Sunday, September 30, 2012

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी



स्वरगोष्ठी – ९० में आज  
‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ 

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं, कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों के बीच उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज से हम आरम्भ कर रहे हैं, एक नई लघु श्रृंखला- ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’। शीर्षक से आपको यह अनुमान हो ही गया होगा कि इस श्रृंखला में हम आपके लिए कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियाँ प्रस्तुत करने जा रहे हैं, जिन्हें भारतीय फिल्मों में शामिल किया गया। फिल्मों का हिस्सा बन कर इन ठुमरियों को इतनी लोकप्रियता मिली कि लोग मूल पारम्परिक ठुमरी को प्रायः भूल गए। इस श्रृंखला में हम आपके लिए उप-शास्त्रीय संगीत की इस मनमोहक विधा के पारम्परिक स्वरूप के साथ-साथ फिल्मी स्वरूप भी प्रस्तुत करेंगे। 


घु श्रृंखला- ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के आज के पहले अंक का राग है, झिंझोटी और ठुमरी है- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’। परन्तु इस ठुमरी पर चर्चा से पहले ठुमरी शैली पर थोड़ी चर्चा आवश्यक है। ठुमरी भारतीय संगीत की रस, रंग और भाव से परिपूर्ण शैली है, जिसे उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल से लेकर अब तक अपार लोकप्रियत मिली। यद्यपि इस शैली के गीत रागबद्ध होते हैं, किन्तु "ध्रुवपद" और "ख़याल" की तरह राग के कड़े प्रतिबन्ध नहीं रहते। रचना के शब्दों के अनुकूल रस और भाव की अभिव्यक्ति के लिए कभी-कभी गायक राग के स्वरों में अन्य स्वरों को भी मिला देते हैं। ठुमरी गीतों में श्रृंगार और भक्ति रस की प्रधानता होती है। कुछ ठुमरियों में इन दोनों रसों का अद्भुत मेल भी मिलता है।

आज के अंक में प्रस्तुत की जाने वाली पारम्परिक ठुमरी- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ के गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ सम्पूर्ण भारतीय संगीत का प्रतिनिधित्व करते थे। वे उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। उन्होने दक्षिण के कर्नाटक संगीत के कई रागों को उत्तर भारतीय संगीत में शामिल किया और सरगम के विशिष्ट अन्दाज को उत्तर भारत में प्रचलित किया। किराना घराने के इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष १८८४ में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं, वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत-सभाओं में गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे १८९९ से १९०२ तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। खाँ साहब खयाल गायकी के साथ ठुमरी, दादरा, भजन और मराठी नाट्य संगीत के गायन में भी दक्ष थे। वर्ष १९२५-२६ में उनकी गायी राग झिंझोटी की अत्यन्त लोकप्रिय ठुमरी- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ का रिकार्ड भी बना था। आइए, उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वर में सुनते हैं, राग झिंझोटी यही प्रसिद्ध ठुमरी।

ठुमरी राग झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ

 

इस परम्परागत ठुमरी को १९३६ में हिन्दी भाषा में निर्मित फिल्म "देवदास" में शामिल किया गया था। फिल्म का निर्देशन पी.सी. बरुआ ने किया था। फिल्म में देवदास की भूमिका में कुन्दनलाल सहगल, पारो (पार्वती) की भूमिका में जमुना बरुआ और चन्द्रमुखी की भूमिका में राजकुमारी ने अभिनय किया था। फिल्म के संगीतकार तिमिर बरन (भट्टाचार्य) थे। तिमिर बरन उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के शिष्य और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वानों के कुल के थे। साहित्य और संगीत में कुशल तिमिर बरन के 'न्यू थियेटर्स' में प्रवेश करने पर पहली फिल्म "देवदास" का संगीत निर्देशन सौंपा गया। इस फिल्म में राग "झिंझोटी" की इसी परम्परागत ठुमरी का स्थायी और एक अन्तरा सहगल साहब ने अत्यन्त संवेदनशीलता के साथ गाया था। रिकार्डिंग के बाद सहगल साहब की आवाज़ में इस ठुमरी को अब्दुल करीम खाँ साहब ने सुना और सहगल साहब के गायन-शैली की खूब तारीफ़ करते हुए उन्हें बधाई का एक सन्देश भी भेजा था। सहगल साहब ने परदे पर मदहोश देवदास की भूमिका में इस ठुमरी को गाया था। गायन के दौरान ठुमरी में तालवाद्य (तबला आदि) की संगति नहीं की गई है। पार्श्व-संगीत के लिए केवल वायलिन और सरोद की संगति है। आइए, राग "झिंझोटी" की यह ठुमरी के.एल. सहगल के स्वरों में सुनते हैं।


फिल्म – देवदास : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ : कुन्दनलाल सहगल



इसी ठुमरी गीत के साथ आज के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए। अगले अंक में ऐसी ही एक और परम्परागत ठुमरी पर आपसे चर्चा करेंगे। 


आज की पहेली

आज की संगीत पहेली में हम आपको एक सुविख्यात गायिका के स्वर में ठुमरी का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह हमारा ९०वाँ अंक है और इस अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।  



१_यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?  
२_ इस ठुमरी की गायिका कौन हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९२वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता  

‘स्वरगोष्ठी’ के ८८वें अंक की पहेली में हमने पं. श्रीकुमार मिश्र द्वारा मयूरवीणा पर प्रस्तुत एक राग-रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ‘मारूबिहाग’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर ताल ‘तीनताल’ है। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर, उत्तर प्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और अहमदाबाद, गुजरात के हमारे एक नये प्रतिभागी कश्यप दवे ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

‘स्वरगोष्ठी’ के ८८वें अंक के प्रकाशन के पहले दिन हम अंक की क्रम संख्या बदलना भूल गए थे। अगले दिन हमने अपनी इस भूल को सुधार दिया था। हमारे कुछ प्रतिभागियों ने पहेली का उत्तर क्रम संख्या ८७ और कुछ ने ८८ क्रमांक अंकित कर भेजा। हमने इन दोनों क्रमांक पड़े हुए उत्तर को स्वीकार किया है। अपनी इस भूल के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में भी हम फिल्मों के आँगन में विचरती, इठलाती, मचलती और ठुमकती ठुमरियों का सिलसिला जारी रखेंगे। अगले अंक में हम अपने इस मंच पर एक मशहूर हस्ती का जन्मदिन भी मनाएँगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित आपकी अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 


कृष्णमोहन मिश्र 


 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता

दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।



Saturday, September 29, 2012

सिने पहेली # 39 - भगत सिंह विशेष

सिने-पहेली # 39 

(29 सितंबर, 2012) 

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का आपके मनपसंद स्तंभ 'सिने पहेली' में। दोस्तों, कल 28 सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिन था, यह तो आप सभी ने याद रखा होगा। हमने भी 'सिने पहेली' में पिछले सप्ताह उनके गाये गीतों पर अपनी पहेली को केन्द्रित किया। पर क्या आपको पता है कि 28 सितंबर को शहीदे आज़म सरदार भगत सिंह की भी जयन्ती होती है। बहुत ही अफ़सोस की बात है कि बहुत कम लोगों को इस बात का पता है। आज के इस 'सिने पहेली' की शुरूआत हम शहीद भगत सिंह को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए कर रहे हैं।


और अब 'सिने पहेली' संबंधित कुछ ज़रूरी बातें। इस प्रतियोगिता के जवाब ई-मेल द्वारा प्राप्त किए जाने की वजह से कुछ प्रतियोगियों ने इसकी पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। जो प्रतियोगी भाग लेते हैं, उनके शारीरिक अस्तित्व को लेकर भी संदेह व्यक्त हुआ है। हालाँकि 'सिने पहेली' के प्रस्तुतकर्ता इसमें ख़ास कुछ कर नहीं सकते, पर आप सभी खिलाड़ियों से अनुरोध ज़रूर कर सकते हैं कि आप 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' के फ़ेसबूक पेज से जुड़ें (Link: https://www.facebook.com/radioplaybackindia), ताकि आपके प्रोफ़ाइल की जाँच हो जाये और आप फ़ेसबूक पर 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' से भी जुड़ जायें। जो प्रतियोगी फ़ेसबूक में हमसे जुड़ना नहीं चाहते, और अपना परिचय गुप्त रखना चाहते हैं, उनसे निवेदन है कि 'सिने पहेली' के ईमेल पते पर अपना फ़ोन नंबर लिख भेजें। हम SMS के द्वारा आपके परिचय की जाँच कर लेंगे। आपका फ़ोन नंबर गुप्त रहेगा। कृपया 'सिने पहेली' का अगला सेगमेण्ट शुरू होने से पहले इन दोनों तरीकों में से जो तरीका आपको पसंद हो, उस पर अमल करें।

आशा भोसले पर केन्द्रित 'सिने पहेली' में फ़िल्म 'काग़ज़ की नाव' का एक गीत शामिल किया गया था "न जैयो सौतन घर सैयां"। हमारे एक प्रतियोगी ने आश्चर्य व्यक्त किया है कि चार-चार खिलाड़ियों ने कैसे इतने मुश्किल गीत को पहचान लिया जबकि यह गीत कहीं पर उपलब्ध नहीं है। इस प्रश्न के जवाब के लिए मैं दायित्व देना चाहूंगा हमारे वरिष्ठ साथी कृष्णमोहन मिश्र जी को क्योंकि यह गीत उन्हीं का सुझाया हुआ था और उन्होंने ही इस गीत का ऑडियो मुझे उपलब्ध करवाया था। जिन प्रतियोगियों ने इसका सही जवाब भेजा था, उनसे भी निवेदन है कि टिप्पणी में लिखें कि इस गीत को उन्होंने कैसे पहचाना?

चलिए बातें बहुत हुईं, अब हम अपने नये प्रतियोगियों के लिए बताते हैं 'सिने पहेली महाविजेता' बनने के आसान से नियम...


कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?

1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। तीसरे सेगमेण्ट की समाप्ति पर अब तक का 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...


4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

और अब आज की पहेली...


आज की पहेलियाँ : कौन हूँ मैं?

'कौन हूँ मैं' के अन्तर्गत आज हम पूछ रहे हैं चार पहेलियाँ। हर पहेली के लिए आपको मिलेंगे 2.5 अंक। इस तरह से कुल 10 अंकों की है आज की 'सिने पहेली'। तो ये रही आज की पहेलियाँ

1. मैं धर्म से सिख हूँ। संगीतकार के रूप में मेरा फ़िल्मी आगाज़ 'निहाल फ़िल्म कॉर्पोरेशन' की एक फ़िल्म से हुआ जिसमें मैंने टी. के. दास के साथ मिल कर संगीत दिया। इस फ़िल्म का शीर्षक गीत मोहम्मद रफ़ी से हमने गवाया था जो राग भैरवी में था। इस फ़िल्म के अगले ही साल मैंने हुस्नलाल-भगतराम के साथ एक फ़िल्म में संगीतकार की भूमिका निभाई। इस फ़िल्म के अगले ही साल मेरे परिवार ने फ़िल्म प्रोडक्शन कंपनी खोल दी और इस बैनर तले जिस पहली फ़िल्म का निर्माण हुआ उसमें बतौर अभिनेत्री सुरैया और बतौर निर्देशक फणी मजुमदार को लिया गया। इसी प्रोडक्शन ने आगे चलकर एक ऐसी फ़िल्म का निर्माण किया जिस शीर्षक से हाल में अक्षय कुमार अभिनीत एक फ़िल्म भी बनी है। तो फिर बताइए कौन हूँ मैं?

2. मैं एक संगीतकार रहा। मेरे हिस्से में अधिकतर धार्मिक और स्टण्ट फ़िल्में ही आईं। मेरी स्वरबद्ध पहली फ़िल्म में मेरे साथ रामप्रसाद और मोहम्मद शफ़ी भी संगीतकार थे। क्योंकि मैं अच्छा गा भी लेता था, इसलिए इस फ़िल्म में मैंने एक दर्द भरा गीत भी गाया था। मैंने अन्य संगीतकारों की धुनों का इस्तमाल अपने गीतों में किया। मसलन, हंसराज बहल द्वारा स्वरबद्ध गीत "जिन रातों में नींद उड़ जाती है" और ओ.पी. नय्यर द्वारा स्वरबद्ध "एक परदेसी मेरा दिल ले गया" जैसे लोकप्रिय गीतों की धुनों पर मैंने गीत बनाये। मैंने कई नई आवाज़ों को मौका दिया जैसे कि कृष्णा कल्ले, सुरेश राजवंशी, कमल बारोट, उषा बलसावर। आज अगर लोग मुझे याद करते हैं तो मेरे द्वारा स्वरबद्ध आशा भोसले और मन्ना डे के गाये एक युगल गीत की वजह से। तो बताइए कौन हूँ मैं?

3. 22 मार्च 1927 को जन्मे और महाराज उमैद सिंह के यहाँ कार्यरत रहने के बाद लाहौर में पं अमरनाथ और गुलाम हैदर के पास तथा उसके बाद लखनऊ में HMV में नौकरी करने के बाद मैंने बतौर संगीतकार फ़िल्म-संगीत में कदम सामाजिक फ़िल्मों के माध्यम से रखा। 1963 की एक फ़िल्म में मैंने सुमन कल्याणपुर से एक गीत गवाया था और इसी साल एक राजस्थानी फ़िल्म में भी मैंने इसी गीत की धुन पर महेन्द्र कपूर से एक गीत गवाया था। 2 फ़रवरी 1980 को मैंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। मेरे पुत्रों ने संगीतकार की जोड़ी बनाई पर उन्हें कामयाबी नहीं मिली। पर उनके संगीत में लता-रफ़ी का गाया एक युगल गीत लता-रफ़ी के सदाबहार युगल गीतों में शामिल किया जाता है, और आज भी रेडियो पर कभी-कभार सुनाई दे जाता है। तो बताइए कौन हूँ मैं?

4. मेरा जन्म और परवरिश अमरीका में हुआ। मैं मूल रूप से अमरीकी हूँ। जब मैं यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउदर्ण कैलिफ़ोर्णिया में एक फ़िल्म कोर्स कर रहा था, तब मुझे मेरे एक मित्र से भारत आने का निमंत्रण मिला। मैं भारत आया और बिना किसी भारतीय भाषा के ज्ञान के भारत में फ़िल्में निर्देशित करनी शुरू कर दी। बतौर निर्देशक यहाँ मेरी पहली फ़िल्म में मैंने एक लीजेन्डरी स्टार (मरणोपरान्त 'भारत रत्न' से सम्मानित) को लौंच किया। बाद में मैंने एक अन्य लीजेन्डरी कलाकार को भी निर्देशित किया, जो उनके करीयर की एक मीलस्तंभ बनी। इस लीजेन्डरी कलाकार को भी आगे चलकर 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। तो फिर बताइए कौन हूँ मैं?


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और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

1. उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

2. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 39" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान अवश्य लिखें।

3. आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 4 अक्टूबर शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

4. सभी प्रतियोगियों ने निवेदन है कि सूत्र या हिंट के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के किसी भी संचालक या 'सिने पहेली' के किसी भी प्रतियोगी से फ़ोन पर या ईमेल के ज़रिए सम्पर्क न करे।

5. कोई भी प्रतियोगी किसी अन्य प्रतियोगी से किसी पहेली का जवाब बताने का निवेदन नहीं करेगा, और न ही हिंट माँगेगा।


पिछली पहेली के सही जवाब

लता मंगेशकर के गाये गीतों की मेडली में क्रम से निम्नलिखित गीत शामिल किये गये थे:

1. मैं खिली खिली फुलवारी (सुभद्रा, 1946)
2. ऐ आँख अब न रोना (सिपहिया, 1949)
3. लम्बी जोरू बड़ी मुसीबत (एक थी लड़की, 1949)
4. जाना ना दिल से दूर (आरज़ू, 1950)
5. माने ना हाय बलम (जागीर, 1957)
6. कैसी ख़ुशी की है रात (नगीना, 1951)
7. साजन ले जाएगा तुझको घर (ग़बन, 1966)
8. वो पास नहीं मजबूर है दिल (नौ बहार, 1952)
9. मचलती आरज़ू खड़ी बाहें पसारे (उसने कहा था, 1960)
10. चला भी आ, आजा रसिया (मन की आँखें, 1970)
11. मैं ना मिलूंगी (प्यार का मौसम, 1969)
12. मैं तो जाऊँगी जाऊँगी रे उस पार (चानी, 1977)
13. देखो कोई प्यार न करना (अपना बना लो, 1982)
14. तेरे प्यार पे भरोसा करती हूँ (हवालात, 1987)
15. पैजनिया बोल (नाचे मयूरी, 1986)
16. सुन सुन सुन मेरे साथिया (अनमोल, 1993)
17. ये दिल बेवफ़ा से वफ़ा कर रहा है (बेवफ़ा से वफ़ा, 1992)
18. होठों पे बस तेरा नाम है (ये दिल्लगी, 1994)
19. अंदेखी अंजानी सी (मुझसे दोस्ती करोगे?, 2002)
20.  हम तो भई जैसे हैं (वीर ज़ारा, 2004)


पिछली पहेली के परिणाम

'सिने पहेली - 38' के परिणाम इस प्रकार हैं...

1. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 9 अंक

2. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 9 अंक

3. सलमन ख़ान, दुबई --- 8.5 अंक

4. शुभ्रा शर्मा, नई दिल्ली --- 8 अंक

5. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 8 अंक

6. क्षिति तिवारी, जबलपुर --- 8 अंक

7. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 6.5 अंक

8. रीतेश खरे, मुंबई --- 4 अंक

9. मंदार नारायण, कोल्हापुर --- 2.5 अंक

10. अमित चावला, दिल्ली --- 2.5 अंक

11. निशान्त अहलावत, गुड़गाँव --- 2.5 अंक


और यह रहा चौथे सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोर-कार्ड...



'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, लता जी को जनमदिन की ढेरों शुभकामनाओं के साथ आपसे विदा ले रहे हैं, नमस्कार!

Friday, September 28, 2012

"मेंहदी लगे हाथ" और "उस बीज की तलाश है"

शब्दों के चाक पर - 16

पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड, झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार, बनती ललनाओं का सिंगार।
जब फूल पिरोये जाते हैं,
हम उनको गले लगाते हैं।

दोस्तों, आज की कड़ी में हमारे दो विषय हैं - "मेंहदी लगे हाथ" और "उस बीज की तलाश है"। जीवन के इन दो अलग-अलग पहलुओंकी कहानियाँ पिरोकर लाये हैं आज हमारे विशिष्ट कवि मित्र: सरस्वती माथुर, शशि पुरवार, राजेश कुमारी, गुंजन श्रीवास्तव, अमित आनंद पांडे, पूनम जैन कासलीवाल, रिया लव, हर्षवर्धन वर्मा,मुकेश कुमार सिन्हा एवम् कई अन्य कविगण। पॉडकास्ट को स्वर दिया है अभिषेक ओझा ओर शैफाली गुप्ता ने, स्क्रिप्ट रची है विश्व दीपक ने, सम्पादन व संचालन है अनुराग शर्मा का, व सहयोग है वन्दना गुप्ता का। आइये सुनिए सुनाईये ओर छा जाईये ...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)


  या फिर यहाँ से डाउनलोड करें 

"शब्दों के चाक पर" हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 


1. इस साप्ताहिक कार्यक्रम में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी के फेसबुक ग्रुप में यहाँ जुड़ सकते है.

2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के प्रमुख पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगी. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से यह बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

4. अधिक जानकारी के लिए आप हमारे संचालक विश्व दीपक जी से इस पते पर संपर्क कर सकते हैं-   vdeepaksingh@gmail.com 

Thursday, September 27, 2012

मैंने देखी पहली फिल्म : अनुराग शर्मा की यादों से झांकती दो फ़िल्में



मैंने देखी पहली फ़िल्म : अनुराग शर्मा 

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान में प्रत्येक गुरुवार को हम आपके लिए सिनेमा के इतिहास पर विविध सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को आपके संस्मरणों पर आधारित ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ का प्रकाशन करते हैं। आज माह का चौथा गुरुवार है, इसलिए आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, गैर-प्रतियोगी संस्मरण। आज का यह संस्मरण, रेडियो प्लेबैक इण्डिया के संचालक-मण्डल के सदस्य अनुराग शर्मा का है।


‘गीत’ के गीत में फूलों की सुगन्ध है तो ‘पुष्पांजलि’ के गीत में राधा के लिए कृष्ण की व्यग्रता

मेरी आयु चार-पाँच वर्ष की थी जब हम लोग जम्मू के तालाब तिल्लो के एक नये बन रहे इलाक़े में किराये पर रहने आये थे। दिन में स्कूल जाना और शाम को अपने मित्रों के साथ तरह-तरह के खेल खेलना। आस-पास नहरें, खड्डों, पत्थरों और जंगली झाड़ियों की भरमार थी। जल्दी ही मैं आक और लेंटाना के पौधों को पहचानने लगा। छोटे-छोटे लाल बेर हम बच्चों के पसन्दीदा थे, जिन्हें डोगरी में गरने कहा जाता था। हमसे कुछ बड़ी लड़कियाँ शाम को जगमगाते जुगनुओं को अपनी चुन्नी में सम्हालकर ऐसे लपेट लेती थीं कि वे सुरक्षित रहते हुए उन्हें प्रकाशित करते रहें।

शाम को रेडियो पर "रेडियो कश्मीर-जम्मू की आवाज़" सुनते थे। मुंशी अंकल और निक्की की बातचीत सुनकर मज़ा आता था। कभी कभार सुबह को कुन्दनलाल सहगल और रात में हवामहल सुनना भी याद है। रविवार को रेडियो पर किसी हिन्दी फ़िल्म का ऑडियो सुनाया जाता था जिसे सभी बड़े ध्यान से सुनते थे और कई बार हम लोग भी। मुकेश के स्वर में "सावन का महीना" उन गीतों में से एक है जिनकी यादें सबसे पुरानी हैं।

जम्मू से पहले की छिटपुट यादें रामपुर, बदायूँ और बरेली की हैं लेकिन जम्मू के दृश्य लम्बे और अधिक स्पष्ट हैं। रामपुर में घर के बाहर शाम को एक पुलिया पर अपने मित्रों के साथ बैठकर एक सुर में "बम बम भोले" कहने की याद तो है लेकिन मित्रों के नाम नहीं याद। जबकि जम्मू की यादों में पात्रों के चेहरे-मोहरे और व्यक्तित्व के साथ उनके नाम भी अधिकांशतः स्पष्ट हैं। तब से अब तक अनगिनत फ़िल्में देखी होंगी, न जाने कितनी भाषाओं में। लेकिन पीछे जाकर देखता हूँ तो सबसे पहले जम्मू में देखी दो फ़िल्मों के बहुत से सुन्दर दृश्य और गीत याद आते हैं। पहाड़ी नगरी जम्मू में देखी ये दोनों हिन्दी फ़िल्में मैंने अपने माता-पिता के साथ शायद कुछ ही दिनों के अंतराल में देखी थीं। एक फ़िल्म का तो नाम ही "गीत" था। शायद तब उम्र की कमी के कारण या तब से इतना समय ग़ुज़र जाने के कारण फ़िल्म की कथा तो पूरी तरह याद नहीं लेकिन कई गीत और दृश्य अब भी दिल में जगह बनाकर डटे हुए हैं। पहला फ़िल्मी दृश्य जो मुझे अभी भी अच्छी तरह याद है, वह है "आजा तुझको पुकारें मेरे गीत रे..." गीत का दृश्य। ऐसा लगता है कि जब हम हाल में घुसे थे तो फ़िल्म शुरू हो चुकी थी और यह गीत चल रहा था। आइये, एक पल रुककर सुनें यह मधुर गीत-

फिल्म – गीत : ‘आजा तुझको पुकारे मेरे गीत...’ : मुहम्मद रफी


बचपन की दूसरी फ़िल्म थी "पुष्पांजलि"। ठीक से नहीं कह सकता कि ‘गीत’ और ‘पुष्पांजलि’ में से पहले कौन सी फ़िल्म देखी थी। जहाँ ‘गीत’ के जितने भी गीत या दृश्य याद हैं, वे सब हरियाली, सुन्दर फूलों व प्रसन्न करने वाले संगीत में ढले हैं वहीं ‘पुष्पांजलि’ का गीत "दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहाँ..." सुनते समय आज भी किसी प्रिय के खो जाने की भावना का अनुभव होता है। जीवन में पहली बार शायद इसी फ़िल्म को देखकर मुझे मृत्यु के शाश्वत सत्य का अहसास हुआ था। लगभग उन्हीं दिनों अपनी ही उम्र के उस छोटे से लड़के को देखा जो अपने घर के बाहर खड़ा होकर हर आने-जाने वाले हमउम्र से डोगरी में कहता था, "तेरा भाई मर गया।" पूछताछ करने पर पता लगा कि कुछ दिन पहले ही उसका भाई पास की नहर में बह गया था और फिर उसकी लाश ही वापस आई। कुछ दिन बाद मैं भी उसी नहर में बहते समय अपने मकान मालिक के किशोर पुत्र व उनके साथियों द्वारा बचा लिया गया था। मृत्यु की इन हाड़-कँपाती यादों के बीच देखी गयी इन दो फ़िल्मों का न केवल याद रहना बल्कि मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन जाना, अब स्वाभाविक सा ही लगता है। मन्ना डे के मधुर स्वर और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के मधुर संगीत में ढला इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत "शाम ढले यमुना किनारे ..." दशकों बाद आज भी मन में बसा हुआ है।

फिल्म – पुष्पांजलि : ‘शाम ढले यमुना किनारे...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर


उसके बाद देखी हुई फ़िल्मों में भुवन शोम, त्रिकाल, चौदहवीं का चाँद, कागज़ के फूल, उमराव जान (पुरानी), जुनून, विजेता और इनके अलावा अनेक फ़िल्में याद हैं मगर इन दो की बात ही कुछ और है।

आपको अनुराग जी की देखी पहली फिल्म का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता


दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।




Wednesday, September 26, 2012

रबिन्द्र संगीत (पहला भाग) - एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट (१४)

रबिंद्रसंगीत एक विशिष्ट संगीत पद्धति के रूप में विकसित हुआ है। इस शैली के कलाकार पारंपरिक पद्धति में ही इन गीतों को प्रस्तुत करते हैं। बीथोवेन की संगीत रचनाओं(सिम्फनीज़) या विलायत ख़ाँ के सितार की तरह रबिंद्रसंगीत अपनी रचनाओं के गीतात्मक सौन्दर्य की सराहना के लिए एक शिक्षित, बुद्धिमान और सुसंस्कृत दर्शक वर्ग की मांग करता है। १९४१ में गुरूदेव की मृत्यु हो गई परन्तु उनका गौरव और उनके गीतों का प्रभाव अनन्त है। उन्होंने अपने गीतों में शुद्ध कविता को सृष्टिकर्त्ता, प्रकृति और प्रेम से एकीकृत किया है। मानवीय प्रेम प्रकृति के दृश्यों में मिलकर सृष्टिकर्त्ता के लिए समर्पण (भक्ति) में बदल जाता है। उनके 2000 अतुल्य गीतों का संग्रह गीतबितान(गीतों का बागीचा) के रूप में जाना जाता है। (पूरा टेक्स्ट यहाँ पढ़ें )

आईये आज के ब्रोडकास्ट में शामिल होईये संज्ञा टंडन के साथ, रविन्द्र संगीत पर इस चर्चा के पहले भाग में. स्क्रिप्ट है सुमित चक्रवर्ती की और आवाज़ है संज्ञा टंडन की   
या फिर यहाँ से डाउनलोड करें

Tuesday, September 25, 2012

कहानी पॉडकास्ट - एक पढ़ी लिखी स्त्री - क्रांति त्रिवेदी - शेफाली गुप्ता

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने देवेन्द्र पाठक "मुन्ना" की आवाज़ में प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हरिशंकर परसाई का व्यंग्य "मध्यम वर्गीय कुत्ता" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार क्रांति त्रिवेदी की कहानी "एक पढ़ी लिखी स्त्री", जिसको स्वर दिया है शेफाली गुप्ता ने।

एक पढ़ी लिखी स्त्री का पाठ्य अभिव्यक्ति पर उपलब्ध है।

इस कहानी का कुल प्रसारण समय 8 मिनट 19 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष कैलाश पंत ने 30 अक्टूबर 2010 को घोषणा की कि मध्यप्रदेश में हर वर्ष युवा कथाकारों के लिए क्रांति त्रिवेदी पुरस्कार दिया जायेगा।

क्रांति त्रिवेदी ~ जन्म : रायपुर, छत्तीसगढ। शिक्षा : एम ए, नागपुर विश्वविद्यालय। कहानी संग्रह - दीप्त प्रश्न, शायर का अंत, एक अंतहीन प्यास, नारी मन की कहानियां, नारी तथा अन्य कहानियां, दीक्षा।


हर सप्ताह "बोलती कहानियाँ" पर सुनें एक नयी कहानी

"सीखूँगी माँ, सब कुछ सीखूँगी। मैंने कब कहा कि पढ़ाई से सारे काम हो जाते हैं लेकिन माँ पढ़ाई को सबसे प्रमुख रखूँगी।" (क्रांति त्रिवेदी की "एक पढ़ी लिखी स्त्री" से एक अंश)

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#31th Story, Ek Padhi Likhi Stri: Kranti Trivedi/Hindi Audio Book/2012/31. Voice: Shaifali Gupta

Monday, September 24, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१७) हीरोईन, और आपकी बात

संगीत समीक्षा -  हीरोईन



संवेदनशील विषयों को अपनी समग्रता के साथ परदे पर उतारने के लिए जाने जाते हैं निर्देशक मधुर भंडारकर. तब्बू से लेकर रवीना, प्रियंका तक जितनी भी हेरोईनों ने उनके साथ काम किया है अपने करियर की बेहतरीन प्रस्तुति दी है, ऐसे में जब फिल्म का नाम ही हेरोईन हो, तो दर्शकों को उम्मीद रहेगी कि उनकी फिल्म, माया नगरी में एक अभिनेत्री के सफर को बहुत करीब से उजागर करेगी. जहाँ तक उनकी फिल्मों के संगीत का सवाल है वो कभी भी फिल्म के कथा विषय के ऊपर हावी नहीं पड़ा है. चलिए देखते हैं फिल्म “हेरोईन” के संगीत का हाल –

मधुर की फिल्म “फैशन” में जबरदस्त संगीत देने वाले सलीम सुलेमान को ही एक बार फिर से आजमाया गया है “हेरोईन” के लिए. गीतकार हैं निरंजन आयंगर. आईटम गीतों के प्रति हमारे फिल्मकारों की दीवानगी इस हद तक बढ़ गयी है कि और कुछ हो न हो एक आईटम गीत फिल्म में लाजमी है, ऐसे ही एक आईटम गीत से अल्बम की शुरुआत होती है- हलकट जवानी. मुन्नी और शीला की तर्ज पर एक और थिरकती धुन, मगर हलकट जवानी पूरी तरह से एक बनावटी गीत लगता है. चंद दिनों बाद कोई शायद ही इस गीत को सुनना पसंद करेगा. पर न इसमें गलती सलीम सुलेमान जैसे काबिल संगीतकार जोड़ी की है न सुनिधि के गायन की. कमी उस रवायत की है जो आनन् फानन में कोई भी तीखा अनोखा शब्द युग्म लेकर आईटम गीतों को रचने की जबरदस्ती से पैदा हो चली है. अच्छे संगीत संयोजन के बावजूद गीत में आत्मा नहीं है. अल्बम की एक निराशाजनक शुरुआत है ये गीत.

हालाँकि इस गीत सुनने के बाद अल्बम को लेकर बहुत सी उम्मीदें नहीं जगती मगर फिर भी अगला गीत “साईयाँ” जो कि राहत फ़तेह अली खान की आवाज़ में है उस खोयी हुई उम्मीद में एक चमक जरूर भर देता है. वोयिलन का सुन्दर इस्तेमाल, शब्दों का अच्छा प्रयोग और सलीम सुलेमान की खासियत से भरा संयोजन इस गीत में दर्द और मासूमियत भरता है. राहत की आवाज़ में वही चिर परिचित सोज़ है, जो इस गीत को और भी असरकारक बना देता है.

अदिति सिंह शर्मा की रोबीली आवाज़ में “मैं हेरोईन हूँ” शायद एल्बम का सबसे शानदार गीत है. इस गीत में नयापन भी है, ताजगी भी. रिदम और आवाज़ का तालमेल भी जबरदस्त है. निरंजन के शब्द भी असरदायक हैं. गीत में जो किरदार दर्शाना चाह रहा है वो अदिति की आवाज़ में जम कर सामने आता है. लंबे समय तक याद रखे जाने वाला गीत है ये.

“मैं हेरोईन हूँ” को सुनने के तुरंत बाद जब आप श्रेया की हलकी हस्की टोन वाली आवाज़ में “ख्वाहिशें’ सुनते हैं तो एक बार फिर सलीम सुलेमान की तारीफ किये बिना नहीं रह पायेंगें. हर शुक्रवार को बदलते समीकरणों में एक हेरोईन के संघर्ष, उसकी पीड़ा को दर्शाया था कभी गुलज़ार साहब ने भी फिल्म “सितारा” में, (वो गीत कौन सा था ये हमारे श्रोता हमें सुझाएँ). यहाँ ख्वाह्शों के इसी सफर को बखूबी पेश किया है श्रेया ने अपनी आवाज़ में. शब्द अच्छे जरूर है पर थोड़ी सी मेहनत और हुई होती तो शायद ये गीत एक मील का पत्थर साबित होता, बहरहाल इस रूप में भी ये बेहद कारगर है यक़ीनन.

आखिरी गीत “तुझपे फ़िदा” बेनी दयाल और श्रद्धा पंडित के स्वरों में है, यहाँ फिर वही बनावटीपन है गीत में. एक बेअसरदार गीत. कुल मिलाकर “मैं हेरोईन हूँ”, “ख्वाहिशें” और “साईयाँ” एल्बम के बेहतर गीत हैं, सलीम सुलेमान की इस कोशिश को रेडियो प्लेबैक २.८ की रेटिंग दे रहा है ५ में से. आपकी राय क्या है, हमें अवगत कराएँ.


और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Sunday, September 23, 2012

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला : पं. श्रीकुमार मिश्र से बातचीत (२)



स्वरगोष्ठी ८९ में आज  

परदे वाले गजवाद्यों की मोहक अनुगूँज
 

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र फिर एक बार आज की महफिल में उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। गत सप्ताह हमारे बीच जाने-माने इसराज और मयूरवीणा-वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र उपस्थित थे, जिन्होने गज-तंत्र वाद्य सारंगी के विषय में हमारे साथ विस्तृत चर्चा की थी। हमारे अनुरोध पर श्रीकुमार जी आज भी हमारे साथ हैं। आज हम उनसे कुछ ऐसे गज-तंत्र वाद्यों का परिचय प्राप्त करेंगे, जिनमें परदे होते हैं।


कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के सुरीले मंच पर एक बार पुनः आपका हार्दिक स्वागत है। गत सप्ताह हमने आपसे सारंगी वाद्य के बारे में चर्चा की थी। आज इस श्रृंखला में एक और कड़ी जोड़ते हुए सारंगी के ही एक परिवर्तित रूप के बारे में जानना चाहते हैं। वर्तमान में इसराज, दिलरुबा, तार शहनाई और स्वयं आप द्वारा पुनर्जीवित वाद्य मयूरवीणा ऐसे वाद्य हैं, जो गज से बजाए जाते हैं, किन्तु इनमें सितार की भाँति परदे लगे होते हैं। इन परदे वाले गज-वाद्यों की विकास-यात्रा के बारे में बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : ‘स्वरगोष्ठी’ के संगीत-प्रेमियों को मेरा अभिवादन। संगीत-रत्नाकर, संगीतसार व संगीतराज आदि प्राचीन ग्रन्थों में निःशंकवीणा तथा पिनाकीवीणा का उल्लेख मिलता है। वर्तमान सारंगी इनका ही परिवर्तित और विकसित रूप हैं। परन्तु परदे वाले गज-वाद्यों का आविष्कार इन वाद्यों के बहुत बाद में हुआ। इस सम्बन्ध में प्रोफेसर रामकृष्ण ने ऋषि मतंग को किन्नरीवीणा का आविष्कारक कहा है। मतंग से पूर्व वीणा में परदे नहीं होते थे। उन्होने ही सर्वप्रथम वीणा पर सारिकाओं (परदों) की योजना की थी। डॉ. लालमणि मिश्र के मतानुसार आधुनिक युग के सभी तंत्रीवाद्य, जिन पर परदे हैं, किन्नरीवीणा के ही विकसित रूप हैं।

कृष्णमोहन : वर्तमान में प्रचलित परदे वाले वाद्यों का इतिहास कितना प्राचीन है?

श्रीकुमार मिश्र : यहाँ मैं पुनः डॉ. लालमणि मिश्र की पुस्तक का सन्दर्भ देना चाहूँगा। उनके मतानुसार लगभग दो सौ वर्ष पूर्व, दो प्रमुख कारणों से परदे वाले गज-वाद्यों का प्रचलन आरम्भ हुआ। पहला कारण तो यह था कि सारंगी की उपयोगिता आरम्भ से ही संगति वाद्य के रूप में ही रही। स्वतंत्र वादन के लिए सारंगी में परदे की आवश्यकता हुई। दूसरा कारण बताते हुए डॉ. लालमणि लिखते हैं कि लगभग दो शताब्दी पूर्व सारंगी पर पेशेवर संगीतज्ञों का एकाधिकार था। वे शिष्यों को सारंगी वादन की बारीकियाँ सिखाने से कतराते थे। ऐसे में सारंगी में सितार या सुरबहार की भाँति परदे लगा कर एक नए वाद्य की परिकल्पना की गई। परदायुक्त जो गज-वाद्य पहले प्रचलित हुआ, उसे इसराज नाम दिया गया। आरम्भ में यह वाद्य काफी बड़े आकार का था और इसकी कुण्डी मयूर की आकृति की थी, इसलिए इसे मयूरवीणा, ताऊस या मयूर इसराज नाम से पुकारा जाने लगा। बाद में इसकी कुण्डी और डाँड़ को छोटा कर दिया गया। आकृति में यह परिवर्तन बंगाल में हुआ और यह इसराज नाम से लोकप्रिय हुआ। छोटी कुण्डी वाले इसराज के प्रचलित हो जाने के बाद मयूर की आकृति वाले वाद्य विस्मृत से हो गए।

कृष्णमोहन : पाठकों को हम यह बता देना चाहते हैं कि मयूर की आकृति वाले विस्मृत वाद्य मयूरवीणा का पुनरोद्धार लगभग एक दशक पूर्व श्रीकुमार जी ने ही लखनऊ के वाद्य-निर्माता बादशाह भाई उर्फ बारिक अली के सहयोग से किया था। आइए, यहाँ थोड़ा विराम देकर श्रीकुमार जी का मयूरवीणा-वादन सुनते हैं। राग है मारूबिहाग और तबला संगति की है, भरत मिश्र ने।

मयूरवीणा वादन : राग मारूबिहाग : पं. श्रीकुमार मिश्र


कृष्णमोहन : परदायुक्त गजवाद्यों की विशेषताओं के बारे में भी कुछ बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : इस वर्ग के वाद्यों के निर्माण से स्वतंत्र अथवा एकल वादन के क्षेत्र में गजवाद्यों की सम्भावनाएँ काफी विस्तृत हो गईं। पहले बंगाल में और फिर पंजाब में इसराज बेहद लोकप्रिय हुआ। इस लोकप्रियता का कारण है, इसमें लगे परदे और धातु के तार। परदे और धातु के तारों से उँगलियों के स्पर्श और क्रियाकलापों से उत्पन्न होने वाली कलात्मक लड़ियाँ, कण, गमक, सूत आदि में एक अलग प्रकार की खनक कायम हुई। सुनने में ऐसा लगता है मानो सितार और सारंगी का युगल वादन हो रहा है। इसराज का ही एक लघु रूप दिलरुबा है, जिसका प्रचलन पंजाब में खूब हुआ। दिलरुबा का चलन बढ़ जाने के कारण लगभग एक शताब्दी पूर्व पंजाब में मयूर इसराज या मयूरवीणा की लोकप्रियता समाप्त हो गई थी।

कृष्णमोहन : यहाँ पर एक और विराम लेकर, संगीत-प्रेमियों को हम दिलरुबा-वादन सुनवाते है। उस्ताद रणवीर सिंह प्रस्तुत कर रहे हैं, दिलरुबा पर राग तिलंग का वादन।

दिलरुबा वादन : राग तिलंग : उस्ताद रणवीर सिंह


कृष्णमोहन : इसराज वाद्य की विशेषताओं के बारे में हमारे पाठकों-श्रोताओं को परिचित कराइए।

श्रीकुमार मिश्र : आघात से बजने वाले और गज से बजने वाले, दोनों प्रकार के वाद्यों के गुण एक वाद्य में आ जाने के कारण इसराज, गतकारी का कौशल प्रदर्शित करने के लिए एक आदर्श वाद्य बन गया। बंगाल में यह अत्यन्त प्रतिष्ठित हुआ। पिछले ५०-६० वर्षों में सितार, सरोद, संतूर, वायलिन आदि वाद्यों की लोकप्रियता बढ़ने के कारण इसराज की लोकप्रियता में कमी अवश्य आई है।

कृष्णमोहन : हमारे पास बंगाल के ही चर्चित इसराज वादक पं. बुद्धदेव दास की एक रिकार्डिंग है, जिसे हम अपने पाठकों-श्रोताओं के लिए प्रस्तुत कर रहे है। श्री दास ने इसराज पर राग सिन्धु भैरवी का वादन किया है।

इसराज वादन : राग सिंधु भैरवी : पं. बुद्धदेव दास


कृष्णमोहन : इसी के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक को यहीं विराम देते हैं और पं. श्रीकुमार मिश्र जी के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।

श्रीकुमार मिश्र : यह मेरा सौभाग्य है कि ‘स्वरगोष्ठी’ के संगीत-प्रेमियों के बीच आने का मुझे अवसर मिला। मैं आप सब पाठकों-श्रोताओं को धन्यवाद देता हूँ।

आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की आज की संगीत-पहेली में हम आपको कण्ठ-संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछेंगे। ९०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी श्रृंखला के विजेता होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

२ – यह भारतीय संगीत की कौन सी शैली है?
आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८७वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध सारंगी वादक पं. रामनारायण की बजायी एक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे का सही उत्तर है- सारंगी वाद्य। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। दोनों विजेताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का
  
मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जिसके अन्तर्गत बीते युग के कुछ भूले-बिसरे स्वरों को आप सुनेंगे। यही नहीं इन मूर्धन्य कलासाधकों की पारम्परिक रचनाओं को बाद में भारतीय फिल्मों में भी शामिल किया गया। आपके लिए हम इन रचनाओं के दोनों रूप प्रस्तुत करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप अवश्य पधारिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, September 22, 2012

'सिने पहेली' आज स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर के नाम

सिने-पहेली # 38 

(22 सितंबर, 2012) 


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का आपके मनपसंद स्तंभ 'सिने पहेली' में। एक आवाज़ है जो पिछले सात दशकों से दुनिया की फ़िज़ाओं में गूंज रही है। यह वह स्वरगंगा है जिसमें जिसने भी डुबकी लगाई, उसने ही तृप्ति पायी। नाद की इस अधिष्ठात्री की आवाज़ में संगम की पवित्रता है जो हर मन को पवित्र कर देती है। इस स्वरधारा में कभी नदिया का अल्हड़पन है तो कभी झरने की चंचलता, और कभी उन्मुक्त व्योम में मन को लीन कर देने वाली शक्ति है इस आवाज़ में। यह स्वर एक ऐसा अतिथि है जिसे दुनिया के किसी भी घर में प्रवेश करने के लिए किसी के अनुमति की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह स्वर एक साथ करोड़ों घरों में गूंजती है, हर रोज़। हम कितने ख़ुशनसीब हैं कि हमने अपने जीवन काल में इस आवाज़ का रस पान किया। अफ़सोस तो उन लोगों के लिए होता है जो इस आवाज़ के आने से पहले ही इस दुनिया को छोड़ चुके थे। अमृत पर तो केवल देवताओं का अधिकार है, पर इस स्वर का अमृत सभी के लिए है। जिसने भी इसका रस पान किया, मुग्ध हो गया, पुलकित हो गया रोम-रोम। जिन निर्माताओं के फ़िल्मों में यह आवाज़ सुनाई दी, जिन गीतकारों के बोलों को यह आवाज़ मिली, और जिन संगीतकारों की धुनों को अपनी मधुर आवाज़ से संवारा, वो तो निहाल हुए ही, उनके साथ निहाल हुए इन असंख्य गीतों को सुनने वाले। जीवन के हर भाव को व्यक्त करती यह आवाज़ है भारत कोकिला, भारत-रत्न, इस देश की सुरीली धड़कन, स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर की। मरुस्थल को भी हरियाली में परिवर्तित कर देने वाली लता जी का आगामी 28 सितंबर को 84-वाँ जनमदिवस है। 'सिने पहेली' परिवार की तरफ़ से लता जी को जनमदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए आज की यह कड़ी हम उन्हीं के नाम करते हैं। और लता जी पर केन्द्रित आज की पहेली पूछने से पहले जान लीजिए 'सिने पहेली महाविजेता' बनने के नियम...


कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। तीसरे सेगमेण्ट की समाप्ति पर अब तक का 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...




4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

और अब आज की पहेली...


आज की पहेली : मेरी आवाज़ ही पहचान है...


लता जी को समर्पित आज की 'सिने पहेली' में हम आपको सुनवा रहे हैं एक मेडली, जिसमें लता जी के गाए 20 गीतों की झलकियाँ आपको सुनने को मिलेंगी। आपको इन 20 गीतों के मुखड़े पहचानने हैं। हर सही मुखड़े के लिए आपको मिलेंगे 0.5 अंक। अर्थात् 20 गीतों के लिए 10 अंक। सुनिए इस मेडली को और सुलझाइए आज की पहेली।





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और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

1. उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

2. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 38" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान अवश्य लिखें।

3. आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 27 सितंबर शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

4. सभी प्रतियोगियों ने निवेदन है कि सूत्र या हिंट के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के किसी भी संचालक या 'सिने पहेली' के किसी भी प्रतियोगी से फ़ोन पर या ईमेल के ज़रिए सम्पर्क न करे। हिंट माँगना और हिंट देना, दोनों इस प्रतियोगिता के खिलाफ़ हैं। अगर आपको हिंट चाहिए तो अपने दोस्तों, सहयोगियों या परिवार के सदस्यों से मदद ले सकते हैं जो 'सिने पहेली' के प्रतियोगी न हों।


पिछली पहेली के सही जवाब


1. तिलचट्टा और छिपकली - "तिलचट्टा हाय हाय तिलचट्टा, छिपकली ने पकड़ लिया (भिखारन)

2. मच्छर और बिस्तर - "अपना घर है स्वर्ग से सुंदर, स्वर्ग में कहाँ से आये मच्छर.... काँट रहा है मुझको बिस्तर..." (स्वर्ग से सुंदर)

3. मुर्गा और कबूतर - "आधी रोटी सारा कबाब, बोल मेरे मुर्गे कूक-ड़ू-कू, जैसी बोली वैसा जवाब, बोल री कबूतरी गूटर गूँ गूँ" (जनता हवलदार); "चु चु चु" (चीता); "मैं तेरा मुर्गा" (हिटलर)

4. ऊँट और दरवाज़ा - "ऊँट वाली से जो करो यारी मोरे राजा, तैयारी करो मोरे राजा, हाँ ऊँचा करो घर का दरवाज़ा" (भ्रष्टाचार)

5. कौवा और ढोलक - "चील चील चिल्ला के कजरी सुनाये, झूम झूम कौवा भी ढोलक बजाये" (हाफ़ टिकट)


पिछली पहेली के परिणाम


'सिने पहेली - 37' के परिणाम इस प्रकार हैं...

1. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 10 अंक
2. अल्पना वर्मा, अल-आइन, यू.ए.ई --- 10 अंक
3. सलमन ख़ान, दुबई --- 10 अंक
4. क्षिति तिवारी, जबलपुर --- 10 अंक
5. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 10 अंक
6. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 8 अंक
7. जीवन दास व्यास, बीकानेर --- 6 अंक
8. मंदार नारायण, कोल्हापुर --- 6 अंक
9. महेन्द्र कुमार रंगा, बीकानेर --- 6 अंक
10. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 4 अंक
11. रीतेश खरे, मुंबई --- 4 अंक

ज़रूरी सूचना: जिन प्रतियोगियों ने "मुर्गा" और "कबूतर" के लिए 'रोशनी और अंधेरा' फ़िल्म के गीत "वाह रे मेरा मुर्गा" को जवाब में लिख भेजा है, वो कृपया इस गीत का लिंक अथवा गीत के पूरे बोल हमें लिख भेजें ताकि हम इसे जाँच सके। अगर उत्तर सही निकला तो अगली कड़ी में आपको अंक दे दिए जायेंगे।

अंक संबंधित कोई भी शिकायत हो तो हमें शीघ्रातिशीघ्र cine.paheli@yahoo.com पर सूचित करें!!!


और यह रहा चौथे सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोर-कार्ड...




'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, लता जी को जनमदिन की ढेरों शुभकामनाओं के साथ आपसे विदा ले रहे हैं, नमस्कार!

Friday, September 21, 2012

शब्दों में संसार - हरा सोना

शब्दों में संसार - एपिसोड ०१ - हरा सोना 

शब्दों में संसार की पहली कड़ी में आप सबका स्वागत है। यह श्रॄंखला "शब्दों के चाक पे" की तरह हीं "कविताओं" पर आधारित है। बस फर्क यह है कि जहाँ "चाक" पर हम आजकल की ताज़ातरीन कविताओं की मिट्टी डालते थे, वहीं "संसार" में हम उन कविताओं को खोदकर ला रहे हैं जो मिट्टी तले कई सालों से दबी हैं यानि कि श्रेष्ठ एवं नामी कवियों की पुरानी कविताएँ। आज की कड़ी में हमने "निराला", "पंत" से लेकर "त्रिलोचन" एवं "नागार्जुन" तक की कविताएँ शामिल की हैं और आज का विषय है "हरा सोना"। "हरा सोना" नाम से हीं साफ हो जाता है कि हम खेतों में लहलहाते फसलों एवं जंगलों में शान से सीना ताने खड़े पेड़ों की बातें कर रहे हैं। हम प्रकृति यानि कि कुदरत की बातें कर रहे हैं। 

लीजिए सुनिए रेडियो प्लेबैक का ये अनूठा पोडकास्ट -



आप इस पूरे पोडकास्ट को यहाँ से डाउनलोड भी कर सकते हैं


आज की कड़ी में प्रस्तुत कवितायें और उनसे जुडी जानकारी इस प्रकार हैं -

 कविता ०१ - फिर बेले में कलियाँ आई : कवि - निराला : स्वर -गार्गी कुलकर्णी



 कविता ०२ - नयी नयी कोंपलें : कवि -माखनलाल चतुर्वेदी : स्वर - अनुराग शर्मा



 कविता ०३ - उठ किसान : कवि -त्रिलोचन : स्वर -संज्ञा टंडन



 कविता ०४ : गोरी गोरी सौंधी धरती : कवि -धर्मवीर भारती : स्वर -सुनीता यादव



 कविता ०५ : कृषक संवरिया : कवि - केदारनाथ अग्रवाल : स्वर -अर्चना चावजी 



 कविता ०६ : नारियल के पेड : कवि -केदारनाथ अग्रवाल : स्वर -राजीव रंजन प्रसाद



 कविता ०७ : महुआ : कवि - शमशेर बहादुर सिंह : स्वर - संज्ञा टंडन



 कविता ०८ : जंगल की याद : कवि -सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : स्वर -वरद देशमुख



 कविता ०९ : शाल के जंगल : कवि -नागार्जुन : स्वर -पूजा यादव

 

कविता १० : हरी बिछली घास : कवि - अज्ञेय : स्वर -राजीव रंजन प्रसाद



कोंसेप्ट, कविता-चयन और स्क्रिप्ट - विश्व दीपक 
स्वर - अभिषेक ओझा और शैफाली गुप्ता 

शीर्षक गीत - सजीव सारथी 
स्वर - अनुराग यश, कृष्ण राजकुमार 
संगीत - कृष्ण राजकुमार 

निर्माण सहयोग - अनुराग शर्मा, रश्मि प्रभा, सुनीता यादव, संज्ञा टंडन, राजीव रंजन प्रसाद, अमित तिवारी 
संयोजन एवं प्रस्तुति - सजीव सारथी 

हिंदी साहित्य के इन अनमोल रत्नों को इस सरलीकृत रूप में आपके सामने लाने का ये हमारा प्रयास आपको कैसा लगा, हमें अपनी राय के माध्यम से अवश्य अवगत करवाएं. यदि आप भी आगामी एपिसोडों में कविताओं को अपनी आवाज़ से सजाना चाहें तो हमसे संपर्क करें.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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