Wednesday, February 29, 2012

"नादान परिन्दे घर आजा" - अर्थपूर्ण गीत आज भी बनते हैं फ़िल्मों के लिए

२०१२ के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का ख़िताब दिया गया है इरशाद कामिल को फ़िल्म 'रॉकस्टार' के गीत "नादान परिन्दे" के लिए। साथ ही सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का ख़िताब दिया गया है ए. आर. रहमान को इसी फ़िल्म के लिए। आइए आज करें इसी गीत की चर्चा 'एक गीत सौ कहानियाँ' की नौवीं कड़ी में, सुजॉय चटर्जी के साथ...


एक गीत सौ कहानियाँ # 9


अक्सर हम लोगों को यह चर्चा करते हुए पाते हैं कि पहले की तुलना में फ़िल्मी गीतों का स्तर गिर गया है, अब वह बात नहीं रही फ़िल्मी गीत-संगीत में। काफ़ी हद तक यह बात सच भी है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इसमें केवल कलाकारों का दोष नहीं। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत समाज का ही आइना होता है, जो समय चल रहा है, जो दौर जारी है, समाज की जो रुचि है, वही सब कुछ फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों में नज़र आते हैं। और यह भी उतना ही सच है कि अगर कलाकार चाहे तो तमाम पाबन्दियों, तमाम दायरों में बंधकर भी अच्छा काम किया जा सकता है। ख़ास तौर से गीतकारों की बात करें तो गुलज़ार और जावेद अख़्तर जैसे गीतकार आज भी कामयाबी के शिखर पर हैं अपने ऊँचे स्तर को गिराये बग़ैर। नई पीढ़ी के गीतकारों में एक चमकता नाम है इरशाद कामिल का जिन्हें इस साल सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से नवाज़ा गया है फ़िल्म 'रॉकस्टार' के "नादान परिन्दे" गीत के लिए। "नादान परिन्दे, घर आजा। क्यों देस-बिदेस फिरे मारा? क्यों हाल-बेहाल, थका-हारा? सौ दर्द बदन पे फैले हैं, हर करम के कपड़े मैले हैं। काटे चाहे जितना परों से हवा को, ख़ुद से ना बच पाएगा तू.... कोई भी ले ले रस्ता, तू है बेबस्ता, अपने ही घर आएगा तू"। परिन्दों की आड़ लेकर इरशाद कामिल ने इस गीत में अपने घरों से दूर जा बसने वालों की तरफ़ इशारा करते हुए यह समझाने की कोशिश की है कि लाख लुभाये महल पराये, अपना घर फिर अपना घर है।

इस गीत में मीराबाई लिखित दोहा "कागा सब तन खाइयो चुन चुन खाइयो मांस, दो नैना मत खाइयो मोहे पिया मिलन की आस" का भी बहुत सुन्दरता से प्रयोग किया है। इसका भावार्थ यह है कि मीराबाई कौवे से कहती हैं कि उनके मर जाने के बाद भले वह उनका पूरा शरीर खा ले, पर उनकी दो आँखों को न खाये क्योंकि उनकी आँखें तब भी अपने कृष्ण की राह तक रही होंगी। प्रस्तुत गीत के थीम से बहुत मेल खाता है यह दोहा और गीत में बहुत अच्छी तरह से समा गया है, घुलमिल गया है। आपको शायद याद हो अक्षय खन्ना की पहली फ़िल्म 'हिमालयपुत्र' में अलका याज्ञ्निक ने एक गीत गाया था जिसका मुखड़ा यही दोहा था। कोरस द्वारा गाये इस दोहे के बाद मुख्य मुखड़ा अलका गाती हैं "किथे नैन न जोड़ी, मेरा मान न तोड़ी, तैनु वास्ता ख़ुदा दा"। १९६१ में एक फ़िल्म बनी थी 'पिया मिलन की आस'। इस फ़िल्म के शीर्षक गीत के लिए इस दोहे से बेहतर भला और क्या हो सकता था। तभी लता मंगेशकर के गाए मुखड़े "पिया मिलन की आस मोहे पिया मिलन की आस" से पहले यह दोहा गाया गया है। फ़िल्मों के बाहर भी इसे कई-कई बार गाया गया है। हाल के सालों में नुसरत फ़तेह अली ख़ान और कैलाश खेर के वर्ज़न लोकप्रिय हुए हैं।

वापस आते हैं "नादान परिन्दे" पर। इस गीत के संगीत संयोजन की बात करें तो शुरु में ही जो लाउड ऑरगन बजता है, उससे कथेड्रल की छवि बनती है। ईलेक्ट्रिक गिटार पर संजीव थॉमस लाजवाब हैं। परक्युशनिस्ट सिवामणि की भूमिका भी इस गीत में कम सराहनीय नहीं। संगीतकार ए. आर. रहमान, जिन्होंने इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर जीता है, इस गीत में अपनी आवाज़ भी मिलाई है जो सुनने वाले को ज़रूर हौण्ट करती है। वैसे मुख्य गायक तो मोहित चौहान ही हैं, पर रहमान के वोकल्स के कहने ही क्या! यह बहुत कम हुआ है कि जब फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में गीतकार, संगीतकार और गायक को एक ही फ़िल्म के लिए पुरस्कृत किया गया हो। मोहित चौहान को इस फ़िल्म के "जो भी मैं" गीत के लिए यह पुरस्कार मिला है। कुल मिलाकर 'रॉकस्टार' का गीत-संगीत ही छाया रहा फ़िल्मफ़ेयर के संगीत विभाग के पुरस्कारों में।

जहाँ एक तरफ़ इस गीत के पीछे पुरस्कारों की लाइन लग गई, वहीं दूसरी तरफ़ एक विवाद भी खड़ा हो गया था। हुआ यह कि इस फ़िल्म की ऑडियो सीडी के कवर पर इरशाद कामिल का नाम नहीं दिया गया, बल्कि कवर पर कवि रुमि का नाम साफ़-साफ़ दिया गया है जिनकी कविता को रणबीर कपूर ने गाया है। इंडस्ट्री में यह बात चल पड़ी थी कि इरशाद कामिल इस बात से नाख़ुश हैं, बल्कि यूं कहें कि वो फ़िल्म के निर्माता इमतियाज़ अली से नाख़ुश हैं। इससे पहले इरशाद ने इमतियाज़ की 'सोचा न था', 'जब वी मेट', और 'लव आज कल' के गानें लिखे थे। 'सोचा न था' के संगीतकार संदेश शान्डिल्य ने पहली बार इरशाद की भेंट इमतियाज़ से करवाई थी। इस गड़बड़ी का ज़िक्र जब मीडिया ने इमतियाज़ से किया तो उन्होंने बताया कि यह एक क्लेरिकल एरर थी और कभी-कभार ऐसी ग़लतियाँ हो जाती हैं जिन पर किसी का बस नहीं चलता। उन्होंने यह भी कहा कि इरशाद उनके दोस्त हैं और सीडी के अगले लॉट में इस ग़लती को सुधार लिया जाएगा। दूसरी तरफ़ जब टी-सीरीज़ के मालिक भूषण कुमार से इस ग़लती के बारे में पूछा गया तो उन्होंने यह साफ़ कह दिया कि यह फ़िल्म के निर्माता की ग़लती है जिन्हें सीडी कवर को ध्यान से देख कर ही अप्रूव करना चाहिए था। "ऐल्बम के कवर पब्लिसिटी डिज़ाइनर द्वारा बनाए जाते हैं और शायद वो इरशाद का नाम डालना भूल गए होंगे। ऐसा फ़िल्म 'मौसम' के साथ भी हुआ था, पर मैंने जैसे ही यह देखा, उसे ठीक कर दिया", भूषण कुमार ने बताया। इरशाद कामिल ऐसे पहले गीतकार नहीं हैं जिन्हें ऐसी हालात से गुज़रना पड़ा हो। उनसे पहले संगीतकार सागर देसाई ने दिल्ली हाइ कोर्ट में सोनी म्युज़िक, फ़ॉक्स स्टार स्टुडियोज़ और फ़ैट-फ़िश के ख़िलाफ़ मुक़द्दमा दायर किया था क्योंकि उन्हें 'क्वीक गन मुरुगन' के सीडी, पोस्टर और वेबसाइट में क्रेडिट नहीं दिया गया था।

"नादान परिंदे" गीत को सुन कर जैसे एक आस की किरण दिखाई देने लगती है यह सोचते हुए कि शायद अर्थपूर्ण गीतों का दौर अभी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है। जब इरशाद कामिल से यह किसी साक्षात्कार में पूछा गया कि आज के गीतों में अर्थ कम और शोर शराबा ज़्यादा होता है, इस बारे में उनका क्या ख़याल है, तो उन्होंने बताया, "आप सही कह रहे हैं कि फ़िल्मी गीतों के बोल बदल गए हैं, पर यह भी तो देखिए कि सिर्फ़ बोल ही नहीं बल्कि फ़िल्में और पूरा समाज भी तो बदल गया है। आज भारतीय युवा पीढ़ी हिन्दी कम और अंग्रेज़ी ज़्यादा समझती है। अगर कोई शुद्ध हिन्दी या वज़नदार उर्दू के शब्द बोले तो बहुतों को समझ ही नहीं आएगी। मैं पुराने गानें पसन्द करता हूँ, पर हमें समकालीन रुचि के साथ भी तो चलना ही पड़ेगा। जो अच्छे शायर हैं, वो अच्छी शायरी करते रहेंगे। आप जिन गीतों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं, वो दरअसल डान्स या आइटम नंबर्स हैं।" किस तरह के गानें लिखना सबसे ज़्यादा मुश्किल है? "मेरे लिए रोमांटिक गीत लिखना सबसे ज़्यादा मुश्किल है क्योंकि इस विषय पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि कोई नई चीज़ लिखना बहुत ही मुश्किल है। कुछ शब्द जो मैं अपने शब्दकोश में नही रखता, वो हैं "दिल", "धड़कन", "जिगर", "प्यार", "इक़रार", "इन्तज़ार" वगेरह।" तो फिर किस तरह के गीत लिखना इरशाद साहब को सबसे ज़्यादा पसन्द है? "मुझे अकेलेपन के रोमांटिक गीत, जिनमें दर्द है, पर एक सूफ़ी टच भी है, लिखना पसन्द है। आजकल क्या होता है कि जिन गीतों में "अल्लाह" या "मौला" शब्द होते हैं, उन पर सूफ़ी गीत होने का ठप्पा लगा दिया जाता है, पर ऐसा बिल्कुल नहीं है।" "नादान परिन्दे" में भी एक अकेलापन सुनाई देता है, जीवन-दर्शन दिखाई देता है। सूफ़ी संगीत को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले में आता है क़व्वालियाँ जिसमे हैं अल्लाह की बातें, अल्लाह तक पहुँचने की बातें; और दूसरे भाग में आता है दर्शन, दार्शनिक बातें, जिस तरह से कबीरदास और रहीमदास के दोहों में होती थीं। इस तरह से कहीं न कहीं इस गीत में इरशाद कामिल ने अपनी पसन्द को शामिल किया है, यानी कि अकेलेपन और सूफ़ी, दोनों। जो भी है, इस गीत ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार जितवा कर आज की पीढ़ी के तमाम गीतकारों की कतार में सबसे आगे ला खड़ा कर दिया है।

"नादान परिन्दे" सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें...



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

२९ फरवरी - आज का गाना


गाना: तुम्हीं हो माता, पिता तुम्ही हो


चित्रपट:मैं चुप रहूँगी
संगीतकार:चित्रगुप्त
गीतकार:राजिंदर कृशन
गायिका:लता मंगेशकर





तुम्हीं हो माता, पिता तुम्ही हो, तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही हो

तुम्ही हो साथी तुम्ही सहारे, कोई न अपना सिवा तुम्हारे
तुम्ही हो नय्या तुम्ही खिवय्या, तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही हो

जो खिल सके ना वो फूल हम हैं, तुम्हारे चरनों की धूल हम हैं
दया की दृष्टि सदा ही रखना, तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही हो




Tuesday, February 28, 2012

रश्मि प्रभा के साथ आज ब्लोग्गेर्स चोईस में हैं मशहूर ब्लॉगर यशवंत माथुर


आज अपनी पसंद के गीतों के साथ हमारे वक़्त में योगदान दे रहे हैं यशवंत माथुर. गीत तो वही होते हैं, पर पसंद और असर अलग अलग होते हैं. बमुश्किल गीतों के समंदर की गहराई से इन गीतों को चुना है और मैं उन्हें यहाँ पिरो रही हूँ ...कहते हैं इन गीतों के लिए यशवंत जी, कि इन गीतों का जीवन से यही संबंध हैं कि इन्हें सुन कर मन मे एक अलग ही उत्साह की भावना आती है और कभी कभी आने वाली निराशा में यह गाने मुझे एक सच्चे दोस्त की तरह प्रेरित करते हैं। साथ ही इन गानों को सुन कर कुछ लिखने के लिये भी मूड बन जाता है। ...आप आनंद उठाइए इन गीतों का, और मैं भी जरा अब इन्हें सुनूँ


रुक जाना नहीं तू कभी हार के (किशोर कुमार)


लक्ष्य को हर हाल मे पाना है (फिल्म लक्ष्य का टाइटिल ट्रैक)


बादल पे पाँव है (चक दे इंडिया)


धूप निकलती है जहां से (फिल्म -क्रिश)


कैसी है ये रुत थी जिसमें फूल बन के दिल खिले (फिल्म दिल चाहता है)


यशवंत माथुर 

२८ फरवरी - आज का गाना


गाना: रे मन सुर में गा


चित्रपट:लाल पत्थर
संगीतकार:शंकर - जयकिशन
गीतकार:नीरज
गायक, गायिका:आशा भोसले, मन्ना डे





रे मन सुर में गा
कोई तार बेसुर न बोले, न बोले
रे मन सुर में गा ...

जीवन है सुख दुःख का संगम
मध्यम के संग जैसे पंचम
दोनों को एक बना
रे मन सुर में गा ...

दिल जो धड़के ताल बजे रे
ताल ताल में समय चले रे
समय के संग हो जा
रे मन सुर में गा ...

जग है गीतों की रजधानी
सुर है राजा लय है रन्नी
साज़ रूप बन जा
रे मन सुर में गा ...


Monday, February 27, 2012

सिने-पहेली # 9

सिने-पहेली # 9 (27 फ़रवरी 2012)

'सिने पहेली' की एक और कड़ी के साथ मैं, आपका ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी, हाज़िर हूँ 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर। दोस्तों, अब बस दो कड़ियाँ शेष हैं 'सिने पहेली' के पहले सेगमेण्ट के पूरे होने में। यानी कि दो अंकों के बाद पहले 'दस का दम' विजेता घोषित कर दिया जाएगा। आठवीं कड़ी के अंकों को जोड़ने के बाद किन चार प्रतिभागियों के सर्वाधिक स्कोर हुए हैं, यह हम अभी थोड़ी देर में आपको बतायेंगे, फ़िल्हाल शुरु करते हैं 'सिने पहेली # 9' के सवालों का सिलसिला।


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सवाल-1: गोल्डन वॉयस

गोल्डन वॉयस में आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं गुज़रे ज़माने की एक आवाज़। सुन कर बताइए यह किस गायक की आवाज़ है?



सवाल-2: पहचान कौन!

दूसरे सवाल के रूप में आपको हल करने हैं एक चित्र पहेली का। नीचे दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए। 1930 के दशक का एक बेहद बेहद बेहद मशहूर और लोकप्रियतम गीतों में से एक है यह गीत जिसका यह दृश्य है। बता सकते हैं गीत का मुखड़ा?



सवाल-3: सुनिये तो...

कुछ संवाद ऐसे होते हैं जो इतने लोकप्रिय होते हैं कि लोग फ़िल्म को, उसकी कहानी को भूल जाते हैं पर ये संवाद याद रह जाते हैं। एक ऐसा ही संवाद सुनिए, और सुन कर बताइए कि यह किस फ़िल्म का है?



सवाल-4: बताइये ना!

और अब चौथा सवाल। फ़िल्मकार शेखर कपूर बुद्ध पर एक फ़िल्म बनाने जा रहे हैं जिसके लिए ब्रैड पिट को नायक चुना गया है। नायिका के लिए उन्होंने किस अभिनेत्री का चयन किया है?

अ) प्रीति ज़िन्टा
ब) ऐश्वर्या राय बच्चन
स) दीपिका पडुकोन
द) कटरीना कैफ़

सवाल-5: गीत अपना धुन पराई

और अब पाँचवा और आख़िरी सवाल। सुनिये इस विदेशी गीत को और बताइए कि वह कौन सा हिन्दी फ़िल्मी गीत है जिसकी धुन इस विदेशी गीत की धुन से प्रेरीत है? बहुत आसान है, इसलिए किसी अतिरिक्त सूत्र की आवश्यक्ता नहीं होनी चाहिए।



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तो दोस्तों, हमने पूछ लिए हैं आज के पाँचों सवाल, और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. अगर आपको सभी पाँच सवालों के जवाब मालूम है, फिर तो बहुत अच्छी बात है, पर सभी जवाब अगर मालूम न भी हों, तो भी आप भाग ले सकते हैं, और जितने भी जवाब आप जानते हों, वो हमें लिख भेज सकते हैं।

२. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

३. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 9" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम, स्थान और पेशा लिखें।

४. आपका ईमेल हमें शुक्रवार 2 मार्च तक मिल जाने चाहिए।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और पचासवे अंक के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा।

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और अब 20 फ़रवरी को पूछे गए 'सिने-पहेली # 8' के सवालों के सही जवाब---

१. पहले सवाल 'गोल्डन वॉयस' में हमने आपको जो आवाज़ सुनवाई थी, वह आवाज़ थी शबाना आज़्मी की। यह शहरयार की लिखी फ़िल्म 'अंजुमन' की ग़ज़ल "गुलाब जिस्म का" का अंश था।

२. 'चित्र-पहेली' में दिखाए गए चित्र में हॄतिक रोशन के साथ नज़र आ रहे हैं गीतकार विजय अकेला।

३. 'सुनिये तो' में जिस गीत का अंतरा हमने सुनवाया, उसका मुखड़ा है "हे शिवशंकर हे करूणाकर', यह फ़िल्म 'सुर संगम' का गीत है राजन साजन मिश्र की आवाज़ में।

४. संतोष सिवन की फ़िल्म 'अशोका' में करीना कपूर के छोटे भाई की भूमिका में जिस बाल कलाकार ने अभिनय किया था, उनका नाम है सूरज बालाजी।

५. 'गीत अपना धुन पराई' में जो विदेशी गीत सुनवाया था, उससे प्रेरीत हिन्दी गीत है फ़िल्म 'आ गले लग जा' का "तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई"। मूल विदेशी गीत है "The Yellow Rose Of Texas (Elvis Presley)"।


और अब 'सिने पहेली # 8' के विजेताओं के नाम ये रहे -----

1. क्षिति तिवारी, इन्दौर --- 5 अंक
2. रीतेश खरे --- 4 अंक
3. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 3 अंक
4. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 3 अंक
5. निशान्त अहलावत, गुड़गाँव --- 2 अंक
6. अमित चावला, दिल्ली --- 2 अंक



और अब आपको बता दें उन चार खिलाड़ियों के नाम जिनका 'सिने-पहेली' की आठवीं कड़ी तक का सम्मिलित स्कोर सबसे उपर हैं। ये चार प्रतियोगी हैं....

प्रकाश गोविन्द, लखनऊ - 30 अंक
पंकज मुकेश, बेंगलुरु - 26 अंक
रीतेश खरे, मुंबई व क्षिति तिवारी, इन्दौर- 20 अंक


10 अंकों की लड़ाई अभी शेष है, देखते हैं कि क्या यही क्रम बरकरार रहती है या कि कोई उलटफेर हो जाती है। बड़ा ही दिलचस्प हो उठा है यह जंग। तो ज़रूर जुड़े रहिएगा अगले अंकों के साथ भी। सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह आपसे इसी स्तंभ में दोबारा मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

२७ फरवरी - आज का गाना


गाना: मेरे घर आई एक नन्ही परी




चित्रपट:कभी कभी
संगीतकार:खय्याम
गीतकार:साहिर
गायिका:लता मंगेशकर





मेरे घर आई एक नन्ही परी, एक नन्ही परी
चांदनी के हसीन रथ पे सवार
मेरे घर आई ...

उसकी बातों में शहद जैसी मिठास
उसकी सासों में इतर की महकास
होंठ जैसे के भीगे\-भीगे गुलाब
गाल जैसे के बहके\-बहके अनार
मेरे घर आई ...

उसके आने से मेरे आंगन में
खिल उठे फूल गुनगुनायी बहार
देख कर उसको जी नहीं भरता
चाहे देखूँ उसे हज़ारों बार (२)
मेरे घर आई ...

मैने पूछा उसे के कौन है तू
हंसके बोली के मैं हूँ तेरा प्यार
मैं तेरे दिल में थी हमेशा से
घर में आई हूँ आज पहली बार
मेरे घर आई ...




Sunday, February 26, 2012

स्वरगोष्ठी में आज- विवाह-पूर्व के संस्कार गीत


February 26, 2012
स्वरगोष्ठी – ५९ में आज

‘हमरी बन्नी के गोरे गोरे हाथ, मेंहदी खूब रचे...’

भारतीय समाज में विवाह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। एक पर्व की तरह यह संस्कार उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर हर धर्मावलम्बी अपने-अपने धार्मिक रीति-रिवाजो के के साथ-साथ लोकाचारों का पालन भी करते हैं। उल्लेखनीय है कि इन लोकाचारों में काफी समानता भी होती है। आपको स्मरण ही होगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ में हमने निश्चय किया था कि प्रत्येक मास में कम से कम एक अंक हम लोक संगीत को समर्पित करेंगे। हमारा आज का अंक लोक संगीत पर केन्द्रित है।


लोक संगीत से अनुराग करने वाले ‘स्वरगोष्ठी’ के सभी पाठको-श्रोताओं को कृष्णमोहन मिश्र का नमस्कार और स्वागत है। इस स्तम्भ की ५२ वीं कड़ी में हमने आपसे संस्कार गीत के अन्तर्गत विवाह पूर्व गाये जाने वाले बन्ना और बन्नी गीतों पर चर्चा की थी। वर और बधू का श्रृंगारपूर्ण वर्णन, विवाह से पूर्व के अन्य कई अवसरों पर किया जाता है, जैसे- हल्दी, मेंहदी, लगन चढ़ाना, सेहरा आदि। इनमें मेंहदी और सेहरा के गीत मुस्लिम समाज में भी प्रचलित है। इन सभी अवसरों के संस्कार गीत महिलाओं द्वारा समूह में गाये जाते है। आज सबसे पहले हम आपको अवध क्षेत्र में प्रचलित एक परम्परागत मेंहदी गीत सुनवाते हैं। गीत में दुल्हन का बहुविध श्रृंगार किया जा रहा है, उसके गोरे हाथों पर कलात्मक मेंहदी लगाई जा रही है और सखियाँ मेंहदी गीत गा रहीं हैं। आपके लिए हम यह मेंहदी गीत क्षिति तिवारी और साथियों के स्वरों में सुनवा रहे हैं।

मेंहदी गीत : ‘हमरी बन्नी के गोरे गोरे हाथ...’ : स्वर – क्षिति तिवारी और साथी


मेंहदी का उत्सव कन्या पक्ष के आँगन में सम्पन्न होता है, जब कि हल्दी, तेल और उबटन का उत्सव दोनों पक्षों में अलग-अलग आयोजित होता है। दूसरी ओर कन्या के पिता, वर पक्ष की सलाह पर अपने पुरोहित से विवाह का शुभ लग्न निकलवाते हैं। एक शुभ मुहूर्त में कन्या के पिता और परिवार के अन्य वरिष्ठ सदस्य, पुरोहित द्वारा तैयार लग्न पत्रिका और फल-मिष्ठान्न आदि भेंट वस्तुएँ लेकर वर के परिवार जाते हैं। औपचारिक रूप से वर के पिता उस लग्न के प्रस्ताव को अपनी सहमति देते हैं। भोजपुरी क्षेत्र में इस अवसर का बड़ा महत्त्व होता है। इन क्षेत्रों में इसे लग्न चढ़ाना कहते हैं। कन्या के परिवार की महिलाएँ खूब धूम-धाम से, गाते-बजाते लग्न चढ़ाने वालों को विदा करती हैं। भोजपुरी की चर्चित लोक-गायिका शारदा सिन्हा ने विवाह के अवसर पर गाये जाने वाले अनेक मोहक गीत गाये हैं। लग्न चढ़ाने के लिए वर पक्ष के यहाँ प्रस्थान करने के अवसर पर कोकिलकंठी श्रीमती सिन्हा ने एक बेहद मधुर गीत- ‘पूरब दिशा से चलले बेटी के बाबू, दूल्हा के लगन चढ़ावे जी...’ गाया है। आज हम आपको उन्हीं का गाया लग्न-गीत प्रस्तुत कर रहे हैं।

लग्न गीत : ‘पूरब दिशा से चलले बेटी के बाबू...’ : स्वर – शारदा सिन्हा और साथी


आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हमने आपसे अवधी और भोजपुरी क्षेत्रों में प्रचलित विवाह-पूर्व के संस्कार गीतों पर चर्चा की। अब हम आपको राजस्थान क्षेत्र की ओर ले चलते हैं, जहाँ आज भी अत्यन्त सुदृढ़ सामाजिक परम्पराएँ कायम हैं। आज़ादी के बाद से यहाँ के समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियाँ, तेज़ी से समाप्त हो रही हैं। राजस्थान में प्रचलित बाल विवाह की कुप्रथा में भी धीरे-धीरे कमी आ रही है। रंग-रँगीले राजस्थान में कई लोक संगीतजीवी समुदाय हैं। लंगा, मांगनियार, मिरासी, भाँट आदि कई समुदाय वंश-परम्परा से आज भी जुड़े हैं। इन लोक कलाकारों को देश-विदेश में भरपूर मान-सम्मान भी प्राप्त हो रहा है। आज हम आपसे लंगा समुदाय के बारे में चर्चा करेंगे। लंगा मुस्लिम समुदाय के होते हैं, किन्तु वंश परम्परा के अनुसार ये हिन्दू परिवारॉ के मांगलिक कार्यों में भी न केवल शामिल होते हैं, बल्कि हिन्दू परम्पराओं और देवी-देवताओं पर रचे लोक गीतों का गायन भी करते हैं। हमारे एक पाठक डॉ. खेम सिंह ने लंगा कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए गए गीत सुनने की इच्छा व्यक्त की थी। उन्हीं की फरमाइश पर आज हम इस समुदाय के चर्चित गायक कोहिनूर लंगा और साथियों द्वारा प्रस्तुत एक मेंहदी गीत सुनवाते हैं। वैवाहिक समारोह के अवसर पर प्रस्तुत किये जाने वाले इस मधुर गीत का आप रसास्वादन कीजिये और आज मुझे यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

मेंहदी गीत : ‘मेंहदी रो रंग लागो...’ : स्वर – कोहिनूर लंगा और साथी


आज की पहेली



अभी हमने आपको सातवें दशक के एक फिल्मी गीत का अंश सुनवाया है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।

१ – यह गीत किस फिल्म से लिया गया है? फिल्म का नाम बताइए।
२ – किस राग पर आधारित है यह गीत? राग का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६१वें अंक में सम्मान के साथ प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ५७वें अंक में हमने आपको पण्डित भीमसेन जोशी से की गई बातचीत का एक अंश सुना कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर है- फिल्म बसन्त बहार और गीतकार शैलेंद्र। दोनों प्रश्न का सही उत्तर राजस्थान के राजेन्द्र सोनकर और इन्दौर की क्षिति तिवारी ने दिया है। हमारे दोनों पाठको को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से बधाई। इसी के साथ हमारे साथी और रेडियो प्लेबैक इण्डिया के तकनीकी प्रमुख अमित तिवारी, जालन्धर के करणवीर सिंह, नई दिल्ली से रजनीश पाण्डेय, लखनऊ से जुबेर खाँ, नितिन मिश्रा और बंगलुरु से पंकज मुकेश ने फिल्म बसन्त बहार के गीत में पण्डित भीमसेन जोशी और मन्ना डे की जुगलबन्दी को बेहद पसन्द किया है। कानपुर के अवतार सिंह जी ने लिखा है कि आप संगीत-प्रेमियों की अभिरुचि का ध्यान रखते हुए गीतों और रागों का चयन करते हैं, इससे भारतीय संगीत के श्रोताओं की वृद्धि होगी। आप सभी श्रोताओं-पाठको को अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आभार।

झरोखा अगले अंक का

फाल्गुन मास का परिवेश मानव को ही नहीं पशु-पक्षियों को भी आह्लादित करता है। इस सप्ताह रस-रंग से परिपूर्ण होली का पर्व उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मूलतः प्रकृति पर केन्द्रित हमारे भारतीय संगीत की हर विधा- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत में फाल्गुनी परिवेश और होली पर्व का मनमोहक चित्रण मिलता है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक में हम संगीत की विविध विधाओं में होली के इन्द्रधनुषी रंगों में आपके तन-मन को रंग देंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

२६ फरवरी - आज का गाना


गाना: न जाने आज किधर मेरी नाव चली रे




चित्रपट:झूला
संगीतकार:सरस्वती देवी
गीतकार:प्रदीप
गायक:अशोक कुमार





न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे
न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे
चली रे चली रे मेरी नाव चली रे
चली रे चली रे मेरी नाव चली रे
कोई कहे यहाँ चली कोई कहे वहाँ चली
कोई कहे यहाँ चली कोई कहे वहाँ चली
मन ने कहा पिया के गाँव चली रे
पिया के गाँव चली रे
चली रे चली रे मेरी नाव चली रे

मन के मीत मेरे मिल जा जळी
दुनिया के सागर में नाव मेरी चल दी
मन के मीत मेरे मिल जा जळी
दुनिया के सागर में नाव मेरी चल दी
बिलकुल अकेली, बिलकुल अकेली अकेली चली रे
चली रे चली रे मेरी नाव चली रे
न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे
चली रे चली रे मेरी नाव चली रे

ऊँची नीची लहरों पे नाव मेरी डोले
मन में प्रीत मेरी पिहू पिहू बोले
ऊँची नीची लहरों पे नाव मेरी डोले
मन में प्रीत मेरी पिहू पिहू बोले
मेरे मन मुझ को बता, मेरी मंज़िल का पता
मेरे मन मुझ को बता, मेरी मंज़िल का पता
बोल मेरे साजन की कौन गली रे
बोल मेरे साजन की कौन गली रे
चली रे चली रे मेरी नाव चली रे

न जाने किधर...



Saturday, February 25, 2012

२५ फरवरी - आज का गाना


गाना: आना मेरी जान मेरी जान संडे के संडे




चित्रपट:शहनाई
संगीतकार:सी. रामचंद्र
गीतकार:प्यारे लाल संतोषी
गायक, गायिका:चितलकर, मीना कपूर





चि: आना मेरी जान, मेरी जान, संडे के संडे
आना मेरी जान, मेरी जान,  संडे के संडे
चि: आई लव यू
मी: भाग यहाँ से दूर
चि: आई लव यू
मी: भाग यहाँ से दूर

चि: तुझे पैरिस दिखाऊँ, तुझे लन्दन घूमाऊँ
तुझे ब्रैन्डी पिलाऊँ, व्हिस्की पिलाऊँ
और खिलाऊँ
खिलाऊँ मुर्गी के,  मुर्गी  के, अण्डे, अण्डे
आना मेरी जान, मेरी जान,  संडे के संडे

मी: मैं धरम करम की नारी
तू नीच अधम व्यभिचारी
मामा हैं गंगा पुजारी
बाबा काशी के, काशी के, पण्डे, पण्डे
चि: आना मेरी जान, मेरी जान,  संडे के संडे

चि: आओ, हाथों में हाथ ले वॉक करें हम
आओ, स्वीट  स्वीट  आपस में टाक करें हम
मी: आरे हट!
सैंय्या मेरा पहलवान है, मारे दण्ड हज़ार
सैंय्या मेरा पहलवान है, मारे दण्ड हज़ार
भाग जाओगे तुम बन्दर देगा जो ललकार
मारे गिन गिन के, गिन गिन के, डण्डे, डण्डे
चि: आना मेरी जान, मेरी जान,  संडे के संडे

मी: ओ माई  साब, कम,  कम , कम
तुम रोमियो, जूलियट हम
ओ डिअर, कम हियर, डोंट फिअर
ये गाँव की नेटिव लड़की है
ये दिल की बीटिंग क्या जाने
ये चेजिंग हंटिंग क्या जाने
ये लव की मीटिंग क्या जाने
चि: राइट!  राइट !  राइट ! औल राइट !
मी: आओ डिअर, हम चले दिअर
चि: वेअर?
मी:  दिअर , करे मुहब्बत के, मुहब्बत के धन्धे, धन्धे
दोनो: आना मेरी जान मेरी जान  संडे के  संडे ...



Friday, February 24, 2012

बोलती कहानियाँ - आखिर बेटा हूँ तेरा

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रसिद्ध कथाकार पंकज सुबीर की कहानी "एक रात" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं समीर लाल की कहानी "आखिर बेटा हूं तेरा", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने।

 कहानी "आखिर बेटा हूँ तेरा" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 48 सेकंड है। इस बार हमने इस प्रसारण  में कुछ नये प्रयोग किये हैं। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

 यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


ऐसा नहीं कि मेरे पास शब्द न थे मगर बेहतर शब्दों की तलाश में भटकता रहा और लोग रचते चले गये।  मेरे भाव किसी और की कलम से शब्द पा गये।
 ~  समीर लाल

हर शुक्रवार को सुनें एक नयी कहानी

उसे 5 बजे बसुआ को उठाकर चाय नाश्ता देना होता था। फिर उसके लिये दोपहर का भोजन बनाकर घर से निकलती।
 (समीर लाल की "आखिर बेटा हूं तेरा" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.

 यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#Seventh Story, Akhir Beta Hoon Tera: Sameer Lal/Hindi Audio Book/2012/7. Voice: Archana Chaoji

२४ फरवरी - आज का गाना


गाना: मुहब्बत ऐसी धड़कन है




चित्रपट:अनारकली
संगीतकार:सी. रामचंद्र
गीतकार:राजिंदर कृशन
गायिका:लता मंगेशकर






इस इंतेज़ार\-ए\-शौक को जनमों की प्यास है
इक शमा जल रही है, तो वो भी उदास है

मुहब्बत ऐसी धड़कन है, (जो समझाई नहीं जाती) \- २
ज़ुबां पर दिल की बेचैनी, (कभी लाई नहीं जाती) \- २
मुहब्बत ऐसी धड़कन है

चले आओ, चले आओ, तक़ाज़ा है निगाहों का \- २
तक़ाज़ा है निगाहों का
किसी की आर्ज़ू ऐसे, (तो ठुकराई नहीं जाती) \- २
मुहब्बत ऐसी धड़कन है, (जो समझाई नहीं जाती) \- २
मुहब्बत ऐसी धड़कन है

(मेरे दिल ने बिछाए हैं सजदे आज राहों में) \- २
सजदे आज राहों में
जो हालत आशिक़ी की है, (वो बतलाई नहीं जाती) \- २
मुहब्बत ऐसी धड़कन है, (जो समझाई नहीं जाती) \- २
मुहब्बत ऐसी धड़कन है




Thursday, February 23, 2012

आर्टिस्ट ऑफ द मंथ - गीतकार सजीव सारथी


सजीव सारथी का नाम इंटरनेट पर कलाकारों की जुगलबंदी करने के तौर पर भी लिया जाता है. वर्चुएल-स्पेस में गीत-संगीत निर्माण की नई और अनूठी परम्परा की शुरूआत करने का श्रेय सजीव सारथी को दिया जा सकता है. मात्र बतौर एक गीतकार ही नहीं, बल्कि अपने गीत संगीत अनुभव से उन्होंने "पहला सुर", "काव्यनाद" और "सुनो कहानी" जैसी अलबमों और अनेकों संगीत आधारित योजनाओं के निर्माण में भी रचनात्मक सहयोग दिया, और हिंदी की सबसे लोकप्रिय संगीत वेब साईटों (आवाज़, और रेडियो प्लेबैक इंडिया) का कुशल संचालन भी किया. अपने ५ वर्षों के सफर में सजीव ने इन्टरनेट पर सक्रिय बहुत से कलाकारों के साथ जुगलबंदी की हैं. आज सुनिए उन्हीं की जुबानी उनके अब तक के संगीत सफर की दास्तान, उन्हें के रचे गीतों की चाशनी में लिपटी...


२३ फरवरी - आज का गाना


गाना: तुम संग लागे पिया मोरे नैना




चित्रपट:ताज
संगीतकार:हेमंत कुमार
गीतकार:राजिंदर कृशन
गायिका:लता






तुम संग लागे पिया मोरे नैना
इक पल चैन न आये

पापी मन मोरी बात न माने
कौन इसे आये समझाने
मचल मचल रह जाये
तुम संग लागे ...

मन में समायी मोरे श्याम सुरतिया
किस दिस भूलू मैं पी की मूरतिया
बात समझ नहीं आये
तुम संग लागे ...



Wednesday, February 22, 2012

"हम चुप हैं कि दिल सुन रहे हैं..." - पर हमेशा के लिए चुप हो गए शहरयार!

१३ फ़रवरी २०१२ को जानेमाने शायर शहरयार का इन्तकाल हो गया। कुछ फ़िल्मों के लिए उन्होंने गीत व ग़ज़लें भी लिखे जिनका स्तर आम फ़िल्मी रचनाओं से बहुत उपर है। 'उमरावजान', 'गमन', 'फ़ासले', 'अंजुमन' जैसी फ़िल्मों की ग़ज़लों और गीतों को सुनने का एक अलग ही मज़ा है। उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप फ़िल्म 'फ़ासले' के एक लोकप्रिय युगल गीत की चर्चा आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' की आठवीं कड़ी में, सुजॉय चटर्जी के साथ...

एक गीत सौ कहानियाँ # 8

यूं तो फ़िल्मी गीतकारों की अपनी अलग टोली है, पर समय समय पर साहित्य जगत के जानेमाने कवियों और शायरों ने फ़िल्मों में अपना स्तरीय योगदान दिया है, जिनके लिए फ़िल्म जगत उनका आभारी हैं। ऐसे अज़ीम कवियों और शायरों के लिखे गीतों व ग़ज़लों ने फ़िल्म संगीत को न केवल समृद्ध किया, बल्कि सुनने वालों को अमूल्य उपहार दिया। ऐसे ही एक मशहूर शायर रहे शहरयार, जिनका हाल ही में देहान्त हो गया। अख़लक़ मुहम्मद ख़ान के नाम से जन्मे शहरयार को भारत का सर्वोच्च साहित्य सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से साल २००८ में सम्मानित किया गया था। ७५-वर्षीय इस अज़ीम शायर को एक लेखक और शिक्षक के रूप में बहुत इज़्ज़त तो मिली ही, इन्होंने मुज़फ़्फ़र अली की तमाम फ़िल्मों के लिए गानें भी लिखे। 'उमरावजान' की ग़ज़लें आज इतिहास बन चुकी हैं। "ये क्या जगह है दोस्तों", "इन आँखों की मस्ती के", "दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए", "ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें" जैसी कालजयी ग़ज़लें हों या फ़िल्म 'गमन' की "सीने में जलन" या "अजीब सनीहा मुझ पर गुज़र गया" हो, शहरयार की हर रचना अपने आप में बेमिसाल है, लाजवाब है। फ़िल्म 'अंजुमन' की ग़ज़लें लोगों में ज़्यादा चर्चित न रही हों, पर कुछ लोगों को शबाना आज़मी की गाई इस फ़िल्म की "गुलाब जिस्म का" आज भी अच्छी तरह याद है।

फ़िल्म जगत में शहरयार का नाम भले मुज़फ़्फ़र अली की फ़िल्मों के साथ जोड़ा जाता हो, पर यश चोपड़ा ने ८० के दशक की अपनी फ़िल्म 'फ़ासले' के गीतकार के रूप में इन्हीं को चुना था। यश चोपड़ा की अन्य फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म ने कामयाबी के झंडे तो नहीं गाढ़े, पर इसके गीतों ने काफ़ी लोकप्रियता हासिल की। शिव-हरि का सुरीला संगीत पाकर शहरयार के नग़में जैसे खिल उठे। आशा भोसले की गाई ग़ज़ल "यूं तो मिलने तो हम मिले हैं बहुत, दरमियाँ फिर भी फ़ासले हैं बहुत" मेरी इस फ़िल्म की पसंदीदा ग़ज़ल है। पर सर्वसाधारण में फ़िल्म का जो गीत सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था, वह था लता मंगेशकर और किशोर कुमार का गाया "हम चुप हैं कि दिल सुन रहे हैं, धड़कनों को, आहटों को, सांसें रुक सी गई हैं"। और शहरयार की सांसें रुक गईं अलीगढ़ में इस १३ फ़रवरी की शाम ८:३० बजे। उनके छोटे बेटे फ़रिदून, जो मुंबई में रहते हैं, ने बताया कि पिछले साल चिकित्सा के लिए उनके पिता मुंबई आए थे और उन्होंने यश चोपड़ा से मुलाक़ात भी की थी। शायद 'फ़ासले' के दिनों की यादें ही उन्हें खींच ले गई होंगी यश जी के पास।

फ़िल्म 'फ़ासले' का यह रोमांटिक डुएट "हम चुप हैं..." फ़िल्माया गया था रोहन कपूर और फ़रहा पर। इस लेख के लिए जब मैंने रोहन कपूर से सम्पर्क किया और उनसे शहरयार साहब और ख़ास कर इस गीत से जुड़ी उनकी यादों के बारे में पूछा तो उन्होंने कुछ इन शब्दों में जवाब दिया - "शहरयार साहब के गुज़र जाने की ख़बर सुन कर मुझे बहुत दुख हुआ। भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को 'quantity' में नहीं बल्कि 'quality' में तोली जानी चाहिए। वो सूक्ष्म और सच्चे लेखकों में से थे और मैं भगवान का आभारी हूँ कि मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला। एक रूमानी शायर... उन्होंने यश जी के लिए लिखा। यश जी, जो उस समय साहिर लुधियानवी से गीत लिखवाते थे, शहरयार साहब को बतौर गीतकार चुनना ही शहरयार साहब के लिए किसी जीत से कम नहीं थी। "हुम चुप हैं" शहरयार साहब ने लिखा और किशोर दा व लता जी नें बेहद ख़ूबसूरती के साथ गाया। यह फ़िल्म का पिक्चराइज़ होने वाला पहला गाना था। पूरा गीत स्विट्‍ज़रलैण्ड की पहाड़ों में फ़िल्माया गया था। कड़ाके की ठण्ड थी और मुझे व फ़रहा को इस गीत में रोमांटिक लिप-सिंक करना था, और वह भी टाइट कोज़-अप में। बहुत मुश्किल काम था। पर शिव-हरि की मेलडीयस धुन ने गीत को इतना सुंदर बना दिया कि हम दोनों ने गीत का हर छोटे से छोटा अंश को फ़िल्माने का भरपूर आनन्द लिया। ८० के दशक का यह एक सदाबहार गीत साबित हुआ था। इस गीत की यादें मेरे दिल में हमेशा ताज़ी रहेंगी।"

२७ सितंबर १९८५ को प्रदर्शित इस फ़िल्म में रोहन कपूर और फ़रहा के अतिरिक्त मुख्य भूमिकाओं में थे सुनिल दत्त, रेखा, दीप्ति नवल, राज किरण और फ़ारूक़ शेख़। शहरयार साहब के जाने की ख़बर सुन कर फ़ारूक़ शेख़ ने कहा - "उर्दू साहित्य जगत के लिए यह एक बहुत बड़ी क्षति है। शहरयार साहब ने मेरी फ़िल्मों - 'गमन', 'उमराव जान', 'अंजुमन' और 'फ़ासले' - के गीतों को लिखा था और हर एक गीत अपने आप में मास्टरपीस साबित हुए। ८० के दशक में मेरी उनसे कई बार मुलाक़ातें हुई हैं, और हाल में उनके बेटे के घर पर मीरा रोड में मुलाक़ात हुई थी जब वो अपनी कैन्सर की चिकित्सा के लिए आए थे। शहरयार साहब एक बहुत ही पढ़े हुए शायर थे जिन्होंने हमेशा इस बात का ख़याल रखा कि उनके लिखे शेर समाज को कुछ न कुछ संदेश ज़रूर दें। एक सच्चे कलाकार की तरह वो पब्लिसिटी से दूर रहना पसन्द करते थे। पर उनकी लेखनी ही उनकी ज़ुबान थी।"

शहरयार का जन्म १६ जून, १९३६ को बरेली के एक गाँव में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा उन्होंने बुलन्दशहर में प्राप्त की और फिर उसके बाद वो जुड़े अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से। १९८६ में इसी यूनिवर्सिटी में उर्दू लेक्चरर की नौकरी मिल गई जहाँ से उन्होंने १९९६ में उर्दू डिपार्टमेण्ट के चेयरमैन के रूप में रिटायर किया। वो साहित्यिक पत्रिका 'शेर-ओ-हिकमत' के सम्पादक रहे, और १९८७ में अपनी काव्य संकलन 'ख़्वाब का दर बन्द है' के लिए उर्दू का 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' भी अर्जित किया। आज शहरयार इस फ़ानी दुनिया से बहुत दूर निकल चुके हैं पर उर्दू साहित्य जगत और सिने-संगीत जगत को जो भेंटें उन्होंने दी हैं, उनकी वजह से वो हमेशा के लिए अमर हो गए हैं। जिस तरह के इस गीत के बोल हैं कि "सांसें रुक सी गई हैं", ठीक वैसे ही उनके जाने के बाद वक़्त रुक गया है, यानी उनके लिखे गीत कालजयी हो गए हैं, उनकी ग़ज़लों पर वक़्त का कोई असर नहीं रहा।

लता-किशोर के गाए, शहरयार के लिखे व शिव-हरि के स्वरबद्ध किए फ़िल्म 'फ़ासले' के इस गीत को सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें...



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

२२ फरवरी - आज का गाना


गाना: आज मेरे मन में सखी बाँसुरी बजाए कोई




चित्रपट:आन
संगीतकार:नौशाद अली
गीतकार:शकील
गायिका:लता




ल: आ हा हा...
आज मेरे मन में सखी बाँसुरी बजाए कोई
आज मेरे मन में...
आज मेरे मन में सखी बाँसुरी बजाए कोई
प्यार भरे गीत सखी बार\-बार गाए कोई
बाँसुरी बजाए...
बाँसुरी बजाए, सखी गाए सखी रे, कोई छैलवा हो
को: कोई अलबेलवा हो, कोई छैलवा हो
ल: रँग मेरी जवानी का किए झूमता घर आया है सावन
को: रँग मेरी जवानी का किए झूमता घर आया है सावन
ल: आ हा हा...
हो सखी, हो रे सखी, आया है सावन
को: मेरे नैनों में है साजन

ल: इन ऊँदी घटाओं में, हवाओं में सखी, नाचे मेरा मन
हो सखी, नाचे मेरा मन
को: हो आँगन में सावन मन\-भावन हो जी
ल: हो, इन ऊँदी घटाओं में, हवाओं में सखी, नाचे मेरा मन
को: लल्ला लाला ला लाला
ल: दिल के हिंडोले पे मोहे झूले न झुलाए कोई
को: प्यार भरे गीत सखी, बार\-बार गाए कोई
ल: बाँसुरी बजाए सखी गाए सखी रे
कोई छैलवा हो
को: कोई अलबेलवा हो, कोई छैलवा हो

ल: कहता है इशारों में कोई
आ मोहे अम्बुआ के तले मिल
को: भला वो कौन है घायल
कहता है इशारों में कोई
आ मोहे अम्बुआ के तले मिल
ल: मैं नाम न लूँ
आज लगे लाज सखी धड़के मेरा दिल हो सखी धड़के मेरा दिल
को: हो आँगन में सावन मन\-भावन हो जी
ल: हो, मैं नाम न लूँ
आज लगे लाज सखी धड़के मेरा दिल हो सखी धड़के मेरा दिल
को: लल्ला लाला ला लाला
ल: तार पे जीवन के मधुर रागिनी सुनाए कोई
को: प्यार भरे गीत सखी बार\-बार गाए कोई
ल: बाँसुरी बजाए सखी गाए सखी रे
ल: कोई छैलवा हो
को: कोई अलबेलवा हो, कोई छैलवा हो




Tuesday, February 21, 2012

ब्लोग्गेर्स चोईस में रश्मि जी लायी हैं, शिखा वार्ष्णेय की पसंद के ५ गीत

शिखा वार्ष्णेय से जब मैंने गीत मांगे, तो सुना और भूल गईं. छोटी बहन ने सोचा - अरे यह रश्मि दी की आदत है, कभी ये लिखो, वो दो, ये करो .... हुंह. मैंने भी रहने दिया. पर अचानक जब उसने समीर जी की पसंद को सुना तो बोली - मैं भी...मैं भी.... हाहा, कौन नहीं चाहेगा कि हमारी पसंद से निकले ५ गीतों को हमें चाहनेवाले सुनें! तो शिखा की बड़ी बड़ी बातों से अलग आकर इस बहुत जाननेवाली की पसंद सुनिए उसके शब्दों में लिपटे
-


रोज की आप धापी से
कुछ लम्हें खुद के लिए बचाकर कर
रख सर को नरम तकिये पर
मूँद कर पलकों को
कुछ पल सिर्फ एहसास के
जब दरकार हों .
यही गीत याद आते हैं.
और सुकून दे जाते हैं.

आप यूँ फासलों से गुजरते रहे


मेरा कुछ सामान - (इजाजत)


यह दिल और उनकी निगाहों के साये.


होटों से छू लो तुम (प्रेम गीत)


दिल तो है दिल .(मुकद्दर का सिकंदर.)

२१ फरवरी - आज का गाना


गाना: ले तो आये हो हमें सपनों की गाँव में




चित्रपट:दुल्हन वही जो पिया मन भाये
संगीतकार:रवीन्द्र जैन
गीतकार:रवीन्द्र जैन
गायिका:हेमलता




ले तो आये हो हमें सपनों की गाँव में
प्यार की छाँव में बिठाये रखना
सजना ओ सजना ...

तुमने छुआ तो तार बज उठे मन के
तुम जैसा चाहो रहे वैसे ही बन के
तुम से शुरू, तुम्हीं पे कहानी खत्म करे
दूजा न आये कोई नैनो के गाँव में
ले तो आये हो हमें ...

छोटा सा घर हो अपना, प्यारा सा जग हो
कोई किसी से पल भर न अलग हो
इसके सिवा अब दूजी कोई चाह नहीं
हँसते रहे हम दोनों फूलों के गाँव में
ले तो आये हो हमें ...



Monday, February 20, 2012

सिने-पहेली # 8

सिने-पहेली # 8 (20 फ़रवरी 2012)

रेडियो प्लेबैक इण्डिया के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, 'सिने-पहेली' की आठवीं कड़ी लेकर मैं हाज़िर हूँ। दोस्तों, जैसा कि पिछले सप्ताह हमने यह घोषित किया कि इस प्रतियोगिता को दस-दस अंकों में विभाजित किया जा रहा है, तो पहले सेगमेण्ट के ७ अंक प्रस्तुत हो चुके हैं और आज आठवा अंक है। तो क्यों न जल्दी से नज़र दौड़ा ली जाए चार अग्रणी प्रतियोगियों के नामों पर। इस वक़्त जो चार प्रतियोगी सबसे उपर चल रहे हैं, वो हैं ---

प्रकाश गोविन्द, लखनऊ - 27 अंक
पंकज मुकेश, बेंगलुरु - 23 अंक
रीतेश खरे, मुंबई - 16 अंक
क्षिति तिवारी, इन्दौर - 15 अंक


भई वाह, इसे कहते हैं कांटे का टक्कर! देखते हैं कि क्या प्रकाश जी बनने वाले हैं पहला 'दस का दम' विजेता? या फिर पंकज मुकेश उन्हें पार कर जायेंगे अगले तीन अंकों में? या कि रीतेश या क्षिति कोई करामात दिखा जायेंगे? यह सब तो वक़्त आने पर ही पता चलेगा, फ़िल्हाल शुरु किया जाए 'सिने पहेली # 8'।

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सवाल-1: गोल्डन वॉयस

गोल्डन वॉयस में आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं मुज़फ़्फ़र अली की एक फ़िल्म की ग़ज़ल का एक अंश। इस अंश को सुन कर बताइए कि गायिका कौन हैं?



सवाल-2: पहचान कौन!

दूसरे सवाल के रूप में आपको हल करने हैं एक चित्र पहेली का। नीचे दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए। सुपरस्टार हृतिक रोशन के साथ जो शख़्स दिख रहे हैं, वो एक फ़िल्म-संगीत से जुड़े कलाकार हैं। कौन हैं ये?



सवाल-3: सुनिये तो...

'सुनिये तो'.... में आज हम आपको सुनवा रहे हैं महाशिवरात्री के पावन उपलक्ष्य पर एक शिव भजन का इन्टरल्युड म्युज़िक व अंतरे का एक अंश। आपको बताना है गीत का मुखड़ा।



सवाल-4: बताइये ना!

और अब चौथा सवाल। संतोष सिवन की महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'अशोका' में करीना कपूर के छोटे भाई का किरदार जिस बाल कलाकार ने निभाया था, उनका क्या नाम है? चलिए चार ऑपशन्स आपको दे रहे हैं।
अ) सूरज बालाजी
ब) सूर्या
स) परज़ान दस्तूर
द) यश झा

सवाल-5: गीत अपना धुन पराई

और अब पाँचवा और आख़िरी सवाल। सुनिये इस विदेशी गीत को और बताइए कि वह कौन सा हिन्दी फ़िल्मी गीत है जिसकी धुन इस विदेशी गीत की धुन से प्रेरीत है? एक सूत्र देते हैं कि इस गीत को पर्दे पर शशि कपूर ने गाया है।



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तो दोस्तों, हमने पूछ लिए हैं आज के पाँचों सवाल, और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. अगर आपको सभी पाँच सवालों के जवाब मालूम है, फिर तो बहुत अच्छी बात है, पर सभी जवाब अगर मालूम न भी हों, तो भी आप भाग ले सकते हैं, और जितने भी जवाब आप जानते हों, वो हमें लिख भेज सकते हैं।

२. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

३. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 8" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम, स्थान और पेशा लिखें।

४. आपका ईमेल हमें शुक्रवार 24 फ़रवरी तक मिल जाने चाहिए।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और पचासवे अंक के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा।

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और अब 13 फ़रवरी को पूछे गए 'सिने-पहेली # 7' के सवालों के सही जवाब---

१. पहले सवाल 'गोल्डन वॉयस' में हमने आपको जो आवाज़ सुनवाई थी, वह आवाज़ थी गायक अभिनेता पहाड़ी सान्याल की। इस सवाल का सही जवाब केवल रीतेश खरे ने दिया है। मान गए रीतेश जी!

२. 'चित्र-पहेली' में दिखाए गए चित्र में जिस गीत का दृश्य दिखाया था, वह था "पप्पु काण्ट डान्स साला"। इसका सही जवाब हर किसी ने दिया है। बहुत आसान जो था!

३. 'सुनिये तो' में जिस गीत का शुरुआती संगीत सुनवाया गया था, वह था 'मृत्युदंड' फ़िल्म का "कह दो एक बार सजना"। इसका भी लगभग सभी ने सही जवाब दिया है।

४. "कोलावरी डी" का सही शाब्दिक अर्थ है "हत्या के लिए इतना आक्रोश क्यों है"। अरे वाह, यह भी आप सब को पता है!

५. 'गीत अपना धुन पराई' में जो विदेशी गीत सुनवाया था, उससे प्रेरीत हिन्दी गीत है फ़िल्म 'मधुमती' का "दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा"। यह चेकोस्लोवाकिया के लोक गीत से प्रेरीत गीत है।

और अब 'सिने पहेली # 7' के विजेताओं के नाम ये रहे -----

1. रीतेश खरे --- 4 अंक
2. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 4 अंक
3. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 4 अंक
4. क्षिति तिवारी, इन्दौर --- 3 अंक
5. सुमित चक्रवर्ती, चण्डीगढ़ --- 3 अंक
6. अमित चावला, दिल्ली --- 2 अंक



आप सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आप को किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। जिन पाठकों नें इसमें भाग लिया पर सही जवाब न दे सके, उनका भी हम शुक्रिया अदा करते हैं और अनुरोध करते हैं कि अगली पहेली में भी ज़रूर भाग लीजिएगा। तो आज बस इतना ही, अगले सप्ताह आपसे इसी स्तंभ में दोबारा मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

२० फरवरी - आज का गाना


गाना: अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे




चित्रपट:जवानी दीवानी
संगीतकार:राहुलदेव बर्मन
गीतकार:आनंद बक्षी
गायक:किशोर कुमार




अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे
तराने बनेंगे फ़साने बनेंगे
तराने बने तो, फ़साने बने तो
फ़साने बने तो दीवाने बनेंगे
अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे ...

फ़साने बने तो सुनेगी ये महफ़िल
सुनेगी ये महफ़िल बड़ी होगी मुशकिल
रुसवाइयों के बहाने बनेंगे
अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे ...

बहानों से फिर तो मुलाक़ात होगी
यूँही दिन कटेगा बसर रात होगी
नये दोस्त इक दिन पुराने बनेंगे
अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे ...

दीवनों पे हँसता है सारा ज़माना
ज़माना मुहब्बत का दुशमन पुराना
दीवाने नहीं हम सयाने बनेंगे
सयाने नहीं हम
सयाने नहीं हम दीवाने बनेंगे
अगर साज़ छेड़ा तराने बनेंगे ...




Sunday, February 19, 2012

मधुमास के परिवेश को चित्रित करता राग बसन्त-बहार

स्वरगोष्ठी – ५८ में आज

‘फूल रही वन वन में सरसों, आई बसन्त बहार रे...’



दो रागों के मेल से निर्मित रागों की श्रृंखला में बसन्त बहार अत्यन्त मनमोहक राग है। राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है यह बसन्त और बहार, दोनों रागों के मेल से बना है। इस राग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी प्रस्तुति में दोनों रागों की छाया परिलक्षित होती है।

मस्त संगीतानुरागियों का आज की ‘स्वरगोष्ठी’ के नवीन अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः स्वागत करता हूँ। इन दिनों हम बसन्त ऋतु में गाये-बजाये जाने वाले कुछ प्रमुख रागों पर आपसे चर्चा कर रहे हैं। आज हमारी चर्चा का विषय है, राग ‘बसन्त बहार’। परन्तु इस राग पर चर्चा करने से पहले हम दो ऐसे फिल्मी गीतों के विषय में आपसे ज़िक्र करेंगे, जो राग ‘बसन्त बहार’ पर आधारित है। हम सब यह पहले ही जान चुके हैं कि राग ‘बसन्त बहार’ दो स्वतंत्र रागों- बसन्त और बहार के मेल से बनता है। दोनों रागों के सन्तुलित प्रयोग से राग ‘बसन्त बहार’ का वास्तविक सौन्दर्य निखरता है। कभी-कभी समर्थ कलासाधक प्रयुक्त दोनों रागों में से किसी एक को प्रधान बना कर दूसरे का स्पर्श देकर प्रस्तुति को एक नया रंग दे देते हैं। आज प्रस्तुत किए जाने वाले फिल्मी गीतों में राग की इस विशेषता का आप प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे।

राग ‘बसन्त बहार’ पर आधारित आज का पहला फिल्मी गीत हमने १९५६ में प्रदर्शित, राग के नाम पर ही रखे गए शीर्षक अर्थात फिल्म ‘बसन्त बहार’ से लिया है। यह एक संगीत-प्रधान फिल्म थी, जिसके संगीतकार शंकर-जयकिशन थे। राग आधारित गीतों की रचना फिल्म के कथानक की माँग भी थी और उस दौर में इस संगीतकार जोड़ी के लिए चुनौती भी। शंकर-जयकिशन ने शास्त्रीय संगीत के दो दिग्गजों- पण्डित भीमसेन जोशी और सारंगी के सरताज पण्डित रामनारायण को यह ज़िम्मेदारी सौंपी। पण्डित भीमसेन जोशी ने फिल्म के गीतकार शैलेन्द्र को एक पारम्परिक बन्दिश गाकर सुनाई और शैलेन्द्र ने १२ मात्रा के ताल पर शब्द रचे। पण्डित जी के साथ पार्श्वगायक मन्ना डे को भी गाना था। मन्ना डे ने जब यह सुना तो पहले उन्होने मना किया, लेकिन बाद में राजी हुए। इस प्रकार भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में एक अविस्मरणीय गीत दर्ज़ हुआ। आइए, पहले हम यह गीत सुनते हैं, उसके बाद हम गीत की कुछ और विशेषताओं पर चर्चा करेंगे।

फिल्म – बसन्त बहार : ‘केतकी गुलाब जूही...’: स्वर – पं. भीमसेन जोशी और मन्ना डे


द्रुत एकताल में निबद्ध यह गीत मन्ना डे की प्रतिभा की दृष्टि से इसलिए उल्लेखनीय माना गया, कि इस गीत में उन्होने राग बसन्त के सटीक स्वरों का प्रयोग कर फिल्म जगत को चकित कर दिया था। इसके अलावा पण्डित जी की गायकी पर तो टिप्पणी की ही नहीं जा सकती। वास्तव में यह गीत राग बसन्त पर ही केन्द्रित है, किन्तु राग बहार का हल्का स्पर्श भी परिलक्षित होता है। राग बसन्त बहार की यही विशेषता होती है। समर्थ कलासाधक दो रागों के मेल से तीसरे राग की अनुभूति करा सकता है और राग बसन्त या बहार के महत्त्व को भी प्रदर्शित कर सकता है। अब हम आपको एक ऐसा फिल्मी गीत सुनवाते हैं, जो बसन्त बहार के स्वरों पर आधारित होते हुए भी पूर्वार्द्ध में बहार और उत्तरार्द्ध बसन्त के रस-रंग की सार्थक अनुभूति कराता है। यह गीत १९५४ में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ का है, जिसके संगीतकार थे नौशाद और इसे स्वर दिया लता मंगेशकर व मोहम्मद रफी ने। गीत का आरम्भ बहार के स्वरों से होता है, परन्तु आगे चल कर बसन्त का आकर्षक स्पर्श, गीत को द्विगुणित कर देता है। आइए सुनते हैं, तीनताल में निबद्ध नौशाद की यह अनूठी रचना।

फिल्म – शबाब : ‘मन की वीन मतवारी बाजे...’: स्वर – लता मंगेशकर व मो. रफी


हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि बसन्त ऋतु का अत्यन्त मोहक राग ‘बसन्त बहार’ दो रागों के मेल से बना है। आम तौर पर इस राग के आरोह में बहार और अवरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाता है। यदि आरोह में बसन्त के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो इसे पूर्वांग प्रधान रूप देना आवश्यक है। षडज से मध्यम तक दोनों रागों के स्वर समान होते हैं, तथा मध्यम के बाद के स्वर दोनों रागों में अन्तर कर देते हैं। राग ‘बसन्त बहार’ दो प्रकार से प्रचलन में है। यदि बसन्त को प्रमुखता देनी हो तो इसे पूर्वी थाट के अन्तर्गत लेना चाहिए। ऐसे में वादी स्वर षडज और संवादी पंचम हो जाता है। काफी थाट के अन्तर्गत लेने पर राग बहार प्रमुख हो जाता है और वादी मध्यम और संवादी षडज हो जाता है। अन्य ऋतुओं में इस राग का गायन-वादन रात्रि के तीसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु बसन्त ऋतु में इसका प्रयोग किसी भी समय किया जा सकता है। आइए अब हम आपको राग ‘बसन्त बहार’ में निबद्ध एक मोहक खयाल सुनवाते हैं। वर्तमान में पटियाला घराना की गायकी के सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में आप यह अनूठी रचना सुनिए-

राग – बसन्त बहार : ‘आई बसन्त बहार रे...’: स्वर – पण्डित अजय चक्रवर्ती


अपनी आज की इस बैठक में आपको राग ‘बसन्त बहार’ की एक और अनूठी प्रस्तुति सुनवाने का लोभ संवरण मैं नहीं कर पा रहा हूँ। गत वर्ष २० अप्रैल के दिन पुणे में एक महत्त्वकांक्षी सांगीतिक अनुष्ठान आयोजित हुआ था। सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर जी के सम्मुख देश भर से जुटे २७५० शास्त्रीय गायक कलासाधकों ने जाने-माने गायक बन्धु पण्डित राजन और साजन मिश्र के नेतृत्व में राग ‘बसन्त बहार’, तीनताल में निबद्ध एक बन्दिश समवेत स्वर में प्रस्तुत किया था। यह प्रस्तुति ‘अन्तर्नाद’ संस्था की थी, जिसके लिए २७,००० वर्गफुट आकार का मंच बनाया गया था। आकाश तक गूँजती यह रचना बनारस के संगीतविद पण्डित बड़े रामदास की थी। लखनऊ के भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय के गायन-शिक्षक विकास तैलंग जी ने इस विशाल सांगीतिक अनुष्ठान का विवरण देते हुए बताया कि प्रस्तुति में उनके दो विद्यार्थी रंजना अग्रहरि और अभिनव शर्मा भी प्रतिभागी थे। आइए इसी अनूठी प्रस्तुति का रसास्वादन करते हुए इस अंक को यहीं विराम देते हैं।

राग – बसन्त बहार : ‘माँ बसन्त आयो री...’: स्वर – पण्डित राजन-साजन मिश्र व २७५० समवेत स्वर 




आज की पहेली



ऊपर दिये गए आडियो क्लिप के द्वारा आपको लोकगीत का एक अंश सुनवाया गया है। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।

१ - इस चर्चित लोक-गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमें उनका नाम बताइए।

२ - यह लोकगीत किस अवसर पर गाया जाता है?

आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६०वें अंक में सम्मान के साथ प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ५६ वें अंक में हमने आपको राग बहार पर आधारित एक फिल्मी गीत- ‘सकल वन पवन चलत पुरवाई...’ सुनवा कर आपसे फिल्म का नाम और संगीतकार का नाम पूछा था, जिसका क्रमशः सही उत्तर है, ममता और रोशन। दोनों प्रश्न का सही उत्तर इन्दौर की क्षिति जी ने ही दिया है। पटना की अर्चना टण्डन जी ने फिल्म का नाम तो सही लिखा, किन्तु संगीतकार को पहचानने में भूल कर बैठीं। इन्हें रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से बधाई। इसी के साथ लखनऊ के संगीत शिक्षक डॉ. सुनील पावगी ने फिल्म-संगीत के माध्यम से रागों की पहचान कराने के हमारे इस प्रयास की सराहना की है। क्षिति जी को पण्डित भीमसेन जोशी द्वारा प्रस्तुत राग बसन्त की बन्दिश और लखनऊ के डॉ. पी.के. त्रिपाठी को फिल्म स्त्री का गीत बहुत पसन्द आया। लुधियाना के करणवीर सिंह जी और कानपुर के अवतार सिंह जी ने रेडियो प्लेबैक इण्डिया के इस प्रयास को संगीत के विद्यार्थियों और सामान्य श्रोताओ के लिए ज्ञानवर्धक माना। आप सभी श्रोताओं-पाठको को अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आभार।

झरोखा अगले अंक का

हमारी आज की पहेली से आपको यह अनुमान हो ही गया होगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ का आगामी अंक लोक संगीत पर केन्द्रित होगा। आपको यह भी स्मरण होगा कि लोकगीतों के अन्तर्गत इन दिनों हम आपके लिए संस्कार-गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। इस श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में हम आपकी ही फरमाइश पर अवधी, भोजपुरी और राजस्थानी गीत प्रस्तुत करेंगे। विश्वास है, आप अगले रविवार की गोष्ठी में अवश्य शामिल होंगे।

कृष्णमोहन मिश्र

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