रविवार, 29 जनवरी 2017

राग पीलू और भीमपलासी : SWARGOSHTHI – 303 : RAG PILU & BHIMPALASI




स्वरगोष्ठी – 303 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 3 : दिन के तीसरे प्रहर के राग

राग पीलू की ठुमरी - ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- “राग और गाने-बजाने का समय” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के तृतीय प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के राग पीलू की एक ठुमरी सुविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही संगीतकार रोशन का स्वरबद्ध किया राग भीमपलासी पर आधारित, फिल्म ‘बावरे नैन’ का एक गीत गायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।




विदुषी गिरिजा देवी
भारतीय संगीत के प्राचीन विद्वानों ने विभिन्न स्वर-समूहों से उपजने वाले रस व भावों, अपने अनुभव, और मनोवैज्ञानिक आधार पर विभिन्न रागों के प्रयोग का समय निर्धारित किया है। उन्होने राग के समय निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। पिछले अंक में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वरसिद्धान्त’ पर चर्चा की थी, जिसके अन्तर्गत राग के मध्यम स्वर से रागों के पूर्वार्द्ध या उत्तरार्द्ध समय का निर्धारण किया गया है। आज के अंक में हम वादी और संवादी स्वरों के आधार पर रागों के समय निर्धारण के सिद्धान्त पर चर्चा कर रहे हैं। जिस प्रकार चौबीस घण्टे की अवधि को दो भागों, पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध, में बाँट कर रागों के समय निर्धारण कर सकते हैं, उसी प्रकार सप्तक के भी दो भाग, उत्तरांग और पूर्वांग, में विभाजित कर रागों का समय निर्धारित किया जाता है। संख्या की दृष्टि से सप्तक के प्रथम चार स्वर, अर्थात षडज, ऋषभ, गान्धार और मध्यम पूर्वांग तथा पंचम, धैवत, निषाद और अगले सप्तक का षडज मिल कर उत्तरांग कहलाते हैं। शास्त्रकारों ने यह नियम बनाया कि जिन रागों का वादी स्वर पूर्वांग के स्वर में से कोई एक स्वर है उस राग को दिन के पूर्वार्द्ध में अर्थात मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच तथा जिन रागों का वादी स्वर उत्तरांग के स्वरों में से कोई एक स्वर हो तो उसे दिन के उत्तरार्द्ध में अर्थात मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जा सकता है। इस नियम की रचना से कुछ राग अपवाद रह गए। उदाहरण के रूप में राग भीमपलासी का उल्लेख किया जा सकता है। इस राग में वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। उपरोक्त नियम से राग का वादी और संवादी सप्तक के पूर्वांग में आ जाता है। राग का एक प्रमुख नियम है कि अगर वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में होगा तो संवादी स्वर उत्तरांग में और यदि वादी स्वर उत्तरांग में होगा तो संवादी स्वर पूर्वांग में होना चाहिए। इस दृष्टि से राग भीमपलासी और भैरव उपरोक्त नियम के प्रतिकूल हैं। इस नियम के अनुसार भीमपलासी के समान भैरवी भी पूर्वांग प्रधान राग होना चाहिए, किन्तु भैरवी प्रातःकालीन राग है। इन अपवादों के चलते उपरोक्त नियम में संशोधन किया गया। संशोधन के अनुसार सप्तक के दोनों अंगों का दायरा बढ़ा दिया गया, अर्थात सप्तक के पूर्वांग में षडज से पंचम तक के स्वर और उत्तरांग में मध्यम से तार सप्तक के षडज तक के स्वर हो सकते हैं। इस नियम के अनुसार राग का वादी स्वर यदि सप्तक के पूर्वांग में आता है तो उसका गायन-वादन दिन के पूर्व अंग में होगा और यदि वादी स्वर उत्तरांग में आता है तो उसका गायन-वादन दिन के ऊतर अंग में किया जाएगा।

आज हम आपसे दिन के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न 12 से अपराह्न 3 बजे के बीच का समय। इस प्रहर के रागों का का वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग के स्वर में से कोई एक स्वर होता है। इस प्रहर का एक बेहद लोकप्रिय राग पीलू है। राग पीलू में उपशास्त्रीय रचनाएँ खूब निखरती हैं। अब हम आपको राग पीलू में निबद्ध एक ठुमरी विदुषी गिरिजा देवी की आवाज़ में सुनवाते हैं। पीलू काफी थाट और सम्पूर्ण जाति का राग है। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के दोनों रूप, शुद्ध और कोमल प्रयोग किये जाते हैं। अब आप राग पीलू की ठुमरी- ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’ सुनिए, जिसे विदुषी गिरिजा देवी ने गाया है।

राग पीलू ठुमरी : “पपीहरा पी की बोल न बोल...” : विदुषी गिरिजा देवी



रोशन और  लता  मंगेशकर
राग पीलू के अलावा दिन के तीसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- धनाश्री, पटमंजरी, प्रदीपकी या पटदीपकी, भीमपलासी, मधुवन्ती, हंसकंकणी, हंसमंजरी आदि। अब हम आपको दिन के तीसरे प्रहर के एक और राग, भीमपलासी का रसास्वादन कराते हैं। राग भीमपलासी भी काफी थाट का राग है। इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। राग में कोमल गान्धार और कोमल निषाद का प्रयोग होता है, शेष सभी शुद्ध स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आइए, भक्त कवयित्री मीरा का एक पद अब राग भीमपलासी पर आधारित सुनते हैं। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ में इसी भक्तिपद को शामिल किया गया था। इसके संगीतकार थे रोशन और इसे स्वर दिया, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार रोशन ने इस भक्तिपद को राग भीमपलासी के स्वरों में और कहरवा ताल में पिरोया है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग भीमपलासी के स्वर भक्तिरस के साथ-साथ श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति में समर्थ होते है। राग के इसी स्वभाव के कारण मीरा के इस पद की प्रस्तुति में भक्ति के साथ श्रृंगाररस की अनुभूति भी होगी। लीजिए, मीरा का यह भजन राग भीमपलासी के स्वरों में सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : “ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” : लता मंगेशकर : फिल्म – नौबहार



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 303वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 60 के दशक की फिल्म का राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश मे गायक और गायिका के युगल स्वरों को पहचानिए और हमे उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 4 फरवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 305वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 301 की संगीत पहेली में हमने आपको फिल्म ‘सन्त ज्ञानेश्वर’ से एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तोड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल एकताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक मन्ना डे। इस बार की पहेली में जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘राग और गाने-बजाने का समय’ का यह तीसरा अंक था। इस अंक में हमने दिन के तीसरे प्रहर के कुछ रागों की चर्चा की है। अगले अंक में हम दिन के चौथे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 28 जनवरी 2017

चित्रकथा - 4: आशा के बाद ओ. पी. नय्यर की पार्श्वगायिकाएँ


अंक - 4

आशा के बाद ओ. पी. नय्यर की पार्श्वगायिकाएँ


हम कैसे बतायें तक़दीर ने हमको ऐसा मारा..



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के तीसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

ओ. पी. नय्यर एक ऐसे संगीतकार थे जो शुरु से लेकर अन्त तक अपने उसूलों पर चले, और किसी के भी लिए उन्होंने अपना सर नीचे नहीं झुकाया, फिर चाहे उनकी हाथ से फ़िल्म चली जाए या गायक-गायिकाएँ मुंह मोड़ ले। करीयर के शुरुआती दिनों में ही एक ग़लतफ़हमी की वजह से लता मंगेशकर के साथ जो अन-बन हुई थी, उसके चलते नय्यर साहब ने कभी लता जी के साथ सुलह नहीं किया। और अपने करीयर के अन्तिम चरण में अपनी चहेती गायिका आशा भोसले से भी उन्होंने सारे संबंध तोड़ दिए। आइए आज हम नज़र डाले उन पार्श्वगायिकाओं पर जिनकी आवाज़ का ओ. पी. नय्यर ने अपने गीतों में इस्तमाल किया आशा भोसले से संबंध समाप्त होने के बाद।



संगीतकार ओ. पी. नय्यर की शख़्सियत के बारे में हम सभी जानते हैं। जब दूसरे सभी संगीतकार लता
मंगेशकर से अपने गीत गवाने के लिए व्याकुल थे, तब उन्होंने यह ऐलान कर दिया कि वो लता से कभी नहीं गवाएँगे। राजकुमारी, शम्शाद बेगम और गीता दत्त से अपनी शुरुआती फ़िल्मों के गीत गवाने के बाद नय्यर साहब को मिली आशा भोसले। आशा जी और नय्यर साहब की जोड़ी कमाल की जोड़ी बनी। एक से एक सुपर-डुपर हिट गीत बनते चले गए। लेकिन यह जोड़ी भी टिक नहीं सकी। 70 के दशक के आते आते संगीतकारों की नई पीढ़ी ने फ़िल्म-संगीत जगत में तहल्का मचाना शुरु कर दिया था। कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल और राहुल देव बर्मन सर्वोच्च शिखर पर पहुँच चुके थे। ऐसे में शंकर जयकिशन, ओ. पी. नय्यर, रवि, चित्रगुप्त आदि संगीतकारों का करीअर ढलान पर आ गया। उधर ओ. पी. नय्यर और आशा भोसले के बीच भी अन-बन शुरु हुई। और कहा जाता है कि जब एक दिन नय्यर साहब ने आशा जी की बेटी वर्षा पर हाथ उठाने की हिमाकत की, उस दिन आशा ने ओ. पी. नय्यर के साथ किसी भी तरह के संबंध में पूर्ण-विराम लगा दिया। उन दिनों ’प्राण जाए पर वचन ना जाए’ फ़िल्म रिलीज़ होने ही वाली थी और इसका "चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया" गीत बेहद लोकप्रिय होने लगा था। ऐसे में आशा जी ने निर्माता-निर्देशक से कह कर इस गीत को फ़िल्म से हटवा दिया। और जब इसी फ़िल्म के लिए नय्यर साहब को इस वर्ष का फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिला, तब घर लौटते वक़्त गाड़ी का शीशा उतार कर यह पुरस्कार उन्होंने बाहर फेंक दिया। नय्यर और आशा का रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो गया।

इस घटना के समय नय्यर और आशा एक और फ़िल्म में साथ में काम कर रहे थे। फ़िल्म थी ’टैक्सी
Krishna Kalle
ड्राइवर’। 1973 में प्रदर्शित इस फ़िल्म में तब तक आशा भोसले की आवाज़ में कई गीत रेकॉर्ड हो चुके थे, बस एक गीत रेकॉर्ड होना बाक़ी था। आशा जी से संबंध समाप्त होने के बाद यह आख़िरी गीत नय्यर साहब ने कृष्णा कल्ले से गवाने का निर्णय लिया। गीत के बोल थे "प्यार करते हो यार, करके डरते हो यार"। गीत क्लब-कैबरे जौनर का गीत है। यूं तो कृष्णा कल्ले ने इस गीत को बहुत अच्छा गाया है, पर आशा-नय्यर का वह जादू नहीं चल पाया। कुछ-कुछ इसी तरह के भाव पर आधारित आशा-नय्यर का एक मास्टरपीस गीत रहा है फ़िल्म ’मेरे सनम’ का "ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का अन्धेरा ना घबराइए"। वह असर नय्यर साहब ’टैक्सी ड्राइवर’ के इस गीत में पैदा नहीं कर सके। गायिका कृष्णा कल्ले ने 60 और 70 के दशकों में बहुत से फ़िल्मी गीत गाए, पर उनमें से अधिकतर कम बजट की फ़िल्मों के गीत होने की वजह से ज़्यादा चल नहीं पाए। रफ़ी साहब के साथ उनका गाया 1967 की फ़िल्म ’राज़’ का गीत "सोचता हूँ के तुम्हें मैंने कहीं देखा है" काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। मराठी और कन्नड़ फ़िल्मों में भी उन्होंने कई गीत गाए हैं।


’टैक्सी ड्राइवर’ के बाद ओ. पी. नय्यर के संगीत से सजी अगली फ़िल्म आई ’ख़ून का बदला ख़ून’। 1978
Vani Jayram
की इस फ़िल्म में नय्यर साहब ने एक नहीं बल्कि तीन-तीन गायिकाओं को मौक़ा दिया अपने गीतों को गाने का। ये थीं वाणी जयराम, उत्तरा केलकर और पुष्पा पगधरे। वाणी जयराम का करीअर हिन्दी फ़िल्मों में 1971 में शुरु हुआ जब वसन्त देसाई के संगीत में फ़िल्म ’गुड्डी’ में दो गीत गा कर वो रातों रात मशहूर हो गईं। फिर नौशाद साहब ने उन्हें अपनी 1972 की फ़िल्म ’पाक़ीज़ा’ में "मोरा साजन" और 1977 की फ़िल्म ’आइना’ में आशा भोसले के साथ एक युगल गीत में गवाया। और 1978 में ओ. पी. नय्यर ने उन्हें ’ख़ून का बदला ख़ून’ की मुख्य गायिका के रूप में प्रस्तुत किया और उनसे एक या दो नहीं बल्कि फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाए। रफ़ी साहब के साथ गाया "एजी होगा क्या आगे जनाब देखना, अभी तो सवाल है जवाब देखना" क़व्वाली शैली का गीत है जिसमें नय्यर साहब का हस्ताक्षर ऑरकेस्ट्रेशन इन्टरल्युड में साफ़ सुनाई देता है, पर गीत को 70 के दशक के स्टाइल में ढालने की कोशिश की गई है। वाणी जयराम के गाए चार और गीत हैं इस फ़िल्म में; "बड़ा दुख द‍इबे पवन पुरवैया" और "प्यार भरा कजरा अखियों में डालके" मुजरा शैली के गीत हैं। "तुमको दीवाना मेरी जान बनाने के लिए, एक बस एक मोहब्बत की नज़र काफ़ी है" एक क्लब नंबर है। "ज़ुल्फ़ लहराई तो सावन का महीना आ गया" में नय्यर साहब की वही 60 के दशक के गीतों की छाया नज़र आई, पर कुल मिला कर इस फ़िल्म में वाणी जयराम की आवाज़ वह कमाल नहीं दिखा सकी जो ’गुड्डी’ में दिखाई थी। गीतों में वह दम नहीं था कि उस दौर के सुपरहिट फ़िल्मों के सुपरहिट गीतों से टक्कर ले पाते।


’ख़ून का बदला ख़ून’ में वाणी जयराम के साथ दो और गायिकाओं की आवाज़ें भी गूंजी। इनमें से एक थीं
Uttara Kelkar
उत्तरा केलकर। इन्होंने हिन्दी फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा तो नहीं गाईं, पर मराठी संगीत जगत में इनका नाम हुआ। कहना आवश्यक है कि हिन्दी फ़िल्म जगत में उत्तरा केलकर को पहला अवसर ओ. पी. नय्यर ने ही दिया था ’ख़ून का बदला ख़ून’ में। इस फ़िल्म के तीन गीतों में इनकी आवाज़ सुनाई दी - "घर अपना बंगाल और बम्बई...", "हम यतीमों के जैसा भी संसार..." और "प्यार भरा कजरा अखियों में..."। लेकिन ये तीनों गीत उनकी एकल आवाज़ में नहीं थे, बल्कि वाणी जयराम इनमें मुख्य गायिका थीं, और साथ में थीं पुष्पा पगधरे। इन गीतों ने उत्तरा केलकर को कोई प्रसिद्धी तो नहीं दिलाई, पर हिन्दी फ़िल्म जगत में उनका खाता खुल गया। उन्हें हिन्दी में दूसरा मौका मिला सात साल बाद, 1985 की फ़िल्म ’टारज़न’ में जिसमें बप्पी लाहिड़ी ने उनसे गवाए "मेरे पास आओगे" और "तमाशा बनके आए हैं" जैसे हिट गीत। 1987 में ’डान्स डान्स’ का "आ गया आ गया हलवा आ गया" गीत भी सुपरहिट रहा। ’माँ कसम’, ’अधिकार’, ’सूर्या’, ’पुलिस और मुजरिम’, और ’इनसानियत के देवता’ जैसी फ़िल्मों में उनके गाए गीत नाकामयाब रहे। ओ. पी. नय्यर ने भी फिर कभी उत्तरा केलकर से अपने गीत नहीं गवाए।


वाणी जयराम और उत्तरा केलकर के अलावा ’ख़ून का बदला ख़ून’ में नय्यर साहब ने पुष्पा पगधरे को
Pushpa Pagdhare
भी गाने का मौक़ा दिया था। "घर अपना बंगाल और बम्बई" और "प्यार भरा कजरा अखियों में डाल के" में इन्होंने अपनी आवाज़ मिलाई थी। वैसे यह पुष्पा पगधरे की पहली फ़िल्म नहीं थी। इससे एक साल पहले 1977 में संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी ने धार्मिक फ़िल्म ’जय गणेश’ में इन्हें गाने का अवसर दिया था। आशा भोसले, मन्ना डे और महेन्द्र कपूर जैसे सीनियर गायकों के साथ इनकी भी आवाज़ इस ऐल्बम में सुनाई दी थी। 1978 में ही एक और फ़िल्म में पुष्पा की आवाज़ सुनाई दी, यह फ़िल्म थी ’चोर का भाई चोर’। डी. एस. रेउबेन के संगीत में इस फ़िल्म के गाने नहीं चले। इस तीनों फ़िल्मों के पिट जाने की वजह से पुष्पा पगधरे की आवाज़ लोगों तक नहीं पहुँच सकी और पुष्पा गुमनामी में ही रह गईं। ओ. पी. नय्यर ने एक बार फिर उन्हें मौका दिया अपनी अगली ही फ़िल्म ’बिन माँ के बच्चे’ में जो प्रदर्शित हुई थी 1979 में। इस फ़िल्म के कुल छह गीतों में तीन रफ़ी साहब के एकल, दो पुष्पा पगधरे के एकल और एक रफ़ी-पुष्पा डुएट थे। रफ़ी साहब के साथ गाया गीत एक होली गीत था जिसके बोल थे "होली आई रे आई रे होली आई रे, दिल झूम रहे मस्ती में लिए लाखों रंग बहार के"। बदलते दौर में भी अपनी शैली को बरकरार रखने की कोशिश में नाकाम रहे नय्यर साहब और यह होली गीत कोई कमाल नहीं दिखा सकी। पुष्पा पगधरे की एकल गीतों में पहला गीत था "अपनी भी एक दिन ऐसी मोटर कार होगी" और दूसरा गीत था "जो रात को जल्दी सोये और सुबह को जल्दी जागे"। इन गीतों में नय्यर साहब का स्टाइल बरकरार था और एस. एच. बिहारी के लिखे सुन्दर बोलों के होने के बावजूद ये गाने नहीं चले। एक तो दौर बदल चुका था, 80 के दशक में 60 के दशक का स्टाइल भला कैसे हिट होता! और शायद आशा भोसले की आवाज़ होती तो बात कुछ और होती, क्या पता! 1986 की फ़िल्म ’अंकुष’ में "इतनी शक्ति हमें देना दाता" गा कर पुष्पा पगधरे को पहली बार हिन्दी फ़िल्म जगत में ख्याति हासिल हुई। इस फ़िल्म के संगीतकार थे कुलदीप सिंह। ओ. पी. नय्यर ने अपने जीवन की अन्तिम फ़िल्म, 1995 की ’मुक़द्दर की बात’ में एक बार फिर से पुष्पा पगधरे को गवाया था।


1979 में ओ. पी. नय्यर के संगीत निर्देशन में एक और फ़िल्म आई ’हीरा मोती’। इस फ़िल्म में भी रफ़ी
Dilraj Kaur
साहब पुरुष गायक थे, साथ में मन्ना डे भी। पर गायिका के रूप में इस बार उन्होंने चुना दिलराज कौर की आवाज़। शत्रुघन सिन्हा और रीना रॉय पर फ़िल्माया रफ़ी-दिलराज डुएट "होंठ हैं तेरे दो लाल हीरे" पंजाबी शैली का नृत्य गीत है जिसमें दिलराज कौर आशा भोसले के अंदाज़ में गाने की कोशिश करती हैं और कुछ हद तक सफल भी हुई हैं। फ़िल्म अगर चलती तो शायद यह गीत भी चल पड़ता, पर अफ़सोस की बात कि फ़िल्म के ना चलने से इस गीत पर किसी का ध्यान नहीं गया। इस फ़िल्म में एक ख़ूबसूरत क़व्वाली भी थी रफ़ी साहब, मन्ना दा और दिलराज कौर की आवाज़ों में - "ज़िन्दगी लेकर हथेली पर दीवाने आ गए, तीर खाने के लिए बन कर निशाने आ गए"। इस गीत में भी दिलराज कौर का वही आशा वाली अंदाज़ साफ़ महसूस की जा सकती है। शत्रुघन सिन्हा, डैनी और बिन्दू पर फ़िल्माई हुई यह क़व्वाली उस ज़माने में काफ़ी हिट हुई थी। इस फ़िल्म में दिलराज कौर की आवाज़ में तीन एकल गीत भी थे। "तुम ख़ुद को देखते हो सदा अपनी नज़र से" सुन कर नय्यर साहब के कितने ही पुराने गीत याद आ जाते हैं। इस गीत की धुन से मिलती जुलती धुनों का उन्होंने कई बार अपने गीतों में प्रयोग किया है। "यही वह जगह है" गीत से भी इस गीत की ख़ास समानता है। "सौ साल जियो तुम जान मेरी तुम्हें मेरी उमरिया लग जाए" एक हल्का फुल्का जनमदिन गीत है जिसमें हिट होने के सभी गुण थे, बस बदक़िस्मती यही थी कि फ़िल्म पिट गई। अन्तिम गीत "मैं तुझको मौत दे दूँ या आज़ाद कर दूँ, तुझे नई ज़िन्दगी दे दूँ या बरबाद कर दूँ" भी एक सुन्दर रचना है जिसमें मध्य एशियाई संगीत की छाया मिलती है, और गीत के बोलों में ’मेरा गाँव मेरा देश’ के प्रसिद्ध गीत "मार दिया जाए के छोड़ दिया जाए" से समानता मिलती है।


इन चन्द फ़िल्मों में संगीत देने के बाद ओ. पी. नय्यर को यह बात समझ आ गई कि लता मंगेशकर या
S Janaki
आशा भोसले को लिए बग़ैर उन्हें किसी बड़ी फ़िल्म में संगीत देने का अवसर मिलना असंभव है। लता के साथ काम करने का सवाल ही नहीं था और आशा से वो किनारा कर चुके थे, अत: इस इंडस्ट्री से संयास लेना ही उन्होंने उचित समझा। नय्यर साहब अपने मर्ज़ी के मालिक थे, वो किसी के शर्तों पर काम नहीं करते थे, अपने उसूलों के लिए वो अपने परिवार से भी अलग हो गए। 80 के दशक के अन्त तक उन्हें आर्थिक परेशानियों ने भी घेर लिया और ना चाहते हुए भी उन्हें एक बार फिर से इस फ़िल्म जगत में क़दम रखना पड़ा। साल था 1992 और फ़िल्म थी ’मंगनी’। बी. आर. इशारा निर्देशित यह फ़िल्म एक कम बजट की फ़िल्म थी। पार्श्वगायिका के रूप में लिया गया दक्षिण की मशहूर गायिका एस. जानकी को, गायक बने एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम। और गीतकार थे क़मर जलालाबादी जिनके साथ नय्यर साहब ने पुराने ज़माने में बहुत काम किया है। लेकिन बात बन नहीं पायी। एस. जानकी की गाई "मैं तो मर के भी तेरी रहूंगी" एक बेहद कर्णप्रिय रचना है जिसे नय्यर साहब ने शास्त्रीय संगीत पर आधारित किया है। एस. जानकी की आवाज़ और अन्दाज़ में आशा जी की झलक मिलती है। इस गीत के इन्टरल्युड में भी उन्होंने कुछ ऐसी आलाप ली हैं जो बिल्कुल आशा-नय्यर के गीतों की याद दिला जाती हैं। नय्यर साहब ने एक साक्षात्कार में यह कहा है कि अगर एस. जानकी विदेश में जाकर नहीं बस जातीं तो उनसे बेहतर गाने वाली पूरे हिन्दुस्तान में नहीं थीं। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर वो मुंबई में गातीं तो वो शीर्ष की गायिका होतीं। इस फ़िल्म का एक अन्य गीत है "हम कैसे बतायें तक़दीर ने हमको ऐसा मारा" जो नय्यर साहब के जाने-पहचाने तालों पर आधारित है। नय्यर साहब के गीतों की ख़ासियत यह है कि हर गीत में वो अपना हस्ताक्षर छोड़ जाते थे और यह गीत भी एक ऐसा ही गीत है जिसे सुन कर कोई भी बता सकता है कि यह नय्यर साहब का कम्पोज़िशन है।


1992 में ही ओ. पी. नय्यर के संगीत से सजी एक और फ़िल्म आई जिसके गीतों ने ख़ूब लोकप्रियता
Kavita
हासिल की। यह फ़िल्म थी ’निश्चय’। भप्पी सोनी निर्मित इस फ़िल्म में सलमान ख़ान और करिश्मा कपूर के होने की वजह से फ़िल्म लोगों तक पहुँची, और ओ. पी. नय्यर ने भी यह सिद्ध किया कि 90 के दशक में भी उनके संगीत का जादू बरक़रार है। इस फ़िल्म में सलमान की आवाज़ बने अमित कुमार और करिश्मा की आवाज़ बनी कविता कृष्णमूर्ती। इस फ़िल्म में कविता की एकल आवाज़ में "छुट्टी कर दी मेरी" के अलावा अमित-कविता के चार युगल गीत थे - "किसी हसीन यार की तलाश है", "सुन मेरे सजना सुन रे", "नई सुराही ताज़ा पानी पी ले तू जानी" और "देखो देखो तुम हो गया मैं गुम"। ये सभी के सभी गीत बेहद कामयाब रहे और ऐसा लगा जैसे फ़िल्म-संगीत का सुनहरा दौर वापस आ गया है। जब यही बात किसी ने एक साक्षात्कार में नय्यर से कही तो ’निश्चय’ के गीतों की लोकप्रियता से साफ़ इनकार करते हुए नय्यर साहब ने कहा,
"देखिए, इन दो पिक्चरों ने यह बता दिया कि नय्यर साहब, आप जो बनाते हो वो आज चलेगा नहीं, और जो आज बन रहा है वो मैं बना नहीं सकता। तो ग्रेस किस चीज़ में है? विस्डम ऐण्ड ग्रेस? कि आप विथड्रॉ कर लीजिए! बहुत कैसेट बिका था, बहुत बहुत बिका म्युज़िक, पिक्चर रिलीज़ होते ही दोनों ठप्प। तो म्युज़िक भी गया साथ में, पिक्चरों का जनाज़ा निकला और म्युज़िक का भी। उस वक़्त मुझे पैसों की सख़्त ज़रूरत थी, तो मुझे वो तस्वीरें लेनी पड़ी। बेगर्स कान्ट बी चूज़र्स; ज़रूरतमन्द आदमी तो यह नहीं देखेगा कि सब्जेक्ट क्या क्या है, जब ज़रूरतमन्द नहीं था, तब भी नहीं पूछता था मैं कि सबजेक्ट क्या है, कहानी क्या है, कुछ नहीं। मेरा एक ही सब्जेक्ट और एक ही कहानी थी कि रुपया कितना है!"



Ranjana Joglekar
’निश्चय’ के बाद 1994 में एक और फ़िल्म आई ’ज़िद’ जिसमें नय्यर साहब का संगीत एक बार फिर हिट हुआ, पर फ़िल्म के बुरी तरह पिट जाने से फ़िल्म के साथ-साथ फ़िल्म के गीतों का भी जनाज़ा निकल गया। इस फ़िल्म में नय्यर साहब ने कविता कृष्णमूर्ति के अलावा दो और गायिकायों से गीत गवाए। ये गायिकाएँ थीं रंजना जोगलेकर और माधुरी जोगलेकर। मोहम्मद अज़ीज़ और रंजना जोगलेकर की युगल आवाज़ों में "तुझे प्यार कर लूँ यह जी चाहता है" को बेहद सुन्दर तरीके से स्वरबद्ध किया है जिसमें तबले का आकर्षक प्रयोग किया गया है। कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में "कोरी गगरिया मीठा पानी" में कोई नई या ख़ास बात नहीं लगी। उपर से हाल ही में फ़िल्म ’निश्चय’ में "नई सुराही ताज़ा पानी" लोग सुन चुके थे। कविता, रंजना और माधुरी जोगलेकर, इन तीनों ने एक साथ आवाज़ें मिलाई "ख़ून-ए-जिगर से हो लिख देंगे हम तो पहला पहला
Madhuri Joglekar
सलाम सँवरिया के नाम"। इस गीत में तीनों गायिकाएँ पूरा गीत साथ में गाती हैं, इसलिए तीनों आवाज़ों का कॉनट्रस्ट बाहर नहीं आया। अगर तीनों गायिकाएँ बारी-बारी गातीं तो शायद कुछ और बात बनती। कुल मिला कर ’ज़िद’ के गाने सुन्दर और कर्णप्रिय होने के बावजूद फ़िल्म के ना चलने से इनकी तरफ़ लोगों ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। 
और 1995 में ओ. पी. नय्यर के संगीत में ढल कर अन्तिम फ़िल्म लौन्च हुई ’मुक़द्दर की बात’ पर यह फ़िल्म प्रदर्शित नहीं हो सकी। इस फ़िल्म के गाने महेन्द्र कपूर और पुष्पा पगधरे ने गाए। "सोने में सुगन्ध मिलाई गई, तब तेरी काया बनाई गई" एक बेहद सुन्दर युगल गीत है, जो बोल, संगीत और गायन की दृष्टि से उत्तर रचना है। एक और युगल गीत है "क्या यह मुमकिन है हम दोनों मिला करें हर बार, बार बार दुनिया में किसी को कब मिलता है प्यार"। इन गीतों को सुन कर यह बात मन में उठती है कि क्या नय्यर साहब ने ही महेन्द्र कपूर को सबसे ज़्यादा अच्छे गाने दिए हैं! इसी फ़िल्म की एक अन्य सुन्दर रचना है "कैसे ये तारों भरी रात खिली सजना" जो पुष्पा पगधरे की एकल आवाज़ में शास्त्रीय राग में ढल कर बेहद सुन्दर बन पड़ी है। पुष्पा जी की आवाज़ में एक और एकल गीत है "पिया तेरा प्यार मैं तो माँग में सजाऊंगी, जग सारा देखेगा मैं तेरी बन जाऊँगी" जिसमें पंजाबी रंग है और साथ ही इन्टरल्युड में सितार पर शास्त्रीय रंग भी है।

ओ. पी. नय्यर 81 वर्ष की आयु में 28 जनवरी 2007 को इस फ़ानी दुनिया से चले गए। अपने उसूलों के पक्के नय्यर साहब ने कभी अपना सर नहीं झुकाया, फिर चाहे उनके गीत लता और आशा न गाए, उन्होंने कभी किसी के साथ कोई समझौता नहीं किया या किसी के दबाव में नहीं आए। आशा भोसले से अलग होने के बाद उनके गाने कृष्णा कल्ले, वाणी जयराम, पुष्पा पगधरे, उत्तरा केलकर, दिलराज कौर, एस. जानकी, कविता कृष्णामूर्ति, रंजना जोगलेकर और माधुरी जोगलेकर जैसी गायिकाओं ने गाए। गाने सभी उत्कृष्ट बने लेकिन फ़िल्मों के ना चलने से ये गाने भी ठंडे बस्ते में चले गए। 

आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले अंक में गणतन्त्र दिवस विशेषांक में महेन्द्र कपूर के गाए देशभक्ति फ़िल्मी गीतों पर लेख आप सब ने पसन्द किया, हमें बहुत प्रसन्नता हुई। आँकड़ों के अनुसार इस लेख को करीब 162 पाठकों ने पढ़ा है। ’चित्रकथा’ के पिछले तीन अंकों का अब तक का मिला-जुला रीडरशिप है 580, आप सभी के इस स्नेह और सहयोगिता के लिए हम आपके अत्यन्त आभारी हैं और आशा करते हैं कि भविष्य में यूं ही आप अपना साथ बनाए रखेंगे।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

बुधवार, 25 जनवरी 2017

"संगीतकार ही अपने गाने के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक चुन सकता है" - राशिद खान II एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है 
एपिसोड - 47


"राज़ ३", "करले प्यार करले", "हेट स्टोरी" जैसी बड़ी फिल्मों के धुरंधर संगीतकार राशिद खान साहेब हैं हमारे आज के मेहमान, मिलिए 'दीवाना कर रहा है' गीत के दीवाने संगीतकार से आज के एपिसोड में, प्ले का बट्टन दबाएँ और आनंद लें, इस बातचीत का...



ये एपिसोड आपको कैसा लगा, अपने विचार आप 09811036346 पर व्हाट्सएप भी कर हम तक पहुंचा सकते हैं, आपकी टिप्पणियां हमें प्रेरित भी करेगीं और हमारा मार्गदर्शन भी....इंतज़ार रहेगा.

एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें


मिलिए इन जबरदस्त कलाकारों से भी -
राकेश चतुर्वेदी ओम, अनवर सागरसंजीवन लालकुणाल वर्माआदित्य शर्मानिखिल कामथमंजीरा गांगुली, रितेश शाह, वरदान सिंह, यतीन्द्र मिश्र, विपिन पटवा, श्रेया शालीन, साकेत सिंह, विजय अकेला, अज़ीम शिराज़ी, संजोय चौधरी, अरविन्द तिवारी, भारती विश्वनाथन, अविषेक मजुमदर, शुभा मुदगल, अल्ताफ सय्यद, अभिजित घोषाल, साशा तिरुपति, मोनीश रजा, अमित खन्ना (पार्ट ०१), अमित खन्ना (पार्ट २), श्रध्दा भिलावे, सलीम दीवान, सिद्धार्थ बसरूर, बबली हक, आश्विन भंडारे , आर्व, रोहित शर्मा, अमानो मनीष, मनोज यादव, इब्राहीम अश्क, हेमा सरदेसाई, बिस्वजीत भट्टाचार्जी (बिबो), हर्षवर्धन ओझा, रफीक शेख, अनुराग गोडबोले, रत्न नौटियाल, डाक्टर सागर

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

काँच के शामियाने - रश्मि रविजा

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। इस शृंखला में पिछली बार आपने उषा छाबड़ा के स्वर में विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार खलील जिब्रान की लघुकथा "आनंद और पीड़ा" का वाचन सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं रश्मि रविजा के चर्चित उपन्यास काँच के शामियाने का एक अंश जिसे स्वर दिया है पूजा अनिल ने।

प्रस्तुत अंश का कुल प्रसारण समय 8 मिनट 17 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। इस उपन्यास की अधिक जानकारी रश्मि रविजा के ब्लॉग अपनी, उनकी, सबकी बातें उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

“मंजिल मिले ना मिले, ये ग़म नहीं मंजिल की जुस्तजू में, मेरा कारवां तो है।” ‍‍- रश्मि रविजा


हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

“पर भैया तो मरने को तैयार है, फिर मैं क्या करूँ?”
 (रश्मि रविजा के चर्चित उपन्यास काँच के शामियाने से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
काँच के शामियाने MP3

#First Story, Kaanch Ke Shaamiyane; Rashmi Ravija; Hindi Audio Book/2017/1. Voice: Pooja Anil

रविवार, 22 जनवरी 2017

राग आसावरी और तोडी : SWARGOSHTHI – 302 : RAG ASAVARI & TODI



स्वरगोष्ठी – 302 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 2 : दिन के दूसरे प्रहर के राग

“जागो रे, जागो प्रभात आया...”





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारे नई श्रृंखला- “राग और गाने-बजाने का समय” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हम आपसे दिन के द्वितीय प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग आसावरी की एक बन्दिश महान संगीतज्ञ पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग तोड़ी पर आधारित, फिल्म ‘सन्त ज्ञानेश्वर’ का एक गीत मन्ना डे की आवाज़ में सुनवा रहे हैं। 


एक संगीत सभा में पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर
भारतीय संगीत की एक प्रमुख विशेषता यह है कि प्रत्येक राग के गाने-बजाने का एक निश्चित समय माना गया है। शास्त्रकारों ने विभिन्न स्वर-समूहों से उपजने वाले भावों, अपने अनुभव, और मनोवैज्ञानिक आधार पर विभिन्न रागों के प्रयोग का समय निर्धारित किया है। राग के समय निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त बनाए गए है। इस समय-चक्र सिद्धान्त के अनुसार ही रागों का गायन-वादन किया जाता है। कुछ राग इस सिद्धान्त के अपवाद भी हैं तो कुछ राग सार्वकालिक भी हैं। इसी प्रकार कुछ राग सन्धिप्रकाश बेला में ही गाये-बजाए जाते हैं तो कुछ राग केवल ऋतु विशेष पर ही भले लगते हैं। समय के अनुसार रागों को दिन और रात के कुल आठ प्रहरों में बाँटे गए हैं। पिछले अंक में हमने दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा की थी और आपको सुबह के दो राग, भैरव और बिलावल का रसास्वादन कराया था। आज हम आपको दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे। दिन का दूसरा प्रहर प्रातः 9 से मध्याह्न 12 बजे तक माना जाता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग इस सिद्धान्त के अपवाद भी होते हैं, जैसे- बसन्त, तोड़ी, भीमपलासी, देस आदि।

दिन के दूसरे प्रहार का एक अत्यन्त लोकप्रिय राग आसावरी है। इस राग में तीन कोमल स्वर, गान्धार, धैवत और निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग आसावरी में शुद्ध मध्यम स्वर की उपस्थिति होने से अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार यह राग मध्याह्न 12 बजे से पूर्व गाया-बजाया जा सकता है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया राग आसावरी प्रस्तुत करते हैं। तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश में आपको पण्डित बलवन्त राव भट्ट के कण्ठ–स्वर और विदुषी एन. राजम् की वायलिन संगति का आनन्द भी मिलेगा।

राग आसावरी : ‘सजन घर लागे...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर


मन्ना डे
राग आसावरी के अलावा दिन के दूसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- कोमल देसी, खट, गान्धारी, गारा, गौड़ सारंग, जौनपुरी, देव गान्धार, देसी, बरवा, बिलासखानी तोड़ी, गुर्जरी तोड़ी, तोड़ी, मध्यमात सारंग, मियाँ की सारंग, शुद्ध सारंग, सामन्त सारंग, वृन्दावनी सारंग, सुघराई आदि। आज के अंक में दूसरे प्रहर के रागों में से हमने राग तोड़ी का चयन इसलिए किया है कि इस राग में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग होता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार तीव्र मध्यम स्वर वाले राग मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 के बीच प्रयोग किये जाने चाहिए। परन्तु यह राग इस सिद्धान्त का अपवाद है। राग तोड़ी में तीन कोमल स्वरों- ऋषभ, गान्धार, और धैवत की उपस्थिति के कारण दिन के दूसरे प्रहर मे गाने-बजाने कि परम्परा है। राग तोड़ी सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में मध्यम स्वर तीव्र तथा ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होते हैं। अन्य सभी स्वर शुद्ध लगते हैं। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह तोड़ी थाट का आश्रय राग है। राग तोड़ी की झलक दिलाने के लिए अब हम आपको फिल्म ‘सन्त ज्ञानेश्वर’ से एक गीत सुनवा रहे हैं। इस गीत को संगीतकार लक्ष्मीकान्त – प्यारेलाल ने राग तोड़ी के स्वरों में स्वरबद्ध किया है और इसे स्वर दिया है मन्ना डे और साथियों ने। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तोड़ी : “जागो रे, जागो प्रभात आया...” : मन्ना डे और साथी : फिल्म - सन्त ज्ञानेश्वर



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के संगीत पहेली क्रमांक 302 में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 310 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2017 के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।






1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 जनवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 304 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 300वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘जागते रहो’ के एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग - भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आप सभी  प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। 



अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” जारी है। ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली के महाविजेताओं को समर्पित हमारे पिछले दो अंको के बारे में पहेली की प्रथम महाविजेता, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा है-

Thank you very much for all your good work to promote classical music through Swargoshthi having film songs based on classical music. That is a great service to music exposing the general public to some knowledge of classical music through film songs they love.
I am not a well-known person in classical music although I grew up in musical environment with also the training. My objective has been to take classical music to deeper level and connect to spirituality in meditation. I have spent all my extra time in learning and teaching music, performing at times appropriate. I am very grateful to you for considering me a winner on Swargoshthi.

In appreciation,
Vijaya Rajkotia

विजया जी के प्रति हम हार्दिक आभार प्रकट करते हैं। अगले अंक में हम दिन के तीसरे प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा करेंगे और आपको कुछ रागबद्ध रचनाएँ भी सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 21 जनवरी 2017

चित्रकथा - 3: महेन्द्र कपूर के गाए देश-भक्ति गीत


अंक - 3

महेन्द्र कपूर के गाए देश-भक्ति गीत


भारत की बात सुनाता हूँ...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आते हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के तीसरे अंक में आपका हार्दिक स्वागत है।  

आगामी 26 जनवरी को राष्ट्र अपना 68-वाँ गणतन्त्र दिवस मनाने जा रहा है। इस शुभवसपर पर हम आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं। राष्ट्रीय पर्वों पर फ़िल्मी देश-भक्ति के गीतों का चलन शुरु से ही रहा है। और एक आवाज़ जिनके बिना ये पर्व अधूरे से लगते हैं, वह आवाज़ है गायक महेन्द्र कपूर की। उनकी बुलन्द पर सुरीली आवाज़ पाकर जैसे देश-भक्ति की रचनाएँ जीवन्त हो उठती थीं। आइए आज के इस विशेषांक में महेन्द्र कपूर के गाए फ़िल्मी देश भक्ति गीतों की चर्चा करें।




मारे देश के देशभक्तों और वीर सपूतों ने अपने अपने तरीकों से इस मातृभूमि की सेवा की है। और
इस राह में हमारे फ़िल्मी गीतकार, संगीतकार और गायकों का योगदान सराहनीय रहा है। गायकों की बात करें तो महेन्द्र कपूर ने अपनी बेशकीमती आवाज़ के माध्यम से देशभक्ति का अलख जगाया है जिसका प्रमाण समय-समय पर उनकी आवाज़ में हमें मिला है। भले सुनहरे दौर के शीर्षस्थ गायकों में सहगल, रफ़ी, तलत, किशोर, मुकेश और मन्ना डे के साथ महेन्द्र कपूर का नाम नहीं लिया गया, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि देशभक्ति गीत गाने की कला में उनसे ज़्यादा पारदर्शी कोई नहीं। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में देशभक्ति रस के गीत इतने जीवन्त, इतने प्रभावशाली लगते हैं कि वतन-परस्ती का जस्बा और बुलन्द हो जाता है। महेन्द्र कपूर की इसी ख़ूबी का कई संगीतकारों ने बख़ूबी इस्तमाल किया है जब जब उन्हें देशभक्ति के गीतों की ज़रूरत पड़ी अपनी फ़िल्मों में। इस देश पर शहीद होने वाले, इस देश की सेवा करने वाले और देशभक्ति की अग्नि प्रज्वलित करने वाले वतन परस्तों के पैग़ाम को आवाज़ तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण काम करती आई है महेन्द्र कपूर की गाई हुई देशभक्ति की कालजयी रचनाएँ।

कुछ समय पहले जब मैंने महेन्द्र कपूर साहब के सुपुत्र रुहान (रोहन) कपूर से उनके पिता के बारे में
बातचीत की, तब उनसे मैंने यह सवाल किया था कि उन्हें कैसा लगता है जब 26 जनवरी और 15 अगस्त को पूरा देश उनके पिता के गाए देशभक्ति गीतों को सुनते हैं, गुनगुनाते हैं, गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है और कभी कभी आँखें नम हो जाती हैं, तब उन्हें कैसा लगता है? इसके जवाब में रुहान जी ने कहा, "उनकी आवाज़ को सुनना तो हमेशा ही एक थ्रिलिंग् एक्स्पीरिएन्स रहता है, लेकिन ये दो दिन मेरे लिये बचपन से ही बहुत ख़ास दिन रहे हैं। उनकी जोशिली और बुलंद आवाज़ उनकी मातृभूमि के लिये उनके दिल में अगाध प्रेम और देशभक्ति की भावनाओं को उजागर करते हैं। और उनकी इसी ख़ासियत ने उन्हें 'वॉयस ऑफ़ इण्डिया' का ख़िताब दिलवाया था। वो एक सच्चे देशभक्त थे और मुझे नहीं लगता कि उनमें जितनी देशभक्ति की भावना थी, वो किसी और लीडर में होगी। He was a human par excellence! अगर मैं यह कहूँ कि वो मेरे सब से निकट के दोस्त थे तो ग़लत न होगा। I was more a friend to him than anybody on planet earth। हम दुनिया भर में साथ साथ शोज़ करने जाया करते थे और मेरे ख़याल से हमने एक साथ हज़ारों की संख्या में शोज़ किये होंगे। वो बहुत ही मिलनसार और इमानदार इंसान थे, जिनकी झलक उनके सभी रिश्तों में साफ़ मिलती थी।"

शोज़ की बात चल पड़ी है तो महेन्द्र कपूर ने ’विविध भारती’ के ’जयमाला’ कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को संबोधित करते हुए एक बार कहा था, "हम सब इस देश के निवासी हैं, हम सभी को यह देश बहुत प्यारा है। हमें इस पर मान है और होना भी चाहिए क्योंकि पूरी दुनिया में ऐसा देश और कहीं नहीं है। मैं जब भी बाहर यानी फ़ौरेन जाता हूँ, देश की यादें साथ लेकर जाता हूँ, और इस गाने से हर प्रोग्राम शुरु करता हूँ।" और यह गाना है फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम’ का, "है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहाँ के गाता हूँ, भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ"। इस फ़िल्म के इस सर्वाधिक लोकप्रिय गीत के अलावा महेन्द्र कपूर की आवाज़ से सजे दो और देशभक्ति गीत थे, "दुल्हन चली बहन चली तीन रंग की चोली" (लता के साथ) और "पूर्वा सुहानी आई रे" (लता और मनहर के साथ)।

भले हमने पहले ’पूरब और पश्चिम’ की बात कर ली, पर महेन्द्र कपूर, मनोज कुमार और देशभक्ति गीत की तिकड़ी की यह पहली फ़िल्म नहीं थी। इस तिकड़ी की पहली फ़िल्म थी 1965 की ’शहीद’ जिसमें मनोज कुमार ने शहीद भगत सिंह की भूमिका अदा की थी। महेन्द्र कपूर, मुकेश और राजेन्द्र मेहता का गाया "मेरा रंग दे बसन्ती चोला माय रंग दे" अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था। बाद में समय समय पर इस गीत के कई संस्करण बने पर ’शहीद’ फ़िल्म के इस गीत का स्थान हमेशा शीर्षस्थ रहा। इसके दो वर्ष बाद मनोज कुमार लेकर आए अपनी अगली फ़िल्म ’उपकार’। इस गीत में महेन्द्र कपूर के गाए "मेरे देश की धरती सोना उगले" ने तो इतिहास रच डाला। इस गीत के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। और फिर आया 1970 जब ’पूरब और पश्चिम’ प्रदर्शित हुई।

70 के दशक में भी मनोज कुमार और महेन्द्र कपूर की जोड़ी बरक़रार रही हालाँकि इस दशक में मनोज कुमार ने देशभक्ति की कोई फ़िल्म नहीं बनाई। 1970 की फ़िल्म ’होली आई रे’ में महेन्द्र कपूर का गाया
"चल चल रे राही चल रे" भले सीधे-सीधे देशभक्ति गीत ना हो, पर देश की उन्नति के लिए सही राह पर चलने का सीख ज़रूर देती है। इसी तरह से 1972 की फ़िल्म ’शोर’ में आंशिक रूप से देशभक्ति गीत "जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम" में मन्ना डे और श्यामा चित्तर के साथ महेन्द्र कपूर ने अपनी जोशिली आवाज़ मिलाई और इस गीत को एक सुमधुर अंजाम दिया। और फिर आया 1981 का साल और प्रादर्शित हुई ’क्रान्ति’। और एक बार फिर से मनोज कुमार और महेन्द्र कपूर ने देशभक्ति गीतों की परम्परा को आगे बढ़ाया। महेन्द्र कपूर की एकल आवाज़ में "अब के बरस तुझे धरती की रानी कर देंगे" ने सिद्ध किया कि 80 के दशक में भी उनसे बेहतर देशभक्ति गीत गाने वाला दूसरा कोई नहीं। इसी फ़िल्म में लता मंगेशकर, मन्ना डे, शैलेन्द्र सिंह और नितिन मुकेश के साथ "दिलवाले तेरा नाम क्या है, क्रान्ति क्रान्ति" गीत में महेन्द्र कपूर की आवाज़ की गूंज दिल को छू गई। ’क्रान्ति’ के बाद मनोज कुमार की देशभक्ति की फ़िल्में दर्शकों के दिलों को छू न सकी और फ़िल्में फ़्लॉप होती गईं। ऐसी ही एक फ़्लॉप फ़िल्म थी 1989 की ’क्लर्क’ जिसमें महेन्द्र कपूर के दो देशभक्ति गीत थे; पहला लता मंगेशकर के साथ "झूम झूम कर गाओ रे, आज पन्द्रह अगस्त है" तथा दूसरा गीत उनकी एकल आवाज़ में था "कदम कदम बढ़ाए जा, ख़ुशी के गीत गाएजा"। इस गीत को भी पहले कई कलाकारों ने गाया होगा, पर महेन्द्र कपूर की बुलन्द आवाज़ ने इस गीत के जस्बे को आसमाँ तक पहुँचा दिया।

महेन्द्र कपूर ने केवल मनोज कुमार ही की फ़िल्मों में देशभक्ति गीत गाए हैं ऐसी बात नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महेन्द्र कपूर का गाया पहला फ़िल्मी देशभक्ति गीत आया था 1959 की फ़िल्म ’नवरंग’ में। कहना ज़रूरी है कि ’सोहनी महिवाल’ के बाद ’नवरंग’ ही वह फ़िल्म थी जिसमें महेन्द्र कपूर के गाए गीतों ने उन्हें पहली-पहली बड़ी सफलता दिलाई थी। भरत व्यास के लिखे देशभक्ति गीत "ना राजा रहेगा, ना रानी रहेगी, यह दुनिया है फ़ानी फ़ानी रहेगी, ना जब एक भी ज़िन्दगानी रहेगी, तो माटी सबकी कहानी कहेगी" को गा कर महेन्द्र कपूर ने पहली बार देशभक्ति गीत की उनकी अपार क्षमता का नमूना प्रस्तुत किया था। इस गीत में छत्रपति शिवाजी और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसे वीरों का उल्लेख मिलता है। इस फ़िल्म के बाद 1963 की फ़िल्म ’कण कण में भगवान’ में महेन्द्र कपूर को देशभक्ति गीत गाने का मौका मिला। गीतकार एक बार फिर भरत व्यास। इनका लिखा और शिवराम कृष्ण का स्वरबद्ध किया यह गीत था "भारत भूमि महान है, तीर्थ इसके प्राण, चारों दिशा में चौमुख दीप से इसके चारों धाम है"। 

1965 में ’शहीद’ के अलावा एक और उल्लेखनीय फ़िल्म थी ’सिकन्दर-ए-आज़म’ जिसमें रफ़ी साहब का गाया "वो भारत देश है मेरा" सर्वश्रेष्ठ देशभक्ति गीतों में शामिल होने वाला गीत था। इसी फ़िल्म में महेन्द्र कपूर ने भी एक सुन्दर देशभक्ति गीत गाया "ऐ माँ, तेरे बच्चे कई करोड़..."। अगर रफ़ी साहब के गीत में भारत का गुणगान हुआ है तो राजेन्द्र कृष्ण के लिखे महेन्द्र कपूर के इस गीत में देश के लिए मर मिटने का जोश जगाया गया है। संगीतकार हंसराज बहल का इस गीत के लिए महेन्द्र कपूर की आवाज़ को चुनना उचित निर्णय था। हमारी महान संस्कृति ने हमारी इस धरती को दिए हैं अनगिनत ऐसी संताने जो इस देश पर मत मिट कर हमें भी इसी राह पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। अपनी शौर्य और पराक्रम की गाथा से हमें देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने की पाठ पढ़ाते हैं। और ऐसी ही महामानवों की अमर गाथा को अपनी आवाज़ से और ओजस्वी बना दिया है महेन्द्र कपूर ने। 1972 में एक देशभक्ति फ़िल्म बनी थी ’भारत के शहीद’ के शीर्षक से। देशभक्ति गीतों के गुरु प्रेम धवन को गीतकार-संगीतकार के रूप में लिया गया। इस फ़िल्म में यूं तो कई देशभक्ति गीत थे, पर सर्वाधिक लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ महेन्द्र कपूर का गाया "संभालो ऐ वतन वालों, वतन अपना संभालो"। इन्हीं की आवाज़ में इस फ़िल्म के दो और गीत थे "मोहनदास करमचन्द गांधी, परम पुजारी अहिंसा के" और "इधर सरहद पे बहता है लहू अपने जवानों का"। 1975 में युद्ध पर बनी फ़िल्म ’आक्रमण’ में आशा भोसले के साथ मिलकर महेन्द्र कपूर ने एक देशभक्ति क़व्वाली गाई जिसके बोल थे "पंजाबी गाएंगे, गुजराती गाएंगे, आज हम सब मिल कर क़व्वाली गाएंगे"। सीधे-सीधे देशभक्ति गीत ना होते हुए भी राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ावा देता है यह गीत।

80 के दशक में महेन्द्र कपूर के कई देशभक्ति गीत सुनाई दिए। ’होली आई रे’, ’उपकार’ और ’पूरब और पश्चिम’ में कल्याणजी-आनन्दजी संगीतकार थे तो ’शोर’ और ’क्रान्ति’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल। 80 के दशक में लक्ष्मी-प्यारे ने महेन्द्र कपूर से कई गीत गवाए। 1981 की ’क्रान्ति’ के बाद 1982 की फ़िल्म ’राजपूत’ में मनहर और हेमलता के साथ उनका गाया "सबने देश का नाम लिया, हमने दिल को थाम लिया" गीत था। 1985 की फ़िल्म ’सरफ़रोश’ में भी लक्ष्मी-प्यारे ने कपूर साहब से देशभक्ति गीत गवाए जिसके बोल थे "तन्दाना तन्दाना, याद रखना भूल ना जाना, वीर अमर शहीदों की यह क़ुरबानी, देश भक्त भगत सिंह की यह कहानी"। इस गीत में सुरेश वाडकर ने भी अपनी आवाज़ मिलाई। 1987 की फ़िल्म ’वतन के रखवाले’ में तो एल.पी. ने महेन्द्र कपूर से फ़िल्म का शीर्षक गीत ही गवा डाला, जिसके सुन्दर बोल थे "जिस धरती के अंग अंग पर रंग शहीदों ने डाले, उस धरती को दाग़ लगे ना देख वतन के रखवाले"। ये बोल थे मजरूह सुल्तानपुरी के।

एक और संगीतकार जिनके लिए महेन्द्र कपूर ने बहुत से गाए हैं, वो हैं रवि। फ़िल्म ’हमराज़’ में "ना मुंह छुपा के जियो और ना सर झुका के जियो" को देशभक्ति गीत तो नहीं कहा जा सकता, पर सर उठा कर जीने की सलाह ज़रूर दी गई है। आगे चल कर 80 के दशक में बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों में रवि साहब के संगीत निर्देशन में महेन्द्र कपूर ने बहुत से गीत गाए जिनमें कुछ देशभक्ति गीत भी थे। 1984 की फ़िल्म ’आज की आवाज़’ में शीर्षक गीत सहित दो देशभक्ति गीत थे। शीर्षक गीत "आज की आवाज़ जाग ऐ इंसान" और दूसरा गीत था "रो रो कर कहता है हिमालय और गंगा का पानी, आज़ादी पा कर भी हमने क़दर ना इसकी जानी, भारत तो है आज़ाद हम आज़ाद कब कहलाएंगे, कभी रामराज के दिन अब आयेंगे कि ना आयेंगे"। गीतकार हसन कमाल। 1987 की फ़िल्म ’आवाम’ में भी रवि का संगीत था जिसमें हसन कमाल ने "रघुपति राघव राजा राम" गीत को आगे बढ़ाते हुए लिखा है "ऐ जननी ऐ हिन्दुस्तान तेरा है हम पर अहसान, तेरी ज़मीं पर जनम लिया जब मैं बढ़ी तब अपनी शान, तन मन धन तुझपे कुरबान कोटी कोटी है तुझको प्रणाम, रघुपति राघव राजा राम"। इस गीत को महेन्द्र कपूर और आशा भोसले ने गाया था।

बी. आर. चोपड़ा ने 1983 में ’मज़दूर’ शीर्षक से एक फ़िल्म बनाई थी जिसके संगीत के लिए राहुल देव बर्मन को साइन करवा कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। और पंचम ने भी चोपड़ा साहब की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए महेन्द्र कपूर के लिए तैयार किया एक देशभक्ति गीत। एक बार फिर हसन कमाल के लिखे इस गीत ने धूम मचाई। गीत के बोल थे "हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा माँगेंगे, एक बाग़ नहीं एक खेत नहीं हम सारी दुनिया माँगेंगे..."। मज़दूरों की आवाज़ बन कर महेन्द्र कपूर की आवाज़ ऐसी गूंजी कि फ़िल्म के फ़्लॉप होने के बावजूद यह गीत रेडियो पर सालों तक देशभक्ति गीतों के कार्यक्रम में बजता रहा। 1984 में एक कमचर्चित फ़िल्म आई थी ’आज के शोले’ जिसमें सत्यम और कमलकान्त का संगीत था। इस फ़िल्म के शुरुआती सीन में ही महेन्द्र कपूर का गाया एक देशभक्ति गीत था जिसके बोल हैं "वतन की आबरू पर जान देने वाले जागे हैं, हमारे देश के बच्चे ज़माने भर से आगे हैं, लेके सर हथेली पर ये नन्ही नन्ही जाने, आज चली है दुनिया से ये ज़ुल्म का नाम मिटाने"।

इस तरह से महेन्द्र कपूर ने हर दौर के गीतकारों और संगीतकारों के लिए देशभक्ति गीत गाए। सी. रामचन्द्र, शिवराम कृष्ण, हंसराज बहल, प्रेम धवन, कल्याणजी-आनन्दजी, रवि, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन, उत्तम-जगदीश के संगीत में महेन्द्र कपूर की बुलन्द आवाज़ ने भरत व्यास, प्रेम धवन, मजरूह, इन्दीवर, हसन कमाल, संतोष आनन्द जैसे गीतकारों की रचनाओं को अमर बना दिया। जब जब वतन की आन-बान और यशगाथा के वर्णन करने की बात आती थी किसी गीत में, तब तब महेन्द्र कपूर की आवाज़ जैसे और प्रखर हो उठती थी, और पूरे जोश के साथ निकल पड़ती थी उनकी ज़ुबान से।

आपकी बात

’चित्रकथा’ की पहली कड़ी को आप सभी ने सराहा, जिसके लिए हम आपके आभारी हैं। इस कड़ी की रेडरशिप 13 जनवरी तक 154 आयी है। हमारे एक पाठक श्री सुरजीत सिंह ने यह सुझाव दिया है कि क्यों ना इसे हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में प्रकाशित की जाए! सुरजीत जी, आपका सुझाव बहुत ही अच्छा है, लेकिन फ़िलहाल समयाभाव के कारण हम ऐसा कर पाने में असमर्थ हैं। भविष्य में अवकाश मिलने पर हम इस बारे में विचार कर सकते हैं, पर इस वक़्त ऐसा संभव नहीं, इसके लिए हमें खेद है।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

चाहा था एक शख़्स को... कहकशाँ-ए-तलबगार में आशा की गुहार

महफ़िल ए कहकशाँ 19


आशा भोंसले और खय्याम 
दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है आशा भोंसले की आवाज़ में एक गज़ल, मौसिकार हैं खय्याम और कलाम है हसन कमाल का |  







मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी

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