Wednesday, December 31, 2014

नववर्ष विशेष: 1934 से 2014 -- 9 दशक, 9 गीत



नववर्ष विशेष

बीते नौ दशकों के नौ चुनिन्दा गीत और उनसे जुड़ी कुछ यादें

विदा 2014



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, आज साल 2014 का अंतिम दिन है। एक और साल बीत गया और एक और नया साल दरवाज़े पर दस्तक देने के लिए बेताब हो रहा है। फ़िल्म संगीत के इतिहास में आज जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं तो ध्यान आता है कि आठ दशक तो पूरे हो ही चुके हैं, नवे दशक के भी चार साल बीत चुके हैं। इस दशकों में फ़िल्म संगीत अनेक दौर से गुजरता गया और एक स्वरूप से दूसरे स्वरूप में ढलता गया। 2014 से पीछे की तरफ़ चलें तो 2004, 1994, 1984, 1974.... से लेकर 1934 तक के नौ दशकों का यह सुरीला सफ़र बड़ा ही सुहाना रहा। तो आज इस विशेष दिन के अवसर पर क्यों ना पिछले 9 दशकों के इन 9 सालों से 9 गीत चुन कर उनके साथ जुड़ी कुछ स्मृतियों को आपके सामने रखे जायें। तो आनन्द लीजिये आज की इस नववर्ष विशेष प्रस्तुति का, और साथ ही स्वीकार कीजिए नववर्ष की हमारी हार्दिक शुभकामनायें। 


1934: "प्रेम नगर में बनाऊंगी घर मैं" (चण्डीदास)

उमा शशि और कुन्दनलाल सहगल का गाया फ़िल्म 'चण्डीदास' का यह युगल गीत शायद फ़िल्म-संगीत इतिहास का पहला-पहला लोकप्रिय युगल गीत रहा। सहगल साहब के बारे में समय समय पर कई कलाकारों ने अपने अपने विचार व्यक्त किये हैं। उन्हीं में से एक हैं गायक तलत महमूद। सहगल साहब से अपनी मुलाक़ात को याद करते हुए तलत साहब ने कहा था - "मैं क्या बताऊँ आपको, मैं इस क़दर दीवाना था उनका अपने स्कूल के ज़माने में, अपने कॉलेज के ज़माने में, हमेशा उनके गाने गाता था, कभी ख़याल भी नहीं था कि कभी उनसे मुलाक़ात होगी। लेकिन जब 'न्यू थिएटर्स' में 1945 में मेरा दो साल का कॉनट्रैक्ट हुआ तो उनकी पिक्चर बन रही थी 'माइ सिस्टर'। तकरीबन उसके सारे गाने मेरे सामने पिक्चराइज़ हुए। कुछ तो काम था ही नहीं, सुबह से, उस ज़माने में स्टुडियो 9:15 बजे जाइये और 5 बजे आइये, जैसे ऑफ़िस का टाइम होता था। तो हम लोग स्टुडियो में होते थे, जब भी कोई गाना वगेरह होता था तो हम लोग वहाँ रहते थे, और मेरी ज़िन्दगी की सबसे हसीन-तरीन यादगार वह मुलाक़ात है सहगल साहब से जो मैं सोच भी नहीं सकता, आज भी मुझे यकीन नहीं आता है कि उनसे मेरी मुलाक़ात हुई थी क्योंकि वाक़ई उनको हम एक अजूबा समझते थे, और उनके साथ, ख़याल कीजियेगा, उनके साथ हमेशा पार्टियों में जाते थे, उनके घर पे जाते थे, बहुत पुर-मज़ाकयात भी थे और पार्टी की जान थे बिल्कुल! मगर यह होता था कि जब खाना वाना खा चुके होते थे तो औरतों को भेज दिया करते थे कि आप लोगों के लायक ये लतीफ़े नहीं हैं। तो औरतों को हमेशा एक तरफ़ कर देते थे, फिर मर्दों की पार्टी जमती थी। और फिर आप देखिये कि उसमें वाक़ई इस क़दर ख़ुशमिज़ाज आदमी थे, इतने नर्म-दिल कि अगर ज़रा सी भी तक़लीफ़ हो आपको तो सब काम करने को तैयार रहते थे। जो कुछ भी मैंने उनको देखा था थोड़े से अरसे में, उस से अंदाज़ा हो गया कि बेहतरीन क़िस्म के आदमी थे वो, और जिस वक़्त गाते थे ऐसा लगता था कि नूर की बारिश हो रही है।" तो आइये अब सुनते हैं उमा शशि और सहगल साहब का गाया 1934 का यह गीत-



1944: "अखियाँ मिलाके जिया भरमाके चले नहीं जाना" (रतन)

1944 का साल संगीतकार नौशाद के करीयर का ‘टर्निंग पॉयण्ट ईयर’ साबित हुआ। ‘जेमिनी पिक्चर्स’ के बैनर तले डी. एन. मधोक ने बनाई ‘रतन’ जिसके प्रदर्शित होते ही चारों तरफ़ धूम मच गई और नौशाद उस दौर के प्रथम श्रेणी के संगीतकारों में शामिल हो गए। नौशाद ने इस फ़िल्म में ज़ोहराबाई अम्बालेवाली से “अखियाँ मिलाके जिया भरमाके चले नहीं जाना” गवाकर चारों तरफ़ तहल्का मचा दिया। नौशाद अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर संगीत में अपनी क़िस्मत आज़माने बम्बई आ गए थे। उनके संगीतकार बन जाने के बाद और सफलता हासिल कर लेने के बाद भी उनकी इस कामयाबी को सामाजिक कारणों से अच्छी निगाहों से नहीं देखा गया। उन्हीं के शब्दों में एक मज़ेदार क़िस्से का आनन्द लीजिए यहाँ पर – “ख़ैर, माँ का पैग़ाम आया कि शादी के लिए लड़की तय हो गई है, मैं घर आ जाऊँ। उस वक़्त मैं नौशाद बन चुका था। माँ ने कहा कि लड़की वाले सूफ़ी लोग हैं, इसलिए उनसे उन्होंने (नौशाद के पिता ने) यह नहीं कहा कि तुम संगीत का काम करते हो, बल्कि तुम दर्ज़ी का काम करते हो। मैंने सोचा कि संगीतकार से दर्ज़ी की इज़्ज़त ज़्यादा हो गई है! तो शादी में शामियाना लगाया गया, और बैण्ड वाले मेरे ही गाने बजाए जा रहे हैं और मैं दर्ज़ी बना बैठा हूँ। किसी ने फिर कहीं से कहा कि कौन ये सब बजा रहा है, सबको ख़राब कर रहा है? उस समय यही सब गाने चल रहे थे, “सावन के बादलों”, “अखियाँ मिलाके” वगैरह।”  चलिए अब आप भी आनन्द लीजिये इसी गीत का।



1954: "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये न बने" (मिर्ज़ा ग़ालिब)

1950 के आसपास 40 के दशक की सिंगिंग्‍ सुपरस्टार सुरैया की शोहरत में कुछ कमी आने लगी ही थी कि सोहराब मोदी की फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' ने एक बार फिर उन्हें सोहरत की बुलन्दी पर पहुँचा दिया। इस फ़िल्म में उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब की मेहबूबा चौधवीं बेग़म का रोल अदा किया था। शायराना अन्दाज़ वाले पंडित नेहरु ने सुरैया को इस फ़िल्म के लिए शाबाशी दिया था। यह वह फ़िल्म है जिसकी पेशानी पर राष्ट्रपति पुरस्कार का तिलक लगाया गया था। इस ख़ूबसूरत मुहुर्त को याद करते हुए सुरैया ने कहा था - "ज़िन्दगी में कुछ मौक़े ऐसे आते हैं जिनपे इंसान सदा नाज़ करता है। मेरी ज़िन्दगी में भी एक मौक़ा ऐसा आया था जब फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' को प्रेसिडेण्ट अवार्ड मिला और उस फ़िल्म का एक ख़ास शो राष्ट्रपति भवन में हुआ जहाँ हमने पंडित नेहरु जी के साथ यह फ़िल्म देखी थी। पंडित नेहरु हर सीन में मेरी तारीफ़ करते और मैं फूली न समाती। इस वक़्त पंडित जी की याद के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल पेश है "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाये न बने, क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने"।



1964: "कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों" (हक़ीक़त)

संगीतकार मदन मोहन के ऑफ़िशिअल वेबसाइट से 'हक़ीक़त' से जुड़ी कुछ बातें जानने को मिलती हैं। उस समय की एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म थी 'हक़ीक़त'। युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनने वाली इस फ़िल्म में गीत-संगीत के लिए बहुत कम ही जगह थी। लेकिन "मैं यह सोच कर उसके दर से उठा था", "ज़रा सी आहट होती है", "खेलो ना मेरे दिल से", "होके मजबूर उसने मुझे बुलाया होगा" और "अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों" जैसे कैफ़ी आज़्मी के लिखे गीतों को रच कर मदन मोहन ने अपने आप को सिद्ध किया। 'हक़ीक़त' ही वह फ़िल्म थी जिसने मदन मोहन में फिर एक बार अभिनय करने की लालसा उत्पन्न की। फ़िल्म 'परदा' के बन्द हो जाने पर मदन मोहन को अभिनय से दिलचस्पी चली गई थी। केवल 'मुनीमजी' और 'आँसू' में उन्होंने थोड़ा बहुत अभिनय किया। लेकिन जब चेतन आनन्द ने उन्हें 'हक़ीक़त' में एक रोल निभाने का मौका दिया तो वो उत्साहित हो उठे। उन्हीं के शब्दों में - "मैं इस ऑफ़र से इतना उत्साहित हुआ कि मैं दर्जनो उलझने एक तरफ़ रख कर, सारे काम जल्दी जल्दी निपटा कर दिल्ली के लिए प्लेन से रवाना हो गया। बाकी यूनिट उस समय लदाख के लिए निकल चुकी थी।" पहले ख़ुद आर्मी रह चुके मदन मोहन के दिल में फिर एक बार आर्मी यूनिफ़ॉर्म पहन कर आर्मी सोलजर का रोल निभाने का लालच था। लेकिन उनका यह सपना हक़ीक़त न हो सका। श्रीनगर में करीब करीब एक सप्ताह इन्तज़ार करने के बाद भी जब मौसम साफ़ नहीं हुआ, तो निराश होकर उन्हें बम्बई वापस लौटना पड़ा। "मैंने सोचा था कि इस ट्रिप से मैं कुछ यादगार लम्हे सहेज कर लाऊंगा, पर मेरे साथ वापस आया कुछ ऊनी कपड़े जिन्हें मैंने दिल्ली से खरीदा था उस सफ़र के लिए।"



1974: "मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया" (कोरा कागज़)

"यह गाना मेरी ज़िन्दगी का भी आइना है। मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। और शायद किशोर कुमार के साथ भी यही हुआ हो! क्योंकि इस गाने के रेकॉर्डिंग्‍ के दौरान उनकी आँखें आंसुओं से भीगे हुए थे। जब तक हम इस ज़िन्दगी को समझ पाते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और ज़िन्दगी ही गुज़र जाती है।" ये शब्द थे इस गीत के गीतकार एम. जी. हशमत के। और इसी गीत के निर्माण से जुड़ा हुआ एक मज़ेदार क़िस्से का ज़िक्र एक बार आनदजी भाई ने किया था। किशोर कुमार इस फ़िल्म की मूल कहानी को बांगला में पढ़ चुके थे, उन्हें फ़िल्म का अन्त मालूम था कि नायक-नायिका में मिलन हो जाता है। इसलिए किशोर दा ने फ़िल्म के निर्देशक अनिल गांगुली के सामने यह प्रश्न रख दिया कि क्या फ़िल्म के अन्तिम सीन में "मेरा जीवन कोरा कागज़" ही बजेगा या कुछ और सोचा है? अनिल दा हक्के-बक्के होकर कल्याणजी-आनन्दजी के पास गये और पूछा कि क्या करना चाहिये। सुझाव आया कि इंस्ट्रुमेण्टल बजा दिया जाये। उस पर किशोर दा बोले कि इंस्ट्रुमेण्टल भी तो "मेरा जीवन कोरा कागज़" का ही बजेगा न? वहाँ मौजूद गीतकार हशमत साहब ने कहा कि कुछ करते हैं इस पर। तो किशोर दा ने कहा कि बाद में आऊंगा तो फिर पैसे लूंगा अलग से। आनदजी के पास जाकर मज़े लेते हुए किशोर दा बोले कि 'महाराज, देखा फसाया ना! किशोरिया ने कैसे पकड़ा तुम को! बड़े वन-टू वन-टू करते हो न, अब करो वन-टू'। आनन्द जी के शब्दों में - "हम लोग हशमत जी से बात कर रहे थे, तो वो सोच रहे थे कि 'मेरा जीवन...' को चेंज कर पाना मुश्किल है। तो हमने कहा कि आप अन्तरे पे जाओ, कुछ नई बात करते हैं। मैंने कहा कि पहले एक कोटेशन दो, कि ऐसा-ऐसा होता है, उदाहरण दो, फिर उसके फ़ाइनल रेज़ल्ट पे आयेंगे कि इसमें यह होता है। हम ये सब काम कर रहे थे और किशोर दा आ आ कर डिस्टर्ब कर रहे थे कि कुछ लिखा महाराज? फस गये न? मेरा जीवन टुंग्‍ टुंग्‍ टुंग्‍...। मैंने कहा कि दादा प्लीज़। बोले, अभी क्यों प्लीज़? तो मैं उनको (एम. जी. हशमत को) लेके बाहर गया, बोला उदाहरण क्या देंगे कि जब डेलिवरी करती है तो माँ को तकलीफ़ होती है; बोले कि हाँ होती है। तो लिखो 'दुख के अन्दर सुख की ज्योति, और दुख ही सुख का ज्ञान'। ऐसा करते करते बन गया कि 'दर्द सहते जनम लेता हर कोई इंसान'। रेज़ल्ट देना है कि फ़ाइनल क्या है, 'वह सुखी है जो दर्द सह गया'। उसका रेज़ल्ट क्या है, 'सुख का सागर बन के रह गया'। अब ये सब कम्प्लीट हो गया, तब किशोर बोले कि चलो लिखो, हो गया? हाँ हो गया। वज़न में तो है? हाँ, वज़न में भी है, बेवज़न में भी है। उनको हमने कहा कि थैंक-यू दादा, आपकी वजह से यह पूरा हो गया, पूरी बात हो गई। और आज तीस साल हो गये इस गाने को।"



1984: "जाने क्या बात है, नींद नहीं आती" (सनी)

फ़िल्म 'सनी' में इस ख़ूबसूरत ग़ज़लनुमा गीत को लता मंगेशकर ने गाया था। वैसे तो राहुल देव बर्मन की ट्यूनिंग्‍ गुलज़ार के साथ बेहतरीन जमती थी, पर इस गीत में आनन्द बक्शी के साथ भी क्या कमाल किया है उन्होंने! इसी गीत का बांगला संस्करण पंचम ने आशा भोसले से गवाया था जिसके बोल थे "चोखे नामे बृष्टि"। लता जी के साथ साथ आशा जी को भी यह गीत और यह धुन इतनी पसन्द थी कि आशा जी ने अपने 74 वर्ष की आयु में पंचम को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने ऐल्बम 'Asha Reveals Real RD' में गाया था। लता और आशा के चाहनेवाले अक्सर लता और आशा के संस्करणों की तुलना करते हैं। पर दोनो सुनने के बाद यह बताना मुश्किल हो जाता है कि कौन किससे बेहतर है। यही ख़ास बात है लता की आवाज़ की सागदी में और आशा की आवाज़ की शोख़ी में! एक बार पंचम, आशा और गुलज़ार एक कार्यक्रम में एकत्रित हुए थे और उसमें आशा जी ने अपने पति पर यह आरोप लगाया था कि सारी सुन्दर तर्ज़ें वो उनकी बड़ी बहन को दे देते हैं। इस पर पंचम और गुलज़ार आशा को समझाते हुए अपना अपना तर्क देते हैं। पंचम के अनुसार यह आरोप ग़लत है क्योंकि उन्होंने आशा को भी एक से एक बेहतरीन गाने दिये हैं गाने के लिए। गुलज़ार ने भी पंचम का साथ देते हुए कहा कि 'ख़ुशबू' में जब "घर जायेगी तर जायेगी" कम्पोज़ हुआ था तब उन्होंने पंचम से कहा था कि यह गाना  आशा जी गायेंगी। उन्होंने आशा जी को याद भी दिलाया कि जब यह गाना उन्होंने आशा जी से गवाने की बात की तो आशा जी ने ही प्रश्न किया था कि यह तो हीरोइन का गाना है, यह गाना आप मुझे कैसे दे सकते हैं? गुलज़ार ने आगे कहा कि "आपको चुप रहना होगा आशा जी, क्योंकि सिर्फ़ 'ख़ुशबू' के ही नहीं, 'इजाज़त' के तमाम गाने भी आप ने गाये हुए हैं, और 'नमकीन' के भी। इसलिए ऐसा नहीं है कि सारे गाने लता जी को ही देते हैं।" इतने पर आशा जी ने कहा कि मैं तो मज़ाक कर रही थी। पर गुलज़ार साहब रुके नहीं, कहने लगे, "आप दोनो का मैं बताऊँ क्या है, आशा जी, आपको पता है चाँद पर किसने सबसे पहले क़दम रखा है? नील आर्मस्ट्रॉंग्। उनके बाद एडविन ने दूसरा क़दम रखा। बस, एक स्टेप से वो पीछे थे, और देखिये सभी आर्मस्ट्रॉंग् की ही बात करते हैं। एडविन, जो उनके पीछे ही थे, उनको किसी ने याद नहीं रखा। एडविन ने भी वही किया जो आर्मस्ट्रॉंग् ने किया; आपकी अचीवमेण्ट बिल्कुल वैसी ही है, उतनी ही है जितनी दीदी की, पर छोटी हैं तो छोटी हैं, क्या किया जाये! यह तो फ़क़्र की बात है कि वो आपकी बड़ी बहन हैं।" तो चलिए, दोनो सुर-साम्राज्ञियों को सलाम करते हुए फ़िल्म 'सनी' का यह गीत सुनें।



1994: "एक ऐसी लड़की थी जिसे मैं प्यार करता था" (दिलवाले)

क्या ख़ूब चला था यह गीत उस ज़माने में। हर दूसरे दिन फ़रमाइशी कार्यक्रमों में बज उठता था रेडियो पर। और फ़ौजी जवानों को तो ख़ास पसन्द था यह गीत! तो क्यों न इस गीत को सुनने से पहले इस गीत के संगीतकार जोड़ी नदीम-श्रवण के श्रवण राठौड़ का संदेश सुन लेते हैं जो उन्होंने फ़ौजी जवानों को कहे थे अपनी 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में। "जयमाला सुनने वाले सभी फ़ौजी भाइयों को श्रवण का, यानी कि नदीम-श्रवण का नमस्कार! मैं जानता हूँ कि आप बम्बई से कितनी दूर रह कर हमारे देश हिन्दुस्तान की रक्षा कर रहे होंगे, जहाँ पर अगर बर्फ़ है तो बर्फ़ के सिवा कुछ भी नहीं, रेगिस्तान है तो रेत के सिवा कुछ भी नहीं, और पहाड़ है तो पहाड़ों के सिवा कुछ नहीं। आप जिस निष्ठा और संकल्प से अपना काम कर रहे हैं, मेरे पास तो क्या किसी के भी पास कोई शब्द नहीं। हमारी पहली हिट फ़िल्म थी 'आशिक़ी' जिससे नदीम-श्रवण नदीम-श्रवण बने। इससे पहले हमने 17 साल कड़ी संघर्ष की, और 17 साल बाद ईश्वर ने हमें फल दिया। 1980 में जब हम स्ट्रगल कर रहे थे, काफ़ी सारे प्रोड्युसर्स को अपनी धुने सुनाया करते थे। उनमें से एक थे ताहिर हुसैन साहब, जो आमिर ख़ान के पिताजी हैं। हम उनके पास गये और कहा कि 'सर, हमें चांस दे दीजिये'। हमने उनको बहुत सारे गीतों की धुने सुनाई, पहला गीत जो हमने सुनाया वह कौन सा था यह मैं आपको थोड़ी देर बाद बताऊंगा, तो हम लोग दो तीन घंटों तक उनको धुने सुनाते गये। दूसरे दिन जब हम उनके पास गये तो उन्होंने कहा कि म्युज़िक अच्छा है लेकिन मैचुरिटी की कमी है। हम अपसेट हो गये कि ताहिर साहब ने यह क्या कह दिया, हमने इतनी मेहनत की थी इन धुनो पर। ख़ैर, बीस साल बाद जब हमारी 'आशिक़ी', 'दिल है कि मानता नहीं', और 'सड़क' हिट हो गई, तो ताहिर साहब ने हमें बुलाया और कहा कि एक फ़िल्म साथ में करते हैं और कहा कि उन्हें एक हिट गाना चाहिये। तो यह वही गाना है जो हमने बीस साल पहले सबसे पहले उनको सुनाया था। और यह गाना था "घुंघट की आढ़ से दिलबर का"। इस गीत से अलका यागनिक को फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला और ताहिर साहब भी बहुत ख़ुश हुए। इस वाक्या से हमें यह मोरल मिला कि हिम्मत कभी नहीं हारनी चाहिये, एक ना एक दिन कामयाबी ज़रूर मिलेगी।" तो इसी सीख को अपनाते हुए सुनते हैं फ़िल्म 'दिलवाले' का गीत कुमार सानू और अलका यागनिक की आवाज़ों में।



2004: "ये जो देस है तेरा, स्वदेस है तेरा" (स्वदेस)

हिन्दी सिनेमा संगीत के इतिहास में पाँच संगीतकारों को क्रान्तिकारी संगीतकार होने का ख़िताब हासिल है। ये हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर, राहुल देव बर्मन और पाँचवा नाम है ए. आर. रहमान का। रहमान की अनोखी प्रतिभा और अनोखा संगीत उन्हें भीड़ से अलग करता है। ए. आर. रहमान बहुत कम बोलते हैं, और साक्षात्कार भी बड़ी मुश्किल से ही देते हैं। और न ही विविध भारती के पास उनका कोई साक्षात्कार या जयमाला मौजूद है। इसलिए रहमान साहब के अपने शब्द तो यहाँ प्रस्तुत नहीं कर पाये, पर 'स्वदेस' फ़िल्म की एक अन्य गीत के बारे में बता रहे हैं इस फ़िल्म के गीतकार जावेद अख़्तर साहब - "स्वदेस फ़िल्म ने तो मुझे हार्ट-अटैक होने के मोड़ पर ले गया था जब मुझसे यह कहा गया कि मुझे लोकेशन पर ही एक गीत लिखना है और वहीं रेकॉर्ड करना है, और वह भी गीत रामलीला का एक पार्ट है। हम सब उस समय वाई में थे, मेरे पास कोई रेफ़रेन्स नहीं था और वो मुझसे सीता और रावण के बीच अशोकवाटिका का एक सीन लिखवाना चाहते थे। मैंने उनसे कहा कि आप जानते हैं कि आप मुझसे क्या कह रहे हैं? मुझे इसके लिए तुलसीदास का रामचरितमानस पढ़ना पड़ेगा और इसके लिए मुझे कम से कम दस दिन चाहिये। आशुतोष ने कहा कि ए. आर. रहमान अगले दिन ही निकल रहे हैं तीन महीने के लिए और इसलिए गाना कल ही रेकॉर्ड करना पड़ेगा। मैं डर गया, मैं हमेशा इस दिन के आने से डरता था कि मुझे एक सिचुएशन बताया जायेगा और मैं उस पर लिख नहीं पाऊँगा। उस दिन मैं जल्दी सो गया और अगली सुबह 5 बजे उठ गया और लिखने बैठ गया, सोचा कि कोशिश करके देख लिया जाये। और "पल पल है भारी विपदा है आयी" सूरज उगले से पहले तैयार हो गया। मैंने कैसे लिखा आज तक समझ नहीं पाया।" इस गीत को हम फिर कभी सुनेंगे, चलिए आज सुनते हैं फ़िल्म 'स्वदेस' का शीर्षक गीत ए. आर. रहमान के स्वर में।



2014: "मैं तैनु समझावाँ कि, ना तेरे बिना" (हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया)

2010 के इस वर्तमान दशक में फ़िल्मी गीतों पर पंजाबी बोलों और सूफ़ी शैली के संगीत की प्रचूरता पायी जा रही है। हर दौर का अपना एक अलग अंदाज़ होता है, एक चलन होता है, एक ऑडियन्स होता है; इन्हीं के बल पर गीतों की सफलता टिकी होती है। 2014 में रिलीज़ होने वाली फ़िल्मों और उनके गीतों को ग़ौर से सुनने के बाद मुझे जो गीत सबसे ज़्यादा पसन्द आया वह है अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल का गाया फ़िल्म 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' का "मैं तैनु समझावाँ कि, ना तेरे बिना लगदा जी...", जिसे लोगों ने भी ख़ूब सराहा और इस साल का एक चार्टबस्टर गीत सिद्ध हुआ। यह गीत दरसल एक पुनर्निर्मित गीत (recreated song) है जिसका मूल गीत पंजाबी फ़िल्म 'वीरसा' का है राहत फ़तेह अली ख़ान और फ़रहा अनवर की आवाज़ों में, और उस मूल गीत के संगीतकार हैं जावेद अहमद। 'हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया' के लिए इसे रि-क्रीएट किया शरीब-तोशी ने। इसी तरह से मूल गीतकार हैं अहमद अनीस और हिन्दी फ़िल्मी वर्ज़न में गीतकार कुमार ने अपनी तरफ़ से कुछ बोल डाले हैं। कुछ लोगों का कहना था कि अगर राहत साहब की आवाज़ को ही रखी जाती तो बेहतर होता, पर कुछ लोगों को अरिजीत का अंदाज़ भी अच्छा लगा। ख़ैर, हिन्दी फ़िल्म संगीत का नौ-वाँ दशक चल रहा है, संगीत की यह धारा एक बहुत ही लम्बा रास्ता तय करती आई है और आगे भी बहुत दूर तक जाएगी इसमें कोई संदेह नहीं है। इन नौ गीतों को सुन कर मन में विश्वास पैदा होती है कि अच्छा संगीत अभी भी ख़त्म नहीं हुआ है। अगर सुनने वालों की रुचि अच्छी हो, तो बनाने वाले भी अच्छा ही संगीत रचेंगे, अच्छे और अर्थपूर्ण बोल लिखे जायेंगे। इसी आशा के साथ और आप सभी को नववर्ष 2015 की अग्रिम शुभकामनाएँ देते हुए मैं, सुजॉय चटर्जी, आप से आज विदा लेता हूँ, नमस्कार! आप सुनिए साल 2014 का यह सुन्दर गीत...




कल यानी 1 जनवरी को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की एक और नववर्ष विशेष प्रस्तुति को पढ़ना/सुनना ना भूलिएगा



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

Tuesday, December 30, 2014

वरुण कुमार जायसवाल की कथा लाज

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको हिन्दी में मौलिक और अनूदित, नई और पुरानी, प्रसिद्ध कहानियाँ और छिपी हुई रोचक खोजें सुनवाते रहे हैं। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में विनय के. जोशी की लघुकथा "ईमानदार" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं वरुण कुमार जायसवाल की छोटी सी लेकिन मर्मस्पर्शी कथा लाज जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "लाज" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 36 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

वर्तमान राजनीति में सबसे बड़ी कमी आदर्शवाद को व्यावहारिक पहलू में ढाल पाने की क्षमता का अभाव है।
वरुण कुमार जायसवाल

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"एक मदरसे में पढ़ाने वाले शिक्षक के लिए ये रकम बड़ी तो थी ही फिर भी इत्मीनान था ..."
 (वरुण कुमार जायसवाल रचित "लाज" से एक अंश)





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#Seventeenth Story, Laaj: Varun Kumar Jaiswal/Hindi Audio Book/2014/17. Voice: Anurag Sharma

Sunday, December 28, 2014

‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ : SWARGOSHTHI – 200 : RAG BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 200 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 9 : राग भैरवी


विदुषी परवीन सुल्ताना से सुनिए भैरवी के स्वरों में पिरोया गीत- ‘हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। वर्ष 2014 के इस समापन अंक के साथ ही शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत पर केन्द्रित हमारे साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ की चार वर्षों की यात्रा पूर्ण होती है। हमारी इस यात्रा में असंख्य संगीतानुरागी सहयात्री बने। उन सभी का नामोल्लेख इस एक अंक में सम्भव नहीं है। हमारे कुछ श्रोता और पाठक समय-समय पर अपने सुझावों और फरमाइशों से अवगत कराते रहते हैं। आपके सुझावों के आधार पर ही हम आगामी अंकों की रूपरेखा निर्धारित करते हैं। वर्ष 2014 में लगभग 12 संगीत प्रेमियों ने हमारी संगीत पहेली में भाग लिया, जिनमें से 4-5 प्रतिभागी तो नियमित थे। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस 200वें अंक के माध्यम से हम सभी पाठको, श्रोताओं, सुझाव देने वालों और पहेली में भाग लेने वाले प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। आइए, अब आज के इस अंक की प्रस्तुतियों पर कुछ चर्चा करते हैं। इन दिनों ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। यह इस लघु श्रृंखला की समापन कड़ी है। इस श्रृंखला में आप फिल्मों के ऐसे गीत सुन रहे हैं जो रागों पर आधारित हैं और इन्हें किसी फिल्मी पार्श्वगायक या गायिका ने नहीं बल्कि समर्थ शास्त्रीय गायक या गायिका ने गाया है। आज का गीत नौवें दशक के शुरुआती दौर अर्थात 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘कुदरत’ से लिया गया है। यह गीत राग भैरवी पर आधारित है और इसे सुप्रसिद्ध गायिका परवीन सुल्ताना ने गाया है। इसके साथ ही राग भैरवी के एक अलग रंग का अनुभव करने के लिए हम आपको विदुषी एन. राजम् की वायलिन पर एक दादरा भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



नौवें दशक के आरम्भिक वर्ष अर्थात वर्ष 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ प्रदर्शित हुई थी। इसके संगीतकार राहुलदेव बर्मन थे। उन्होने फिल्म के एक प्रसंग के लिए राग भैरवी के स्वरों में एक गीत की धुन बनाई। फिल्म में यह गीत दो भिन्न प्रसंगों में और दो भिन्न आवाज़ों में शामिल किया गया है। गीत का एक संस्करण पार्श्वगायक किशोर कुमार की आवाज़ में है तो दूसरा संस्करण विदुषी परवीन सुल्ताना की आवाज़ में है। आज हम आपको परवीन जी की आवाज़ में राग भैरवी के स्वरों में पिरोया वही गीत सुनवाते हैं। बेगम परवीन सुल्ताना का नाम देश की शीर्षस्थ गायिकाओं में शामिल है। उनका जन्म नौगाँव, असम में 10 जुलाई 1950 को एक संगीतप्रेमी परिवार में हुआ था। बचपन में ही उन्हें संगीत की शिक्षा अपने दादा मोहम्मद नजीब खाँ से मिली। बाद में बंगाल के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया। पटियाला घराने की परम्परागत गायकी का मार्गदर्शन उन्हें उस्ताद दिलशाद खाँ ने प्रदान किया। बाद में उस्ताद दिलशाद खाँ से ही उनका विवाह हुआ। दोनों का पहला सार्वजनिक जुगलबन्दी गायन का प्रदर्शन अफगानिस्तान के जाशीन समारोह में हुआ था। परवीन जी का पहला एकल गायन का प्रदर्शन 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में हुआ था और 1965 से ही उनके संगीत की रिकार्डिंग होने लगी थी। भारत सरकार ने उन्हें 1976 में ‘पद्मश्री’ सम्मान और इसी वर्ष यानी 2014 में ‘पद्मभूषण’ सम्मान प्रदान किया है। इसके अलावा 1986 में देश के प्रतिष्ठित ‘तानसेन पुरस्कार’ और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से भी अलंकृत किया जा चुका है। परवीन सुल्ताना जी ने खयाल, ठुमरी, भजन के साथ ही कुछ फिल्मों में भी गीत गाये हैं। फिल्म ‘कुदरत’ के अलावा ‘दो बूँद पानी’, ‘पाकीजा’ और ‘गदर’ जैसी फिल्मों के गीत गाये हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में फिल्म कुदरत का जो गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उसके बोल हैं- ‘हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते...’। जैसा कि हमने पूर्व में उल्लेख किया है, इस गीत का एक और संस्करण पार्श्वगायक किशोर कुमार की आवाज में है। उस वर्ष के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए गीत के दोनों संस्करण नामित हुए थे, किन्तु पुरस्कार मिला, महिला वर्ग में परवीन जी के गाये इसी गीत को। इसके अलावा फिल्म के लेखक और निर्देशक सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार चेतन आनन्द को सर्वश्रेष्ठ लेखन का फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। इस गीत के संगीतकार राहुलदेव बर्मन और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी हैं। परदे पर यह गीत सुप्रसिद्ध अभिनेत्री अरुणा ईरानी पर फिल्माया गया है। लीजिए, आप यह गीत सुनिए।


राग भैरवी : ‘हमें तुमसे प्यार कितना...’ : फिल्म – कुदरत : विदुषी परवीन सुल्ताना




अभी आपने जो गीत सुना, उसमें राग भैरवी के स्वर लगे हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे सदा सुहागिन राग तथा सदाबहार राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का ही आश्रय राग माना जाता है।

कोमल सबही सुर भले, मध्यम वादी बखान,
षडज जहाँ संवादी है, ताहि भैरवी जान।

राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने राग भैरवी पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगा। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वायलिन पर इस राग का भावपूर्ण वादन। विश्वविख्यात वायलिन-साधिका विदुषी एन. राजम् प्रस्तुत कर रही हैं, गायकी अंग में एक भावपूर्ण दादरा। आप इस दादरा के माध्यम से भैरवी के रस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : वायलिन पर गायकी अंग में परम्परागत दादरा : विदुषी एन. राजम्





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको दो महान कलासाधकों की वाद्य संगीत जुगलबन्दी का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – इस जुगलबन्दी में कौन से स्वरवाद्यों का प्रयोग हुआ है? वाद्यों के नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 3 जनवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस श्रृंखला और पहेली के वार्षिक विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 202वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 198वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ के लिए पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी के स्वरों में एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भटियार और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल अद्धा तीनताल अथवा सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ की यह समापन कड़ी थी। ‘स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक नये वर्ष 2015 के पहले रविवार को प्रस्तुत किया जाएगा। इस अंक में हम आपको परिवेश के अनुकूल संगीत का रसास्वादन कराएँगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  








Saturday, December 27, 2014

बातों बातों में - INTERVIEW OF ACTOR, MODEL & FORMER CRICKETER SAJIL KHANDELWAL

 बातों बातों में - 03

फिल्म अभिनेता व पूर्व-क्रिकेटर सजिल खण्डेलवाल से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

" मेहनत ज़रूर रंग लाती है..." 






नमस्कार दोस्तों। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते। काश, परदे से इतर इनके जीवन के बारे में कुछ मालूमात हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने बीड़ा उठाया है फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का। फ़िल्मी अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार के दिन। आज दिसम्बर, 2014 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है अभिनेता, मॉडल और पूर्व-क्रिकेटर सजिल खण्डेलवाल से सुजॉय चटर्जी की लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। सजिल खण्डेलवाल अपने क्रिकेट करीयर में रणजी ट्रॉफ़ी खेल चुके हैं, और अब फ़िल्म जगत में उनका पदार्पण होने वाला है फ़िल्म 'Confessions of a Rapist' से जिसमें वो नायक की भूमिका में नज़र आयेंगे। तो आइए स्वागत करते हैं सजिल खण्डेलवाल का। 




सजिल, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है, और आपका बहुत-बहुत धन्यवाद हमारे इस निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए।

धन्यवाद!

आपकी पहली फ़िल्म और वह भी नायक की भूमिका में जल्द ही प्रदर्शित होने जा रही है - Confessions of a Rapist' । इस फ़िल्म के लिए आप हमारी अग्रिम शुभकामनाएँ स्वीकार करें।

बहुत बहुत धन्यवाद!

हम आपकी इस फ़िल्म की विस्तृत चर्चा इस साक्षात्कार में आगे चलकर करेंगे, लेकिन शुरूआत हम शुरू से करना चाहते हैं। तो बताइए अपने जन्म और बचपन के बारे में। कैसे थे बचपन के वो दिन?

मेरी पैदाइश लखनऊ, उत्तर प्रदेश की है। एक बड़े ही इज़्ज़तदार घराने में मेरा जन्म हुआ। शुरू से ही मेरा स्वभाव सरल सहज रहा; मैं चालाक नहीं था पर हर चीज़ का ज्ञान था। कभी कभार शरारतें भी करता था जब दूसरे दोस्त शरारत करते। बचपन के वो दिन भी क्या दिन थे। सबसे पहली बात तो यह कि मैं कभी भी स्कूल ठीक समय पर नहीं पहुँच पाता था, हमेशा लेट। और इसलिए पनिशमेण्ट भी ख़ूब मिलता था मुझे। ट्यूशन में भी वही हाल था। कई बार ऐसा हुआ कि मेरे मम्मी-डैडी को मेरी शिकायत आ जाया करती, और फिर डैडी से मुझे डाँट पड़ती। जैसे जैसे उम्र बढ़ती गई, मैं और ज़्यादा शरारती और होशियार होता चला गया। मेरे टीचर्स हमेशा मेरे मम्मी-डैडी को कहते कि आपका बेटा होशियार और तेज़ है, पर शरारती बहुत है। और यह भी कहते कि अगर सही दिशा मिले तो आपका बेटा कमाल कर सकता है।

अच्छा अपने बचपन के दोस्तों के बारे में भी बताइए?

मेरे बहुत ही कम दोस्त हुआ करते थे, दो या तीन। हम एक साथ पढ़ाई करते, एक साथ खेलते-कूदते, एक साथ क्लास बंक करते, आपस में अपने-अपने मसले भी सुलझाते। मतलब हमने साथ में हर एक पल का भरपूर आनन्द लिया।

आपने बताया कि आप शरारती बहुत थे; तो क्या अपनी शरारत भरी कोई घटना याद है?

जी हाँ, शायद 15 साल पहले की बात होगी। मैंने सीढ़ियों में तेल डाल दिया था ताकि मेरा क्लास टीचर जैसे ही सीढ़ियों से उतरने लगे तो वो गिर पड़े, क्योंकि मुझे वो बिल्कुल भी पसन्द नहीं थीं। पर अफ़सोस (हँसते हुए) कि वो नहीं गिरीं।

अच्छा सजिल, ये तो थी आपके बिल्कुल बचपन के दिनों का हाल, यह बताइए कि आपने क्रिकेट खेलना, मेरा मतलब है, गम्भीरता से क्रिकेट खेलना कब शुरू किया?

गम्भीरता से क्रिकेट खेलना मैंने 8 वर्ष की आयु से शुरू किया था। मेरे डैडी हमेशा यह चाहते थे कि मैं एक क्रिकेटर बनूँ और उसमें बहुत दूर तक जाऊँ। मैं स्कूल में क्रिकेट खेलता था, घर के आस-पड़ोस में दोस्तों के साथ खेलता था, और मैं काफ़ी अच्छा खेल लेता था शुरू से ही। मुझे आउट करना मुश्किल होता था। क्रिकेट को लेकर मेरे अन्दर एक दॄढ़ संकल्प था शुरू से ही। धीरे धीरे मेरे दोस्तों और आस-पड़ोस के लोगों को यह आभास हो गया कि मैं वाक़ई अच्छा खेलता हूँ और उन सब ने मुझसे कहा कि मुझे क्रिकेट को गम्भीरता से लेनी चाहिए। सबने यह भी सुझाव दिया कि मुझे किसी क्रिकेट अकादमी में एक अच्छे कोच से इसकी तालीम लेनी चाहिए। जब मैंने यह बात अपने मम्मी-डैडी को बताई तो मेरे डैडी मुझे के. डी. सिंह बाबू  स्टेडियम ले गए जहाँ मुझे श्री संजीव पन्त और श्री शशिकान्त सिंह जैसे गुरु मिले। और वहीं से शुरू हुआ क्रिकेट का औपचारिक सफ़र।

वाह! उस वक़्त आपके फ़ेवरीट प्लेअर कौन होते थे?

ऑस्ट्रेलिआ के मार्क वा।

सजिल, क्रिकेटर बनने का आपका औपचारिक सफ़र शुरू हो गया। लेकिन एक सफल क्रिकेटर बनने और रणजी ट्रॉफ़ी में जगह बनाने के लिए किस तरह का संघर्ष आपको करना पड़ा, यह हम जानना चाहेंगे।

क्रिकेटर बनने की राह पर चलना आसान नहीं रहा। कड़ी मेहनत करनी पड़ी। सुबह बहुत जल्दी उठ कर दौड़ना पड़ता था अपने आप को फ़िज़िकली फ़िट रखने के लिए। उस वक़्त मैं स्कूल में था। तो वापस लौट कर स्कूल के लिए तैयार होकर जाना पड़ता था। स्कूल के बाद प्रैक्टिस सेशन में जाता; वहाँ से लौट कर पढ़ाई, और फिर आठ घंटे की नींद। यह मेरी दिनचर्या हुआ करती थी। जैसा कि कहा जाता है कि मेहनत रंग ज़रूर लाती है, मेरे साथ भी यही हुआ। मैं कानपुर गया जहाँ उत्तर प्रदेश क्रिकेट ऐसोसिएशन का मुख्य कार्यालय स्थित है। हर साल वहाँ ट्रायल होता है, यानी कि नए खिलाड़ियों की खोज। मुझे भी वहाँ 'Under 12 Trial' में जाने का मौका मिला। मैं बहुत घबराया हुआ था क्योंकि मेरी उम्र उस वक़्त सिर्फ़ दस साल थी। मैं ख़ुशनसीब था जो मुझे एक बहुत ही अच्छा कोच मिला जिन्होंने मुझे हर वक़्त उत्साह दिया और मेरी मदद की। मुझे याद है कि उस वक़्त कानपुर में मैं रो रहा था क्योंकि सीटें बहुत कम थीं और 500 से 1000 खिलाड़ी आए हुए थे। पर मैंने अपने आप को सम्भाला, आत्मविश्वास को वापस लाया और खेल के मैदान में उतर गया। करीब 1000 खिलाड़ियों में 40 का सीलेक्शन हुआ, और मैं उनमें से एक था। उस कैम्प का नाम था  'Uttar Pradesh Under 12 Top 40'। कैम्प चार दिनों का था। फिर मैं 12 खिलाड़ियों के टीम में चुन लिया गया। उन शुरुआती मैचों में मैंने 51 और 70 रन बनाए, यानी कि मेरा प्रदर्शन सराहनीय रहा। फिर मेरा सफ़र शुरू हुआ Under 14, 16, 19, 22 से होते हुए रणजी तक का। मैंने कुछ चार या पाँच मैच खेले, मेरा प्रदर्शन ठीक-ठाक था, बहुत अच्छा भी नहीं और बहुत ख़राब भी नहीं। मैं अपनी बल्लेबाज़ी की शुरुआत ऑफ़-ब्रेक से किया करता था। रणजी ट्रॉफ़ी की टीम में शामिल होने के लिए किसी भी खिलाड़ी को शारीरिक और मानसिक रूप से फ़िट होना पड़ता है, और मैं हमेशा इस तरफ़ ध्यान देता था। और मैंने अपने स्टेट लेवेल 'Under 16' और 'Under 19' के मैचों में क्रम से 56, 78, 43 और 65 स्कोर किया था। मेरे अन्दर हमेशा अच्छी नेट्रुत्व-क्षमता थी, तो ये सब तमाम चीज़ें काम आयी रणजी टीम में शामिल होने में।

बहुत ख़ूब! आपकी बातों से ऐसा लग रहा है कि आप एक अच्छा क्रिकेटर बनने की क्षमता रखते थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि आपने क्रिकेट को अलविदा कह दिया और मॉडेलिंग की दुनिया में आ गए?

मैं कभी अपना प्रोफ़ेशन बदलना नहीं चाहता था, मैं एक क्रिकेटर ही रहना चाहता था, पर वह कहते हैं ना कि नसीब में जो रहता है वही होता है। सबसे बड़ी बात जो मेरे साथ हुई वह यह कि मैंने अपने पीक टाइम में अपने डैडी को हमेशा के लिए खो दिया। और इससे क्रिकेट खेलने की जो प्रेरणा मुझे उनसे मिलती थी, वह ख़तम हो गई, और मेरा इन्टरेस्ट भी ख़तम हो गया।

बहुत ही अफ़सोस की बात है! क्या उम्र रही होगी आपकी उस वक़्त?

मैं उस वक़्त 19 साल का था।

बहुत ही कठिन समय रहा होगा यकीनन। फिर मॉडेलिंग और फ़ैशन जगत में क़दम रखने के लिए आपने अपने आप को किस तरह से तैयार किया?

मैं यह मानता हूँ कि किसी भी प्रोफ़ेशन में सफलता प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत और लगन ज़रूरी होता है। अगर आप फ़ैशन जगत में एन्टर कर रहे हो तो आपका चेहरा, शारीरिक गठन, बॉडी लैंगुएज, कम्युनिकेशन स्किल्स बहुत ज़रूरी होता है। और अपने आप पर भरोसा होना भी बेहद ज़रूरी है; मन में यह विश्वास बनाए रखना कि चाहे कोई भी रोल हो, उसे आप निभा सकते हो। यह ज़रूर है कि एक नवागन्तुक होने की वजह से आप अपने काम और किरदार ख़ुद चुन नहीं सकते, पर आपको अपने आप को हर किरदार और हर काम के लिए तैयार रहना है। मैं हमेशा आइने के सामने घंटों खड़े हो कर प्रैक्टिस किया करता था।

क्रिकेटर बनने का स्ट्रगल तो आपने बताया था, मॉडल बनने के लिए भी ज़रूर एक बार फिर से स्ट्रगल करना पड़ा होगा?

पहली बात तो यह कि मैं बेशक़ मॉडेलिंग की दुनिया में आया, पर मेरा मक़सद एक मॉडल बनना नहीं था। मैं शुरू से ही एक अभिनेता बनना चाहता था। मैंने 21 वर्ष की आयु में अपनी ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही मॉडेलिंग्‍ शुरू की। मैं अक्सर मॉडल कोर्डिनेटर्स के पीछे भागता रहता, उन्हें अपनी तस्वीरें दिखाता, और फ़ॉलो-अप करता रहता। यह एक 24-घंटों का प्रोफ़ेशन है। इसमें आपका शारीरिक गठन, उच्चता, चेहरे की बनावट, फ़ोटोजेनिक होना, ये सब चीज़ें ज़रूरी होती हैं।

कहते हैं कि ग्लैमर की दुनिया के इन चकाचौंध के पीछे का जो अन्धेरा है वह लोगों को दिखाई नहीं देता। मेरा मतलब है कि इस लाइन में सुनने में आता है कि नवागन्तुक युवाओं का शोषण और उत्पीड़न होता है। आपके क्या विचार हैं इस बारे में?

मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि यह डीपेन्ड करता है कि इस तरह की चीज़ों को कोई कितनी समझदारी और होशियारी से हैन्डल कर सकता है। यह सच है कि लोग इस प्रोफ़ेशन के बारे में बहुत सी बातें करते हैं, पर मैं यही कहना चाहता हूँ कि हमें प्रैक्टिकल होना चाहिए और सिर्फ़ अपनी मेहनत पर भरोसा रखना चाहिए, बस! किसी से कुछ पाने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए; अगर आपमें वह बात है, अगर आपकी मेहनत में सच्चाई है तो काम ज़रूर मिलेगा। वैसे इस प्रोफ़ेशन में उतार-चढ़ाव बहुत हैं। बहुत से लड़के लड़कियों को समझौता करने को कहा जाता है। बहुत धोखेबाज़ लोग भी भर गए हैं इस लाइन में जो युवा लड़कों और लड़कियों को अपना शिकार बनाते हैं। ऐसे बहुत सी घटनाएँ हैं जो यहाँ कहना मुमकिन नहीं।

जी, मैं समझ सकता हूँ। आपकी इन बातों से युवा-वर्ग को जो सन्देश मिलना था, वह मिल चुका होगा। अच्छा अब यह बताइए कि आपने अपना पहला रैम्प शो किस तरह से हासिल किया? इसके बारे में कुछ बताइए?

वह मेरे कॉलेज का ही शो था जहाँ मुझे Mr. Prince का ख़िताब दिया गया। फिर उसके बाद मेरा पहला डिज़ाइनर शो था मुम्बई में उमैर ज़फ़र का।

दिल की क्या हालत रही होगी उस पहले पहले शो को करते हुए?

मुझे घबराहट नहीं हुई, पर मैं उत्तेजित ज़रूर था। मैंने रिहर्सल्स ठीक तरह से किए और स्टेज को हिट करने के लिए तैयार हो गया। (हँसते हुए)

यानी वही आत्मविशास एक बार फिर नज़र आया, जो क्रिकेट के मैदान में दिखता था। फिर किन किन डिज़ाइनर्स और ब्रैण्ड्स के फ़ैशन शोज़ आपने किए?

उमैर ज़फ़र के साथ
उमैर ज़फ़र के शोज़ मैं नियमित रूप से करता हूँ। मुम्बई के ही डिज़ाइनर ख़ुशीज़ के शोज़ मैंने किए। लखनऊ के डिज़ाइनर अभिजीत साईप्रेम के लिए रैम्प शोज़ मैंने किए। दिल्ली के डिज़ाइनर सदन पाण्डे के फ़ैशन शो में भी जल्दी ही काम करने जा रहा हूँ। इस तरह से जब जो शोज़ आ रहे हैं मैं करता चला जा रहा हूँ।

प्रिन्ट मीडिया में आपका पहला विज्ञापन कौन सा था?

मेरा पहला प्रिन्ट-शूट 'मदर्स डे प्रोमो शूट' था ब्लैकबेरी फ़ोन के लिए। वह एक बहुत बड़ा शूट था जिसके लिए 117 लड़के ऑडिशन के लिए आए हुए थे। सभी की टेस्ट ली गई और उनमें से मैं सीलेक्ट हुआ। मुझे अपने आप पर बहुत गर्व महसूस हुआ, और मेहनताना भी बहुत अच्छा मिला मुझे। उस ऐड को करते हुए मुझे बहुत मज़ा आया पर मैं घबराया हुआ था। पर यह ज़िन्दगी की सच्चाई ही है कि जब आप अपना 100% देते हो, तभी उसका परिणाम भी उतना ही अच्छा होता है।

और कौन कौन से विज्ञापन में आप नज़र आए हैं?

टेलीविज़न पर जो ऐड्स आते हैं, उनमें से 99% स्थापित फ़िल्म कलाकारों द्वारा किए जाते हैं, या फिर सीनियर टीवी कलाकार उन्हें करते हैं। मैंने प्रिन्ट शूट्स किए हैं लेनिन, ग्रासिम सूटिंग्स, वेडिंग टाइम्स मैगज़ीन, ब्लैकबेरी जैसे ब्राण्ड्स के लिए। फ़ैशन मैगज़ीन के कवर पेज पर भी मैं आ चुका हूँ। कैटलॉग शूट्स भी किए हैं। अब तक मुझे अच्छा रेस्पॉन्स मिला है। अगले साल जनवरी-फ़रवरी में कुछ अच्छे काम मुझे मिल रहे हैं।

एक मॉडल के लिए एक नियमित दिनचर्या का होना बहुत आवश्यक होता है शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए। आप किस तरह से इस बात को ध्यान में रखते हैं?

दिनचर्या... मेरा दिन शुरू होता है सुबह 9 या कभी कभी 10 बजे से। मैं हेवी ब्रेकफ़ास्ट करता हूँ और फिर छोटे-छोटे मील्स लेता हूँ लंच, मिड-मील, डिनर के साथ साथ। मैं एक फ़िटनेस-फ़्रीक हूँ, ईश्वर का मुझ पर आशीर्वाद ही रहा है कि मुझे एक अच्छा शरीर मिला है। और यह शूट पर भी डीपेन्ड करता है। और एक बात यह भी है कि आजकल सिर्फ़ इस प्रोफ़ेशन के लिए ही फ़िट रहना ज़रूरी नहीं बल्कि आजकल की ज़िन्दगी में हर किसी को फ़िट रहना चाहिए। जब मैं जिम जाता हूँ तो 40 मिनट वेट ट्रेनिंग करता हूँ और 20 मिनट कार्डियो और रनिंग करता हूँ।

आपने अपने फ़ूड-हैबिट की बात की; इसके बारे में और ज़रा सा विस्तार से बताइए?

मैं बहुत ही पौष्टिक आहार लेता हूँ। ब्रेकफ़ास्ट में एक सेब, दो केले, दो अन्डे का सफ़ेद हिस्सा और एक प्रोटीन शेक विथ मल्टिविटामिन लेता हूँ। लंच में एक कटोरी दाल, तीन रोटियाँ, हरी सब्ज़ियाँ, दही और चावल। जिम से निकल कर दूध और अन्डे लेता हूँ। डिनर में दो रोटियाँ और सब्ज़ियाँ लेता हूँ। दिन में तीन लिटर पानी पीता हूँ और आठ घंटे सोता ज़रूर हूँ जो एक स्वस्थ जीवन के लिए बहुत ज़रूरी होता है।

मॉडल से एक अभिनेता कैसे बने आप? क्या पहले भी कभी आपने कहीं अभिनय किया था? 'Confessions...' फ़िल्म का रोल आपको कैसे मिला?

मेरे हिसाब से हर किसी के अन्दर एक अभिनेता छुपा हुआ है। आपको बस इसका अहसास होना चाहिए, यही मेरे लिए अभिनय है। मैंने इससे पहले कभी कहीं अभिनय नहीं किया था। जैसे ही इस फ़िल्म की और इस रोल की ख़बर सुनी मुझे ऐसा लगा कि यह रोल सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे लिए है और मैं यह रोल किसी भी अन्य नए अभिनेता से बेहतर निभा सकता हूँ। यह रोल बोल्ड था और उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। मैंने ’लूक टेस्ट’ दिया, फिर मुझे ऑडिशन का बुलावा आया। दस ऑडिशन देने के बाद आख़िरकार इस ऑडिशन में मैं चुन लिया गया। प्रोडक्शन टीम ने मुझे सुबह सवा दस बजे फ़ोन किया और उनके दफ़्तर में जाकर उनसे मिलने को कहा। मैं वहाँ पहुँचा तो निर्देशक महोदय ने कहा कि सजिल, बधाई हो, आप फ़िल्म में नायक के रोल के लिए चुन लिए गए हो। मुझे जैसे एक झटका लगा, कुछ देर के लिए मैं बिल्कुल ख़ामोश सा हो गया और सोचने लगा कि कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा। फिर मुझे यकीन हुआ कि अपने जीवन के अब तक का सबसे बड़ा मुहुर्त मैं अनुभव कर रहा था। मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि क्या बताऊँ। मैंने तुरन्त अपनी मम्मी को फ़ोन किया और उन्हें यह ख़ुशख़बरी दी।

वाह! वाक़ई बड़ा ही सुखद अनुभव रहा होगा। अच्छा सजिल, अब आप इस फ़िल्म के बारे में ज़रा विस्तार में बताइए कि फ़िल्म की विषयवस्तु क्या है?

जैसा कि फ़िल्म के शीर्षक से ही प्रतीत होता है कि फ़िल्म की कहानी बलात्कार पर केन्द्रित है। मैं इस फ़िल्म में एक दोहरा-किरदार निभा रहा हूँ। पहले किरदार में मेरी थोड़ी सी दाढ़ी है, एक पोनी टेल है, और पतला शरीर है। और दूसरे किरदार में मैं क्लीन शेव और सामान्य छोटे बालों वाला हूँ। फ़िल्म की शूटिंग् दिल्ली, गोरखपुर और कानपुर में हुई है। यह फ़िल्म समाज को एक सशक्त सन्देश देगा बलात्कार विरोधी अभियान के बारे में, जो आज के भारतीय समाज के सबसे जघन्य अपराधों में से एक है। साथ ही नारी सुरक्षा का भी सन्देश है इस फ़िल्म में। मैं इससे ज़्यादा इस वक़्त नहीं बता सकता फ़िल्म के बारे में। बस इतना कहूँगा कि फ़िल्म में दो लड़कियाँ हैं जो मुख्य किरदारों में हैं, एक जो मेरी बहन का रोल निभा रही है और दूसरी जो एक रिपोर्टर है। मेरी ही तरह इस फ़िल्म के निर्देशक भी फ़िल्म जगत में अपना पहला क़दम रख रहे हैं। He is a chilled out guy and also very young. उन्हें भी इस फ़िल्म से बहुत सारी उम्मीदें हैं और उनका यह मानना है कि यह फ़िल्म हर किसी को पसन्द आएगी।

फ़िल्म के सह-कलाकारों और ख़ास कर निर्देशक के साथ आपकी ट्युनिंग् कैसी रही? पहली फ़िल्म होने की वजह से आपको बहुत कुछ सीखने को भी मिला होगा न?

मुझे पूरी टीम यूनिट के साथ काम करते हुए बहुत ही मज़ा आया, ख़ूब मस्ती की। साथी कलाकारों और निर्देशक साहब के साथ काम करके बहुत अच्छा लगा। इस यूनिट के साथ जुड़ने का जो मौका मुझे मिला, इसे मैं अपनी ख़ुशक़िस्मती समझता हूँ। भविष्य में फिर कभी मौका मिले तो इस यूनिट का दोबारा हिस्सा बनना चाहूँगा। हम जैसे एक ही परिवार के सदस्य बन गए थे। इस फ़िल्म को करते हुए मुझे बहुत ही ख़ूबसूरत तजुर्बे हुए, पर मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि एक अभिनेता बनने के लिए प्रतिबद्धता के साथ-साथ भाग्य भी साथ में होना चाहिए। जब बात ना बन रही हो और टेक के बाद टेक हो रहे हों तो आदमी झल्ला जाता है। और कभी-कभी ऐसा वक़्त भी आता है कि आपको लगता है कि सबसे उपर हो। शूटिंग के दौरान पूरे यूनिट की निगाह आप पर होती है। तो कभी कोई शॉट इतना बेकार होता है कि आप झल्ला जाते हो। फिर यह भी कहा गया है कि practice makes a man perfect। मुम्बई में हर रोज़ लाखों लोग क़दम रखते हैं फ़िल्म जगत में अपने सपनों को पूरा करने के लिए। पर बहुत कम लोग ही कुछ कर पाते हैं। मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मुझे यह मौका मिला और भविष्य में भी मैं अच्छे प्रोजेक्ट्स में काम कर सकूँ, उसकी कोशिश मैं करता रहूँगा। अभी तो करीअर की बस शुरूआत ही है।

और हम आपको इसके लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं।

धन्यवाद!

अच्छा सजिल, इस फ़िल्म की पृष्ठभूमि से तो आपने हमें अवगत करवाया, लेकिन हमने ऐसा सुना है कि फ़िल्म को लेकर कोई विवाद चल रहा है और इसके रिलीज़ की भी तारीख़ अभी निर्धारित नहीं हो पायी है, क्या यह सही है?

जी हाँ, फ़िल्म की रिलीज़ डेट अभी तय नहीं हो पायी है। फ़िल्म विवादित है, पर मेरा इसके बारे में कुछ कहना ठीक नहीं रहेगा। बस इतना कहूँगा कि कि बलात्कार जैसे सेन्सिटिव विषय पर होने की वजह से सेन्सर बोर्ड ने अभी तक अनुमति नहीं दी है। पर जल्दी ही मामला निपट जाएगा और उसके बाद ही रिलीज़ डेट तय की जाएगी।

क्या आपको यह लगता है कि यह विवाद आपके मात्र शुरू हुए करीअर पर बुरा असर कर सकता है? या फिर इस विवाद से फ़िल्म को पब्लिसिटी मिलने की उम्मीद दिखाई देती है?

कोई भी विवाद किसी कलाकार को चोट नहीं पहुँचा सकता। कलाकार का विवाद से क्या लेना देना? कलाकार विवाद के लिए ज़िम्मेदार नहीं होता। और रही पब्लिसिटी स्टण्ट की बात, तो इसका भी कोई मतलब नहीं बनता क्योंकि इस फ़िल्म से कई लोगों का करीअर शुरू होने जा रहा है। मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि हर किसी को पता है कि क्लास स्थायी होता है, मुझे ऑफ़र्स मिल रहे हैं। मेरी इच्छा है कि भविष्य में मुझे अच्छे-अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिले। फ़िलहाल तो जैसे ही सेन्सर बोर्ड का यह मामला सुलझ जाता है, हम फ़िल्म का प्रोमोशन शुरू करेंगे और इसकी रिलीज़ के लिए जुट जायेंगे।

जी बिल्कुल! जैसा कि आपने बताया कि फ़िल्म का विषय बोल्ड है, तो क्या अपनी पहली फ़िल्म के लिए ऐसे बोल्ड सब्जेक्ट पर काम करने से आपको डर नहीं लगा? एक पल के लिए भी आपने यह नहीं सोचा कि यह आपके हित में नहीं भी हो सकता है?

यह सच है कि मैंने एक बोल्ड करैक्टर निभाया है इस फ़िल्म में और बहुत चुनौतीपूर्ण भी रहा। पर कोई भी अभिनेता ऐसे रोल करने से डरेगा क्यों भला? अगर आपको एक सफल अभिनेता बनना है तो हर तरह के किरदार आपको निभाने पड़ेंगे। और यह रोल तो आज के समाज को एक बहुत ही ज्वलन्त मुद्दे को लेकर एक बड़ा सन्देश दे रहा है। हाल ही में दिल्ली में हमने एक भयानक बलात्कार का हादसा देखा जिसने पूरे देश को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। उसके बाद भी बलात्कार के मामले कम नहीं हुए हैं। हमारा देश, हमारी सरकार क्या क़दम उठा रही है इस तरफ़, यही सब कुछ हमने इस फ़िल्म में कैप्चर किया है। फ़िल्म के क्लाइमैक्स सीन में हम एक सशक्त सन्देश देने जा रहे हैं। मैं इस फ़िल्म से बहुत ख़ुश हूँ और हम सभी का यह मानना है कि देशवासियों को यह फ़िल्म पसन्द आएगी, ना कि वो इस फ़िल्म को नकारात्मक्ता से देखेगी।

चलिए इस फ़िल्म के बारे में तो हमने जाना, अब यह बताइए कि आप एक अभिनेता के रूप में किस तरह से पनपना चाहते हैं? आपकी किस तरह की उम्मीदें हैं इस फ़िल्म इंडस्ट्री से?

यहाँ पर पनपने का जो सबसे उत्तम तरीका है, वह है कड़ी मेहनत और अपने आप पर भरोसा। मुझे बहुत कुछ करना है आगे, मैं बहुत तरह के किरदार निभाना चाहता हूँ, सिर्फ़ नायक की भूमिका में ही नहीं बल्कि खलनायक और हास्य अभिनेता के रूप में भी अपनी पहचान बनाना चाहता हूँ। मैं मधुर भण्डारकर जी के साथ काम करना चाहता हूँ क्योंकि वो मेरे सबसे पसन्दीदा निदेशक रहे हैं। और मेरे आइडॉल हैं शाहरुख़ ख़ान। वो मेरे सब कुछ हैं।

सजिल, यह बताइए कि पहले क्रिकेट, फिर मॉडलिंग्, उसके बाद फ़िल्म अभिनेता, अब इसके बाद क्या??

कुछ भी नहीं (हँसते हुए), मैं ख़ुशनसीब हूँ कि क़िस्मत ने मुझे इतना कुछ करने का मौका दिया है। पर इस वक़्त मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ अभिनय को लेकर सीरियस हूँ और इसे ही अपना करीअर मानता हूँ और इसी पर अपना पूरा ध्यान लगा रहा हूँ।

आप एक युवा क्रिकेटर, मॉडल और अभिनेता हैं, और निश्चित रूप से युवाओं के लिए एक लाइट-हाउस की तरह भी हैं। क्या सन्देश देना चाहेंगे आप उन युवाओं को जो आप ही की तरह एक क्रिकेटर या अभिनेता/मॉडल बनना चाहते हैं?

मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि किसी भी शॉर्ट-कट में विश्वास नहीं करनी चाहिए और ना ही किसी से कोई भी उम्मीद रखनी चाहिए। अपने जीवन में आप जो भी करना चाहें, उस तक पहुँचने के लिए कड़ी मेहनत कीजिए और अपना पूरा ध्यान उस पर लगाए रखिए। ईश्वर पर भरोसा कीजिए, वो आपको फल ज़रूर देगा। हमेशा ख़ुश रहिए और चीज़ों को हल्के अंदाज़ में ग्रहण कीजिए। कोई भी प्रोफ़ेशन आप चुनिए, क्रिकेट, मॉडलिंग् या ऐक्टिंग्, सभी में आपको कड़ी मेहनत करनी होगी। सफलता अगर पाना है तो कोई भी शॉर्ट-कट नहीं चलेगा, there is no shortcut to success, मैं ऐसा मानता हूँ।

बहुत अच्छी बात बताई आपने और यह बिल्कुल सही भी है। और सजिल, अन्त में हम यह जानना चाहेंगे कि सजिल उस वक़्त क्या कर रहे होते हैं जब वो ना तो अभिनय कर रहे होते हैं, ना ही मॉडलिंग और ना ही जिम में वर्क आउट?

मुझे बहुत सी चीज़ों का शौक है, जैसे कि मैं क्रिकेट खेलता हूँ अपने निकट के दोस्तों के साथ जब भी मुझे समय मिलता है। बान्द्रा में या फिर जब मैं लखनऊ में होता हूँ तो दोस्तों के साथ हैंग-आउट करता हूँ। मैं अपने प्ले-स्टेशन में भी ख़ूब गेम्स खेलता हूँ। मुझे गाड़ियाँ चलाने का भी बड़ा शौक है। और अपने परिवार के साथ ढेर सारा समय बिताना मुझे बेहद अच्छा लगता है।

बहुत बहुत शुक्रिया सजिल जो आपने हमें अपना कीमती समय दिया और अपने बारे में, और अपनी आने वाली फ़िल्म के बारे में इतना कूछ बताया। आपको फ़िल्म की कामयाबी के लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए आपसे विदा लेते हैं, नमस्कार!

आपको बहुत बहुत धन्यवाद, ढेर सारा प्यार, नमस्कार।


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए।  



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



Sunday, December 21, 2014

‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ : SWARGOSHTHI – 199 : RAG BHATIYAR


स्वरगोष्ठी – 199 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 8 : राग भटियार


पण्डित राजन मिश्र ने एस. जानकी के साथ भटियार के स्वरों में गाया- 'आयो प्रभात सब मिल गाओ...'



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। अब हम इस लघु श्रृंखला के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। इस श्रृंखला में अभी तक आपने 1943 से 1960 के बीच में बनी कुछ फिल्मों के ऐसे गीत सुने जो रागों पर आधारित थे और इन्हें किसी फिल्मी पार्श्वगायक या गायिका ने नहीं बल्कि समर्थ शास्त्रीय गायक या गायिका ने गाया था। छठे दशक के बाद अब हम आपको सीधे नौवें दशक में ले चलते है। इस दशक में भी फिल्मी गीतों में रागदारी संगीत का हल्का-फुल्का प्रयास किया गया था। ऐसा ही एक प्रयास संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने 1985 की फिल्म ‘सुर संगम’ में किया था। इस फिल्म के मुख्य चरित्र के लिए उन्होने सुविख्यात गायक पण्डित राजन मिश्र (युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र में से एक) से पार्श्वगायन कराया था। आज के अंक में हम आपको इसी फिल्म से पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में राग भटियार के स्वरों में पिरोया एक गीत सुनवा रहे हैं। राग भटियार का एक अलग प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में इस राग की एक आकर्षक रचना भी हम सुनेंगे। 


पण्डित राजन मिश्र
ठवें दशक से ही फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों में काफी बदलाव आ चुका था। नौवें दशक के फिल्म संगीत में रागदारी संगीत का समावेश एक उल्लेखनीय घटना मानी जाएगी। ऐसे ही माहौल में 1985 में ‘सुर संगम’ और ‘उत्सव’, दो फिल्में बनीं जिसके संगीत में रागों का सहारा लिया गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे। फिल्मों में लम्बे समय तक लोकप्रिय संगीत देने के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का योगदान सराहनीय रहा है। 1963 में फिल्म ‘पारसमणि’ से फिल्म संगीतकार के रूप में पदार्पण करने वाली इस संगीतकार जोड़ी ने शुरुआती दौर की निम्नस्तरीय स्टंट फिल्मों में भी राग आधारित धुनें बना कर अपनी पैठ बनाई थी। उस दौर में उनकी फिल्में भले ही न चली हो, किन्तु उसका संगीत खूब लोकप्रिय हुआ। उनकी फिल्मों में लोक संगीत और लोकप्रिय सुगम संगीत के साथ-साथ राग आधारित धुनों का भी सहारा लिया गया था। 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ में उन्होने तत्कालीन प्रचलित फिल्म संगीत की प्रवृत्तियों के विपरीत संगीत दिया था। इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विभिन्न रागों का आधार लिये हुए थे। यही नहीं फिल्म में मुख्य चरित्र के लिए उन्होने किसी फिल्मी पार्श्वगायक को नहीं बल्कि सुप्रसिद्ध शास्त्रीय युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र बन्धुओं में से एक राजन मिश्र का सहयोग लिया।

विदुषी एस. जानकी 
फिल्म ‘सुर संगम’ में राग आधारित संगीत देना एक अनिवार्यता थी। दरअसल यह फिल्म दक्षिण भारतीय फिल्म ‘शंकराभरणम्’ का हिन्दी रूपान्तरण थी। फिल्म में मुख्य चरित्र संगीतज्ञ पण्डित शिवशंकर शास्त्री थे, जो संगीत की शुचिता और मर्यादा के प्रबल पक्षधर थे। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शास्त्री जी मानव-मानव में कोई भेद नहीं मानता थे। ऐसे विषय के लिए राग आधारित संगीत की आवश्यकता थी। फिल्म में राग मालकौंस पर आधारित गीत- ‘आए सुर के पंछी आए...’, राग भूपाली और देशकार पर आधारित गीत- ‘जाऊँ तोरे चरणकमल पर वारी...’, राग भैरवी के सुरों में- ‘धन्यभाग सेवा का अवसर पाया...’ जैसे आकर्षक गीत पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में थे। परन्तु इस फिल्म का जो गीत लेकर आज हम उपस्थित हुए हैं, वह राग भटियार के सुरों में पिरोया गीत- ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ है। इस गीत में पण्डित राजन मिश्र के साथ दक्षिण भारत की सुप्रसिद्ध गायिका एस. जानकी के स्वर भी शामिल हैं। गीतकार बसन्त देव का लिखा यह गीत संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने सितारखानी ताल में निबद्ध किया है। इस गीत के अन्य पक्ष पर चर्चा जारी रहेगी, आइए पहले यह गीत सुनते हैं।


राग भटियार : ‘आयो प्रभात सब मिल गाओ...’ : पण्डित राजन मिश्र  और एस. जानकी : फिल्म - सुर संगम : संगीत - लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल : गीत - बसन्त देव



आरोही नी अल्प ले, मध्यम दोऊ सम्हार,
रे कोमल, संवाद म स, क़हत राग भटियार।

अर्थात, इस राग में कोमल ऋषभ और दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह में निषाद स्वर का अल्प प्रयोग किया जाता है। यह मारवा थाट का सम्पूर्ण जाति का राग है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह रात्रि के अन्तिम प्रहर विशेष रूप से सन्धिप्रकाश काल में गाया-बजाया जाने वाला राग है। अवरोह के स्वर वक्रगति से लिये जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह पाँचवीं शताब्दी के राजा भर्तृहरि की राग रचना है। उत्तरांग प्रधान यह राग भंखार के काफी निकट होता है। राग भंखार में पंचम स्वर प ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भटियार में शुद्ध मध्यम पर। यह राग गम्भीर, दार्शनिक भाव और जीवन के उल्लास की अभिव्यक्ति देने में पूर्ण समर्थ है। फिल्म ‘सुर संगम’ का यह गीत इन्हीं भावों की अभिव्यक्ति करता है। राग भटियार का एक शास्त्रोक्त और प्रयोगधर्मी स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व की आवाज़ में इसी राग में एक खयाल रचना भी सुनवाएँगे।

पण्डित कुमार गन्धर्व 
पण्डित कुमार गन्धर्व भारतीय संगीत की एक नई प्रवृत्ति और नई प्रक्रिया के पहले कलासाधक थे। घरानों की पारम्परिक गायकी की अनेक शताब्दी पुरानी जो प्रथा थी उसमें संगीत तो जीवित रहता था, किन्तु संगीतकार के व्यक्तित्व और प्रतिभा का विसर्जन हो जाता था। कुमार गन्धर्व ने पारम्परिक संगीत के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत ही कलासाधक की सम्भावना को स्थापित किया। 8 अप्रैल 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत प्रेमी परिवार में उनका जन्म हुआ था। माता-पिता ने नाम तो रखा था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत जगत में उन्हें कुमार गन्धर्व के नाम से प्रसिद्धि मिली। जिन दिनों कुमार गन्धर्व ने संगीत जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर संवेदना के साथ एकाकी ही सक्रिय हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन शैली विकसित की जो हमें भक्तिपदों के आत्मविस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती है। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। आइए, अब हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में राग भटियार, तीनताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं। आप इस कृति का रसास्वादन कीजिए और इसी के साथ आज के इस अंक से विराम लेने की हमें अनुमति दीजिए।


राग भटियार : ‘दिन गए बीत दुःख के...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व : तीनताल





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 199वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। फिल्म के इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।वर्ष 2014 की 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि आपको इसमें किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – यह रचना किस गायिका की आवाज़ में है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 27 दिसम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 201वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 197वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के एक राग आधारित गीत अथवा खयाल का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल मध्य लय तीनताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पूर्व की भाँति जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। अब हम इस लघु श्रृंखला के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, December 20, 2014

"नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है एक माँ..." - 15 साल बाद भी उतना ही सार्थक है यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 48 


"बारूद के धुएँ में तू ही बोल जाएँ कहाँ..."





"आज पेशावर पाक़िस्तान में इंसानियत को शर्मिन्दा करने वाला जो हत्याकाण्ड हुआ, जिसमें कई मासूम लोगों और बच्चों को बेरहमी से मारा गया, वह सुन के मेरी रूह काँप गई। उन सभी के परिवारों के दुख में मैं शामिल हूँ" 
- लता मंगेशकर, 16 दिसम्बर 2014


"हमसे ना देखा जाए बरबादियों का समा, 
उजड़ी हुई बस्ती में ये तड़प रहे इंसान, 
नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है एक माँ, 
बारूद के धुएँ में तू ही बोल जाएँ कहाँ..."। 

रीब 15 साल पहले फ़िल्म ’पुकार’ के लिए लिखा गया यह गीत उस समय के परिदृश्य में जितना सार्थक था, आज 15 साल बाद भी उतना ही यथार्थ है। हालात अब भी वही हैं। आतंकवाद का ज़हर समूचे विश्व के रगों में इस क़दर फैल चुका है कि करीबी समय में इससे छुटकारा पाने का कोई भी आसार नज़र नहीं आ रहा है। आतंकवाद का रूप विकराल से विकरालतम होता जा रहा है। इससे पहले सार्वजनिक स्थानों पर हमला कर नागरिकों या फिर फ़ौजी जवानों पर हमला करने से बाज़ ना आते हुए अब लाचार और बेबस मासूम बच्चों को अपना निशाना बना कर आतंकवादियों ने न केवल इन्सानियत को ज़बरदस्त धक्का मारा है बल्कि अपनी कायरता और खोखलेपन का नमूना भी पेश किया है पूरी दुनिया के सामने। पेशावर की दुखद और कल्पनातीत घटना ने समूचे विश्व के लोगों के दिलों को दहला कर रख दिया है, विश्व के हर नागरिक को ऐसी चोट पहुँची है कि हम यह सोचने पर विवश हो गए हैं कि क्या हम वास्तव में इतने लाचार हो गए हैं कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ अब कुछ भी नहीं किया जा सकता? क्या यह बिल्कुल ही असम्भव है कि इस दुनिया के मुखपृष्ठ से आतंकवाद का नामोनिशाँ मिट जाए? और अगर यह मुमकिन है तो फिर कैसे? मज़हबी आतंकवाद भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और मध्यपूर्व एशिया (इराक़, सीरिया आदि देशों) से लेकर अफ़्रीका के नाइजीरिया, केनिया तक अपनी जड़े फैला चुका है। किसी एक देश के लिए इसका खात्मा कर पाना सम्भव नहीं। ज़रूरत है एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था के गठन की जिसके सदस्य हों इन तमाम देशों की सरकारें, और संयुक्त रूप से एक ठोस प्रणाली बना कर आतंकवाद पर इस तरह से शिकंजा कसा जाए कि कोई भी आतंकवादी फिर सर ना उठा सके। यह काम असम्भव सा प्रतीत ज़रूर हो रहा है पर मुमकिन है अगर हर देश की सरकार पूरी इमानदारी से इस काम में जुट जाए। इंसान आज मंगल की दर तक जा पहुँचा है, ऐस्टरॉयड के उपर अन्तरिक्ष यान लैण्ड करवा चुका है, तो क्या अपनी ही धरती से आतंकवाद जैसी बीमारी को दूर नहीं कर सकता? फ़िल्म ’पुकार’ के इसी गीत की शुरुआती पंक्तिओं की तरह ईश्वर-अल्लाह से हम बस यही प्रार्थना कर सकते हैं कि-

आ जा के सब मिल के रब से दुआ माँगे,
जीवन में सुकूँ चाहे, चाहत में वफ़ा माँगे,
हालात बदलने में अब देर ना हो मालिक,
जो दे चुके फिर ये अन्धेर ना हो मालिक।

और इस गीत के आख़िर की पंक्तिओं में प्रेम और अमन के सन्देश पर ज़ोर देते हुए जैसे कहा गया है कि "इन्हें फिर से याद दिला दें सबक वही प्यार का, बन जाये गुलशन फिर से काँटों भरी दुनिया", यही बात अगर हर एक इंसान की समझ में आ जाती तो यह संसार हमारे सपनों का संसार हो गया होता।

फ़िल्म ’पुकार’ साल 2000 की फ़िल्म थी। फ़िल्म में लता मंगेशकर का गाया यह एकमात्र गीत है और इसे उन्हीं पर फ़िल्माया गया है। स्कूली बच्चों के साथ गाया गया यह एक प्रार्थना गीत है जिसमें ईश्वर से प्रार्थना के साथ-साथ युद्ध या आतंकवाद के खिलाफ़ आवाज़ भी है; ठीक वैसे जैसे लता जी ने बरसों पहले फ़िल्म ’हम दोनों’ में "अलाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम" गाया था। वैसे तो गीत के गायक कलाकारों के रूप में लता मंगेशकर और कोरस कहा गया है, पर विश्वसनीय सूत्र के हवाले से यह जानकारी मिली है कि जिन चार बाल-गायिकाओं ने लता जी के साथ अपनी आवाज़ें मिलाई थीं, उनके नाम हैं के. विद्या, आर. सुरविहि, आर. प्रिया और सुभिक्षा रंगराजन। इनमें से सुभिक्षा रंगराजन एक शास्त्रीय गायिका बन कर उभरी हैं, बाकि तीन बच्चियों भी क्या आगे चलकर गायिकाएँ बनीं, इसका पता नहीं लगाया जा सका। गायक कलाकारों के बाद अब गीतकार की बारी। फ़िल्म ’पुकार’ के गीतकार के रूप में मजरूह सुल्तानपुरी और जावेद अख़्तर के नाम दिए गए हैं, पर किन्होंने कौन सा गीत लिखा है इसकी जानकारी रेकॉर्ड लेवल पर नहीं दिया गया। सम्भवत: साल 2000 में मजरूह के निधन के बाद जावेद अख़्तर से अधूरा कार्य सम्पन्न करवाया गया होगा। IMDB Database के अनुसार "एक तू ही भरोसा" गीत को मजरूह ने लिखा है, पर कुछ फ़िल्म विश्लेषकों का यह मानना है कि इस गीत के शब्दों पर ग़ौर करने से ऐसा लगता है कि ये जावेद अख़्तर के लिखे बोल हैं। ऐसा मानने का यह भी कारण हो सकता है कि इसी फ़िल्म के आसपास बनने वाली दो और फ़िल्मों - ’1947 अर्थ' और ’बॉर्डर' में उन्होंने इसी तरह के देशभक्ति और विश्वशान्ति के गीत लिखे थे। और आख़िर में बात इस गीत के संगीत की। लता और बच्चों की आवाज़ों के साथ-साथ पियानो के arpeggios का जो संगम ए. आर. रहमान ने किया है, उसने गीत को एक अलग ही मुकाम तक जा पहुँचाया है। इस गीत की धुन रहमान ने इस फ़िल्म के बनने के चार साल पहले, यानी कि 1996 में कम्पोज़ किया था, बोसनिआ के सिविल वार में मरने वाले लाखों लोगों की याद में, जिसे उन्होंने "Oh Bosnia" शीर्षक गीत के माध्यम से मलयेशिया के एक कॉनसर्ट में प्रस्तुत किया था। इसी धुन का इस्तेमाल कर "एक तू ही भरोसा, एक तू ही सहारा" का यह भजन बना, जिसे सभी ने हाथों हाथ ग्रहण किया। 2000 के दशक में लता जी के गाए चन्द गीतों में यह एक महत्वपूर्ण रचना है जो आज के विश्व में एक मार्गदशक गीत है, जिसके बोलों को अगर सही मायने में समझा जाए तो शायद इस विश्व से आतंकवाद का नामोनिशान मिट जाएगा। आइए ऐसी ही दुआ करें।

फिल्म - पुकार : 'आजा कि सब मिल के रब से दुआ मांगे...' : लता मंगेशकर और बच्चे 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से 16 दिसम्बर 2014 के दिन पेशावर में हुए हत्याकाण्ड में मृत  132 बच्चों की पुण्य स्मृति को विनम्र नमन और अश्रुपूर्ण श्रद्धासुमन अर्पित है।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी, कृष्णमोहन मिश्र

Tuesday, December 16, 2014

विनय के. जोशी की कथा ईमानदार

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको हिन्दी में मौलिक और अनूदित, नई और पुरानी, प्रसिद्ध कहानियाँ और छिपी हुई रोचक खोजें सुनवाते रहे हैं। पिछली बार आपने अर्चना चावजी के स्वर में प्रसिद्ध साहित्यकार जयशंकर प्रसाद की काव्यात्मक लघुकथा "कला" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं विनय के. जोशी की कथा ईमानदार जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "ईमानदार" का गद्य कथा कलश पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 46 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

श्रम मंत्रालय राजस्थान सरकार, भास्कर रचनापर्व, दैनिक भास्कर तथा जवाहर कला केन्द्र द्वारा पुरस्कृत लेखक विनय के. जोशी उदयपुर में रहते हैं। उनकी रचनायें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से छपती रही हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"शर्माजी से जैरामजी कर आगे बढ़ने लगा तो पास में खड़े कुल्फी वाले ने कुरते की बाह पकड़ कर कहा ..."
 (विनय के. जोशी रचित "ईमानदार" से एक अंश)





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ईमानदार MP3

#Sixteenth Story, Imandar: Vinay K. Joshi/Hindi Audio Book/2014/16. Voice: Anurag Sharma

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