शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

चित्रशाला - 04 :फ़िल्म-संगीत में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें

चित्रशाला - 04

फ़िल्म-संगीत में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। मिर्ज़ा ग़ालिब की लोकप्रियता जितनी है शायद और किसी शायर की नहीं। हिन्दी फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों में भी ग़ालिब हर दौर में आते रहे हैं और आगे भी आते रहेंगे। आज ’चित्रशाला’ में हम चर्चा करने जा रहे हैं उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों का जो या तो मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें हैं या फिर जिनमें ग़ालिब की ग़ज़लों या शेरों का असर है। प्रस्तुत है आपके इस दोस्त सुजॉय चटर्जी द्वारा शोध किए हुए इस विषय पर यह लेख।





1931 में 'इम्पीरियल मूवीटोन' नें पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम आरा’ का निर्माण कर इतिहास रच दिया था। इसी कम्पनी की 1931 की एक और फ़िल्म थी 'अनंग सेना' जिसमें मास्टर विट्ठल, ज़ोहरा, ज़िल्लो, एलिज़र, हाडी, जगदीश और बमन ईरानी ने काम किया। फ़िल्म में अनंग सेना की भूमिका में ज़ोहरा और सुनन्दन की भूमिका में हाडी ने अभिनय व गायन किया। फ़िल्म में दो ग़ालिब की ग़ज़लें शामिल थीं – “दिले नादां तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है” और “दिल ही तो है न संगो-खिश्त, दर्द से भर न आए क्यूं”। इस तरह से ग़ालिब की ग़ज़लें बोलती फ़िल्मों के पहले साल ही फ़िल्मों में प्रवेश कर गया। हाडी अभिनेता और गायक होने के साथ साथ एक संगीतकार भी थे और ग़ालिब की इन ग़ज़लों को उन्होंने ही कम्पोज़ किया था। १९४३ की 'बसन्त पिक्चर्स' की फ़िल्म ‘हण्टरवाली की बेटी’ में छन्नालाल नाइक का संगीत था, इस फ़िल्म में ख़ान मस्ताना ने ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल “दिले नादां तुझे हुआ क्या है” को गाया जिसे ख़ूब सफलता मिली थी। 


Jaddanbai
जद्दनबाई, जिन्होंने पिछले साल ‘संगीत फ़िल्म्स’ की स्थापना कर अपनी बेटी नरगिस (बेबी रानी) को 'तलाश-ए-हक़’ में लॉन्च किया था, की 1936 में इस बैनर तले दो फ़िल्में आईं - ‘हृदय मंथन’ और ‘मैडम फ़ैशन’। जद्दनबाई निर्मित, निर्देशित, अभिनीत और स्वरबद्ध ‘हृदय मंथन’ में जद्दनबाई के गाये तमाम गीतों में मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल “दिल ही तो है न संगो ख़िश्त, दर्द से भर न आये क्यों” को भी शामिल किया गया था। इसी ग़ज़ल को 1940 में फिर एक बार फ़िल्म-संगीत में जगह मिली जब कलकत्ता के ‘फ़िल्म कॉर्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया’ की फ़िल्म ‘कैदी’ में संगीतकार भीष्मदेव चटर्जी नें इसे फिर एक बार कम्पोज़ किया। बल्कि इस फ़िल्म में ग़ालिब की दो ग़ज़लों शामिल हुईं; दूसरी ग़ज़ल थी “रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो, हमसुखन कोई न हो और हमज़बां कोई न हो”। संगीतकार रामचन्द्र पाल के भतीजे सूर्यकान्त पाल ने भी अपने चाचा की तरह फ़िल्म-संगीत के क्षेत्र में क़दम रखते हुए एस. के. पाल नाम से संगीतकार बने और पहली बार 1942 में ‘शालीमार पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘एक रात’ में संगीत दिया। इस फ़िल्म की अभिनेत्री नीना गाने में कमज़ोर थीं, और उनका पार्श्वगायन ताराबाई उर्फ़ सितारा (कानपुर) ने किया। पर रेकॉर्ड पर नीना का ही नाम छपा था। ‘हमराज़’ के ‘गीत कोश’ में भी नीना का ही नाम दिया गया है। कुछ गीत राजकुमारी ने भी गाए। ग़ालिब की ग़ज़ल “दिल ही तो है न संगो ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यूं” को इस फ़िल्म के लिए नीना (सितारा) ने गाया था। 


Saigal
ग़ालिब की मशूर ग़ज़ल “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने” कई बार फ़िल्मों में सुनाई दी है। संगीतकार बी. आर. देवधर ने पहली बार 1933 की फ़िल्म 'ज़हर-ए-इश्क़' के लिए इसे कम्पोज़ किया था। मज़ेदार बात यह है कि इसी साल, यानी 1933 में फ़िल्म  ‘यहूदी की लड़की’ में 'न्यु थिएटर्स' में संगीतकार पंकज मल्लिक नें इसी ग़ज़ल को कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में रेकॉर्ड किया। राग भीमपलासी में स्वरबद्ध यह ग़ज़ल सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इम्पीरियल के अनुबंधित संगीतकारों में एक नाम अन्नासाहब माइनकर का भी था जिन्होंने 1935 के वर्ष में ‘अनारकली’ और ‘चलता पुतला’ जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया था। ‘अनारकली’ में ग़ालिब की इसी ग़ज़ल “नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल” को एक अन्य अंदाज़ में प्रस्तुत किया था। 1934 की फ़िल्म ‘ख़ाक का पुतला’ में मास्टर मोहम्मद ने ग़ालिब की एक मशहूर ग़ज़ल “कोई उम्मीदबर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती, मौत का एक दिन मुइयाँ है, नींद क्यों रात भर नहीं आती” को कम्पोज़ किया था जिसे अच्छी सराहना मिली थी। 1935 में महबूब ख़ान निर्देशित फ़िल्म ‘जजमेण्ट ऑफ़ अल्लाह’ में संगीतकार प्राणसुख नायक का संगीत था। अन्य गीतों के साथ ग़ालिब की इसी मशहूर ग़ज़ल “कोई उम्मीदवर नहीं आती” को उन्होंने भी स्वरबद्ध किया था। 1949 की फ़िल्म 'अपना देश' में भी यही ग़ज़ल सुनने को मिली जिसके संगीतकार थे पुरुषोत्तम और गायिका थीं पुष्पा हंस। 1942 की ‘फ़ज़ली ब्रदर्स’ की फ़िल्म ‘चौरंगी’ (अंग्रेज़ी में Chauringhee) में काजी नज़रूल इस्लाम और हनुमान प्रसाद शर्मा संगीतकार थे। हनुमान प्रसाद की यह पहली फ़िल्म थी। इस फ़िल्म के लिए प्रसाद नें इस ग़ज़ल को कम्पोज़ किया था। 1941 में  ‘फ़ज़ली ब्रदर्स कलकत्ता’ ने मुन्शी मुबारक हुसैन को संगीतकार लेकर फ़िल्म बनाई ‘मासूम’। अन्य गीतों के अलावा ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल “आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक” को इस फ़िल्म के लिए कम्पोज़ किया गया था। 


A scene from Mirza Ghalib (1954)
1954 में मिर्ज़ा ग़ालिब पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनी, जिसमें भारत भूषण नें ग़ालिब का रोल अदा किया। साथ में थीं सुरैया। फ़िल्म में संगीत था मास्टर ग़ुलाम मुहम्मद का, और कहने की ज़रूरत नहीं, सभी ग़ज़लें ग़ालिब की लिखी हुई थीं। फ़िल्म में ग़ालिब की इन ग़ज़लों को शामिल किया गया था -
१. आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक (सुरैया)
२. दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है (तलत-सुरैया)
३. है बस कि हर एक उनके इशारे में निशां और करते हैं मुहब्बत (रफ़ी)
४. इश्क़ मुझको न सही वहशत ही सही (तलत)
५. नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल (सुरैया)
६. फिर मुझे दीद-ए-तर याद आया (तलत)
७. रहिए अब ऐसी जगह चलकर (सुरैया)
८. ये न थी हमारी क़िस्मत (सुरैया)


Gulzar
"ये न थी हमारे क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता", इस ग़ज़ल को उषा मंगेशकर नें शंकर जयकिशन की धुन पर फ़िल्म 'मैं नशे में हूँ' में गाया था। उधर गुलज़ार नें ग़ालिब का एक शेर लिया "दिल ढूंढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन, बैठे रहें तसव्वुरे जाना किए हुए", और इसी को ईलाबोरेट करते हुए फ़िल्म 'मौसम' का वह ख़ूबसूरत गीत लिख डाला। नए दौर में ग़ालिब की जिस ग़ज़ल को फ़िल्म में जगह मिली, वह थी "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले"। फ़िल्म का नाम भी था 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी' जो आई थी साल 2003 में। संगीतकार शान्तनु मोइत्रा नें शुभा मुदगल से इस ग़ज़ल को गवाया था इस फ़िल्म में। 


ग़ालिब की एक बेहद मशहूर शेर है "इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है यह वह आतिश ग़ालिब, कि लगाये ना लगे और बुझाये ना बने"। इस शेर का सहारा समय-समय पर फ़िल्मी गीतकारों ने लिय अपने गीतों को सजाने-सँवारने के लिए। उदाहरण स्वरूप, 1981 की फ़िल्म ’एक दूजे के लिए’ के मज़ेदार गीत "हम बने तुम बने एक दूजे के लिए" में एक पंक्ति है "इश्क़ पर ज़ोर नहीं ग़ालिब ने कहा है इसीलिए, उसको क़सम लगे जो बिछड़ के एक पल भी जिये..."। इसके गीतकार थे आनन्द बक्शी। वैसे बक्शी साहब ने इस गीत से 10 साल पहले, 1970 में, फ़िल्म ’इश्क़ पर ज़ोर नहीं’ के शीर्षक गीत में भी इस जुमले का इस्तमाल किया और ख़ूबसूरत गीत बना "सच कहती है दुनिया इसक पे जोर नहीं, यह पक्का धागा है यह कच्ची डोर नहीं, कह दे कोई और है तू मेरा चितचोर नहीं, जो थम जाए वो ये घटा घनघोर नहीं, इस रोग की दुनिया में दवा कुछ और नहीं..."। 1995 की फ़िल्म ’तीन मोती’ में नवाब आरज़ू के कलम से निकले "इश्क़ पे कोई ज़ोर चले ना ना कोई मनमानी, फँस गई मैं तो प्रेम भँवर में अब क्या होगा जानी"। इस तरह से ग़ालिब की ग़ज़लें हर दौर में फ़िल्मों में आती रही हैं। कुछ तो है इन ग़ज़लों में कि इतने पुराने होते हुए भी आज की पीढ़ी को पसन्द आते हैं। दरसल ये कालजयी रचनाएँ हैं जिन पर उम्र का कोई असर नहीं। ग़ालिब नें जैसे लिखा था कि "आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक", ठीक वैसे ही इन ग़ज़लों का असर सदियों तक यूंही बना रहेगा। 

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिए। आपके सुझावों के आधार पर हम अपने कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। आप हमें radioplaybackindia@live.com के पते पर अपने सुझाव, समालोचना और फरमाइशें भेज सकते हैं।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी



रविवार, 25 अक्तूबर 2015

बेगम अख्तर की ठुमरी और ग़ज़ल : SWARGOSHTHI – 241 : THUMARI & GAZAL OF BEGAM AKHTAR




स्वरगोष्ठी – 241 में आज 

संगीत के शिखर पर – 2 : बेगम अख्तर की ठुमरी और ग़ज़ल

विदुषी बेगम अख्तर को उनकी जन्मशती वर्ष-पूर्ति पर सुरीला स्मरण 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का एक बार फिर स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा करेंगे। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व और उनकी कृतियों को प्रस्तुत करेंगे। आज श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हमारा विषय है, उपशास्त्रीय संगीत और इस विधा में अत्यन्त लोकप्रिय गायिका विदुषी बेगम अख्तर के व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा करेंगे और उनकी गायी राग मिश्र खमाज और काफी की ठुमरी तथा एक ग़ज़ल सुनवाएँगे।


श्रृंगार और भक्तिरस से सराबोर ठुमरी और गजल शैली की अप्रतिम गायिका बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्तूबर, 1914 को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद नामक एक छोटे से नगर (तत्कालीन अवध) में एक कट्टर मुस्लिम परिवार में हुआ था। परिवार में किसी भी सदस्य को न तो संगीत से अभिरुचि थी और न किसी को संगीत सीखना-सिखाना पसन्द था। परन्तु अख्तरी (बचपन में उन्हें इसी नाम से पुकारा जाता था) को तो मधुर कण्ठ और संगीत के प्रति अनुराग जन्मजात उपहार के रूप में प्राप्त था। एक बार सुविख्यात सरोदवादक उस्ताद सखावत हुसेन खाँ के कानों में अख्तरी के गुनगुनाने की आवाज़ पड़ी। उन्होने परिवार में ऐलान कर दिया कि आगे चल कर यह नन्ही बच्ची असाधारण गायिका बनेगी, और देश-विदेश में अपना व परिवार का नाम रोशन करेगी। उस्ताद ने अख्तरी के माता-पिता से संगीत की तालीम दिलाने का आग्रह किया। पहले तो परिवार का कोई भी सदस्य इसके लिए राजी नहीं हुआ किन्तु अख्तरी की माँ ने सबको समझा-बुझा कर अन्ततः मना लिया। उस्ताद सखावत हुसेन ने अपने मित्र, पटियाला के प्रसिद्ध गायक उस्ताद अता मुहम्मद खाँ से अख्तरी को तालीम देने का आग्रह किया। वे मान गए और अख्तरी उस्ताद के पास भेज दी गईं। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें उस्ताद के कठोर अनुशासन में रियाज़ करना पड़ा। तालीम के दिनों में ही उनका पहला रिकार्ड- ‘वह असीरे दम बला हूँ...’ बना और वे अख्तरी बाई फैजाबादी बन गईं। उस्ताद अता मुहम्मद खाँ के बाद उन्हें पटना के उस्ताद अहमद खाँ से रागों की विधिवत शिक्षा मिली। इसके अलावा बेगम अख्तर को उस्ताद अब्दुल वहीद खाँ और हारमोनियम वादन में सिद्ध उस्ताद गुलाम मुहम्मद खाँ का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। 1934 में कलकत्ता (अब कोलकाता) के अल्फ्रेड थियेटर हॉल में बिहार के भूकम्प-पीड़ितों के सहायतार्थ एक संगीत समारोह का आयोजन किया गया था। इस समारोह में कई दिग्गज कलाकारों के बीच नवोदित अख्तरी बाई को पहली बार गाने का अवसर मिला। मंचीय कार्यक्रमों की भाषा में कहा जाए तो “अख्तरी बाई ने मंच लूट लिया”। बेगम अख्तर की गायकी का एक अलग ही अंदाज रहा है। उनकी भावपूर्ण गायकी का सहज अनुभव कराने के लिए अब हम प्रस्तुत करते हैं, एक ठुमरी। यह ठुमरी राग मिश्र खमाज में निबद्ध है, जिसके बोल हैं –“अँखियन नींद न आए...”। 


ठुमरी मिश्र खमाज : ‘अँखियन नींद न आए...’ : बेगम अख्तर




पण्डित जसराज
बेगम विदुषी बेगम अख्तर का उदय जिस काल में हुआ था, भारतीय संगीत का पुनर्जागरण काल था। ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय संगीत जिस प्रकार उपेक्षित हुआ था, उससे जनजीवन से संगीत की दूरी बढ़ गई थी। ऐसी स्थिति में 1878 में जन्में पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और 1896 में जन्में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने अपने अनथक प्रयत्नों से पूरी शुचिता के साथ संगीत को न केवल पुनर्प्रतिष्ठित किया बल्कि जन-जन के लिए संगीत-शिक्षा सुलभ कराया। इस दोनों संगीत-ऋषियों के प्रयत्नों के परिणाम बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में परिलक्षित होने लगे थे। बेगम अख्तर इसी पुनर्जागरण काल की देन थीं। उनकी गायकी में शुचिता थी और श्रोताओं के हृदय को छूने की क्षमता भी थी। अब हम आपके लिए बेगम अख्तर के स्वर में एक होरी ठुमरी प्रस्तुत करते हैं। सुविख्यात गायक पण्डित जसराज ने बेगम साहिबा और उनकी गायकी पर एक सार्थक टिप्पणी की थी, जिसे ठुमरी से पूर्व आप भी सुनेंगे। 


होरी ठुमरी : ‘कैसी ये धूम मचाई...’ : बेगम अख्तर




बेगम अख्तर यद्यपि खयाल गायकी में अत्यन्त कुशल थीं किन्तु उन्हें ठुमरी और गज़ल गायन में सर्वाधिक ख्याति मिली। स्पष्ट उच्चारण और भावपूर्ण गायकी के कारण उन्हे चौथे और पाँचवें दशक की फिल्मों में भी अवसर मिला। उन्होने ईस्टर्न इण्डिया कम्पनी की फिल्मों- एक दिन का बादशाह, नल-दमयंती, नसीब का चक्कर आदि फिल्मों में काम किया। 1940 में बनी महबूब प्रोडक्शन की फिल्म ‘रोटी’ में उनके गाये गीतों ने तो पूरे देश में धूम मचा दिया था। विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रे ने 1959 में फिल्म ‘जलसाघर’ का निर्माण किया था। यह फिल्म उन्नीसवीं शताब्दी की सामन्तवादी परम्परा और भारतीय संगीत की दशा-दिशा पर केन्द्रित थी। फिल्म ‘जलसाघर’ में गायन, वादन और नर्तन के तत्कालीन उत्कृष्ट कलाकारों को प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया गया था। फिल्म में बिस्मिल्लाह खाँ (शहनाई), उस्ताद वहीद खाँ (सुरबहार), रोशन कुमारी (कथक), उस्ताद सलामत अली खाँ (खयाल गायन) के साथ बेगम अख्तर का गायन भी प्रस्तुत किया गया था। 

कैफी आज़मी
बेगम अख्तर ने अपने जीवन में ठुमरी, दादरा और गज़ल गायकी को ही लक्ष्य बनाया। खयाल गायकी में भी वे दक्ष थीं, किन्तु उनका रुझान उप-शास्त्रीय गायकी की ओर ही केन्द्रित रहा। उनकी गायकी में अनावश्यक अलंकरण नहीं होता था। उनके सुर सच्चे होते थे। बड़ी सहजता और सरलता से रचना के भावों को श्रोताओं तक सम्प्रेषित कर देती थीं। अब हम आपके लिए बेगम साहिबा की गज़ल गायकी का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। उनके जीवनकाल में आयोजित एक कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध शायर कैफी आज़मी और बेगम अख्तर की एक अनूठी जुगलबन्दी हुई थी। पहले कैफी आज़मी ने अपनी एक गज़ल पढ़ी। बाद में बेगम साहिबा ने उसी गज़ का सस्वर गायन प्रस्तुत किया था। शायर और गायिका की एक ही मंच पर हुई इस अनूठी जुगलबन्दी का आप आनन्द लीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हम विदुषी बेगम अख्तर की स्मृतियों को नमन अर्पित है। 


गजल : ‘सुना करो मेरे जाँ इनसे उनसे अफसाने...’ : बेगम अख्तर




संगीत पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 241वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत रचना का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा भी की जाएगी। 


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि रचना के इस अंश में किस राग का स्पर्श है? 

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए। 

3 – यह किस गायक की आवाज़ है? गायक का नाम बताइए। 

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 31 अक्टूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 243वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 239वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा सरोद पर प्रस्तुत एक रचना का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचंदी या चाँचर और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – सरोद। 

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। 


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे ठुमरी, दादरा और गजल गायकी के शिखर पर प्रतिष्ठित बेगम अख्तर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त चर्चा की है। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

BAATON BAATON MEIN-13: INTERVIEW OF PULKIT SAMRAT

बातों बातों में - 13

अभिनेता पुलकित सम्राट से लम्बी बातचीत


"हर कोई सर्वोच्च शिखर पर चढ़ना चाहता है, और मैं उसी कोशिश में लगा हूँ"  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। इस बार हम आपके लिए लेकर आए हैं जाने-माने अभिनेता पुलकित सम्राट से की हुई लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। पुलकित सम्राट इन दिनों सफलता की सीढ़ियाँ लगातार चढ़ते चले जा रहे हैं। तो आइए मिलते हैं पुलकित सम्राट से।
    




’बिट्टू बॉस’, ’फ़ुकरे’, ’ओ तेरी’, ’बंगिस्तान’, ’डॉली की डोली’ जैसी फ़िल्मों और ’क्योंकि सास भी कभी बहु थी’ जैसे लोकप्रिय धारावाहिक में अभिनय करने वाले पुलकित सम्राट आज हमारे साथ हैं, नमस्कार पुलकित, और बहुत बहुत स्वागत है आपका।

नमस्कार, और धन्यवाद मुझे याद करने के लिए!

पुलकित, सबसे पहले तो यह बताइए कि आपकी पैदाइश कहाँ की है, अपने परिवार और बचपन की यादों के बारे में कुछ बताइए?

मेरी पैदाइश 1983 की है, मैं एक पंजाबी हूँ और मेरा जन्म दिल्ली के शालीमार बाग़ में एक बहुत बड़े संयुक्त परिवार में हुआ। मैं परिवार का बड़ा बेटा हूँ, और सबसे ज़्यादा लाड-प्यार मुझे ही मिला। मेरे परिवार का real estate का कारोबार है। आर्थिक रूप से परिवार मज़बूत था, इसलिए मुझे कभी पैसों की कमी वाला जो संघर्ष है, वो नहीं करना पड़ा। न्यु राजेन्द्र नगर में ’मानव स्थली स्कूल’ है, मैं उसमें दसवीं कक्षा तक पढ़ा। उसके बाद अशोक विहार स्थित Montfort Senior Secondary School से बारहवीं की पढ़ाई पूरी की।

पुलकित, माफ़ी चाहूँगा टोकने के लिए, पर यहाँ एक सवाल पूछना चाहूँगा कि क्योंकि मैं भी दिल्ली से हूँ और मुझे यह पता है कि ’मानव स्थली’ बारहवीं तक है, फिर आपने स्कूल क्यों बदला?

बहुत अच्छा सवाल है यह (हँसते हुए); दरसल बात ऐसी थी कि मुझे ’मानव स्थली’ से निकाल दिया गया था, मेरा जुर्म यह था कि मैंने वाइस-प्रिन्सिपल के ऑफ़िस के बाहर पटाखे फोड़े थे। 

हा हा हा, मतलब आपके अव्वल दर्जे के शरारती हुआ करते थे?

पूछिए मत... मैं कभी अपने क्लासेस बंक नहीं करता था क्योंकि मेरा लक्ष्य ही था क्लास में बैठ कर टीचर को परेशान करना। मैं बिल्कुल सामने वाली पंक्ति में बैठ कर वो सब शरारतें करता जो आम तौर पर लास्ट बेन्चर्स करते हैं।


वैसे पढ़ाई में आप कैसे थे?

पढ़ाई में काफ़ी अच्छा था, मुझे दसवी में 87% मार्क्स मिले थे, पर ’मानव स्थली’ वालों ने मुझे जान-बूझ कर ग्यारहवीं में ’non-medical science’ लेने नहीं दिया। और यही वजह है स्कूल बदलने की। वहाँ मैं IIT और Medical entrance tests की तैयारी भी करने लगा। पर जल्द ही मुझे पता चल गया कि मुझे पढ़ाई-लिखाई में खास रुचि नहीं है, और मैं मनोरंजन की दुनिया में जाना चाहता हूँ। यह सोच कर मैंने Apeejay Institute of Design में दाखिला ले लिया, और केवल पाँच महीने के भीतर मुझे मॉडल के रूप में काम करने का मौका मिल गया। वह एक Asian Paints का विज्ञापन था।

यानी कि यह आपके प्रोफ़ेशनल करीअर का पहला ब्रेक था। क्या उम्र थी उस वक़्त आपकी?

मैं 19 साल का था उस वक़्त। इस विज्ञापन के तुरन्त बाद मैंने मुंबई जाने का फ़ैसला कर लिया, और मुंबई आकर किशोर नमित कपूर के वहाँ अभिनय का एक कोर्स करने लगा। यह 2005 की बात थी। इससे फ़ायदा यह हुआ कि मुझे ’बालाजी टेलीफ़िल्म्स’ में ऑडिशन देने का मौक़ा मिल गया। उन दिनों ’क्योंकि सास भी कभी बहु थी’ टॉप पर चल रही थी, उसी धारावाहिक में एक नए चेहरे की ज़रूरत थी जिसका ऑडिशन वो लोग कर रहे थे। मैं इस ऑडिशन में कामयाब रहा और लक्ष्य वीरानी का किरदार मुझे मिल गया।

और इस तरह से पुलकित सम्राट इस देश के हर घर में पहुँच गया, है ना?

सही बात है! 


’क्योंकि सास...’ में लक्ष्य वीरानी की भूमिका में
अच्छा, आपका किरदार काफ़ी सराहा जा रहा था, पर जल्द ही, यानी कि एक साल के भीतर ही आपने इस धारावाहिक को छोड़ने का फ़ैसला कर लिया। ऐसा क्यों?

एकता (कपूर) का मैं आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे बड़ा ब्रेक दिया और मुझे हिन्दुस्तान के हर घर तक पहुँचाया। मुझे बहुत जल्दी गुस्सा आता है जब मेरे आसपास चीज़ें सही नहीं चलती हैं। और शायद यही वजह है बालाजी को छोड़ने का।

ज़रा विस्तार से बताएँगे कि मुद्दा क्या था?

मैं उस धारावाहिक में करीब डेढ़ साल से काम कर रहा था। पर देखा जाए तो मेरे रोल के लिए मैंने केवल चार-पाँच महीने ही काम किए होंगे मुश्किल से। मुझे महीने के 30 दिन शूट पर जाना पड़ता था जहाँ 14 घंटे इन्तज़ार करने के बाद मेरा दो-तीन मिनट का शॉट होता था। मैं दिल्ली से मुंबई ये करने तो नहीं आया था। मुझे पता है कि इन्डस्ट्री में काम ऐसे ही होता है और अगर रोल दमदार हो तो ये सब जायज़ है। मेरे हिस्से में तो कभी-कभी सिर्फ़ ऐसे लाइन्स आते थे कि "खाना अच्छा है", या फिर मुझे जाकर दरवाज़ा खोलना है। जब मैंने इन सब बातों को सामने रखा और कहा कि मैं ’बालाजी’ के बाहर भी काम करना चाहता हूँ क्योंकि मेरा यहाँ समय बरबाद हो रहा है तो उन लोगों ने मुझे मेरा बालाजी के साथ तीन साल का कॉनट्रैक्ट दिखाया। और तरह तरह की अफ़वाहें उड़ने लगी कि मैं नियम तोड़ कर बाहर काम कर रहा हूँ वगेरह वगेरह। और एक दिन तो हद ही हो गई। मुझे एक कोर्ट का नोटिस मिला जिसमें यह लिखा हुआ था कि मैं ना तो शूट पे जा रहा हूँ और ना प्रोडक्शन हाउस के फ़ोन कॉल्स अटेन्ड कर रहा हूँ, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था।

आपने एकता कपूर से बात की इस बारे में?

मैंने कोशिश की उन्हें समझाने की पर उन्हें मुझ पर यकीन नहीं हुआ। कुछ लोगों ने उन्हें ग़लत बातें बताई जिन पर उन्हें बहुत ज़्यादा विश्वास था, और उन्हीं के कहने पर वो ये सब करवा रही थीं।

अच्छा फिर क्या हुआ?

उस नोटिस को देख कर तो मेरा दिमाग़ ख़राब हो गया और मैंने भी कोर्ट में केस कर दिया ’बालाजी’ के ख़िलाफ़। हर प्रोडक्शन का कॉनट्रैक्ट होता है, पर उसके बाहर आप काम नहीं कर सकते, यह उचित बात नहीं है। एक अभिनेता के लिए निरन्तर आगे बढ़ना बहुत ज़रूरी होता है। इसलिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने के अलावा मेरे पास कोई उपाय नहीं था।

कोर्ट का फ़ैसला किसके पक्ष में गया?

निस्संदेह मेरे पक्ष में, अभिनेताओं के पक्ष में। मैं आभारी हूँ उन सभी लोगों का जिन्होंने मुझे इस लड़ाई को लड़ने का हौसला दिया। जस्टिस चन्द्रचुड़ ने बालाजी को हिदायत दी कि वो अभिनेताओं के साथ ऐसा नहीं कर सकते और उन्हें अन्य प्रोडक्शन हाउसेस में काम करने से नहीं रोक सकते।

एकता कपूर के साथ पंगा लेना करीअर के लिए खतरा मोल लेना नहीं लगा आपको?

मैंने एकता से माफ़ी माँगी, मुझे उनसे कोई ज़ाती दुश्मनी तो थी नहीं, मुझे उस कॉनट्रैक्ट से परेशानी थी। मुझे पता है कि उनके पास कुछ ख़ास तरह की शक्तियाँ हैं, पर अगर उन सब के बारे में सोचने लगता तो ज़िन्दगी में आगे नहीं बढ़ पाता। कोर्ट केस ख़त्म होने पर एकता ने मुझे एक SMS भेजा कि 'We will see to it by next year you will be nowhere.' मुझे ख़ुशी है कि मैंने यह क़दम उठाया, मुझे ढेरों संदेश मिले इंडस्ट्री से, चैनल वालों से, पत्रकारों से, दोस्तों और चाहने वालों से।

’बालाजी’ की चर्चा ख़त्म करने से पहले यह जानना चाहूँगा कि लक्ष्य वीरानी के रोल के लिए आपको कुछ पुरस्कार भी मिले थे, उनके बारे में कुछ बताइए?

मुझे उसके लिए The Indian Telly Awards में Best Fresh New Face Award मिला था। इसके अलवा Star Parivaar Awards में Favourite Naya Sadasya Award मिला था। पर उससे भी ज़्यादा, उससे भी बड़ा अवार्ड था लोगों का प्यार। देश के कोने कोने से मुझे लोगों के, चाहने वालों के संदेश मिलते थे, जो मेरा हौसला अफ़ज़ाई करते थे।

अच्छा, ’क्यॊंकि सास...’ और कोर्ट केस का मसला सुलझने के बाद आपने क्या किया?

उसके बाद मैं ’ताज एक्स्प्रेस’ शीर्षक से एक म्युज़िकल थिएट्रिकल शो किया जो कोरीओग्राफ़र वैभवी मर्चैन्ट का शो था। इस शो ने मेरे आत्मविश्वास को और भी ज़्यादा बढ़ा दिया। इस शो का जो कास्टिंग् डिरेक्टर था, वही कास्टिंग् डिरेक्टर ’बिट्टू बॉस’ की भी कास्टिंग् कर रहे थे। कई राउन्ड्स ऑडिशन होने के बाद मेरा सेलेक्शन हो गया इस फ़िल्म के लिए।


’बिट्टू बॉस’ का दृश्य
और इस तरह से आप छोटे परदे से बड़े परदे पर आ गए?

जी हाँ!

’बिट्टू बॉस’ फ़िल्म में आपके किरदार के बारे में कुछ बताइए।

इस फ़िल्म में मैंने एक पंजाबी wedding videographer बिट्टू का रोल किया था, यानी कि जो शादी के विडियोज़ शूट करता है। किस तरह से वो अपनी चारों तरफ़ ख़ुशियाँ फैलाता है, कैसे एक लड़की से प्यार होने पर उसकी ज़िन्दगी बदल जाती है, ये सब कुछ मिला कर है इस फ़िल्म की कहानी।

इस फ़िल्म को लेकर विवाद भी खड़ा हुआ था, उसके बारे में बताइए?

सेन्सर बोर्ड ने इस फ़िल्म का प्रोमो रीजेक्ट कर दिया था। प्रोमो में सबकुछ कैमरामैन के कैमरे से दिखाया गया था, जिसमें शादी में आए महमान कैमरामैन से कहते हैं कि "मेरी भी लो" जिसका डबल मीनिंग् भी होता है। वैसे ही गाने में बोल थे "बिट्टू सबकी लेगा"। ये सब देख कर सेन्सर बोर्ड ने फ़िल्म के प्रोमो को अश्लील करार देते हुए इसे रद्द कर दिया। उस गीत को भी रद्द कर दिया। अन्त में PG Certification के साथ फ़िल्म को मुक्ति मिली। यहाँ मैं बताना चाहूँगा कि भारत में PG certificate वाला यह पहला फ़िल्म है, जिसका अर्थ है 15 वर्ष के उपर के लोग इसे देख सकते हैं अपने अभिभावक की उपस्थिति में।


अपने ’भाई’ के साथ
पर यह फ़िल्म असफल रही?

जी हाँ, बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म पिट गई। भाई ने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा कि "आज भले मैं एक ऊँचे मुकाम पे हूँ, पर हर शुक्रवार हमारी ज़िन्दगी बदल सकता है। बड़े-बड़े अभिनेताओं को भी फ़्लॉप का सामना करना पड़ता है। इसलिए फ़िल्म के नतीजे से परेशान मत हुआ करो। इमानदारी से अपना काम करते रहो और यही तुम्हे एक दिन पार लगाएगा।" उनकी इस बात को मैं हमेशा ध्यान में रखता हूँ।

आपने "भाई" का ज़िक्र किया, कौन है ये भाई?

सलमान भाई, सलमान ख़ान! 

अच्छा अच्छा! जी हाँ, हमने भी सुना है आपके और सलमान ख़ान के रिश्ते के बारे में। आप बहुत अच्छा नकल भी उतारते हैं उनकी, उनके मैनरिज़्म्स की। तो बताइए सलमान ख़ान से आपका क्या रिश्ता है?

आप मुझे उनका साला कह सकते हैं। मेरी पत्नी श्वेता उनकी "राखी बहन" है। श्वेता एक सिंधी लड़की है जो मुंबई में अपना बूटिक़ चलाती है। पर जब मैं उससे मिला था तब वो एक पत्रकार थीं जो मेरा इन्टरव्यू लेने आई थी जब मैं ’क्योंकि...’ कर रहा था। हम दोस्त बन गए और जल्द ही एक दूसरे को पसन्द करने लगे। श्वेता जब छोटी थी, तब वो सलमान भाई के घर ज़बरदस्ती घुस गई। जब सलमा आन्टी नीचे आईं तो उनसे कहा कि मैं सलमान को राखी बाँधना चाहती हूँ। भाई नीचे आए और श्वेता से पूछा कि क्या तुम राखी बाँधने वाली बात पे गम्भीर हो? उनका यह कहना था कि अगर वो एक बार राखी बाँधेगी तो हर साल बाँधना पड़ेगा क्योंकि वो रिश्तों को सदा कायम रखने में विश्वास करते हैं। उन्होंने श्वेता से कहा कि अगर तुम यह नहीं कर सकती तो राखी मत बाँधो। और उस दिन से लेकर आज तक वो हर साल भाई को राखी बाँधती चली आ रही है।

तो अपने भाई से आपकी मुलाक़ातें होती रहती हैं?

जब भी वो शहर में होते हैं। हम कभी भी उनके घर जा सकते हैं। पूरी दुनिया उनसे प्यार करती है। हम ख़ुशनसीब हैं कि भाई भी हमसे प्यार करते हैं। उनके पास एक नहीं पर चार-चार दिल है। He is one of the best human beings that I have seen, इसलिए नहीं कि वो एक स्टार हैं, बल्कि इसलिए कि एक स्टार होने के बावजूद इतने ज़्यादा सीधे हैं और उनके पाँव हमेशा ज़मीन पर ही रहते हैं। उन्हें सादा जीवन पसन्द है। अगर आप उन्हें एक छोटी गाड़ी में बिठा दो, तो भी वो कुछ नहीं कहेंगे। वो 24x7 फ़िल्मों के बारे में सोचते रहते हैं। लोगों को यह लगता है कि वो सेट पर देर से आते हैं वगेरह वगेरह, पर सच पूछिये तो वो सिर्फ़ फ़िल्मों की ही बातें करते हैं, फ़िल्मों से ही उनकी साँसें चलती हैं।

आपके अभिनय के बारे में कभी उन्होंने कोई टिप्पणी की?

’बिट्टू बॉस’ में मेरा डान्स उनको अच्छा लगा और मुझसे उनकी बहुत सी आशाएँ हैं। मैं कोशिश करूँगा कि उनकी इस उम्मीद पर खरा उतर सकूँ। अतुल अग्निहोत्री की ’ओ तेरी’ फ़िल्म में उन्होंने ही मुझे मौका दिलवाया अभिनय का।

बहुत ख़ूब! ’क्योंकि सास...’ और ’बिट्टू बॉस’ - एक टेलीविज़न, दूसरी फ़िल्म। किस तरह का फ़र्क आपने महसूस किया दोनो में?

फ़र्क सिर्फ़ स्केल और डीटेलिंग् का है। दोनों माध्यमों की अपनी लाभ और हानियाँ हैं। टेलीविज़न को हमेशा फ़िल्मों की ज़रूरत पड़ेगी ग्लैमर के लिए, और फ़िल्मों को टीवी की ज़रूरत पड़ती रहेगी पब्लिसिटी के लिए, प्रोमोशन के लिए। मुझे दोनों माध्यमों में काम करने में रुचि है, पर यह सच है कि हर कोई सर्वोच्च शिखर पर चढ़ना चाहता है, और मैं उसी कोशिश में लगा हूँ। मुझे प्रतीक्षा रहेगी यह जानने की कि दर्शक मुझे टेलीविज़न पर स्वीकार करती है या फ़िल्मों में।


’फ़ुकरे’ का दृश्य
पुलकित, ’बिट्टू बॉस’ के बाद आपकी दूसरी फ़िल्म आई ’फ़ुकरे’। इसका ऑफ़र कैसे मिला आपको?

रितेश सिधवानी ने ’बिट्टू बॉस’ के किसी डान्स नंबर को देखा और मुझे ’फ़ुकरे’ की ऑडिशन के लिए बुलाया। फ़रहान और रितेश को मुझ पर भरोसा था और यह रोल मुझे मिल गया।

’फ़ुकरे’ में और भी कई चेहरे नज़र आए, आपके रोल के बारे में कुछ बताइए।

मैंने इसमें हनी नाम के लड़के का रोल किया जो एक बेकार लड़का है, वेला जिसे कहते हैं पंजाबी में। वह सुबह घर से निकल जाता है और वापस सिर्फ़ सोने के लिए आता है। वह सोचता है कि वह ग़लत घर में पैदा हो गया जबकि उसे टाटा या बिरला परिवार में पैदा होना चाहिए था। स्कूल में पहली कक्षा से ही फ़ेल होता आया है पर उसे कॉलेज जाने की इच्छा है जहाँ वह लड़कियों के साथ घूमने और मस्ती करने के सपने देखता है। वह हमेशा कोई ना कोई प्लान बनाता रहता है पैसे कमाने का, और एक दिन अपने दोस्त चूचा की एक अद्वितीय क्षमता का इस्तेमाल करके एक प्लान बनाता है जो उसे अपनी कब्र की ओर लिए जाता है।

इस फ़िल्म में आपका दिल्ली उच्चारण अलग हट के था। कैसे तैयारी की थी इसकी?

इस फ़िल्म में भाषा एक चिन्ता की विषय ज़रूर थी क्योंकि यह पूरी तरह से दिल्ली की भाषा नहीं थी, बल्कि पूर्वी दिल्ली की भाषा थी। इसमें एक स्पीच पैटर्ण होती है। इसलिए मैं पूर्वी दिल्ली के एक म्युनिसिपल स्कूल में गया, और वहाँ जाकर देखा कि वो लोग वही सब कर रहे थे जो हम फ़िल्म में दिखाने वाले थे। दीवारों पर से कूदना, क्लासेस बंक करना, कभी सटीक यूनिफ़ॉर्म में न रहना वगेरह। वहाँ एक क्लास था जहाँ स्कूल के रेज़ल्ट बताए जा रहे थे, और जिसने भी पास नहीं किया, उसे क्लास से बाहर भेजा जा रहा था। रेज़ल्ट घोषणा के ख़त्म होने के बाद उस क्लास में केवल दो ही लड़के अन्दर बैठे हुए थे। पूरी क्लास बाहर थी। मैं उसी तरह का किरदार निभा रहा था। मेरे लिए वहाँ जाना बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुआ। फ़िल्म के सेट पर भी इन किरदारों को निभाते हुए हमने जो जो चीज़ें की, ’फ़ुकरे’ के बाद अगर अब मुझे नंगा होकर सड़क पर दौड़ने के लिए कहोगे तो मुझे कोई झिझक नहीं होगी (हँसते हुए)।


’ओ तेरी’ का दृश्य
’फ़ुकरे’ के बाद आई ’ओ तेरी’, जो अतुल अग्निहोत्री की फ़िल्म थी और इस फ़िल्म के पीछे सलमान ख़ान का भी हाथ था। यानी कि पूरी तरह से यह आपकी पारिवारिक फ़िल्म जैसी थी। इस फ़िल्म के बारे में बताइए कुछ?

इस फ़िल्म में यही दिखाने की कोशिश की गई है कि मीडिया के हाथ काफ़ी लम्बे होते हैं। इसमें मेरे साथ बिलाल अमरोही ने भी काम किया, हम दोनो ने टीवी जर्नलिस्ट के किरदार निभाए। हमने बहुत मस्ती किए शूटिंग् के दौरान। लेकिन यह फ़िल्म चल नहीं पाई।

पुलकित, अब तक जितनी भी फ़िल्मों की चर्चा हमने की, किसी में भी आप सोलो हीरो नहीं थे। क्या आप अब सोलो-हीरो वाली फ़िल्म में अभिनय करने का प्रयास कर रहे हैं?

जी नहीं, बल्कि मैं एक ऐसी फ़िल्म की तलाश में हूँ जिसकी कहानी फ़िल्म का हीरो है। आप समझ रहे होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ।

जी जी, मतलब कहानी में दम होनी चाहिए।

मुझे लगता है कि मैं अब तक अपनी प्रधान गुण (forte) को खोज नहीं पाया हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि मुझे अपने आप को अभी और दो तीन साल देने होंगे ताकि मैं यह भाँप सकूँ कि एक अभिनेता के कौन कौन से गुण मेरे अन्दर है और किस जौनर में मुझे जाना चाहिए। अभी के लिए मुझे जो भी रोल मिलता है मुझे उसे पूरी इमानदारी के साथ निभाना है और कहानी का हिस्सा बनना है।


'डॉली की डोली’ में पुलकित दिखे चुलबुल पाण्डे जैसे
इस साल 2015 में आपकी अब तक दो फ़िल्में आ चुकी हैं - ’डॉली की डोली’ और ’बंगिस्तान’। पहली फ़िल्म के बारे में बताइए।

’डॉली की डोली’ भी एक कॉमेडी-ड्रामा फ़िल्म थी, जिसमें मुझे सोनम कपूर के साथ काम करने का मौक़ा मिला। इसमें मैंने एक सख़्त पुलिसवाले का किरदार निभाया था। मेरा जो गेट-अप था, लोगों को लगा कि वो भाई के चुलबुल पाण्डे से मिलता-जुलता है। 

’बंगिस्तान’ में आपने रितेश देशमुख के साथ काम किया। उस अनुभव के बारे में बताइए?


रितेश बहुत ही मज़ाक़िया मिज़ाज के हैं। उनका सेन्स ऑफ़ ह्युमर कमाल का है। पर शुरु में मुझे उनके साथ काम करने में थोड़ा डर लग रहा था क्योंकि वो मुझसे काफ़ी सीनीयर हैं। इसलिए मैं सोचता था कि पता नहीं वो कैसे मेरे साथ पेश आएँगे, कैसे मैं उनक्से साथ काम करूँगा वगेरह वगेरह। जब पहली बार हम मिले तो मैंने कुछ नहीं बोला। रीतेश ने ही पहले ’हैलो’ कह कर दोनों के बीच के बर्फ़ को तोड़ा, he made me the most comfortable. वो अपने आइडियाज़ देते थे कि 'let's do something’, हमलोग वर्कशॉप्स करते थे और इतने ज़्यादा मस्ती करते थे कि दोनों के बीच फिर कोई दीवार नहीं रह गई थी और दोनों एक दूसरे के सामने ऐसे खुल गए थे कि वही बात फ़िल्म के परदे पर भी नज़र आई है। 

’बंगिस्तान’ फ़िल्म के बारे में कुछ बताइए?


’बंगिस्तान’ का दृश्य
करण अंशुमन निर्देशित यह पहली फ़िल्म है, जो एक व्यंगात्मक फ़िल्म है दो स्खलित उग्रवादियों के जीवन पर आधारित। बंगिस्तान के दो प्रान्तों से आए हुए दो युवकों की यह कहानी है। रीतेश द्वारा अभिनीत चरित्र उत्तर बंगिस्तान से आता है, जो एक मुसलमान है और मैंने प्रवीण चतुर्वेदी का चरित्र निभाया है जो आता है दक्षिण बंगिस्तान से। हम दोनों अपने अपने विचारों और उसूलों के पक्के हैं और इसी बात का हम दोनों के अपने-अपने कट्टरपंथी उग्रवादी दल फ़ायदा उठाते हैं। 

पुलकित, भले आपको फ़िल्मों में अब तक बहुत बड़ी सफलता नहीं मिली है, पर एक बात जो सराहनीय है, वह यह कि आपने हर फ़िल्म में एक नई भूमिका अदा की है जिसे लोगों ने पसन्द किया है। 

जी शुक्रिया!


’भाई’ के नक्श-ए-क़दम पर चल रहे हैं पुलकित
अब बात करते हैं आपके आने वाली फ़िल्म ’सनम रे’ के बारे में, जिसका फ़र्स्ट लूक रीलीज़ हो चुका है। इसमें पहली बार आपने कमीज़ उतार कर अपनी बॉडी दिखाई है। मीडिया में यह चर्चा है कि आप अगले सलमान ख़ान के रूप में उभर कर सामने आने वाले हैं। क्या ख़याल है आपका इस बारे में?

सनम रे’ के लिए मैंने अपनी बॉडी को बहुत मेहनत से तैयार किया है। इसके पीछे भाई का इन्स्पिरेशन तो है ही। लेकिन भाई के साथ मेरा नाम जोड़ना ठीक नहीं। उनकी कोई बराबरी नही कर सकता।

फिर भी आपका जो लूक इस फ़िल्म के लिए दिया गया है, उसे देख कर सलमान ख़ान के शुरुआती दिनों की याद आ जाती है।

यह सुन कर बहुत अच्छा लगा, वैसे यह आपकी बस एक ख़ूबसूरत ग़लतफ़हमी है।


'सनम रे’ का दृश्य
इस सीन में आप एक लेक में नाव के उपर खड़े दिखते हैं। कहाँ फ़िल्माया गया है यह सीन?

यह लदाख का वही पैंगॉंग् लेक है जहाँ ’3 Idiots' फ़िल्म में करीना कपूर ने आमिर ख़ान को चूमा था। इस सीन को जब हम शूट कर रहे थे तो तापमान शून्य से नीचे था, इस कड़ाके की ठंड में बिना कमीज़ पहने इस सीन को हमने शूट किया।

’सनम रे’ दिव्या खोसला कुमार की फ़िल्म है। उनकी पहली फ़िल्म ’यारियाँ’ ने बॉक्स ऑफ़िस पर कमाल किया था, कैसी उमीदें हैं आपकी इस फ़िल्म से?

दिव्या ने जिस तरह से अपनी पहली फ़िल्म को ट्रीट किया था, मुझे वह बहुत पसन्द आया। 2014 की एक बहुत बड़ी हिट फ़िल्म थी ’यारियाँ’। मुझे बहुत ज़्यादा ख़ुशी है कि इस प्रेम-कहानी ’सनम रे’ का मैं हिस्सा हूँ, और यह मेरी पहली मच्योर लव-स्टोरी जौनर की फ़िल्म है। मेरी नायिका इस फ़िल्म में यामी गौतम हैं जो एक अच्छी अभिनेत्री हैं, और मैं उम्मीद करता हूँ कि हमारी जोड़ी कामयाब रहेगी और दर्शकों को हमारी जोड़ी पसन्द आएगी। बहुत ज़्यादा उम्मीदें हैं इस फ़िल्म से। अगले साल वलेन्टाइन डे पर यह फ़िल्म रिलीज़ होने जा रही है।

और कौन कौन सी फ़िल्में आपकी आने वाली है अगले साल?

’सनम रे’ के अलावा तीन और फ़िल्में हैं - ’जुनूनियत’, ’बादशाहो’, और ’थ्री स्टोरीज़’। इसमें ’बादशाहो’ मिलन लुथरिया की निर्देशित फ़िल्म है, भूषण कुमार निर्मित फ़िल्म है, जिसमें अजय देवगन साहब का लीड रोल है। ’जुनूनियत’ भी भूषण साहब की ही फ़िल्म है और उसमें भी यामी गौतम मेरी हीरोइन है।

फ़िल्मों के अलावा ख़ाली समय में क्या करना पसन्द करते हैं? आपके शौक़ क्या-क्या हैं?

जादू (मैजिक) और अभिनय, ये दो मेरे पैशन रहे हैं। मुझे जादू, माया, उत्तोलन, मस्तिष्क-पठन, और ताश के खेल में हाथ की सफ़ाई दिखाना बहुत अच्छा लगता है। एक समय था जब मैं अपने मोहल्ले में मैजिक शो दिखाना चाहता था। बचपन से ही मुझे जादू में दिलचस्पी है। दिल्ली के दिवाली के मेलों में घूम घूम कर तरह तरह की किताबें खोजता रहता था जादू वाले। यहाँ तक कि देश-विदेश के जादूगरों को ख़त भी लिखता था उनकी किताबों को पढ़ने के बाद। मुझे बहुत उत्तेजक लगता है जादू, और मैं यह चाहता हूँ कि एक दिन मैं ज़रूर अपनी जादूई दुनिया में वापस जा सकूँगा।

वाह! बहुत ख़ूब! अच्छा खाने में क्या पसन्द करते हैं?

वैसे तो सबकुछ खाता है, वेज और नॉन-वेज। घर का बना खाना प्रेफ़र करता हूँ। राजमा-चावल मुझे ख़ास पसन्द है।

पुलकित, आपने इतना समय हमें दिया, इतनी सारी बातें की, आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आपकी आने वाली फ़िल्म ’सनम रे’ सफल हो, आप शोहरत की बुलन्दियों को छुयें, यह कामना हम करते हैं। एक बार फिर, बहुत बहुत शुक्रिया और शुभकामनाएँ!

आपका बहुत बहुत शुक्रिया!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

उषा छाबड़ा की लघुकथा बचपन का भोलापन

रेडियो प्लेबैक इंडिया के साप्ताहिक स्तम्भ 'बोलती कहानियाँ' के अंतर्गत हम आपको सुनवाते हैं हिन्दी की नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में उन्हीं की हिन्दी लघुकथा "खिलखिलाहट" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं उषा छाबड़ा की एक लघुकथा "बचपन का भोलापन", उन्हीं के स्वर में।

इस लघुकथा "बचपन का भोलापन" का टेक्स्ट उनके ब्लॉग अनोखी पाठशाला पर उपलब्ध है।

उषा जी साहित्यिक अभिरुचि वाली अध्यापिका हैं। वे पिछले उन्नीस वर्षों से दिल्ली पब्लिक स्कूल ,रोहिणी में अध्यापन कार्य में संलग्न हैं। उन्होंने कक्षा नर्सरी से कक्षा आठवीं तक के स्तर के बच्चों के लिए पाठ्य पुस्तकें एवं व्याकरण की पुस्तक श्रृंखला भी लिखी हैं। वे बच्चों एवं शिक्षकों के लिए वर्कशॉप लेती रहती हैं। बच्चों को कहानियाँ सुनाना उन्हें बेहद पसंद है। उनकी कविताओं की पुस्तक "ताक धिना धिन" और उस पर आधारित ऑडियो सीडी प्रकाशित हो चुकी हैं। आप उनकी आवाज़ में पंडित सुदर्शन की कालजयी कहानी "हार की जीत" पहले ही सुन चुके हैं। कहानी "बचपन का भोलापन" दो बच्चियों के वार्तालाप पर आधारित है। इसका कुल प्रसारण समय 2 मिनट 32 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



इंसानियत की मशाल सब मिलकर उठाएं
जश्न मानवता का एक जुट हों मनाएं
चलो सब एक हो नया गीत गुनगुनाएं
प्रेम के संदेश को जन जन में फैलाएं
~ उषा छाबड़ा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी


"बच्ची रोना भूलकर उसकी ओर देखने लगी।"
(उषा छाबड़ा की "बचपन का भोलापन" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
बचपन का भोलापन MP3

#Twenty First Story, Bachpan Ka Bholpan: Usha Chhabra/Hindi Audio Book/2015/21. Voice: Usha Chhabra

रविवार, 18 अक्तूबर 2015

सरोद और अमजद अली : SWARGOSHTHI – 240 : SAROD & AMJAD ALI



स्वरगोष्ठी – 240 में आज

संगीत के शिखर पर – 1 : सरोद वादन

सरोद वादन में अप्रतिम उस्ताद अमजद अली खाँ



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही हमारी नई श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा करेंगे। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर उनके व्यक्तित्व और उनकी कृतियों को प्रस्तुत करेंगे। आज श्रृंखला की पहली कड़ी में हम अत्यन्त लोकप्रिय तंत्रवाद्य सरोद और इसके विश्वविख्यात वादक उस्ताद अमजद अली खाँ के व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा करेंगे और उनका बजाया राग श्याम कल्याण, कामोद और भैरवी की रचनाएँ सुनेगे।




संगीत रत्नाकर’ ग्रन्थ के अनुसार भारतीय संगीत के वाद्ययंत्रों को चार मुख्य वर्ग- तत्, सुषिर, अवनद्ध और घन में बांटा गया है। जिन वाद्यों में ताँत या तार से ध्वनि उत्पन्न होती है उन्हें तत् वाद्य कहा जाता है। जैसे- सितार, सरोद, गिटार, सारंगी, वायलिन आदि। आगे चल कर तत् श्रेणी के वाद्यों को वादन शैली में भिन्नता के कारण दो भागों में बाँटा जाता है। कुछ तत् वाद्ययंत्र गज या कमानी द्वारा वाद्य के तारों पर रगड़ कर बजाया जाता है। इस श्रेणी के व्वाद्ययंत्रों में सारंगी, वायलिन, इसराज, दिलरुबा, चेलो आदि आते हैं। दूसरी श्रेणी में वाद्ययंत्रों के तारों पर मिज़राब, जवा या उँगलियों से आघात करके बजाया जाता है। इस श्रेणी में वीणा, सुरबहार, सितार, सरोद, गिटार आदि वाद्य रखे गए हैं। सरोद वाद्य इसी श्रेणी का है। आधुनिक सरोद प्राचीन वाद्य ‘रबाब’ का संशोधित और विकसित रूप है। आज की ‘स्वरगोष्ठी में हम सरोद और उसके अप्रतिम साधक और वादक उस्ताद अमजद अली खाँ पर चर्चा कर रहे हैं।

विश्वविख्यात संगीतज्ञ और सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का जन्म 9 अक्टूबर, 1945 को ग्वालियर में संगीत के सेनिया बंगश घराने की छठी पीढ़ी में हुआ था। संगीत इन्हें विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नामकरण किया। अमजद अली अपने पिता हाफ़िज़ अली के सबसे छोटे पुत्र हैं। उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ने परिवार के सबसे छोटे और सर्वप्रिय सन्तान को बहुत छोटी उम्र में ही संगीत-शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। मात्र बारह वर्ष की आयु में एकल सरोद-वादन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। एक छोटे से बालक की सरोद पर अनूठी लयकारी और तंत्रकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए। उस्ताद अमजद अली खाँ और उनके सरोद पर चर्चा जारी रहेगी, आइए, उस्ताद के सरोद-वादन का एक उदाहरण सुनते हैं। उस्ताद अमजद अली खाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, कल्याण थाट का राग ‘श्याम कल्याण’। इस राग में दोनों मध्यम स्वर प्रयोग किये जाते हैं और आरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। रचना मध्यलय तीनताल में निबद्ध है।



राग श्याम कल्याण : मध्यलय तीनताल की रचन : उस्ताद अमजद अली खाँ




उस्ताद अमजद अली खाँ को बचपन में ही सरोद से ऐसा लगाव हुआ कि युवावस्था तक आते-आते एक श्रेष्ठ सरोद-वादक के रूप में पहचाने जाने लगे। उन्होने सरोद-वादन की शैली में विकास के लिए कई प्रयोग किये। उनका एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग यह है कि सरोद के तारों को उँगलियों के सिरे से बजाने के स्थान पर नाखून से बजाना। सितार की भाँति सरोद में स्वरों के पर्दे नहीं होते, इसीलिए जब उँगलियों के सिरे के स्थान पर नाखूनों से इसे बजाया जाता है तब स्वरों की स्पष्टता और मधुरता बढ़ जाती है। अब आप सरोद पर बजाया राग ‘कामोद’ सुनिए। राग कामोद कल्याण थाट और सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग में भी दोनों मध्यम स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। रात्रि के प्रथम प्रहर में इस राग का गायन-वादन सुखदायी होता है। आप उस्ताद अमजद अली खाँ का बजाया, चाँचर या दीपचन्दी ताल में निबद्ध यह रचना सुनिए।


राग कामोद : चाँचर ताल में निबद्ध रचना : उस्ताद अमजद अली खाँ




युवावस्था में ही उस्ताद अमजद अली खाँ ने सरोद-वादन में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली थी। 1971 में उन्होने द्वितीय एशियाई अन्तर्राष्ट्रीय संगीत-सम्मेलन में भाग लेकर ‘रोस्टम पुरस्कार’ प्राप्त किया था। यह सम्मेलन यूनेस्को की ओर से पेरिस में आयोजित किया गया था, जिसमें उन्होने ‘आकाशवाणी’ के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था। अमजद अली ने यह पुरस्कार मात्र 26 वर्ष की आयु में प्रपट किया था, जबकि इससे पूर्व 1969 में यही ‘रोस्टम पुरस्कार’ उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ को शहनाई-वादन के लिए प्राप्त हो चुका था। 1963 में मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्होने पहली अमेरिका यात्रा की थी। इस यात्रा में पण्डित बिरजू महाराज के नृत्य-दल की प्रस्तुति के साथ अमजद अली खाँ का सरोद-वादन भी हुआ था। इस यात्रा का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह था कि खाँ साहब के सरोद-वादन में पण्डित बिरजू महाराज ने तबला संगति की थी और खाँ साहब ने बिरजू महाराज की कथक संरचनाओं में सरोद की संगति की थी। उस्ताद अमजद अली खाँ ने देश-विदेश के अनेक महत्त्वपूर्ण संगीत केन्द्रों में प्रदर्शन कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है। इनमें कुछ प्रमुख हैं- रायल अल्बर्ट हाल, रायल फेस्टिवल हाल, केनेडी सेंटर, हाउस ऑफ कामन्स, फ़्रंकफ़र्ट का मोजर्ट हाल, शिकागो सिंफनी सेंटर, आस्ट्रेलिया के सेंट जेम्स पैलेस और ओपेरा हाउस आदि। खाँ साहब अनेकानेक पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किये जा चुके हैं। इनमें कुछ प्रमुख सम्मान हैं- भारत सरकार द्वारा प्रदत्त ‘पद्मश्री’ और ‘पद्मभूषण’ सम्मान, संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान, यूनेस्को पुरस्कार, यूनिसेफ का राष्ट्रीय राजदूत सम्मान आदि। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ के दो पुत्र, अमान और अयान सहित देश-विदेश के अनेक शिष्य सरोद वादन की पताका फहरा रहे हैं। अब हम उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा सरोद पर प्रस्तुत राग ‘भैरवी’ में एक दादरा सुनवाते हैं। आप यह दादरा सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : दादरा में रचना : उस्ताद अमजद अली खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय संगीत की एक मशहूर गायिका द्वारा प्रस्तुत कण्ठ-संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग में निबद्ध है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 24 अक्टूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 242वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 238 की संगीत पहेली में हमने 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ से मदन मोहन का संगीतबद्ध एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ललित, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मन्ना डे और लता मंगेशकर। 

इस बार की पहेली में करवार, कर्नाटक से सुधीर हेगड़े, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 



मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 




शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

"एक राधा एक मीरा..." - इसी गीत के दम पर लिखी गई थी ’राम तेरी गंगा मैली’ की कहानी


एक गीत सौ कहानियाँ - 68
 

'एक राधा एक मीरा...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 68-वीं कड़ी में आज श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं आशा फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार, संगीतकार व गायक रवीन्द्र जैन को जिनका 9 अक्टुबर 2015 को निधन हो गया। गीत है लता मंगेशकर का गाया फ़िल्म ’राम तेरी गंगा मैली’ का, "एक राधा एक मीरा, दोनो ने श्याम को चाहा..."। रवीन्द्र जैन के जितने सुन्दर बोल हैं इस गीत में, उतना ही सुरीला है उनका इस गीत का संगीत।



"तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले, संग गा ले, तो ज़िन्दगी हो जाए सफल", कुछ ऐसा कहा था रवीन्द्र जैन ने फ़िल्म ’चितचोर’ के एक गीत में। ज़िन्दगी, जिसने रवीन्द्र जैन के साथ एक बहुत ही अफ़सोस-जनक मज़ाक किया उनसे उनकी आँखों की रोशनी छीन कर, उसी ज़िन्दगी को जैन साहब ने एक चुनौती की तरह लिया और अपनी ज़िन्दगी को सफल बना कर दिखाया। ज़िन्दगी ने तो उनसे एक बहुत बड़ी चीज़ छीन ली, पर उन्होंने इस दुनिया को अपने अमर गीत-संगीत के माध्यम से बहुत कुछ दिया। रवीन्द्र जैन जैसे महान कलाकार और साधक शारीरिक रूप से भले इस संसार को छोड़ कर चले जाएँ, पर उनकी कला, उनका काम हमेशा अमर रहता है, आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाता है। रवीन्द्र जैन के लिखे गीतों की विशेषता यह रही कि उनमें कभी किसी तरह का सस्तापन या चल्ताउ क़िस्म के बोल नज़र नहीं आए। चाहे फ़िल्म चले ना चले, चाहे गीत चले ना चले, उन्होंने कभी अपने गीतों के स्तर और अर्थपूर्णता के साथ समझौता नहीं किया। यूं तो मीराबाई के अपने लिखे भजनों की कमी नहीं है, और ना ही राधा-कृष्ण के उपर बनने वाले गीतों की संख्या कुछ कम है, पर हमारे प्यारे दादु ने ऐसे दो गीत लिख कर हमें दिए जिनमें मीराबाई और राधा के कृष्ण-प्रेम में जो अन्तर है उन्हें उजागर किया बड़े ही सुन्दर शब्दों में। ये दोनों गीत इतने लोकप्रिय हुए कि चाहे कितनी ही बार क्यों न इन्हें सुन ले, इनकी ताज़गी वहीं की वहीं बरकरार है। इनमें पहला गीत है फ़िल्म ’गीत गाता चल’ का "श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम, लोग करे मीरा को यूंही बदनाम", और दूसरा गीत है "एक राधा एक मीरा, दोनों ने श्याम को चाहा, अन्तर क्या दोनों की प्रीत में बोलो, एक प्रेम दीवानी, एक दरस दीवानी..."।


जिस दिन रवीन्द्र जैन के बेटे का जन्म हुआ था, उसी दिन उन्हें राज कपूर से यह ख़ुशख़बरी मिली थी कि जैन साहब को 'राम तेरी गंगा मैली' के लिए गीतकार-संगीतकार चुन लिया गया है। आगे रवीन्द्र जैन साहब की ज़ुबानी पढ़िए - "राज साहब को एक दिन ऐसे ही मैंने कह दिया था कि राज साहब, एक दिन में दो अच्छी ख़बरें मिलना तो मुश्किल है, तो 'राम तेरी गंगा मैली' मिल गई, सबसे बड़ी ख़बर है, उनके मन में यह बात कैसे बैठ गई थी, उन्होंने मुझे बुलाया और शिरडी ले गए, शिरडी ले जाके कृष्णा भाभी को उन्होंने फ़ोन किया था, तब मुझे पता चला कि मेरे लिए वो बेटा माँगने आए थे। राज साहब को जो पसंद आ गया न, या उनके मेण्टल लेवेल पे जो फ़िट बैठ गया न, उनको लगता था कि मेरा काम होनेवाला है। उसका बड़ा पर्सोनल केयर करते थे और हर तरह से ख़ुश रखते थे और 'he knew how to take out the work', और कैसे डील करना है अपने कम्पोज़र से, अपने नए आर्टिस्ट्स से, किस तरह 'best of their capability' काम कराना है, वो बहुत अच्छी तरह जानते थे। एक बार, हमारे कॉमन फ़्रेण्ड थे टी. पी. झुनझुनवाला साहब, वो इन्कम टैक्स कमिशनर थे, मुंबई में भी थे, लेकिन बेसिकली दिल्ली में रहते थे। तो वहाँ उनकी बिटिया की शादी थी। तो जैसे शादियों में संगीत की महफ़िल होती है, मैं भी गया था, मैं, हेमलता, दिव्या (रवीन्द्र जैन की पत्नी), टी.पी. भाईसाहब, हम सब लोग वहाँ पे थे। टी.पी. साहब ने ज़िक्र किया कि दादु, राज साहब को गाना सुनाओ। यह गीत मैंने 'जीवन' फ़िल्म के लिए लिखा था, 'राजश्री' वालों के लिए। दो ऐसे गीत हैं जो दूसरी फ़िल्म में आ गए, उसमें से एक है 'अखियों के झरोखों से' का टाइटल सॉंग, सिप्पी साहब के लिए लिखा था जो 'घर' फ़िल्म बना रहे थे, लेकिन वो कुछ ऐसी बात हो गई कि उनके डिरेक्टर को पसन्द नहीं आया, उनको गाना ठंडा लगा। तो मैंने राज बाबू को सुना दिया तो उन्होंने यह टाइटल रख लिया। फिर सिप्पी साहब ने वही गाना माँगा मुझसे, मैंने कहा कि अब तो मैंने गाना दे दिया किसी को। बाद में ज़रा वो नाख़ुश भी हो गए थे। तो यह गाना 'जीवन' फ़िल्म के लिए, प्रशान्त नन्दा जी डिरेक्ट करने वाले थे, उसके लिए "एक राधा एक मीरा" लिखा था मैंने। तो राज साहब वहाँ बैठे थे। तो यह गाना जब सुनाया तो राज साहब ने दिव्या से पूछा कि यह गीत किसी को दिया तो नहीं? मैंने कहा कि नहीं, दिया तो नहीं! राज साहब तीन दिन थे और तीनो दिन वो मुझसे यह गाना सुनते रहे। और टी.पी. भाईसाहब से सवा रुपय लिया और मुझे देकर कहा कि आज से यह गाना मेरा हो गया, मुझे दे दो। अब राज साहब को यह कौन पूछे कि इसका क्या करेंगे, न कोई कहानी है, न कोई बात। तो वहीं उन्होंने यह गीत तय कर लिया, फिर मुझे बम्बई बुलाया, कुछ गानें सुने, 'and he gave me a token of Rs 5000' कि तुम आज से RK के म्युज़िक डिरेक्टर हो गए।"

इस तरह से "एक राधा एक मीरा" वह गीत था जिसकी बदौलत राज कपूर ने रवीन्द्र जैन को RK Camp में एन्ट्री दी, और यही नहीं इसी गीत को ही आधार बनाकर 'राम तेरी गंगा मैली' की कहानी भी लिखी गई। कितनी मज़ेदार व आश्चर्य कर देने वाली बात है कि राज कपूर को एक गीत इतना अच्छा लगा कि गीत के भाव को लेकर पूरी की पूरी फ़िल्म बना डाली! और इस गीत के तो वाकई क्या कहने। राधा और मीरा के श्रीकृष्ण प्रेम में अन्तर को शायद इससे सुन्दर अभिव्यक्ति नहीं मिल सकती। रवीन्द्र जैन ने जिस काव्यात्मक तरीके से इस अन्तर को व्यक्त किया है, इस गीत के लिए दादु को शत शत नमन।


एक राधा एक मीरा,
दोनों ने श्याम को चाहा,
अन्तर क्या दोनों की चाह में बोलो,
एक प्रेम दीवानी, एक दरस दीवानी।

राधा ने मधुबन में ढूंढा,
मीरा ने मन में पाया,
राधा जिसे खो बैठी वो गोविन्द
मीरा हाथ बिकाया,
एक मुरली एक पायल
एक पगली एक घायल
अन्तर क्या दोनों की प्रीत में बोलो,
एक सूरत लुभानी, एक मूरत लुभानी।

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर,
राधा के मनमोहन,
राधा नित शृंगार करे,
और मीरा बन गई जोगन,
एक रानी एक दासी
दोनों हरि प्रेम की प्यासी,
अन्तर क्या दोनों की तृप्ति में बोलो,
एक जीत न मानी, एक हार न मानी।

तो आइए सुनते हैं राग किरवानी पर आधारित यह गीत :- 


फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' : "एक राधा एक मीरा...' : लता मंगेशकर : रवीन्द्र जैन 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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