सोमवार, 30 अप्रैल 2012

सिने-पहेली # 18 (जीतिये 5000 रुपये के इनाम)

सिने-पहेली # 18 (30 अप्रैल, 2012) 


नमस्कार दोस्तों, 'सिने पहेली' की 18-वीं कड़ी में मैं, सुजॉय चटर्जी, आप सभी का फिर एक बार स्वागत करता हूँ। दोस्तों, यह हमारे लिए बहुत ख़ुशी की बात है कि धीरे-धीरे 'सिने-पहेली' परिवार में नए-नए सदस्य जुड़ते जा रहे हैं, और हमारा परिवार बड़ा होता जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि आने-वाले सेगमेण्ट्स बहुत दिलचस्प होने वाले हैं। पिछले हफ़्ते कृतिका, शुभ्रा शर्मा और राजेश प्रिया हमसे जुड़े, और इस हफ़्ते दो और प्रतोयोगियों का इज़ाफ़ा हुआ है। ये हैं मुंबई के शुभम जैन और अलीगढ़ के सलमान ख़ान। आप दोनों का बहुत-बहुत स्वागत है 'सिने-पहेली' में और हम आपसे यह गुज़ारिश करते हैं कि हर एपिसोड में ज़रूर भाग लीजिएगा ताकि महाविजेता की लड़ाई में आप पीछे न रह जाएँ। महाविजेता बनने के लिए नियमितता काफ़ी मायने रखेगी।

सभी नए प्रतियोगियों के लिए 'सिने पहेली' महाविजेता बनने के नियम हम एक फिर दोहरा देते हैं। हमने इस प्रतियोगिता को दस-दस कड़ियों के सेगमेण्ट्स में विभाजित किया है (वर्तमान में दूसरा सेगमेण्ट चल रहा है जिसकी आज आठवीं कड़ी है)। इस तरह से १००-वें अंक तक १० सेगमेण्ट्स हो जाएँगे, और हर सेगमेण्ट का एक विजेता घोषित होगा (पहले सेगमेण्ट के विजेता रहे प्रकाश गोविंद)। इस तरह से १० सेगमेण्ट्स के बाद जो सर्वाधिक सेगमेण्ट विजेता होगा, वही होगा महाविजेता और उन्ही को 5000 रुपये की नकद राशि से सम्मानित किया जाएगा। 

चलिए अब शुरु किया जाए आज की 'सिने पहेली - 18' के सवालों का सिलसिला...

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 सवाल-1: बूझो तो जाने

इस श्रेणी में हम आपको कुछ शब्द देंगे जिनका इस्तमाल कर आपको किसी हिन्दी फ़िल्मी गीत का मुखड़ा बनाना है। यानी कि हम आपको किसी गीत के मुखड़े के कुछ महत्वपूर्ण शब्दों को आगे-पीछे करके देंगे, आपको सही मुखड़ा पहचानना है। तो ये रहे आज के गीत के कुछ शब्द; ध्यान से पढ़िए और इन शब्दों को उचित स्थानों पे बिठाकर बताइए कि यह कौन सा गीत है।
 मज़ा, क़सम, दीवानापन, सोचो, देखो, दिन, अकेले  

सवाल-2: पहचान कौन!

आज की चित्र-पहेली बिल्कुल आसान है। आपको बस नीचे दिए चित्र में दिख रहे अभिनेता को पहचानना है।


सवाल-3: सुनिये तो...

'सुनिये तो...' में आज आपको सुनवा रहे हैं एक गोडन वॉयस। ४० के दशक के किसी फ़िल्म का यह गीत है। बताइए यह आवाज़ किनकी है?



सवाल-4: कौन हूँ मैं?

मैं एक पार्श्वगायक हूँ। मेरा जन्म हरियाणा में हुआ था। मेरे स्कूल में मेरा सहपाठी रहा वह लड़का जो आगे चलकर एक संगीतकार बना। मेरी पहली फ़िल्म में मेरे अन्य गीतों के अलावा एक युगल गीत ऐसा भी था जिसे १९३६ की किसी फ़िल्म में सुरेन्द्र और बिब्बो ने गाया था। मैंने १९४४ में कुसुम मंत्री के साथ एक युगल गाया था जिसमें दिल किराये पे लेने की बात कही गई थी। इस गीत का जो फ़िल्म का नाम है, उसमें दो शब्द हैं, और इन्हीं दो शब्दों का इस्तमाल मेरे गाए १९४५ की एक फ़िल्म के एक गीत के मुखड़े में हुआ है जिसे मैंने दो गायिकाओं के साथ मिलकर गाया है। नारायण के साथ मिलकर १९४६ में मैंने एक गीत गाया था जिसके मुखड़े में "अंजाम", "नाकाम" और "आग़ाज़" जैसे शब्द हैं। जब मेरा बेटा मेरे पास आकर कहा कि मुझे भी गायक बनना है, तब मैंने उससे कहा, "Singing is a very good hobby, but a very painful profession"। तो फिर बताइए कौन हूँ मैं?

सवाल-5: गीत अपना धुन पराई

और अब पाँचवा और आख़िरी सवाल। सुनिए इस विदेशी धुन को और पहचानिए वह हिन्दी फ़िल्मी गीत जो इस धुन से प्रेरित है। 



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तो दोस्तों, हमने पूछ लिए हैं आज के पाँचों सवाल, और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. अगर आपको सभी पाँच सवालों के जवाब मालूम है, फिर तो बहुत अच्छी बात है, पर सभी जवाब अगर मालूम न भी हों, तो भी आप भाग ले सकते हैं, और जितने भी जवाब आप जानते हों, वो हमें लिख भेज सकते हैं।

२. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

३. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 18" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम, स्थान और पेशा लिखें।

४. आपका ईमेल हमें शुक्रवार 4 मई तक मिल जाने चाहिए।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और पचासवे अंक के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा। 

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और अब 20 अप्रैल को पूछे गए 'सिने-पहेली # 17' के सवालों के सही जवाब---

1. पहले सवाल का गीत है फ़िल्म 'ठाकुर जर्नैल सिंह' का "हम तेरे बिन जी ना सकेंगे सनम, दिल की ये आवाज़ है"। 

2. 'चित्र-पहेली' में जिस फ़िल्म का पोस्टर दिखाया गया है, वह है फ़िल्म 'शौकीन'।

3. इस प्रश्न का सही जवाब है गायक मनमोहन सिंह।

4. 'कौन हूँ मैं' का सही जवाब है बिमल रॉय।

5. 'गीत अपना धुन पराई' में जो विदेशी गीत सुनवाया था, उससे प्रेरित हिन्दी गीत है फ़िल्म 'दो जासूस' का "पुरवैया लेके चली मेरी नैया जाने कहाँ रे"। मूल विदेशी गीत के डीटेल ये रहे: "Woyaya" by Art Garfunkel, music from Sol Amarfio & OSIBISA,
album "Angel Clare" released in 1973


और अब 'सिने पहेली # 17' के विजेताओं के नाम ये रहे (जिस क्रम से जवाब प्राप्त हुए हैं) -----

1. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 5 अंक

2. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 5 अंक

3. राजेश प्रिया, पटना --- 5 अंक

4. रीतेश खरे, मुंबई --- 5 अंक

5. सलमन ख़ान, अलीगढ़ --- 5 अंक

6. कृतिका, दुबई --- 4 अंक

7. शुभम जैन, मुंबई --- 3 अंक

8. अमित चावला, दिल्ली --- 3 अंक


सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। अब जबकि 'सिने पहेली' के दूसरे सेगमेण्ट के १० में से ७ अंकों के परिणाम सामने आ गए हैं, तो क्यों न एक नज़र डाली जाए अब तक के सम्मिलित स्कोर पर। शीर्ष के पाँच प्रतियोगियों के स्कोर ये रहे...

1. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 35 अंक (100%)

2. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 32 अंक (91%)

3. रीतेश खरे, मुंबई --- 30 अंक (86%)

4. अमित चावला, दिल्ली --- 28 अंक (80%)

5. क्षिति तिवारी, इंदौर --- 24 अंक (69%)


प्रतियोगिता बेहद दिलचस्प मोड़ पे आ पहुँची है। पंकज मुकेश जो अब प्रकाश गोविंद से केवल ३ अंक पीछे रह गए हैं, क्या अगली तीन पहेलियों में वो प्रकाश गोविंद को मात दे पाएँगे? या फिर प्रकाश गोविंद ही बनेंगे दूसरे सेगमेण्ट के विजेता? नतीजा जो भी हो, आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, हम बस इतना ही चाहते हैं। 

हम फिर एक बार उन साथियों से, जिन्होंने अभी तक इस प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया है, अनुरोध करते हैं कि 'सिने पहेली' के सवालों के जवाब भेज कर इस जंग में शामिल जायें, और 5000 रुपये का इनाम अपने नाम कर लें। क्यों किसी और को देना है 5000 रुपये जब आप में काबिलियत है इसे जीतने की? आज बस इतना ही, अगले सप्ताह आपसे इसी स्तंभ में दोबारा मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

३० अप्रैल- आज का गाना



गाना: पिया मिलन को जाना

चित्रपट: कपाल कुण्डला
संगीतकार:पंकज मलिक
गीतकार:
पंकज मलिक 
स्वर: 
पंकज मलिक





पिया मिलन को जाना, हां पिया मिलन को जाना
जग की लाज, मन की मौज, दोनों को निभाना
पिया मिलन को जाना, हां पिया मिलन को जाना

काँटे बिखरा के चलूं, पानी ढलका के चलूं \- २
सुख के लिये सीख रखूं \- २
पहले दुख उठाना, पिया मिलन को जाना ...

(पायल को बांध के \- २), उठी चुभ नाग के (?)
पायल को बांध के
धीरे\-धीरे दबे\-दबे पावों को बढ़ाना
पिया मिलन को जाना ...

बुझे दिये अंधेरी रात, आँखों पर दोनों हाथ \- २
कैसे कटे कठिन बाट \- २
चल के आज़माना, पिया मिलन को जाना
हां पिया मिलन को जाना, जाना
पिया मिलन को जाना, जाना
पिया मिलन को जाना, हां
पिया मिलन को जाना




रविवार, 29 अप्रैल 2012

94वें जन्मदिवस पर सुर-गन्धर्व मन्ना डे को स्वरांजलि


स्वरगोष्ठी – ६८ में आज

स्वर-साधक मन्ना डे और राग दरबारी

हिन्दी फिल्मों में १९४३ से २००६ तक सक्रिय रहने वाले पार्श्वगायक मन्ना डे फिल्म-संगीत-क्षेत्र में अपनी उत्कृष्ठ स्तर की गायकी के लिए हमेशा याद किए जाएँगे। फिल्मों में राग आधारित गीतों की सूची में उनके गाये गीत शीर्ष पर हैं। १ मई, २०१२ को मन्ना दा अपनी आयु के ९३ वर्ष पूर्ण कर ९४वें वर्ष में प्रवेश करेंगे। इस उपलक्ष्य में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हम उनके स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की प्रार्थना करते हुए उन्हें जन्म-दिवस पर बधाई देते हैं।



‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक में मैं, कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का, एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज की और अगले सप्ताह की गोष्ठी में हम फिल्म-जगत के सुप्रसिद्ध पार्श्व-गायक मन्ना डे को उनके जन्म-दिवस के अवसर पर, उन्हीं के गाये गीतों से अपनी शुभकामनाएँ अर्पित करेंगे। आज के अंक में हम उनके राग-आधारित गाये असंख्य गीतों में से राग दरबारी कान्हड़ा के तीन श्रेष्ठ गीत सुनवाने जा रहे हैं। परम्परागत भारतीय संगीत में राग दरबारी का जो स्वरूप बना हुआ है, आज की प्रस्तुतियों में आपको वह स्वरूप स्पष्ट रूप से परिलक्षित होगा। साथ ही राग दरबारी पर भी हम थोड़ी चर्चा भी करेंगे।

आपको सुनवाने के लिए मन्ना डे का गाया आज का पहला गीत जो हमने चुना है, वह १९५९ की फिल्म ‘रानी रूपमती’ से है। इस फिल्म के संगीतकार हैं- एस.एन. त्रिपाठी, जिन्होने कई राग-आधारित गीतों से फिल्म को सुसज्जित किया था। इन गीतों में एक गीत है- ‘उड़ जा भँवर माया कमल का आज बन्धन तोड़ दे...’, जो राग दरबारी पर आधारित गीतों में एक उत्कृष्ट गीत है। फिल्म में यह गीत दो भागों में है। मन्ना डे का गाया गीत का पहला भाग राग दरबारी पर आधारित है, जिसमें जीवन में वैराग्य के महत्त्व को रेखांकित किया गया है। गीत का दूसरा भाग राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित है और इसे लता मंगेशकर ने गाया है, जिसमें जीवन में प्रेम का महत्त्व रेखांकित है। आज हम आपको गीत का पूर्वार्द्ध, जो राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित है, सुनवा रहे हैं। गीतकार हैं, भरत व्यास। अति कोमल गांधार का आन्दोलन राग दरबारी की एक मुख्य विशेषता होती है, जिसका दर्शन आपको गीत में होगा। आइए, रूपक ताल में निबद्ध इस गीत का आनन्द लिया जाए-

फिल्म – रानी रूपमती : ‘उड़ जा भँवर माया कमल का...’ : संगीत - एस.एन. त्रिपाठी



राग दरबारी के स्वरों में श्रृंगार और भक्ति रस खूब मुखर होता है, किन्तु मन्ना डे के दरबारी के स्वरॉ में गीत का वैराग्य भाव कितना मुखरित हुआ है, आपने यह गीत सुन कर स्पष्ट अनुभव किया होगा। मन्ना डे को संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उनके चाचा कृष्णचन्द्र (के.सी.) डे से मिली, जो बंगाल की भक्ति संगीत शैलियों के सिद्ध गायक थे। इसके अलावा अपने विद्यार्थी जीवन में उस्ताद दबीर खाँ से खयाल, तराना और ठुमरी की शिक्षा भी प्राप्त हुई। १९४० में मन्ना डे अपने चाचा के साथ कोलकाता से मुम्बई आए अपने चाचा के साथ-साथ खेमचन्द्र प्रकाश, शंकरराव व्यास, अनिल विश्वास, सचिनदेव बर्मन आदि के सहायक के रूप में कार्य किया। इस दौर में उन्होने कई फिल्मों में संगीत निर्देशन भी किया। फिल्म-संगीत के क्षेत्र में स्वयं को स्थापित करने के प्रयासों के बीच मन्ना डे ने मुम्बई में उस्ताद अमान अली खाँ और उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ से संगीत सीखना जारी रखा।

मन्ना डे के स्वर में राग दरबारी पर आधारित आज का दूसरा गीत श्रृंगार रस प्रधान है। यह गीत हमने १९६८ की फिल्म ‘मेरे हुज़ूर’ से लिया है। इसके संगीतकार शंकर-जयकिशन और गीतकार हसरत जयपुरी हैं। फिल्मों में राग दरबारी पर आधारित श्रृंगार रस प्रधान गीतों की सूची में यह गीत सर्वोच्च स्थान पर रखे जाने योग्य है। तीन ताल में निबद्ध इस गीत में मन्ना डे ने अन्तिम अन्तरे में सरगम तानों का प्रयोग अत्यन्त कुशलता से किया है। आइए, सुनते हैं यह सुरीला गीत।

फिल्म – मेरे हुज़ूर : ‘झनक झनक तोरी बाजे पायलिया...’ : संगीत – शंकर-जयकिशन



फिल्मों में राग आधारित गीतों के गायन में मन्ना डे का कोई विकल्प नहीं था। उनके गाये गीतों में ध्रुवपद, खयाल और ठुमरी अंग की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्होने श्रृंगार, भक्ति आदि रसों में अनेक राग आधारित गीतों को गाया है, किन्तु हास्य-रस-प्रधान गीतों के गायन में भी उनका कोई जवाब नहीं था। आज के अंक का तीसरा और अन्तिम गीत राग दरबारी के स्वरों पर आधारित एक हास्य गीत है, किन्तु उससे पहले थोड़ी चर्चा राग दरबारी के स्वरूप के विषय में आवश्यक है।

प्राचीन काल में कर्णाट नामक एक राग प्रचलित था। १५५० की राजस्थानी पेंटिंग में इस राग का नाम आया है। बाद में यह राग कानडा या कान्हड़ा नाम से प्रचलित हुआ। अकबर के दरबारी गायक तानसेन ने इस राग के स्वरों में कुछ परिवर्तन कर राज-दरबार में गाया। तब से यह दरबारी कान्हड़ा नाम से प्रचलित हुआ। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के इस राग में धैवत और निषाद स्वर कोमल, आन्दोलन के साथ अति कोमल गांधार स्वर और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। अवरोह के स्वर वक्रगति से लगाए जाते हैं।

संगीतकार सचिनदेव बर्मन, १९६४ की एक फिल्म- ‘जिद्दी’ के संगीतकार थे। इस फिल्म में उन्होने हास्य अभिनेता महमूद के लिए एक हास्य-गीत- ‘प्यार की आग में तन बदन जल गया...’ राग दरबारी के स्वरों में ढाला था। हसरत जयपुरी के इस गीत को मन्ना डे ने बड़े कौशल से गाया। महमूद के लिए मन्ना डे द्वारा कई हास्य-गीत गाये गए हैं, जिनमें यह गीत विशेष उल्लेखनीय है। कहरवा ताल का लोच गीत में हास्य-रस की वृद्धि करता है। आप यह गीत सुनिए और आज के इस अंक से मुझे यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

फिल्म – जिद्दी : ‘प्यार की आग में तन बदन जल गया...’ : संगीत सचिनदेव बर्मन





आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं मन्ना डे की ही आवाज़ में १९६२ की एक फिल्म के गीत का अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ७०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी दूसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – पर्दे पर यह गीत किस अभिनेता पर फिल्माया गया है?


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ७०वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ६६वें अंक की पहेली में हमने आपको बांग्ला में एक रवीद्र-गीत का अंश सुनवा कर आपसे ताल का नाम और उस गीत के समतुल्य हिन्दी फिल्मी गीत का परिचय पूछा था। सही उत्तर है सात मात्रा का रूपक ताल और हिन्दी फिल्म अभिमान का गीत- ‘तेरे मेरे मिलन की ये रैना...’। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर हमारे तीन पाठकों- बैंगलुरु के पंकज मुकेश, पटना की अर्चना टण्डन और मीरजापुर (उत्तर प्रदेश) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर हार्दिक बधाई। हमारा ६६वाँ अंक ‘उस्ताद अली अकबर खाँ और राग मारवा’ विषय पर केन्द्रित था। इस अंक के बारे में हमें कई पाठकों/श्रोताओं के प्रतिक्रिया मिली है। जाने-माने संगीत-समीक्षक मुकेश गर्ग ने आलेख में टाइप की एक अशुद्धि को इंगित किया है। उनका आभार व्यक्त करते हुए हम अपेक्षा करते हैं कि भविष्य में भी इसी प्रकार हमारा मार्गदर्शन करते रहें। अनुपमा त्रिपाठी ने इस अंक में दी गई जानकारी को ‘बेहद उपयोगी’ बताया। हमारे एक अन्य पाठक, शिवम मिश्रा ने उस्ताद अली अकबर खाँ की स्मृतियों को नमन करते हुए प्रस्तुत आलेख को पसन्द किया। ‘ब्लॉग बुलेटिन’ ने हमारी पोस्ट को अपने पृष्ठ पर शामिल करते हुए आभार प्रकट किया है। इनके साथ ही उन सभी संगीत-प्रेमियों का हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक को पसन्द किया। आपको याद ही होगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ के ६५वाँ अंक हमने पण्डित कुमार गन्धर्व के प्रति समर्पित किया था। कुछ विलम्ब से ही सही, कुमार जी की सुपुत्री और सुप्रसिद्ध गायिका सुश्री कलापिनी कोमकली जी ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए हमारे आलेख और राग के चयन को ‘बहुत अच्छा’ कहा। हम कलापिनी जी के हृदय से आभारी हैं।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, सुर गन्धर्व मन्ना डे के जन्म-दिवस पर आयोजित ‘स्वरगोष्ठी’ का यह अनुष्ठान अगले अंक में भी जारी रहेगा। मन्ना डे के गाये राग आधारित गीतों के समृद्ध खजाने में से चुन कर कुछ और गीत हम आपके लिए प्रस्तुत करेंगे। आगामी रविवार की सुबह ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

२९ अप्रैल- आज का गाना



गाना: रुक जा ओ जानेवाली रुक जा

चित्रपट: कन्हैया
संगीतकार:शंकर - जयकिशन
गीतकार:शैलेन्द्र
स्वर: 
मुकेश






रुक जा ओ जाने वाली रुक जा
मैं तो राही तेरी मंज़िल का
नज़रों में तेरी मैं बुरा सही
आदमी बुरा नहीं मैं दिल का  \- (२)

देखा ही नहीं तुझको
सूरत भी न पहचानी
तू आके चली छम से
यूँ डूबके दिन पानी \- (२)
     रुक जा ...

मुद्दत से मेरे दिल के
सपनों की तू रानी है
अब तक न मिले लेकिन
पहचान पुरानी है \- (२)
     रुक जा ...

आ प्यार की राहों में
बाहों का सहारा ले
दुनिया जिसे गाती है
उस गीत को दोहरा ले  \- (२)
     रुक जा ...





शनिवार, 28 अप्रैल 2012

tERRORISM - एक लघु फिल्म

"बीट ऑफ इंडियन यूथ" एक संगीतमय प्रोजेक्ट है जिसे रेडियो प्लेबैक और उसकी टीम का समर्थन हासिल है, ये दृश्य और श्रवण माध्यमों से आज के युवा वर्ग को प्रेरित करने, उनमें इमानदारी इंसानियत और राष्ट्प्रेम जैसी मूल भावानाओं को जागृत करने और आतंकवाद के खिलाफ एक जुट होने के लिए तैयार करने की एक पहल है जिसे पूर्व राष्ट्पति श्री ए पी जे अब्दुल कलाम का भी आशीर्वाद प्राप्त है. इसी श्रृंखला में एक और कड़ी जोड़ती है ये लघु फिल्म.

t"ERRORISM"
A Short Film completely shot using 12.1 MP digital cam (Canon Powershot X220hs )
Major portion of this film was shot in Kochi.

J KABS in association with BEAT OF INDIAN YOUTH

PRESENTS

tERRORISM

STORY.DOP.DIRECTION: BASIL BK

SOUND DESIGN N MIX: JIBIN GEORGE SEBASTIAN

EDITING: DEEPU JOSEPH

CAST: JEAN TOMS SANKAR GANESH ASWAS BABU KRISHNAN C PAI

Sincer thanks

Shenoys theater
KERALA POLICE
Maharajas college
Mr. Rajeesh (naval base)
ADDHOC Team   


२८ अप्रैल- आज का गाना



गाना: मुझे जब जब बहारों का ज़माना याद आएगा

चित्रपट: खानदान
संगीतकार:रवि
गीतकार:राजेन्द्र कृष्ण
स्वर: रफ़ी






मुझे जब जब बहारों का ज़माना याद आएगा
कहीं अपना भी था इक आशियाना याद आएगा
कल चमन था आज इक सहरा हुआ
देखते ही देखते ये क्या हुआ
कल चमन था ...

मुझको बरबादी का कोई ग़म नहीं -२
ग़म है बरबादी का क्यों चर्चा हुआ
कल चमन था ...

एक छोटा सा था मेरा आशियाँ -२
आज तिनके से अलग तिनका हुआ
कल चमन था ...

सोचता हूँ अपने घर को देखकर -२
हो न हो ये है मेरा देखा हुआ
कल चमन था ...

देखने वालों ने देखा है धुआँ -२
किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ
कल चमन था ...




शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

२७ अप्रैल- आज का गाना



गाना: पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ

चित्रपट: शिकार
संगीतकार:शंकर - जयकिशन
गीतकार:हसरत
स्वर: 
आशा भोसले





पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ
पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जायेगा
अल्लाह मेरी तौबा, अल्लाह मेरी तौबा   ...

मेरे  पर्दे   में लाख जलवे हैं
कैसे मुझसे नज़र मिलाओगे
जब ज़रा भी नक़ाब उठाऊँगी
याद रखना की, जल ही जाओगे
पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ   ...

हुस्न जब बेनक़ाब होता है
वो समाँ लाजवाब होता है
खुद को खुद की खबर नहीं रहती
होश वाला भी, होश खोता है
पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ   ...

हाय जिसने मुझे बनाया है,
वो भी मुझको समझ न पाया है
मुझको सजदे किये हैं इन्साँ ने
इन फ़रिश्तों ने, सर झुकाया है
पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ   ...




गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

२६ अप्रैल- आज का गाना



गाना: नज़रों में समाने से क़रार

चित्रपट: हैदराबाद की नाजनीन
संगीतकार:वसंत देसाई
गीतकार:नूर लखनवी
स्वर: राजकुमारी





आ आ आ~~~~~~~~
नज़रों में समाने से क़रार आ न सकेगा
तुम पास नहीं दिल को ये बहला न सकेगा

तस्वीर निगाहों में ख़्हामोश तुम्हारी
जो सुन नहीं सकती कभी फ़रियाद हमारी
ये खाली तसव्वुर किसी काम आ न सकेगा
तुम पास नहीं दिल को ये बहला न सकेगा
आ आ~~~ नज़रों में समाने...

आयेगा ख़्हयाल आके
ओह ओह ओह
आयेगा ख़्हयाल आके गुज़रता ही रहेगा
आहें कोई दिल थाम के भरता ही रहेगा
तस्कीन की सूरत कोई बतला न सकेगा
तुम पास नहीं दिल को ये बहला न सकेगा
आ आ~~~ नज़रों में समाने...

टकरायेंगे हम सर कभी दीवार से दर से
हर साँस में उबलेगा लहू ज़ख़्ह्म-ए-जिगर से
दिल ढूँधेगा
आ आ आ
दिल ढूँधेगा तड़पेगा तुम्हें पा न सकेगा
तुम पास नहीं दिल को ये बहला न सकेगा
आ आ~~~ नज़रों में समाने...




बुधवार, 25 अप्रैल 2012

"डफ़ली वाले डफ़ली बजा..." - शुरू-शुरू में नकार दिया गया यह गीत ही बना फ़िल्म का सफ़लतम गीत


कभी-कभी ऐसे गीत भी कमाल दिखा जाते हैं जिनसे निर्माण के समय किसी को कोई उम्मीद ही नहीं होती। शुरू-शुरू में नकार दिया गया गीत भी बन सकता है फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत। एक ऐसा ही गीत है फ़िल्म 'सरगम' का "डफ़ली वाले डफ़ली बजा"। यही है आज के 'एक गीत सौ कहानियाँ' के चर्चा का विषय। प्रस्तुत है इस शृंखला की १७-वीं कड़ी सुजॉय चटर्जी के साथ...



एक गीत सौ कहानियाँ # 17


फ़िल्म इंडस्ट्री एक ऐसी जगह है जहाँ किसी फ़िल्म के प्रदर्शित होने तक कोई १००% भरोसे के साथ यह नहीं कह सकता कि फ़िल्म चलेगी या नहीं, यहाँ तक कि फ़िल्म के गीतों की सफ़लता का भी पूर्व-अंदाज़ा लगाना कई बार मुश्किल हो जाता है। बहुत कम बजट पर बनी फ़िल्म और उसके गीत भी कई बार बहुत लोकप्रिय हो जाते हैं और कभी बहुत बड़ी बजट की फ़िल्म और उसके गीत-संगीत को जनता नकार देती है। मेहनत और लगन के साथ-साथ क़िस्मत भी बहुत मायने रखती है फ़िल्म उद्योग में। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था फ़िल्म 'सरगम' का संगीत। १९७९ में प्रदर्शित इस फ़िल्म का "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" गीत उस साल बिनाका गीतमाला में चोटी का गीत बना था। और इसी फ़िल्म के संगीत ने एल.पी को १९८० में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी दिलवाया। भले यह पुरस्कार उन्हें मिला पर स्तर की अगर बात करें तो इस फ़िल्म के गीत चल्ताऊ क़िस्म के ही थे। 'सरगम' की तुलना में इसी वर्ष पं रविशंकर के संगीत में फ़िल्म 'मीरा' के गीत या कानु राय के संगीत में फ़िल्म 'गृहप्रवेश' के गीत कई गुणा ज़्यादा उत्कृष्ट थे, पर यह भी एक विडम्बना ही है कि फ़िल्मफ़ेयर कमिटी ने बहुत कम बार के लिए ही गुणवत्ता को पैमाना समझा है। "डफ़ली वाले" गीत के लिए आनन्द बक्शी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार का नामांकन मिला था, पर यह पुरस्कार मिला था गुलज़ार को फ़िल्म 'गोलमाल' के "आने वाला पल जाने वाला है" गीत के लिए।

"डफ़ली वाले डफ़ली बजा" को जनता ने भी हाथों हाथ ग्रहण किया। पर मज़े की बात यह है कि शुरू-शुरू में फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक ने इस गीत को फ़िल्म में रखने से इंकार कर दिया था। इस बात पर अभी आते हैं, उससे पहले 'सरगम' के पार्श्व पर एक नज़र डालते हैं। 'सरगम' एन. एन. सिप्पी द्वारा निर्मित फ़िल्म थी। के. विश्वनाथ लिखित व निर्देशित यह फ़िल्म १९७६ की सुपरहिट तेलुगू फ़िल्म 'सिरि सिरि मुव्वा' की रीमेक थी। 'सरगम' ने अभिनेत्री जया प्रदा को स्टार बना दिया, इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का नामांकन भी मिला था, और इस फ़िल्म को १९७९ के बॉक्स ऑफ़िस में तीसरा स्थान मिला था। अब आते हैं "डफ़ली वाले" गीत पर। जब लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने इस गीत की धुन बनाई और आनन्द बक्शी ने बोल लिखे, और निर्माता-निर्देशक को सुनाया तो उन्हें बिल्कुल पसन्द नहीं आया। उन्हें बोल और संगीत दोनों ही बेकार लगे। "डफ़ली वाले डफ़ली बजा, मेरे घुंघरू बुलाते हैं, आ, मैं नाचूँ तू नचा", ये बोल बहुत ही सस्ते और चल्ताऊ किस्म के लगे। सच भी है, फ़िल्म के अन्य गीतों ("पर्बत के इस पार", "कोयल बोली दुनिया डोली", "मुझे मत रोको मुझे गाने दो", "रामजी की निकली सवारी", "हम तो चले परदेस", "कहाँ तेरा इंसाफ़") की तुलना में "डफ़ली वाले" के बोल कम स्तरीय थे। "डफ़ली वाले" गाना रद्द हो गया। फ़िल्म की शूटिंग् शुरू हुई; एक एक कर सारे गानें फ़िल्माए गए। पर लक्ष्मी-प्यारे को पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि "डफ़ली वाले" को पब्लिक स्वीकार करेगी और गाना हिट होगा, पर उनकी बात को कोई नहीं मान रहा था। पूरी फ़िल्म कम्प्लीट हो गई पर "डफ़ली वाले" की क़िस्मत नहीं चमकी। पर अन्त में एल.पी के लगातार अनुरोध करने पर निर्माता मान गए और "डफ़ली वाले" गीत की रेकॉर्डिंग् को अप्रूव कर दिया।

लता और रफ़ी की आवाज़ों में लक्ष्मी-प्यारे ने "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" को रेकॉर्ड तो कर लिया गया, पर अब अगली समस्या यह आन पड़ी की फ़िल्म में किसी और गीत की कोई गुंजाइश ही नहीं बची थी। ऐसी कोई सिचुएशन नहीं थी जिसमें "डफ़ली वाले" को फ़िट किया जाए। जिन लोगों ने यह फ़िल्म देखी है, उन्हें पता है कि "डफ़ली वाले" को फ़िल्म के बिल्कुल अन्त में, क्लाइमैक्स से पहले एक ऐसी जगह पर डाल दिया गया है, बल्कि यूं कहें कि ठूस दिया गया है, जहाँ पर गीत का कोई सिचुएशन ही नहीं था। मैंने जब यह फ़िल्म दूरदर्शन पर देखी थी, तब इस गीत को न पा कर शुरू शुरू में ऐसा लगा था जैसे दूरदर्शन वालों ने गीत को काट दिया है (ऐसा दूरदर्शन अक्सर करता था), पर मेरी यह धारणा ग़लत निकली और फ़िल्म के बिल्कुल अन्त में यह गीत सुनाई/दिखाई दिया। इस तरह से "डफ़ली वाले" को फ़िल्म में एन्ट्री तो मिल गई और गीत भी ख़ूब लोकप्रिय हुआ, पर एक अफ़सोस की बात यह रह गई कि फ़िल्म में इस गीत के लिए एक अच्छी सिचुएशन नहीं बन सकी। अगर निर्माता-निर्देशक शुरू में ही एल.पी की बात मान कर गीत को रख लेते तो शायद ऐसा नहीं होता। ख़ैर, अन्त भला तो सब भला।

ॠषी कपूर, डफ़ली और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की तिकड़ी का एक बार फिर साथ हुआ 'सरगम' के बनने के १० साल बाद। १९८९ में एक फ़िल्म बनी थी 'बड़े घर की बेटी', जिसमें "डफ़ली वाले" गीत जैसा एक गीत बनाने की कोशिशें हुई थी। आनन्द बक्शी की जगह आ गए संतोष आनन्द, जया प्रदा की जगह आ गईं मीनाक्षी शेशाद्री, तथा लता-रफ़ी के जगह आ गए अनुराधा पौडवाल और मोहम्मद अज़ीज़। और गीत बना "तेरी पायल बजी जहाँ मैं घायल हुआ वहाँ, तेरी डफ़ली बजी जहाँ मैं पागल हुई वहाँ"। यह गीत "डफ़ली वाले" की तरह ब्लॉकबस्टर तो नहीं हुआ, पर अच्छी ख़ासी लोकप्रियता ज़रूर हासिल की थी। यूं तो फ़िल्मी गीतों के फ़िल्मांकन में डफ़ली का प्रयोग काफ़ी बार हुआ है, पर गीत के बोलों में डफ़ली का इस्तमाल इन्हीं दो गीतों में सबसे ज़्यादा चर्चित हुआ है। चलते चलते यही कहेंगे कि "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" की सफलता से हमें ज़िन्दगी के लिए यही सबक मिलती है कि किसी को भी हमें अंडरेस्टिमेट नहीं करनी चाहिए, कब कौन बड़ा काम कर जाए कह नहीं सकते, किसी को भी कमज़ोर समझ कर उसका अपमान नहीं करना चाहिए; शुरू-शुरू में नकार दिया गया गीत "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" ही बना था फ़िल्म का सफ़लतम गीत।

"डफ़ली वाले" सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें।


तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। कैसा लगा ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में या आप मुझ तक पहुँच सकते हैं cine.paheli@yahoo.com के पते पर भी। इस स्तंभ के लिए अपनी राय, सुझाव, शिकायतें और फ़रमाइशें इसी ईमेल आइडी पर ज़रूर लिख भेजें। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

२५ अप्रैल- आज का गाना



गाना: सागर किनारे दिल ये पुकारे

चित्रपट: सागर
संगीतकार:राहुलदेव बर्मन
गीतकार:जावेद अख्तर
स्वर: किशोर कुमार, लता






सागर किनारे दिल ये पुकारे
तू जो नहीं तो मेरा कोई नहीं है
सागर किनारे   ...

जागे नज़ारे, जागी हवाएं
जब प्यार जागा, जागी फ़िज़ाएं
हो पल भर को दिल की दुनिया सोयी नहीं है
सागर किनारे   ...

लहरों पे नाचें, किरणों की परियाँ
मैं खोई जैसे, सागर में नदिया
हो तू ही अकेली तो खोई नहीं है
सागर किनारे   ...





मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

सब कुछ सीख कर भी अनाड़ी रही रंजना भाटिया

रंजना भाटिया जी .... जब मैंने ब्लॉग पढ़ना शुरू किया तो यह मेरी पहली पसंद बनीं. जो सोचता है ख़ास, लिखता है ख़ास तो उसकी पसंद के गीत....होंगे ही न ख़ास. उनके शब्दों से सुनिए -

नमस्ते रश्मि जी ...गाने सुनना तो बहुत पसंद है और उस में से पांच गाने चुनना बहुत मुश्किल काम है ...पर कोशिश करती हूँ ....

अजीब दास्तां है ये
कहाँ शुरू कहाँ खतम
ये मंज़िलें है कौन सी
न वो समझ सके न हम
अजीब दास्तां...
फ़िल्म - दिल अपना और प्रीत पराई
गायिका - लता मंगेशकर
पसंद है इस लिए क्यों कि इस गीत में ज़िन्दगी कि सच्चाई है, एक ऐसी दास्तान जो ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच ब्यान करती है ...और ज़िन्दगी गुजर जाती है समझते समझाते ...

सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी

दुनिया ने कितना समझाया
कौन है अपना कौन पराया
फिर भी दिल की चोट छुपा कर
हमने आपका दिल बहलाया
खुद पे मर मिटने की ये ज़िद थी हमारी...
सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी

सही में मैं अनाड़ी ही रही ..और दुनिया अपना काम कर गयी ..फिर भी आज तक कोई समझ नहीं पाया ...यह गाना खुद पर लिखा महसूस होता है इस लिए बहुत पसंद है

मेरा कुछ समान
तुम्हारे पास पड़ा है
हो सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे हैं
और मेरे एक ख़त में लिपटी रात पडी है
वोह रात बुझे दो मेरा वोह सामान लौटा दो

इस गाने के बोल सहज है और बहुत अपने से लगते हैं इस लिए पसंद है


तेरे मेरे सपने अब एक रंग है ..
तू जहाँ भी ले जाए  साथी हम संग है


 
यह भी बहुत पसंद है
तुम को देखा तो यह ख्याल आया ..ज़िन्दगी धूप तुम घना साया ....



पसंद बहुत है गाने ,,गाने ज़िन्दगी का अर्थ बन जाते हैं, ज़िन्दगी की बात बन जाते हैं इस लिए दिल में उतर जाते हैं ...कोई गीत क्यों कितना पसंद है यह वक़्त पर तय है पर कई गाने जब भी सुने जाए तो वह पाने दिल की बात कहते लगे यह चुने गए गीत उन्ही गीतों में से कुछ है ...शुक्रिया
कुछ रंजना जी की कलम से
अमृता प्रीतम को याद करती रंजन भाटिया  

२४ अप्रैल- आज का गाना



गाना: जलता है बदन

चित्रपट: रज़िया सुल्तान
संगीतकार:खैय्याम

स्वर: 
लता





जलता है बदन
हो ... हाय! जलता है बदन
प्यास भड़की है
प्यास भड़की है सरे शाम से जलता है बदन \- २
इश्क़ से कह दो कि ले आए कहीं से सावन
प्यास भड़की है सरे शाम से जलता है बदन
जलता है बदन \- २

जाने कब रात ढले, सुबह तक कौन जले
दौर पर दौर चले, आओ लग जाओ गले
आओ लग जाओ गले कम हो सीने की जलन
प्यास भड़की है सरे शाम से जलता है बदन
जलता है बदन \- ३
ओ आह! जलता है बदन

देख जल जाएंगे हम, इस तबस्सुम की कसम
अब निकल जायेगा दम, तेरे बाहों में सनम
दिल पे रख हाथ कि थम जाये दिल की धड़कन
प्यास भड़की है सरे शाम से जलता है बदन
जलता है बदन
इश्क़ से कह दो के ले आये कहीं से सावन
प्यास भड़की है सरे शाम से जलता है बदन
जलता है बदन \- २
ओ ... हाय जलता है बदन
जलता है बदन ...





सोमवार, 23 अप्रैल 2012

सिने-पहेली # 17 (जीतिये 5000 रुपये के इनाम)


सिने-पहेली # 17 (23 अप्रैल, 2012) 



नमस्कार दोस्तों, 'सिने पहेली' की १७-वीं कड़ी में मैं, सुजॉय चटर्जी, आप सभी का फिर एक बार स्वागत करता हूँ। दोस्तों, 'सिने पहेली' में इस सप्ताह हमारे साथ तीन प्रतियोगी और जुड़े हैं, इनमें एक हैं नई दिल्ली से शुभ्रा शर्मा (जो आकाशवाणी की जानी-मानी समाचारवाचिका भी हैं), दूसरी हैं दुबई से कृतिका, और तीसरी हैं पटना की राजेश प्रिया। आप तीनों का 'सिने पहेली' में बहुत-बहुत स्वागत है और आपसे अनुरोध करते हैं कि आगे भी नियमित रूप से 'सिने पहेली' में भाग लेते रहिएगा और कोशिश कीजिएगा कि 'सिने पहेली' के महाविजेता बन कर 5000 रुपये का इनाम अपने नाम कर लें। आपके लिए और अन्य सभी नए प्रतियोगियों के लिए 'सिने पहेली' महाविजेता बनने के नियम दोहरा देते हैं। हमने इस प्रतियोगिता को दस-दस कड़ियों के सेगमेण्ट्स में विभाजित किया है (वर्तमान में दूसरा सेगमेण्ट चल रहा है)। इस तरह से १००-वें अंक तक १० सेगमेण्ट्स हो जाएँगे, और हर सेगमेण्ट का एक विजेता घोषित होगा (पहले सेगमेण्ट के विजेता रहे प्रकाश गोविंद)। इस तरह से १० सेगमेण्ट्स के बाद जो सर्वाधिक सेगमेण्ट विजेता होगा, उन्हीं को हम 'सिने पहेली महाविजेता' का पुरस्कार प्रदान करेंगे।

चलिए अब शुरु किया जाए आज की 'सिने पहेली - 17' के सवालों का सिलसिला...

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सवाल-1: बूझो तो जाने


इस श्रेणी में हम आपको कुछ शब्द देंगे जिनका इस्तमाल कर आपको किसी हिन्दी फ़िल्मी गीत का मुखड़ा बनाना है। यानी कि हम आपको किसी गीत के मुखड़े के कुछ महत्वपूर्ण शब्दों को आगे-पीछे करके देंगे, आपको सही मुखड़ा पहचानना है। तो ये रहे आज के गीत के कुछ शब्द; ध्यान से पढ़िए और इन शब्दों को उचित स्थानों पे बिठाकर बताइए कि यह कौन सा गीत है।

सनम, आवाज़, बिन, दिल, सकेंगे, तेरे, जी

सूत्र: इस गीत की गायिका हैं आशा भोसले


सवाल-2: पहचान कौन!


नीचे दिया गया चित्र एक फ़िल्म का पोस्टर है। क्या कलाकारों को देख कर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं फ़िल्म के नाम का?



सवाल-3: सुनिये तो...


'सुनिये तो...' में आज आपको सुनवा रहे हैं एक गीत का अंतरा। इसमें लता मंगेशकर की आवाज़ को आप पहचान ही लेंगे। पर क्या आप पुरुष स्वर को पहचान पाए हैं?



सवाल-4: कौन हूँ मैं?


मैं एक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक रहा हूँ। मेरा जन्म १९०९ में एक ज़मीनदार परिवार में हुआ था। मैंने अपना फ़िल्मी करीयर न्यू थिएटर्स में एक कैमरा ऐसिस्टैण्ट के रूप में शुरू किया था। इसी दौरान पी. सी. बरुआ की महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'देवदास' में मैंने बरुआ के सहायक के रूप में काम किया था। मेरी पहली निर्देशित की हुई फ़िल्म थी १९४४ की एक बंगला फ़िल्म जिसका १९४५ में हिंदी वर्ज़न बना था। मैं १९५२-५३ में बम्बई स्थानान्तरित होकर अपनी निजी फ़िल्म प्रोडक्शन कंपनी खोली, और इस बैनर तले जिस प्रथम फ़िल्म का निर्माण हुआ उस फ़िल्म को आज भारतीय सिनेमा की एक मीलस्तंभ फ़िल्म मानी जाती है, बल्कि भारतीय सिनेमा के १० सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में गिना जाता है। शुरू-शुरू में मैं उपदेशात्मक सामाजिक फ़िल्में बनाता था, इसलिए १९५८ में जब मैंने पुनर्जनम की कहानी पर एक फ़िल्म बनाई तो मेरी कुछ लोगों ने समालोचना भी की। ५६ वर्ष की आयु में कर्कट रोग से मेरी मृत्यु हुई। मेरी बेटी रिंकी भट्टाचार्य ने मेरी जीवनी प्रकाशित की है। तो फिर बताइए कौन हूँ मैं?


सवाल-5: गीत अपना धुन पराई


और अब पाँचवा और आख़िरी सवाल। सुनिए इस विदेशी धुन को और पहचानिए वह हिन्दी फ़िल्मी गीत जो इस धुन से प्रेरित है। बहुत आसान है इस बार।



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तो दोस्तों, हमने पूछ लिए हैं आज के पाँचों सवाल, और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. अगर आपको सभी पाँच सवालों के जवाब मालूम है, फिर तो बहुत अच्छी बात है, पर सभी जवाब अगर मालूम न भी हों, तो भी आप भाग ले सकते हैं, और जितने भी जवाब आप जानते हों, वो हमें लिख भेज सकते हैं।

२. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

३. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 17" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम, स्थान और पेशा लिखें।

४. आपका ईमेल हमें शुक्रवार 27 अप्रैल  तक मिल जाने चाहिए।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और पचासवे अंक के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा।

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और अब 20 अप्रैल को पूछे गए 'सिने-पहेली # 16' के सवालों के सही जवाब---

1. पहले सवाल का गीत है फ़िल्म 'सरस्वतीचन्द्र' का "फूल तुम्हे भेजा ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है"।

2. 'चित्र-पहेली' में गायिका सुषमा श्रेष्ठ के साथ नज़र आ रहे हैं उन्हीं के पिता व संगीतकार भोला श्रेष्ठ।

3. इस प्रश्न का सही जवाब है फ़िल्म 'दिल तो पागल है'।

4. 'कौन हूँ मैं' का सही जवाब है अभिनेत्री मधुबाला।

5. 'गीत अपना धुन पराई' में जो विदेशी गीत सुनवाया था, उससे प्रेरित हिन्दी गीत है फ़िल्म 'छलिया' का "बाजे पायल छुन छुन होके बेकरार"।


और अब 'सिने पहेली # 16' के विजेताओं के नाम ये रहे -----

1. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 5 अंक

2. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 5 अंक

3. कृतिका, दुबई --- 4 अंक

4. अमित चावला, दिल्ली --- 4 अंक

5. रीतेश खरे, मुंबई --- 4 अंक

6. शुभ्रा शर्मा, नई दिल्ली --- 3 अंक



सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। अब जबकि 'सिने पहेली' के दूसरे सेगमेण्ट के १० में से ६ अंकों के परिणाम सामने आ गए हैं, तो क्यों न एक नज़र डाली जाए अब तक के सम्मिलित स्कोर पर। शीर्ष के पाँच प्रतियोगियों के स्कोर ये रहे...

1. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 30 अंक (100%)

2. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 27 अंक (90%)

' 3. रीतेश खरे, मुंबई --- 25 अंक (83%)

4. क्षिति तिवारी, इंदौर --- 24 अंक (80%)

5. अमित चावला, दिल्ली --- 23 अंक (77%)


इसका मतलब यह हुआ कि पहले सेगमेण्ट की तरह दूसरे सेगमेण्ट में भी प्रकाश गोविंद अब तक सबसे उपर चल रहे हैं। क्षिति तिवारी भी पिछले एपिसोड तक उनसे केवल १ अंक पीछे चल रही थीं, पर एपिसोड-१६ में भाग न लेने की वजह से वो काफ़ी पीछे रह गई हैं। तो अब यह देखना है कि क्या अगले चार एपिसोड्स (१७ से २०) में पंकज मुकेश प्रकाश गोविंद को मात दे पाते हैं या नहीं। हम तो यही उम्मीद करते हैं कि मुकाबला और भी ज़्यादा रोचक हो। हम फिर एक बार उन साथियों से, जिन्होंने अभी तक इस प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया है, अनुरोध करते हैं कि 'सिने पहेली' के सवालों के जवाब भेज कर इस जंग में शामिल जायें, और 5000 रुपये का इनाम अपने नाम कर लें। क्यों किसी और को देना है 5000 रुपये जब आप में काबलीयत है इसे जीतने की? आज बस इतना ही, अगले सप्ताह आपसे इसी स्तंभ में दोबारा मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

२३ अप्रैल- आज का गाना



गाना: तुम मुझे यूँ, भुला ना पाओगे

चित्रपट: पगला कहीं का
संगीतकार:शंकर - जयकिशन
गीतकार:हसरत जयपुरी
स्वर: रफ़ी






तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

(वो बहारें वो चांदनी रातें
हमने की थी जो प्यार की बातें ) \- २
उन नज़ारों की याद आएगी
जब खयालों में मुझको लाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

(मेरे हाथों में तेरा चेहरा था
जैसे कोई गुलाब होता है ) \- २
और सहारा लिया था बाहों का
वो शाम किस तरह भुलाओगे
हाँ तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूँ ...

(मुझको देखे बिना क़रार ना था
एक ऐसा भी दौर गुज़रा है ) \- २
झूठ मानूँ तो पूछलो दिल से
मैं कहूंगा तो रूठ जाओगे
हाँ तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे

जब कभी भी ...




रविवार, 22 अप्रैल 2012

हिन्दी फिल्मी गीतों में रवीद्र संगीत - एक शोध

स्वरगोष्ठी – ६७ में आज
रवीन्द्र-सार्द्धशती वर्ष में विशेष

‘पुरानो शेइ दिनेर कथा...’


हाँ एक ओर फ़िल्म-संगीत का अपना अलग अस्तित्व है, वहीं दूसरी ओर फ़िल्म-संगीत अन्य कई तरह के संगीत पर भी आधारित रही है। शास्त्रीय, लोक और पाश्चात्य संगीत का प्रभाव फ़िल्म-संगीत पर हमेशा रहा है और आज भी है। उधर बंगाल की संस्कृति में रवीन्द्र संगीत एक मुख्य धारा है, जिसके बिना बांग्ला संगीत, नृत्य और साहित्य अधूरा है। समय-समय पर हिन्दी सिने-संगीत-जगत के कलाकारों ने रवीन्द्र-संगीत को भी फ़िल्मी गीतों का आधार बनाया है। इस वर्ष पूरे देश मेँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की १५०वीं जयन्ती मनायी जा रही है। इस उपलक्ष्य मेँ हम भी उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।

‘स्वरगोष्ठी’ के सभी संगीत रसिकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! इस स्तम्भ के वाहक कृष्णमोहन जी की पारिवारिक व्यस्तता के कारण आज का यह अंक मैं सुजॉय चटर्जी प्रस्तुत कर रहा हूँ। कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लिखे गीतों का, जिन्हें हम "रवीन्द्र-संगीत" के नाम से जानते हैं, बंगाल के साहित्य, कला और संगीत पर जो प्रभाव पड़ा है, वैसा प्रभाव शायद शेक्सपीयर का अंग्रेज़ी जगत में भी नहीं पड़ा होगा। ऐसा कहा जाता है कि टैगोर के गीत दरअसल बंगाल के ५०० वर्ष के साहित्यिक और सांस्कृतिक मंथन का निचोड़ है। धनगोपाल मुखर्जी ने अपनी किताब 'Caste and Outcaste' में लिखा है कि रवीन्द्र-संगीत मानव-मन के हर भाव को प्रकट करने में सक्षम हैं। कविगुरु में छोटे से बड़ा, गरीब से धनी, हर किसी के मनोभाव को, हर किसी की जीवन-शैली को आवाज़ प्रदान की है। गंगा में विचरण करते गरीब से गरीब नाविक से लेकर अर्थवान ज़मिंदारों तक, हर किसी को जगह मिली है रवीन्द्र-संगीत में। समय के साथ-साथ रवीन्द्र-संगीत एक म्युज़िक स्कूल के रूप में उभरकर सामने आता है। रवीन्द्र-संगीत को एक तरह से हम उपशास्त्रीय संगीत की श्रेणी में डाल सकते हैं। अपने लिखे गीतों को स्वरबद्ध करते समय कविगुरु ने शास्त्रीय संगीत, बांग्ला लोक-संगीत और कभी-कभी तो पाश्चात्य संगीत का भी सहारा लिया है।

पंकज मलिक 
रवीन्द्र-संगीत पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित "विश्वभारती विश्वविद्यालय" का नियंत्रण था। इस विश्वविद्यालय की अनुमति के बिना कोई रवीन्द्र-संगीत का गायन अथवा अन्य रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता था। फ़िल्मों में रवीन्द्र-संगीत की धारा को लाने में पहला क़दम उठाया था संगीतकार-गायक पंकज मल्लिक ने। १९३७ की फ़िल्म 'मुक्ति' के बांग्ला संस्करण में मल्लिक बाबू नें कविगुरु की रचनाओं का बृहद्‍ स्तर पर इस्तेमाल किया। अधिकांश धुनें कविगुरु की थीं, पर सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "दिनेर शेषे घूमेर देशे..." की धुन मल्लिक बाबू नें ख़ुद बनाई थी। इस फ़िल्म के बाद भी पंकज मल्लिक रवीन्द्र-संगीत का इस्तेमाल व्यापक रूप से करते रहे और कविगुरु की रचनाओं को बंगाल के बाहर पहुँचाया। 'मुक्ति' के हिन्दी संस्करण में कानन देवी के स्वर में "साँवरिया मन भाया रे..." गीत रवीन्द्र-संगीत की छाया लिए हुए था जो न केवल बहुत लोकप्रिय हुआ बल्कि कानन देवी के गाये अति लोकप्रिय गीतों में से एक है। १९४८ की फ़िल्म 'अंजानगढ़' में पंकज मल्लिक और उत्पला सेन का गाया एक गीत था "संसार के आधार पर दया हम पे दिखाओ..." जो रवीन्द्रनाथ रचित "सर्बा खर्बा तार दाहे..." गीत पर आधारित था। यूँ तो इस फ़िल्म के संगीतकार थे रायचन्द बोराल, पर इस गीत का संगीत-संयोजन पंकज मल्लिक ने किया था। फ़िल्म के बांग्ला संस्करण में इस गीत को हेमन्त मुखर्जी और उत्पला सेन नें गाया है। रायचन्द बोराल ने १९४५ की फ़िल्म 'हमराही' (जो विमल राय निर्देशित प्रथम हिन्दी फ़िल्म थी) में रवीन्द्रनाथ रचित " मधुगन्धे भरा मधु स्निग्ध छाया..." को उसके मूल बांग्ला रूप में प्रस्तुत कर सुनने वालों को चमत्कृत कर दिया था।

फिल्म – हमराही : "मधुगन्धे भरा मधु स्निग्ध छाया..." : स्वर - हेमन्त मुखर्जी, बिनोता राय


अनिल विश्वास
न्यू थिएटर्स के संगीतकार पंकज मल्लिक और रायचन्द बोराल की जब बात चल ही रही है, तो वहाँ के तीसरे संगीतकार अर्थात्‍ तिमिर बरन का उल्लेख भी आवश्यक हो जाता है। पंकज बाबू की तरह तिमिर बरन ने संगीत का प्रयोग ज़्यादा तो नहीं किया पर १९५४ की 'बादबान' (एस.के. पाल के साथ) फ़िल्म में "कैसे कोई जिए, ज़हर है ज़िन्दगी आया तूफ़ान" (हेमन्त कुमार-गीता दत्त) को रवीन्द्र-संगीत ("तारे ना जानी...") पर आधारित कर ऐसा कम्पोज़ किया कि जिसे ख़ूब सराहना मिली। रबीन्द्र-संगीत का इस्तेमाल करने वाले न्यू थिएटर्स के बाहर के संगीतकारों में पहला नाम है अनिल बिस्वास का। बिस्वास ने मूल गीत के शब्दों को नहीं, बल्कि उनकी धुनों का प्रयोग किया। और उनके बाद भी तमाम संगीतकारों ने केवल रबीन्द्र-संगीत के धुनों का ही सहारा लिया। उपर्युक्त "मधुगंधे भरा..." गीत की धुन का प्रयोग अनिल बिस्वास ने अपनी १९६० की फ़िल्म 'अंगुलिमाल' में किया था, मीना कपूर और साथियों के गाये "मेरे चंचल नैना मधुरस के भरे..." गीत में। अनिल बिस्वास द्वारा स्वरबद्ध रवीन्द्र-संगीत पर आधारित सबसे लोकप्रिय रचना है, १९५४ की फ़िल्म 'वारिस' का "राही मतवाले, तू छेड़ एक बार मन का सितार..." गीत। तलत महमूद और सुरैया की आवाज़ों में यह गीत बहुत ज़्यादा लोकप्रिय तो हुआ पर बंगाल के बाहर जनसाधारण को यह पता भी नहीं चला कि दरसल इस गीत की धुन कविगुरु रचित "ओ रे गृहबाशी..." पर आधारित थी जो एक होली गीत है। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कविगुरु होली के त्योहार को एक विशेष उत्सव की तरह गीत-संगीत-नृत्य के माध्यमों से मनाते थे और आज भी यह परम्परा विश्वभारती में कायम है।

रवीन्द्र-गीत : "ओ रे गृहबाशी..." : स्वर – श्रावणी सेन



संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने रवीन्द्र-संगीत का हू-ब-हू प्रयोग ज़्यादा गीतों में नहीं किया। यह ज़रूर है कि उनके द्वारा स्वरबद्ध कई गीतों में रवीन्द्र-संगीत की छाया मिलती है। रवीन्द्र-संगीत पर आधारित दादा बर्मन का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है १९७३ की फ़िल्म 'अभिमान' का "तेरे मेरे मिलन की यह रैना..." जो रवीन्द्रनाथ रचित "जोदी तारे नाइ चिनी गो..." गीत पर आधारित है। इसे सुनिए और याद कीजिए "तेरे मेरे मिलन की यह रैना..." गीत को।

रवीन्द्र-गीत : "जोदी तारे नाइ चिनी गो..." : स्वर – राघव चट्टोपाध्याय



१९५० की देव आनन्द-सुरैया अभिनीत फ़िल्म 'अफ़सर' में सुरैया का गाया लोकप्रिय गीत "नैन दीवाने एक नहीं माने..." भी एक रवीन्द्र-रचना "शेदिन दुजोने दुलेछिलो बोने..." पर आधारित है। रवीन्द्र-संगीत की छाया लिये दादा बर्मन द्वारा स्वरबद्ध कुछ और गीत हैं "जायें तो जायें कहाँ..." (टैक्सी ड्राइवर), "मेरा सुन्दर सपना बीत गया..." (दो भाई), "मेघा छाये आधी रात..." (शर्मीली)। सचिन दा के बेटे राहुलदेव बर्मन ने बंगाल और नेपाल के लोक-संगीत का ख़ूब प्रयोग किया है, अपने गीतों में, पर एक-आध बार रवीन्द्र-संगीत की तरफ़ भी झुके हैं। फ़िल्म 'जुर्माना' में लता के गाये "छोटी सी एक कली खिली थी एक दिन बाग़ में..." गीत के लिए पंचम ने जिस रवीन्द्र-रचना को आधार बनाया, उसके बोल हैं "बसन्ते फूल गान्थलो आमार जयेर माला..."। इस मूल रवीन्द्र-रचना को १९४४ की बांग्ला फ़िल्म 'उदयेर पथे' में शामिल किया गया था। 'उदयेर पथे' दरसल बांग्ला-हिन्दी द्विभाषी फ़िल्म थी, जिसका हिन्दी में 'हमराही' के नाम से निर्माण हुआ था। इस फ़िल्म के एक गीत की चर्चा हम उपर कर चुके हैं।

राहुलदेव बर्मन ने १९८२ की फ़िल्म 'शौकीन' में आशा-किशोर से "जब भी कोई कंगना बोले..." गीत गवाया था जो रवीन्द्रनाथ रचित "ग्राम छाड़ा ओइ रांगा माटीर पथ..." की धुन पर आधारित था। '१९४२ ए लव स्टोरी' में कविता कृष्णमूर्ति का गाया "क्यों नए लग रहे हैं ये धरती गगन..." को भी रवीन्द्र-संगीत से प्रेरित पंचम ने ही एक साक्षात्कार में बताया था पर मूल रवीन्द्र-रचना की पहचान नहीं हो पायी है। इसी अंश का प्रयोग पंचम ने बरसों पहले 'हीरा-पन्ना' के शीर्षक गीत "पन्ना की तमन्ना..." के अन्तरे की पंक्ति "हीरा तो पहले ही किसी और का हो गया..." में किया था।

हेमन्त कुमार 
हेमन्त कुमार की आवाज़ में एक अत्यन्त लोकप्रिय रवीन्द्र-रचना है "मोन मोर मेघेरो शोंगी उड़े चोले दिग दिगन्तेरो पाने..."। हेमन्त कुमार ने ही इस गीत की धुन पर १९६४ की हिन्दी फ़िल्म 'माँ बेटा' में एक गीत कम्पोज़ किया था "मन मेरा उड़ता जाए बादल के संग दूर गगन में, आज नशे में गाता गीत मिलन के रे, रिमझिम रिमझिम रिमझिम..."। लता मंगेशकर का गाया यह गीत ज़्यादा सुनाई तो नहीं दिया पर इसे सुनने का अनुभव एक बहुत ही सुकूनदायक अनुभव है। इस गीत के फ़िल्मांकन में निरुपा रॉय सितार हाथ में लिए गीत गाती हैं और एक नर्तकी इस पर नृत्य कर रही हैं। इस बात का उल्लेख हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस नृत्य शैली को "रबीन्द्र-नृत्य" के नाम से जाना जाता है।

रवीन्द्र-गीत : "मोन मोर मेघेरो शोंगी..." : स्वर – हेमन्त मुखोपाध्याय


फिल्म – माँ बेटा : "मन मेरा उड़ता जाये...” : स्वर – लता मंगेशकर



बंगाल से ताल्लुक रखने वाले संगीतकारों में एक नाम बप्पी लाहिड़ी का भी है। यूँ तो बप्पी दा 'डिस्को किंग' के नाम से जाने जाते हैं, पर उन्होंने भी कई शास्त्रीय और लोक संगीत पर आधारित गीत रचे हैं। रवीन्द्र-संगीत का प्रयोग उन्होंने कम से कम दो बार किया है। १९८५ की फ़िल्म 'झूठी' में उन्होंने "चन्दा देखे चन्दा तो वो चन्दा शर्माये..." को उसी "जोदी तारे नाइ गो चीनी..." पर आधारित किया जिस पर सचिन दा ने "तेरे मेरे मिलन की यह रैना..." को कम्पोज़ किया था। दोनों ही गीत लता-किशोर के गाए हुए हैं, और दोनों ही फ़िल्मों के निर्देशक हैं ऋषिकेश मुखर्जी। क्या पता वो 'झूठी' के गीत में 'अभिमान' के उस गीत को पुनर्जीवित करना चाहते होंगे! १९८४ की फ़िल्म 'हम रहे न हम' में बप्पी दा ने एक अत्यन्त लोकप्रिय रवीन्द्र-रचना "पुरानो शेइ दिनेर कथा भूलबो की रे..." के शुरुआती अंश का प्रयोग कर एक सुन्दर गीत कम्पोज़ किया "रोशन रोशन रातें अपनी, दिन भी रोशन, जब से जीवन में तुम आये, तब से ऐसा जीवन..."। आशा-किशोर की युगल आवाज़ों में यह गीत था। वैसे यह भी एक रोचक तथ्य है कि मूल रवीन्द्रनाथ रचित "पुरानो शेइ दिनेर कथा..." की संगीत-रचना स्कॉटलैण्ड की एक धुन ‘Auld Lang Syne’ से मिलती-जुलती है। यह शोध का विषय होगा कि इन दोनों में से किस रचना ने पहले जन्म लिया।

मूल स्कॉटीश गीत : ‘Auld Lang Syne’



रबीन्द्रनाथ रचित "पुरानो शेइ दिनेर कथा" –



फ़िल्म - हम रहे न हम : "रोशन रोशन रातें अपनी...” : संगीत - बप्पी लाहिड़ी



बप्पी लाहिड़ी के संगीत में १९८६ की फ़िल्म 'अधिकार' में किशोर कुमार का गाया "मैं दिल तू धड़कन, तुझसे मेरा जीवन..." गीत भी रवीन्द्र-संगीत शैली में ही स्वरबद्ध एक रचना थी। दोस्तों, अब तक हिन्दी फ़िल्म-संगीत में रवीन्द्र-संगीत के प्रयोग की जितनी चर्चा हमने की है, उसमें जितने भी संगीतकारों का नाम आया है, वो सब बंगाल से ताल्लुक रखने वाले थे। बंगाल के बाहर केवल राजेश रोशन ही एक ऐसे संगीतकार हुए जिन्होंने रवीन्द्र-संगीत का प्रयोग कई बार अपने गीतों में किया। वैसे राजेश रोशन का बंगाल से रिश्ता तो ज़रूर है। उनकी माँ इरा रोशन बंगाली थीं। १९८१ की फ़िल्म 'याराना' में राजेश रोशन द्वारा स्वरबद्ध गीत "छू कर मेरे मन को, किया तूने क्या इशारा..." का मुखड़ा रवीन्द्रनाथ रचित "तोमार होलो शुरू, आमार होलो शाड़ा..." से प्रेरित था। यूँ तो इस रवीन्द्र-रचना को कई गायकों ने गाया, पर किशोर कुमार का गाया संस्करण सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था, और राजेश रोशन ने भी अपने गीत को किशोर दा से ही गवाया। भले राजेश रोशन ने केवल मुखड़े की धुन को ही प्रयोग किया था, पर कलकत्ते की जनता को क्रोधित करने में यही काफ़ी था। दरअसल राजेश रोशन ने इस धुन के इस्तेमाल के लिए विश्वभारती से अनुमति नहीं ली थी, जिस वजह से बंगाल में यह हंगामा हुआ। पर बंगाल के बाहर इस गीत ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि राजेश रोशन को कोई फ़र्क नहीं पड़ा। इतना ही नहीं, उन्होंने १९८४ की फ़िल्म 'इन्तहा' में फिर एक बार इसी धुन की छाया तले कम्पोज़ किया एक और गीत "तू ही मेरा सपना, तू ही मेरी मंज़िल...", और इसे भी किशोर कुमार से ही गवाया। १९९७ की फ़िल्म 'युगपुरूष' में राजेश रोशन ने दो गीतों में रवीन्द्र-संगीत की छटा बिखेरी। इनमें एक था आशा भोसले का गाया "कोई जैसे मेरे दिल का दर खटकाए..." (मूल रवीन्द्र रचना - "तुमि केमोन कोरे गान कोरो हे गुणी...") और दूसरा गीत था प्रीति उत्तम का गाया "बन्धन खुला पंछी उड़ा..." (मूल रवीन्द्र-रचना - "पागला हावा बादल दिने पागोल आमार मोन नेचे ओठे...")। "पगला हावार..." एक अत्यन्त लोकप्रिय रवीन्द्र-रचना है और बंगाल के बहुत सारे कलाकारों ने समय-समय पर इसे गाया है।

रवीन्द्र संगीत : "पागला हावार बादल दिने..." : स्वर - किशोर कुमार



फिल्म – युगपुरुष : "बन्धन खुला पंछी उड़ा..." : स्वर – प्रीति उत्तम


कहते हैं कि नौशाद द्वारा स्वरबद्ध लता-शमशाद का गाया "बचपन के दिन भुला न देना..." भी किसी रवीन्द्र-संगीत से प्रेरित है, ऐसा विश्वभारती का दावा है, पर वह कौन सा गीत है इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है। ऐसे कई गानें हैं जिन्हें रवीन्द्र-संगीत शैली में कम्पोज़ किया गया है, पर सही-सही कहा नहीं जा सकता कि मूल रचना कौन सी है। फ़िल्म 'सुजाता' का "जलते हैं जिसके लिए, मेरी आँखों के दिये..." को भी रवीन्द्र-संगीत पर आधारित होने का दावा विश्वभारती ने किया है। इस तरह से हमने देखा कि हिन्दी फ़िल्मी गीतों में रवीन्द्र-संगीत की महक हमें कई बार मिली हैं। इसके लिए हिन्दी के संगीतकारों को श्रेय तो नहीं मिला, पर इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि जब-जब रवीन्द्र-संगीत हिन्दी फ़िल्मी गीतों में सुनाई दिया है, वो सभी गीत बेहद मधुर व कर्णप्रिय बने हैं। रवीन्द्र-संगीत इस देश की अनमोल धरोहर है जिसे हमें सहेज कर रखना है। जिन-जिन संगीतकारों ने रवीन्द्र-संगीत का प्रयोग अपने गीतों में किया है, और इस तरह से इसे बंगाल के बाहर पहुँचाने में योगदान दिया है, उन्हें हमारा सलाम।

आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, १९५९ की एक हिन्दी फिल्म के गीत का अंश। इस अंश को सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ७०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी दूसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।


१ – यह गीत किस राग पर आधारित है? आपको राग का नाम बताना है।

२ – गीत का ताल पहचानिए और हमें ताल का नाम भी बताइए।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६९वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ६५वें अंक में हमने आपको १९६६ मेँ प्रदर्शित फिल्म ‘साज और आवाज़’ के एक गीत का अंश सुनवाकर दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारवा और दूसरे का उत्तर है- संगीतकार नौशाद। इस बार दोनों प्रश्नों के सही उत्तर हमारे तीन नियमित पाठकों- पटना की अर्चना टण्डन, इंदौर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर (उ.प्र.) के डा. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। इनके अलावा हमारे एक और नियमित पाठक बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने संगीतकार को तो सही पहचाना किन्तु राग पहचानने में भूल कर दी। इन सभी प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर हार्दिक बधाई। इनके साथ ही उन सभी संगीत-प्रेमियों का हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक को पसन्द किया।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, आगामी १ मई को हिन्दी, बांग्ला सहित अनेक भारतीय भाषाओं और बोलियों के पार्श्वगायक मन्ना डे का ९४वाँ जन्मदिवस है। उन्होने हिन्दी फिल्मों में सर्वाधिक राग-आधारित गीत गाये हैं। उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आगामी रविवार की सुबह ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे और मन्ना डे के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

सुजॉय चटर्जी

२२ अप्रैल- आज का गाना



गाना: मत मारो शाम पिचकारी

चित्रपट: दुर्गेश नन्दिनी
संगीतकार:हेमंत कुमार
गीतकार:राजिंदर कृष्ण
स्वर: लता






मत मारो शाम पिचकारी
मोरी भीगी चुनरिया सारी रे...

नाजुक तन मोरा रंग न डारो शामा
अंग-अंग मोर फड़के
रंग पड़े जो मोरे गोरे बदन पर
रूप की ज्वाला भड़के
कित जाऊँ मैं लाज की मारी रे
मत मारो शाम...

काह करूँ कान्हा, रूप है बैरी मेरा
रंग पड़े छिल जाये
देखे यह जग मोहे, तिरछी नजरिया से
मोरा जिया घबराये
कित जाऊँ मैं लाज की मारी रे
मत मारो शाम...




शनिवार, 21 अप्रैल 2012

२१ अप्रैल- आज का गाना



गाना: कभी न कभी कहीं न कहीं कोई न कोई तो आयेगा

चित्रपट: शराबी
संगीतकार:मदन मोहन
गीतकार:राजिंदर कृष्ण
स्वर: रफ़ी




कभी न कभी कहीं न कहीं कोई न कोई तो आयेगा
अपना मुझे बनायेगा दिल में मुझे बसायेगा

कब से तन्हा ढूँढ राहा हूँ दुनियाँ के वीराने में
खाली जाम लिये बैठा हूँ कब से इस मैखाने में
कोई तो होगा मेरा साक़ी कोई तो प्यास बुझायेगा
कभी न कभी ...

किसी ने मेरा दिल न देखा न दिल का पैग़ाम सुना
मुझको बस आवारा समझा जिस ने मेरा नाम सुना
अब तक तो सब ने ठुकराया कोई तो पास बिठायेगा
कभी न कभी ...

कभी तो देगा सन्नाटे में प्यार भरी आवाज़ कोई
कौन ये जाने कब मिल जाये रस्ते में हम्राज़ कोई
मेरे दिल का दर्द समझ कर दो आँसु तो बहायेगा
कभी न कभी ...



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