में मनोज कुमार अभिनीत फ़िल्म 'शहीद' ने कमाल कर दिखाया। फ़िल्म ज़बरदस्त कामयाब रही और महेन्द्र कपूर, मुकेश और राजेन्द्र मेहता के गाये "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना। इस फ़िल्म को कई राष्ट्रीय पुरसकारों से सम्मानित किया गया, जिनमें शामिल थे 'सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म', राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म का 'नरगिस दत्त पुरस्कार', तथा 13-वीं राष्ट्रीय पुरस्कारों में 'सर्वश्रेष्ठ कहानी' का पुरस्कार। 



नई पीढ़ी के कई फ़िल्मकारों ने भी भगत सिंह पर कई फ़िल्में बनाई। साल 2002 में इक़बाल ढिल्लों 
निर्मित व सुकुमार नायर निर्देशित फ़िल्म आई 'शहीद-ए-आज़म', जिसमें भगत सिंह की भूमिका में नज़र आये सोनू सूद। फ़िल्म को लेकर विवाद का जन्म हुआ और पंजाब-हरियाणा हाइ कोर्ट के निर्देश पर फ़िल्म का प्रदर्शन बन्द किया गया। इस वजह से फ़िल्म को ज़्यादा नहीं देखा गया। फ़िल्म के गीत पंजाबी रंग के थे पर "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" ऐल्बम से ग़ायब था। इसी साल, 2002 में बॉबी देओल नज़र आये भगत सिंह के किरदार में और फ़िल्म का शीर्षक था '23 मार्च 1931: शहीद'। इस फ़िल्म में "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" को आवाज़ दी भुपिन्दर सिंह, वीर राजिन्दर और उदित नारायण ने। संगीत दिया आनन्द राज आनन्द ने तथा फ़िल्म के अन्य गीत लिखे देव कोहली ने। साल 2002 में तो जैसे भगत सिंह के फ़िल्मों की लड़ी ही लग गई। इसी वर्ष एक और फ़िल्म आई 'दि लीजेन्ड ऑफ़ भगत सिंह', जिसमें शहीदे आज़म की भूमिका में नज़र आये अजय देवगन। ए. आर. रहमान के संगीत निर्देशन में सोनू निगम और मनमोहन वारिस का गाया "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" काफ़ी लोकप्रिय हुआ और 1965 में बनी 'शहीद' के उस गीत के बाद इसी संस्करण को लोगों ने हाथोंहाथ ग्रहण किया। एक और बार "मेरा रंग दे..." लेकर आए रूप कुमार राठौड़, हरभजन मान और मोहम्मद सलामत। संगीतकार जयदेव कुमार के संगीत में यह फ़िल्म ’शहीद भगत सिंह’ का गीत है, लेकिन यह फ़िल्म ठीक किस वर्ष प्रदर्शित हुई इसमें संशय है। इन तमाम संस्करणों में इन फ़िल्मों के गीतकारों ने अपनी तरफ़ बोल जोड़े हैं। बिसमिल के मूल मुखड़े को आधार बना कर अन्तरों और शुरुआती पंक्तियों में नए बोल डाले गए हैं। 1965 की फ़िल्म ’शहीद’ के गीत में प्रेम धवन, ’दि लिगेंड ऑफ़ भगत सिंह’ के गीत में समीर, और जयदेव कुमार स्वरबद्ध गीत में नक्श ल्यालपुरी साहब का योगदान है। बिसमिल के मूल गीत के बोल ये रहे...

मेरा रंग दे बसंती चोला, माए रंग दे 
मेरा रंग दे बसंती चोला 

दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान है
एक बार इस राह में मरना सौ जन्मों के समान है 
देख के वीरों की क़ुरबानी अपना दिल भी बोला
मेरा रंग दे बसंती चोला ...

जिस चोले को पहन शिवाजी खेले अपनी जान पे
जिसे पहन झाँसी की रानी मिट गई अपनी आन पे 
आज उसी को पहन के निकला हम मस्तों का टोला 
मेरा रंग दे बसंती चोला ...

बड़ा ही गहरा दाग है यारों जिसका देश ग़ुलाम है
वो जीना भी क्या जीना है अपना देश ग़ुलाम है
सीने में जो दिल था यारों आज बना है शोला
मेरा रंग दे बसंती चोला ...


और फिर साल 2006 में आई राकेश ओमप्रकाश मेहरा निर्मित व निर्देशित आमिर ख़ान की फ़िल्म 'रंग दे बसन्ती', जो भगत सिंह के बलिदान का एक नया संस्करण था, आज की युवा पीढ़ी के नज़रिए से। फ़िल्म बेहद कामयाब रही। ए. आर. रहमान के संगीत में फ़िल्म के सभी गीत बेहद मशहूर हुए। जिस तरह से भगत सिंह की कहानी का यह एक नया संस्करण था, ठीक वैसे ही इस फ़िल्म में "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" को भी एक नया जामा पहनाया गया। जामा पहनाने वाले गीतकार प्रसून जोशी "थोड़ी सी धूल मेरी, धरती की मेरे वतन की, थोड़ी सी ख़ुशबू बौराई सी मस्त पवन की, थोड़ी से धोंकने वाली धक धक धक साँसे, जिनमें हो जुनूं जुनूं वो बूंदे लाल लहू की, ये सब तू मिला मिला ले, फिर रंग तू खिला खिला ले, और मोहे तू रंग दे बसन्ती यारा, मोहे तू रंग दे बसन्ती"।


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में हमने गीतकार शकील बदायूंनी के लिखे प्रसिद्ध फ़िल्मी होली गीतों की चर्चा की थी। इसके संदर्भ में हमारे पाठक प्रवीण गुप्ता जी ने कहा है, "शकील बदायूंनी तो भारत की आत्मा को पहचानते थे और उसके गुण गाते रहे। ये वो महान गीतकार थे जिन्हें शासन की ओर से उचित प्रतिष्ठा अभी तक नहीं मिली।" प्रवीण जी, आपका बहुत बहुत आभार इस टिप्पणी के लिए। और इस अंक की अब तक की कुल रीडरशिप 140 है, और आप सभी को हमारा धन्यवाद। आगे भी बने रहिए ’चित्रकथा’ के साथ।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

गीत अतीत 04 || हर गीत की एक कहानी होती है || हमसफ़र || बदरी की दुल्हनिया || अखिल सचदेवा ||

Geet Ateet 04
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Humsafar
Akhil Sachdeva- Singer, Lyricist & Composer

ताज़ा प्रदर्शित फिल्म "बद्री की दुल्हनिया" के यूँ तो सभी गीत काफी हिट हो चुके हैं, पर जिस गीत की हम बात कर रहे हैं वो सबसे अनूठा है, सबसे अलग और सोलफुल है, मिलिए इसी गीत के गायक, संगीतकार और गीतकार अखिल सचदेव से, और जानिए इस गीत के बनने की कहानी, प्ले पर क्लिक करें और सुनें... 



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -

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रविवार, 12 मार्च 2017

अन्तिम प्रहर के राग : SWARGOSHTHI – 308 : RAGAS OF LAST QUARTER


रंगोत्सव पर सभी पाठकों और श्रोताओं को हार्दिक शुभकामनाएँ




स्वरगोष्ठी – 308 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 8 : रात के चौथे प्रहर के राग

पण्डित मल्लिकार्जुन मंसूर से सुनिए राग परज - “अँखियाँ मोरी लागि रही...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला – “राग और गाने-बजाने का समय” की आठवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं अथवा प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों के प्रयोग का एक निर्धारित समय होता है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे आठवें प्रहर अर्थात रात्रि के चौथे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग परज में एक दुर्लभ खयाल रचना सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित मल्लिकार्जुन मंसूर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ हे 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा जिंदाबाद’ से इसी प्रहर के राग ललित पर आधारित एक गीत मन्ना डे और लता मंगेशकर के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



पण्डित मल्लिकार्जुन  मंसूर 
भारतीय संगीत के प्रायः सभी राग पूर्वनिर्धारित समय पर ही गाने-बजाने की परम्परा है। कुछ राग सार्वकालिक माने गए हैं। जैसे धानी, पहाड़ी आदि। इन्हें किसी भी समय प्रस्तुत किया जा सकता है। श्रृंखला की समापन कड़ी में आज हम रात्रि के चौथे प्रहर अर्थात अन्तिम प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर के रागों में से पहले हम प्रस्तुत करेंगे राग ‘परज’ और फिर राग ‘ललित’। इन दोनों रागों में कोमल ऋषभ और दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अध्वदर्शक स्वर के नियमानुसार तीव्र मध्यम स्वर वाले राग दिन के पूर्वार्द्ध में, अर्थात 12 बजे दिन से मध्यरात्रि 12 बजे तक तथा शुद्ध मध्यम स्वर वाले राग उत्तरार्द्ध में, अर्थात मध्यरात्रि से लेकर 12 बजे मध्याह्न के बीच प्रयोग किये जा सकते हैं। परन्तु राग परज और ललित में दोनों मध्यम लगते हैं और ये राग रात्रि के चौथे प्रहर में प्रस्तुत किये जाते हैं। एक और सिद्धान्त के अनुसार कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर वाले राग सन्धिप्रकाश काल में प्रस्तुत किये जा सकते हैं। इन दोनों रागों में कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर उपस्थित है और चौथे प्रहर का समापन सन्धिप्रकाश काल से होता है। इन दोनों नियमों का पालन करते हुए राग परज और ललित को अन्तिम प्रहर के रगों की श्रेणी में रखा गया है। राग परज पूर्वी थाट और सम्पूर्ण जाति का राग है। इसमें कोमल ऋषभ, कोमल धैवत व दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग होता है। अब हम आपको वरिष्ठतम संगीतज्ञ पण्डित मल्लिकार्जुन मंसूर द्वारा प्रस्तुत राग परज की एक मोहक रचना सुनवा रहे हैं। इस रचना पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ संगीत समीक्षक डॉ. मुकेश गर्ग लिखते हैं–
 “मल्लिकार्जुन मंसूर की गायकी में आन्तरिक बेचैनी, साँस-सुर की अविश्वसनीय मजबूती और राग-दृढ़ता का विरल संयोग सदा चमत्कृत करता है। वह भी बिना किसी औपचारिक तामझाम के। ऐसे उस्ताद आज दुर्लभ हैं, जो पूर्वी से बचाते हुए परज का खालिस रूप सामने रख सकें।“ 

राग परज : “अँखियाँ मोरी लागि रही...” : पण्डित मल्लिकार्जुन मंसूर



लता मंगेशकर
 रात्रि के चौथे प्रहर में राग परज के अलावा अन्य प्रमुख राग हैं- वसन्त, भटियार, भंखार, मनोहर, मेघरंजनी, ललित पंचम, सोहनी, जयन्त, हेवित्री, नेत्ररंजनी और ललित। अब हम आपसे राग ललित की संरचना पर कुछ चर्चा करेंगे और इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत प्रस्तुत करेंगे। राग ललित पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में कोमल ऋषभ, कोमल धैवत तथा दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह दोनों में पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। इसीलिए इस राग की जाति षाड़व-षाड़व होती है। राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज है। फिल्म संगीत के क्षेत्र में मदनमोहन का का नाम एक ऐसे संगीतकार के रूप में लिया जाता है, जिनकी रचनाएँ सभ्रान्त और संगीत के शौकीनों के बीच सुनी जाती है। उनका संगीत जटिलताओं से मुक्त होते हुए भी हमेशा सतहीपन से दूर ही रहा। फिल्मों में गजल गायकी का एक मानक स्थापित करने में मदनमोहन का योगदान प्रशंसनीय रहा है। उनके अनेक गीतों में रागों की विविधता के दर्शन भी होते हैं। फिल्म संगीत को रागों के परिष्कृत और सरलीकृत रूप प्रदान करने की प्रेरणा उन्हें उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और लखनऊ के तत्कालीन समृद्ध सांगीतिक परिवेश से ही मिली थी।

मन्ना डे 
1951 में बनी देवेंद्र गोयल की फिल्म ‘अदा’ में मदनमोहन और लता मंगेशकर का साथ हुआ और यह साथ लम्बी अवधि तक जारी रहा। इसी प्रकार पुरुष कण्ठ में राग आधारित गीतों के लिए उनकी पहली पसन्द मन्ना डे हुआ करते थे। मन्ना डे और लता मंगेशकर ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में अनेक उच्चकोटि के गीत गाये। मदनमोहन के संगीत से सजा गीत, जो हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वह राग ललित पर आधारित एक युगल गीत है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा जिन्दाबाद’ में मदनमोहन का संगीत था। इस फिल्म के गीतों में उन्होने रागों का आधार लिया और आकर्षक संगीत रचनाओं का सृजन किया। फिल्म में राग ललित के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत- ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ था, जिसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया। आइए, सुनते हैं यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक और श्रृंखला को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग ललित : ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर : फिल्म – चाचा ज़िन्दाबाद



संगीत पहेली

 ‘स्वरगोष्ठी’ के 308वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक वाद्य संगीत की रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 310 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस संगीतांश में किस राग का स्पर्श है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह कौन सा वाद्य -यंत्र है? वाद्य -यंत्र का नाम बताइए।

 आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 18 मार्च, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

 ‘स्वरगोष्ठी’ के 306ठे अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म “झनक झनक पायल बाजे” एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – अड़ाना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अमीर खाँ और साथी। इस बार की पहेली में सही उत्तर देने वाली प्रतिभागी हैं, वोरहीज़, न्यूजर्सी से  डॉ. किरीट छाया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

 मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का समापन अंक था। अगले अंक से एक नई लघु श्रृंखला “फागुन के राग-रंग” आरम्भ करेंगे और आपको कुछ रागबद्ध रचनाएँ भी सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए या अगली श्रृंखला आप अपनी पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 




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