Sunday, March 31, 2013

अतिथि संगीतज्ञ का पृष्ठ : पण्डित श्रीकुमार मिश्र



स्वरगोष्ठी – 114 में आज
अतिथि संगीतकार का पृष्ठ
स्वर एक राग अनेक 



‘स्वरगोष्ठी’ के आज के इस विशेष अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने सभी संगीत-प्रेमी पाठकों और श्रोताओं का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज का यह अंक एक विशेष अंक है। विशेष इसलिए कि यह अंक संगीत-जगत के एक जाने-माने संगीतज्ञ प्रस्तुत कर रहे हैं। दरअसल इस वर्ष के कार्यक्रमों की समय-सारिणी तैयार करते समय ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ ने माह के पाँचवें रविवार की ‘स्वरगोष्ठी’ किसी संगीतज्ञ लेखक से प्रस्तुत कराने का निश्चय किया था। आज माह का पाँचवाँ रविवार है और आपके लिए आज का यह अंक देश के जाने-माने इसराज व मयूर वीणा-वादक और संगीत-शिक्षक पण्डित श्रीकुमार मिश्र प्रस्तुत कर रहे है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक के लिए उन्होने तीन ऐसे राग- पूरिया, सोहनी और मारवा का चयन किया है, जिनमें समान स्वरों का प्रयोग किया जाता है। लीजिए, श्रीकुमार जी प्रस्तुत कर रहे हैं, इन तीनों रागों में समानता और कुछ अन्तर की चर्चा, जिनसे इन रागों में और उनकी प्रवृत्ति में अन्तर आ जाता है। 

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा संचालित ‘स्वरगोष्ठी’ के संगीत-मंच पर संगीतानुरागियों से कुछ बातचीत करने का आज मुझे अवसर दिया गया है, इसके लिए मैं, श्रीकुमार मिश्र इस स्तम्भ के सम्पादक-मण्डल को धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। आज मैं आपका ध्यान भारतीय संगीत के खजाने के तीन ऐसे रागों की तरफ आकर्षित करूँगा, जिनमें प्रयोग किये जाने वाले स्वर-समूह तो समान होते हैं, किन्तु उनके नाम, प्रवृत्ति और भाव में पर्याप्त भेद होता है। ऐसा ही एक स्वर-समूह है-

सा नी रे(कोमल) ग म(तीव्र) ध नी सां

ये स्वर-समूह तीन रागों- पूरिया, मारवा और सोहनी में प्रयुक्त होते हैं। जब तीनों रागों में स्वर एक है तो भाव अलग-अलग क्यों है? आज के आलेख में हम इसी ‘क्यों’ का उत्तर खोजने का प्रयास करते हैं। जब व्यक्ति दुःखी होकर भारी मन से अभिव्यक्ति देता है तो उसकी आवाज़ अपेक्षाकृत धीमी होती है। ये स्वर इस आवाज़ में राग पूरिया कायम करते हैं। इसी प्रकार जब क्लान्त और व्यथित मन को विश्रान्ति की तलाश होती है तब वह मध्यम आवाज़ में इन स्वरों का उच्चार करेगा, तब मारवा का रूप बनता है। और जब पीड़ा से त्रस्त होकर चीख-चीख कर पुकारने लगे तो यही स्वर राग सोहनी की उत्पत्ति करते हैं। राग पूरिया में वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद है। गान्धार व्यथा को उभारता है और निषाद थोड़ी देर के लिए शान्ति व एकाग्रता प्रदान कर देता है। भावानुसार पूरिया में विलम्बित रचनाएँ अत्यन्त भावपूर्ण प्रतीत होती हैं। इस राग के गायन-वादन का समय सूर्यास्त के बाद होता है। राग पूरिया में मींड़ के द्वारा भावों को एकसूत्र में रखा जाता है। आपके समक्ष राग पूरिया का स्वरूप और भाव स्पष्ट करने के उद्देश्य मैं आपको विख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ का गाया इस राग में एक खयाल सुनवाता हूँ।


राग पूरिया : ‘फूलवन की सेज बिछाओ...’ : उस्ताद राशिद खाँ



राग पूरिया में प्रयोग किये जाने वाले स्वरों को राग मारवा में भी प्रयोग किया जाता है, परन्तु इसकी प्रवृत्ति और भाव में पूरिया की तुलना में काफी अन्तर आता है। राग मारवा का वादी स्वर धैवत तथा संवादी स्वर ऋषभ होता है। धैवत स्वर उलझन से युक्त व्यथित व क्लान्त मन की अभिव्यक्ति कर देता है और ऋषभ (अपनी मूल श्रुति से उतरा हुआ) मन को शान्ति और विश्रान्ति प्रदान कर देता है। मारवा राग में मध्यलय की रचनाओं का प्रयोग अधिक स्पष्ट भाव कायम करता है। मारवा एक राग का नाम है और थाट का नाम भी होता है और राग मारवा, थाट मारवा का आश्रय राग माना जाता है। यह सूर्यास्त के समय प्रस्तुत किया जाने वाला राग होता है। राग पूरिया की तुलना में राग मारवा में मींड़ के बजाय सीधे स्वरों का सपाट प्रयोग अधिक करके भाव स्पष्ट किया जाता है। इस राग के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए मैं चाहूँगा कि आप सुप्रसिद्ध गायक पण्डित जसराज के स्वरों में राग मारवा की एक भक्तिपरक रचना सुनिए और राग की भावानुभूति कीजिए।


राग मारवा : ‘चरण प्रीत करुणानिधान की...’ : पण्डित जसराज





राग पूरिया और मारवा की तरह राग सोहनी में भी समान स्वरों का प्रयोग किया जाता है, किन्तु इसके प्रभाव और भावाभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर हो जाता है। राग सोहनी का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। धैवत पीड़ा की अभिव्यक्ति करने में समर्थ होता है। ‘नी सां रें (कोमल) सां’ की स्वर संगति से तीव्र पुकार का वातावरण निर्मित होता है। संवादी गान्धार कुछ देर के लिए इस उत्तेजना को शान्त कर सुकून देता है। वास्तव में वादी और संवादी स्वर राग के प्राणतत्त्व होते हैं, जिनसे रागों के भावों का सृजन होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में राग सोहनी के भाव अधिक स्पष्ट होते हैं। इस राग में मींड़ एवं गमक को कसे हुए ढंग से मध्यलय में प्रस्तुत करने से राग का भाव अधिक मुखरित होता है। अब चलते-चलते तीनों रागों- पूरिया, मारवा और सोहनी के स्वरों के चलन पर एक दृष्टि डालते हैं, जिससे एक ही स्वर के बावजूद रागों में उत्पन्न होने वाले अन्तर स्पष्ट हो जाएँगे।आप इन स्वर-संयोजनों का तुलनात्मक अवलोकन कीजिए और उसके बाद राग सोहनी की एक रचना पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में सुनिए।

राग पूरिया : नी रे(कोमल) ग, म(तीव्र) ध ग म(तीव्र) ग, म(तीव्र) रे(कोमल) ग s रे(कोमल) सा

राग मारवा : नी रे(कोमल) ग म(तीव्र) ध s, म(तीव्र) ग, रे(कोमल), ग रे(कोमल) सा

राग सोहनी : ग s म(तीव्र) ध नी सां s नी ध नी ध, म(तीव्र) ग, ग म(तीव्र) ध ग म(तीव्र) ग, रे(कोमल) सा

राग सोहनी के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए अब आप इस राग में निबद्ध एक रचना सुनिए, जिसे पण्डित कुमार गन्धर्व ने प्रस्तुत किया है।


राग सोहनी : ‘रंग न डारो श्याम जी...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व





आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 114वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत-अंश किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 116वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 112वें अंक में हमने आपको 1996 की एक संगीतप्रधान फिल्म ‘सरदारी बेगम’ से ठुमरी अंग का एक होली गीत सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर पिछले दो अंकों से विशेष अवसर के कारण हमारे लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ के आगामी अंकों को हमे दो सप्ताह का विराम देना पड़ा। अगले रविवार को हम इस श्रृंखला को जारी रखते हुए आपको एक और रागमाला गीत सुनवाएँगे और उस गीत पर आपसे चर्चा भी करेंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।


आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, March 30, 2013

स्वाधीनता संग्राम और फ़िल्मी गीत (भाग-4)


विशेष अंक : भाग 4


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में फिल्म संगीत की भूमिका 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! मित्रों, इन दिनों हर शनिवार को आप हमारी विशेष श्रृंखला 'भारत के स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका' पढ़ रहे हैं। पिछले सप्ताह हमने इस विशेष श्रृंखला का तीसरा भाग प्रस्तुत किया था। आज प्रस्तुत है, इस श्रृंखला का चौथा व अन्तिम भाग।


अब तक आपने पढ़ा -
पहला भाग
द्रितीय भाग
तृतीय भाग
गतांक से आगे...

फ़िल्म जगत के संगीतकारों में एक उल्लेखनीय नाम चित्रगुप्त का भी रहा है। उनका संगीतकार बनने का सपना तब पूरा हुआ जबन्यू दीपक पिक्चर्सके रमणीक वैद्य ने 1946 की दो स्टण्ट फ़िल्मों में उन्हें संगीत देने का निमन्त्रण दिया। ये फ़िल्में थीं लेडी रॉबिनहुडऔरतूफ़ान क्वीन। इन दो फ़िल्मों के गीतकार थे क्रम से ए. करीम और श्याम हिन्दी। दोनों फ़िल्मों के मुख्य कलाकार लगभग एक ही थेनाडिया, प्रकाश, शान्ता पटेल, अनन्त प्रभु प्रमुख।लेडी रॉबिनहुडमें एक देशभक्ति गीत थाभारत की नारी जाग उठी, अब होगा देशोद्धार”। ‘कमल पिक्चर्स, बम्बई’ की ऐतिहासिक फ़िल्म ‘मगधराजमें मोहनतारा और हमीदा बानो के गाए गीतों के अलावा फ़िरोज़ दस्तूर का गाया एक देशभक्ति गीत थाजननी जन्म भूमि माता, तेरा नाता, गोद में तेरी खेलने वालेफ़िल्म के गीतकार थे पंडित इन्द्र और संगीतकार थे बुलो सी. रानी। ‘के. अब्दुल्ला प्रोडक्शन्सके बैनर तले निर्मित फ़िल्महमजोलीमें हफ़ीज़ ख़ान का संगीत था और अंजुम पीलीभीती के गीत थे। नूरजहाँ, जयराज और गुलाम मोहम्मद अभिनीत इस फ़िल्म में नूरजहाँ के गाये अन्य गीतों के अलावा एक देशभक्ति गीत भी थाये देश हमारा प्यारा हिन्दुस्तान जहान से न्यारा, हिन्दुस्तान के हम हैं प्यारे, हिन्दुस्तान हमारा प्याराइस गीत ने स्वाधीनता संग्राम के उस अंतिम चरण में लोगों के दिल को छूआ ज़रूर होगा, पर उस समय यह गीत नूरजहाँ के लिए एक उपहास सिद्ध हुआ क्योंकि अगले ही वर्ष स्वाधीनता के बाद उन्हें हिन्दुस्तान छोड़ पाक़िस्तान जा बसना पड़ा। नूरजहाँ और सुरैया उस ज़माने की सबसे मशहूर अभिनेत्री-गायिकाएँ थीं। इन दोनों ने साथ में 1946 की मशहूर फ़िल्म ‘अनमोल घड़ी’ में काम किया था। इसके अलावा एकल रूप से सुरैया इस वर्ष नज़र आईं ‘उमर ख़य्याम’, जग बीती’, ‘भटकती मैना’, ‘उर्वशी’ और ‘1957’ जैसी फ़िल्मों में। ‘1857’ एक ऐतिहासिक/ देशभक्ति फ़िल्म थी जिसका निर्माणमुरारी पिक्चर्सके बैनर तले हुआ था। सज्जाद हुसैन के संगीत में फ़िल्म के गीत लिखे मोहन सिंह, शेवन रिज़वी, पंडित अंकुर और अंजुम पीलीभीती ने। फ़िल्म में एक समूह गीत था “दिल्ली तेरे क़िले पर होंगे निशां हमारे”। और इसके अगले ही साथ दिल्ली के लाल क़िले की प्राचीर पर पंडित नेहरू ने तिरंगा फहराया।

1943 मेंराजकमल कलामन्दिरकी पहली कामयाब फ़िल्मशकुन्तलाके बाद 1946 में व्ही. शान्ताराम लेकर आएडॉ. कोटनिस की अमर कहानी’, जिसने उनकी प्रतिभा का एक बार फिर से लोहा मनवाया। वसन्त देसाई के संगीत में जयश्री का गाया एक देशभक्ति गीत थाचल आ, चल आ, ग़ुलामी और नहीं तू जोश में आ, ये देश है तेरा”, जिसके बोल और धुन मशहूर चीनी रण-गीतचिलाईपर आधारित था। राजकमलकी 1946 की एक और मशहूर फ़िल्म थीजीवन यात्राजिसके मुख्य कलाकार थे नयन तारा, याकूब, बाबूराव पेण्ढारकर, प्रतिमा देवी प्रमुख। मास्टर विनायक फ़िल्म के निर्देशक थे। आज़ादी के द्वार पर देश आ पहुँचा था। इसलिए फ़िल्मों में भी आज़ादी की ख़ुशी के गीत बनने शुरु होने लगे थे। मनमोहन कृष्ण और साथियों का गाया इस फ़िल्म का एक ऐसा ही गीत थाआओ आज़ादी के गीत गाते चलें, इक सुनहरा संदेसा सुनाते चलें। और फिर आया 15 अगस्त 1947 का वह ऐतिहासिक दिन जो भारत के इतिहास का एक सुनहरा दिन बन गया। एक तरफ़ आया ‘Freedom at Midnight’ और दूसरी तरफ़ प्रदर्शित हुई ‘फ़िल्मिस्तान’ की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ‘शहनाई’। यह फ़िल्म बम्बई के नोवेल्टी थिएटर में प्रदर्शित हुई थी जब पूरा देश आज़ादी की ख़ुशियाँ मना रहा था।शहनाईकी मंगलध्वनियाँ गली-गली गूंज उठीं अमीरबाई और शमशाद बेगम की आवाज़ों के साथ फ़िल्म के शीर्षक गीतहमारे अंगना हो हमारे अंगना, आज बाजे, बाजे शहनाईके रूप में।

ब्रिटिश राज के समाप्त होते ही 1948 में जैसे फ़िल्मों में देशभक्ति और सर चढ़ कर बोलने लगा। ‘हुआ सवेरा’ शीर्षक से एक फ़िल्म आई, जिसका शीर्षक ही सब कुछ कह देता है। इस फ़िल्म में संगीतकार ज्ञान दत्त के संगीत में दो विजय गीत बने – “क़दम-क़दम पे क़ौम ने जो ज़िल्लतें सहीं.... हिन्दोस्ताँ आज़ाद” और “झण्डा हमारा ये सदा ऊँचा ही रहेगा”। ‘आज़ादी की राह पर’ फ़िल्म
के लगभग सभी गीत देशभक्ति के थे जैसे कि “जाग उठा है हिन्दुस्तान” (समूह गीत), “मेरे चरखे में जीवन का राग सखि” (कविता, साथी), “दिल फ़िदा करते हैं, कुर्बान जिगर करते हैं” (जी. एम. दुर्रानी), “बदल रही है ज़िंदगी” (बी. एस. नानजी), “भारत जननी तेरी जय हो, विजय हो” (नानजी, गान्धारी, साथी) और “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा” (बी. एस. नानजी, साथी)। साहिर लुधियानवी, राम प्रसाद बिस्मिल और श्याम लाल गुप्त की ये रचनाएँ थीं। ‘रोशन पिक्चर्स’ ने दो फ़िल्में बनाईं –‘आज़ाद हिन्दुस्तान’ और ‘देश सेवा’। दोनों के गीत पंडित अनुज ने लिखे और दोनों में संगीत था ए. आर. कुरेशी का। ‘आज़ाद हिन्दुस्तान’ में संदेश साम्प्रदायिक सदभाव की तरफ़ घूम गया और फ़िल्म में कुछ गीत थे “हे भारत के नर-नारी, कैसी बिगड़ी दशा तुम्हारी”, “आपस के झगड़े दूर करो, इन्सान बनो, इन्सान बनो”, “तुम गौर करो, गौर करो, हिन्दू-मुसलमान...”। ‘देश सेवा’ क गीतों में शामिल थे “जाग उठा है देश हमारा” और “आज़ाद हो गया है हिन्दुस्तान हमारा”। 1934 में ‘प्रभात फ़िल्म कंपनी’ संत एकनाथ पर फ़िल्म बनाना चाहते थे ‘महात्मा’ शीर्षक से। पर महात्मा गांधी से इस शीर्षक की समानता की वजह से ब्रिटिश राज की सम्भावित आपत्ति को ध्यान में रखते हुए सेन्सर बोर्ड ने इस शीर्षक की अनुमति नहीं दी, और अंत में फ़िल्म का नाम रखा गयाधर्मात्मा। पर देश आज़ाद होते ही 1948 में गांधी जी पर कम से कम दो फ़िल्में बनीं। एक ती ‘पटेल इण्डिया लिमिटेड, बम्बई’ की वृत्तचित्र ‘गांधीजी और दूसरी थी ‘डॉकुमेण्टरी फ़िल्म लिमिटेड, मद्रास’ की वृत्तचित्र ‘महात्मा गांधी’। इस फ़िल्म के गीतकार थे बी. राजरतनम, कु. प्रेमा और यशवंत भट्ट। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म ‘मजबूर’ में लता मंगेशकर और मुकेश का गाया नाज़िम पानीपती का लिखा व ग़ुलाम हैदर द्वारा स्वरबद्ध गीत था “अब डरने की बात नहीं अंग्रेज़ी छोरा चला गया”। इस गीत की कल्पना इसके बनने के एक साल पहले भी नहीं की जा सकती थी। मास्टर विनायक द्वारा निर्देशित अंतिम फ़िल्म ‘मंदिर’ में भी दो देश भक्ति गीत थे – “Quit India चले जाओ, हिन्द महासागर की लहरें...” और “जगमग भारत माँ का मंदिर”। इस फ़िल्म में लता मंगेशकर ने अभिनय किया था। क्या इन दो गीतों में उनकी आवाज़ शामिल थी, इस बात की पुष्टि नहीं हो पायी है। और इसी साल आई शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के जीवन पर आधारित पहली फ़िल्म ‘शहीद’। ‘फ़िल्मिस्तान’ निर्मित इस फ़िल्म में दिलीप कुमार बने भगत सिंह। ग़ुलाम हैदर के संगीत में राजा मेहंदी अली ख़ान का लिखा मोहम्मद रफ़ी, ख़ान मस्ताना और साथियों का गाया देश भक्ति गीत “वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हों” पूरे देश में आग की तरह फैल गया।

50 और 60 के दशकों में बहुत सी देशभक्ति फ़िल्में बनीं और बहुत से फ़िल्मी देशभक्ति गीत बने, जिन्हें बेहद कामयाबी और लोकप्रियता हासिल हुई, जो आज तक राष्ट्रीय पर्वों पर बजाये जाते हैं। अफ़सोस की बात है कि स्वाधीनता संग्राम के दौरान बनने वाले फ़िल्मी देशभक्ति गीतों को आज हम लगभग भुला चुके हैं और कहीं भी ये सुनाई नहीं देते, जबकि सच्चाई यह है कि इन्हीं गीतों ने स्वाधीनता संग्राम में देशवासियों में राष्ट्रीय एकता की उर्जा पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक तरफ़ जनसाधारण में राष्ट्रीयता के विचार जगाने का दायित्व और दूसरी तरफ़ ब्रिटिश शासन द्वारा प्रतिबंध का डर। इस कठिन स्थिति में उस दौर के फ़िल्मकारों ने जो सराहनीय योगदान दिया है, इस लेख के माध्यम से उन्हें हम झुक कर प्रणाम करते हैं। हमारे स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में इन फ़िल्मी कलाकारों के योगदान को भी सम्माननीय स्थान मिलना ही चाहिए।

समाप्त


आपको हमारा यह विशेष अंक कैसा लगा, हमे अवश्य लिखिए। आपका प्रिय साप्ताहिक स्तम्भ ‘सिने-पहेली’ बहुत जल्द नई साज-धज के साथ पुनः आरम्भ होगा। आज के इस विशेष अंक के बारे में आप अपने विचार हमे radioplaybackindia@live.com के पते पर अवश्य अवगत कराएँ। 

शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी

Thursday, March 28, 2013

तन रंग लो जी आज मन रंग लो... होली के गीतों से तन मन भीगोने वाला गीतकार




भारतीय सिनेमा के सौ साल – 40
कारवाँ सिने-संगीत का 

होली के हजारों रंग भरने वाले गीतकार शकील बदायूनी के सुपुत्र जावेद बदायूनी से बातचीत

‘लाई है हज़ारों रंग होली...’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का रस-रंग के उल्लासपूर्ण परिवेश में हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। परन्तु आज होली पर्व के विशेष अवसर के कारण हम दो वर्ष पूर्व सुजॉय चटर्जी द्वारा सुप्रसिद्ध गीतकार शकील बदायूनी के बेटे जावेद बदायूनी से की गई बातचीत का पुनर्प्रकाशन कर रहे हैं। आप जानते ही हैं कि शकील बदायूनी ने फिल्मों में कई लोकप्रिय होली गीत रचे थे, जो आज भी गाये-गुनगुनाए जाते हैं। 

होली है!!! 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के दोस्तों, नमस्कार, और आप सभी को रंगीन पर्व होली पर हमारी ढेर सारी शुभकामनाएँ। तो कैसा रहा होली का दिन? ख़ूब मस्ती की न? हमनें भी की। हमारी टोली दिन भर रंग उड़ेलते हुए, मौज-मस्ती करते हुए, लोगों को शुभकामनाएँ देते हुए, अब दिन ढलने पर आ पहुँचे हैं एक मशहूर शायर व गीतकार के बेटे के दर पर। ये उस अज़ीम शायर के बेटे हैं, जिस शायर नें अदबी शायरी के साथ-साथ फिल्म-संगीत में भी अपना अमूल्य योगदान दिया। हम आये हैं, शक़ील बदायूनी के साहबज़ादे जावेद बदायूनी के पास, उनके पिता के बारे में थोड़ा और क़रीब से जानने के लिए। इस बातचीत के साथ ही हम शक़ील साहब के लिखे कुछ बेमिसाल होली गीत भी आपको सुनवायेंगे।

सुजॊय- जावेद बदायूनी साहब, नमस्कार, और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

जावेद- बहुत-बहुत शुक्रिया, और आपको भी होली की शुभकामनाएँ।

सुजॊय- आज का दिन बड़ा ही रंगीन है और हमें बेहद ख़ुशी है कि आज के दिन आप हमारे पाठकों से रू-ब-रू हो रहे हैं।

जावेद- मुझे भी बेहद खुशी है, अपने पिता के बारे में कुछ बताने का मौका पाकर। 
 
सुजॊय- जावेद साहब, इससे पहले कि मैं आप से शक़ील साहब के बारे में कुछ पूछूँ, मैं यह बताना चाहूँगा कि उन्होंने कुछ शानदार होली गीत लिखे हैं, जिनका शुमार सर्वश्रेष्ठ होली गीतों में होता है। ऐसा ही एक होली गीत है फ़िल्म 'मदर इण्डिया' का, "होली आई रे कन्हाई, रंग छलके, सुना दे जरा बाँसुरी...”। आइए, शमशाद बेगम की आवाज़ में इस गीत को पहले सुनते हैं, फिर बातचीत को आगे बढ़ाते हैं।

जावेद- जरूर साहब, सुनवाइए। 


फिल्म मदर इण्डिया : ‘होली आई रे कन्हाई रंग बरसे...' : शमशाद बेगम और साथी



सुजॊय- जावेद साहब, यह बताइए कि जब आप छोटे थे, तब पिता के रूप में शक़ील साहब का बरताव कैसा हुआ करता था? घर-परिवार का माहौल कैसा था?

जावेद- एक पिता के रूप में उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता था और सिर्फ मेरे साथ ही नहीं, अपने सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे और सबसे हँस-खेल कर बातें करते थे। यानी कि घर का माहौल बड़ा ही ख़ुशनुमा हुआ करता था।

सुजॊय- जावेद जी, घर पर शायरों का आना जाना लगा रहता होगा?

जावेद- जी हाँ, बिलकुल। शक़ील साहब के दोस्त लोगों का आना-जाना लगा ही रहता था, जिनमें बहुत से शायर भी होते थे। घर पर ही शेर-ओ-शायरी की बैठकें हुआ करती थीं।

सुजॊय- जावेद साहब, शक़ील साहब के अपने एक पुराने इंटरव्यु में ऐसा कहा था कि उनके करीयर को चार पड़ावों में विभाजित किया जा सकता है। पहले भाग में 1916 से 1936 का समय जब वे बदायूँ में रहा करते थे। फिर 1936 से 1942 का समय अलीगढ़ का और फिर 1942 से 1946 तक दिल्ली का उनका समय। और अन्त में 1946 के बाद बम्बई का सफ़र। हमें उनकी फ़िल्मी करीयर, यानी कि बम्बई के जीवन के बारे में तो फिर भी पता है, क्या आप पहले तीन के बारे में कुछ बता सकते हैं?

जावेद- बदायूँ में जन्म और बचपन की दहलीज़ पार करने के बाद शकील साहब ने अलीगढ़ से अपनी ग्रैजुएशन पूरी की और दिल्ली चले गये, और वहाँ पर एक सरकारी नौकरी कर ली। साथ ही साथ अपने अंदर शेर-ओ-शायरी के जज्बे को कायम रखा और मुशायरों में भाग लेते रहे। ऐसे ही किसी एक मुशायरे में नौशाद साहब और ए.आर. कारदार साहब भी गए थे। उन्होने शकील साहब को नज़्म पढ़ते हुए सुना। उन पर शक़ील साहब की शायरी का इतना असर हुआ कि उसी वक़्त उन्हें फ़िल्म 'दर्द' के सभी गानें लिखने का ऒफ़र दे दिया।

सुजॊय- 'दर्द' का कौन सा गीत सबसे पहले उन्होंने लिखा होगा, इसके बारे में कुछ बता सकते हैं?

जावेद- उनका लिखा ‘हम दर्द का फसाना...’ पहला गीत था, और दूसरा गाना था ‘अफसाना लिख रही हूँ...’, उमा देवी का गाया हुआ।

सुजॊय- इस दूसरे गीत को हम अपने श्रोताओं को सुनवा चुके हैं। क्योंकि आज होली का अवसर है, आइए यहाँ पर शक़ील साहब का लिखा हुआ एक और शानदार होली गीत सुनते हैं। फ़िल्म 'कोहिनूर' से जिसका संगीत नौशाद साहब ने तैयार किया था।

जावेद- ज़रूर सुनवाइए।


फिल्म कोहिनूर : ‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो...’ : मोहम्मद रफी और साथी


सुजॊय- जावेद साहब, क्या शक़ील साहब कभी आप भाई-बहनों को प्रोत्साहित किया करते थे लिखने के लिए?

जावेद- जी हाँ, वो प्रोत्साहित भी करते थे और जब हम कुछ लिख कर उन्हें दिखाते तो वो ग़लतियों को सुधार भी दिया करते थे।

सुजॊय- शक़ील बदायूनी और नौशाद अली, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू थे। ये दोनों एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे। क्या शक़ील साहब आप सब को नौशाद साहब और उस दोस्ती के बारे में बताया करते थे? या फिर इन दोनों से जुड़ी कोई यादगार घटना या वाकया याद है आपको?

जावेद- यह हक़ीक़त है कि शकील साहब और नौशाद साहब ग्रेटेस्ट फ्रेंड थे। शक़ील साहब, नौशाद साहब के साथ अपने परिवार से भी ज़्यादा वक़्त बिताया करते थे। दोनों के आपस की ट्युनिंग् ग़ज़ब की थी और यह ट्युनिंग इनके गीतों से साफ़ झलकती है। शक़ील साहब के गुज़र जाने के बाद भी नौशाद साहब हमारे घर आते रहते थे और हमारा हौसला-अफ़ज़ाई करते थे। यहाँ तक कि नौशाद साहब हमें बताते थे कि ग़ज़ल और नज़्म किस तरह से पढ़ी जाती है और मैं जो कुछ भी लिखता था, वो उन्हें सुधार दिया करते थे।

सुजॊय - यानी कि शक़ील साहब एक पिता के रूप में जिस तरह से आपको गाइड करते थे, उनके जाने के बाद वही किरदार नौशाद साहब ने निभाया और आपको पिता के समान स्नेह दिया।

जावेद- इसमें कोई शक नहीं।

सुजॊय- जावेद साहब, बचपन की कई यादें ऐसी होती हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। शक़ील साहब से जुड़ी आप के मन में भी कई स्मृतियाँ होंगी। उन स्मृतियों में से कुछ आप हमारे साथ बाँटना चाहेंगे?

जावेद- शकील साहब के हम सब प्रायः रेकार्डिंग पर जाया करते थे और कभी-कभी तो वो हमें शूटिंग् पर भी ले जाते। फ़िल्म 'राम और श्याम' के लिए वो हमें मद्रास ले गये थे। 'दो बदन', 'नूरजहाँ' और कुछ और फ़िल्मों की शूटिंग् पर हम सब गये थे। वो सब यादें अब भी हमारे मन में ताज़ा हैं जो बहुत याद आते हैं।

सुजॊय- अब मैं आपसे जानना चाहूँगा कि शक़ील साहब के लिखे कौन कौन से गीत आपको व्यक्तिगत तौर पे सब से ज़्यादा पसंद हैं?

जावेद- उनके लिखे सभी गीत अपने आप में मासटरपीस हैं, चाहे किसी भी संगीतकार के लिए लिखे गये हों।

सुजॊय- निस्सन्देह।

जावेद- यह बता पाना नामुमकिन है कि कौन सा गीत सर्वोत्तम है। मैं कुछ फ़िल्मों के नाम ज़रूर ले सकता हूँ, जैसे कि 'मदर इण्डिया', 'गंगा जमुना', 'बैजु बावरा', 'चौदहवीं का चांद', 'साहब बीवी और ग़ुलाम', और ‘मुगल-ए-आजम’।

सुजॊय- वाह! आपने फिल्म मुगल-ए-आजम का ज़िक्र किया, और आज हम आप से शक़ील साहब के बारे में बातचीत करते हुए उनके लिखे कुछ होली गीत सुन ही रहे हैं, तो मुझे एकदम से याद आया कि इस फ़िल्म में भी एक ऐसा गीत है जिसे हम पूर्णतः होली गीत तो नहीं कह सकते, लेकिन क्योंकि उसमें राधा और कृष्ण के छेदछाड़ का वर्णन है इसलिए इसे यहाँ पर बजाया जा सकता है। मूलतः यह गीत लखनऊ कथक घराने के संस्थापक बिंदादीन महाराज की एक ठुमरी रचना है, जिसे फिल्म के नृत्य निर्देशक लच्छू महाराज और संगीत निर्देशक नौशाद ने शकील साहब से फिल्म के लिए पुनर्लेखन कराया था।

जावेद- जी बिलकुल ठीक फरमाया आपने। सुनने वालों को यह होली गीत जरूर सुनवाइये।


फिल्म मुगल-ए-आजम : ‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे...’ : लता मंगेशकर और साथी


सुजॊय- अच्छा जावेद साहब, हम शक़ील साहब के लिखे गीतों को हर रोज़ ही कहीं न कहीं से सुनते हैं, लेकिन उनके लिखे गैर-फिल्मी नज़मों और गज़लों को कम ही सुना जाता है। इसलिए मैं आप से उनकी लिखी अदबी शायरी और प्रकाशनों के बारे में जानना चाहूँगा।

जावेद- मैं आपको बताऊँ कि भले ही वो फ़िल्मी गीतकार के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, लेकिन हक़ीक़त में पहले वो एक लिटररी फ़िगर थे और बाद में फ़िल्मी गीतकार। फ़िल्मों में गीत लेखन वो अपने परिवार को चलाने के लिये किया करते थे। जहाँ तक ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का सवाल है, उन्होंने ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों के पाँच दीवान लिखे हैं, जिनका अब ‘कुलयात-ए- शकील’ के नाम से संकलन प्रकाशित हुआ है। उन्होंने अपने जीवन काल में 500 से ज़्यादा ग़ज़लें और नज़्में लिखे होंगे जिन्हें आज भारत, पाक़िस्तान और दुनिया भर के देशों के गायक गाते हैं।

सुजॊय- आपने आँकड़ा बताया तो मुझे याद आया कि हमनें आप से शक़ील साहब के लिखे फ़िल्मी गीतों की संख्या नहीं पूछी। कोई अंदाज़ा है आपको कि शक़ील साहब ने कुल कितने फ़िल्मी गीत लिखे होंगे?

जावेद- उन्होने 108 फिल्मों में लगभग 800 गीत लिखे थे। इनमें से 5 फिल्में अनरिलीज़्ड भी हैं।

सुजॊय- वाह! जावेद साहब, यहाँ पर हम शक़ील साहब का लिखा एक और बेहतरीन होली गीत सुनना और सुनवाना चाहेंगे। नौशाद साहब के अलावा जिन संगीतकारों के साथ उन्होंने काम किया, उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है रवि साहब का। अभी कुछ देर पहले आपने 'दो बदन' और 'चौदहवीं का चाँद' फ़िल्मों का नाम लिया जिनमें रवि का संगीत था। तो रवि साहब के ही संगीत में शक़ील साहब नें फ़िल्म 'फूल और पत्थर' के भी गीत लिखे जिनमें एक होली गीत था- ‘लाई है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिये, कोई मन के लिए...’ आइए सुनते हैं इस गीत को।


फिल्म फूल और पत्थर : ‘लाई है हज़ारों रंग होली...’ : आशा भोसले और साथी


सुजॊय- अच्छा जावेद साहब, अब एक आख़िरी सवाल आप से। शक़ील साहब नें जो मशाल जलाई है, क्या उस मशाल को आप या परिवार का कोई और सदस्य उसे आगे बढ़ाने में इच्छुक हैं?

जावेद- मेरी बड़ी बहन रज़ीज़ को पिता जी के गुण मिले हैं और वो बहुत खूबसूरत शायरी करती हैं।

सुजॊय- बहुत-बहुत शुक्रिया जावेद साहब। होली के इस रंगीन पर्व को आप ने शक़ील साहब की यादों से और भी रंगीन किया, और साथ ही उनके लिखे होली गीतों को सुन कर मन ख़ुश हो गया। भविष्य में हम आपसे शक़ील साहब की शख्सियत के कुछ अनछुये पहलुओं पर चर्चा करना चाहेंगे। आपको एक बार फिर होली की हार्दिक शुभकामना देते हुए अब विदा लेते हैं, नमस्कार।

जावेद- आपको और सभी पाठकों / श्रोताओं का बहुत-बहुत शुक्रिया और होली की मुबारकबाद अदा करता हूँ।

तो दोस्तों, होली पर ये थी 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की ख़ास प्रस्तुति जिसमें हमनें शक़ील बदायूनी के लिखे होली गीत सुनने के साथ-साथ थोड़ी बातचीत की, उन्हीं के बेटे जावेद बदायूनी से। आपको आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए  radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें। आप सभी को एक बार फिर होली की हार्दिक शुभकामनाएँ, नमस्कार!

Tuesday, March 26, 2013

राग रंग तरंग, होली की उमंग


प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट 

राग आधारित होली के गीत 

स्वर एवं प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 

स्क्रिप्ट - कृष्णमोहन मिश्र 

Monday, March 25, 2013

युवाओं को एक नए भारत की सृष्टि के लिए आन्दोलित करता एक संगीतमय प्रयास

प्लेबैक वाणी -38 - संगीत समीक्षा - बीट ऑफ इंडियन यूथ


संगीत केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं है। इसका मूल उद्देश्य इंसान के मनोभावों को एक कैनवास, एक प्लेटफॉर्म देना है। इसकी कोशिश यह होनी चाहिए कि समय-समय पर डूबती उम्मीदों को तिनके भर का हीं सही लेकिन सहारा मिलता रहे। आज अपने देश में हालात यह हैं कि हर इंसान या तो डरा हुआ है या बुझा हुआ है। युवा पीढी रास्ते में या तो भटक रही है या रास्ते को हीं दुलाती मार रही है। इस पीढी की आँखें खोलने के लिए संगीत की कमान थामे कुछ फ़नकार आगे आए हैं। उन्हीं फनकारों की संगीतमय कोशिश का नाम है ’बीट ऑफ इंडियन यूथ’। इस एलबम में कुल ९ भाषाओँ के १३ गाने हैं, जो कि एक विश्व रिकॉर्ड है. एल्बम गिनिस बुक ऑफ रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराने की कगार पर है. एलबम की एक और प्रमुख खासियत यह है कि इसे डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम का साथ और आशिर्वाद हासिल है। पहला गाना इन्हीं ने लिखा है।

कम साज़ों के साथ शुरू होता ’द वीज़न’ बच्चे की मासूमियत में घुले हुए डॉ कलाम के शब्दों के सहारे खड़ा होता है और फिर सजीव सारथी के शुद्ध हिन्दी के शब्द इसके असर को कभी ठहराव तो कभी गति देते हैं। राष्ट्र को सुखी, समृद्ध एवं स्वावलंबी बनाने की बातें कही गई हैं और यह तभी हो सकता है जब सब मिलकर आगे बढें। इस एलबम की सोच भी यही है, यही वीज़न है। संगीतकार कृष्णा राज और आवाज़ के तीनों हीं फ़नकारों (उन्नी, श्रीराम एवं मीरा) के सपने शब्द-शिल्पियों के जैसे हीं हैं। इसीलिए गाने में संदेश उभरकर आया है। बस मुझे यह लगा कि भावुकता खुलकर आई है, लेकिन जोश में थोड़ी कमी रह गई। शायद ’परकशन इंस्ट्रुमेंट्स’ थोड़े और जोड़े जा सकते थे।

अगला गाना है ’असतो मा सद्गमय’। अक्षि उपनिषद की यह पंक्ति जो शांति मंत्र के रुप में जानी जाती है, एक प्रार्थना है, एक दुआ है। ये शब्द बढने की प्रेरणा देते हैं। लॉयड ऑस्टिन ने इन्हीं शब्दों की नींव पर कोंकणी की इमारत खड़ी की है। संगीत सुलझा हुआ है। रोशन डिसुज़ा संस्कृत और कोंकणी के ट्रांजिशन में अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने देते। प्रकाश महादेवन की भी मैं इसी खासियत के लिए तारीफ करूँगा। उनकी आवाज़ में ज़रूरी मात्रा में खनक है, खरापन है, खुलापन है। कोरस का इस्तेमाल बढिया है। कुल मिलाकर यह गीत खुद को बरसों तक जीवित रखने में सफल हुआ जाता है।

’थीम सांग’.. यह नाम है तीसरे गाने का। धुन जितनी मुश्किल है, उतनी हीं आसानी से सजीव सारथी ने इस पर बोल गढे हैं। एक जोश है शब्दों में और गाने की ताल सच में ताथैया करती है। उम्मीद है कि आसमान छूने को प्रेरित करता यह गीत सुनने वालों को झूमने पर भी बाध्य कर देगा। उन्नी की आवाज़ में मधुरता है और कुहू की आवाज़ में हल्का मर्दानापन। इसे अनुपात से संतुलित किया जा सकता था या फिर शायद यह जानबूझकर किया गया है। खैर.. इन बातों से गाने का असर ज़रा भी नहीं बिगड़ता।

भांगड़ा पंजाबियत की पहचान है, एक उत्सव है, अपना दिल खोलकर रखने की एक कवायद है। ’इंडिया सानु’ गाने में अमनदीप अपनी आवाज़ और शब्दों के साथ यही कोशिश करते हैं। संगीत है प्रभजोत सिंह का। हिन्दुस्तान को अपनी जान कहने की यह कोशिश थोड़ी कामयाब भी है, लेकिन गाने के तीनों हीं पक्ष पारंपरिक तरीके के लगते हैं। नीयत सही जगह पर है, लेकिन गाने में उतनी जान नहीं आ पाई। जिस नयेपन की दरकार थी, वह कहीं रह-सी गई है, ऐसा लगता है।

इलेक्ट्रॉनिक गिटार एक गजब की शय है। शांत बैठे हुई साँसों को भी हवा में उड़ाने लगता है। “वा वा जय कलाम” में कलाम की शख्सियत यूँ तो की बोर्ड पर गढी गई है, लेकिन उनकी ऊँचाई नज़र आती है गिटार के परवाज़ से हीं। विष्णु की आवाज़ है और हरेश के बोल। परंतु इस गाने की यू एस पी, इस गाने की जान हैं जिबिन जॉर्ज। संगीत की दृष्टि से यह गाना जितना ज़रूरी है, उतनी हीं इसकी महत्ता राष्ट्रभक्ति और मोटिवेशन के लहजे से है। इस गीत के साथ मैं भी डॉ कलाम को नमन करता हूँ।

बांग्ला भाषा मेरे दिल के करीब है। एक शीतलता, एक सौम्यता दिखती है इसमें। कहते हैं कि जब ज़बान मीठी हो, तो ख्याल, शब्द, संगीत, रिश्ते सब कुछ मीठे हो जाते हैं। ऐसे में अगर ये रिश्ते दूर होने लगें तो दर्द गहरा होगा। इलेक्टॉनिक साजों पर सजा यह गीत अंदर के गुबार को बाहर लाने के लिए आवाज़ में भारीपन का सहारा तो लेता है, लेकिन भीतर छुपी कोई चोट अंत होते-होते मधुरता और भावुकता में तब्दील हो हीं जाती है। शेखर गुप्ता की आवाज़ ऐसे गानों के लिए “टेलर मेड” है। श्रृजा सिन्हा तेज धुन पर साफ सुनाई नहीं देतीं, लेकिन धुन मद्धम होते हीं अपनी रवानी पर आ जाती हैं। जे एम सोरेन का प्रयास दिखता है। हाँ सुमंता चटर्जी से बस यह जानना चाहूँगा कि “मोने पोरे” बहुत हीं कॉमन एक्स्प्रेशन है क्या बंगाल में? 

घोर निराशा में उतरा यह दिल आशा की खिड़की तक देख नहीं पाता। ऐसे में डेसमंड फरनांडीज का यह कहना कि ’हेवेनली फादर.. यू टेक अवे माई पेन’ बहुत हीं खास मायने रखता है। आवाज़ में खुद को जगाने की जो जद्दोजहद है, वह बड़ी हीं काबिले-तारीफ है। संगीत सधा हुआ है। शब्द उड़ने के लिए आमंत्रित करते हैं और जैसे हीं ’आई फ्लाई’ का उद्घोष होता है, मन होता है कि सारी बेड़ियाँ कुतर दी जाएँ। गाना जो आधा सफर तय कर चुका होता है तब एक धुन कई बार दुहराई गई है। मुझे यह धुन कुछ सुनी-सुनी-सी लगी या फिर हो सकता है कि इस धुन का असर “देजा वु” की तरह हो। फिर भी मुझे लगा कि इस धुन पर जोशीले शब्द गढे जा सकते थे, जो गीतकार से छूट-से गए। डेसमंड मेरी इस राय से शायद इत्तेफाक रखते हों। खैर…. मुझे पिछले ७ गानों में सबसे ज्यादा इसी ने प्रभावित किया।

अगला गाना है “लफ़्ज़ नहीं मिलते”। यह गाना एलबम में मिसफिट-सा मालूम होता है। बोल कमज़ोर हैं तो वहीं गायक की मेहनत भी कहीं कहीं कन्नी काटकर निकलने जैसी लगती है। ऐसा नहीं है कि आवाज़ में कहीं कोई खामी है, लेकिन दो-चार जगहों पर जबरदस्ती की गई तुकबंदी गायक को शब्द चबाने पर मजबूर कर गई है। संगीत आज के बॉलीवुड गानों जैसा है इसलिए ज़ेहन पर चढ तो जाता है लेकिन नयापन गैरमौजूद है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि तीनों हीं पहलुओं पर अनुदत्त और श्रीधर को और ध्यान देने की ज़रूरत थी। गाने का निराशावादी होना भी मुझे खटक गया। 

कह नहीं सकता कि जे एम सोरेन की मीठी आवाज़ का कमाल है या फिर संथाली भाषा हीं शक्कर-सी मीठी है कि ’जोनोम देशोम’ दिल में एकबारगी हीं उतर जाता है। साजों का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से किया गया है, जिससे एक वृत्त में घूमते नृतकों और वाद्य-यंत्रों का माहौल तैयार हो रहा है। शायद मादल है। कहीं कहीं एकतारा-सा भी बजता मालूम होता है। हिमालय, हिन्द महासागर, हिन्दुस्तान और इसके गाँवों की सुंदरता का बखान इससे बेहतर तरीके से शायद हीं हो सकता था। लाउस हंसदक का लिखा यह गाना मुझे बरसों याद रहेगा… यकीनन।

बॉलीवुड में सईद कादरी कई सालों से लिख रहे हैं और हिट पे हिट गाने दिये जा रहे हैं। फिर भी मुझे उनके गानों में एक कमी खटकती है और वह है कुछ नया कहने की जद्दोजहद, जिद्द। “क्या यही प्यार है”.. यह बात न जाने कितनी बार हमें सुनाई जा चुकी है। इसलिए हम किसी अलहदा एक्सप्रेशन की खोज में रहते हैं। “मुझसे दिल” गाने में श्रीधर भी उसी ढर्रे पर चलते नज़र आ रहे हैं। हाँ यहाँ पर संगीतकार अनुदत्त अपनी तरफ से सफल कहे जा सकते हैं। साजों का प्रयोग बेहतर है और उनकी आवाज़ में एक तरलता, एक प्रवाह भी है। फिर भी एक बदलाव के तौर पर प्रोफेशनल गायक का इस्तेमाल किया जा सकता था। शायद शेखर गुप्ता अच्छे चुनाव होते।

एलबम का अगला गाना है ’गेलुवा बा’। यह ’वा वा जय कलाम’ का कन्नड़ संस्करण है, इसलिए संगीत के लिहाज से वहीं ठहरता है जहाँ मूल तमिल गाना था। शब्द सूर्य प्रकाश के हैं। चूँकि मुझे इस भाषा की कोई जानकारी नहीं ,इसलिए मैं कथ्य पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता। तमिल के बरक्स इस गाने में आवाज़ खुद जिबिन जॉर्ज की है। ’वा वा कलाम’ में विष्णु सी सलीम खुले गले से गाते मालूम हो रहे थे, लेकिन यहाँ जिबिन की आवाज़ कुछ दबी-सी है और यही इस गाने का कमजोर पक्ष है। 

आतंकवाद और इसकी जड़ में छुपे आत्मघाती दस्ते हिन्दुस्तान के इतिहास के लिए नए नहीं हैं। इसलिए दरकार है कि आज की युवा पीढी इनके दुष्परिणामों से परिचित रहे। सजीव सारथी अपने लिखे ’मानव बम’ में यही प्रयास करते दिखते हैं। किसी जन्नत की ख्वाहिश में दुनिया को जहन्नुम करने चले ये मौत के सौदागर कहीं और से तो नहीं आए, यही जन्मे है और यही गढे गए हैं। संदेश साफ है। फिर भी ’है धोखा जैसे खौफ़ का’ जैसी पंक्तियों से बचा जा सकता था। कोशिश तुकबंदी की है, लेकिन न अर्थ खुल रहा है और न हीं धुन सज रही है। रोडर की आवाज़ में एक मासूमियत है, जिसमें जोश पूरा नहीं उतर पाया है। हाँ जे एम सोरेन सौ फीसदी सही रास्ते पर हैं। जॉनर रॉक है, इसलिए लाइव कंसर्ट जैसी फीलिंग है। बस एक फाईनल ड्राफ्ट हो जाता तो यह गाना इस एलबम का बेस्ट साँग होता।

’टु रु टु रु टु रु टु रु’… वाह.. यह सुनते हीं दिल खुद-ब-खुद गाने में डूब जाता है। ऐसा हीं जादू है ’नी एन्निल’ गाने का। बोल मलयालम के हैं, जिसे खुद संगीतकार राकेश ने जिबिन के साथ मिलकर रचा है। वैसे यह गाना पूरा का पूरा राकेश केशव का हीं है। इनकी आवाज़ रेशम की तरह फ्री फ्लोविंग है और हर ठहराव अपनी नियत जगह पर है। संगीत और साजों का इस्तेमाल गाने के मूड को परफेक्टली सूट करते हैं। बाकी यह कहना तो मुश्किल है कि ऐसा कौन-सा तड़का है इस गाने में जो इसे खास बनाता है। कुछ तो है जो बस महसूस किया जा सकता है, शब्दों में उतारा नहीं जा सकता। 

तो यह था ’बीट ऑफ इंडियन यूथ’ एलबम के गानो का रिव्यू। मेरी कोशिश थी कि एक संतुलित और ईमानदार राय दे सकूँ। आप भी सुनिए और अपनी राय हमसे शेयर कीजिए। हमें इंतज़ार रहेगा।       

संगीत समीक्षा - विश्व दीपक 
आवाज़ - अमित तिवारी


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संगीत समीक्षा - बीट ऑफ इंडियन यूथ


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