Saturday, February 28, 2015

INTERVIEW OF LYRICIST HASRAT JAIPURI'S DAUGHTER KISHWARI JAIPURI

 बातों बातों में - 05

 गीतकार हसरत जयपुरी की पुत्री किश्वरी जयपुरी से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

"तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे..." 






नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते; काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज फ़रवरी माह का चौथा शनिवार है और आज प्रस्तुत है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार हसरत जयपुरी की पुत्री किश्वरी जयपुरी से की गई हमारी लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश।




किश्वरी जी, नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत है आपका ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर।

नमस्कार, और शुक्रिया मुझे याद करने के लिए।

हम बता नहीं सकते कि हमें कितनी ख़ुशी हो रही है कि हसरत जयपुरी साहब जैसे दिग्गज और लीजेन्डरी गीतकार की पुत्री, यानी कि आप आज हमारे बीच हैं और हमें आप के ज़रिए हसरत साहब की ज़िन्दगी और उनके गीतों से सम्बन्धित तमाम बातचीत करने का मौका मिल रहा है।

मुझे भी यकीनन बेहद ख़ुशी होगी, अपने डैडी के बारे में बताते हुए। 

किश्वरी जी, हसरत साहब के बारे में जो आम जानकारी है वो सब तो इन्टरनेट पर उपलब्ध है, उनके लिखे गीतों की फ़ेहरिस्त भी आसानी से मिल जाती है, इसलिए हमने सोचा कि आज के इस साक्षात्कार में हम आपसे कुछ ऐसे सवाल पूछें जो बिल्कुल एक्स्क्लूसिव हों। मेरा मतलब है कि एक बेटी की नज़र से हसरत साहब की शख़्सियत को हम जानना चाहेंगे।

जी ज़रूर! आप पूछ सकते हैं अपने सवाल।

शुक्रिया! सबसे पहले तो आप यह बताइए कि कैसा लगता है हसरत जयपुरी की बेटी कहलाना, वो हसरत जयपुरी जो हिन्दी फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के सबसे लोकप्रिय गीतकारों में से एक थे?

मुझे अपने डैडी की एकलौती बेटी बनने का जो मौका मिला है, इससे मैं अपने आप को बहुत ही ज़्यादा ख़ुशनसीब समझती हूँ, I feel extremely privileged। मैं अल्लाह का शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मुझे इस धरती पर रोमान्स के मशहूर शहंशाह की एकलौती बेटी बना कर भेजा है। इससे ज़्यादा और इससे बेहतर मैं कुछ नहीं माँग सकती थी। 

वाह, क्या बात है! वाकई आप ख़ुशक़िस्मत हैं कि आप हसरत जयपुरी की बेटी हैं। अच्छा किश्वरी जी, यह बताइए कि आपका जो बाल्यकाल था, यानी जब आप एक बच्ची के रूप में बड़ी हो रही थीं, वह दशक कौन सा दशक था?

मेरा जन्म साल 1963 को हुआ था और यह वह दौर था जब डैडी अपनी लोकप्रियता और कामयाबी की बुलन्दियों को छू रहे थे। 

जी, मेरा इशारा भी उसी तरफ़ था, मैं भी इसी बात पर आ रहा था कि हसरत साहब की उस सफल दौर में जब आप बड़ी हो रही थीं, तब क्या आपको यह अहसास था, क्या इतनी समझ थी उस वक़्त कि आप इतने बड़े गीतकार की बेटी हैं?

हसरत जयपुरी नन्ही किश्वरी के साथ
जी, जैसे जैसे मैं बड़ी हो रही थी, मेरा रिश्ता डैडी के गीतों के साथ जुड़ता और पनपता चला जा रहा था। मैं, मेरी माँ, मेरे दोनों भाई और डैडी, हम सब बैठ कर हमारे Philips Record Player पर उनके गीतों को सुना करते थे। अफ़सोस की बात है कि हम 40 और 50 के दशकों के उनके गीतों का आनन्द नहीं ले सके और उनकी कामयाबी के जश्नों को अपनी आँखों से नहीं देख सके। क्योंकि मेरा जन्म 1963 में हुआ, इसलिए 60 का दशक भी बहुत कम उम्र होने की वजह से समझ ही नहीं सकी। पर जैसे-जैसे बड़ी हुई, मैं उनके गीतों की तरफ़ खींचती चली गई, आकर्षित होती चली गई। उनका लहू मेरे रगों में दौड़ रहा है, इसलिए बाद में ही सही, पर मैं उनके गीतों से जुड़ ज़रूर गई।

हसरत साहब एक पिता के रूप में कैसे थे? किस तरह का सम्बन्ध था आप दोनों के बीच?

मेरा मेरे डैडी के साथ जो सम्बन्ध था वह इस दुनिया से परे था। यह रिश्ता बहुत ही ज़्यादा मज़बूत और बहुत ही ज़्यादा प्यार भरा था। क्योंकि मैं उनकी एकलौती बेटी थी, इसलिए लाड़-प्यार कुछ ज़्यादा ही करते थे। मैं उनकी आँखों का तारा थी, वो मुझसे इतना ज़्यादा प्यार करते थे कि अगर मैं कहती कि पिताजी, अभी दिन है, तो वो कहते हाँ दिन है, फिर चाहे वह रात ही क्यों न हो!

जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे... 

जी बिल्कुल! और फिर हर रात को सोने जाने से पहले वो हमारे बेडरूम में आते और हम तीनों से कहते - "अल्लाह इनकी हज़ारी उमर करे"। मैं क्या बताऊँ, वो एक बहुत ही ज़्यादा प्यार करने वाले पिता थे। आज भी मैं उन्हें बहुत ज़्यादा मिस करती हूँ, उनकी कमी को महसूस करती हूँ।

किश्वरी जी, मैं यही कह सकता हूँ कि भले वो शारीरिक रूप से हमारे बीच में नहीं हैं, पर उनका जो काम है, उनके जो लिखे हुए गीत हैं, वो हमेशा-हमेशा इस धरती पर गूँजते रहेंगे। इसलिए यह कहना अनुचित होगा कि आज वो हमारे बीच नहीं हैं। कलाकार भले इस फ़ानी दुनिया से चला जाए, पर उसकी कला अमर रहती है।

बिल्कुल सही कहा आपने!

पिता की गोद में किश्वरी; माँ और बड़े भाई के साथ
अच्छा किश्वरी जी, यह बताइए कि घर में सारे लोग जब मौजूद होते थे, पिताजी, माँ, दोनों भाई और आप, तो किस तरह का माहौल हुआ करता था घर में? अपनी यादों को ताज़ा करना चाहेंगी आप?

ज़रूर, पिताजी तो बड़े ही सीधे-सादे इंसान थे, फ़कीर थे, he was very down to earth। उन्हें मम्मी के हाथों से बना अच्छा मुग़लई खाना बहुत पसन्द था। शायरी तो ख़ैर उन्हें पसन्द थी। उन्होंने अपने तमाम सुनहरे हिट गीत हमारे खार स्थित एक बेडरूम-हॉल फ़्लैट में लिखे थे। 

यानी आप यह कहना चाहती हैं कि भीड़ में बैठ कर वो गाने लिखते थे, उन्हें एकान्त में लिखना पसन्द नहीं था? 
जी हाँ, क्योंकि वो God-gifted थे, उन्हें लिखने के लिए किसी तरह की प्राइवेसी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। मैंने उन्हें किसी गीत को मिनटों में लिखते हुए देखा है। वो छन्दों को इस क़दर लिख जाते थे कि जैसे ये छन्द उपर से उतार दिए हों किसी ने उन पर। जब वो किसी गीत के मुखड़े और अन्तरों को लिख डालते, तो वो माँ को बुलाते और कहते - "अजी सुनती हो, लो यह गाना सुनो"। अगर माँ उस कमरे में मौजूद ना हों तो ख़ुद किचन में चले जाते थे और खाना बनाती हुई मेरी माँ को उसी वक़्त अपना लिखा गाना सुनाने लग जाते।

बहुत ख़ूब! अच्छा आपने तो यह बता दिया कि हसरत साहब आपकी माँ को अपना लिखा हुआ गीत पढ़ कर सुनाते थे। क्या वो आप बच्चों को भी सुनाते थे या फिर किसी गीत को लिखते समय आप से सुझाव माँगते थे या आपकी राय लेते थे?

वो ज़्यादातर माँ के साथ ही अपने गीतों की चर्चा किया करते थे। कभी-कभार वो मुझे या मेरे भाइयों से अपने गीत को हिन्दी में लिखने के लिए कहते थे क्योंकि उन्हें हिन्दी लिखना और पढ़ना नहीं आता था।

"हिन्दी लिखना और पढ़ना नहीं आता था", मतलब???

जी हाँ, वो उर्दू में अपनी शायरी और गीत लिखते थे। उन्हें हिन्दी नहीं आती थी।

बहुत ही आश्चर्य हुआ यह जानकर। हिन्दी फ़िल्मों के सफलतम गीतकारों में से एक, और हिन्दी भाषा पढ़ना और लिखना नहीं जानते थे। कमाल की बात है! किश्वरी जी, यह बताइए कि क्या आपने कभी उन्हें किसी गीत में असिस्ट किया है?

एक गीत याद है मुझे जिसमें मैंने उनकी मदद की थी क्योंकि बहुत ही कम समय में उन्हें वह गीत तैयार करना था। और वह गीत था ’राम तेरी गंगा मैली’ फ़िल्म का "सुन साहिबा सुन प्यार की धुन"। "सुन साहिबा सुन" जुमला तैयार था, पर आगे का गीत उन्हें पूरा करना था। इसलिए उन्होंने मुझसे कहा कि "सुन" से तुकबन्दी करते हुए कुछ शब्द मैं सुझाऊँ। मैंने उन्हें "धुन", "चुन", "पुन", "बुन", "शगुन" जैसे शब्द सुझाए।

वाह क्या बात है, क्या बात है! इसका मतलब यह कि इस बेहद मशहूर गीत की सफलता में आपका भी योगदान रहा है। यह बड़ी ही अनोखी जानकारी आपने दी हमें। अच्छा उसके बाद क्या हुआ?

उसके बाद डैडी ने फ़टाफ़ट अन्तरों को पूरा किया और निकल गए। रेकॉर्डिंग् से वापस आकर उन्होंने मुझे 5000 रुपये इनाम में दिए, और मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा।

बहुत ख़ूब! गीतों की जब बात चल ही पड़ी है तो किश्वरी जी, यह बताइए कि हसरत साहब के लिखे अनगिनत गीतों में से वह एक गीत कौन सा है जिसे आप सबसे उपर रखना चाहेंगी, या जो आपको सबसे ज़्यादा अज़ीज़ है?

सबसे पसन्दीदा गीत तो वही गीत है जिसे Song of the Century कहा गया है, "बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है"। जैसे ही मेरे कानो में यह बात पहुँची कि डैडी के लिखे इस गीत को Song of the Century का ख़िताब दिया गया है, मैं तो जैसे आसमान में उड़ने लगी। डैडी हम सब से दूर जाने के बाद भी अमर हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं! अच्छा यह बताइए कि इस गीत की क्या ख़ास बात है?

इस गीत की सबसे बड़ी ख़ासियत तो यही है कि भले यह एक रोमान्टिक गीत है, पर डैडी ने इसे किसी ख़ूबसूरत लड़की की कल्पना करते हुए नहीं लिखा था। यह गीत तो उन्होंने हमारे प्रोफ़ेट मोहम्मद की शान में लिखा था। यह मुझे डैडी ने ख़ुद एक बार बताया था।

क्या बात है! यानी कि इस गीत को अगर गहराई से समझा जाए तो इसे एक आध्यात्मिक गीत का दर्जा भी दिया जा सकता है। 

जी हाँ।

मुझे याद है ऐसा ही एक गीत एस. एच. बिहारी साहब का लिखा हुआ है "है दुनिया उसी की ज़माना उसी का, मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का", इस गीत के साथ भी इसी तरह का क़िस्सा जुड़ा हुआ है।

जी।

किश्वरी जी, आपका सबसे चहीता गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में "बहारों फूल बरसाओ" है। पर एक टीम हुआ करती थी राज कपूर, शैलेन्द्र-हसरत, शंकर-जयकिशन और मुकेश की। तो मुकेश का गाया और आपके पिताजी का लिखा हुआ वह कौन सा गीत है जो आपके दिल के बहुत क़रीब है?

वह गीत यकीनन फ़िल्म ’संगम’ का है, "ओ महबूबा, तेरे दिल के पास ही है मेरी मंज़िल-ए-मक़सूद"। यह दरअसल राज जी के जज़्बात थे वैजयन्तीमाला जी के लिए, जिसे डैडी ने इस ख़ूबसूरत रूमानी शायरी का जामा पहनाया। और आपको बताऊँ, यह गीत बिल्कुल उस वक़्त लिखा गया था जब राज जी और वैजयन्तीमाला जी का रोमान्स सर चढ़ कर बोल रहा था फ़िल्म ’संगम’ के निर्माण के दौरान।

किश्वरी जी, हमने अभी-अभी टीम की बात की, तो उस ज़माने में क्या आपकी भी मुलाक़ातें हुईं शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र जी, लता जी, मुकेश जी, और रफ़ी साहब जैसे दिग्गज हस्तियों के साथ?

जब मैं छोटी थी, तब मैं शंकर अंकल, जय अंकल, मुकेश जी और राज कपूर जी से कई बार मिली जब ये लोग डैडी से मिलने हमारे घर पर आते थे। जय अंकल तो दीवाली पर हमारे घर आनेवाले लोगों में सबसे पहले होते थे अपने एक बड़े से मिठाई के डब्बे और ड्राई फ़्रूट्स के साथ। मैं बहुत ख़ुशक़िस्मत हूँ कि मुझे ग्रेट रफ़ी साहब और मन्ना दा से भी मिलने का मौका मिला जब मैं डैडी के किसी गीत की रेकॉर्डिंग् पर उनके साथ गई थी। रफ़ी साहब और मैंने एक दूसरे को सलाम किया और उन्होंने मेरे माथे को चूमा। आशा जी भी बहुत ही प्यार से मिलीं जब मैं अपने पति के साथ उनकी किसी रेकॉर्डिंग् पर गई थी। इस तरह से मेरी ख़ुशनसीबी ही कहूँगी कि मुझे ऐसे बड़े-बड़े कलाकारों से मिलने का मौक़ा नसीब हुआ अपने डैडी की वजह से।

हसरत साहब की बेटी बन कर जन्म लेना ही अपने आप में एक सौभाग्य है। अच्छा, किश्वरी जी, अब हम जानना चाहेंगे आपकी माताजी के बारे में। कहा जाता है कि हर कामयाब आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है, तो बताइए कि आपकी माताजी का आपके पिता की सफलता में कितना बड़ा योगदान था?

मेरी माँ मेरे डैडी का ताक़त स्तम्भ थीं। वो डैडी और उनकी कमाई का उचित देख-रेख किया करती थीं और चाहे ख़ुशहाली हो या तंगी, हर तरह के दिनों में, बिना किसी शर्त के, वो उनका साथ दिया करतीं। माँ डैडी के कई गीतों की प्रेरणा भी बनीं। "ग़म उठाने के लिए" एक ऐसा पछतावा भरा गीत है जिसे डैडी ने माँ के लिए लिखा था जिन्हे वो बहुत ज़्यादा प्यार करते थे।

"ग़म उठाने के लिए", आपका मतलब है फ़िल्म ’मेरे हुज़ूर’ का वह गीत?

जी हाँ।

"ग़म उठाने के लिए मैं तो जिए जाऊँगा, साँस की लय पे तेरा नाम लिये जाऊँगा"। बहुत ही ख़ूबसूरत गीत है यह।

"तू ख़यालों में मेरे अब भी चली आती है, अपनी पलकों पे उन अश्क़ों का जनाज़ा लेकर, तूने नींदे करी क़ुरबान मेरी राहों में, मैं नशे में रहा ग़ैरों का सहारा लेकर, ग़म उठाने के लिए मैं तो जिए जाऊँगा"

बहुत ख़ूब! अच्छा किश्वरी जी, यह गीत तो एक ऐसा गीत था जिसे हसरत साहब ने आपकी माताजी की याद में लिखा था। आप की राय में उनका लिखा वह कौन सा गीत होगा जिसे आप अपनी माँ की तरफ़ से हसरत साहब को समर्पित करना चाहेंगे?

"हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे"

वाह! वाह! क्या बात है!

"हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे" महज़ एक गीत नहीं है बल्कि ये प्यार की धाराएँ हैं जो स्वर्ग से धरती पर बरसी हैं। ऐसा गीत और कोई नहीं सिर्फ़ रोमान्स का बादशाह ही लिख सकता था। "हम प्यार के गंगाजल में बमलजी तन मन अपना धो बैठे"। यह गीत मुझे बेहद पसन्द है।

हम बात कर रहे थे आपकी माताजी की। उनसे जुड़ा और कोई वाक्या बताना चाहेंगी?

एक बार एक पार्टी में भगवान दादा और नादिरा जी मेरे डैडी से कहने लगे, "हसरत मिया, आप बहुत ख़ुशक़िस्मत हो जो आपको ऐसी बीवी मिली है, वरना आप जयपुर में या तो भीख माँग रहे होते या मज़दूरी कर रहे होते"। डैडी का जो ड्रीम-हाउस बंगला है ’ग़ज़ल’ के नाम से, उसके पीछे भी माँ का ही सबसे बड़ा हाथ है। डैडी माँ को ’बिलक़िस-ए-ज़मानी’ जिसका अर्थ है दुनिया की राजकुमारी। मेरी माँ का नाम बिलक़िस था।

वाह! किश्वरी जी, जब ऐसी रूमानियत भरी बातें हो रही हैं तो ऐसे में हसरत साहब के किस गीत का ज़िक्र करना चाहेंगी?

फ़िल्म ’तुमसे अच्छा कौन है" का लता जी और रफ़ी साहब का गाया "रंगत तेरी सूरत सी किसी में नहीं नहीं, ख़ुशबू तेरे बदन सी किसी में नहीं नहीं। युं तो हसीं लाख ह दुनिया की राह में, आता नहीं है कोई नहीं मेरी निगाहों में, तुझमें है जो अगन किसी में नहीं नहीं..."। इस गीत का हर एक लफ़्ज़ मोहब्बत की ख़ुशबू से भरा हुआ है। और यह गीत मुझे मेरी पहली मोहब्बत की भी याद दिला जाता है। मैं इस गीत को लगातार सुनती चली जा सकती हूँ और दिन के किसी भी वक़्त गुनगुना भी लेती हूँ।

वाह! एक वह दौर था, एक आज का दौर है। फ़िल्म-संगीत की धारा में बहुत सारे बदलाव आए हैं। तो आज के रोमान्टिक गीतों के बारे में आपके क्या विचार हैं?

आजकल के गीतों में रोमान्स के बारे में मेरा ख़याल यह है कि अब रोमान्स का वजूद ही नहीं है। डैडी के शब्दों में आज के गाने महज़ तुकबन्दी बन कर रह गए हैं। आज जिस तरह के गीत लिखे जा रहे हैं, कोई भी गीतकार बन सकता है, मैं भी लिख सकती हूँ।

क्या आपको भी लिखने का शौक़ है?

जी हाँ, थोड़ा बहुत लिख लेती हूँ। 

कुछ सुनाइए ना?

एक कविता जो मैंने डैडी को डेडिकेट करते हुए लिखा है, वह सुनाती हूँ।

ज़रूर!

हर एक मनज़र तमाशा दिखाई देता है
तेरे बिना सबकुछ फीका दिखाई देता है
अब आयें भी तो कहाँ से सदायें तेरी
ना तू है ना तेरा साया दिखाई देता है।

वाह! बहुत ख़ूब! पर एक हक़ीक़त यह भी है कि अपने गीतों के ज़रिए हसरत साहब हमेशा जीवित रहेंगे। एक और सुनाइए किश्वरी जी?

एक और ग़ज़ल सुनिए...
किस तरह जान को रोकूँ मैं, क्या करूँ मुझको यह ख़याल सताता है,
जाने का नाम जब भी लेता है वो, मैं क्या करूँ दिल मेरा डूब जाता है।

बहुत सुन्दर ग़ज़ल है! वैसे आपको हसरत साहब की कौन सी ग़ज़ल बहुत पसन्द है?

एक ग़ज़ल है फ़िल्म ’मेरे हुज़ूर’ फ़िल्म में रफ़ी साहब की आवाज़ में, "वह ख़ुशी मिली है मुझको", यह मुझे बहुत पसन्द है और हर प्यार करने वाला अपने आप को इस ग़ज़ल के साथ जोड़ सकता है।

इस ग़ज़ल के तमाम शेर आपको याद हैं?

जो गुज़र रही है मुझ पर, उसे कैसे मैं बताऊँ,
वह ख़ुशी मिली है मुझको, मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

मेरे दिल की धड़कनों का यह पयाम तुमको पहुँचे,
मैं तुम्हारा हमनशी हूँ, यह सलाम तुमको पहुँचे,
उसे बन्दगी मैं समझूँ जो तुम्हारे काम आऊँ
वह ख़ुशी मिली है मुझको मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

वाह!

मेरी ज़िन्दगी में हमदम कभी ग़म ना तुम उठाना,
कभी आए जो अन्धेरे मुझे प्यार से बुलाना,
मैं चिराग़ हूँ वफ़ा का, मैं अन्धेरे में जगमगाऊँ, 
वह ख़ुशी मिली है मुझको मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

और जो तीसरा शेर है, वह तो जैसे मेरे जसबात है डैडी के लिए....

मेरे दिल की महफ़िलों में वह मकाम है तुम्हारा,
कि ख़ुदा के बाद लब पर बस नाम है तुम्हारा,
मेरी आरज़ू यही है मैं तुम्हारे गीत गाऊँ,
वह ख़ुशी मिली है मुझको मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

वाह! क्या बात है! बहुत ही सुन्दर! अच्छा किश्वरी जी, क्या आपके दोनों भाई भी लिखते हैं? उन्हें भी शौक़ है?

जी नहीं, सिर्फ़ मैं ही थोड़ा-बहुत लिखती हूँ।

क्या नाम हैं आपके दो भाइयों के?

मेरे बड़े भाईसाहब का नाम है अख़्तर हसरत जयपुरी और मेरा छोटा भाई है आसिफ़ जयपुरी।

अच्छा किश्वरी जी, और कौन कौन से गीत हैं हसरत साहब के जो आपको पसन्द हैं?

मुकेश जी का गाया फ़िल्म ’दीवाना’ का गीत "तारों से प्यारे दिल के इशारे, प्यासे हैं अरमान आ मेरे प्यारे" मुझे बहुत पसन्द है। इस गीत को डैडी ने इतने प्यार से लिखा है कि जब भी मैं यह गीत सुनती हूँ तो रोमान्स की एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाती हूँ। यह गीत सच्चे प्यार की ताक़त को बयान करता है...  आना ही होगा तुझे आना ही होगा...। फ़िल्म ’आख़िरी दाँव’ का एक गीत है "ऐसा ना हो कि इन वादियों में मैं खो जाऊँ, और तुम मुझे ढूंढा करो और मैं लौट के ना आऊँ", यह भी रफ़ी साहब का गाया हुआ है। डैडी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जी के ज़बरदस्त फ़ैन थे और उनकी एक दिली तमन्ना थी एल.पी के साथ काम करने की। इस तरह से लक्ष्मी-प्यारे जी की यह राजसी कम्पोज़िशन जिसे रफ़ी साहब की दिव्य आवाज़ ने संवारा है, मेरे दिल के बहुत करीब है क्योंकि यह मुझे डैडी की याद दिला जाता है। एक और गीत, यह भी रफ़ी साहब का ही गाया हुआ, "रुख़ से ज़रा नक़ाब उठा दो, मेरे हुज़ूर"। शहद से भरी हुई यह ग़ज़ल, और शायद ’मेरे हुज़ूर’ फ़िल्म के शीर्षक गीत के रूप में इससे बेहतर गीत नहीं सकता था। मिठास और ख़ुशबू लिए यह ग़ज़ल हर प्यार करने वाले को समर्पित है। फ़िल्म ’आरज़ू’ की ग़ज़ल "अजी रूठ कर अब कहाँ जाइयेगा" भी मुझे बेहद पसन्द है। डैडी ने प्यार के बेहद नाज़ुक शब्दों का इस्तेमाल इसमें किये हैं, जितनी भी तारीफ़ करूँ रुकती नहीं ज़ुबाँ। राजसी ग़ज़ल!

वाक़ई एक से बढ़ कर एक रचनाएँ हैं ये सभी, और आपकी पसन्द की भी दाद देता हूँ किश्वरी जी।

शुक्रिया!

किश्वरी जी, अब हम इस साक्षात्कार के अन्तिम चरण में पहुँच गए हैं। यह बताइए कि आपकी हसरत साहब से अन्तिम मुलाक़ात कब हुई थी?

डैडी से जो मेरी अन्तिम मुलाक़ात थी वह बहुत ही दिल को छू लेने वाली और दिल को मरोड़ कर रख देने वाली थी। मैं साल 1999 में भारत आई थी और यहाँ तीन महीने रही। तीन महीने ख़त्म हो गए और मेरे वापस जाने का समय आ गया। मुझे याद है कि जब मैं एअरपोर्ट के लिए निकल रही थी तब डैडी ने कस के मुझे गले से लगा लिया और ज़ोर ज़ोर से रोने लगे और कहने लगे कि बेटा, यह हमारी आख़िरी मुलाक़ात है। और हाँ, उनकी यह भविष्यवाणी सच साबित हुई और मेरे चले जाने के एक महीने बाद ही उनका देहान्त हो गया। मैंने उन्हें उस तरह से रोते हुए कभी नहीं देखा था पहले। उस दिन को याद करते हुए आज भी मेरी आँखें भर आती हैं।

मैं समझ सकता हूँ। आपको बस हसरत साहब का ही लिखा एक गीत याद दिलाना चाहूँगा, "तुम मुझे युं भुला ना पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग संग तुम भी गुनगुनाओगे.."

बिल्कुल सच बात है!

चलते-चलते हसरत साहब के किस गीत के ज़िक्र से इस मुलाक़ात को आप अंजाम देना चाहेंगी?

यकीनन "जाने कहाँ गए वो दिन...", एक बहुत ही दिल को मरोड़ कर रख देने वाला गीत, जो पैथोस से भरा हुआ है। इस गीत में डैडी ने जैसे अपनी निजी भावनाओं को ही गीत की शक्ल में उतार दिए हों, यह वह समय था जब उनके तथाकथित ’good friends' ने उनका साथ छोड़ दिया था। डैडी जब भी कभी यह सुनते, रोने लगते। मैं भी जब भी कभी यह गीत सुनती हूँ, मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

किश्वरी जी, बहुत-बहुत शुक्रिया आपका, आपने हमें इतना लम्बा समय दिया, हसरत साहब की इतनी सारी बातें हमें बताईं, उनके गीतों की चर्चा कीं, ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से और अपने पाठकों की तरफ़ से, और मैं अपनी तरफ़ से आपको बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ, नमस्कार!

आपका भी बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने मुझे याद किया और डैडी से जुड़ी बातें बताने का मौका दिया। नमस्कार!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए।  



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Sunday, February 22, 2015

तराना : SWARGOSHTHI – 208 : TARANA RECITAL


स्वरगोष्ठी – 208 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 6 : तराना

सार्थक शब्दों की अनुपस्थिति के बावजूद रसानुभूति कराने में समर्थ तराना शैली




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नयी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली कड़ी से हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय ‘खयाल’ शैली का परिचय आरम्भ किया है। आज के अंक में हम खयाल शैली के साथ अभिन्न रूप से सम्बद्ध ‘तराना’ शैली पर सोदाहरण चर्चा करेंगे। तराना रचनाओं में सार्थक शब्द नहीं होते। परन्तु रचना से रसानुभूति पूरी होती है। आज के अंक में हम आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वरों में राग हंसध्वनि के तराना का रसास्वादन कराते हैं। इसके अलावा लगभग छः दशक पुरानी फिल्म ‘लड़की’ से सुविख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर गाये एक गीत का अंश भी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें उन्होने राग चन्द्रकौंस का तराना गाया है।
 



रम्परागत भारतीय संगीत की शैलियों में खयाल शैली वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित है। वर्तमान शास्त्रीय संगीत से यह इतनी घुल-मिल गई है कि इसके बिना रागदारी संगीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसकी लोकप्रियता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि वाद्य संगीत पर भी खयाल बजाया जाता है। खयाल शैली विकास अठारहवीं शताब्दी से हुआ है। खयाल शब्द फारसी भाषा का है, जो संस्कृत के ‘ध्यान’ शब्द का पर्याय है। प्राचीन ग्रन्थकार मतंग के काल में विभिन्न रागों को ध्यान शैली में गायन का उल्लेख मिलता है। सम्भव है ध्यान परम्परा से खयाल शैली का सम्बन्ध हो। खयाल शैली का सम्बन्ध सूफी संगीत से भी जुड़ता है। सूफी काव्य में भी खयाल नाम से एक प्रकार प्रचलित रहा है। कुछ विद्वान खयाल शैली पर मध्यकाल के लोक संगीत का प्रभाव भी मानते हैं। आज भी राजस्थान, ब्रज और अवध क्षेत्र में खयाल नामक लोक संगीत का एक प्रकार प्रचलित है। एक खयाल रचना के तीन भाग होते हैं; अत्यन्त संक्षिप्त आलाप, विलम्बित खयाल और द्रुत खयाल। खयाल के भी दो भाग हो जाते हैं; स्थायी और अन्तरा। स्थायी और अन्तरा के लिए एक संक्षिप्त सी पद की रचना भी होती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत स्वर-प्रधान है। अधिकतर विद्वान शब्दों को स्वर के आरोहण का एक माध्यम ही मानते हैं और राग के स्वरों की अपेक्षा शब्दों को विशेष महत्त्व नहीं देते। परन्तु कुछ विद्वान खयाल गायन में शब्दों के उच्चारण पर विशेष बल देते हैं। इनका मानना है कि स्वरो में रस के निष्पत्ति की सीमित सम्भावना होती है, जबकि शब्दों अर्थात साहित्य को जब स्वरों का संयोग मिलता है तब सभी नौ प्रकार के रसों की सृष्टि सहज हो जाती है। विलम्बित, मध्य और द्रुत खयाल के साथ ही तराना गायकी का विशेष महत्त्व है। तराना की संरचना मध्य या द्रुत लय के खयाल जैसी होती है, अन्तर इसकी शब्द रचना में होता है। खयाल के स्थायी और अन्तरा में सार्थक शब्दों की रचना होती है, जबकि तराना मे निरर्थक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। ये शब्द सार्थक नहीं होते किन्तु लय के प्रवाह सरलता से घुल-मिल जाते हैं। कुशल कलासाधक तराना के इन्हीं निरर्थक साहित्य के माध्यम सार्थक रसानुभूति कराने में समर्थ होते हैं। तराना के उदाहरण के लिए आज के अंक में हमने राग हंसध्वनि के एक मोहक तराना का चुनाव किया है। यह तराना सुविख्यात संगीत-विदुषी परवीन सुल्ताना प्रस्तुत कर रही हैं। हमारी यह चर्चा जारी रहेगी, पहले आप यह तराना सुनिए।


राग हंसध्वनि : आलापचारी और द्रुत तीनताल का तराना : बेगम परवीन सुल्ताना




स्वर-विस्तार की प्रधानता होने कारण खयाल में आलाप का महत्त्व सीमित हो गया है। इस शैली में ध्रुपद जैसी स्थिरता और गम्भीर गमक के अलावा छूट, मुरकी, जमजमा आदि का महत्त्व बढ़ जाता है। आरम्भिक काल के खयाल में तानों का प्रयोग नहीं होता था। बाद में जब घरानों की स्थापना हुई तो तानों का प्रयोग वैचित्र्य के लिए किया जाने लगा। यही नहीं इस शैली में सरगम का प्रयोग भी बाद में शुरू हुआ। तराना गायकी में लयकारी का विशेष महत्त्व होता है। फिल्म संगीत में कई संगीतकारों ने तराना का इस्तेमाल किया है। 1953 में ए.वी.एम. प्रोडक्शन की एक फिल्म ‘लड़की’ के एक गीत में तराना का प्रयोग किया गया था। इस फिल्म के संगीतकार धनीराम ने फिल्म के एक नृत्यगीत के अन्त में राग चन्द्रकौंस के संक्षिप्त तराना को जोड़ा था। फिल्म में यह गीत अभिनेत्री और नृत्यांगना वैजयन्तीमाला द्वारा मंच पर प्रस्तुत किये जा रहे नृत्य में शामिल किया गया था। मूल गीत के बोल हैं- ‘मेरे वतन से अच्छा कोई वतन नहीं है...’। गीतकार राजेंद्र कृष्ण की इस रचना के अन्तिम डेढ़ मिनट की अवधि में संगीतकार धनीराम ने राग चन्द्रकौंस का ताराना इस्तेमाल किया था। पूरा गीत और अन्त का तराना लता मंगेशकर ने गाया है। आप गीत का तराना वाला हिस्सा सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग चन्द्रकौंस : फिल्म लड़की : गीत ‘मेरे वतन से अच्छा...’ का तराना अंश : लता मंगेशकर 





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 208वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।

3 – इस रचना के गायक को पहचानिए और उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 28 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 206वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की एक पुरानी रेकार्डिंग का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल विलम्बित एकताल। इस बार पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी है हमारी लघु श्रृंखला- ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत वर्तमान में भारतीय संगीत की जो भी शैलियाँ प्रचलन में हैं, उनका सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। आज आपने खयाल शैली से जुड़े तराना का परिचय प्राप्त किया। अगले अंक में हम आपका परिचय संगीत की किसी अन्य प्रकार से कराएंगे। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा को निखारने का अवसर सहर्ष देंगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



Saturday, February 21, 2015

‘जाओ रे जोगी तुम जाओ रे...’ - एक दिन के अन्दर बन कर तैयार हुआ था यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 53
 

जाओ रे जोगी तुम जाओ रे...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 53वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'आम्रपाली' के मशहूर गीत "जाओ रे जोगी तुम जाओ रे" से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें। 



फ़िल्म संगीत जगत में कुछ संगीतकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने करिअर के शुरुआत में धार्मिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में संगीत देने की वजह से "टाइप-कास्ट" हो गए और जिसकी वजह से सामाजिक और पॉपुलर फ़िल्मों में संगीत कभी नहीं दे सके। पर ऐसा भी नहीं कि इन संगीतकारों को धार्मिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में बड़ी सफलता प्राप्त हुई हो। तब इन संगीतकारों ने यह तर्क दिया कि इन जौनरों के गीतों को सफलता नहीं मिलती है। इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता क्योंकि संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने यह कई बार साबित किया है कि फ़िल्म चाहे सामाजिक हो या धार्मिक, या फिर ऐतिहासिक, अगर संगीतकार में काबिलियत है तो उसे सफलता की बुलन्दी तक पहुँचा सकता है। 'हलाकू', 'यहूदी' और 'आम्रपाली' आदि ऐसी फ़िल्में हैं जो ऐतिहासिक और पौराणिक जौनर के होते भी अपने गीत-संगीत की वजह से बेहद कामयाब रहीं। 'आम्रपाली' लेख टंडन की फ़िल्म थी जिसमें वैजयन्तीमाला और सुनील दत्त मुख्य किरदारों में थे। फ़िल्म की कहानी 500 BC काल के वैशाली राज्य की नगरवधू आम्रपाली पर केन्द्रित थी। मगध साम्राज्य के राजा अजातशत्रु आम्रपाली से प्यार करने लगता है और उसे पाने के लिए वैशाली को तबाह कर देता है। पर तब तक आम्रपाली गौतम बुद्ध के विचारों से प्रभावित होकर बुद्ध के शरण में चली जाती है। इस फ़िल्म को लेख टंडन ने इतनी ख़ूबसूरती के साथ परदे पर उतारा कि इस फ़िल्म को उस साल ऑस्कर के लिए भारत की तरफ़ से 'Best Foreign Language Film' के लिए भेजा गया। फ़िल्म को बॉक्स ऑफ़िस पर भले बहुत ज़्यादा कामयाबी न मिली हो पर इसे एक क्लासिक फ़िल्म का दर्जा दिया गया है। फ़िल्म के गीत-संगीत ने भी फ़िल्म को चार-चाँद लगाए। शंकर-जयकिशन के शास्त्रीय-संगीत पर आधारित इस फ़िल्म की रचनाएँ आज भी कानों में शहद घोलती है। फ़िल्म में कुल पाँच गीत थे, जिनमें से चार गीत लता मंगेशकर की एकल आवाज़ में थे ("नील गगन की छाँव में...", "तड़प ये दिन रात की...", "जाओ रे जोगी तुम जाओ रे...", "तुम्हे याद करते करते जायेगी रैन सारी...") और पाँचवाँ गीत "नाचो गाओ धूम मचाओ..." एक समूह गीत था। इनमें से केवल एक गीत "नील गगन की छाँव में" हसरत जयपुरी का लिखा हुआ था, और बाक़ी चार गीत शैलेन्द्र के थे।

और अब बारी एक मज़ेदार क़िस्से की। गीत बन रहा था "जाओ रे जोगी तुम जाओ रे"। रेकॉर्डिंग स्टूडियो में शंकर, जयकिशन, शैलेन्द्र और लता मंगेशकर इस गीत का रिहर्सल कर रहे थे। संयोग से राज कपूर भी किसी काम से उस स्टूडियो में उस समय मौजूद थे। इस गीत की धुन उनके कानों में पड़ते ही वो उठ खड़े हुए और रिहर्सल के जगह पर पहुँच गए। उन्होंने शंकर-जयकिशन से कहा कि यह धुन तो मेरी है, इसे तुम लोग किसी और की फ़िल्म में कैसे इस्तेमाल कर सकते हो? दरसल बात ऐसी थी कि जिस धुन पर "जाओ रे जोगी तुम..." को बनाया गया था, वह धुन इससे पहले शंकर जयकिशन ने राज कपूर की किसी फ़िल्म के लिए बनाई थी जिसका इस्तेमाल राज कपूर ने उस फ़िल्म में नहीं किया था। इसलिए शंकर-जयकिशन यह समझ बैठे कि राज साहब को वह धुन नहीं चाहिए। पर राज कपूर उस धुन का इस्तेमाल अपनी आनेवाली किसी फ़िल्म में करना चाहते थे। तो उस रिहर्सल रूम में राज कपूर से यह ऐलान कर दिया कि वो इस धुन का इस्तेमाल 'मेरा नाम जोकर' के किसी गीत में करना चाहते हैं, इसलिए "जाओ रे जोगी" के लिए शंकर-जयकिशन कोई और धुन बना ले। यह कह कर राज कपूर वहाँ से चले गए। एक पल के लिए जैसे रूम में सन्नाटा हो गया। लेख टंडन एक समय राज कपूर के सहायक हुआ करते थे और राज कपूर से उन्होंने फ़िल्म निर्माण के महत्वपूर्ण पहलू सीखे थे; ऐसे में वो राज कपूर के ख़िलाफ़ कैसे जाते या उनसे बहस करते, पर अब इस उलझन से कैसे निकले?

लेख टंडन
स्टूडियो की चुप्पी को तोड़ा लता मंगेशकर ने। उन्होंने हारमोनियम को अपनी तरफ़ खींचा और ऐलान किया कि चलिए हम एक और गीत बनाते हैं! शंकर-जयकिशन ने मिनटों में मुखड़े की धुन बना दी, और शैलेन्द्र के मुख से भी तुरन्त मुखड़े के बोल निकल पड़े "जाओ रे जोगी तुम जाओ रे, यह प्रेमियों की नगरी, यहाँ प्रेम ही है पूजा"। लता जी के मुख से इस मुखड़े की अद्भुत अदायगी को सुन कर सब ख़ुशी से उछल पड़े। पर अभी भी उलझन खतम नहीं हुई, मुखड़ा तो बन गया, पर अन्तरे इतनी जल्दी कैसे बनेंगे! तब शैलेन्द्र ने यह ऐलान कर दिया - "इस वक़्त 10 बज रहे हैं, सभी को 3 बजे वापस बुलाओ, मेरा गाना पूरा हो जाएगा"। यह कह कर शैलेन्द्र ने लेख टंडन को अपनी कार में बिठाया और 'आरे मिल्क कॉलोनी' ले गए। जाते हुए बीअर की कुछ बोतलें भी साथ ले लिए। आरे कॉलोनी की सुन्दर गलियों में टहलते हुए शैलेन्द्र मुखड़े को गुनगुनाए जा रहे थे, पर लाख कोशिशें करने के बावजूद अन्तरे का कुछ भी उन्हें सूझ नहीं रहा था। टहलते टहलते घड़ी के काँटें भी आगे बढ़ते चले जा रहे थे। घड़ी में 3 बजने में जब कुछ ही समय बाक़ी थे, तब लेख टंडन घबराते हुए शैलेन्द्र से पूछा कि अब क्या होगा? शैलेन्द्र ने सीधे सीधे उनसे माफ़ी माँग ली और कहा कि आज की रेकॉर्डिंग रद्द करनी पड़ेगी। वापसी में गाड़ी में लेख टंडन और शैलेन्द्र की बीच कोई भी बातचीत नहीं हुई। शायद लेख साहब शैलेन्द्र जी से ख़फ़ा हो गए थे। स्टूडियो के बाहर पहुँचते ही जब दोनों ने लता जी की गाड़ी को खड़ा देखा तो लेख साहब डर गए और शैलेन्द्र से कहा, "अब आप ही उन्हें सम्भालिएगा, हमने उनका पूरा दिन खराब कर दिया, वो बहुत नाराज़ होंगी"। शैलेन्द्र सिर्फ़ मुस्कुराए।

स्टूडियो के अन्दर पहुँच कर दोनों ने देखा कि लता मंगेशकर काँच से घिरे सिंगर के केबिन में पहुँच चुकी हैं। लेख टंडन ने मॉनिटर रूम में जाते हुए शैलेन्द्र जी से कहा कि वो जाकर लता जी से बात करे। शैलेन्द्र और लता के बीच क्या बातचीत हो रही थी यह लेख साहब को पता नहीं चला, वो सिर्फ़ शीशे से देख रहे थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर इतनी क्या बातें हो रही हैं दोनों में जबकि गाना लिखा ही नहीं गया है। अपनी उत्सुकता को काबू में न रख पाते हुए लेख टंडन ने रेकॉर्डिस्ट से कहा कि वो सिंगर का माइक्रोफ़ोन ऑन कर दे ताकि वो वहाँ क्या चल रहा है उसे सुन सके। जैसे ही माइक्रोफ़ोन ऑन हुआ तो जो शब्द उनके कान में गए वो थे - "शैलेन्द्र जी, बस... दो ही अन्तरे काफ़ी हैं इस गाने के लिए... बहुत अच्छे हैं!" लेख टंडन चकित रह गए। उन्हें ज़रा सा भी पता नहीं चला कि कविराज शैलेन्द्र ने किस समय ये अन्तरे बना लिए थे। शायद आरे कॉलोनी से वापस आते समय गाड़ी में जो चुप्पी साधे दोनो बैठे थे, उस वक़्त वो असल में अन्तरे ही रच रहे थे। क्या लिखा है शैलेन्द्र ने, राग कामोद के सुरों का आधार लेकर क्या कम्पोज़ किया है शंकर जयकिशन ने और क्या गाया है लता मंगेशकर ने। आप भी सुनिए।


फिल्म आम्रपाली : 'जाओ रे जोगी तुम जाओ रे...' : लता मंगेशकर : शंकर जयकिशन : शैलेन्द्र 


अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, February 15, 2015

राग ललित और बसन्त में खयाल : SWARGOSHTHI – 207 : KHAYAL RECITAL


स्वरगोष्ठी – 207 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 5 : खयाल

राग ललित और बसन्त में आलाप, विलम्बित और द्रुत खयाल



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की पाँचवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली चार कड़ियों में हमने भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली ‘ध्रुपद’ शैली का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किया था। आज के अंक से हम वर्तमान में सबसे लोकप्रिय ‘खयाल’ शैली का परिचय आरम्भ कर रहे हैं। आज के अंक में पुराने उस्तादों- उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में विलम्बित और द्रुत खयाल के साथ आलाप का उदाहरण भी हम प्रस्तुत करेंगे। आज प्रस्तुत किये जाने वाले राग हैं, ललित और बसन्त। 



भारतीय संगीत में ध्रुपद शैली के बाद जिस शैली का विकास हुआ उसे हम आज की सबसे लोकप्रिय और प्रचलित शैली ‘खयाल’ के नाम से जानते हैं। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक अनेक कारणों से जनरुचि में पर्याप्त बदलाव आ चुका था। संगीत मन्दिरों से निकल कर राजदरबारों में पहले ही स्थापित हो चुका था। ध्रुपद संगीत से प्रभावित होकर सूफी संगीत भी अस्तित्व में आ चुका था। कई विद्वान मानते हैं कि खयाल शैली पर सूफी संगीत का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है। ‘खयाल’ शब्द फारसी भाषा का है, जिसका अर्थ ‘कल्पना’ होता है। मध्यकाल में खयाल नामक एक लोक संगीत की शैली भी प्रचलित थी। सम्भव है इस लोक शैली का प्रभाव भी खयाल शैली पर पड़ा हो। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्क़ी को खयाल शैली का प्रवर्तक माना जाता है। अठारहवीं शताब्दी में मुहम्मद शाह रँगीले के दरबारी संगीतज्ञ नियामत खाँ ‘सदारंग’ ने इस शैली को शास्त्रीय संगीत के रूप में प्रतिष्ठित किया। खयाल शैली की भाषा ध्रुपद की भाँति संस्कृतनिष्ठ न होकर तत्कालीन प्रचालित ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी, अवधी और भोजपुरी से प्रभावित हुई। इसके अलावा खयाल शैली में सदारंग ने आलाप के महत्त्व को कम करते हुए राग-विस्तार अथवा स्वर-विस्तार को अधिक महत्त्व दिया। खयाल शैली में आलाप का अंदाज़ खयाल अंगों के अनुरूप होता है। आगरा घराने के गायक ध्रुपद जैसा आलाप करते हैं। आज हम आपको खयाल शैली में ध्रुपद अंग जैसा आलाप और एक द्रुत खयाल उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ की आवाज़ में सुनवाते हैं।

भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो हमारे सामने आता है, वह है, आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में कराते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ उन्ही में से एक थे। ध्रुपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा आदि सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस की वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना गुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बना लिया और पालन-पोषण के साथ ही संगीत के शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। अब हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग ललित का आलाप और खयाल अंग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं।

राग ललित : आलाप और बन्दिश : ‘तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




खयाल गायकी में स्वर-विस्तार की प्रधानता होने के कारण आलाप सीमित हो जाता है। खयाल के शुरुआती दौर में तानों का प्रयोग नहीं होता था। बाद में जब घरानों का निर्माण हुआ तब गायकी में रंजकता और चमत्कार उत्पन्न करने के लिए तानों का प्रचलन हुआ। खयाल में स्थायी और अन्तरा, दो भाग होते हैं। स्थायी में अपेक्षाकृत शब्द कम होते हैं, जिससे ताल के आवर्तन में बोलतानों के गाने में सुविधा रहे। विलम्बित या बड़ा खयाल प्रायः एकताल, तिलवाड़ा, झूमरा, आड़ा चौताल आदि तालों में और मध्य-द्रुत खयाल या छोटा खयाल तीनताल, एकताल, झपताल, रूपक आदि तालों में निबद्ध होते हैं। पखावज के स्थान पर तबला की संगति की जाती है। अब हम आपके लिए विलम्बित और मध्य-द्रुत खयाल का एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। अपने समय के सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों मे राग बसन्त में विलम्बित और द्रुत खयाल प्रस्तुत है।

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ ऐसे गवैये थे जिन्होने सम्पूर्ण भारतीय संगीत का प्रतिनिधित्व किया। वे उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। उन्होने दक्षिण के कर्नाटक संगीत के कई रागों को उत्तर भारतीय संगीत में शामिल किया और सरगम के विशिष्ट अन्दाज को उत्तर भारत में प्रचलित किया। उनकी कल्पना विस्तृत और अनूठी थी, जिसके बल पर उन्होने भारतीय संगीत को एक नया आयाम और क्षितिज प्रदान किया। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही प्रतिष्ठित संगीत सभाओं में गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। खाँ साहब के स्वरों में जैसी मधुरता, जैसा विस्तार और जैसी शुद्धता थी वैसी अन्य किसी गायक को नसीब नहीं हुई। वे विलम्बित खयाल में लयकारी और बोलतान की अपेक्षा आलाप पर अधिक ध्यान रखते थे। उनके गायन में वीणा की मींड़, सारंगी के कण और गमक का मधुर स्पर्श होता था। रचना के स्थायी और एक अन्तरे में ही खयाल गायन के सभी गुणो का प्रदर्शन कर देते थे। अपने गायन की प्रस्तुति के समय वे अपने तानपूरे में पंचम के स्थान पर निषाद स्वर में मिला कर गायन करते थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। आइए, अब हम उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में राग बसन्त में निबद्ध दो खयाल सुनते हैं। विलम्बित एकताल के खयाल के बोल हैं- ‘अब मैंने देखे...’ तथा द्रुत तीनताल की बन्दिश के बोल हैं- ‘फगुआ ब्रज देखन को चलो री...’।

राग बसन्त : विलम्बित खयाल ‘अब मैंने देखे...’ और द्रुत खयाल ‘फगुआ ब्रज देखन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 207वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन प्रश्नों में से कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – भारतीय संगीत की यह कौन सी शैली है? शैली का नाम बताइए।

2 – संगीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

3 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 21 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 209वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 205वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद असद अली खाँ का रुद्रवीणा पर बजाये राग आसावरी का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछे थे। आपको इनमे से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। यह हमारे लिए अत्यन्त सुखद था कि सभी प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य रुद्रवीणा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग आसावरी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल चौताल। इस बार की पहेली में पूछे गए प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक से हमने संगीत के खयाल शैली का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

Saturday, February 14, 2015

प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर डॉ. प्रकाश जोशी से मुलाक़ात



स्मृतियों के स्वर - 16




प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर डॉ. प्रकाश जोशी से मुलाक़ात





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। इस स्तम्भ के माध्यम से हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज हम आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर डॉ. प्रकाश जोशी से। डॉ. जोशी हमें सैर करवायेंगे गुज़रे ज़माने के कुछ हसीन सुरीले नज़ारों के, और साथ ही ज़िक्र भूले-बिसरे साज़िन्दों का जो हिस्सा थे उन सदाबहार नग़मों के। 





सूत्र: जुबिली झंकार, विविध भारती, 3 अक्तूबर 2008



डॉ. साहब, सबसे पहले तो हम यह जानना चाहेंगे कि फ़िल्म-संगीत का जो यह पूरा का पूरा इतिहास छुपा हुआ है आपके घर में, उसके बारे में कुछ बताएँ। 

नारायणराव व्यास
शुरुआत तो बचपन से ही हुई है। जब मैं छोटा था, तो मेरे पिताजी भजन और पुराने जो 78 RPM के रेकॉर्ड्स का उनके चाचाजी के पास बहुत बड़ा कलेक्शन था; और ऐसे ऐसे सब कलाकार थे, नारायण राव व्यास, बाल गंधर्व, अमीरबाई, उनके सब 78 RPM रेकॉर्ड्स वो लाया करते थे। हमारे घर के पीछे एक बगीचा था, फूलों में पानी डालते हुए, मुझे अभी तक याद है, "राधे कृष्ण बोल मुख से", नारायण राव व्यास जी का बहुत बढ़िया भजन था, हम सुना करते थे। फिर क्या है मेरी माताजी भी बहुत गाने गाया करती थीं। जैसे "शान्ता सागरी कशा सा उठवली सवादडे...", ऐसा एक बहुत फ़ेमस सॉंग हुआ करता था। हमारे यहाँ जो पहली रेकॉर्ड आयी थी, वह 'तराना' फ़िल्म की थी और पहला गाना था "सीने में सुलगते हैं अरमान"। यह जो गाना है, वह रचने वाले प्रेम धवन साहब, गाने वाले तलत साहब, और संगीतकार अनिल बिस्वास साहब, तीनो एक साथ मेरे घर में आयेंगे और अपने गाने का लुत्फ़ उठायेंगे, वह मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। मुझे लगा, 'oh my God, what I have achieved!'


अच्छा डॉ साहब, कलाकारों से मिलने का मौका और ये सब कैसे संभव हुआ? यह प्रैक्टिस कब से शुरु हुई आपकी?

दत्ता डावजेकर
बस, 1970 के आसपास। फिर जैसे जैसे रेकॉर्ड मिलते गये, मैं एक एक करके कलेक्ट करता गया। पहले तो चोर बज़ार, फिर मैंने कराची से, लंदन से, दुबई से, फिर ईस्ट में भी काफ़ी पिक्चर्स मिले, फिर लंदन से भी मुझे अच्छे अच्छे पिक्चर्स मिले जो यहाँ पर नहीं थे उपलब्ध। तो कम्पाइलेशन का दौर वहाँ से चालू हुआ। सबसे पहले मैंने विडियो कम्पाइलेशन किया मधुबाला का। लेकिन पर्दे के उपर फ़िल्म 'आराम' का एक गीत है "मन में किसी का प्रीत बसा ले ओ मतवाले ओ मतवाले", लता जी का गीत है, अनिल दा का संगीत है, और जब अनिल दा हमारे घर आये थे तो सनी कास्तोलिनो जो कलाकार था, जिसका वो हमेशा ज़िक्र करते थे, और इस गाने में जो पियानो बजा है, वह सनी कास्तोलिनो, जो गोवा के आर्टिस्ट हैं, उनका बजाया हुआ है और ऐसे पियानो के सॉंग्स बहुत कम है। लता जी ने 'छत्रपति शिवाजी' नाम से एक फ़िल्म थी, उस फ़िल्म में उन्होंने ख़ुद भी काम किया था, और गाने भी गाये थे, लेकिन यह कहा जाता है कि 'आपकी सेवा में' जो फ़िल्म थी, दत्ता डावजेकर का संगीत था, मैं यह कहना चाहूंगा कि दत्ता डावजेकर अनिल दा को अपना गुरु मानते थे। उनका जो लता जी का पहला गाना है, 'आपकी सेवा में' का, "पा लागूँ कर जोरी रे, श्याम ना मारो पिचकारी", इतना बढ़िया गाना और इतनी यंग है लता जी, और पूरा बैठक में जो ठुमरी होती है, बैठक की ठुमरी, वही उस गाने में, और क्या लता जी की आवाज़ लगी है!


डॉ साहब, हम आपसे जानना चाह रहे थे कि जो बड़े-बड़े कलाकार आपके घर में आये थे, उसके बारे में कुछ और हमें बतायें?

अभी तक मुझे याद है जब अनिल दा, सलिल दा और प्रेम धवन जी आये थे, तो बस वो भी अपने पुराने ज़माने में खो गये थे। वो बात करते करते एक बात बता दी, कि प्रेम धवन जी का एक जुहु में बंगला था। तो हर रविवार की सुबह वहाँ पे ऐसी महफ़िल जमती थी और कौन कौन साहब आते थे - सलिल चौधरी, अनिल दा, प्रेम धवन, मीना कपूर, साहिर लुधियानवी, पंडित नरेन्द्र शर्मा, रामानन्द सागर, रोशन साहब भी कभी कभी आया करते थे। और वो उस सप्ताह में कौन कौन सी अच्छी अच्छी धुनें बनाई वो सब के सामने पेश करते थे। अनिल दा ने रोशन साहब के बारे में यही बताया था कि रोशन जैसा इन्टरल्यूड म्युज़िक बहुत ही कम लोग बना सकते हैं। अनिल दा ख़ुद बोले कि ऐसा इन्टरल्यूड म्युज़िक मैं नहीं बना सकूंगा। शहनाई, सितार, बांसुरी और क्या मिलाप होता है साज़ों का, I just can't describe, ऐसा कहा था उन्होने।


जैसा कि आप ने रोशन साहब के बारे में बताया कि उनका इन्टरल्यूड बहुत अच्छा होता था, इसी तरह अनिल बिस्वास का जो ऑरकेस्ट्रेशन था, वह कमाल का था?

मारुतिराव


जी हाँ, वो पहले संगीतकार थे जिन्होंने 12-piece orchestra बम्बई में शुरु किया। उनकी रेकॉर्डिंग देखने के लिए बाक़ी सब संगीतकार जाते थे। गोवा के जो आर्टिस्ट्स थे, और बम्बई में यहाँ काफ़ी क्लब्स हुआ करते थे, और वहाँ से ये इन्स्ट्रुमेण्टलिस्ट्स ये सब बजाने के लिए आते थे। तो बम्बई के जो जाने माने दिग्गज सब कलाकार, मैंने घर में बुलाके सबका सत्कार किया था और कौन कौन कलाकार थे, अब्दुल करीम, मारुतिराव, जो तबले में मास्टर थे, और लाला ढोलकीवाला, उनका नाम लाला गंगावानी था, पर वो लाला ढोलकीवाला के नाम से जाने जाते थे, और एक ज़माना ऐसा आया कि उनका नाम इतना हुआ कि सब मौजूद हैं, रेकॉर्डिस्ट भी आये हैं, लता जी भी आयी हैं, रफ़ी साहब भी आये हैं, लेकिन खाली लाला गंगावानी नहीं आये हैं, तो रेकॉर्डिंग्‍ थोड़ी देर के लिए रुकता था, they used to wait for sometime कि लाला गंगावानी आ रहे हैं। फ़िल्म 'आवारा' के गीत "तेरे बिना आग यह चांदनी", फिर "घर आया मेरा परदेसी" का जो पहला पीस है, ढोलक का, और उसका तो रेकॉर्डिंग रात को पूरा हुआ, सुबह से रेकॉर्डिंग शुरु हुई तो रात तक चली, वो थे लाला गंगावानी।



डॉ साहब, और कौन कौन से साज़िन्दों के नाम याद आते हैं?

जैसे कि जयसिंह भोयी साहब थे, स्पेशल ईफ़ेक्ट्स में मास्टर थे, फिर रामलाल, जो ख़ुद जाने माने संगीतकार और ख़ुद वायलिन बजाते थे, और सारंगी भी बजाते थे। शहनाई में तो मास्टर थे ही। शहनाई में उनका बहुत अच्छा काम था, 'सेहरा' में उन्होंने संगीत भी दिया है। फिर मारुतिराव थे जो तबला बजाते थे, फिर जयराम आचार्य जी हैं  जो सितार अच्छा बजाते थे, "ओ सजना बरखा बहार आयी" में उनकी ही सितार है। फिर अन्ना जोशी थे, वो भी तबले के मास्टर थे, और एक साहब थे अब्दुल करीम, जो ग़ुलाम मोहम्मद साहब के भाई थे। एक बार ऐसा हुआ कि कुछ रेकॉर्डिंग चल रही थी, तो उसमें कुछ ग़लत तबला बजाया। सीनियर जो कलाकार थे वो हँस पड़े और उनसे कहा कि तू दूसरा कोई काम क्यों नहीं कर लेता, ये तबला तुम्हारे बस का रोग नहीं है, तो उनका ऐसा इन्सल्ट हुआ तो वो सीधे रोते रोते अपने भाई के पास गया, ग़ुलाम मोहम्मद जी के पास, और कहा कि तुम मुझे तबला सिखा दो, नहीं तो मैं मर जाऊँगा। फिर ग़ुलाम मोहम्मद जी ने तालीम चालू की और फिर आठ-आठ घंटे हाथ ख़ून से भर जाये तो भी तालीम में स्टॉप नहीं, आठ-आठ घंटे बाद तबले के बोल बजाते रहो, बजाते रहो, बजाते रहो, ऐसे जब एक साल, दो साल में जब तबला में मास्टरी पायी, फिर जाके वो रेकॉर्डिंग में हाज़िर हुए और ऐसी अच्छी उन्होंने तबला और ढोलकी बजायी कि सब लोग ख़ुश हो गये। वह गाना था 'कठपुतली' फ़िल्म का, "बाकड़ बम बम बम बम बाजे घुंगरू"। लता जी इतनी ख़ुश हो गईं कि सीधे 100 रुपये का नोट, उस ज़माने में 100 रुपये तो बहुत बड़ी रकम थी, तो 100 रुपये का नोट पाकर वो तुरन्त ज़ोर से हँस पड़े और उन लोगों के सामने जाकर कहा कि देख, लता जी ने मुझे क्या दिया है, आज मैं कौन हूँ, देख।

कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Sunday, February 8, 2015

रुद्रवीणा और पखावज : SWARGOSHTHI – 206 : RUDRA VEENA AND PAKHAWAJ RECITAL




स्वरगोष्ठी – 206 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 4

रुद्रवीणा पर आसावरी के और पखावज पर चौताल के स्वर गूँजे




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की चौथी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ियों में हमने आपके लिए ध्रुपद और धमार का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किया है। आज के अंक में हम आपसे ध्रुपद शैली के संगीत से अभिन्न रूप से जुड़ा प्राचीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा और ताल के लिए उपयोगी वाद्य पखावज की चर्चा करेंगे और विश्वविख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली खाँ द्वारा प्रस्तुत राग आसावरी का और राजा छत्रपति सिंह द्वारा पखावज पर प्रस्तुत चौताल का रसास्वादन भी कराएँगे।  



उस्ताद असद अली खाँ
र्तमान में भारतीय संगीत के जितने भी प्रकार की शैलियाँ प्रचलित हैं, यह सभी पारम्परिक रूप से विकसित और परिमार्जित होकर हमारे बीच उपस्थित हैं। प्राचीन ग्रन्थों और उपलब्ध पुरावशेषों का विश्लेषण करने पर यह निष्कर्ष भी निकलता है की वैदिक युग में भारतीय संगीत की समृद्ध परम्परा रही है। आधुनिक संगीत शैलियों में ध्रुपद अथवा ध्रुवपद सबसे प्राचीन संगीत शैली है। ग्वालियर नरेश मानसिंह तोमर (1486-1516) ने प्राचीन प्रबन्ध गीत शैली को परिमार्जित कर ध्रुपद संगीत को विकसित किया था। उन्हें मध्ययुगीन पदशैली का प्रवर्तक भी माना जाता है। राजा मानसिंह तोमर स्वयं संगीतज्ञ थे और प्राचीन शास्त्रों को आधार मान कर ध्रुपद शैली को स्थापित किया था। ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंकों में हमने ध्रुपद के आलाप, जोड़, झाला, निबद्ध गीत और धमार गीत पर चर्चा की है। आज हम ध्रुपद शैली के वाद्यों के विषय में चर्चा करेंगे। वैदिक युग से परम्परागत रूप में विकसित वीणा के कई प्रकार आज भी ध्रुपद संगीत से जुड़े हुए हैं। प्राचीन वीणा का एक प्रकार है, “रुद्रवीणा”। ऐसी मान्यता है की इस तंत्रवाद्य का सृजन स्वयं देवाधिदेव शिव ने माता पार्वती के रंजन के लिए किया था। यह “तत्” श्रेणी का वाद्य है। अर्थात धातु के तारों पर आघात कर स्वरोत्पत्ति की जाती है। रुद्रवीणा की बनावट में मुख्य भाग एक बेलनाकार दण्ड होता है, जिसकी लम्बाई 54 से 62 इंच तक होती है। दण्ड पर स्वर परिवर्तन के लिए 24 परदे होते हैं। दोनों सिरों पर दो तुम्बे लगे होते हैं। इस वाद्य में चार स्वर के मुख्य तार और तीन चिकारी के तार होते हैं। आज हम आपको विश्वविख्यात वीणा वादक उस्ताद असद अली खाँ का रुद्रवीणा वादन सुनवा रहे हैं। आज हम जिसे संगीत का जयपुर घराना के नाम से पहचानते हैं, उसकी स्थापना में असद अली खाँ के प्रपितामह (परदादा) उस्ताद रजब अली खाँ का योगदान रहा है। उस्ताद रजब अली खाँ जयपुर दरबार के केवल संगीतज्ञ ही नहीं; बल्कि महाराजा मानसिंह के गुरु भी थे। महाराजा ने उन्हें जागीर के साथ ही एक विशाल हवेली दे रखी थी तथा उन्हें किसी भी समय बेरोक-टोक महाराज के महल में आने के स्वतन्त्रता थी। असद अली खाँ के दादा जी उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ ने भी जयपुर दरबार में वही प्रतिष्ठा प्राप्त की। वीणावादकों का यह घराना ध्रुवपद संगीत के खण्डहार वाणी में वादन करता रहा है; जिसका पालन उस्ताद असद अली खाँ ने किया और अपने शिष्यों को भी इसी वाणी की शिक्षा दी। ध्रुवपद संगीत में चार वाणियों का वर्गीकरण तानसेन के समय में ही हो चुका था। "संगीत रत्नाकर” ग्रन्थ में यह वर्गीकरण शुद्धगीत, भिन्नगीत, गौड़ीगीत और बेसरागीत नामों से हुआ है; जिसे आज गौड़हार वाणी, डागर वाणी, खण्डहार वाणी और नौहार वाणी के नाम से जाना जाता है। उस्ताद असद अली खाँ और उनके पूर्वजों का वादन खण्डहार वाणी का था। इसके अलावा खाँ साहब दूसरी वाणियों की विशेषताओं को प्रदर्शित करने से भी हिचकते नहीं थे। ध्रुवपद अंग में वीणावादन का चलन कम होने के बावजूद उन्होंने परम्परागत वादन शैली से कभी समझौता नहीं किया। आइए, अब हम उनकी वादन शैली की सार्थक अनुभूति करते हैं। इस प्रस्तुति में उस्ताद असद अली खाँ ने ध्रुवपद अंग से राग आसावरी के चौताल में एक बन्दिश का वादन किया है। नाथद्वारा परम्परा के पखावज वादक पण्डित डालचन्द्र शर्मा ने पखावज संगति की है।


राग आसावरी : चौताल में रुद्रवीणा वादन : उस्ताद असद अली खाँ



राजा छत्रपति सिंह 

ध्रुपद संगीत में ताल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त वाद्य पखावज अथवा मृदंग है। यह खोखली बेलनाकार लकड़ी का बना हुआ होता है, जिसके दोनों सिरों पर चमड़े से मढ़ा होता है। यह अत्यन्त श्रमसाध्य वाद्य है। ध्रुपद संगीत में इस तालवाद्य की संगति से अनूठी गम्भीरता और भव्यता आती है। गायन और वादन में संगति के साथ-साथ शास्त्रीय नृत्य शैलियों में भए इसका उपयोग होता है। समर्थ कलासाधक पखावज का स्वतंत्र अर्थात एकल वादन भी कुशलता से करते हैं। आम तौर पर पखावज पर चौताल, तीव्रा, धमार, सूल आदि लघु तथा ब्रह्म, रुद्र, लक्ष्मी, सवारी, मत्त, शेष आदि दीर्घ ताल बजाए जाते हैं। आज के अंक में हम आपको स्वतंत्र अर्थात एकल पखावज वादन सुनवा रहे हैं। बीती शताब्दी के प्रमुख संगीतज्ञों में राजा छत्रपति सिंह (1919-1998) की गणना की जाती है। आज के उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच स्थित तत्कालीन बिजना राज परिवार में उनका जन्म हुआ था। इनके पितामह राजा मुकुन्ददेव सिंह जूदेव और पिता राजा हिम्मत सिंह जूदेव का नाम भारतीय संगीत के संरक्षकों में शुमार किया जाता है। राजा छत्रपति सिंह जूदेव ने बचपन से ही पखावज सीखना आरम्भ कर दिया था। अपने युग के जाने-माने दिग्गज पखावजी कुदऊ सिंह और स्वामी रामदास से उनकी ताल शिक्षा हुई। प्रस्तुत रिकार्डिंग में विद्वान पखावजी राजा छत्रपति सिंह पखावज पर चौताल प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इस वादन का आनन्द लीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


स्वतंत्र पखावज वादन : ताल - चौताल : राजा छत्रपति सिंह





संगीत पहेली 

'स्वरगोष्ठी’ के 206वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।



आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 14 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 206वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 204वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको चर्चित युगल ध्रुपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं द्वारा प्रस्तुत धमार गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग केदार और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल धमार (14 मात्रा)। इस बार पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने दिया है। इस बार हमारे एक नये प्रतिभागी ने भी पहेली में हिस्सा लेकर एक अंक अर्जित किया है। इन्होने उत्तर के साथ अपना नाम और स्थान का नाम नहीं लिखा है। इनके ई-मेल आई डी के आधार पर अनुमान है कि सम्भवतः प्रेषक का नाम पार्थ सोदानी है। आपसे अनुरोध है कि अपना पूरा नाम और स्थान का नाम हमे शीघ्र भेज दें। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी है हमारी नई लघु श्रृंखला- ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत वर्तमान में भारतीय संगीत की जो भी शैलियाँ प्रचलन में हैं, उनका सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। अभी तक आप ध्रुपद शैली का परिचय प्राप्त कर रहे थे। अगले अंक से हम खयाल शैली की चर्चा करेंगे। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा को निखारने का अवसर सहर्ष देंगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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