शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

एक अधूरी सी हसरत...शब्दों में उजागर

शब्दों की चाक पर - एपिसोड 13

ख्वाब उगते हैं आँखों में, चमकते हैं कुछ तो कुछ मुरझा जाते हैं, तमाम मुक्कमल ओर अधूरी हसरतों के इस खेल में डूबती उतरती है जिंदगी. कुछ ऐसे ही भाव सजा कर लाये हैं हमारे कवि मित्र आज अपने शब्दों में. जिसे आवाज़ दी है अभिषेक ओझा ओर शैफाली गुप्ता ने. स्क्रिप्ट रची है विश्व दीपक ने ओर संयोजन सहयोग है वंदना गुप्ता, अनुराग शर्मा ओर सजीव सारथी का, तो सुनिए सुनाईये ओर छा जाईये.

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)



  या फिर यहाँ से डाउनलोड करें 


शब्दों की चाक पर हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 


1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.

2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगें. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से ये बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

4. किसी भी जानकारी के लिए आप हमारे संचालक विश्व दीपक जी से इस पते पर संपर्क कर सकते हैं-   vdeepaksingh@gmail.com 

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 12




मैंने देखी पहली फ़िल्म

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान में प्रत्येक गुरुवार को हम आपके लिए सिनेमा के इतिहास पर विविध सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को आपके संस्मरणों पर आधारित ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ का प्रकाशन प्रतियोगी रूप में प्रस्तुत करते हैं। परन्तु आज माह का पाँचवाँ गुरुवार है, इसलिए आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, गैर-प्रतियोगी संस्मरण। आज का यह संस्मरण, हमारे संचालक-मण्डल के किसी सदस्य का नहीं, बल्कि हमारे सम्मानित अतिथि लेखक और फिल्म-पत्रकार शिशिर कृष्ण शर्मा का है।  
शिशिर जी मूलतः देहरादून के हैं और वर्तमान में मुम्बईवासी जाने-माने कथाकार, पत्रकार और फिल्म-इतिहासकार हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी स्तम्भों को रुचि के साथ पढ़ते/सुनते हैं। शिशिर जी ने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ के पिछले अंकों को देख कर गैर-प्रतियोगी रूप में भाग लेने की इच्छा व्यक्त की। तो लीजिए, प्रस्तुत है- शिशिर कृष्ण शर्मा की स्मृतियों में बसी फिल्म ‘बीस साल बाद’ का रोचक और रोमांचक संस्मरण।



‘फिल्म देख कर गायत्री मंत्र कण्ठस्थ किया...’ : शिशिर कृष्ण शर्मा 

‘जनता की भारी माँग पर...’न्यू एम्पायर’ में, नए प्रिंट के साथ...घटी दरों पर देखिए...’ !!!...और तांगे के दोनों तरफ़ लगे होर्डिंग्स पर नज़र पड़ते ही मेरी बांछें, बकौल श्रीलाल शुक्ल ‘वो शरीर में जहाँ कहीं भी थीं’, खिल उठीं। होर्डिंग्स पर मौजूद थे, हेट लगाए और ओवरकोट ओढ़े, शहरी बाबू विश्वजीत और लहँगा-चोली पहने और दुपट्टे का कोना मुंह में दबाए शरमाती-इठलाती ग्रामीण बाला वहीदा रहमान।...पार्श्व में था वो मशहूर ख़ूनी पंजा जिसका ज़िक़्र मैं अपने होश सम्भालने के वक़्त से बुआ-चाचा और माँ के मुंह से सुनता आ रहा था। तांगे पर लगे भोंपू ऐलान कर रहे थे...’रोज़ाना चार शो’...’ख़ून को जमा देने वाला खेल’...’बीस साल बाद’...’बीस साल बाद’ !!!

आज की पीढ़ी के लिए भले ही ये एक अजूबा हो, लेकिन 70 के दशक में फ़िल्मों का प्रचार इसी तरह से तांगों और रिक्शों पर शहरों-क़स्बों के गली-कूंचों में घूम-घूम कर किया जाता था। उस जमाने में न तो टेलीविज़न थे और न ही ऑडियो-वीडियो कैसेट। सी.डी.-डी.वी.डी.प्लेयर और कम्प्यूटर जैसी अलौकिक चीज़ों का तो ख़्याल भी किसी के ज़हन में नहीं था। मनोरंजन का सस्ता और सुलभ साधन सिर्फ़ सिनेमा था, पुरानी फ़िल्में सालों-साल बार-बार प्रदर्शित की जाती थीं और हरेक शहर और क़स्बे में कम से कम एक सिनेमाहॉल सिर्फ़ पुरानी फ़िल्मों के प्रदर्शन के लिए सुरक्षित होता था, जैसा कि मेरे शहर देहरादून का ‘न्यू एम्पायर’। बरसों के इन्तज़ार की मेरी घड़ियाँ ख़त्म हो चुकी थीं और मेरे शहर में अब फिर से दिखाया जा रहा था... ‘ख़ून को जमा देने वाला खेल’...’बीस साल बाद’...जनता की भारी माँग पर...घटी दरों पर, रोज़ाना चार शो...!!!

‘बीस साल बाद’ और मेरी पैदाईश एक ही साल, यानि 1962 की थी। और अब 15 साल की उम्र में मैं पहली बार अकेला कोई फ़िल्म देखने पहुँचा था।...मेरा ‘हमउम्र’ और बहुप्रतीक्षित ‘खेल’...’बीस साल बाद’। माँ ने दो रूपए दिए थे, बीस पैसे साईकिल स्टैंड के ख़र्च हुए और एक रूपए बीस पैसे का फ़िल्म का टिकट ख़रीदा। फ़िल्म के शुरू होते ही कलेजा घोड़े पर सवार हो गया। माथे पर पसीना, अटकती साँसें, खटमलों से भरी, फटी सीट के टूटे हत्थों पर कसती मुट्ठियाँ। हॉल में गूँजती अजीब-अजीब सी डरावनी आवाज़ें, दहशत के ग्राफ़ को चाँद के पार पहुँचा थीं। ये आवाज़ें उन ‘लौंडे-लफ़ाड़ेनुमा’ दर्शकों की थीं, जो नवरस के प्रत्येक रस को सिर्फ़ ‘मौजमस्ती-रस’ में बदलकर रख देना चाहते हैं। उधर परदे पर आदमक़द घास के बीच से गुज़रता, डरा हुआ सा आदमी, उलटे क़दमों से चलकर घने पेड़ के पास पहुँचा और इधर हॉल में गूँजती डरावनी आवाज़ें अपने चरम पर पहुँच गई...और फिर अचानक वो खूनी पंजा !...उस आदमी का क़त्ल !!...और अन्ततः हॉल में पसरा हुआ सन्नाटा !!!

मेरा दृढ़ विश्वास है कि ‘ब्लैक एंड व्हाईट’ की सी मनमोहक लाईटिंग और असरदार गहराई, रंगीन सिनेमा में और वो भी रहस्य-रोमांच वाली फ़िल्मों में हो ही नहीं सकती। हिन्दी सिनेमा के स्वर्णकाल की एक पूर्ण प्रतिनिधि उस फ़िल्म का मेरे किशोर मन पर ऐसा ज़बर्दस्त असर हुआ कि आज 35 बरस बाद भी अपनी उस ‘हमउम्र’ के साथ मेरा उतना ही क़रीबी रिश्ता बना हुआ है। क़ातिल का पता तो उस पहले शो में ही चल चुका था लेकिन इस फिल्म को देखने का मौक़ा मैं आज भी ढूँढ ही लेता हूँ।...हर बार वही आनन्द...वही नयापन। कसी हुई कथा-पटकथा, कमाल की फ़ोटोग्राफ़ी, बेमिसाल निर्देशन!...सुनसान भुतही हवेली...पैशाचिक ध्वनि के साथ खुलते-बन्द होते खिड़की-दरवाज़े... दूर कहीं किसी औरत का रूदन... घुँघरूओं की छमछम... गलियारे से गुज़रता रहस्यमय साया... ऐसे में कलेजा उछलकर आख़िर हलक़ में क्यों न आए? उधर कानों में रस घोलता गीत-संगीत, विशेषत: लता के पारलौकिक स्वर में तमाम रहस्यमयता को समेटे, दिल में उतर जाने वाला गीत ‘कहीं दीप जले कहीं दिल, जरा देख ले आकर परवाने...’, सीप के मोती की तरह बेहद ख़ूबसूरती के साथ गढ़ा गया फ़िल्म का एक-एक चरित्र... नायक-नायिका की दिलकश जोड़ी...बग्घी पर सवार ‘डॉक्टर पाण्डेय’ (मदन पुरी)...बैसाख़ी का सहारा लिए ‘मोहन त्रिपाठी’ (सज्जन)...दर्शकों के तमाम तनाव और भय को तिरोहित करने के लिए मशहूर ‘गोपीचन्द्र जासूस’ (असित सेन)...सीधे-सादे बुज़ुर्ग चाचा (मनमोहन कृष्ण)...सुनसान हवेली के पुराने नौकर ‘लक्ष्मण’ का अपने ही शब्दों को दोहराना...’समझ गया...मैं सब समझ गया’!...आज भी ये चरित्र मेरे दिल के सबसे ज़्यादा क़रीब है। ‘लक्ष्मण’ के रहस्यों से लिपटे हुए चरित्र को निभाया था अभिनेता देवकिशन ने जो इस फ़िल्म के संवाद-लेखक भी थे।

देहरादून की ‘सर्वे ऑफ़ इण्डिया’ की सरकारी कॉलोनी ‘हाथीबड़कला एस्टेट’ का 4 नम्बर ब्लॉक, जहाँ मेरी ज़िन्दगी के शुरूआती 28 साल गुज़रे, उस ज़माने में घने जंगलों से घिरा हुआ था। फ़िल्म ‘बीस साल बाद’ देखने के बाद काफ़ी अरसे तक मेरे लिए रात-बिरात उस इलाक़े की सुनसान सड़कों से गुज़रना आसान नहीं रह गया था। देर रात नाटकों की रिहर्सल से लौटते वक़्त मैं इन्तज़ार करता था कि मेरे घर की दिशा में जाने वाला जाना-अनजाना कोई तो साथी मिले। सच कहूँ तो उन दिनों कण्ठस्थ किया ‘गायत्री-मंत्र’ आज भी मुझे शक्ति देता है... ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यम........”!!!

और अब हम आपको शिशिर जी की देखी हुई फिल्म ’बीस साल बाद’ का रोमांचक किन्तु मधुर गीत- ‘कहीं दीप जले कहीं दिल, जरा देख ले आकर परवाने...’ सुनवाते हैं। इस गीत को हेमन्त कुमार ने राग शिवरंजिनी  के सुरों में संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर ने अपने पारलौकिक सुरों में गाया है।

फिल्म – बीस साल बाद : ‘कहीं दीप जले कहीं दिल, जरा देख ले आकर परवाने...’ : लता मंगेशकर



आपको शिशिर जी की देखी पहली फिल्म का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र
 

सोमवार, 27 अगस्त 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (१३) एक था टाइगर, और आपकी बात

संगीत समीक्षा - एक था टाइगर



जहाँ यश राज फिल्म्स का बैनर हो और सलमान खान हो टाईगर की तरह दहाड़ते हुए परदे पर तो फिल्म से उम्मीदें आसमां छुवेंगीं ही. 
सटीक ही था कि फिल्म ने प्रदर्शन के लिए १५ अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस का दिन चुना. बहरहाल आज हम चर्चा करेंगें फिल्म के संगीत की, जिसे रचा है सोहेल सेन ने और अतिथि संगीतकार की भूमिका में हैं साजिद वाजिद. 
साजिद वाजिद के बारे में बात करें तो कह सकते हैं कि एक दौर था जब इस संगीतकार जोड़ी पर केवल सलमान खान को ही अटूट विश्वास था, मगर आज साजिद वाजिद एक के बाद एक हिट संगीत रचकर प्रीतम और रहमान को कड़ी टक्कर देने की स्तिथि में है, मगर आज भी जब वो अपने सल्लू भाई की फिल्म के लिए संगीत रचते हैं तो अपना सबकुछ झोंक देते हैं. 
वो सलमान ही थे जिन्होंने हिमेश को संगीत जगत में उतरा था, बाद में कुछ मतभेदों के चलते ये जोड़ी टूट सी गयी थी, जिसका फायदा साजिद वाजिद को मिला. हालाँकि सल्लू मियाँ ने हिमेश को वापसी का मौका दिया “बॉडीगार्ड” में जहाँ एक बार फिर हिमेश खरे उतरे थे....


अल्बम में साजिद वाजिद अतिथि संगीतकार के रूप में हैं, पर आश्चर्य कि उन्हीं के गीत को सबसे अधिक लोकप्रियता प्राप्त हो रही है. अरेबिक धुन और नृत्य शैलियों की तर्ज पर है “माशाल्लाह”...जिसमें आवाज़ है खुद वाजिद और सुरीली श्रेया की. थिरका देने वाली धुन, कटरीना का बैले नृत्य और सलमान खान की उपस्तिथि सुनिश्चित करती है कि ये गीत साल के सबसे सफलतम गीतों में अवश्य ही शुमार होगा. पारंपरिक वाध्यों जैसे दरबुका, तार ड्रूम, एकतारा और तम्बूरे का सुन्दर इस्तेमाल है पार्श्व में जो इस गीत को एक अलग मुकाम देता है. साजिद वाजिद की गेस्ट भूमिका अल्बम में चार चाँद लगाने के लिए काफी है.


इसके बाद के गीतों का जिम्मा फिल्म के प्रमुख संगीतकार सोहेल सेन उठाते हैं. एक बात गौर करने लायक है. पुराने गीतों में कभी गीतों के नाम नहीं सोचे जाते थे, अमूमन ऑडियो सी डी या कैसट्स में गीत की पहली पंक्ति को ही लिखा जाता था, पर नयी सदी में इस बात का खास ध्यान रखा जाता है कि हर गीत का एक नाम हो, जिससे उस गीत की पहचान बने. इन्हीं नामों के लिए गीतकार एक कैच लाईन, शब्द या शब्द युग्म सोचते हैं, इस अल्बम में भी इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है, माशाल्लाह के बाद अगले गीत का नाम है –“लापता”. सालसा अंदाज़ का ये गीत के के और पलक की आवाजों में है. कोरस जबरदस्त है और रिदम गिटार थिरका देने वाला है.


बंजारा गीत से सोहेल अपनी विविधता का दिलचस्प परिचय देते हैं. यहाँ भी पार्श्व वाध्य एक अलग ही मौहौल रच देते हैं. सुखविंदर की जबरदस्त आवाज़ और नीलेश के असरदार शब्द गीत को कामियाब बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते.


कौसर मुनीर के सुन्दर शब्दों से महका है अगला गीत “सय्यारा”, सभी नृत्य प्रधान गीतों से अलग इस गीत की मेलोडी श्रोताओं को खूब भा सकती है. मोहित चौहान की जादू भरी आवाज़ और तरन्नुम मल्लिक के अच्छे साथ ने गीत को बेहद खास बना दिया है.


कुल मिलकर “एक था टाईगर” के गीतों दुनिया भर के संगीत का असर है, देखा जाए तो श्रोताओं को एक ही अल्बम अलग अलग किस्म के संगीत का जायका मिल जाता है. प्लेबैक इंडिया की टीम दे रही है अल्बम को ३.९ की रेटिंग.



और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

रविवार, 26 अगस्त 2012

उस्ताद विलायत खाँ : ८५वें जन्मदिवस पर एक स्वरांजलि


स्वरगोष्ठी – ८५ में आज

जिनके सितार-तंत्र बजते ही नहीं गाते भी थे

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, दो दिन बाद अर्थात २८अगस्त को भारतीय संगीत-जगत के विश्वविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ का ८५वाँ जन्म-दिवस है। इस अवसर पर आज हम इस महान कलासाधक के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करने के साथ उनकी कुछ विशिष्ट रचनाओं का रसास्वादन भी करेंगे।

न्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त सितारनवाज उस्ताद विलायत खाँ का जन्म २८अगस्त, १९२८ को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के गौरीपुर नामक स्थान पर एक संगीतकार परिवार में हुआ था। उनके पिता उस्ताद इनायत खाँ अपने समय के न केवल सुरबहार और सितार के विख्यात वादक थे, बल्कि सितार वाद्य को विकसित रूप देने में भी उनका अनूठा योगदान था। उस्ताद विलायत खाँ के अनुसार सितार वाद्य प्राचीन वीणा का ही परिवर्तित रूप है। इनके पितामह (दादा) उस्ताद इमदाद खाँ अपने समय के रुद्रवीणा-वादक थे। उन्हीं के मन में सबसे पहले सितार में तरब के तारों को जोड़ने का विचार आया था, किन्तु इसे पूरा किया, विलायत खाँ के पिता इनायत खाँ ने। उन्होने संगीत-वाद्यों के निर्माता कन्हाई लाल के माध्यम से इस स्वप्न को साकार किया। सितार के ऊपरी हिस्से पर दूसरा तुम्बा लगाने का श्रेय भी इन्हें है।

उस्ताद विलायत खाँ की आरम्भिक संगीत-शिक्षा उनके पिता इनायत खाँ साहब से प्राप्त हुई थी। परन्तु जब वे मात्र १२ वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। बाद में उनके चाचा वाहीद खाँ ने उन्हें सितार-वादन की शिक्षा दी। नाना बन्दे हुसेन खाँ और मामू जिन्दे हुसेन खाँ से उन्हें गायन की शिक्षा प्राप्त हुई। इनकी शिक्षा के प्रभाव से ही आगे चल कर उस्ताद विलायत खाँ ने गायकी अंग में अपने सितार-वादन को विकसित किया। आइए यहाँ थोड़ा रुक कर उनके सितार-वादन का एक उत्कृष्ट उदाहरण सुनते हैं। आपके लिए हमने सबसे पहले उस्ताद विलायत खाँ का बजाया राग शंकरा चुना है। बिलावल थाट, षाडव जाति के इस राग में खाँ साहब द्वारा तीनताल में प्रस्तुत एक मधुर रचना और अन्त में अति द्रुत लय में झाला वादन का रसास्वादन आप भी करें। राग शंकरा की एक अत्यन्त प्रचलित बन्दिश है- ‘अब मोरी आली कैसे धरूँ धीर...’। खाँ साहब का वादन सुनते जाइए और साथ-साथ यह बन्दिश भी गुनगुनाते जाइए।

राग शंकरा : उस्ताद विलायत खाँ



उस्ताद विलायत खाँ के सितार-वादन में तंत्रकारी कौशल के साथ-साथ गायकी अंग की स्पष्ट झलक मिलती है। सितार वाद्य को गायकी अंग से जोड़ कर उन्होने अपनी एक नई वादन शैली का सूत्रपात किया था। वादन करते समय उनके मिज़राब के आघात से ‘दा’ के स्थान पर ‘आ’ की ध्वनि का स्पष्ट आभास होता है। उनका यह प्रयोग, वादन को गायकी अंग से जोड़ देता है। खाँ साहब ने सितार के तारों में भी प्रयोग किए थे। सबसे पहले उन्होने सितार के जोड़ी के तारॉ में से एक तार निकाल कर एक पंचम स्वर का तार जोड़ा। पहले उनके सितार में पाँच तार हुआ करते थे। बाद में एक और तार जोड़ कर संख्या छह कर दी थी। अपने वाद्य और वादन शैली के विकास के लिए वे निरन्तर प्रयोगशील रहे। एक अवसर पर उन्होने स्वीकार भी किया था कि वर्षों के अनुभव के बावजूद अपने हर कार्यक्रम को एक चुनौती के रूप में लेते थे और मंच पर जाने से पहले दुआ माँगते थे कि इस इम्तहान में भी वो अव्वल पास हों। आइए अब आप सुनिए, उस्ताद विलायत खाँ का बजाया, राग गारा। इस रचना में तबला संगति उस्ताद ज़ाकिर हुसेन ने की है।

राग गारा : उस्ताद विलायत खाँ



उस्ताद विलायत खाँ की उम्र तब मात्र बारह वर्ष थी जब उनके वालिद उस्ताद इनायत खाँ का इंतकाल हुआ था। आगे की संगीत-शिक्षा नाना बन्दे हुसेन खाँ और मामू जिन्दे हुसेन खाँ ने उन्हें दी। यह गायकों का घराना था। आरम्भ में विलायत खाँ का झुकाव गायन की ओर ही था, किन्तु उनकी माँ ने उन्हें अपनी खानदानी परम्परा निभाने के लिए प्रेरित किया। गायन की ओर उनके झुकाव के कारण ही आगे चल कर उन्होने अपने वाद्य को गायकी अंग के अनुकूल परिवर्तित करने का सफल प्रयास किया। यही नहीं, अपने मंच-प्रदर्शन के दौरान प्रायः गाने भी लगते थे। १९९३ में लन्दन के रॉयल फेस्टिवल हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में खाँ साहब ने राग हमीर के वादन के दौरान पूरी बन्दिश का गायन भी प्रस्तुत कर दिया था। लीजिए आप भी सुनिए।

राग हमीर : ‘अचानक मोहें पिया आके जगाये...’ : उस्ताद विलायत खाँ राग 



उस्ताद विलायत खाँ ने कुछेक विश्वविख्यात फिल्मों में भी संगीत दिया था। १९५८ में निर्मित सत्यजीत रे की बांग्ला फिल्म ‘जलसाघर’, १९६९ में मर्चेन्ट आइवरी की फिल्म ‘दि गुरु’ और १९७६ में मधुसूदन कुमार द्वारा निर्मित हिन्दी फिल्म ‘कादम्बरी’, उस्ताद विलायत खाँ के संगीत से सुसज्जित था। वे वास्तव में सरल, सहज और सच्चे कलासाधक थे। जन्मदिवस के अवसर पर उनकी स्मृतियों को यह स्वरांजलि अर्पित करते हुए हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। आइए, ‘स्वरगोष्ठी’ की आज की कड़ी को विराम देने से पहले संगीत-मंच की परम्परा का निर्वहन करते हुए, उस्ताद विलायत खाँ द्वारा प्रस्तुत राग भैरवी की मधुर रचना सुनवाते है। इसे सुन कर आपका मन उन्नीसवीं शताब्दी के महान संगीतज्ञ और रचनाकार कुँवरश्याम की बेहद चर्चित ठुमरी- ‘बाट चलत मोरी चुनरी रंग डारी श्याम...’ गुनगुनाने का अवश्य करेगा।

राग भैरवी : उस्ताद विलायत खाँ



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की आज की संगीत-पहेली में हम पूर्व की भाँति संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछेंगे। ९०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी श्रृंखला के विजेता होंगे।


१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह तराना किस राग में निबद्ध है?

२ - इस गीत की गायिका के स्वर आपने शास्त्रीय मंच के अलावा अनेकानेक बार सुना है। तो देर किस बात की, गायिका का नाम हमें लिख भेजें।
आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८७वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८३वें अंक में हमने आपको पण्डित विनायक राव पटवर्धन के स्वर में एक दुर्लभ बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार और दूसरे का सही उत्तर है- तीनताल। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी, जबलपुर की क्षिति तिवारी ने ही दिया है। मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग का नाम पहचानने में भूल की, अतः उन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। विजेताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ की विभिन्न कड़ियों को तैयार कराते समय हम आपके सुझावों और फरमाइशों का पूरा ध्यान रखते हैं। तो देर किस बात की, आज ही अपने सुझाव हमें मेल करें। ‘स्वरगोष्ठी’ के कई संगीत-प्रेमी और कलासाधक स्वयं अपना या अपनी पसन्द का आडियो हमें निरन्तर भेज रहे है और हम विभिन्न कड़ियों में हम उनका इस्तेमाल भी कर रहे हैं। यदि आपको कोई संगीत-रचना प्रिय हो और आप उसे सुनना चाहते हों तो आज ही अपनी फरमाइश हमें मेल कर दें। इसके साथ ही यदि आप इनसे सम्बन्धित आडियो ‘स्वरगोष्ठी’ के माध्यम से संगीत-प्रेमियों के बीच साझा करना चाहते हों तो अपना आडियो क्लिप MP3 रूप में भेज दें। हम आपकी फरमाइश को और आपके भेजे आडियो क्लिप को ‘स्वरगोष्ठी’ आगामी किसी अंक में शामिल करने का हर-सम्भव प्रयास करेंगे। आगामी अंक में हम एक ऐसी संगीत-साधिका के बारे में चर्चा करेंगे, जिन्हें आपने शास्त्रीय संगीत के मंच पर शायद न देखा हो, किन्तु वे बेहद लोकप्रिय हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 25 अगस्त 2012

अमरीका और यू.ए.ई के बाद अब 'सिने पहेली' के प्रतियोगी रूस से भी...


सिने-पहेली # 34 (25 अगस्त, 2012) 

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का 'सिने पहेली' स्तंभ में। दोस्तों, इस सप्ताह 'सिने पहेली' परिवार के साथ जुड़े हैं दो नए खिलाड़ी - आप हैं मॉस्को, रूस से शुभदीप चौधरी और कोल्हापुर, महाराष्ट्र से मंदार नारायण। आप दोनों का हार्दिक स्वागत है इस प्रतियोगिता में और निवेदन है कि आगे भी नियमित रूप से 'सिने पहेली' में भाग लें और अन्य खिलाड़ियों को अच्छी टक्कर देकर प्रतियोगिता को और रोचक बनाएँ। 

दोस्तों, 'सिने पहेली' से मनोरंजन तो होता ही है, साथ में ज्ञान भी बढ़ता है। पर आप यह न समझिए कि सिर्फ़ पाठकों या फिर प्रतियोगियों का ज्ञान बढ़ता है, बल्कि 'सिने पहेली' के संचालक दल का, और ख़ास तौर से मेरा ज्ञान भी बढ़ता है, और कई बार तो प्रतियोगियों के माध्यम से भी। अब देखिए न, पिछले अंक में मैंने एक सवाल पूछा था कि किस गायक के साथ किशोर कुमार ने गीत गाया है। यह सवाल मैंने अभिजीत को ध्यान में रख कर किया था; विकल्पों में अभिजीत के अलावा कुमार सानू, उदित नारायण और सोनू निगम के नाम थे। मैं इस बात से बिल्कुल अंजान था कि किशोर दा ने उदित नारायण के साथ भी कोई गीत गाया है। पर जब आप प्रतियोगियों के जवाब आने शुरू हुए तो मुझे अपनी ग़लती का अहसास हो गया। अल्पना वर्मा जी से पूछ-ताछ की तो पता चला कि फ़िल्म 'कह दो प्यार है' में किशोर कुमार, सुरेश वाडकर और उदित नारायण का गाया एक गीत है। तो 'सिने पहेली' के माध्यम से संचालक और प्रतियोगी, दोनों के ही फ़िल्मी ज्ञान में वृद्धि हो रही है, इसका हमें बहुत संतोष है। तो चलिए शुरू किया जाए 'सिने पहेली - 34'। लेकिन उससे पहले हम दोहरा देते हैं कि किस तरह से आप बन सकते हैं 'सिने पहेली' के महाविजेता।

कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। तीसरे सेगमेण्ट की समाप्ति पर अब तक का 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

और अब आज की पहेली...

आज की पहेली : मुस्कान-पहचान


नीचे फ़िल्मी अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के मुस्कुराहट की दो पंक्तियाँ दिखाई गई हैं। पहली पंक्ति में पाँच अभिनेत्रियों के मुस्कान हैं तो दूसरी पंक्ति में पाँच अभिनेताओं के। आपको इन दो पंक्तियों में से एक एक अभिनेता और एक एक अभिनेत्री चुन कर कुल पाँच जोड़ियाँ इस तरह से बनानी है कि जिनकी कम से कम एक फ़िल्म नीचे दी गई 25 फ़िल्मों में शामिल हों। एक अभिनेता या एक अभिनेत्री को आप केवल एक ही जोड़ी के लिए चुन सकते हैं। यानी कि पाँच जोड़ियाँ यूनिक होनी चाहिए। हर सही जवाब के लिए आपको मिलेंगे 2 अंक, अर्थात् आज की कड़ी के कुल अंक हैं 10।



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और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

1. उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

2. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 34" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान अवश्य लिखें।

3. आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 30 अगस्त शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

4. सभी प्रतियोगियों ने निवेदन है कि सूत्र या हिंट के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के किसी भी संचालक या 'सिने पहेली' के किसी भी प्रतियोगी से फ़ोन पर या ईमेल के ज़रिए सम्पर्क न करे। हिंट माँगना और हिंट देना, दोनों इस प्रतियोगिता के खिलाफ़ हैं। अगर आपको हिंट चाहिए तो अपने दोस्तों, सहयोगियों या परिवार के सदस्यों से मदद ले सकते हैं जो 'सिने पहेली' के प्रतियोगी न हों।


पिछली पहेली के सही जवाब


1 b) अलका याग्निक के साथ रफ़ी साहब ने कोई भी गीत नहीं गाया है। कविता कृष्णमूर्ती के साथ फ़िल्म 'Ladies Tailor' में और उदित नारायण के साथ फ़िल्म 'उन्नीस बीस' में उन्होंने गाया था।

2 b) अभिनेता गोविंदा पर रफ़ी साहब का गाया गीत फ़िल्माया गया है। यह फ़िल्म थी 'फ़र्ज़ की जंग' जो 1989 में प्रदर्शित हुई थी रफ़ी साहब के निधन के कई साल बाद।

3 a & c) किशोर कुमार ने अभिजीत के साथ फ़िल्म 'आनन्द और आनन्द' में और उदित नारायण के साथ फ़िल्म 'कह दो प्यार है' में गीत गाया था।

4 d) अनुराधा पौडवाल

5 b) पंडित सत्यनारायण मिश्र 


पिछली पहेली के परिणाम


'सिने पहेली - 33' के परिणाम इस प्रकार हैं...

1. अल्पना वर्मा, अल-आइन, यू.ए.ई --- 10 अंक

2. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 10 अंक

3. रीतेश खरे, मुंबई --- 10 अंक

4. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 10 अंक

5. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 10 अंक

6. क्षिति तिवारी, इंदौर --- 10 अंक

7. सलमन ख़ान, अलीगढ़ --- 10 अंक

8. महेश बसंतनी, पिट्सबर्ग, यू.एस.ए --- 8 अंक

9. शुभदीप चौधरी, मॉस्को, रूस --- 8 अंक

10. मंदार नारायण, कोल्हापुर --- 8 अंक

11. अदिति चौहान, देहरादून --- 6 अंक

12. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 6 अंक

13. राजेश प्रिया, पटना --- 6 अंक

14. तरुशिखा सुरजन, नई दिल्ली --- 4 अंक

15. अमित चावला, दिल्ली --- 4 अंक

16. निशान्त अहलावत, गुड़गाँव --- 4 अंक


और यह रहा चौथे सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोर-कार्ड...



चौथे सेगमेण्ट के तीन एपिसोड्स के बाद कुल 6 खिलाड़ी चोटी के पायदान पर विराजमान हैं। जैसे जैसे यह सेगमेण्ट आगे बढ़ेगा, पहेलियाँ कठिन होती जायेंगी, और तब हम देखना चाहेंगे कि क्या सभी 6 खिलाड़ी पहले नंबर पर रहते हैं या नहीं। 

सभी प्रतियोगियों को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। 

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

मैंने देखी पहली फिल्म - रंजना भाटिया का संस्मरण


रंजना भाटिया ने देखी 'अमर अकबर एंथनी' 
मैंने देखी पहली फिल्म : वो यादें जो दिल में कस्तूरी-गन्ध सी बसी हैं 

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और आज बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ की। इस द्विसाप्ताहिक स्तम्भ के पिछले अंक में आप श्री प्रेमचंद सहजवाला की देखी पहली फिल्म के संस्मरण के साझीदार रहे। आज अपनी देखी पहली फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ का संस्मरण सुश्री रंजना भाटिया प्रस्तुत कर रही हैं। यह प्रतियोगी वर्ग की प्रविष्टि है।

जीवन में पहली बार घटने वाला हर प्रसंग रोमांचकारी होता है। पहला पत्र, पहला दोस्त, पहली कविता, पहला प्रेम आदि कुछ ऐसे प्रसंग हैं, जो जीवन भर याद रहते हैं। ऐसे में एक सवाल उठा- पहली देखी पिक्चर का संस्मरण......। सोचने वाली बात है की इनमें किसको पहली पिक्चर कहें...। बचपन में जब बहुत छोटे हों तो माता-पिता के साथ और उन्हीं के शौक पर निर्भर करता है कि आपने कौन सी पिक्चर देखी होगी। मेरे माता-पिता दोनों को पिक्चर देखने का बहुत शौक रहा है। पापा के अनुसार, मैं बहुत छोटी थी, और उन दोनों के साथ ‘संगम’ पिक्चर देखने गई थी। आज भी पापा याद करते हुए बताते हैं कि उस फिल्म का गाना- ‘मैं का करूँ राम मुझे बुड्ढा मिल गया...’ वे नहीं देख देख पाए थे, क्यों कि मैंने एक सुर में रोना शुरू कर दिया था। परन्तु यह सब कुछ मेरी यादों में नहीं है।

होश संभालने पर मेरी यादों में जो पिक्चर है, वह अमिताभ बच्चन की ‘अमर अकबर एंथनी’ है। यह पिक्चर मेरे दसवीं के बोर्ड एग्जाम के बाद मैं परिवार के साथ देखने गई थी। फिल्म नारायणा में पायल सिनेमा हॉल में लगी थी। इस हॉल में जाना बहुत स्वाभाविक लगा था, क्योंकि इस हॉल में पहले भी कई बार आना हुआ था। परन्तु पहले पिक्चर में रुचि कम और वहाँ मिलने वाले पोपकार्न और कोला में अधिक होती थी। उस वक्त की कोई पिक्चर याद नहीं है, पर माहौल से अवश्य परिचित रही हूँ। ‘अमर अकबर एंथनी’ पिक्चर मेरी यादों में आज भी बसा हुआ है, क्योंकि इसे देखने के बाद ही पिक्चर देखने का अर्थ पता चला। पिक्चर में अमिताभ बच्चन की एक्टिंग से हम दोनों बहनों का हँस-हँस कर जो बुरा हाल हुआ था, वह बोर्ड के पेपर खत्म होने के उत्साह सा ही रोमांचित कर गया था। तब कहानी भी पूरी समझ में आई। माँ से बिछुड़ने का दर्द भी महसूस हुआ और यह देख कर पहली बार आँसू भी आए। हीरो ऋषि कपूर तभी से ड्रीम हीरो बने और पिक्चर में गाये गए गाने खुद के लिए गाये हुए महसूस हुए। क्या करें, वह उम्र ही ऐसी होती है..., सपनों की..., ख्वाबों की...। तब लगता था कि अमिताभ बच्चन की तरह कोई हीरो मेरी लाइफ में भी आएगा, यूँ ही गुण्डों से ढिशुम-ढिशुम लड़ेगा, गाना गाएगा और इसी तरह से खूब हँसाएगा। इस पिक्चर एक गाना, जो आज भी मुझे बहुत पसन्द है, वो है- ‘देख के तुमको दिल डोला है, खुदा गवाह हम सच बोला है...’। तब हम खुद को परवीन बाबी से कम कहाँ समझते थे, (वैसे तो आज भी नहीं समझते)। परवीन बाबी ने पिक्चर में जैसी ड्रेस पहनी थी वैसी ही ड्रेस मैंने भी बनवाई। आज भी जब यह पिक्चर टी.वी. पर आती है तो वो सिनेमा हॉल, वो माहौल और पिक्चर देखने के बाद वो ड्रेस पहन कर इतराना याद आ जाता है। पर जब इस पिक्चर की यादों को लिखने को कहा गया तो बरबस ही लिखते हुए मुस्कान आ गई। वाकई, पहली याद कोई भी हो, वह दिल में कस्तूरी-गन्ध सी होती है। हम बहुत सी यादें दोहरा लेते हैं, पर पहली पिक्चर की यादों को इस तरह शब्दों में पिरोना सचमुच बहुत अनूठा अनुभव है।

अब हम आपको रंजना जी की देखी पहली फिल्म- ‘अमर अकबर एंथनी’ का वह गीत सुनवाते हैं, जो उन्हें सर्वाधिक पसन्द है।

फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ : ‘देख के तुमको दिल डोला है...’ : किशोर कुमार, लता मंगेशकर मोहम्मद रफी और मुकेश



आपको रंजना जी की देखी पहली फिल्म का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। आप भी हमारे इस आयोजन- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ में भाग ले सकते हैं। आपका संस्मरण हम रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस अनुष्ठान में सम्मिलित तो करेंगे ही, यदि हमारे निर्णायकों को पसन्द आया तो हम आपको पुरस्कृत भी करेंगे। आज ही अपना आलेख और एक चित्र हमे radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। जिन्होने आलेख पहले भेजा है, उन प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपना एक चित्र भी भेज दें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

बुधवार, 22 अगस्त 2012

मैं और मेरा देश....कविताओं में देश प्रेम का उबाल


शब्दों की चाक पर - एपिसोड 12


शब्दों की चाक पर आज हमारे कवि मित्र लेकर आये हैं "मैं और मेरा देश" विषय पर कुछ लाजवाब कवितायेँ. आवाजें हैं अभिषेक ओझा और शैफाली गुप्ता की. आज की स्क्रिप्ट है अनुराग शर्मा की. प्रस्तुति सहयोग है विश्व दीपक, रश्मि प्रभा और सजीव सारथी का. तो सुनिए देश प्रेम से सराबोर कुछ काव्यात्मक अभिव्यक्तियाँ...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)

  या फिर यहाँ से डाउनलोड करें 


शब्दों की चाक पर हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 


1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.

2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगें. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से ये बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

सूचना - इस हफ्ते हम कवितायेँ स्वीकार करेंगें "एक अधूरी हसरत" विषय पर. अपनी रचनाएँ आप उपर दिए रश्मि जी के पते पर भेज सकते हैं. शुक्रवार शाम तक प्राप्त कवितायेँ ही स्वीकार की जायेंगीं.

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

एक सुरीला दौर जो बीतकर भी नहीं बीता -राजेश खन्ना


सुनिए काका को श्रद्धान्जली देने को तैयार किया गया हमारा खास पॉडकास्ट  


मूल स्क्रिप्ट 

यह पोडकास्ट समर्पित है हिन्दी फिल्मों के निर्विवादित पहले सुपरस्टार को। इनकी मक़बूलियत के किस्से परिकथाओं और जनश्रुतियों की तरह दुनिया में मशहूर हैं। हमें उम्मीद और पक्का यकीन है कि हमें इनका नाम बताने की ज़रूरत न होगी। चलिए तो नाम पर पर्दा रहते हुए हीं इनके बारे में दो-चार बातें कर ली जाएँ। इन महानुभाव का जन्म २९ दिसंबर १९४२ को ब्रिटिश इंडिया के बुरेवाला में हुआ था। जब जन्म हुआ तो नाम भी रखना था तो नाम रखा गया जतिन अरोड़ा। लेकिन ज्यादा दिनों तक न जतिन रहा और न हीं अरोड़ा। १९४८ में जब इनके माता-पिता इन्हें अपने रिश्तेदारों चुन्नी लाल खन्ना और लीलावती खन्ना को सौंपकर पंजाब के अमृतसर चले गए तो ये अरोड़ा से खन्ना हो लिए। इनके नए माता-पिता बंबई के गिरगांव के नजदीक ठाकुरगांव में रहते थे। यही इनका भी लालन-पालन और बढना-पढना हुआ। इन्होंने स्कूल से लेकर कॉलेज तक की पढाई की अपने बचपन के दोस्त रवि कपूर के साथ जो आगे चलकर जितेंद्र कहलाए। ज्यों-ज्यों इनकी उम्र बढती गई, इन्हें अपने सही हुनर की पहचान और परख की ज़रूरत महसूस हुई और ये एक जुनून के साथ अदाकारी की ओर हो लिए। उस वक़्त थियेटर का रूतबा था तो इन्होंने भी कई सारे नाटक किए, रंगमंच की शोभा बढाई। रंगमंच ने इनकी अदाकारी में इतने रंग भर दिए और इन्हें इतना मुखर कर दिया कि जब फिल्मों में इन्हें पहला मौका मिलना था तो इन्होंने रूखे-सूखे संवाद को अपने थियेटर के अंदाज़ से ऐसा रंगीन कर दिया कि सारे चयनकर्ता हक्के-बक्के रह गए।

 बात करते हैं जतिन खन्ना के रंगमंच के दिनों की। फिल्मों में आने से पहले इन्होंने अपने आप को रंगमंच पर खूब मांजा। इन्होंने कई नाटक मंचित किए। वार्डन रोड के भूलाभाई देसाई मेमोरियल इंस्टीयूट में ये नाटकों के रिहर्सल करते थे। उन्हीं दिनों गीताबाली ने वहां अपना दफ्तर खोला था। वह पंजाबी फिल्म 'रानो' की योजना बना रही थीं। गीता बाली ने इन्हें अपनी फिल्म में एक भूमिका दी और यह भविष्यवाणी भी कर दी कि तुम एक दिन बड़े स्टार बनोगे। इन्हें यकीन नहीं हुआ। ये ज्योतिषी से मिले। ज्योतिषी ने बताया कि अभिनेता के तौर पर इनका कोई भविष्य नहीं है। हां, अगर ये लोखंड (लोहा) का कारोबार करें तो सफल हो सकते हैं। ज्योतिषी की भविष्यवाणी गलत साबित हुई और अभिनेता जतिन खन्ना का लोहा सभी ने माना।

 समय बीतता गया और देखते-देखते १९६५ आ गया। तब जतिन खन्ना महज २३ साल के थे। उस वक़्त "युनाइटेड प्रोड्युसर्स" जिसमें शीर्ष के १२ फिल्म निर्माता शामिल थे, ने एक ‘ऑल इंडिया टैलेंट हंट आयोजित किया था। निर्णायकों में चेतन आनंद, जी पी शिप्पी , नासिर हुसैन जैसे मंझे हुए निर्माता-निर्देशक थे। इस टैलेंट हंट में दस हज़ार से भी ज्यादा प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। जतिन खन्ना ने सबको पछाड़ते हुए जीत हासिल की। कहते हैं कि हारने वालों में विनोद मेहरा भी थे.. खैर वह कहानी फिर कभी। हाँ तो इस जीत के साथ यह निश्चित हो गया था कि जतिन खन्ना एक के बाद एक १२ निर्देशकों की फिल्मों में नज़र आएँगे। उस वक़्त यह जुमला बहुत मशहूर हुआ था कि जहाँ दूसरे नवोदित कलाकार फटे कपड़े और टूटी चप्पल में संघर्ष कर रहे थे, वहीं जतिन खन्ना का स्ट्रगल इनकी "इम्पाला" गाड़ी में होता था। हाँ तो जब फिल्मों का दौर शुरू होना था, तब इनके शुभचिंतकों को महसूस हुआ कि जतिन नाम "खास फिल्मी" नहीं लगता, यह किसी व्यावसायिक घराने से जुड़े इंसान का नाम लगता है, इसलिए इन्हें सलाह दिया गया कि जतिन की जगह ये "फिल्मों के किसी आम किरदार" का नाम रखे लें और तब "जतिन" "राजेश" में तब्दील हो गया। इन शुभचिंतकों में या तो इनके अपने चाचा के०के० तलवार थे या फिल्म निर्माता जी०पी०सिप्पी।

 जतिन राजेश कैसे हुए ये तो हम जान गए लेकिन राजेश काका कैसे हुए, चलिए यह भी जान लिया जाए। ज्यादातर लोगों को यह गलतफहमी रहती है कि राजेश खन्ना को "काका" यानि कि "चाचा" के नाम से संबोधित किया जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। पंजाबी में काका का मतलब होता है छोटा नन्हा-सा बच्चा। जब ये फिल्मों में आए तब इनकी उम्र बहुत हीं कम थी। इसलिए इनके सहकलाकारों और इनके निर्माता-निर्देशकों ने इन्हें प्यार से काका कहना शुरू कर दिया। फिर आगे क्या हुआ, यह तो इतिहास है। आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन "काका" की पत्नी यानि कि डिंपल कपाड़िया भी इन्हें काका हीं कहा करती थीं, वैसे हीं जैसे दिलीप कुमार को शायरा बानो आज भी "साहब" हीं कहती हैं।

 राजेश खन्ना की सबसे पहली फिल्म आई "आखिरी खत"। इस फिल्म के निर्देशक थे चेतन आनंद। यह फिल्म १९६७ के ४०वें आस्कर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के श्रेणी में भेजी गई थी। आखिरी खत के बाद रविन्द्र दवे की "राज़" आई। समयक्रम के हिसाब से तो "राज़" बाद में आई थी, लेकिन "द हिन्दु" को दिए एक साक्षात्कार में राजेश खन्ना ने कहा था कि "भले हीं आखिरी खत मेरी पहली फिल्म थी, लेकिन पहला ब्रेक मुझे रविन्द्र दवे ने दिया था अपनी फिल्म राज़ में। इस फिल्म में मेरे साथ बबीता थीं, जो उस समय बहुत हीं मशहूर थीं। चूँकि मैं पहली बार कैमरे के सामने थे, इसलिए मेरे अंदर का कलाकार खुल कर बाहर आने में वक़्त ले रहा था। मैंने अपनी संवाद अदायगी तो दो-चार टेक में सही कर ली, लेकिन मेरा बडी लैंग्वेज और मेरा मूवमेंट अभी भी गलत हीं जा रहा था। तब रविन्द्र दवे ने मुझे सीन सही से समझाया और मेरे चलने के तरीके को परफेक्ट कर दिया।" "राज़" के बाद नासिर हुसैन की बहारों के सपने आई। बदकिस्मती से ये तीनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पे फ्लॉप हो गई। तीन लगातार फिल्मों के फ्लॉप होने के बाद निश्चित था कि निर्माता इनसे कन्नी काटने लगेंगे और वही हुआ, वही होता रहा.. जब तक अराधना नहीं आई थी।

 आराधना १९४६ की हॉलीवुड की फिल्म "टू इच हिज़ ओन" की रीमेक थी। कहते हैं कि अराधना जब आठ रील तक फिल्मा ली गई थी, तब तक इसके निर्देशक शक्ति सामंता काका की नाकामयाबी से इतने परेशान हो चले थे कि उन्होंने काका को फिल्म से निकाल देने तक का ख्याल कर लिया था। ऐसा इसलिए क्योंकि सारे वितरकों ने इस फिल्म से खुद को दूर करने की घोषणा कर दी थी। लेकिन फिर न जाने क्या हुआ, शक्ति सामंता को अपने मुख्य अभिनेता पर यकीन हो आया और उन्होंने इस फिल्म में न एक सिर्फ़ एक बल्कि दो-दो काका हमें दिए। कहते हैं कि जिस दिन फिल्म रीलिज हुई उस दिन दोपहर बारह बजे तक सिनेमा हॉल्स लगभग खाली थे, लेकिन शाम तक माउथ पब्लिसिटी इतनी फैली कि हॉल्स के बाहर हाउसफुल के बोर्ड लगाने पड़े। फिर तो राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर का एक फिल्म का सफर पूरी १२ फिल्मों तक चलता रहा। इस फिल्म से जुड़ी कुछ मज़ेदार कहानियाँ हैं। एक तो ये कि "रूप तेरा मस्ताना" हिन्दी फिल्मों का ऐसा पहला गाना है जो एक हीं टेक में फिल्माया गया था। इस फिल्म का एक और गाना "मेरे सपनों की रानी" सबको ज़रूर याद होगा। इस गाने की खासियत यह है कि काका की जीप और शर्मिला टैगोर की ट्वाय ट्रेन भले हीं एक साथ चलती दिखती हैं लेकिन दोनों का फिल्मांकन अलग-अलग जगहों पर हुआ था। शर्मिला उस वक़्त सत्यजीत रे की फिल्म कर रही थीं, इसलिए वो दार्जिलिंग न जा सकी और उनके दृश्य बंबे में हीं फिल्माए गए। काका अपनी धुन के पक्के थे इसलिए वे सुजीत कुमार को साथ लेकर निकल लिए दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की सैर करने।

 काका की एक और जो बहुत मक़बूल फिल्म थी वह थी "हाथी मेरे साथी"। इस फिल्म के निर्माता थे तेवार फिल्म्स के चिनप्पा तेवार, जो कि अपनी फिल्मों में जानवरों के इस्तेमाल के लिए मशहूर थे। यह पहली फिल्म थी जिसमें सलीम-जावेद ने पटकथा लिखी थी। और इसका सारा श्रेय काका को जाता है। बकौल जावेद साहब: "एक दिन राजेश खन्ना सलीम साहब के पास आएँ और उन्होने कहा कि मिस्टर तेवार ने उन्हें बहुत बड़ा साइनिंग अमाउंट दिया है, जिससे वे अपने बंगले आशिर्वाद की किश्तें चुका पाएँगे। लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म की स्क्रिप्ट बेहतरीन क्या, अच्छी होने से भी कोसों दूर है। इसलिए वे चाहते थे कि हम दोनों सलीम और जावेद मिलकर इस पर काम करॆं और उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि हमें पैसों के साथ-साथ क्रेडिट भी पूरी मिले।" इस फिल्म से जुड़ा एक मज़ेदार वाक्या है। यह तो जगजाहिर था कि काका जब कामयाब हो लिए तो उन्होंने घड़ी पर ध्यान रखना लगभग छोड़ हीं दिया था। अगर फिल्म की शिफ्ट सुबह ६ बजे की हो तो ये सेट पर ३ बजे दिन में पहुँचते थे। अच्छे अदाकार थे इसलिए इन्हें ज्यादा टेक लेने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी, लेकिन निर्माता-निर्देशक को नुकसान तो सहना हीं पड़ता था। तो हुआ यूँ कि जब भी काका हाथी मेरे साथी के सेट पर पहुँचते थे तो देखते थे कि चिनप्पा तेवार एक स्पॉट ब्यॉय की पिटाई कर रहे हैं। यह हर रोज़ होता था। थक-हारकर एक दिन जब काका ने उस लड़के से पिटाई की वजह पूछी तो मालूम चला कि निर्माता होते थे गुस्सा काका से लेकिन चूँकि काका को कुछ कह नहीं सकते इसलिए उन्हें दिखाकर अपना गुस्सा निकालते थे। तब से काका ने यह कोशिश करनी शुरू कर दी वे सेट पर लेट न पहुँचें। 

काका को गीत-संगीत का बहुत शौक था और वे ध्यान रखते थे कि इनकी फिल्मों के गानें कहीं से कमजोर न रहें। इनके गानों मे पंचम और किशोर अमूमन नियमित और निश्चित थे। कई बार तो इन्होंने जिद्द ठान ली थी कि किशोर नहीं गाएँगे तो गाना हीं नहीं होगा। एक ऐसे हीं वाक्ये का ज़िक्र किशोर दा ने एक इंटरव्यु में किया था। उस दौरान काका की पंचम दा से कुछ अनबन हो गई थी। इसलिए उन्होंने "दुश्मन" फिल्म के निर्माता से कहकर पंचम दा की जगह "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल" को साईन करवा लिया था। तो जब उस फिल्म के एक गाने "वादा तेरा वादा" को गाने कि बारी आई तो किशोर दा को महसूस हुआ कि इसे अगर रफ़ी साहब गाएँगे तो ज्यादा जमेगा। उन्होंने यह बात एल-पी को बताई लेकिन काका के सामने किसकी चलनी थी। काका ने सीधा-सीधा कह दिया कि या तो किशोर या तो कोई नहीं। हार मानकर किशोर दा को हामी भरनी पड़ी। आराधना के दौरान काका ने शक्ति सामंता को इतना कह दिया था कि किशोर उनकी आत्मा हैं और वे किशोर के शरीर। काका किशोर दा और पंचम दा के साथ-साथ आनंद बक्शी के भी काफी नजदीक थे। कहते हैं कि जब १९९२ में ससदीय उपचुनाव चल रहे थे तब ये बक्षी साहब से कविताएँ लिखवाकर उन्हें मंच पर पढा करते थे। १९८५ में इन्होने जब अपनी फिल्म "अलग-अलग" बनाई थी, तब इन्होंने वादे के अनुसार पंचम दा और बक्षी साहब को एक-एक कार उपहार में दिए थे। तो ऐसा था इनका गीत-संगीत से प्यार।

 काका ने दो साल में चौदह गोल्डन-जुब्ली फिल्में दी थीं। इन्होंने बहुत कम हीं मल्टी-स्टारर फिल्में की थीं। उन मल्टी-स्टारर में दो जो खासे लोकप्रिय हुए वे थे आनंद और नमकहराम। दोनों फिल्मों में काका के साथ थे तब के उभरते स्टार अमिताभ बच्चन। दोनों हीं फिल्में ऋषिकेष मुखर्जी यानि कि राज कपूर के बाबू मोशाय की थीं। आनंद के बारे में क्या कहा जाए। बच्चे-बच्चे की जुबान पर "बाबू मोशाय" और "ज़िंदगी एक रंगमंच है और हम सब कठपुतलियाँ" आज भी वैसे हीं चस्पां है जैसे ३५ साल पहले था। कहते हैं कि भले हीं काका दूसरे निर्देशकों के सामने नखरे दिखाते हॊं लेकिन ऋषि दा के सामने उनकी एक न चलती थी। फिर भी अगर बीबीसी के संवाददाता जैक पिज़्ज़े की "बम्बे सुपरस्टार" नाम की डाक्यूमेंट्री देखें तो मालूम पड़ जाएगा कि नमकहराम की शूटिंग के दौरान काका के नखरे चरम पर थे। अमिताभ घंटों से इंतेज़ार कर रहे हैं, काका आते हैं, अपने संवाद देखते हैं, पढते हैं, निर्देशक को कुछ सुनाते हैं और निकल जाते हैं। वैसे भी अमिताभ और काका के बीच का यह फासला पुराने सूरज के डूबने के डर और नए के निकलने की तैयारी का था। तब के एक पत्रकार अली पीटर जॉन ने अपने संस्मरण में एक जगह लिखा भी था कि अमिताभ बच्चन के आगमन पर राजेश खन्ना की टिप्पणी थी कि ऐसे अटन-बटन आते-जाते रहते हैं। "बावर्ची" की शूटिंग के दौरान जया भादुड़ी और काका में इसी विषय पर बहस भी हो गई थी और जया भादुड़ी ने एक तरह से भविष्यवाणी कर दी थी कि "देखना एक दिन ये जो आदमी मेरे साथ खड़ा है वह कितना बड़ा स्टार होगा और वो जो अपने आप को खुदा समझता है वो कहीं का नहीं रहेगा।" काका की सबसे बड़ी खामी यही थी कि उन्होंने सफलता को सर पे चढा लिया। काश ऐसा न होता!!

 काका बड़े हीं मूडियल थे। अपनी ज़िंदगी के दो सबसे बड़े निर्णय उन्होंने इसी ताव मॆं लिए थे। डिम्पल कपाड़िया से शादी के पहले उनकी अंजु महेंद्रु नाम की गर्लफ्रेंड हुआ करती थी और वे दोनों साथ रहते थे। किसी कारण से काका और अंजु महेंद्रु की माँ के बीच अनबन हो गई और अंजु घर छोड़कर चली गईं। अपने आप को सही साबित करने के लिए काका ने आनन-फानन में अपने से १५ साल छोटी डिंपल से शादी कर ली,जिनकी बॉबी अभी-अभी सुपरहिट हुई थी। काका की लाखों चाहने वालियों में डिंपल भी एक थीं और उन्होंने भी काका के घर के बाहर इनकी एक झलक का घंटों इंतेज़ार किया था, इसलिए डिंपल शादी के लिए झट तैयार हो गईं। ये अलग बात है कि काका ने उन्हें सुपरस्टार का खिताब देने वालीं देवयानी चौबल को झूठी कहानी बताई थी कि इन्होंने डिंपल को समुद्र में डूबने से बचाया था और उसी दौरान डिंपल की सुंदरता पर मोहित हो गए। ऐसा हीं ताव काका ने तब दिखाया था जब वे जुबली कुमार राजेंद्र कुमार से उनका डिंपल नाम का घर खरीद रहे थे। काका के पास उतने पैसे नहीं तो उन्होंने यश चोपड़ा से कहा था कि वे इनसे चाहे जिस फिल्म में काम करवा लें लेकिन तत्काल घर खरीदने का पैसा दे दें। घर खरीद लेने पर वे घर का नाम डिंपल हीं रहने देना चाहते थे। लेकिन चूँकि राजेंद्र कुमार की बेटी का नाम डिंपल था तो उन्होंने काका के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। काका ताव में तो जीत गए लेकिन इन्हें खून का घूंट पीकर अपने मकान का नाम "डिंपल" से "आशीर्वाद" करना पड़ा।

 १९७८-७९ के बाद काका को अपनी रोमांटिक हीरो की छवि छोड़कर दुसरे किरदार निभाने पड़े। इनमें से बहुत सारी फिल्में तो प्लॉप रहीं लेकिन आलोचकों ने इनके अभिनय को काफी सराहा। ऐसी हीं एक फिल्म थी "भारती राजा" की "रेड रोज़"। यह फिल्म भारती राजा की हीं १९७८ की तमिल फिल्म "सिगप्पु रोजक्कल" की रीमेक थी,जिसमें कमल हसन मुख्य अभिनेता थे। रेड रोज़ में काका का किरदार एक "साईकोपैथ" का था। माना जाता है कि काका का अभिनय कमल हसन से भी बेहतर था। ऐसी हीं लीक से हटकर एक फिल्म थी "खुदाई", जिसमें काका ने कमाल किया था। राजनीति में आने से पहले काका की अंतिम फिल्म डेविड धवन की स्वर्ग थी। आगे चलकर इन्होंने ऋषि कपूर की "आ अब लौट चलें" की,जिसमें ये उतने कामयाब न हो सके। काका की आखिरी फिल्म हाल में हीं सूर्खियों में रही मरहूम लैला खान के साथ "वफ़ा" थी। संयोग या यूँ कहें कि कुयोग देखिए कि वफ़ा के दोनों मुख्य कलाकार एक महिने के अंदर दिवंगत हो लिए। लैला खान को उसके पूरे परिवार के साथ किसी की गोलियों ने मौत के घाट उतार दिया तो काका को उनकी शराब की आदतों और लंबी बीमारी ने । काका आखिरी बार हैवल्स फैन के ऐड में पर्दे पर नज़र आए थे..... मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता। १८ जुलाई २०१२ को ऊपर वाले ने काका को हीं हम सबसे छीन लिया। "टाईम हो गया है, पैक अप" कहते हुए वे ज़िंदगी से मौत की और चल पड़े।

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