Thursday, March 31, 2016

निगाहों से हमें समझा रहे हैं ग़ुलाम अली आज कहकशाँ में



कहकशाँ - 6
आज की ग़ज़ल में ग़ुलाम अली
निगाहों से हमें समझा रहे हैं...




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है ग़ुलाम अली की गाई हुई एक ग़ज़ल।





साल 1983 में पैशन्स (Passions) नाम की ग़ज़लों की एकग ऐल्बम आई थी। उस एलबम में एक से बढ़कर एक कुल नौ गज़लें थी। मज़े की बात है कि इन नौ ग़ज़लों के लिए आठ अलग-अलग गज़लगो थे: प्रेम वरबरतनी, एस एम सादिक़, अहमौम फ़राज़, हसन रिज़वी, मोहसिन नक़्वी, चौधरी बशीर, जावेद कुरैशी और मुस्तफा ज़ैदी। और इन सारे गज़लगो की गज़लों को जिस फ़नकार या कहिए गुलूकार ने अपनी आवाज़ और साज़ से सजाया था आज की यह महफिल उन्हीं को नज़र है। उम्मीद है कि आप समझ ही गए होंगे। जी हाँ, हम आज पटियाला घराना के मशहूर पाक़िस्तानी फ़नकार "ग़ुलाम अली" साहब की बात कर रहे हैं।

ग़ुलाम अली साहब, जो कि बड़े ग़ुलाम अली साहब के शागिर्द हैं और जिनके नाम पर इनका नामकरण हुआ है, गज़लों में रागों का बड़ा ही बढ़िया प्रयोग करते हैं। बेशक़ ही ये घराना-गायकी से संबंध रखते हैं, लेकिन घरानाओं (विशेषकर पटियाला घराना) की गायकी को किस तरह गज़लों में पिरोया जाए, इन्हें बख़ूबी आता है। ग़ुलाम अली साहब की आवाज़ में वो मीठापन और वो पुरकशिश ताज़गी है, जो किसी को भी अपना दीवाना बना दे। अपनी इसी बात की मिसाल रखने के लिए हम आपको ’पैशन्स’ ऐल्बम से एक गज़ल सुनाते हैं, जिसे लिखा है जावेद कुरैशी ने। हाँ, सुनते-सुनते आप मचल न पड़े तो कहिएगा।

अच्छा रूकिये, सुनने से पहले थोड़ा माहौल बनाना भी तो ज़रूरी है। अरे भाई, गज़ल ऐसी चीज़ है जो इश्क़ के बिना अधूरी है और इ्श्क़ एक ऐसा शय है जो अगर आँखों से न झलके तो कितने भी लफ़्ज क्यों न कुर्बान किए जाएँ, सामने वाले पर कोई असर नहीं होता। इसलिए आशिक़ी में लफ़्ज़ परोसने से पहले ज़रूरी है कि बाकी सारी कवायदें पूरी कर ली जाएँ। और अगर आशिक़ आँखों की भाषा न समझे तो सारी आशिक़ी फिज़ूल है। मज़ा तो तब आता है जब आपका हबीब लबों से तबस्सुम छिरके और आँखों से सारा वाक्या कह दे। इसी बात पर मुझे अपना एक पुराना शेर याद आ रहा है:

दबे लब से मोहब्बत की गुज़ारिश हो जो महफिल में,
न होंगे कमगुमां हम ही, न होंगे वो ही मुश्किल में।

यह तो हुआ मेरा शेर, अब हम उस ग़ज़ल की ओर बढ़ते हैं जिसके लिए आज की कहकशाँ जगमगाई है। वह ग़ज़ल और उसके बोल आप सबके सामने पेशे-खिदमत है:

निगाहों से हमें समझा रहे हैं
नवाज़िश है करम फ़रमा रहे हैं

मैं जितना पास आना चाहता हूँ
वो उतना दूर होते जा रहे हैं

मैं क्या कहता किसी से बीती बातें
वो ख़ुद ही दास्ताँ दोहरा रहे हैं

फ़साना शौक़ का ऐसे सुना है
तबस्सुम ज़ेर-ए-लब फ़रमा रहे हैं









’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’ 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, March 30, 2016

मेलोडी की नयी बहार लाये हैं युवा संगीतकार अनुराग गोडबोले : एक मुलाक़ात ज़रूरी है


एक मुलाक़ात ज़रूरी है (3) 
संगीतकार गायक अनुराग गोडबोले 
राठी फिल्मों से हिंदी फिल्म संगीत जगत में कदम रखा है युवा संगीतकार अनुराग गोडबोले ने अपने साथी चिन्मय के साथ, अपनी पहली फिल्म "१९८२ अ लव मैरिज" के साथ. कार्यक्रम एक मुलाकात ज़रूरी है में आज हम आपको मिलवा रहे हैं इसी युवा संगीतकार से. सुनिए और एन्जॉय करें इस संवाद को और साथ ही सुनें इस ताज़ा फिल्म के कुछ सुरीले गीत भी.

Tuesday, March 29, 2016

शॉर्टकट टु हैपिनैस - अनुराग आर्या


लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने स्वर-कलाकार "संज्ञा टण्डन" की विशिष्ट प्रस्तुति में, पूजा अनिल के स्वर में गौतम राजऋषि की कथा "लेम्बरेटा, नन्ही परी और एक ठिठकी शाम" का पाठ सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, डॉ अनुराग आर्या की रचना शॉर्टकट टु हैपिनैस, स्पेन से पूजा अनिल के स्वर में।

 इस कहानी शॉर्टकट टु हैपिनैस का कुल प्रसारण समय 7 मिनट 43 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



जब हम एक वक़्त से दूसरे वक़्त, एक शहर से दूसरे शहर, एक देश से दूसरे देश में अपने अपने कारणों के लिए बसते है, हम अपने भीतर ढेर सारी चीज़े साथ लेकर चलते है जिसमे चाही अनचाही बहुत सी चीज़े होती है। जीवित - निर्जीव दोनों! अज़ीब बात है कभी कभी हम उन्ही चीज़ो को बचाये रखते है जिन्हे हम खोना चाहते थे!
~ डॉ अनुराग आर्या
मेरठ में रहने वाले डॉ अनुराग आर्या पेशे से डर्मेटोलॉजिस्ट हैं। शौकिया लिखते हैं। मुख्य तौर पर उनके संस्मरण ब्लॉग जगत में खूब सराहे गए हैं। इसके अलावा त्रिवेणी और नज़्म लिखना उन्हें पसंद है। उनके ब्लॉग दिल की बात का लिंक है: www.anuragarya.blogspot.com

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी


"अम्मा जितना डांटती हैं, वह उतना ही खिलखिलाती है।”
 (डॉ अनुराग आर्या की रचना "शॉर्टकट टु हैपिनैस" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
डॉ अनुराग आर्य की रचना शॉर्टकट टु हैपिनैस MP3

#Tenth Story, Shortcut to Happiness: Anurag Arya/Hindi Audio Book/2016/10. Voice: Pooja Anil

Monday, March 28, 2016

हिंदी फिल्म इतिहास का वो साल : सन १९५६ : मेरे ये गीत याद रखना


साल १९५६, कैसा था हिंदी फिल्म के इतिहास का, किन गीतों ने मचाई धूम, किन संगीतकारों का रहा दबदबा, किन गीतकारों ने चलाया कलम का जादू, वो कौन सी आवाजें थी जिन्होंने श्रोताओं के दिलों पर राज़ किया, जानिए इस साल की कहानी कार्यक्रम "मेरे ये गीत याद रखना" के इस एपिसोड में, आपके प्रिय विवेक श्रीवास्तव के साथ

Sunday, March 27, 2016

राग काफी : SWARGOSHTHI – 263 : RAG KAFI




स्वरगोष्ठी – 263 में आज

होली और चैती के रंग – 1 : राग काफी

राग काफी में रची-बसी फागुनी रचनाएँ





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – ‘होली और चैती के रंग’ आरम्भ हो रही है। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम ऋतु के अनुकूल भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों और रचनाओं की चर्चा करेंगे, जिन्हें ग्रीष्मऋतु के शुरुआती परिवेश में गाने-बजाने की परम्परा है। भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव, प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। अबीर-गुलाल के उड़ते बादलों और पिचकारियों से निकलती इन्द्रधनुषी फुहारों के बीच आज के अंक में और अगले अंक में भी हम फागुन की सतरंगी छटा से सराबोर होंगे। संगीत के सात स्वर, इन्द्रधनुष के सात रंग बन कर हमारे तन-मन पर छा जाएँगे। भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी असंख्य रचनाएँ हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। आज हम आपको राग काफी के स्वरों पर तैरती कुछ फागुनी रचनाएँ सुनवा रहे हैं।


मारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है- काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। आइए, पहले हम राग काफी के स्वरों की संरचना पर विचार करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिया राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर ने राग काफी में एक मोहक तराना गाया है। अब हम आपके लिए द्रुत तीनताल में निबद्ध वही काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए सुनिए यह तराना और शब्दों के स्थान पर काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए।


राग काफी : द्रुत तीनताल में निबद्ध तराना : स्वर – विदुषी मालिनी राजुरकर




होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधा-कृष्ण की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मनमोहक काफी होरी।


काफी होरी : ‘तुम तो करत बरजोरी...’ : स्वर – विदुषी गिरिजा देवी




अब हम आपको सुनवाते है, राग काफी पर आधारित एक फिल्मी गीत। 1963 में एक फिल्म- ‘गोदान’ प्रदर्शित हुई थी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित थी यह फिल्म, जिसके संगीतकार थे विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और विभिन्न लोक संगीत शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर-समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म- ‘गोदान’ के इस होली गीत का। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग काफी : फिल्म – गोदान : ‘होली खेलत नन्दलाल बिरज में...’ : मुहम्मद रफी





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 263वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग पर आधारित गीत है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 2 अप्रैल, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 265वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 261 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1979 में प्रदर्शित फिल्म ‘मीरा’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पूर्वी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – सितारखानी और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – वाणी जयराम

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागी सही उत्तर देकर विजेता बने हैं। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


पिछली श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ पहेली की पहली श्रृंखला 251वें अंक से लेकर 260वें अंक के बीच आयोजित की गई थी। 251वें अंक में पहेली का प्रश्न नहीं पूछा गया था। इस प्रकार 9 अंको में अधिकतम 18 अंक हुए। श्रृंखला के कुल 12 प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना करने के बाद पहले तीन स्थान पर 6 प्रतिभागियों ने विजेता होने का सम्मान प्राप्त किया है। 18 में से 18 अंक अर्जित कर प्रथम स्थान पर चार विजेता हैं- वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। 16 अंक प्राप्त कर दूसरे स्थान पर चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल विजेता हुए हैं। इसी क्रम में 4 अंक अर्जित कर मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने तीसरा स्थान प्राप्त किया है। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप पर्व और ऋतु के अनुकूल श्रृंखला ‘होली और चैती के रंग’ की पहली कड़ी का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के पहले अंक में हमने आपसे राग काफी की चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पास हर सप्ताह आपकी फरमाइशे आती हैं। हमारे कई पाठकों ने ‘स्वरगोष्ठी’ में दी जाने वाली रागों के विवरण के प्रामाणिकता की जानकारी माँगी है। उन सभी पाठकों की जानकारी के लिए बताना चाहूँगा कि रागों का जो परिचय इस स्तम्भ में दिया जाता है, वह प्रामाणिक पुस्तकों से पुष्टि करने का बाद ही लिखा जाता है। यह पुस्तकें है; संगीत कार्यालय, हाथरस द्वारा प्रकाशित और श्री वसन्त द्वारा संकलित और श्री लक्ष्मीनारायण गर्ग द्वारा सम्पादित ‘राग-कोष’, संगीत सदन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित और श्री हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘राग परिचय’ तथा आवश्यकता पड़ने पर पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के ग्रन्थ ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’। हम इन ग्रन्थों से साभार पुष्टि करके ही आप तक रागों का परिचय पहुँचाते हैं। आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

 


Saturday, March 26, 2016

BAATON BAATON MEIN - 17: INTERVIEW OF LYRICIST SHAKEEL BADAYUNI'S SON JAVED BADAYUNI

बातों बातों में - 17

गीतकार शकील बदायूनी के पुत्र जावेद बदायूनी से बातचीत 


"मुझे फ़क़्र है मेरी शायरी मेरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज मार्च 2016 का चौथा शनिवार है। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं फ़िल्म जगत के मशहूर गीतकार और अदबी शायर शकील बदायूनी के पुत्र जावेद बदायूनी से की गई बातचीत के सम्पादित अंश। जावेद साहब से यह बातचीत वर्ष 2011 में की गई थी। संयोग से उस दिन होली था। क्योंकि इस सप्ताह हम होली का त्योहार मना रहे हैं, इसलिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के ख़ज़ाने से हम इसे आपके लिए दुबारा चुन लाए हैं।

    


जावेद बदायूनी साहब, नमस्कार, और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' परिवार की तरफ़ से आपको और आपके पूरे परिवार को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!


शुक्रिया बहुत बहुत, और आपको भी होली की शुभकामनाएँ! मुझे याद करने के लिए आपका शुक्रिया!

आज का दिन बड़ा ही रंगीन है, और हमें बेहद ख़ुशी है कि आज के दिन आप हमारे पाठकों से रु-ब-रु हो रहे हैं। 

मुझे भी बेहद ख़ुशी है अपने वालिद के बारे में बताने का मौका पाकर।

जावेद साहब, इससे पहले कि मैं आप से शकील साहब के बारे में सवालात का सिलसिला शुरु करूँ,  मैं यह कहना चाहूँगा कि यह बड़ा ही संयोग की बात है कि हमारी और आपकी बातचीत होली के मौक़े पर हो रही है और शकील साहब ने होली पर एक नहीं दो नहीं बल्कि बहुत सारे गीत लिखे हैं।

जी हाँ,, आपने ठीक कहा, उन्होंने कई होली गीत फ़िल्मों के लिए लिखे हैं। ’मदर इण्डिया’ में शमशाद बेगम का गाया "होली आई रे कन्हाई, रंग छलके, सुना दे ज़रा बांसुरी", शायद यही उनका पहला मशहूर होली गीत था।

जी। और इसके बाद भी उन्होंने कई और गीत लिखे जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे। फ़िल्हाल यह बताइए कि जब आप छोटे थे, तब पिता के रूप में शकील साहब का बरताव कैसा हुआ करता था? घर परिवार का माहौल कैसा था?


जावेद बदायूनी
एक पिता के रूप में उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता था, और सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं, अपने सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे और सब से हँस खेल कर बातें करते थे। यानी कि घर का माहौल बड़ा ही ख़ुशनुमा हुआ करता था। कई परिवारों में ऐसा देखा गया है कि पिता बहुत सख़्त होते हैं जिस वजह से बच्चे उनके साथ घुलमिल नहीं सकते, एक दूरी बनी रहती है हमेशा। पर हमारे साथ ऐसा बिलकुल नहीं हुआ। बहुत ही शानदार यादें हैं मेरे मन में अपने वालिद के।

क्या उस समय घर पर शायरों का आना जाना लगा रहता था?

जी हाँ जी हाँ, शकील साहब के दोस्त लोगों का आना जाना लगा ही रहता था जिनमें बहुत से शायर भी होते थे। घर पर ही शेर-ओ-शायरी की बैठकें हुआ करती थीं। एक अदबी माहौल होता था घर पर। 

शकील साहब ने अपने एक पुराने इंटरव्यु में ऐसा कहा था कि उनके करीयर को चार पड़ावों में विभाजित किया जा सकता है। पहले भाग में 1916 से 1936 का समय जब वे बदायूँ में रहा करते थे। फिर 1936 से 1942 का समय अलीगढ़ का; 1942 से 1946 का दिल्ली का उनका समय, और 1946 के बाद बम्बई का सफ़र। हमें उनकी फ़िल्मी करीयर, यानी कि बम्बई के जीवन के बारे में तो फिर भी पता है, क्या आप पहले तीन के बारे में कुछ बता सकते हैं?

शकील साहब का जन्म बदायूँ में हुआ, उनके वालिद का नाम था मोहम्मद जमाल अहमद सोख़ता क़ादरी। वो चाहते थे कि उनके बेटे का करीअर बहुत अच्छा हो। इसलिए उन्होंने घर पर ही अरबी, उर्दू, फ़ारसी और हिन्दी के ट्युशन का इन्तज़ाम कर दिया।

इसका मतलब कि जैसे ज़्यादातर शायरों को यह परम्परा विरासत में मिली होती है, शकील साहब के साथ ऐसा नहीं हुआ?

बिलकुल नहीं हुआ!

फिर शेर-ओ-शायरी क चसका उन्हें कैसे लगा?


उनके एक दूर के रिश्तेदार हुआ करते थे जिनका नाम था ज़िया-उल-क़ादरी बदायूनी। वो एक मज़हबी शायर थे। तो उनकी शायरी से शकील साहब काफ़ी प्रभावित हुए। और साथ ही बदायूँ का समकालीन माहौल कुछ ऐसा था कि इस तरफ़ उनका रुझान हुआ। और वो शेर-ओ-शायरी की तरफ़ मुड़ गए।

सार्वजनिक रूप से शकील साहब ने शेर-ओ-शायरी और मुशायरों में हिस्सा लेना कब से शुरु किया?

1936 में जब उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया, तब से वो इन्टर-कॉलेज, इन्टर-यूनिवर्सिटी मुशायरों में हिस्सा लेते थे और अक्सर जीत भी जाते। यह सिलसिला उस ज़माने से शुरु हुआ। तब उनकी उम्र कोई 20 साल की होगी। उनका काफ़ी नाम हो गया था उस समय से ही। 

आपने बताया कि बदायूं में उनके दूर के रिश्तेदार से प्रभावित होकर उनके अन्दर शायरी के अन्कुर फूटे। क्या किसी और से भी उन्होंने कोई तालीम ली?

अलीगढ़ के दिनों में उन्होंने उर्दू में पारदर्शी बनने के लिए हकीम अब्दुल वहीद ’अश्क़’ बिजनोरी से ट्युशन लेने लगे। बस यहीं तक, बाक़ी सब उनके अन्दर ही था।

पढ़ाई पूरी होने के बाद क्या वो दिल्ली आ गए थे?

1940 में उनका निकाह मेरी वालिदा से हुआ, मेरी वालिदा का नाम है सलमा। मेरी वालिदा उनके दूर के रिश्तेदारों में थीं और बचपन से वो मेरे वालिद साहब को जानती भी थीं। लेकिन उनके परिवार में परदा का रिवाज़ था जिस वजह से दोनों कभी पास नहीं आ सके थे उन दिनों। और ना ही कभी मेरे वालिद ने उसे देखा था। तो निकाह हो गया, और बी.ए. की डिग्री लेकर वो दिल्ली चले गए बतौर सपलाई अफ़सर। साथ ही ख़ाली समय में शौक़िया तौर पर मुशायरों में भाग लेना नहीं भूलते। उनका नाम चारों तरफ़ फ़ैलने लगा था। अलीगढ़, बदायूँ से निकल कर दिल्ली में भी उनका नाम हो गया और धीरे-धीरे पूरे हिन्दुस्तान में उनकी चर्चा होने लगी।

वाह! बहुत ख़ूब!

ये वो दिन थे जब शायर अक्सर समाज के दलित और शोषित वर्गों के लिए लिखा करते थे, उनके उत्थान के लिए, समाज की भलाई के लिए। पर शकील साहब की शायरी का रंग बिलकुल अलग था। उनकी शायरी में रोमान्स था जो दिल के बहुत क़रीब था। उनकी शायरी में नयापन था जो लोगों को पसन्द आया। वो अक्सर कहते थे मैंने सुना है "मैं शकील दिल का हूँ तरजुमाँ, कह मोहब्बतों का हूँ राज़दाँ, मुझे फ़क़्र है मेरी शायरी मेरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं"।

वाह! क्या बात है! अच्छा ये सब बातें दिल्ली की हैं। दिल्ली से बम्बई तक का फ़सला कैसे और कब मिटा?


शकील साहब लता जी से क्या कह रहे हैं भला?
शकील साहब 1944 में बम्बई शिफ़्ट हो गए थे। वो फ़िल्मों में गाने लिखना चाहते थे। शुरुआत मुशायरों से ही की। वहाँ भी वो मुशायरों की जान बन बैठे बहुत जल्दी ही। ऐसे ही किसी एक मुशायरे में नौशाद साहब और ए. आर. कारदार साहब भी गये हुए थे और इन्होंने शकील साहब को नज़्म पढ़ते हुए वहाँ सुना। उन पर शकील साहब की शायरी का बहुत असर हुआ। उन्हें लगा कि शकील साहब एक सफल फ़िल्मी गीतकार बन सकते हैं। तो कारदार साहब और नौशाद साहब उनसे मिले और नौशाद साहब ने उनसे पूछा कि क्या आप अपने शायराना अंदाज़ का बयाँ एक लाइन में कर सकते हैं? इस सवाल पर शकील साहब का जवाब था "हम दर्द का अफ़साना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की एक आग लगा देंगे"।

वाह!

बस फिर क्या था, नौशाद साहब ने फ़ौरन कारदार साहब से कह कर उन्हें 1947 की फ़िल्म ’दर्द’ में गाने लिखने के लिए साइन करवा लिया। और इसी शेर को इस फ़िल्म का टाइटल सॉंग् भी बनाया गया, "हम दर्द का अफ़साना दुनिया को सुना देंगे"। इस फ़िल्म के गाने मशहूर हो गए, ख़ास कर उमा देवी का गाया "अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का"। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी गीतकार को अपनी पहली ही फ़िल्म में इतनी बड़ी कामयाबी मिले। पर शकील साहब ने ’दर्द’ से ही कामयाबी का जो झंडा लहराना शुरु किया, वो आख़िर तक कायम रहा।

इसमें कोई शक़ नहीं! जावेद साहब, क्या शकील साहब कभी आप भाई बहनों को भी प्रोत्साहित किया करते थे लिखने के लिए?

जी हाँ, वो प्रोत्साहित भी करते थे और जब हम कुछ लिख कर उन्हें दिखाते तो वो ग़लतियों को सुधार भी दिया करते थे। 

शकील बदायूनी और नौशाद अली, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू। ये दोनों एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे। क्या शकील साहब आप सब को नौशाद साहब और उस दोस्ती के बारे में बताया करते थे? या फिर इन दोनों से जुड़ी कोई यादगार घटना या वाक्या?


शकील साहब और नौशाद साहब वीयर ग्रेटेस्ट फ़्रेण्ड्स! यह हक़ीक़त है कि शकील साहब नौशाद साहब के साथ अपने परिवार से भी ज़्यादा वक़्त बिताया करते थे। दोनों की आपस की ट्युनिंग् ग़ज़ब की थी और यह ट्युनिंग् इनके गीतों से साफ़ छलकती है। शकील साहब के गुज़र जाने के बाद भी नौशाद साहब हमारे घर आते रहते थे और हमारा हौसला अफ़ज़ाई करते थे। यहाँ तक कि नौशाद साहब हमें बताते थे कि ग़ज़ल और नज़्म किस तरह से पढ़ी जाती है और मैं जो कुछ भी लिखता था, वो उन्हें सुधार भी दिया करते थे। नौशाद साहब जितने बड़े संगीतकार थे, उतनी ही अच्छी शेर-ओ-शायरी भी किया करते थे। अगर वो गीतकार भी होते तो भी उतने ही मशहूर होते इसमें कोई शक़ नहीं।

सही है! यानी कि शकील साहब एक पिता के रूप में जिस तरह से आपको गाइड करते थे, उनके जाने के बाद वही किरदार नौशाद साहब ने निभाया और आपको पिता समान स्नेह दिया।

बिलकुल ठीक, इसमें कोई शक़ नहीं!

शकील-नौशाद जोड़ी का कौन सा गीत आपको सबसे ज़्यादा पसन्द है?

इस जोड़ी का हर गीत अपने आप में एक मील का पत्थर है। किस किस गीत की बात करूँ? 'दुलारी’ (1949), ’दीदार’ (1951), 'बैजु बावरा’ (1952), 'शबाब’ (1954), 'मदर इण्डिया’ (1957), ’मुग़ल-ए-आज़म’ (1960), ’शबाब’ (1954), ’गंगा जमुना’ (1961), ’मेरे महबूब’ (1963), ये सारी फ़िल्मों के गानें बहुत हिट हुए थे, मुझे भी पसन्द है।

जावेद साहब, बचपन की कई यादें ऐसी होती हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। शकील साहब से जुड़ी आप के मन में भी कई स्मृतियाँ होंगी। उन स्मृतियों में से कुछ आप हमारे साथ बाँटना चाहेंगे?

शकील साहब के साथ हम सब रेकॊर्डिंग् पर जाया करते थे और कभी कभी तो वो हमें शूटिंग् पर भी ले जाते थे। फ़िल्म 'राम और श्याम' के लिए वो हमें मद्रास ले गये थे। 'दो बदन', 'नूरजहाँ' और कुछ और फ़िल्मों की शूटिंग् पर सब गये थे। वो सब यादें अब भी हमारे मन में ताज़े हैं जो बहुत याद आते हैं। 

आपने शकील-नौशाद की जोड़ी के कुछ फ़िल्मों के नाम गिनाये जिनके गीत आपको पसन्द है। शकील साहब ने अन्य संगीतकारों के लिए भी गीत लिखे हैं जैसे कि रवि, हेमन्त कुमार प्रमुख। इन संगीतकारों के लिए शकील साहब के लिखे कौन कौन से गीत आपको व्यक्तिगत तौर पे सब से ज़्यादा पसंद हैं?

उनके लिखे सभी गीत अपने आप में मास्टरपीस हैं, चाहे किसी भी संगीतकार के लिये लिखे गये हों। यह बताना नामुमकिन है कि कौन सा गीत सर्वोत्तम है। मैं कुछ फ़िल्मों के नाम ज़रूर ले सकता हूँ, जैसे कि ’दो बदन’ और 'चौधवीं का चांद' रवि साहब के साथ, 'साहब बीवी और ग़ुलाम' हेमन्त कुमार साहब के साथ।

जावेद साहब, आज होली है और जैसा कि मैंने शुरु में ही कहा था कि शकील साहब ने बहुत सारे फ़िल्मी होली गीत लिखे हैं, एक गीत का उल्लेख हमने किया, बाक़ी गीतों के बारे में बताइए?

’मुग़ल-ए-आज़म’ में एक गीत था, हालाँकि यह होली गीत तो नहीं, बल्कि जन्माष्टमी के सिचुएशन का गीत था फ़िल्म में, "मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे"। फ़िल्म ’कोहिनूर’ में "तन रंग लो जी आज मन रंग लो"। यह नौशाद सहब के साथ था। फिर रवि साहब के साथ फ़िल्म ’फूल और पत्थर’ में "लायी है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिये, कोई मन के लिये"।

जी हाँ, ’कोहिनूर’ और ’फूल और पत्थर’ के इन दोनो गीतों में ही "तन" और "मन" शब्दों का शकील साहब ने इस्तमाल किया अलग अलग तरीक़ों से, बहुत ही सुन्दर और रंगीन। जावेद साहब, अब हम बात करना चाहेंगे शकील साहब को मिले हुए पुरस्कारों के बारे में?


पुरस्कारों की क्या बात करूँ, उन्हें लगातार तीन साल तक फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला था।

क्या बात है! इनके बारे में बताएँगे विस्तार से?

1961 में ’चौधवीं का चाँद’ फ़िल्म के टाइटल गीत के लिए, 1962 में फ़िल्म ’घराना’ के "हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं" के लिए, और 1963 में ’बीस साल बाद’ के "कहीं दीप जले कहीं दिल" गीत के लिए।

मतलब दो बार रवि साहब और एक बार हेमन्त दा के गीत के लिए। नौशाद साहब के किसी गीत में उन्हें यह पुरस्कार नहीं मिला, यह आश्चर्य की बात है।

भारत सरकार ने उन्हें ’गीतकार-ए-आज़म’ की उपाधि से सम्मानित किया था। 3 मई 2013 को उनकी तस्वीर के साथ एक डाक टिकट India Post ने जारी किया है।

वाह! बहुत ख़ूब! जावेद साहब, नौशाद साहब के साथ शकील साहब के दोस्ती की बात हमने की, और कौन कौन से उनके दोस्त थे फ़िल्म इन्डस्ट्री से?

शकील साहब को बैडमिन्टन खेलने का बहुत शौक़ था। पिक्निक और शिकार करना, पतंग उड़ाना उन्हें बहुत भाता था। और इन सब कामों में उनके साथी हुआ करते थे मोहम्मद रफ़ी साहब, जॉनी वाकर साहब और नौशाद साहब तो थे ही। इनके अलावा दिलीप कुमार साहब, वजाहत मिर्ज़ा साहब, ख़ुमार बाराबंकवी साहब और आज़म बजतपुरी साहब उनके करीबी लोग हुआ करते थे फ़िल्म इन्डस्ट्री से।

हम शकील साहब के लिखे गीतों को हर रोज़ ही सुनते हैं रेडियो पर, लेकिन उनके लिखे ग़ैर-फ़िल्मी नज़्मों और ग़ज़लों को कम ही सुना जाता है। इसलिए मैं आप से उनकी लिखी अदबी शायरी और प्रकाशनों के बारे में जानना चाहूँगा।


मैं आपको बताऊँ कि भले ही वो फ़िल्मी गीतकार के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, लेकिन हक़ीक़त में पहले वो एक लिटररी फ़िगर थे और बाद में फ़िल्मी गीतकार। फ़िल्मों में गीत लेखन वो अपने परिवार को चलाने के लिये किया करते थे। जहाँ तक ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का सवाल है, उन्होंने ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों के पाँच दीवान लिखे हैं, जिनका अब 'कुल्यात-ए-शकील' के नाम से संकलन प्रकाशित हुआ है। उन्होंने अपने जीवन काल में 500 से ज़्यादा ग़ज़लें और नज़्में लिखे होंगे जिन्हें आज भारत, पाक़िस्तान और दुनिया भर के देशों के गायक गाते हैं।

आपने आंकड़ा बताया तो मुझे याद आया कि हमने आप से शकील साहब के लिखे फ़िल्मी गीतों की संख्या नहीं पूछी। कोई अंदाज़ा आपको कि शकील साहब ने कुल कितने फ़िल्मी गीत लिखे होंगे?

उन्होंने 108 फ़िल्मों में लगभग 800 गीत लिखे हैं, और इनमें 5 फ़िल्में अनरिलीज़्ड भी हैं।

बहुत ही कम उम्र में शकील साहब चले गए। क्या कारण था उनकी इस असामयिक मृत्यु का?

उन्हें डाइबेटिस तो थी ही, उन्हें टी.बी भी हो गया। पंचगनी के एक सैनिटोरियम में उनका इलाज चल रहा था। 1968-69 में वो बम्बई से पंचगनी के चक्कर लगाया करते थे। नौशाद साहब आते थे मिलने। केवल 53 साल की उम्र में उनका इन्तकाल हो गया। दिन था 20 अप्रैल 1970।

हमने सुना है कि आर्थिक स्थिति परिवार की उस समय ठीक नहीं थी। और नौशाद साहब ने निर्माताओं से कह कर शकील साहब को तीन फ़िल्मों के लिए साइन करवाया था। इस घटना के बारे में बतायेंगे?


जावेद बदायूनी
नौशाद साहब को जैसे ही इस बात का पता चला कि शकील साहब बीमार हैं और उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं है, उन्हें बहुत ज़्यादा तकलीफ़ हुई, दुख हुआ। नौशाद साहब को पता था कि शकील साहब इतने ख़ुद्दार इंसान हैं कि किसी से पैसे वो नहीं लेंगे, यहाँ तक कि नौशाद से भी नहीं। इसलिए नौशाद साहब ने एक दूसरा रास्ता इख़्तियार किया। वो पहुँच गये कुछ फ़िल्म निर्माताओं के पास और शकील साहब की हालत का ब्योरा देते हुए उनके लिए हासिल कर लाए तीन फ़िल्मों में गीत लिखने का कॉनट्रैक्ट। यही नहीं, उस समय शकील किसी फ़िल्म के लिए जितने रकम लिया करते थे, उससे दस गुणा ज़्यादे रकम पर नौशाद ने उन फ़िल्म निर्माताओं को राज़ी करवाया। उसके बाद नौशाद ख़ुद जा पहुँचे पंचगनी जहाँ इनका इलाज चल रहा था। जैसे ही उन्होंने उन तीन फ़िल्मों में गाने लिखने और पेमेण्ट की रकम के बारे में बताया तो शकील सहब समझ गये कि उन पर अहसान किया जा रहा है। और उन्होंने नौशाद साहब से वो फ़िल्में वापस कर आने को कहा। पर नौशाद साहब ने भी अब ज़िद पकड़ ली और शकील साहब को गाने लिखने पर मजबूर किया। ये तीन फ़िल्में थीं 'राम और श्याम', 'आदमी', और 'संघर्ष'। फ़िल्म 'राम और श्याम' का गीत "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" उन्होंने पंचगनी के अस्पताल के बेड पर बैठे-बैठे लिखा था। अपनी दिन-ब-दिन ढलती जा रही ज़िन्दगी को देख कर उन्हें शायद यह अहसास हो चला था कि अब वो ज़्यादा दिन ज़िन्दा नहीं रहेंगे, कि उनका अन्तिम समय अब आ चला है, शायद इसीलिए उन्होंने इस गीत में लिखा कि "कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जायेगा, शम्मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा, आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले"। नौशाद साहब अपने जीवन के अन्त तक जब भी इस गीत को सुनते थे, उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे शकील साहब को याद करके।

बहुत ही मार्मिक! क्या ये तीन फ़िल्में शकील साहब की अन्तिम तीन फ़िल्में थीं?

आख़िरी फ़िल्म शायद ’प्यार का रिश्ता’ थी जिसे वो शंकर-जयकिशन के लिए लिख रहे थे। इस फ़िल्म के कुल पाँच गीतों में से तीन गीत इन्होंने लिखे, फिर इनका इन्तकाल हो गया और बाक़ी के बचे दो गीत इन्दीवर साहब से लिखवाये गए। यह फ़िल्म 1973 में रिलीज़ हुई थी।

शकील साहब के जाने के बाद आपके परिवार की आर्थिक स्तिथि बिगड़ गई होगी। कैसे सम्भला फिर सब?

उनके दोस्त अहमद ज़कारिया और रंगूनवाला जी, इन्होंने मिल कर एक ट्रस्ट बनाई ’याद-ए-शकील’ के नाम से। और इस ट्रस्ट ने हमें उस बुरे वक़्त में सहारा दिया।

जावेद साहब, आप भी अपने पैरों पर खड़े हुए, यह बताइए कि आप किस क्षेत्र में कार्यरत है?

मैं पिछले 32 सालों से SOTC Tour Operators के साथ था, और अब HDFC Standard Life में हूँ, मुंबई में स्थित हूँ। 

और अब एक आख़िरी सवाल आपसे, शकील साहब ने जो मशाल जलाई है, क्या उस मशाल को आप या आपके परिवार का कोई और सदस्य, रिश्तेदार उसे आगे बढ़ाने में इच्छुक हैं?

मेरी बड़ी बहन रज़ीज़ शकील को शकील साहब के गुण मिले हैं और वो बहुत ख़ूबसूरत शायरी लिखती हैं।

बहुत बहुत शुक्रिया जावेद साहब। होली के इस रंगीन पर्व को आप ने शकील साहब की यादों से और भी रंगीन किया, भविष्य में हम आप से शकील साहब की शख़्सियत के कुछ और अनछुये पहलुयों पर चर्चा करना चाहेंगे। आपको एक बार फिर से होली की हार्दिक शुभकामना देते हुए अब विदा लेते हैं, नमस्कार!

बहुत बहुत शुक्रिया आपका!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Friday, March 25, 2016

लव जिहाद उर्फ़ उदास आँखों वाला लड़का


बोलती कहानियां : एक नया अनुभव - 01 

बोलती कहानियां के नए संस्करण में आज प्रस्तुत है पंकज सुबीर की कालजयी रचना "लव जिहाद उर्फ़ उदास आँखों वाला लड़का". प्रमुख स्वर है अनुज श्रीवास्तव का, और संयोजन है संज्ञा टंडन का. सुनिए और महसूस कीजिये इस कहानी के मर्म को, जो बहुत हद तक आज के राजनितिक माहौल की सच्चाई को दर्शाता है.

"लड़का बहुत कुछ भूल चुका है। बहुत कुछ। उसके मोबाइल में अब कोई गाने नहीं हैं। न सज्जाद अली, न रामलीला, न आशिक़ी 2। जाने क्या क्या सुनता रहता है अब वो। दिन भर दुकान पर बैठा रहता है। मोटर साइकिल अक्सर दिन दिन भर धूल खाती है। कहीं नहीं जाता। आप जब भी उधर से निकलोगे तो उसे दुकान पर ही बैठा देखोगे। अब उसके गले में काले सफेद चौखाने का गमछा परमानेंट डला रहता है और सिर पर गोल जालीदार टोपी भी। दाढ़ी बढ़ गई है। बढ़ी ही रहती है।" - इसी कहानी से

लेखक का परिचय
पंकज सुबीर उपन्यास ये वो सहर तो नहीं को भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा वर्ष 2009 का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार । उपन्यास ये वो सहर तो नहीं को इंडिपेंडेंट मीडिया सोसायटी (पाखी पत्रिका) द्वारा वर्ष 2011 का स्व. जे. सी. जोशी शब्द साधक जनप्रिय सम्मान । उपन्यास ये वो सहर तो नहीं को मप्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा वागीश्वरी पुरस्कार। कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी वर्ष 2008 में भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार हेतु अनुशंसित। कहानी संग्रह महुआ घटवारिन को कथा यूके द्वारा अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान। समग्र लेखन हेतु वर्ष 2014 में वनमाली कथा सम्मान। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित तीन कहानी संकलनों लोकरंगी प्रेम कथाएँ, नौ लम्बी कहानियाँ तथा युवा पीढ़ी की प्रेम कथाएँ में प्रतिनिधि कहानियाँ सम्मिलित। कहानी शायद जोशी कथादेश अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत । पाकिस्तान की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका आज ने भारत की कहानी पर केन्द्रित विशेषांक में चार कहानियों का उर्दू अनुवाद प्रकाशित किया। कहानियाँ, व्यंग्य लेख एवं कविताएँ नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, हँस, लमही, प्रगतिशील वसुधा, हिंदी चेतना, परिकथा, सुख़नवर, सेतु, वागर्थ, कथाक्रम, कथादेश, समर लोक, संवेद वराणसी, जज्बात, आधारशिला, समर शेष है, लफ्ज़, अभिनव मीमांसा, अन्यथा जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित। इसके अलावा समाचार पत्रों के सहित्यिक पृष्ठों पर भी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दैनिक भास्कर, नव भारत, नई दुनिया, लोकमत आदि हिंदी के प्रमुख समाचार पत्र शामिल हैं। कई कहानियों का तेलगू , पंजाबी, उर्दू में अनुवाद। कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शोध कार्य । सह संपादक : हिंदी चेतना, वेब संपादक : परिकथा, वेब संपादक : लमही, वेब संपादक : दूसरी परंपरा समन्वयक (भारत) : हिन्दी प्रचारिणी सभा (हिन्दी चेतना), कैनेडा प्रकाशित पुस्तकेंः ईस्ट इंडिया कम्पनी (कहानी संग्रह), महुआ घटवारिन (कहानी संग्रह ), ये वो सहर तो नहीं (उपन्यास), युवा पीढ़ी की प्रेम कथाएँ (कहानी संकलन), नौ लम्बी कहानियाँ (कहानी संकलन), लोकरंगी प्रेमकथाएँ (कहानी संकलन), एक सच यह भी (कहानी संकलन), हिन्दी कहानी का युवा परिदृश्य (संपादन श्री सुशील सिद्धार्थ)

Thursday, March 24, 2016

"रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा...", होली में आज सराबोर हो जाइए प्रेम-रंग में



कहकशाँ - 5
मन्ना डे, योगेश, श्याम सागर की एक रंगरेज़ रचना
"रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा..."




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है होली के इस ख़ास मौक़े पर मन्ना डे की आवाज़ में योगेश की एक रचना।




गर आपसे कहूँ कि हमारे आज के फ़नकार "श्री प्रबोध चंद्र जी" हैं तो लगभग १ या २ फीसदी लोग ही होंगे जो इन्हें जानने का दावा करेंगे या फिर उतने लोग भी न होंगे। लेकिन यह सच है। अरे-अरे डरिये मत.. मैं किसी अजनबी की बात नहीं कर रहा; जिनकी भी बात कर रहा हूँ उन्हें आप सब जानते हैं। जैसे श्री हरिहर ज़रिवाला को लोग संजीव कुमार कहते हैं, वैसे ही हमारे प्रबोध चंद्र जी यानि कि प्रबोध चंद्र डे को लोग उनके उपनाम मन्ना डे के नाम से बेहतर जानते हैं। मन्ना दा ने फिल्म-संगीत को कई कालजयी गीत दिए हैं। चाहे "चोरी-चोरी" का लता के साथ "आजा सनम मधुर चाँदनी में हम" हो या फिर "उपकार" का कल्याण जी-आनंद जी की धुनों पर "कसमें-वादे प्यार वफ़ा" हो या फिर सलिल चौधरी के संगीत से सजी "आनंद" फिल्म की "ज़िंदगी कैसी है पहेली" हो, मन्ना दा ने हर एक गाने में ही अपनी गलाकारी का अनूठा नमूना पेश किया है, उनके गाये शास्त्रीय-संगीत आधारित रचनाओं की तो बात ही छोड़ दीजिए!

चलिये अब आज के गाने की ओर रूख करते हैं। 2005 में रीलिज़ हुई "सावन की रिमझिम में" नाम के एक ऐल्बम में मन्ना दा के लाजवाब पंद्रह गीतों को संजोया गया था। यह गाना भी उसी ऐल्बम से है। वैसे मैंने यह पता करने की बहुत कोशिश की कि यह गाना मूलत: किस ग़ैर-फिल्मी ऐल्बम या ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड से है ,लेकिन मैं इसमें सफल नहीं हो पाया। तो आज हम जिस गाने की बात कर रहे हैं उसे लिखा है योगेश ने और अपने सुरों से सजाया है श्याम सागर ने और वह गाना है: "ओ रंगरेजवा रंग दे ऐसी चुनरिया"। वैसे इस ऐल्बम में इस तिकड़ी के एक और गाने को स्थान दिया गया था- "कुछ ऐसे भी पल होते हैं..." । संयोग देखिए कि जिस तरह हिन्दी फिल्मों में मन्ना दा की प्रतिभा की सही कद्र नहीं हुई उसी तरह कुछ एक संगीतकारों को छोड़ दें तो बाकी संगीतकारों ने योगेश क्या हैं, यह नहीं समझा। भला कौन "जिंदगी कैसी है पहेली" या फिर "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" में छिपी भावनाओं के सम्मोहन से बाहर आ सकता है भला!

लोग माने या ना मानें लेकिन इस गाने और मन्ना दा के एक और गाने "लागा चुनरी में दाग" में गहरा साम्य है। साहिर का वह गाना या फिर योगेश का यह गाना निर्गुण की श्रेणी में आता है, जैसा कबीर लिखा करते थे, जैसे सूफियों के कलाम होते हैं। प्रेमिका जब ख़ुदा या ईश्वर में तब्दील हो जाए या फिर जब ख़ुदा या ईश्वर में आपको अपना पिया/अपनी प्रिया दिखने लगे, तब ही ऐसे नज़्म सीने से निकलते हैं। मेरे मुताबिक इस गाने में भी वैसी ही कुछ बातें कही गई हैं। और सच कहूँ तो कई बार सुनकर भी मैं इस गाने में छुपे गहरे भावों को पूरी तरह नहीं समझ पाया हूँ। राधा का नाम लेकर योगेश अगर सांसारिक प्रेम की बातें कर रहे हैं तो फिर मीरा या कबीर का नाम लेकर वो दिव्य/स्वर्गीय प्रेम की ओर इशारा भी कर रहे हैं। वैसे प्रेम सांसारिक हो या फिर दिव्य, प्रेम तो प्रेम है और प्रेम से बड़ा अनुभव कुछ भी नहीं।

हुलस हुलस हरसे हिया, हुलक हुलक हद खोए,
उमड़ घुमड़ बरसे पिया, सुघड़ सुघड़ मन होए।

दर-असल प्रेम वह कोहिनूर है, जिसके सामने सारे नूर फीके हैं। प्रेम के बारे में कुछ कहने से अच्छा है कि हम ख़ुद ही प्रेम के रंग में रंग जाएँ। तो चलिए आप भी हमारे साथ रंगरेज के पास और गुहार लगाइये कि:

ओ रंगरेजवा रंग दे ऐसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा....

पग-पग पर लाखों ही ठग थे तन रंगने की धुन में,
सबसे सब दिन बच निकला मन पर बच ना सका फागुन में।
तो... जग में ये तन ये मेरा मन रह ना सका बैरागी,
कोरी-कोरी चुनरी मोरी हो गई हाय रे दागी।
अब जिया धड़के, अब जिया भड़के
इस चुनरी पे सबकी नजरिया गड़े,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....

रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा,
उसी रंग में सब रंग डूबे कह गए दास कबीरा।
तो... नीले पीले लाल सब्ज रंग तू ना मुझे दीखला रे,
मैं समझा दूँ भेद तुझे ये , तू ना मुझे समझा रे।
प्रेम है रंग वो, प्रेम है रंग वो,
चढ़ जाए तो रंग ना दूजा चढ़े,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऐसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....








’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’ 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, March 23, 2016

होली के रंग रंगा राग काफी


रेडियो प्लेबैक की पूरी टीम अपने पाठकों और श्रोताओं को संप्रेषित कर रही है होली की ढेर सारी मंगल कामनाएँ...रंगों भरे इस त्यौहार में आपके जीवन में भी खुशियों के नए रंग आये यही हमारी प्रार्थना है. हिंदी फिल्मों में राग काफी पर आधारित बहुत से होली गीत बने हैं, आईये आज सुनें हमारे स्तंभकार कृष्णमोहन मिश्रा और आवाज़ की धनी संज्ञा टंडन के साथ इसी राग पर एक चर्चा, जिसमें जाहिर है शामिल है एक गीत होली का भी
 

Monday, March 21, 2016

मूड्स ऑफ़ बॉलीवुड : तनहा रेगिस्तान : मेरे ये गीत याद रखना


तपता रेगिस्तान, दूर तक फैला बियाबान, बोलती तन्हाईयाँ, गूंजती खामोशियाँ, और दिल की बेजारियों से निकलते कुछ बहतरीन नगमें. आईये चलें इस सुरीले सफ़र में विवेक श्रीवास्तव के साथ, मेरे ये गीत याद रखना के इस एपिसोड में...

Sunday, March 20, 2016

राग पूर्वी : SWARGOSHTHI – 262 : RAG PURVI



स्वरगोष्ठी – 262 में आज


दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 10 : राग पूर्वी


पण्डित रविशंकर और उस्ताद शाहिद परवेज का राग पूर्वी





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की दसवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की दसवीं और समापन कड़ी में आज हम राग पूर्वी के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही सबसे पहले हम आपके लिए सुविख्यात सितार वादक उस्ताद शाहिद परवेज़ का सितार पर बजाया राग पूर्वी की एक रचना प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर का संगीतबद्ध किया और वाणी जयराम का गाया फिल्म ‘मीरा’ का इसी राग पर आधारित एक गीत सुनेगे। 




रे ध कोमल गाइए, दोनों मध्यम मान,
ग-नि वादी-संवादि सों, राग पूर्वी जान।

उस्ताद शाहिद परवेज
पूर्वी थाट का आश्रय राग पूर्वी है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग पूर्वी के आरोह के स्वर- सा रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र) प, (कोमल), नि सां और अवरोह के स्वर- सां नि (कोमल) प, म॑(तीव्र) ग, रे(कोमल) सा होते हैं। इस राग में कोई भी स्वर वर्जित नहीं होता। ऋषभ और धैवत कोमल तथा मध्यम के दोनों प्रकार प्रयोग किये जाते हैं। राग पूर्वी का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है तथा इसे दिन के अन्तिम प्रहर में गाया-बजाया जाता है। राग पूर्वी के आरोह में हमेशा तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। जबकि अवरोह में दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग होता है। कभी-कभी दोनों माध्यम स्वर एकसाथ भी प्रयोग होते है। इस राग की प्रकृति गम्भीर होती है, अतः मींड़ और गमक का काम अधिक किया जाता है। यह पूर्वांगवादी राग है, जिसे अधिकतर सायंकालीन सन्धिप्रकाश काल में गाया-बजाया जाता है। राग का चलन अधिकतर मंद्र और मध्य सप्तक में होता है। इस राग का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए अब हम आपके समक्ष राग पूर्वी की एक रचना सितार पर सुनवाते हैं, जिसे उस्ताद शाहिद परवेज़ ने बजाया है। इस प्रस्तुति में पण्डित रामकुमार मिश्र ने तीनताल में तबला संगति की है।


राग पूर्वी : सितार पर तीनताल की रचना : उस्ताद शाहिद परवेज़ 




वाणी जयराम
राग पूर्वी पर आधारित फिल्मी गीत के लिए अब हम आपको 1979 की फिल्म ‘मीरा’ से एक भक्तिपद, गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनवा रहे हैं। मीराबाई का जन्म 1498ई. में माना जाता है। मीरा राजस्थान के मेड़ता राज परिवार की राजकुमारी थीं। सात वर्ष की आयु में एक महात्मा ने उन्हें श्रीकृष्ण की एक मूर्ति दी। कृष्ण के उस स्वरूप पर वे इतनी मुग्ध हो गईं कि उन्हें अपना आराध्य और पति मान लिया। 1516ई. में मीरा का विवाह चित्तौड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। परन्तु कृष्णभक्ति के प्रति समर्पित रहने और साधु-संतों के बीच समय व्यतीत करने के कारण उनका गृहस्थ जीवन कभी भी सफल नहीं रहा। मीरा वैष्णव भक्तिधारा की प्रमुख कवयित्री मानी जाती है। उनके रचे हुए लगभग 1300 पद हमारे बीच आज भी उपलब्ध हैं। उनके पदों में राजस्थानी बोली के साथ ब्रज भाषा का मिश्रण है। कुछ विद्वान मानते हैं कि मीरा के भक्तिकाव्य पर उनके समकालीन संगीत सम्राट तानसेन, चित्तौड़ के गुरु रविदास और गोस्वामी तुलसीदास का प्रभाव है। उनके रचे असंख्य पदों में से आज के अंक के लिए हमने जो पद चुना है, वह है- ‘करुणा सुनो श्याम मोरी...’। गीतकार गुलज़ार द्वारा 1979 में निर्मित फिल्म ‘मीरा’ में शामिल यह भक्ति रचना है। फिल्म का संगीत निर्देशन विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर ने किया था। पण्डित जी ने मीरा के इस पद में निहित करुणा मिश्रित भक्तिभाव की अभिव्यक्ति के लिए राग पूर्वी के स्वरों का चयन किया था। आप यह पद गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनिए और करुण और भक्तिरस के मिश्रण की अनुभूति कीजिए। रचना सितारखानी ताल में निबद्ध है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग पूर्वी : ‘करुणा सुनो श्याम मोरी...’ : वाणी जयराम : संगीत – पं. रविशंकर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 262वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग पर आधारित एक फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के मुख्य गायक का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 26 मार्च, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 264वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 258 की संगीत पहेली में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – ललित, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक-गायिका – मन्ना डे और लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में कुल छः प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। हमारी एक प्रतिभागी नूपुर सिंह ने ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में पहली बार भाग लिया है। संगीत-प्रेमियों के इस परिवार में नूपुर जी को शामिल करते हुए उनका हार्दिक स्वागत है। हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में अभी तक आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे थे। श्रृंखला के इस समापन अंक में हमने आपसे राग पूर्वी पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नई श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

 


Saturday, March 19, 2016

"देखो अब तो किसको नहीं है ख़बर....", जॉर्ज मार्टिन को श्रद्धांजलि इस गीत के ज़रिए



एक गीत सौ कहानियाँ - 78
 
'देखो अब तो किसको नहीं है ख़बर...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 78-वीं कड़ी में आज प्रस्तुत है हाल ही में प्रयात हुए जॉर्ज मार्टिन के एक गीत की धुन से प्रेरित फ़िल्म ’जानवर’ के गीत "देखो अब तो किसको नहीं है ख़बर..." के बारे में, जिसे मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, एस. डी. बातिश और एस. बलबीर ने गाया था। बोल हसरत जयपुरी के और संगीत शंकर जयकिशन का।  

8 मार्च 2016 को चल बसे जॉर्ज मार्टिन। जॉर्ज मार्टिन जिन्हें ’पाँचवाँ बीटल’ (The Fifth Beatle) कहा जाता था।
जॉर्ज मार्टिन
3 जनवरी 1926 को जन्में बहुमुखी प्रतिभा के धनी सर जॉर्ज हेनरी मार्टिन एक अंग्रेज़ रेकॉर्ड प्रोड्युसर, अरेंजर, कम्पोज़र, कंडक्टर, ऑडियो इंजिनीयर व म्युज़िशियन थे। मार्टिन का व्यावसायिक सफ़र छह दशकों तक चला जिसमें उन्होंने संगीत, सिनेमा, टेलीविज़न और स्टेज पर काम किया। परोपकार करने में भी उनका नाम था। उनके योगदान को ध्यान में रखते हुए उन्हें 1996 में Knight Bachelor की उपाधि से सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध ब्रिटिश रॉक बैण्ड ’बीटल्स’ के बारे में तो सभी ने सुन रखा है। इस बैण्ड में चार सदस्य थे - जॉन लेनन, पॉल मैक् कार्टनी, जॉर्ज हैरिसन और रिंगो स्टार। ’बीटल्स’ के मूल ऐल्बमों में गहन व बहुमूल्य योगदान की वजह से जॉर्ज मार्टिन को ’दि फ़िफ़्थ बीटल’ कहा जाता है। हालाँकि यह उपाधि औपचारिक नहीं है और एकाधिक व्यत्क्ति को ’फ़िफ़्थ बीटल’ की तथाकथित अनौपचारिक उपाधि मिली है। जॉर्ज मार्टिन के अलावा इस उपाधि के हक़दार बनने वालों में स्टुआर्ट सुटक्लिफ़, पीट बेस्ट, ब्राअन एप्सटेन, नील ऐस्पिनॉल, डेरेक टेलर, टोनी शेरीडॉन, बिली प्रेस्टन और एरिक क्लैपटन के नाम उल्लेखनीय हैं। एकाधिक ग्रैमी अवार्ड्स सहित असंख्य पुरस्कारों से सम्मानित जॉर्ज मार्टिन के चले जाने से उस दौर की कितनी ही बातें, यादें, गाने, तराने उनके चाहनेवालों को याद आ रही होंगी। और यही वजह है जो आज के ’एक गीत सौ कहानियाँ’ में एक हिन्दी फ़िल्मी गीत के ज़रिए हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने जा रहे हैं।


जिस हिन्दी फ़िल्मी गीत का ज़िक्र यहाँ करेंगे, उस पर आने से पहले जॉर्ज मार्टिन के उस मूल रचना के बारे में
बताते हैं जिससे प्रेरित होकर यह हिन्दी बना था। ऐल्बम का नाम था ’मीट द बीटल्स’। रेकॉर्ड के ए-साइड पर था "I want to hold your hand" और बी-साइड पर था "This Boy" और "I saw her standing there"। 7 RPM की EMI Studios London की यह रेकॉर्ड जारी हुई थी 29 नवंबर 1963 के दिन। इनमें से "I want to hold your hands" गीत आज के चर्चा का विषय है। इसे लिखा था लेनन और मैक् कार्टनी ने और जॉर्ज मार्टिन ने इसे प्रोड्युस किया था। इस गीत के साथ कई किस्से जुड़े हुए हैं। कहा जाता है कि ब्राअन एप्स्टेन (ये भी एक ’फ़िफ़्थ बीटल’ थे) ने ही अमरीकी श्रोताओं के लिए इस गीत को लेनन और मैक् कार्टनी को लिखने के लिए प्रेरित किया था, लेकिन जॉर्ज मार्टिन ने इस बात से साफ़ इनकार किया था। ख़ैर, गीत 17 अक्टुबर 1963 के दिन रेकॉर्ड हुआ, कुल 17 टेक लगे थे। जॉर्ज मार्टिन ने इस गीत का मोनो और स्टिरीओ मिक्सिंग् किया था 21 अक्टुबर को। ऑस्ट्रेलिआ व नेदरलैण्ड्स में जारी करने से पहले 8 जून 1965 को इसकी और अधिक मिक्सिंग् की गई थी। बीटल्स के दो गीत जर्मन भाषा में अनुवादित हुए थे; एक था "She loves you" और दूसरा गीत था "I want to hold your hand"। दोनों गीतों का अनुवाद लुग्ज़ेम्बर्ग के म्युज़िशियन कैमिलो फ़ेल्गन ने जीन निकोलस के तख़ल्लुस से किया था। इस अनुवाद का कारण यह था कि EMI के जर्मन शाखा ने यह संदेह किया कि बीटल्स के ये रेकॉर्ड्स जर्मनी में नहीं बिक पायेंगे जब तक कि इन्हें जर्मन भाषा में न गाये जाएँ। इस सुझाव का बीटल्स ने खुले आम तिरस्कार किया। इस वजह से जब वो पैरिस में अपने एक 18 दिवसीय कॉनसर्ट के दौरान इस गीत को जर्मन में रेकॉर्ड करने का प्रोग्राम बना, तब उस तिरस्कार से अपमानित बोध करने वाले EMI Paris वालों ने गाना रेकॉर्ड करने से मना कर दिया। प्रोड्युसर जॉर्ज मार्टिन के साथ चारों बीटल्स प्रतीक्षा करते रहे पर कोई नहीं आया। ग़ुस्से से तिलमिलाये मार्टिन ने ख़ुद ही रेकॉर्ड करने का निर्णय लिया। दो दिन बाद बीटल्स ने रेकॉर्ड किया "Komm, gib mir deine Hand", लेकिन मार्टिन ने बीटल्स के चारों सदस्यों का पक्ष लेते हुए स्वीकार किया कि इस जर्मन संस्करण की ज़रूरत नहीं थी, पर उन चारों ने सराहनीय काम किया है जर्मन संस्करण में भी। और यह गीत जर्मनी में बहुत हिट हुआ। "I want to hold your hand" को ’500 Greatest Songs of All Time' में शामिल किया गया है। इस गीत को Billboard's All Time Top 100 परेड में 39-वाँ पायदान मिला था। उस वर्ष के ग्रमी अवार्ड के लिए भी इस गीत को नामांकन मिला था, पर अवार्ड गया ऐस्ट्रुड गिलबर्तो और स्टान गेत्ज़ के "The Girl from Ipanema" गीत को।

रॉक एन रोल शैली के "I want to hold your hand" के जादू से हिन्दी फ़िल्म-संगीत के उस समय शीर्ष पर चल
रफ़ी, आशा, शंकर, जयकिशन, हसरत, शैलेन्द्र
रहे संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन भी बच नहीं सके। और उस समय निर्माणाधीन फ़िल्म ’जानवर’ के एक गीत के लिए इसी गीत की धुन को चुन लिया। इस गीत का फ़िल्मांकन बड़ा मज़ेदार है। फ़िल्म में राजेन्द्र नाथ और माधवी के शादी के रीसेपशन पर यह गीत एक पार्टी गीत के तौर पर रखा गया है। गीत शुरू होता है चार गीटारिस्ट्स द्वारा हास्यास्पद तरीके से गीटार बजाते हुए "देखो अब तो..." गाते हुए। शायद ये चार गीटारिस्ट्स चार बीटल्स सदस्यों का भिवेदन कर रहे होंगे उन्हीं की धुन पर। आवाज़ें मोहम्मद रफ़ी, एस. बलबीर और एस. डी. बातिश की। इन चार गीटार बजाने वाले अभिनेताओं में एक नाम (सबसे दायीं तरफ़ वाले) ऑस्कर अंगर का है जो आगे चल कर विजय-ऑस्कर के नाम से बतौर कोरीओग्राफ़र प्रतिष्ठित हुए। इन चार गीटारिस्ट्स के पीछे हमें ’टेड लियोन्स ऐण्ड हिज़ कब्” बैण्ड के सदस्य भी दिखाई देते हैं संगत करते हुए। और कुछ ही पलों में शम्मी कपूर (और भी ज़्यादा हास्यास्पद गेट-अप लिए) आ जाते हैं और रफ़ी साहब गीत को आगे बढ़ाते हैं। मुखड़ा ख़त्म होते ही शम्मी कपूर की नायिका राजश्री नज़र आती हैं। राजश्री, जो अब तक आदर्श भारतीय नारी के किरदार निभाया करती थीं, इस फ़िल्म और इस गीत में सबको चकित करती हुईं एक वस्टर्ण स्किन-टाइट ड्रेस में थिरकती दिखाई देती हैं, आवाज़ आशा भोसले की। सुनहरे लिबास और सुनहरी विग में राजश्री ख़ूबसूरत दिखती हैं। शम्मी, राजश्री, गीटारिस्ट्स और बैण्ड के अलावा भी कई डान्सर्स भी दिखाई देते हैं जिनमें उल्लेखनीय नाम हैं टेड सिस्टर्स की दो बहनों - एडविना और मारी - का। गीत के अन्त में ड्रमर टेड को भी प्रॉमिनेन्टली दिखाया गया है। गीत इतना मस्ती भरा हो उठता है कि राजेन्द्र नाथ और माधवी भी थिरक उठते हैं (भले राजेन्द्र नाथ का चश्मा बार बार नीचे गिर रहा था)। पृथ्वीराज कपूर भी ख़ुश नज़र आ रहे हैं। कुल मिला कर एक ख़ूबसूरत मस्ती भरा, थिरकन भरा गीत। भले गीत की धुन विदेशी धुन से प्रेरित है, पर इसे जिस तरह का ट्रीटमेण्ट पूरी की पूरी टीम ने दी है, वाक़ई कमाल की बात है।लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए। 


फिल्म जानवर : "देखो अब तो किसको नहीं है खबर..." : मोहम्मद रफी, आशा भोसले, एस. बलबीर और एस.डी. बातिश





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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