रविवार, 30 अगस्त 2015

स्वरगोष्ठी - 234





स्वरगोष्ठी - 234

कुछ अपरिहार्य कारणवश ‘स्वरगोष्ठी 234’ का आज का अंक हम प्रकाशित / प्रसारित नहीं कर पा रहे हैं। इस व्यवधान के लिए हमे खेद है। ‘स्वरगोष्ठी’ का यह अंक अगले रविवार, 6 सितम्बर, 2014 को प्रातः 9 बजे यथासमय प्रकाशित / प्रसारित होगा। सभी संगीत-प्रेमी इस स्तम्भ के प्रति अपना स्नेह बनाए रखें।

सम्पादक



शनिवार, 29 अगस्त 2015

चित्रशाला - 03 : फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ

चित्रशाला - 03

फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। आज रक्षाबंधन है, इस पावन अवसर पर हम अपने सभी पाठकों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। दोस्तों, हिन्दी सिने संगीत जगत में कई भाई-बहन की जोड़ियों ने काम किया है। आज रक्षाबंधन के अवसर पर आइए ’चित्रशाला’ के ज़रिए याद करें कुछ ऐसे भाई-बहनों को जिन्होंने फ़िल्म संगीत को समृद्ध किया है।




क ही परिवार के दो भाई या दो बहनों के फ़िल्म संगीत जगत में काम करने के उदाहरण तो हमें बहुत से मिल जायेंगे, पर एक ही परिवार से एक भाई और एक बहन की जोड़ियों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। फ़िल्म संगीत के शुरुआती दौर की तरफ़ चलें तो सबसे पहले जिस भाई-बहन की जोड़ी हमें याद आती है, वह है सुनहरे दौर के फ़िल्म संगीतकारों में भीष्म-पितामह की हैसियत रखने वाले संगीतकार अनिल बिस्वास और फ़िल्म संगीत की प्रथम पार्श्वगायिका पारुल घोष की जोड़ी। पारुल घोष अनिल दा से दो वर्ष छोटी थीं। भाई बहन दोनों में संगीत के बीज बोये उनकी माँ ने जिन्हें संगीत से बहुत लगाव था। पारुल का विवाह अनिल दा के मित्र और बांसुरी नवाज़ पंडित पन्नालाल घोष से सम्पन्न हुआ और संगीत की धारा बहती चली गई। भाई ने अपनी बहन को अपने द्वारा स्वरबद्ध किए हुए बहुत से गीत गवाए, जिनमें पारुल घोष का सबसे हिट गीत "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" भी शामिल है।

अनिल बिस्वास - पारुल घोष के बाद जिस जोड़ी का ज़िक्र हमारे ज़हन में आता है, वह है पार्श्वगायिका गीता दत्त और कमचर्चित संगीतकार मुकुल रॉय की। मुकुल रॉय जो आजकल महाराष्ट्र के नासिक में रहते हैं, उन्होंने अपनी बहन गीता दत्त की जीवनी "Geeta Dutt - The Skylark" को प्रकाशित करने में लेखिका हेमन्ती बनर्जी की बहुत सहायता की है। मुकुल रॉय अपनी बहन की तरह कामयाब तो नहीं हुए, पर ’सैलाब’, ’डीटेक्टिव’ और ’भेद’ जैसी फ़िल्मों में उनके स्वरबद्ध गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे। गीता दत्त की आवाज़ में ’डीटेक्टिव’ का "मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया" और ’सैलाब’ का "है यह दुनिया कौन सी ऐ दिल" गली गली गूंजा करता था। मुकुल अपनी बहन के बहुत करीब थे और गीता दत्त की ज़िन्दगी में जब निराशा और हताशा ने घर कर लिया था, तब मुकुल ही थे जिन्होंने उनका हमेशा साथ दिया। गुरु दत्त और गीता दत्त की असामयिक मृत्यु के बाद इनकी संतानों - तरुण और अरुण - को मुकुल रॉय ने ही बड़ा किया। एक भाई का अपनी बहन के प्रति निस्वार्थ प्रेम का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है भला!

एक ऐसा परिवार जिसने फ़िल्म संगीत जगत को शायद सर्वाधिक योगदान दिया है, वह है मंगेशकर परिवार। चार बहनों और एक भाई ने मिल कर संगीत का ऐसा ताना-बाना बुना है कि फ़िल्म संगीत का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, उसके कम से कम आधे हिस्से में इस परिवार के किसी ना किसी का उल्लेख रहेगा। मंगेशकर परिवार के बारे में नई बात बताने को अब कुछ बाक़ी नहीं बचा है। लता, मीना, आशा, उषा और हृदयनाथ - चार बहनें और एक भाई - स्वाभाविक है कि इन चारों दीदी से हृदयनाथ को अपार प्यार मिला। हालाँकि हृदयनाथ हिन्दी फ़िल्म जगत में ज़्यादा काम नहीं कर सके, पर मराठी और ग़ैर फ़िल्म-संगीत में उनका योगदान उल्लेखनीय है। लता, आशा और उषा ने उनके बहुत सी सुन्दर रचनाओं को कंठ दिया है। मंगेशकर परिवार में भाई-बहन का रिश्ता अगली पीढ़ी में भी जारी रहा। आशा की संताने - हेमन्त और वर्षा - जब संगीतकार और गायिका बनीं तब आशा की ख़ुशियों का ठिकाना न रहा। आशा के शब्दों में, "कोई भी क्षण ज़िन्दगी के ऐसे होते हैं जो भुलाये नहीं जा सकते, बड़े मज़ेदार होते हैं। मेरा लड़का हेमन्त, आप समझते होंगे माँ के लिए बेटा क्या चीज़ होता है, एक दिन वो म्युज़िक डिरेक्टर बन गया और मेरे पास आकर कहने लगा कि यह मेरा गाना है, तुम गाओ। कैसा लगता है ना? जो कल तक इतना सा था, आज वो मुझसे कह रहा है कि मेरा गाना गाओ। फिर उसने अपनी बहन, मेरी बेटी वर्षा से कहने लगा कि तुम्हे भी गाना पड़ेगा। वर्षा बहुत शर्मिली है, उसने कहा कि बड़ी मासी इतना अच्छा गाती है, माँ इतना अच्छा गाती है, मैं नहीं गाऊँगी। लेकिन हेमन्त ने बहुत समझाया और उसका पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। मैं स्टुडियो पहुँची तो देखा कि लड़की माइक के सामने खड़ी है और उसका भाई वन-टू बोल रहा है। यह क्षण मैं कभी नहीं भूल सकती। और वह गाना था फ़िल्म ’जादू-टोना’ का "यह गाँव प्यारा-प्यारा..."।" अफ़सोस की बात है कि हेमन्त और वर्षा, दोनों में से किसी को भी सफलता नहीं मिली, और वर्षा ने तो हाल ही में आत्महत्या भी कर ली।

भाई-बहन का रिश्ता हमेशा ख़ून का ही रिश्ता हो यह ज़रूरी नहीं। लता मंगेशकर का मदन मोहन के साथ सगे भाई जैसा ही रिश्ता था। इस रिश्ते की शुरुआत और पहली बार राखी बंधवाने का क़िस्सा लता के शब्दों में कुछ यूं है - "मैं पहली बार मदन भ‍इया से उनका स्वरबद्ध कोई गीत गाने के लिए नहीं बल्कि उनके साथ एक डुएट गीत गाने के लिए मिली थी। मास्टर ग़ुलाम हैदर ने हम दोनो को फ़िल्म ’शहीद’ में एक भाई-बहन के रिश्ते के गीत को गाने के लिए बुलाया था जिसके बोल थे "पिंजरे में बुलबुल बोले मेरा छोटा सा दिल डोले..."। गीत के बाद हम दोनों ने एक दूसरे की तारीफ़ की और तुरन्त हमारे बीच एक जुड़ाव सा हो गया। उन्होंने मुझसे यह वादा लिया कि जब भी वो संगीतकार बनेंगे तो उनकी पहली फ़िल्म में मुझे गाना पड़ेगा। मैंने वादा किया। पर किसी कारण से मैं उनकी पहली फ़िल्म ’आँखें’ में नहीं गा सकी और हमारे मीठे रिश्ते में एक खटास आई। मदन भ‍इया का दिल टूट गया। पर कुछ ही दिनों में मदन भ‍इया हमारे घर आए और कहा कि हमारा रिश्ता भाई-बहन के एक प्यार भरे गीत से शुरु हुआ था, आज रक्षाबंधन है, मेरी कलाई पर यह राखी बाँधो और वादा करो कि हम हमेशा भाई-बहन रहेंगे और तुम हमेशा मेरे लिए गाओगी। उन्हें राखी बाँधते हुए मेरी आँखों से आँसू टपकने लगी।"

संगीत के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण परिवार रहा है पंडित जसराज जी का। सुलक्षणा, विजेता, जतिन और ललित उन्हीं के भतीजी/भतीजे हैं। जब जतिन और ललित फ़िल्म जगत में आए तब तक सुलक्षणा फ़िल्मों से संयास ले चुकी थीं। इसलिए सुलक्षणा द्वारा जतिन-ललित के किसी गीत के गाने की जानकारी नहीं है। छोटी बहन विजेता ने ज़रूर जतिन-ललित के निर्देशन में कुछ गीत गाई हैं जिनमें "जवाँ हो यारों यह तुमको हुआ क्या" (जो जीता वही सिकन्दर) और "सच्ची यह कहानी है" (कभी हाँ कभी ना) चर्चित रहे। मंगेशकर और पंडित परिवार के बाद अब ज़िक्र शिवराम परिवार का। संगीतकार पंडित शिवराम कृष्ण का नाम आज लोग लगभग भुला चुके हैं पर चार पीढ़ियों से उनका परिवार संगीत की सेवा में निरन्तर लगा हुआ है। संगीतकार जोड़ी जुगल किशोर और तिलक राज उन्हीं के बेटे हैं जिन्होंने ’भीगी पलकें’, ’समय की धारा’ आदि फ़िल्मों में संगीत दिया है। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ को दिए एक साक्षात्कार में जुगल किशोर जी ने अपने परिवार के बारे में बताते हुए अपनी बहनों का भी उल्लेख किया था कुछ इस तरह - "तिलक राज तो मेरा ही छोटा भाई है। बचपन से ही हम दोनों साथ में संगीत की चर्चा भी करते थे और साथ ही में बजाते भी थे। अपने स्कूल के वार्षिक दिवस के कार्यक्रम के लिए दोनों साथ में मिल कर नए गाने कम्पोज़ करते थे और स्टेज पर साथ में गाते थे। हमने अपना ऑरकेस्ट्रा भी बनाया था 'जयश्री ऑरकेस्ट्रा' के नाम से। जयश्री मेरी छोटी बहन है। आपने जयश्री शिवराम का नाम सुना होगा जो एक प्लेबैक सिंगर रही है। 'रामा ओ रामा' फ़िल्म का शीर्षक गीत उसी ने ही गाया था। हम लोग आठ भाई बहने हैं और सभी के सभी फ़िल्म इंडट्री से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। मैं वायलिनिस्ट, कम्पोज़र और सिंगर, तिलक राज कम्पोज़र और सिंगर, मुकेश शिवराम एक सिंगर है, भगवान शिवराम एक रिदम प्लेअर, पूर्णिमा परिहार एक सिंगर, नवीन शिवराम एक कीबोर्ड प्लेअर, तथा जयश्री शिवराम व निशा चौहान सिंगर्स। इस तरह से तीन पीढ़ियों से हमारा परिवार संगीत की सेवा में लगा हुआ है।" अपनी बहन के नाम पर ऑरकेस्ट्रा रखने वाले जुगल किशोर और तिलक राज ने अपनी बहन जयश्री को फ़िल्म ’समय की धारा’ और ’तेरे बिना क्या जीना’ में गीत गवाया था। मशहूर संगीतकार बप्पी लाहिड़ी ने बरसों पहले अपनी बेटी रीमा को लौन्च किया था, और अब हाल में उनके बेटे बप्पा ने भी फ़िल्म जगत में क़दम रख दिया है। नए-नए संगीतकार बने बप्पा लाहिड़ी ने बहन रीमा को अपनी पहली फ़िल्म ’जय वीरू’ में हार्ड कौर के साथ एक गीत गवाया है "ऐसा लश्कारा..."। 

अब तक जितने भी भाई-बहन जोड़ियों की हमने बातें की, उन सब में भाई संगीतकार और बहन गायिका हैं। अब ज़िक्र करते हैं उन भाई-बहन जोड़ियों की जिनमें भाई और बहन दोनो ही गायक/गायिका हैं। पहली जोड़ी है नाज़िया हसन और ज़ोहेब हसन की। नाज़िया और ज़ोहेब, दोनों का बचपन कराची और लंदन में बीता। 70 के दशक के अन्त में दोनो ने साथ मिल कर "संग संग चलें" और "कलियों का मेला" जैसे लोकप्रिय म्युज़िकल शोज़ में गाया। 1976 में दोनो नज़र आये Beyond the Last Mountain फ़िल्म के एक गीत में। नाज़िया हसन की पहली और बेहद कामयाब ऐल्बम ’डिस्को दीवाने’ में ज़ोहेब की भी आवाज़ शामिल थी। इसके बाद ’बूम बूम’ ऐल्बम भी ख़ूब चला, जिसके गाने ’स्टार’ फ़िल्म में लिया गया। बप्पी लाहिड़ी ने नाज़िया और ज़ेहेब से फ़िल्म ’शीला’ में गीत गवाये। नाज़िय को जितनी लोकप्रियता हासिल हुई, भाई ज़ोहेब को उतनी कामयाबी नहीं मिली। अफ़सोस की बात है कि मात्र 35 वर्ष की आयु में नाज़िया हसन इस दुनिया से चल बसीं और भाई-बहन की यह जोड़ी टूट गई। सरहद के इस पार इसी तरह की एक जोड़ी रही है शान और सागरिका की। पार्श्व गायन के क्षेत्र में क़दम जमाने से पहले संगीतकार मानस मुखर्जी के बेटे शान ने अपनी बड़ी बहन सागरिका के साथ मैगनासाउण्ड कंपनी के साथ एक अनुबन्ध किया और कई ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम्स में गाये जिनमें ’नौजवान’ और ’Q – Funk’ ख़ास चर्चित रहे। जिस तरह से बिद्दु ने नाज़िया और ज़ोहेब की जोड़ी को काफ़ी काम दिये, वैसे ही शान और सागरिका से भी बहुत से गीत और रीमिक्स गवाये। शान-सागरिका की जोड़ी भी बहुत ज़्यादा नहीं चल सकी क्योंकि शान पार्श्वगायन में व्यस्त हो गए और सागरिका का भी अपना अलग स्टाइल था। पर भाई-बहन के आपसी रिश्ते में कभी दरार नहीं आई। मशहूर पार्श्वगायिका अलका याज्ञनिक ने अपने भाई समीर याज्ञनिक के साथ मिल कर एक प्राइवेट ऐल्बम ’दिल था यहाँ अभी’ में गीत गाए। अपने भाई को बढ़ावा मिल सके इसी उद्देश्य से अलका ने यह ऐल्बम की जिसके गीत पसन्द तो बहुत किए गए पर समीर के करीयर को सँवारने में यह ऐल्बम असफल रही।

इस तरह से हर दशक में भाई-बहन की जोड़ियाँ हिन्दी फ़िल्म-संगीत जगत में आती रही हैं और शायद आगे भी आती रहेंगी, और यह परम्परा यूं ही चलती रहेगी। रक्षाबन्धन के शुभवसर पर आप सभी को एक बार फिर से बहुत सारी शुभकामनाएँ!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिए। आपके सुझावों के आधार पर हम अपने कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। आप हमें radioplaybackindia@live.com के पते पर अपने सुझाव, समालोचना और फरमाइशें भेज सकते हैं।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी


मंगलवार, 25 अगस्त 2015

मुसीबत मोल ली मैंने - मोनिका गुप्ता

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने मोनिका गुप्ता के स्वर में उन्हीं की लघुकथा "लव यू" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में मोनिका गुप्ता लिखित व्यंग्य मुसीबत मोल ली मैंने, उन्हीं के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं।

इस व्यंग्य मुसीबत मोल ली मैंने का कुल प्रसारण समय 3 मिनट है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

हरियाणा निवासी, साहित्यकार और रेडियो व्यक्तित्व मोनिका गुप्ता के लेख जाने माने राष्ट्रीय समाचार पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन कार्यक्रमों के अलावा इन्होनें जिंगल्स और वाईस ओवर भी किए हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी से बाल साहित्य पुरस्कार मिल चुका है। अभी तक सात किताबे प्रकाशित हुई हैं जिसमें से दो नेशनल बुक ट्र्स्ट से हैं। लेखन और वाचन के साथ साथ कार्टूनों के माध्यम से भी अपने विचार व्यक्त कर रही है।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"आज स्कूल बस भी तो नहीं आएगी, बच्चों को स्कूल भी छोडना है।”
 (मोनिका गुप्ता के व्यंग्य "मुसीबत मोल ली मैंने" से एक अंश)


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मुसीबत मोल ली मैंने MP3

#Thirteenth Story, Musibat Mol Li Maine; Monica Gupta; Hindi Audio Book/2015/13. Voice: Monica Gupta

रविवार, 23 अगस्त 2015

राग आसावरी और तोडी : SWARGOSHTHI – 233 : RAG ASAVARI & TODI




स्वरगोष्ठी – 233 में आज

रागों का समय प्रबन्धन – 2 : दिन के दूसरे प्रहर के राग

‘ए री मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दरद न जाने कोय...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारे नई श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हम आपसे दिन के द्वितीय प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग आसावरी की एक बन्दिश सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग तोड़ी पर आधारित, फिल्म ‘मीरा’ का एक गीत वाणी जयराम की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।

 
भारतीय संगीत की एक प्रमुख विशेषता यह है कि प्रत्येक राग के गाने-बजाने का एक निश्चित समय माना गया है। शास्त्रकारों ने विभिन्न स्वर-समूहों से उपजने वाले भावों, अपने अनुभव, और मनोवैज्ञानिक आधार पर विभिन्न रागों के प्रयोग का समय निर्धारित किया है। राग के समय निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त बनाए गए है। इस समय-चक्र सिद्धान्त के अनुसार ही रागों का गायन-वादन किया जाता है। कुछ राग इस सिद्धान्त के अपवाद भी हैं तो कुछ राग सार्वकालिक भी हैं। इसी प्रकार कुछ राग सन्धिप्रकाश बेला में ही गाये-बजाए जाते हैं तो कुछ राग केवल ऋतु विशेष पर ही भले लगते हैं। समय के अनुसार रागों को दिन और रात के कुल आठ प्रहरों में बाँटे गए हैं। पिछले अंक में हमने दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा की थी और आपको सुबह के दो राग, भैरव और बिलावल का रसास्वादन कराया था। आज हम आपको दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे। दिन का दूसरा प्रहर प्रातः 9 से मध्याह्न 12 बजे तक माना जाता है।

शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग इस सिद्धान्त के अपवाद भी होते हैं, जैसे- बसन्त, तोड़ी, भीमपलासी, देस आदि। दिन के दूसरे प्रहार का एक अत्यन्त लोकप्रिय राग आसावरी है। इस राग में तीन कोमल स्वर, गान्धार, धैवत और निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग आसावरी में शुद्ध मध्यम स्वर की उपस्थिति होने से अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार यह राग मध्याह्न 12 बजे से पूर्व गाया-बजाया जा सकता है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया राग आसावरी प्रस्तुत करते हैं। तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश में आपको पण्डित बलवन्त राव भट्ट के कण्ठ–स्वर और विदुषी एन. राजम् की वायलिन संगति का आनन्द भी मिलेगा।


राग आसावरी : ‘सजन घर लागे...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर




राग आसावरी के अलावा दिन के दूसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- कोमल देसी, खट, गानधारी, गारा, गौड़ सारंग, जौनपुरी, देव गान्धार, देसी, बरवा, बिलासखानी तोड़ी, गुर्जरी तोड़ी, तोड़ी, मध्यमात सारंग, मियाँ की सारंग, शुद्ध सारंग, सामन्त सारंग, वृन्दावनी सारंग, सुघराई आदि। आज के अंक में दूसरे प्रहर के रागों में से हमने राग तोड़ी का चयन इसलिए किया है कि इस राग में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग होता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार तीव्र मध्यम स्वर वाले राग मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 के बीच प्रयोग किये जाने चाहिए। परन्तु यह राग इस सिद्धान्त का अपवाद है। राग तोड़ी में तीन कोमल स्वरों- ऋषभ, गान्धार, और धैवत की उपस्थिति के कारण दिन के दूसरे प्रहर मे गाने-बजाने कि परम्परा है। राग तोड़ी सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में मध्यम स्वर तीव्र तथा ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होते हैं। अन्य सभी स्वर शुद्ध लगते हैं। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह तोड़ी थाट का आश्रय राग है। राग तोड़ी की झलक पाने के लिए अब हम आपको फिल्म ‘मीरा’ से मीराबाई का एक भक्तिपद सुनवा रहे हैं।

मीराबाई का जन्म 1498ई. में माना जाता है। मीरा राजस्थान के मेड़ता राज परिवार की राजकुमारी थीं। सात वर्ष की आयु में एक महात्मा ने उन्हें श्रीकृष्ण की एक मूर्ति दी। कृष्ण के उस स्वरूप पर वे इतनी मुग्ध हो गईं कि उन्हें अपना आराध्य और पति मान लिया। 1516ई. में मीरा का विवाह चित्तौड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। परन्तु कृष्णभक्ति के प्रति समर्पित रहने और साधु-संतों के बीच समय व्यतीत करने के कारण उनका गृहस्थ जीवन कभी भी सफल नहीं रहा। मीरा वैष्णव भक्तिधारा की प्रमुख कवयित्री मानी जाती है। उनके रचे हुए लगभग 1300 पद हमारे बीच आज भी उपलब्ध हैं। उनके पदों में राजस्थानी बोली के साथ ब्रज भाषा का मिश्रण है। कुछ विद्वान मानते हैं कि मीरा के भक्तिकाव्य पर उनके समकालीन संगीत सम्राट तानसेन, चित्तौड़ के गुरु रविदास और गोस्वामी तुलसीदास का प्रभाव है। उनके रचे असंख्य पदों में से आज के अंक के लिए हमने जो पद चुना है, वह है- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’। गीतकार गुलज़ार द्वारा 1979 में निर्मित फिल्म ‘मीरा’ में शामिल यह भक्ति रचना है। फिल्म का संगीत निर्देशन विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर ने किया था। पण्डित जी ने मीरा के इस पद में निहित करुणा मिश्रित भक्तिभाव की अभिव्यक्ति के लिए राग तोड़ी के स्वरों का चयन किया था। आप यह पद गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनिए और करुण और भक्तिरस के मिश्रण की अनुभूति कीजिए। रचना रूपक ताल में निबद्ध है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग तोड़ी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : वाणी जयराम ; फिल्म मीरा





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 233वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 240 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग की झलक मिलती है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 235वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 231वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘जागते रहो’ के एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग - भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में पहली बार तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाली प्रतिभागी हैं, नई दिल्ली की अनुपमा त्रिपाठी। अनुपमा जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है। तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाली हमारी नियमित प्रतिभागी हैं, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ जारी है। अगले अंक में हम दिन के तीसरे प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा करेंगे और आपको कुछ रागबद्ध रचनाएँ भी सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


 

शनिवार, 22 अगस्त 2015

BAATON BAATON MEIN-11: INTERVIEW OF LYRICIST PT. NARENDRA SHARMA'S DAUGHTER SMT. LAVANYA SHAH

बातों बातों में - 11

गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा की पुत्री श्रीमती लावण्या शाह से सुजॉय चटर्जी की बातचीत


"दर भी था, थी दीवारें भी, माँ, तुमसे घर घर कहलाया..."  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज अगस्त 2015 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध कवि, गीतकार, भाषाविद, दार्शनिक और आयुर्वेद के ज्ञाता पंडित नरेन्द्र शर्मा की पुत्री श्रीमती लावण्या शाह से की गई हमारी लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश।    




लावण्या जी, आपका बहुत बहुत स्वागत है, नमस्कार!

नमस्ते, सुजॉय भाई, आपका आभार जो आपने आज मुझे याद किया।

यह हमारा सौभाग्य है आपको पाना, और आप से आपके पापाजी, यानी पंडित जी के बारे में जानना। यूं तो आप ने उनके बारे में अपने ब्लॉगों में या साक्षात्कारों में कई बार बताया भी है, आज के इस साक्षात्कार में हम आपसे पंडित जी की शख्सियत के कुछ अनछुये पहलुओं के बारे में भी जानना चाहेंगे। सबसे पहले यह बताइए पंडित जी के पारिवारिक पार्श्व के बारे में। ऐसे महान शख़्स के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी कौन थे, उनके क्या व्यवसाय थे? 

पूज्य पापा जी का जन्म उत्तर प्रदेश प्रांत के ज़िला बुलंदशहर, खुर्जा, ग्राम जहाँगीरपुर में हुआ, जो अब ग्रेटर नॉयडा कहलाता है। तारीख थी फरवरी की 28, जी हाँ, लीप-यीअर में 29 दिन होते हैं, उस के ठीक 1 दिन पहले सन 1913 में। उनका संयुक्त परिवार था, भारद्वाज वंश का था, व्यवसाय से पटवारी कहलाते थे। घर को स्वामी पाडा कहा जाता था जो तीन मंजिल की हवेलीनुमा थी। जहाँ मेरे दादाजी स्व. पूर्णलाल शर्मा तथा उनकी धर्मपत्नी मेरी दादी जी स्व. गंगा देवी जी अपने चचेरे भाई व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आबाद थे। उनके खेत थे, अब भी हैं और फलों की बाडी भी थी। खुशहाल, समृद्ध परिवार था जहाँ एक प्रतिभावान बालक का जन्म हुआ और दूर के एक चाचाजी जिन्हें रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियाँ पढ़ने का शौक था, उन्होंने बालक का नामकरण किया और शिशु को "नरेंद्र" नाम दिया!

वाह!

किसे खबर थी कि "नरेंद्र शर्मा" का नाम एक दिन भारतवर्ष में एक सुप्रसिद्ध गीतकार और कवि के रूप में पहचाना जाएगा? पर ऐसे ही एक परिवार में, बालक नरेंद्र पलकर बड़े हुए थे।

पंडित जी के परिवार का माहौल किस तरह का था जब वो छोटे थे? क्या घर पर काव्य, साहित्य, गीत-संगीत आदि का माहौल था? किस तरह से यह बीज पंडित जी के अंदर अंकुरित हुई? 

पापा से ही सुना है और उन्होंने अपनी पुस्तक "मुठ्ठी बंद रहस्य" में अपने पिताजी श्री पूर्ण लाल शर्मा जी को समर्पित करते हुए लिखा है कि 'पिता की तबीयत अस्वस्थ थी और बालक पिता की असहाय स्थिति को देख रहा था ..' चार साल की उमर में बालक नरेंद्र के सर से पिता का साया हट गया था और बड़े ताऊजी श्री गणपत भाई साहब ने, नरेंद्र को अपने साथ कर लिया और बहुत लाड प्यार से शिक्षा दी और घर की स्त्रियों के पास अधिक न रहने देते हुए उसे आरंभिक शिक्षा दी थी। एक कविता है पापा जी की ..'हर लिया क्यूं शैशव नादान'।

हर लिया क्यों शैशव नादान?
शुद्ध सलिल सा मेरा जीवन,
दुग्ध फेन-सा था अमूल्य मन,
तृष्णा का संसार नहीं था,
उर रहस्य का भार नहीं था,
स्नेह-सखा था, नन्दन कानन
था क्रीडास्थल मेरा पावन;
भोलापन भूषण आनन का
इन्दु वही जीवन-प्रांगण का
हाय! कहाँ वह लीन हो गया
विधु मेरा छविमान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?

निर्झर-सा स्वछन्द विहग-सा,
शुभ्र शरद के स्वच्छ दिवस-सा,
अधरों पर स्वप्निल-सस्मिति-सा,
हिम पर क्रीड़ित स्वर्ण-रश्मि-सा,
मेरा शैशव! मधुर बालपन!
बादल-सा मृदु-मन कोमल-तन।
हा अप्राप्य-धन! स्वर्ग-स्वर्ण-कन
कौन ले गया नल-पट खग बन?
कहाँ अलक्षित लोक बसाया?
किस नभ में अनजान!
हर लिया क्यों शैशव नादान?

जग में जब अस्तित्व नहीं था,
जीवन जब था मलयानिल-सा
अति लघु पुष्प, वायु पर पर-सा,
स्वार्थ-रहित के अरमानों-सा,
चिन्ता-द्वेष-रहित-वन-पशु-सा
ज्ञान-शून्य क्रीड़ामय मन था,
स्वर्गिक, स्वप्निल जीवन-क्रीड़ा
छीन ले गया दे उर-पीड़ा
कपटी कनक-काम-मृग बन कर
किस मग हा! अनजान?
हर लिया क्यों शैशव नादान?


बहुत सुंदर, बहुत सुंदर!

भारत के संयुक्त परिवारों में अकसर हमारे पौराणिक ग्रंथों का पाठ जैसे रामायण होता ही है और सुसंस्कार और परिवार की सुद्रढ़ परम्पराएं भारतीयता के साथ सच्ची मानवता के आदर्श भी बालक मन में उत्पन्न करते हुए, स्थायी बन जाते हैं, वैसा ही बालक नरेंद्र के पितृहीन परिवार के लाड दुलार भरे वातावरण में हुआ था।

पंडित जी की शिक्षा-दीक्षा कैसे शुरु हुई?

शिक्षा घर पर ही आरम्भ हुई, फिर नरेंद्र को सीधे बड़ी कक्षा में दाखिला मिल गया और स्कूल के शिक्षक नरेंद्र की प्रतिभा व कुशाग्र बुद्धि से चकित तो थे पर बड़े प्रसन्न भी थे।

आगे की शिक्षा उन्होंने कहाँ से प्राप्त की?

प्रारम्भिक शिक्षा खुर्जा में हुई। इलाहाबाद विश्वविध्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में MA करने के बाद, कुछ वर्ष आनन्द भवन में 'अखिल भारतीय कॉंग्रेज़ कमिटी के हिंदी विभाग से जुड़े और नज़रबंद किये गए। देवली जेल में भूख हड़ताल से (14 दिनों तक) जब बीमार हालत में रिहा किए गए तब गाँव, मेरी दादीजी गंगादेवी से मिलने गये। वहीं से भगवती बाबू ("चित्रलेखा" के प्रसिद्ध लेखक) के आग्रह से बम्बई आ बसे। वहीं गुजराती कन्या सुशीला से वरिष्ठ सुकवि श्री पंत जी के आग्रह से व आशीर्वाद से पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हुए। बारात में हिंदी साहित्य जगत और फिल्म जगत की महत्त्वपूर्ण हस्तियाँ हाजिर थीं - दक्षिण भारत से स्वर-कोकिला सुब्बुलक्षमीजी, सुरैयाजी, दिलीप कुमार, अशोक कुमार, अमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजी, भगवती बाबू, सपत्नीक अनिल बिश्वासजी, गुरुदत्त जी, चेतनानन्दजी, देवानन्दजी इत्यादि .. और जैसी बारात थी उसी प्रकार 19 वे रास्ते पर स्थित उनका आवास डॉ. जयरामनजी के शब्दों में कहूँ तो "हिंदी साहित्य का तीर्थ-स्थान" बम्बई जैसे महानगर में एक शीतल सुखद धाम मेँ परिवर्तित हो गया।

लावण्या जी, हम बात कर रहे हैं पंडित जी की शिक्षा के बारे में। कवि, साहित्यिक, गीतकार, दार्शनिक - ये सब तो फिर भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन आयुर्वेद तो बिल्कुल ही अलग शास्त्र है, जो चिकित्सा-विज्ञान में आता है। यह बताइए कि पंडित जी ने आयुर्वेद की शिक्षा कब और किस तरह से अर्जित की? क्या यह उनकी रुचि थी, क्या उन्होंने इसे व्यवसाय के तौर पर भी अपनाया, इस बारे में ज़रा विस्तार से बतायें। 

पूज्य पापा जी ने आयुर्वेद का ज्ञान किन गुरुओं की कृपा से पाया उनके बारे में बतलाती हूँ पर ये स्पष्ट कर दूं कि व्यवसाय की तरह कभी इस ज्ञान का उपयोग पापा जी ने नहीं किया था। हाँ, कई जान-पहचान के लोग आते तो उन्हें उपाय सुझाते और पापा ज्योतिष शास्त्र के भी प्रखर ज्ञाता थे, तो जन्म पत्रिका देखते हुए, कोई सुझाव उनके मन में आता तो बतला देते थे। हमारे बच्चों के जन्म के बाद भी उनके सुझाव से 'कुमार मंगल रस' शहद के साथ मिलाकर हमने पापा के सुझाव पर दी थी। आयुर्वेद के मर्मज्ञ और प्रखर ज्ञाता स्व. श्री मोटा भाई, जो दत्तात्रेय भगवान के परम उपासक थे, स्वयं बाल ब्रह्मचारी थे और मोटाभाई ने, पावन नदी नर्मदा के तट पर योग साधना की थी, वे पापा जी के गुरु-तुल्य थे, पापा जी उनसे मिलने अकसर सप्ताह में एक या दो शाम को जाया करते थे और उन्हीं से आयुर्वेद की कई गूढ़ चिकित्सा पद्धति के बारे में पापा जी ने सीखा था। मोटा भाई से कुछ वर्ष पूर्व, स्व. ढूंडीराज न्यायरत्न महर्षि विनोद जी से भी पापा का गहन संपर्क रहा था।

लावण्या जी, हमने सुना है कि पंडित जी 30 वर्ष की आयु में बम्बई आये थे भगवती चरण वर्मा के साथ। यह बताइए कि इससे पहले उनकी क्या क्या उपलब्धियाँ थी बतौर कवि और साहित्यिक। बम्बई आकर फ़िल्म जगत से जुड़ना क्यों ज़रूरी हो गया? 

पापा जी ने इंटरमीडीयेट की पढ़ाई खुरजा से की और आगे पढ़ने वे संस्कृति के गढ़, इलाहाबाद में आये और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जोइन की। 19 वर्ष की आयु में, सन 1934 में प्रथम काव्य-संग्रह, "शूल - फूल" प्रकाशित हुआ। अपने बलबूते पर, एम्.ए. अंग्रेज़ी विषय लेकर, पास किया। 'अभ्युदय दैनिक समाचार पत्र' के सह सम्पादक पद पर काम किया। सन 1936 में "कर्ण - फूल" छपी, पर 1937 में "प्रभात - फेरी" काव्य संग्रह ने नरेंद्र शर्मा को कवि के रूप में शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा दिया। काव्य-सम्मलेन में उसी पुस्तक की ये कविता जब पहली बार नरेंद्र शर्मा ने पढी तब, सात बार, 'वंस मोर' का शोर हुआ ...गीत है - "आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगें, आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगें". और एक सुमधुर गीतकार के रूप में नरेंद्र शर्मा की पहचान बन गयी। इसी इलाहाबाद में, आनंद भवन मेँ, 'अखिल भारतीय कोँग्रेस कमिटि के हिंदी विभाग से जुडे, हिंदी सचिव भी रहे जिसके लिये पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने पापा जी को अखिल भारतीय कोंग्रेस कमिटी के दस्तावेजों को, जल्दी से अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद कर, भारत के कोने कोने तक पहुंचाने के काम में, उन्हे लगाया था। अब इस देशभक्ति का नतीजा ये हुआ के उस वक्त की अंग्रेज़ सरकार ने, पापा जी को, दो साल देवली जेल और राजस्थान जेल में कैद किया जहाँ नरेंद्र शर्मा ने 14 दिन का अनशन या भूख हड़ताल भी की थी और गोरे जेलरों ने जबरदस्ती सूप नलियों में भर के पिलाया और उन्हे जिंदा रखा। जब रिहा हुए तब गाँव गये, सारा गाँव वंदनवार सजाये, देशभक्त के स्वागत में झूम उठा! दादी जी स्व. गंगा देवी जी को एक सप्ताह बाद पता चला कि उनका बेटा, जेल में भूखा है तो उन्होंने भी एक हफ्ते भोजन नहीं किया। ऐसे कई नन्हे सिपाही महात्मा गांधी की आज़ादी की लड़ाई में, बलिदान देते रहे तब कहीं सन 1947 में भारत को पूर्ण स्वतंत्रता मिली थी। इस रोमांचक घटना का जिक्र करते हुए जनाब सादिक अली जी का लिखा अंग्रेज़ी आलेख देखें ..वे कहते हैं -- " Poet, late Pandit Narendra Sharma, was arrested without trial under the British Viceroy's Orders, for more than two years. His appointment to AICC was made by Pandit Jawaharlal Nehru. Pandit Narendra Sharma's photo along with then AICC members, is still there in Swaraj Bhavan, Allahabad."

बहुत ख़ूब! अच्छा, बम्बई कैसे आना हुआ उनका?
with Bhagwati Charan Verma

आपका कहना सही है कि भगवतीचरण वर्मा, 'चित्रलेखा ' के मशहूर उपन्यासकार नरेन्द्र शर्मा को अपने संग बम्बई ले आये थे। कारण था, फिल्म निर्माण संस्था "बॉम्बे टॉकीज" नायिका देविका रानी के पास आ गयी थी जब उनके पति हिमांशु राय का देहाँत हो गया और देविका रानी को, अच्छे गीतकार, पटकथा लेख़क, कलाकार सभी की जरूरत हुई। भगवती बाबू को, गीतकार नरेंद्र शर्मा को बोम्बे टाकीज़ के काम के लिये ले आने का आदेश हुआ था और नरेंद्र शर्मा के जीवन की कहानी का अगला चैप्टर यहीं से आगे बढा।

पंडित जी का लिखा पहला गीत पारुल घोष की आवाज़ में 1943 की फ़िल्म 'हमारी बात' का, "मैं उनकी बन जाऊँ रे" बहुत लोकप्रिय हुआ था। क्योंकि यह उनका पहला पहला गीत था, उन्होंने आपको इसके बारे में ज़रूर बताया होगा। तो हम भी आपसे जानना चाहेंगे उनके फ़िल्म जगत में पदार्पण के बारे में, इस पहली फ़िल्म के बारे में, इस पहले मशहूर गीत के बारे में।

पापा ने बतलाया था कि फिल्म 'हमारी बात' के लिए लिखा सबसे पहला गीत 'ऐ बादे सबा, इठलाती न आ...' उन्होंने इस ख्याल से इलाहाबाद से बंबई आ रही ट्रेन में ही लिख रखा था कि हिन्दी फिल्मों में उर्दू अलफ़ाज़ लिए गीत जरूरी है, जैसा उस वक्त का ट्रेंड था, तो वही गीत पहले चित्रपट के लिए लिखा गया और 'हमारी बात' में अनिल बिस्वास जी ने स्वरबद्ध किया और गायिका पारुल घोष ने गाया। पारुल घोष, मशहूर बांसुरी वादक श्री पन्नालाल घोष की पत्नी थीं और भारतीय चित्रपट संगीत के भीष्म पितामह श्री अनिल बिस्वास की बहन। जब यह गीत बना तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था पर आज इस गीत को सुनती हूँ तब भी बड़ा मीठा, बेहद सुरीला लगता है। एक वाकया याद आ रहा है, हमारे पडौसी फिल्म कलाकार जयराज जी के घर श्री राज कपूर आये थे और बार बार इसी गीत की एक पंक्ति गा रहे थे, 'दूर खड़ी शरमाऊँ, मैं मन ही मन अंग लगाऊँ, दूर खडी शरमाऊँ, मैं, उनकी बन जाऊं रे, मैं उनकी बन जाऊं' और इसी से मिलते जुलते शब्द यश राज की फिल्म 'दिल तो पागल है' में भी सुने 'दूर खडी शरमाये, आय हाय', तो प्रेम की बातें तब भी और अब भी ऐसे ही दीवानगी भरी होती रहीं हैं और होतीं रहेंगीं ..जब तक 'प्रेम', रहेगा ये गीत भी अमर रहेगा।

बहुत सुंदर! और पंडित जी ने भी लिखा था कि "मेरे पास मेरा प्रेम है"। अच्छा लावण्या जी, यह बताइए कि 'बॉम्बे टॉकीज़' के साथ वो कैसे जुड़े? क्या उनकी कोई जान-पहचान थी? किस तरह से उन्होंने अपना क़दम जमाया इस कंपनी में? 

पापा के एक और गहरे मित्र रहे मशहूर कथाकार श्री अमृतलाल नागर : उनका लिखा पढ़ें| नागर जी चाचा जी लिखते हैं ...
"एक साल बाद श्रद्धेय भगवती बाबू भी "बोम्बे टाकीज़" के आमंत्रण पर बम्बई पहुँच गये, तब हमारे दिन बहुत अच्छे कटने लगे। प्राय: हर शाम दोनोँ कालिज स्ट्रीट स्थित, स्व. डॉ. मोतीचंद्र जी के यहाँ बैठेकेँ जमाने लगे। तब तक भगवती बाबू का परिवार बम्बई नहीँ आया था और वह, कालिज स्ट्रीट के पास ही माटुंगा के एक मकान की तीसरी मंजिल मेँ रहते थे। एक दिन डॉक्टर साहब के घर से लौटते हुए उन्होँने मुझे बतलाया कि वह एक दो दिन के बाद इलाहाबाद जाने वाले हैँ। "अरे गुरु, यह इलाहाबाद का प्रोग्राम एकाएक कैसे बन गया ?" "अरे भाई, मिसेज रोय (देविका रानी रोय) ने मुझसे कहा है कि, मैँ किसी अच्छे गीतकार को यहाँ ले आऊँ! नरेन्द्र जेल से छूट आया है और मैँ समझता हूँ कि वही ऐसा अकेला गीतकार है जो प्रदीप से शायद टक्कर ले सके!' सुनकर मैँ बहुत प्रसन्न हुआ प्रदीप जी तब तक, बोम्बे टोकीज़ से ही सम्बद्ध थे "कंगन", "बंधन" और "नया संसार" फिल्मोँ से उन्होँने बंबई की फिल्मी दुनिया मेँ चमत्कारिक ख्याति अर्जित कर ली थी, लेकिन इस बात से कुछ पहले ही वह बोम्बे टोकीज़ मेँ काम करने वाले एक गुट के साथ अलग हो गए थे। इस गुट ने "फिल्मिस्तान" नामक एक नई संस्था स्थापित कर ली थी - कंपनी के अन्य लोगोँ के हट जाने से देविका रानी को अधिक चिँता नहीँ थी, किंतु, ख्यातनामा अशोक कुमार और प्रदीप जी के हट जाने से वे बहुत चिँतित थीँ - कंपनी के तत्कालीन डायरेक्टर श्री धरम्सी ने अशोक कुमार की कमी युसूफ ख़ान नामक एक नवयुवक को लाकर पूरी कर दी! युसूफ का नया नाम, "दिलीप कुमार" रखा गया, (यह नाम भी पापा ने ही सुझाया था - एक और नाम 'जहाँगीर' भी चुना था पर पापा जी ने कहा था कि युसूफ, दिलीप कुमार नाम तुम्हे बहुत फलेगा - (ज्योतिष के हिसाब से) और आज सारी दुनिया इस नाम को पहचानती है। किंतु प्रदीप जी की टक्कर के गीतकार के अभाव से श्रीमती राय बहुत परेशान थीँ। इसलिये उन्होँने भगवती बाबू से यह आग्रह किया था एक नये शुद्ध हिंदी जानने वाले गीतकार को खोज लाने का।

किसी भी सफल इंसान के पीछे किसी महिला का हाथ होता है, ऐसी पुरानी कहावत है। आपके विचार में आपकी माताजी का कितना योगदान है पंडित जी की सफलता के पीछे? अपनी माताजी की शख़्सीयत के बारे में विस्तार से बतायें।
with his better half

मेरी माँ, श्रीमती सुशीला नरेंद्र शर्मा, कलाकार थीं। चार साल हलदनकर इंस्टिट्यूट में चित्रकला सीख कर बेहतरीन आयल कलर और वाटर कलर के चित्र बनाया करती थीं। हमारे घर की दीवारों को उनके चित्रोँ ने सजाया। उस सुन्दर, परम सुशील, सर्वगुण संपन्न माँ के लिये, पापा का गीत गाती हूँ - "दर भी था, थीं दीवारें भी, माँ, तुमसे, घर घर कहलाया!" यह कम लोग जानते हैं के सुशीला गोदीवाला संगीत निर्देशक गायक अविनाश व्यास के ग्रुप में गाया भी करतीं थीं; रेडियो आर्टिस्ट थीं और अनुपम सुन्दरी थीं - हरी हरी, अंगूर सी आँखें, तीखे नैन नक्श, उजला गोरा रंग और इतनी सौम्यता और गरिमा कि स्वयं श्री सुमित्रानंदन पन्त जी ने सुशीला को दुल्हन के जोड़े में सजा हुआ देख कहा था, "शायद दुष्यंत राजा की शकुन्तला भी ऐसी ही होगी"। पन्त जी तो हैं हिंदी के महाकवि! मैं, अम्मा की बेटी हूँ! जिस माँ की छाया तले अपना जीवन संवारा वो तो ऐसी देवी माँ को श्रद्धा से अश्रू पूरित नयनों से प्रणाम ही कर सकती है। कितना प्यार दुलार देकर अपनी फुलवारी सी गृहस्थी को अम्मा ने सींचा था। पापा जी तो भोले शम्भू थे, दिन दुनिया की चिंता से विरक्त सन्यासी - सद गृहस्थ! अम्मा ही थी जो नमक, धान, भोजन, सुख सुविधा का जुगाड़ करतीं, साक्षात अम्बिका भवानी सी हमारी रक्षा करती, हमें सारे काम सिखलाती, खपती, थकती पर कभी घर की शांति को बिखरने न दिया, न कभी पापा से कुछ माँगा। अगर कोई नई साड़ी आ जाती तो हम तीन बहनों के लिये सहेज कर रख देतीं। ऐसी निस्पृह स्त्री मैंने और नहीं देखी और हमेशा सादा कपड़ों में अम्मा महारानी से सुन्दर और दिव्य लगतीं थीं। अम्मा की बगिया के सारे सुगंधी फूल, नारियल के पेड़, फलों के पेड़ उसी के लगाए हुए आज भी छाया दे रहे हैं पर अम्मा नहीं रहीं, यादें रह गयीं, बस!

बहुत खी सुंदर तरीके से आपने अपनी माताजी का वर्णन किया, हम भी भावुक हो गए हैं। लावण्या जी, फ़िल्म जगत के किन किन कलाकारों के साथ आपके परिवार का पारिवारिक सम्बंध रहा है? इसमें एक नाम लता मंगेशकर जी का अवश्य है । लता जी के साथ आपके पारिवारिक सम्बन्ध बारे में हम विस्तार से जानना चाहेंगे।
with the Melody Queen

स्वर साम्राज्ञी सुश्री लता मंगेशकर जी हमारे परिवार की बड़ी दीदी हैं। दीदी, पापा जी से निर्माता निर्देशक विनायक राव जी [जो मशहूर तारिका नंदा जी के पिताजी थे] उन के यहाँ दीदी जब काम किया करतीं थीं उसी दौरान सबसे पहली बार मिले थे ..फिर मुझे याद आता है मैं छोटी ही थी तब दीदी घर आयीं थीं, फिर मुलाकातें होती रहीं बाहर काम के लिये, बंबई फिल्म निर्माण का मुख्य केंद्र है तो कहीं न कहीं मुलाक़ात हो ही जाया करती थी।

लावण्या जी, एक तरफ़ आपके पिता, पंडित जी, और दूसरी तरफ़ स्वर-साम्राज्ञी लता जी। ऐसे महान दो कलाकारों का स्पर्श आपको जीवन में मिला, जो मैं समझता हूँ कि इस तरह का सौभाग्य बहुत कम लोगों को नसीब है। 

पापाजी और दीदी, दो ऐसे इंसान हैं जिनसे मिलने के बाद मुझे ज़िंदगी के रास्तों पे आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा मिली है। संघर्ष का नाम ही जीवन है। कोई भी इसका अपवाद नहीं- सत्चरित्र का संबल, अपने भीतर की चेतना को प्रखर रखे हुए किस तरह अंधेरों से लड़ना और पथ में कांटे बिछे हों या फूल, उन पर पग धरते हुए, आगे ही बढ़ते जाना ये शायद मैंने इन दो व्यक्तियों से सीखा। उनका सान्निध्य मुझे यह सिखला गया कि अपने में रही कमजोरियों से किस तरह स्वयं लड़ना जरुरी है- उनके उदाहरण से हमें इंसान के अच्छे गुणों में विश्वास पैदा करवाता है। पापा जी का लेखन, गीत, साहित्य और कला के प्रति उनका समर्पण और दीदी का संगीत, कला और परिश्रम करने का उत्साह, मुझे बहुत बड़ी शिक्षा दे गया। उन दोनों की ये कला के प्रति लगन और अनुदान सराहने लायक है ही, परन्तु उससे भी गहरा था उनका इंसानियत से भरापूरा स्वरूप जो शायद कला के क्षेत्र से भी ज्यादा विस्तृत था। दोनों ही व्यक्ति ऐसे जिनमें इंसानियत का धर्म कूट-कूट कर भरा हुआ मैंने बार बार देखा और महसूस किया । जैसे सुवर्ण शुद्ध होता है, उसे किसी भी रूप में उठालो, वह समान रूप से दमकता मिलेगा वैसे ही दोनों को मैंने हर अनुभव में पाया। जिसके कारण आज दूरी होते हुए भी इतना गहरा सम्मान मेरे भीतर बैठ गया है कि दूरी महज एक शारीरिक परिस्थिती रह गयी है। ये शब्द फिर भी असमर्थ हैं मेरे भावों को आकार देने में।

पंडित जी से सम्बंधित कुछ यादगार घटनाओं के बारे में बताइए। वो घटनाएँ या संस्मरण जो भुलाये नहीं भूलते। 
The Father-Daughter duo

हम बच्चे दोपहरी मेँ जब सारे बड़े सो रहे थे, पड़ोस के माणिक दादा के घर से कच्चे पक्के आम तोड़ कर किलकारियाँ भर रहे थे कि अचानक, पापाजी वहाँ आ पहुँचे, गरज कर कहा, "अरे! यह आम पूछे बिना क्योँ तोड़े? जाओ, जाकर माफी माँगो और फल लौटा दो"। एक तो चोरी करते पकड़े गए और उपर से माफी माँगनी पडी!!! पर अपने और पराये का भेद आज तक भूल नही पाए, यही उनकी शिक्षा थी। एक और बताती हूँ,  मेरी उम्र होगी कोई 8 या 9 साल की। पापाजी ने कवि शिरोमणि कवि कालिदास की कृति " मेघदूत " से पढ़ने को कहा। संस्कृत कठिन थी परँतु, जहाँ कहीँ , मैँ लड़खड़ाती, वे मेरा उच्चारण शुद्ध कर देते। आज, पूजा करते समय, हर श्लोक के साथ ये पल याद आते हैँ। एक और सुनिए, मेरी बिटिया, सिंदूर के जन्म के बाद जब भी रात को उठती, पापा, मेरे पास सहारा देते, मिल जाते, मुझसे कहते, "बेटा, मैँ हूँ, यहाँ"। आज मेरी बिटिया की प्रसूति के बाद, यही वात्सल्य उड़ेलते समय, पापाजी की निश्छल, प्रेममय वाणी और स्पर्श का अनुभव हो जाता है। जीवन अतीत के गर्भ से उदित होकर, भविष्य को संजोता आगे बढ रहा है।

पंडित जी ने जहाँ एक तरफ़ कविताएँ, साहित्य, और फ़िल्मी गीत लिखे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ ग़ैर फ़िल्मी भक्ति रचनाएं, ख़ास कर माता को समर्पित बहुत से गीत लिखे हैं, उनके लेखनी के इस पक्ष के बारे में भी बताइए। क्या वो अंदर से भी उतने ही धार्मिक थे? आध्यात्मिक थे? कैसी शख़्सीयत थी उनकी? 

पापा जी दार्शनिक, विचारशील, तरुण व्यक्ति और प्रखर बुद्धिजीवी रहे। धार्मिक तो वे थे ही पर भारतीय वांग्मय, पुराण, वेद, धर्म ग्रन्थ के अध्येता थे। कईयों का अनुभव है और लोग कहते थे 'नरेंद्र शर्मा चलता फिरता विश्व कोष है'। 'राम चरित मानस' को पढ़ते और आंसू बहाते भी देखा है। उनका धर्म , सच्ची मानवता थी। सभी को एक समान आदर दिया करते चाहे वो आनेवाला महाराणा मेवाड़ हो या हमारे घर कपड़े लेने आनेवाला हमारा इस्त्रीवाला हो। हमारी बाई को चिट्ठी बांच कर सुनाते और घंटों existansilism इस गूढ़ विषय पे वे बोलते। बी.बी.सी सुनते और मारग्रेट थेचर को चुनाव लड़ने की शुभ तारीख भी उन्होंने बतलाई थी, हाँ सच! और मैडम जीती थीं! वे पूरी बंबई, पैदल या लोकल ट्रेन से या बस से घूम आते। दूरदर्शन पे संगीत का प्रोग्राम रेकॉर्ड करवा के सहजता से घर पर बतियाते। कभी कोई पर्चा या नोट नहीं रखते। किसी भी विषय पे साधिकार, सुन्दर बोलते। पंडित नेहरू के निधन पर भी 'रनिंग्‍कमेंट्री' की थी। भारत माता के प्रति अगाध प्रेम व श्रद्धा थी जो उनकी कविताओं में स्पष्ट है। उन्होँने "कदली वन " काव्य -सँग्रह की "देश मेरे" शीर्षक कविता में कहा है - "दीर्घजीवी देश मेरे, तू, विषद वट वृक्ष है"। पापा जी का धर्म आडम्बरहीन और मानवतावादी था सर्वोदय और ' सर्वे भवन्तु सुखिन ' का उद्घोष लिये था।

अपने पापाजी के लिखे फ़िल्मी रचनाओं में अगर पाँच गीत हम चुनने के लिए कहें, तो आप कौन कौन से गीतों को चुनेगी? 

यूं तो मुझे उनके लिखे सभी गीत बहुत पसंद हैं, पर आपने पाँच के लिये कहा है तो मैं इन्हें चुनती हूँ। पहला, "ज्योति कलश छलके", गायिका लतादीदी, संगीत सुधीर फडके जी, शब्द पं. नरेंद्र शर्मा। दूसरा, "सत्यम शिवम् सुंदरम", गायिका लतादीदी, लक्ष्मीकांत प्यारे लाल जी का संगीत, शब्द पापा के। तीसरा, "नाच रे मयूरा", विविध भारती का सर्व प्रथम प्रसार-गीत, स्वर श्री मन्ना डे, संगीत अनिल बिस्वास जी और शब्द पंडित नरेंद्र शर्मा के। चौथा, "स्वागतम शुभ स्वागतम", स्वागत गान एशियाड खेलों के उदघाटन पर संगीत पंडित रवि शंकर जी, शब्द पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा के। और पाँचवाँ गीत "नैना दीवाने, एक नहीं माने, करे मनमानी माने ना...", गायिका सुरैया जी और संगीत श्री एस डी बर्मन तथा शब्द नरेंद्र शर्मा फिल्म "अफसर" जो देवानन्द जी के "नवकेतन बेनर" की प्रथम पेशकश थी।

और अब एक अंतिम सवाल, पंडित नरेन्द्र शर्मा एक ऐसी शख़्सीयत का नाम है जिनके व्यक्तित्व और उपलब्धियों का मूल्यांकन शब्दों में संभव नहीं। लेकिन फिर भी हम आपसे जानना चाहेंगे कि अगर केवल एक वाक्य में आपको अपने पापाजी के बारे में कुछ कहना हो तो आप किस तरह से उनकी शख़्सीयत का व्याख्यान करेंगी?

मैं मानती हूँ कि हर एक इंसान ईश्वर की अप्रतिम कृति है। हम ईश्वर के अंश हैं शायद, ईश्वर को कविता, गीत व संगीत बेहद प्रिय हैं! सबसे अलग, सबसे विशिष्ट हैं हम सभी। जैसे हमारे फिंगर प्रिंट सब से अलग होते हैं। पर पापा जी, पंडित नरेंद्र शर्मा के लिये एक वाक्य में कहूं तो यही कहूंगी - 'न भूतो न भविष्यति' ! एक अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी, जो आजीवन सर्वथा साधारण और सहज बने रहे शायद यही उनकी तपस्या का फल था और उनकी आत्मा का अंतिम चरण ...अंतिम सोपान ...

बहुत बहुत धन्यवाद लावण्या जी आपका, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, अपनी व्यस्त जीवन से समय निकालकर आपने हमें समय दिया, और पंडित जी के बारे में इतनी जानकारी दी जो शायद उनके चाहने वालों को मालूम नहीं होगी। बहुत बहुत धन्यवाद, नमस्कार! 

सुजॉय भाई, आपके अनेक इंटरव्यू पढ़ कर खुश हुई हूँ और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ हिन्दी भाषा के प्रति समर्पित होकर महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। समग्र सम्पादक मंडल व पूरी टीम को मेरे सस्नेह आशीष। आपको मेरे सच्चे मन से कहे धन्यवाद, बड़ी लम्बी बातचीत हो गयी। आप सब को समय देने के लिये भी शुक्रिया, फिर मिलेंगें, नमस्ते!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





मंगलवार, 18 अगस्त 2015

मोनिका गुप्ता की कथा लव यू

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने मोनिका गुप्ता के स्वर में उन्हीं की लघुकथा "सहयोग" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में मोनिका गुप्ता लिखित लघुकथा लव यू, उन्हीं के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं।

इस कहानी लव यू का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 50 सेकंड है। इसका गद्य monicagupta.info पर उपलब्ध है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

हरियाणा निवासी, साहित्यकार और रेडियो व्यक्तित्व मोनिका गुप्ता के लेख जाने माने राष्ट्रीय समाचार पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन कार्यक्रमों के अलावा इन्होनें जिंगल्स और वाईस ओवर भी किए हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी से बाल साहित्य पुरस्कार मिल चुका है। अभी तक सात किताबे प्रकाशित हुई हैं जिसमें से दो नेशनल बुक ट्र्स्ट से हैं। लेखन और वाचन के साथ साथ कार्टूनों के माध्यम से भी अपने विचार व्यक्त कर रही है।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"बदलता मौसम है ... ना आज नाक और आंखो से पानी बहुत बह रहा है।”
 (मोनिका गुप्ता की लघुकथा "लव यू" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
लव यू MP3

#Twelfth Story, Love You; Monica Gupta; Hindi Audio Book/2015/12. Voice: Monica Gupta

रविवार, 16 अगस्त 2015

प्रातःकाल के राग : SWARGOSHTHI – 232 : MORNING RAGA




स्वरगोष्ठी – 232 में आज


रागों का समय प्रबन्धन – 1 : दिन के प्रथम प्रहर के राग

‘जग उजियारा छाए, मन का अँधेरा जाए...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ आरम्भ कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर, दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर, रात्रि के प्रहर कहलाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग बिलावल की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती और उनकी सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग भैरव पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।



भारतीय कालगणना सिद्धान्तों के अनुसार नये दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है। सूर्योदय से लेकर तीन घण्टे तक प्रथम प्रहर माना जाता है। भारत में सूर्योदय का समय ऋतु और स्थान के अनुसार चार से सात बजे के बीच बदलता रहता है। संगीत के प्रथम प्रहर का निर्धारण समान्यतः प्रातःकाल 6 से 9 बजे के बीच किया गया है। रागों का समय निर्धारण कुछ प्रमुख सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है। इन सिद्धान्तों की चर्चा हम अगली कड़ी से करेंगे। सामान्यतः प्रातःकाल के रागों में शुद्ध मध्यम वाले राग और ऋषभ और धैवत कोमल स्वर वाले राग होते हैं। प्रथम प्रहर के कुछ मुख्य राग हैं- बिलावल, अल्हैया बिलावल, अरज, भैरव, अहीर भैरव, आनन्द भैरव, आभेरी, आभोगी, गुणकली, जोगिया, देशकार, रामकली, विभास, वैरागी और भैरवी आदि। आज हम पहले राग बिलावल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

बिलावल राग, बिलावल थाट का आश्रय राग है। यह सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग बिलावल का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल है- ‘रब सों नेहा लगाओ रे मनवा...’। यह बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं, पटियाला (कसूर) घराने की गायकी में सिद्ध पण्डित अजय चक्रवर्ती। इस प्रस्तुति में उनका साथ दे रही हैं, अजय जी की ही सुपुत्री कौशिकी चक्रवर्ती।


राग बिलावल : रब सों नेहा लगाओ रे मनवा...’ : अजय चक्रवर्ती और कौशिकी चक्रवर्ती





आज का दूसारा प्रातःकालीन भैरव थाट का आश्रय राग भैरव है। इस राग का गायन-वादन सन्धिप्रकाश काल में भी किया जाता है। राग भैरव भी सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बांग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बांग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - जागते रहो : संगीत - सलिल चौधरी





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 232वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गायिका के स्वर को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 22 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 234वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 230 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर प्रस्तुत कजरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ। इस बार की पहेली में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। तीसरी श्रृंखला के विजेताओं के प्राप्तांक हम अगले अंक में प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



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