Wednesday, August 31, 2011

शरमाये काहे, घबराये काहे, सुन मेरे राजा...नशीली अंदाज़ और चुलबुलापन शमशाद की आवाज़ का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 734/2011/174



'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! आज 'ईद-उल-फितर' का पाक़ मौका है। इस मौक़े पर मैं, अपनी तरफ़ से, और पूरे 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से आप सभी को दिली मुबारक़बाद देता हूँ। यह त्योहार आप सब के जीवन में ढेरों ख़ुशियाँ लेकर आएँ, यही परवर दिगारे आलम से दरख्वास्त है। एक तरफ़ ईद की ख़ुशियाँ हों, और दूसरी तरफ़ हो शमशाद बेगम की खनकती आवाज़ का जादू, तो फिर जैसे सोने पे सुहागा वाली बात है, क्यों है न? तो चलिए 'बूझ मेरा क्या नाव रे' शृंखला की चौथी कड़ी शुरु की जाए। दोस्तों, आजकल फ़िल्मों में आइटम नंबर का बड़ा चलन हो गया है। शायद ही कोई ऐसी फ़िल्म बनती है जिसमें इस तरह का गीत न हो। लेकिन यह परम्परा आज की नहीं है, बल्कि पचास के दशक से ही चली आ रही है। आज जिस तरह से कुछ निर्दिष्ट गायिकाओं से आइटम सॉंग गवाये जाते हैं, उस ज़माने में भी वही हाल था। और उन दिनों इस जौनर में शीर्ष स्थान शमशाद बेग़म का था। बहुत सी फ़िल्में ऐसी बनीं, जिनमें मुख्य नायिका का पार्श्वगायन किसी और गायिका नें किया, जबकि शमशाद बेगम से कोई ख़ास आइटम गीत गवाया गया। आज की कड़ी में आप सुनेंगे दादा सचिन देव बर्मन की धुन पर शमशाद जी की मज़ाहिया आवाज़-ओ-अंदाज़। मुझे तो ऐसा अनुभव होता है कि उस ज़माने में किशोर कुमार जिस तरह की कॉमेडी अपने गीतों में करते थे, गायिकाओं में, और इस शैली में उन्हें टक्कर देने के लिए केवल एक ही नाम था, और वह था शमशाद बेगम का। १९५१ में 'नवकेतन' की फ़िल्म आई थी 'बाज़ी', जिसमें मुख्य गायिका के रूप में गीता रॉय नें अपनी आवाज़ दीं और एक से एक लाजवाब गीत फ़िल्म को मिले, जिनमें शामिल हैं "सुनो गजर क्या गाये", "तदबीर से निगड़ी हुई तक़दीर बना ले", "देख के अकेली मोहे बरखा सताये", "ये कौन आया", "आज की रात पिया दिल ना तोड़ो"। इन कामयाब और चर्चित गीतों के साथ साथ इस फ़िल्म में एक गीत शमशाद बेगम का भी था, जिसनें भी ख़ूब मकबूलीयत हासिल की उस ज़माने में। "शरमाये काहे, घबराये काहे, सुन मेरे राजा, ओ राजा, आजा आजा आजा", इस गीत में उन्होंने न केवल अपनी गायकी का लोहा मनवाया, बल्कि अजीब-ओ-ग़रीब हरकतों से, तरह तरह की आवाज़ें निकालकर कॉमेडी का वह नमूना पेश किया जो उससे पहले किसी गायिका नें शायद ही की होगी। और इसी वजह से आज की कड़ी के लिए हमने इस गीत को चुना है। साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ यह गीत है।



दोस्तों, आज के प्रस्तुत गीत में शमशाद जी भले ही हमसे ना घबराने और ना शरमाने की सीख दे रही हैं, लेकिन हक़ीक़त यह भी है कि वो ख़ुद मीडिया से दूर भागती रहीं, पब्लिक फ़ंक्शन्स में वो नहीं जातीं, और यहाँ तक कि अपना पहला स्टेज शो भी पचास वर्ष की आयु होने के बाद ही उन्होंने दिया था। शमशाद जी तो सामने नहीं आतीं, लेकिन उनके गाये गीतों के रीमिक्स आज भी बाज़ार में छाये हैं। कैसा लगता है उनको? "मुझे रीमिक्स से कोई शिकायत नहीं है। आज शोर शराबे का ज़माना है, रीदम का ज़माना है, बच्चे लोग ऐसे गाने सुन कर ख़ुश होते हैं, झूमते हैं। मुझे भी अच्छा लगता है, पर कोई इन गीतों में हमारा नाम भी तो लें! लोग जब तक मुझे याद करते हैं, जब तक मेरे गाने बजाये जाते हैं, मैं ज़िंदा हूँ।" शमशाद जी के गाये गीत हमेशा ज़िंदा रहेंगे इसमें कोई शक़ नहीं है। तीन दशकों तक उन्होंने फ़िल्म-संगीत जगत में राज किया है और उनकी आवाज़ की खासियत ही यह है कि उनकी आवाज़ की ख़ुद की अलग पहचान है, खनक है, जो किसी अन्य गायिका से नहीं मिलती, और इसलिए उनकी प्रतियोगिता भी अपने आप से ही रही है। शमशाद जी के गाये ज़्यदातर गानें चर्चित हुए। मास्टर ग़ुलाम हैदर, नौशाद, ओ.पी. नैयर, सी. रामचन्द्र जैसे संगीतकारों नें उनकी आवाज़ को नई दिशा दी, और साज़ और आवाज़ के इस सुरीले संगम से उत्पन्न हुआ एक से एक कामयाब, सदाबहार गीत। आइए आज का सदाबहार गीत सुना जाये, लेकिन संगीतकार हैं दादा बर्मन।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. इस गीत के संगीतकार वो हैं जिन्होंने शमशाद की आवाज़ को "टेम्पल बेल" का नाम दिया था.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. एक अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है - "इरादे"



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

गीत किस अभिनेत्री पर है फिल्माया गया - २ अंक

फिल्म का नाम - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

क्षिति जी बहुत दिनों में दिखी कल, सही जवाब के साथ, अमित जी और इंदु जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

हरकीरत हीर के मजमुआ-ए-नज़्म 'दर्द की महक' का विमोचन

कविताप्रेमियो,

आप सभी को ईद की बधाइयाँ!

आज कविता की दुनिया की रुहानी-क़लम अमृता प्रीतम की जयंती है। अमृता अपनी रचनाओं में एक ख़ास तरह की रुमानियत और कोर-संवेदनशीलता के लिए पहचानी जाती हैं। कुछ इसी तरह की रचनाधर्मिता युवा कवयित्री हरकीरत हीर की कविताओं में दृष्टिगोचर होती है। और कितना सुखद संयोग है कि आज ही हरकीरत का भी जन्मदिन है। हरकीरत खुद के अमृता से इस संयोग को चित्रित करते हुए कहती हैं- "...वह अमृता जिसकी आत्मा का इक-इक अक्षर हीर के ज़िस्म में मुस्कुराता है ...जिसकी इक-इक सतर हीर की तन्हा रातों में संग रही है..."

नज़्मों से निर्मित उसी हरकीरत की नज़्मों का एक संग्रह 'दर्द की महक' का प्रकाशन हिन्द-युग्म ने किया है। और अमृता की जयंती, हरकीरत के जन्मदिन और ईद के इस महान संयोग पर 'दर्द की महक' का ऑनलाइन विमोचन कर रहा है।


(यहाँ से फीटा काटकर विधिवत लोकार्पण करें)

'दर्द की महक' से अमृता के जन्मदिन को समर्पित एक नज़्म

उसने कहा है अगले जन्म में तू फ़िर आएगी मोहब्बत का फूल लिए

रात ....
बहुत गहरी बीत चुकी है
मैं हाथों में कलम लिए
मग्मूम सी बैठी हूँ ....
जाने क्यूँ ....
हर साल ...
यह तारीख़
यूँ ही ...
सालती है मुझे.....


पर तू तो ...
खुदा की इक इबारत थी
जिसे पढ़ना ...
अपने आपको
एक सुकून देना है ...


अँधेरे मन में ...
बहुत कुछ तिड़कता है
मन की दीवारें
नाखून कुरेदती हैं तो...
बहुत सा गर्म लावा
रिसने लगता है ...

सामने देखती हूँ
तेरे दर्द की ...
बहुत सी कब्रें...
खुली पड़ी हैं...
मैं हाथ में शमा लिए
हर कब्र की ...
परिक्रमा करने लगती हूँ ....

अचानक
सारा के खतों पर
निगाह पड़ती है....
वही सारा ....
जो कैद की कड़ियाँ खोलते-खोलते
कई बार मरी थी .....
जिसकी झाँझरें कई बार
तेरी गोद में टूटी थीं ......
और हर बार तू
उन्हें जोड़ने की...
नाकाम कोशिश करती.....
पर एक दिन
टूट कर...
बिखर गयी वो ....

मैं एक ख़त उठा लेती हूँ
और पढने लगती हूँ .......
"मेरे बदन पे कभी परिंदे नहीं चहचहाये
मेरी सांसों का सूरज डूब रहा है
मैं आँखों में चिन दी गई हूँ ...."

आह.....!!
कैसे जंजीरों ने चिरागों तले
मुजरा किया होगा भला ....??
एक ठहरी हुई
गर्द आलूदा साँस से तो
अच्छा था .....
वो टूट गयी .......

पर उसके टूटने से
किस्से यहीं
खत्म नहीं हो जाते अमृता ...
जाने और कितनी सारायें हैं
जिनके खिलौने टूट कर
उनके ही पैरों में चुभते रहे हैं ...

मन भारी सा हो गया है
मैं उठ कर खिड़की पर जा खड़ी हुई हूँ
कुछ फांसले पर कोई खड़ा है ....
शायद साहिर है .. .....
नहीं ... नहीं ...... .
यह तो इमरोज़ है .....
हाँ इमरोज़ ही तो है .....
कितने रंग लिए बैठा है . ...
स्याह रात को ...
मोहब्बत के रंग में रंगता
आज तेरे जन्मदिन पर
एक कतरन सुख की
तेरी झोली डाल रहा है .....

कुछ कतरने और भी हैं
जिन्हें सी कर तू
अपनी नज्मों में पिरो लेती है
अपने तमाम दर्द .... ...

जब मरघट की राख़
प्रेम की गवाही मांगती है
तो तू...
रख देती है
अपने तमाम दर्द
उसके कंधे पर ...
हमेशा-हमेशा के लिए ....
कई जन्मों के लिए .....

तभी तो इमरोज़ कहते हैं ....
तू मरी ही कहाँ है ....
तू तो जिंदा है .....
उसके सीने में....
उसकी यादों में .....
उसकी साँसों में .....
और अब तो ....
उसकी नज्मों में भी...
तू आने लगी है ....

उसने कहा है ....
अगले जन्म में
तू फ़िर आएगी ....
मोहब्बत का फूल लिए ....
जरुर आना अमृता
इमरोज़ जैसा दीवाना
कोई हुआ है भला ......!!

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Tuesday, August 30, 2011

ना बोल पी पी मोरे अंगना, ओ पंछी जा रे जा...एक अंदाज़ ये भी शमशाद का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 733/2011/173



मशाद बेगम के गाये गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे' की आज है तीसरी कड़ी। कुछ वर्ष पहले वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के नेतृत्व में विविध भारती की टीम पहुँची थी शमशाद जी के पवई के घर में, और उनसे लम्बी बातचीत की थी। उसी बातचीत का पहला अंश कल हमनें पेश किया था, आइए आज उसी जगह से बातचीत के कुछ और अंश पढ़ें।



शमशाद जी: मैंने मास्टरजी (ग़ुलाम हैदर) से फिर कहा कि दूसरा गाना गाऊँ? उन्होंने कहा कि नहीं, इतना ठीक है। फिर १२ गानों का ऐग्रीमेण्ट हो गया, हर गाने के लिए १२ रुपये। मास्टरजी नें उन लोगों से कहा कि इस लड़की को वो सब फ़ैसिलिटीज़ दो जो सब बड़े आर्टिस्टों को देते हो। उस ज़माने में ६ महीनों का कॉनट्रैक्ट हुआ करता था, ६ महीने बाद फिर रेकॉर्डिंग् वाले आ जाते थे। सुबह १० से शाम ५ बजे तक हम रिहर्सल किया करते म्युज़िशियन्स के साथ, मास्टरजी भी रहते थे। आप हैरान होंगे कि उन्हीं के गाने गा गा कर मैं आर्टिस्ट बनी हूँ।



कमल जी: आप में भी लगन रही होगी?



शमशाद जी - मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब कहा करते थे कि इस लड़की में गट्स है, आवाज़ भी प्यारी है। शुरु में हर गीत के लिए १२ रूपए देते थे। पूरा सेशन ख़त्म होने पर मुझे ५००० रूपए मिले। जब रब मेहरबान तो सब मेहरबान! (यहाँ शमशाद जी भावुक हो जाती हैं और रो पड़ती हैं) जब रेज़ल्ट निकलता है तो फिर क्या कहने!



कमल जी: आप फिर रेडियो से भी जुड़ गईं, इस बारे में कुछ बतायें।



शमशाद जी: जब मैंने गाना शुरु किया था तब रेडियो नहीं था, सिर्फ़ ग्रामोफ़ोन कंपनीज़ थीं, और बहुत महंगा भी था, १०० रूपए कीमत थी ग्रामोफ़ोन की और हर रेकॉर्ड की कीमत होती थी २.५० रुपये। दो साल बाद जब हम तैयार हो गए, तब रब ने रेडियो खोल दिया और मैं पेशावर रेडियो में शामिल हो गई।



कमल जी: रेडियो में किसी प्रोड्युसर को आप जानती थीं, आपको मौका कैसे मिला?



शमशाद जी: उस वक़्त प्रोड्युसर नहीं, स्टेशन डिरेक्टर होते थे, उनके लिए गाने वाले कहाँ से आयेंगे? वो ग्रामोफ़ोन कंपनी वालों से पूछते थे गायकों के बारे में। जिएनोफ़ोन कंपनी से भी उन्होंने पूछा और इस तरह से मेरा नाम उन्हें मिल गया। मैंने पेशावर रेडियो से शुरुआत की, पश्तो, परशियन, हिंदी, उर्दू और पंजाबी प्रोग्राम करने लगी। फिर लाहौर और दिल्ली रेडियो से भी जुड़ी।



और दोस्तों, जुड़े हुए तो हम हैं पिछले ६ दशकों से शमशाद बेगम के गाये हुए गीतों के साथ। उनकी आवाज़ में जो आकर्षण है, रौनक है, जो चंचलता है, जो शोख़ी है, उसके जादू से कोई भी नहीं बच सकता। तीन दशकों में उनकी खनकती आवाज़ नें सुनने वालों पर जो असर किया था, वह असर आज भी बरकरार है। आइए आज की कड़ी में भी एक और असरदार गीत सुनते हैं १९४९ की फ़िल्म 'दुलारी' से। ग़ुलाम हैदर और राम गांगुली के बाद, आज बारी संगीतकार नौशाद साहब की। जैसा कि पहली कड़ी में हमनें ज़िक्र किया था कि नौशाद साहब के मुताबिक़ शमशाद जी की आवाज़ में पंजाब के पाँच दरियाओं की रवानी है। आइए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत को सुनते हुए नौशाद साहब के इसी बात को महसूस करने की कोशिश करते हैं। नौशाद साहब को याद करते हुए शमशाद जी नें अपनी 'जयमाला' में कहा था, "संगीतकार नौशाद साहब के साथ मैंने कुछ १६-१७ फ़िल्मों में गाये हैं जैसे 'शाहजहाँ', 'दर्द', 'दुलारी', 'मदर इण्डिया', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'दीदार', 'अनमोल घड़ी', 'आन', 'बैजु बावरा', वगेरह। मेरे पास उनके ख़ूबसूरत गीतों का ख़ज़ाना है। लोग आज भी उनके संगीत के शैदाई हैं। मेरे स्टेज शोज़ में भी लोग ज़्यादातर उनके गीतों की ही फ़रमाइश करते हैं।" लीजिए, नौशाद साहब और शमशाद जी, इन दोनों को समर्पित आज का यह गीत सुनते हैं।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. मुख्या रूप से इस फिल्म में गीता रॉय के गाये गीत थे.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. एक अंतरे में "दिलवाले"- "मतवाले" का काफिया है



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

इस गीत के संगीतकार - २ अंक

फिल्म का नाम - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

एक बार फिर अमित जी को टक्कर मिल मात्र इंदु जी से, अरे भाई बाकी धुरंधर कहाँ है ? या सवाल ज्यादा मुश्किल लग रहे हैं ? खैर इंदु जी आपके जवाब गलत हों संभावना कम ही होती है :)

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, August 29, 2011

काहे कोयल शोर मचाये रे....एक और खनकता गीत शमशाद की आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 732/2011/172



'बूझ मेरा क्या नाव रे' - पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है। जैसा कि कल हमने वादा किया था कि शमशाद जी के बचपन और शुरुआती दौर के बारे में हम विस्तार से चर्चा करेंगे, तो आइए आज प्रस्तुत है विविध भारती द्वारा ली गई एक साक्षात्कार के अंश। शमशाद जी से बातचीत कर रहे हैं वरिष्ठ उद्‍घोषक श्री कमल शर्मा:



शमशाद जी: मेरे को गाना नहीं सिखाया किसी ने, ग्रामोफ़ोन पर सुन सुन कर मैंने सीखा। मेरे घरवाले ने एक पैसा नहीं खर्च किया। लड़कों का ही फ़िल्मों में गाना बजाना अच्छा नहीं माना जाता था, लड़कियों की क्या बात थी! मैं गाने लगती घर में तो सब चुप करा देते थे कि क्या हर वक़्त चैं चैं करती रहती है!



कमल जी: शमशाद जी, आपनें किस उम्र से गाना शुरु किया था?



शमशाद जी - आठ साल से गाना शुरु किया, जब से होश आया तभी से गाती थी।



कमल जी - आप जिस स्कूल में पढ़ती थीं, वहाँ आपके म्युज़िक टीचर ने आपका हौसला बढ़ाया होगा?



शमशाद जी - उन्होंने कहा कि आवाज़ अच्छी है, पर घरवालों ने इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया। मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी, वह ब्रिटिश ने बनाया था, उर्दू ज़बान में, मैंने पाँचवी स्टैण्डर्ड तक पढ़ाई की। हम चार बहनें और तीन भाई थे। एक मेरा चाचा था, एक उनको गाने का शौक था। वो कहते थे कि हमारे घर में यह लड़की आगे चलकर अच्छा गायेगी। वो मेरे बाबा के सगे भाई थे। वो उर्दू इतना अच्छा बोलते थे कि तबीयत ख़ुश हो जाती, लगता ही नहीं कि वो पंजाब के रहनेवाले थे। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौकीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। लेकिन वो मेरे गाने से डरते थे। वो कहते कि चार चार लड़कियाँ हैं घर में, तू गायेगी तो इन सबकी शादी करवानी मुश्किल हो जायेगी।



कमल जी: शमशाद जी, आपकी गायकी की फिर शुरुआत कैसे और कब हुई?



शमशाद जी: मेरे उस चाचा ने मुझे जिएनोफ़ोन (Jien-o-Phone) कंपनी में ले गए, वो एक नई ग्रामोफ़ोन कंपनी आयी हुई थी। उस समय मैं बारह साल की थी। वहाँ पहुँचकर पता चला कि ऑडिशन होगा, उन लोगों ने तख़्तपोश बिछाया, हम चढ़ गए, उस पर बैठ गए (हँसते हुए)। वहीं पर मौजूद थे संगीतकार मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब। इतने कमाल के आदमी मैंने देखा ही नहीं था। वो मेरे वालिद साहब को पहचानते थे। वो कमाल के पखावज बजाते थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि आपके साथ कौन बजायेगा? मैंने कहा मैं ख़ुद ही गाती हूँ, मेरे साथ कोई बजानेवाला नहीं है। फिर उन्होंने कहा कि थोड़ा गा के सुनाओ। मैंने ज़फ़र की ग़ज़ल शुरु की, "मेरे यार मुझसे मिले तो...", एक अस्थाई, एक अंतरा, बस! उन्होंने मुझे रोक दिया, मैंने सोचा कि गये काम से, ये तो गाने ही नहीं देते! ये मैंने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि मैं प्लेबैक आर्टिस्ट बन जाऊँगी, मेरा इतना नाम होगा। मैं सिर्फ़ चाहती थी कि मैं खुलकर गाऊँ।



दोस्तों, शमशाद जी का कितना नाम हुआ, और कितना खुल कर वो गाईं, ये सब तो अब इतिहास बन चुका है, आइए अब बात करते हैं आज के गाने की। शृंखला की शुरुआत हमने कल की थी मास्टर ग़ुलाम हैदर के कम्पोज़िशन से। आज आइए सुनें संगीतकार राम गांगुली के संगीत निर्देशन में १९४८ की राज कपूर की पहली निर्मित फ़िल्म 'आग' से शमशाद जी का गाया फ़िल्म का एक बेहद लोकप्रिय गीत "काहे कोयल शोर मचाये रे, मोहे अपना कोई याद आये रे..."। गीतकार हैं बहज़ाद लखनवी और गीत फ़िल्माया गया है नरगिस पर। इस गीत में कुछ ऐसा जादू है कि गीत को सुनने वाला हर कोई अपनी यादों में खो जाता है, उसे भी कोई अपना सा याद आने लगता है। इस गीत के बारे में शमशाद जी नें कहा था, "राज कपूर अपनी पहली फ़िल्म 'आग' बना रहे थे। वे मेरे पास आये और कहा कि मैं पृथ्वीराज कपूर का बेटा हूँ। मैं कहा बहुत ख़ुशी की बात है। फिर उन्होंने कहा कि आपको मेरी फ़िल्म में गाना पड़ेगा। मैंने कहा गा दूँगी। इस फ़िल्म के सारे गानें बहुत ही मक़बूल हुए, संगीतकार थे राम गांगुली। इस फ़िल्म का एक गीत सुनिये।"







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. १९४९ की फिल्म है ये.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द युग्म से - "रुत अलबेली"



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

इस गीत के संगीतकार - २ अंक

फिल्म का नाम - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

वाह इंदु जी आपके क्या कहने, दादी आपकी उपस्तिथि लगनी चाहिए इस शृंखला की हर कड़ी में, और अमित जी को बधाई है :)



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, August 28, 2011

सावन के नज़ारे हैं....शमशाद बेगम की पहली फिल्म के एक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 731/2011/171



मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, स्वागत है आप सभी का इस सुरीले सफ़र में। कृष्णमोहन मिश्र जी द्वारा प्रस्तुत 'वतन के तराने' लघु शृंखला के बाद आज से एक नई शृंखला के साथ, मैं सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ हाज़िर हो गया हूँ। आज से शुरु होने वाली लघु शृंखला समर्पित है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की एक लाजवाब पार्श्वगायिका को। ये वो गायिका हैं दोस्तों जिनकी आवाज़ की तारीफ़ में संगीतकार नौशाद साहब नें कहा था कि इसमें पंजाब की पाँचों दरियाओं की रवानी है। उधर ओ. पी. नय्यर साहब नें इनकी शान में कहा था कि इस आवाज़ को सुन कर ऐसा लगता है जैसे किसी मंदिर में घंटियाँ बज रही हों। इस अज़ीम गुलुकारा नें कभी हमसे अपना नाम बूझने को कहा था, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि आज भी जब हम इनका गाया कोई गीत सुनते हैं तो इनका नाम बूझने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि इनकी खनकती आवाज़ ही इनकी पहचान है। प्रस्तुत है फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे'। शमशाद बेगम के गाये गीतों की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आज ६ दशक बाद भी उनके गाये हुए गीतों के रीमिक्स जारी हो रहे हैं। आइए इस शृंखला में उनके गाये गीतों को सुनने के साथ साथ उनके जीवन और करीयर से जुड़ी कुछ बातें भी जानें, और शमशाद जी के व्यक्तित्व को ज़रा करीब से जानने की कोशिश करें।



विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को सम्बोधित करते हुए शमशाद बेगम नें बरसों बरस पहले अपनी दास्तान कुछ यूं शुरु की थीं - "देश के रखवालों, आप सब को मेरी दुआएँ! मेरे लिए गाना तो आसान है, पर बोलना बहुत मुश्किल। समझ में नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरु करूँ! आप मेरे गानें अपने बचपन से ही सुनते चले आ रहे होंगे, पर आज पहली बार आप से बातें कर रही हूँ। जगबीती बयान करना मेरे लिये बहुत मुश्किल है। दास्तान यूं है कि मेरा जन्म लाहौर में १९१९ में हुआ। उस समय लड़कियों को जो ज़रूरी तालीम दी जाती थी, मुझे भी दी गई। गाने का शौक घर में किसी का भी नहीं था मेरे अलावा। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौक़ीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। मास्टर ग़ुलाम हैदर मेरे वालिद के अच्छे दोस्त थे। एक बार उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी और उनको मेरी आवाज़ पसंद आ गई। मास्टरजी नें एक रेकॉर्डिंग् कंपनी (jien-o-phone) के ज़रिये मेरा पहला रेकॉर्ड निकलवा दिया। १४ साल की उम्र में मेरा पहला गाना रेकॉर्ड हुआ जो था "हाथ जोड़ा लई पखियंदा ओये क़सम ख़ुदा दी चंदा"। उस रेकॉर्ड कंपनी नें फिर मेरे १०० रेकॉर्ड्स निकाले। १९३७ में मैं पेशावर रेडियो की आर्टिस्ट बन गई, जहाँ मैंने पश्तो, परशियन, हिंदी, उर्दू और पंजाबी में प्रोग्राम पेश किए। पर मैंने कभी संगीत की कोई तालीम नहीं ली। १९३९ में मैं लाहौर और फिर दिल्ली में रेडियो प्रोग्राम करने लगी। पंचोली जी नें पहली बार मुझे प्लेबैक का मौका दिया १९४० की पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' में, जिसमें मेरा गीत "आ सजना" काफ़ी हिट हुआ था। मेरी पहली हिंदी फ़िल्म थी पंचोली साहब की 'ख़ज़ांची'। उन्होंने मुझसे फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाये। यह फ़िल्म ५२ हफ़्तों से ज़्यादा चली।" दोस्तों, शमशाद जी नें बहुत ही कम शब्दों में अपने शुरुआती दिनों का हाल बयान कर दिया। लेकिन इतनी आसानी से हम भला संतुष्ट क्यों हों? इसलिये कल हम उनसे इन्ही दिनों के बारे में विस्तार से जानेंगे। लेकिन फ़िल्हाल सुना जाये शमशाद जी की पहली हिंदी फ़िल्म 'ख़ज़ांची' से उनका गाया यह गीत "सावन के नज़ारे हैं"। मास्टर ग़ुलाम हैदर का संगीत है, और गीत लिखा है वली साहब नें। १९४१ में बनी इस फ़िल्म को निर्देशित किया था मोती गिदवानी नें और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे एम. इस्माइल, रमोला और नारंग।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. एक बड़े निर्माता निर्देशक की पहली निर्मित फिल्म थी ये.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. मुखड़े में शब्द है - "याद"



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

इस गीत के संगीतकार - २ अंक

फिल्म का नाम - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

जी इंदु जी अमित जी अब १० से भी अधिक श्रृंखलाएं जीत चुके हैं. बधाई के हकदार तो हैं ही



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, August 27, 2011

तेरे नैनों के मैं दीप जलाऊँगा....नेत्र दान महादान, जिन्दा रखिये अपनी आँखों को सदा के लिए

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 56



'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नम्स्कार! दोस्तों, भगवान से इन्सान और पशुओं को जितनी भी अनमोल चीज़ें मिली हैं, उनमें सबसे अनमोल देन है आँखें। आँखें, जिनसे हम दुनिया को देखते हैं, अपने प्रियजनों को देखते हैं। अपने संतान को बड़ा होते देखने में जो सुख है, वह शायद सबसे सुखद अनुभूति है, और यह भी हम अपनी आँखों से ही देखते हैं। पर ज़रा सोचिए उन लोगों के बारे में जिनकी आँखों में रोशनी नहीं है, जो नेत्रहीन हैं। कितनी अन्धेरी, कितनी बेरंग होती होगी उनकी दुनिया, क्या इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं! पर मैं और आप अपने एक छोटे से प्रयास से कम से कम एक नेत्रहीन को नेत्र ज़रूर प्रदान कर सकते हैं। २५ अगस्त से ४ सितम्बर भारत में 'राष्ट्रीय नेत्रदान सप्ताह' के रूप में पालित किया जाता है। आइए आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में इसी पर चर्चा की जाए। चर्चा क्या दोस्तो, आइए आपको एक कहानी सुनाता हूँ जो मुझे इंटरनेट पर ही प्राप्त हुई थी। यह एक सत्य घटना है अनीता टेरेसा अब्राहम के जीवन की।



I don't remember my grandfather, as he passed away when I was three years old. He was known as a very terrorizing person. There was nobody in the town who did not know about his thundering anger. My father hardly remembers his father talking to his children or expressing some kind of affection or love towards them. He was always remembered as a person who gave blunt replies and didn't care about what other people felt. But I guess, eventually as he walked closer to his gray old days, he reformed himself to a sober person.



With the birth of his first grandchild (me), he became even more sober and sweet. My grandmother and father saw different changes, they started seeing a face they had never seen before. But my grandfather still remained very reserved. My first three years were with my grandparents, far away from my parents, who flew to Dubai for work. For my grandparents I was the child, God had gifted them in their old age, to pamper, love and caress. My grandmother cooked me all the possible food the three year old, could eat and my grandfather carried me everywhere this three year old girl could go. There was nothing this little fairy had missed in that small village.



Soon, the whole village knew this inseparable grandfather and granddaughter. There was never a moment one could see either of us alone. My grandfather loved me so much, that he wouldn't open his eyes in the morning without seeing this little fairy who taught the art of living.



After three long years, my parents came home, with a passport and a visa all ready for me to fly away. My grandparents though very hesitant and sad, were helpless and so had to let me go with my parents. Although they brought me up those three years, they had to accept the fact that I was only their grandchild and had to let me go with my parents. Never did I know, when I bid him good bye, I would part from him for life.



After that day, my grandfather went back to his old ways. He used to get angry and irritated even at the smallest creek of door. He spent his time all alone. He sat at the veranda with a confused stare on the plain floor. He missed his little fairy. He kept telling my grandmother that, they shouldn't have looked after me, maybe then he wouldn't be in this state!!



In a year's time, on a dreadful morning, the news of my grandfather's death reached us. Since I was a small girl, the reality of death was too complex for me to comprehend. But I knew that there was something very bad that happened and the next time I went home, I would never be able to run into those warm arms again.



After a year I came to know, that my grandfather had donated both his eyes to two blind people, who rejoiced in his name with the power of vision. Nobody in the family knew about it, except my uncle. While donating grandfather had told my uncle that he wanted to donate his eyes once he dies so that his eyes would still live to see his little fairy. Every time I think of that thought of my dear Grandfather, my eyes fill with tears.



I have met the two people who can now see because of his great deed. Though I don't know them, those eyes do smile at me. If my grandfather, who was a very rude and reserved man in others eyes, could do it, I think all of us can do it. Donate your eyes, you can make many witness the world of love.




इस कहानी को पढकर शायद आपकी आँखें भी मेरी तरह नम हो गई होंगी। अब इसके बाद कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं। अगर हमारे इस विशेषांक को पढ़कर आपमें भी नेत्रदान करने की इच्छा जागृत हुई है, तो इसे हम अपनी सफलता मानेंगे। आइए चलते चलते 'अनुराग' फ़िल्म का गीत सुनते हैं लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में। आनन्द बक्शी के बोल और सचिन देव बर्मन का संगीत। हम ख़ुद अपनी आँखों से दुनिया तो देखते ही हैं, पर क्यों न हम ऐसा कुछ कर जाएँ कि हमारे जाने के बाद हमारी आँखें किसी और के आँखों को रोशनी प्रदान करें। नेत्रदान असल में प्रेमदान, जीवनदान है, सबसे महत दान है। आप इस गीत का आनन्द लें और मुझे, यानि अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दें, नमस्कार!







और अब एक विशेष सूचना:



२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

तीर्थयात्रा - पंडित सुदर्शन

सुनो कहानी: पंडित सुदर्शन की "तीर्थयात्रा"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हरिशंकर परसाई का व्यंग्य "अपील का जादू" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं हिंदी और उर्दू के अमर साहित्यकार पंडित सुदर्शन की प्रसिद्ध कहानी "तीर्थयात्रा", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। यथार्थ से आदर्श का सन्देश देने वाले सुदर्शन जी की कहानियों का लक्ष्य समाज व राष्ट्र को सुन्दर व मजबूत बनाना है।

कहानी "तीर्थयात्रा" का कुल प्रसारण समय 18 मिनट 47 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।






“अब कोई दीन-दुखियों से मुँह न मोड़ेगा।”
~ सुदर्शन (मूल नाम: पंडित बद्रीनाथ भट्ट)
(1895-1967)


प्रेमचन्द, कौशिक और सुदर्शन, इन तीनों ने हिन्दी में कथा साहित्य का निर्माण किया है। ~ भगवतीचरण वर्मा (हम खंडहर के वासी)

पहली बार "हार का जीत" पढी थी, तब से ही इसके लेखक के बारे में जानने की उत्सुकता थी। दुःख की बात है कि हार की जीत जैसी कालजयी रचना के लेखक के बारे में जानकारी बहुत कम लोगों को है। गुलज़ार और अमृता प्रीतम पर आपको अंतरजाल पर बहुत कुछ मिल जाएगा मगर यदि आप पंडित सुदर्शन की जन्मतिथि, जन्मस्थान (सिआलकोट) या कर्मभूमि के बारे में ढूँढने निकलें तो निराशा ही होगी। मुंशी प्रेमचंद और उपेन्द्रनाथ अश्क की तरह पंडित सुदर्शन हिन्दी और उर्दू में लिखते रहे हैं। उनकी गणना प्रेमचंद संस्थान के लेखकों में विश्वम्भरनाथ कौशिक, राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि के साथ की जाती है। लाहोर की उर्दू पत्रिका हज़ार दास्ताँ में उनकी अनेकों कहानियां छपीं। उनकी पुस्तकें मुम्बई के हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय द्वारा भी प्रकाशित हुईं। उन्हें गद्य और पद्य दोनों ही में महारत थी। पंडित जी की पहली कहानी "हार की जीत" १९२० में सरस्वती में प्रकाशित हुई थी। मुख्य धारा के साहित्य-सृजन के अतिरिक्त उन्होंने अनेकों फिल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे हैं. सोहराब मोदी की सिकंदर (१९४१) सहित अनेक फिल्मों की सफलता का श्रेय उनके पटकथा लेखन को जाता है। सन १९३५ में उन्होंने "कुंवारी या विधवा" फिल्म का निर्देशन भी किया। वे १९५० में बने फिल्म लेखक संघ के प्रथम उपाध्यक्ष थे। वे १९४५ में महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित अखिल भारतीय हिन्दुस्तानी प्रचार सभा वर्धा की साहित्य परिषद् के सम्मानित सदस्यों में थे। उनकी रचनाओं में तीर्थ-यात्रा, पत्थरों का सौदागर, पृथ्वी-वल्लभ, बचपन की एक घटना, परिवर्तन, अपनी कमाई, हेर-फेर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। फिल्म धूप-छाँव (१९३५) के प्रसिद्ध गीत तेरी गठरी में लागा चोर, बाबा मन की आँखें खोल आदि उन्ही के लिखे हुए हैं। यदि आपके पास पण्डित सुदर्शन का कोई चित्र या रेखाचित्र हो तो कृपया हमारे साथ साझा कीजिये। धन्यवाद!
(निवेदक: अनुराग शर्मा)

कई दिन बीत गये पर हेमराज का बुखार नहीं उतरा।
(पंडित सुदर्शन की "तीर्थयात्रा" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें।
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3

#142nd Story, Teerth Yatra: Pt. Sudarshan/Hindi Audio Book/2011/23. Voice: Archana Chaoji

Friday, August 26, 2011

अपने हाथों करें 'अनुगूँज' का विमोचन

साहित्यप्रेमियो,

हिन्द-युग्म विगत 20 महीनों से प्रकाशन में सक्रिय है। हम अपने यहाँ से प्रकाशित पुस्तकों के ऑनलाइन विमोचन का अनूठा कार्यक्रम संयोजित करते हैं, जिससे हर पाठक लोकार्पण करने का सुख प्राप्त कर लेता है।

आज हम हिन्द-युग्म प्रकाशन की नवीनतम पुस्तक 'अनुगूँज' का ऑनलाइन विमोचन कर रहे हैं। इस पुस्तक में 28 कवियों की प्रतिनिधि कविताएँ संकलित हैं। संग्रह के लिए कविताओं का संकलन और संपादन रश्मि प्रभा ने किया है। रश्मि प्रभा संग्रह पर टिप्पणी करते हुए कहती हैं-

एक कदम के साथ मिलते क़दमों की गूँज अनुगूँज हिंदी साहित्य की साँसों को प्रकृति से जोड़ता है.... वैसे सच तो ये है कि हिंदी के बीज हम क्या लगायेंगे, हिंदी तो हमारा गौरव है- हिंदी साहित्य की जड़ें इतनी पुख्ता रही हैं कि इसे कितना भी काटो, पर इसके पनपने की क्षमता अक्षुण है .... हिन्दुस्तान की मिट्टी हमेशा उर्वरक रही है, बस बीज डालना है और उस पर उग आए अनचाहे विचारों को हटाना है- यही इन्कलाब अनुगूँज है और इसमें शामिल क़दमों को देखकर- साहित्य से जुड़े स्वर कह उठते हैं -

'नहीं है नाउम्मीद इकबाल अपनी किश्ते वीरां से
ज़रा नम हो तो यह मिट्टी बड़ी ज़रखेज है साकी'


इस मिट्टी पर उभरे कुछ पदचिन्ह साहित्य के अमरत्व को दुहराते हैं -

अंजना दयाल
अंजु चौधरी
अभिषेक 'निशांत'
आनन्द कुमार द्विवेदी
आशीष अवस्थी 'सागर'
एम वर्मा
किशोर खोरेन्द्र
देवेन्द्र कुमार शर्मा
निपुण पाण्डेय
नीलम पुरी
पूजा
प्रतीक महेश्वरी
बाबुषा कोहली
मुकेश कुमार सिन्हा
रश्मि प्रभा
राजेंद्र तेला 'निरंतर'
रामपति
वाणभट्ट
वाणी शर्मा
वीणा श्रीवास्तव
शोभना चौरे
शोभा सारड़ा
सत्यम शिवम
सरस्वती प्रसाद
सीमा सदा
सुमन सिन्हा
सुषमा आहुति
हेमंत कुमार दुबे

शब्दों की शंख ध्वनि, शब्दों के मंगलाचार में आइये इस 'अनुगूँज ' को हम अपनी अर्चना का स्पर्श दें ... खोलें द्वार .... आप सबका भावनाओं के इस मंदिर में स्वागत है ....


(यहाँ से फीटा काटकर विधिवत लोकार्पण करें)

पुस्तक का फेसबुक-पेज

Thursday, August 25, 2011

अब कोई गुलशन न उजड़े....एक आशावादी गीत आज के इस बदलते भारत की उथल पुथल में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 730/2011/170



शृंखला ‘वतन के तराने’ की समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। दोस्तों, स्वतन्त्रता की 64वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में यह श्रृंखला हमने उन बलिदानियों को समर्पित किया है, जिन्होने देश को विदेशी सत्ता से मुक्त कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इनके बलिदानों के कारण ही 15अगस्त, 1947 को विदेशी शासकों को भारत छोड़ कर जाना पड़ा। आज़ादी के 64वर्षों में हम किसी विदेशी सत्ता के गुलाम तो नहीं रहे, किन्तु स्वयं द्वारा रची गई अनेक विसंगतियों के गुलाम अवश्य हो गए हैं। इस गुलामी से मुक्त होने के लिए हमे अपने पूर्वजों के त्याग और बलिदान का स्मरण करते हुए राष्ट्र-निर्माण के लिए नए संकल्प लेने पड़ेंगे।



श्रृंखला की इस समापन कड़ी में हम एक ऐसे बलिदानी का परिचय आपके साथ बाँटना चाहेंगे जो महान पराक्रमी, अद्वितीय युद्धविशारद, कुशल वक्ता के साथ-साथ प्रबुद्ध शायर भी था। उस महान बलिदानी का नाम है रामप्रसाद ‘बिस्मिल’। प्रथम विश्वयुद्ध के समय देश को गुलामी से मुक्त कराने का एक प्रयास हुआ था, जिसे ‘मैनपुरी षड्यंत्र काण्ड’ के नाम से जाना गया था। इस अभियान में रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की सक्रिय भागीदारी थी, परन्तु पुलिस इन्हें पकड़ न सकी। 1921 में जब असहयोग आन्दोलन आरम्भ हुआ तब ‘बिस्मिल’ अशफाक़उल्ला के साथ आन्दोलन में कूद पड़े। उस दौर में उन्होने युवा पीढ़ी में स्वतन्त्रता के प्रति चेतना जागृत करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। असहयोग आन्दोलन स्थगित हो जाने के बाद ये लोग फिर अपने पुराने पथ पर लौट आए। युवा वर्ग इन्हें श्रद्धा और विश्वास से देखता था। नवयुवकों के सहयोग से ‘बिस्मिल’ क्रान्तिकारी संघ के कार्यों में तत्परता से जुट गए।



रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ एक अच्छे लेखक, कवि और वक्ता भी थे। उन्होने ‘मन की लहर’, ‘बोल्शेविकों की करतूत’ तथा ‘मैनपुरी षड्यंत्र का इतिहास’ नामक पुस्तकें लिखी। ‘अज्ञात’ छद्म नाम से वे ‘प्रभा’ और ‘प्रताप’ आदि पत्रों में उन्होने लेख भी लिखे। कुशल लेखक के साथ-साथ वे एक कुशल वक्ता भी थे। ‘काकोरी काण्ड’ में अंग्रेजों की अदालत में जिस तर्कपूर्ण ढंग से उन्होने अपना पक्ष रखा, उससे पूरी अंग्रेज़-सत्ता हतप्रभ रह गई। इस मुकदमे में ‘बिस्मिल’ को राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह के साथ फाँसी की सज़ा दी गई। सज़ा सुन कर अदालत में ही उन्होने ‘भारतमाता की जय’ और ‘भारतीय प्रजातन्त्र की जय’ के नारे लगाए और दो शे’र कहे-



‘हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मर जाने को,

जीते-जी हमसे छुड़ाया उसी काशाने को।

दरो-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं,

खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं।




19 दिसम्बर, 1927 के दिन इस वीर सेनानी को गोरखपुर जेल में फाँसी दी गई थी। फाँसी से पहले उन्होने रोज की तरह पूजा की और अपनी माँ के नाम पत्र लिखा। सिपाहियों ने चलने का इशारा किया और मुस्कुराते हुए ‘वन्देमातरम’ का जयघोष करते हुए फाँसी स्थल की ओर चल पड़े। चलते-चलते बुलन्द आवाज़ में ‘बिस्मिल’ ने यह शे’र कहे और ‘आज़ाद भारत की जय’ कहते हुए भारतमाता के चरणों में स्वयं को बलिदान कर दिया।



मालिक! तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे,

बाकी न मैं रहूँ,, न मेरी आरज़ू रहे।

जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे,

तेरा ही ज़िक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे।




दोस्तों भारत की स्वतन्त्रता के लिए यूँ तो असंख्य बलिदानियों ने अपने प्राणो की आहुतियाँ देकर देश को स्वतंत्र कराया था। इस श्रृंखला में हमने केवल दस बलिदानियों की चर्चा आपसे की है। देश के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर देने वाले इन क्रान्तिवीरों ने आज़ाद भारत की जैसी परिकल्पना की थी, वैसी ही परिकल्पना आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत में भी की गई है। आज हम आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुझे जीने दो’ का वह गीत सुनवाते हैं जिसमे एक समृद्ध भारत की परिकल्पना की गई है। समाज की मुख्य धारा से कटे डाकुओं के पुनर्वास की समस्या पर बनी इस फिल्म के संगीतकार जयदेव हैं और गीतकार हैं साहिर लुधियानवी। आप यह गीत सुनिए और हमें श्रृंखला ‘वतन के तराने’ से आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिये। रविवार की शाम एक नई श्रृंखला में फिर हम-आप मिलेंगे।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



अब बताएं इस सवाल का जवाब

के एल सहगल की प्रशंसक रही इस गायिका का जन्म अमृतसर पंजाब में हुआ था, इनका नाम बताएं ?



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

अमित जी एक और शृंखला जीतने की बधाई...



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, August 24, 2011

अपनी आजादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं - शकील ने लिखी दृढ संकल्प की गाथा इस गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 729/2011/169



‘ओल्ड इज गोल्ड’ पर जारी श्रृंखला ‘वतन के तराने’ की नौवीं कड़ी में एक और बलिदानी की अमर गाथा और अपनी आज़ादी की रक्षा का संकल्प लेने वाले एक प्रेरक गीत के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आपके सम्मुख उपस्थित हूँ। आज के अंक में हम आपको फिल्म जगत के जाने-माने शायर और गीतकार शकील बदायूनी का एक संकल्प गीत सुनवाएँगे और साथ ही स्वतन्त्रता संग्राम के एक ऐसे सिपाही का स्मरण करेंगे जिसे जीते जी अंग्रेज़ गिरफ्तार न कर सके। उस वीर सपूत को हम चन्द्रशेखर आज़ाद के नाम से जानते हैं।



लोगों ने आज़ाद को 1921 के असहयोग आन्दोलन से पहचाना। उन दिनों अंग्रेज़ युवराज के बहिष्कार का अभियान चल रहा था। काशी (वाराणसी) में पुलिस आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर रही थी। पुलिस ने एक पन्द्रह वर्षीय किशोर को पकड़ा और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। कम आयु देख कर मजिस्ट्रेट ने पहले तो चेतावनी देकर छोड़ दिया, किन्तु जब वह किशोर दोबारा पकड़ा गया तो मजिस्ट्रेट ने उसे 15 बेंतों की सजा दी। मजिस्ट्रेट के नाम पूछने पर उस किशोर ने ‘आज़ाद’ और निवास स्थान पूछने पर उसने उत्तर दिया था ‘जेलखाना’। यही किशोर आगे चलकर चन्द्रशेखर आज़ाद के नाम से जाना गया और क्रान्तिकारियों के प्रधान सेनापति के पद पर प्रतिष्ठित हुआ। असहयोग आन्दोलन से स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी की भूमिका अदा करने वाले चन्द्रशेखर आज़ाद आन्दोलन स्थगित हो जाने पर बहुत निराश हुए और सशस्त्र क्रान्ति के मार्ग पर बढ़ चले।



शीघ्र ही आज़ाद की भेंट प्रणवेशकुमार चटर्जी से हुई और वे ‘भारतीय प्रजातन्त्र संघ’ के सदस्य बन गए। संगठन में रह कर आज़ाद ने अपने साहस और अपने पावन चरित्र के बल पर कई महत्त्वपूर्ण अभियान का सफलता के साथ संचालन किया। 9अगस्त, 1925 को शाम का समय था, 8 डाउन पैसेंजर लखनऊ की ओर चली आ रही थी। गाड़ी अभी काकोरी स्टेशन चली थी कि अचानक चेन खींच कर रोक दी गई। दरअसल इस ट्रेन में सरकारी खजाना ले जाया जा रहा था, जिसे क्रान्तिकारियों ने लूट कर अंग्रेजों को सीधी चुनौती दी थी। ‘काकोरी षड्यंत्र काण्ड’ में शामिल क्रान्तिकारियों में से रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा दी गई थी। शेष क्रान्तिकारियों को आजीवन कारावास से लेकर पाँच वर्ष तक की कारावास की सजा दी गई थी। इस अभियान में चन्द्रशेखर आज़ाद भी सम्मिलित थे, किन्तु अंग्रेज़ उन्हे पकड़ न सके।



इस अभियान के बाद आज़ाद ने अप्रैल 1928 के साँडर्स को ‘जलियाँवाला बाग नरसंहार’ की सज़ा देने और ब्रिटिश संसद में बम फेकने के अभियान में सम्मिलित थे। (स्वतन्त्रता संग्राम के इन दोनों अभियानों की चर्चा हम इस श्रृंखला की छठी कड़ी में कर चुके हैं।) 1925 से 1931 तक क्रान्ति के जितने भी अभियान हुए, उन सब में आज़ाद की भूमिका प्रमुख थी। परन्तु आज़ाद सदा आज़ाद ही रहे। फरवरी 1931 में अपने एक विश्वासघाती साथी की गद्दारी से इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में सशस्त्र पुलिस द्वारा घेर लिये गए। उनके पिस्तोल में जब तक गोलियाँ थीं तब तक मुक़ाबला किया और जब एकमात्र गोली बच गई तो स्वयं अपने ऊपर चला ली। अंग्रेजों की गोली से मरने के बजाय आज़ाद ने आत्मघात कर लेना उचित समझा। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महानायक बलिदानी चन्द्रशेखर आज़ाद आजीवन आज़ाद ही रहे।



दोस्तों, आज हम आपको एक ऐसे गीतकार का देशभक्ति गीत सुनवाएँगे जिन्हें 1961 से 1963 तक लगातार तीन वर्षों तक वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ था। आज के गीतकार हैं; शकील बदायूनी और फिल्म है; ‘लीडर’। 1964 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीत निर्देशक नौशाद हैं और गीत के बोल हैं- ‘अपनी आज़ादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं...’। इस गीत में अपनी आज़ादी की रक्षा का संकल्प है और देश के दुश्मनों को चेतावनी। आइए सुनते हैं जोश से भरपूर यह गीत-







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - साहिर के हैं शब्द.

सूत्र २ - आज़ाद भारत की मधुर कल्पना है गीत में.

सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "गंगा" .



अब बताएं -

फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

गायक बताएं - २ अंक

संगीतकार बताएं - ३ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -





खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, August 23, 2011

है प्रीत जहाँ की रीत सदा....इन्दीवर साहब ने लिखा ये राष्ट गौरव गान

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 728/2011/168



देशभक्ति भावों से अभिमंत्रित गीतों की श्रृंखला ‘वतन के तराने’ की आठवीं कड़ी में हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं। आज हम आपसे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक ऐसे व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे, जिसने अपने बौद्धिक बल से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने आपसे चर्चा की थी कि 1951 में पेशवा बाजीराव का निधन हो गया था। उनके बाद अंग्रेजों ने दत्तक पुत्र नाना साहब को उत्तराधिकारी तो मान लिया, किन्तु पेंशन देना स्वीकार नहीं किया। अंग्रेजों की इस अन्यायपूर्ण कार्यवाही के विरुद्ध लार्ड डलहौजी को कई पत्र लिखे गए, किन्तु कोई परिणाम नहीं निकला। ऐसी स्थिति में उन्होने अपने चतुर वकील अजीमुल्ला खाँ को इंग्लैण्ड भेजा, ताकि वहाँ की अदालत में पेंशन के लिए मुकदमा दायर किया जा सके। आगे चल कर 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में अज़ीमुल्ला खाँ की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो गई थी। इंग्लैण्ड की अदालत में अज़ीमुल्ला खाँ, नाना साहब की पेंशन तो बहाल न करा सके, किन्तु इस मुकदमे के बहाने समृद्ध भारतीय परम्परा, बौद्धिक सम्पदा और संस्कृति का पूरे इंग्लैण्ड में भरपूर प्रचार किया। अपने सुदर्शन व्यक्तित्व और वाकपटुता के बल पर अज़ीमुल्ला खाँ शीघ्र ही इंग्लैण्ड के बुद्धिजीवी वर्ग में अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे।



इंग्लैण्ड में बात न बनी तो अज़ीमुल्ला ने वापस भारत लौटने का निश्चय किया। परन्तु वे इंग्लैण्ड से चल कर पहले रूस पहुँचे। वहाँ के शासक ज़ार से मिले और रूस की राजनैतिक स्थिति का अध्ययन किया। भारत लौट कर वे नाना साहब के प्रमुख सलाहकार बन गए। 1857 की क्रान्ति के लिए जब नाना साहब तीर्थयात्रा के बहाने क्रान्तिकारी शक्तियों को एकजुट करने निकले तो उनके साथ अज़ीमुल्ला खाँ भी थे। मंगल पाण्डेय के बलिदान के बाद विभिन्न स्थानों पर सैनिक छावनियों में क्रान्ति की ज्वाला धधकने लगी थी। कानपुर छावनी में 4 जून की रात तीन फायर का संकेत होते ही सिपाही अपनी-अपनी बैरक से बाहर निकल आए और नवाबगंज पहुँचकर नाना साहब,अज़ीमुल्ला खाँ और तात्या टोपे से जा मिले। यहाँ इन लोगों ने अंग्रेजों के खजाने पर कब्जा कर लिया। सुबह होने से पहले कानपुर अंग्रेजों के अधिकार से मुक्त हो चुका था।यह पूरी योजना अज़ीमुल्ला खाँ की थी।



अज़ीमुल्ला खाँ केवल कुशल योजनाकार ही नहीं, कुशल पत्रकार और शायर भी थे। प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम के दौरान उन्होने ‘पयाम-ए-आज़ादी’ नामक अखबार निकाला। इस अखबार के उग्र तेवर से अंग्रेज़ परेशान हो गए थे। इसके एक अंक में अज़ीमुल्ला खाँ का एक गीत प्रकाशित हुआ था जो शीघ्र ही क्रान्तिकारियों का ‘झण्डा-गीत’ बन गया। बाद में अंग्रेजों ने ‘पयाम-ए-आज़ादी’ के उस अंक को जब्त कर लिया और इस गीत पर प्रतिबन्ध लगा दिया। आइए, क्रान्ति के सिपाहियों में रक्त-संचार करने वाले और अपने देश के वैभव का गुणगान करने वाले ‘झण्डा-गीत’ के तेवर को देखा जाए-



हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा।

ये है हमारी मिल्कियत, जन्नत से भी प्यारा।

इसकी रूहानियत से रोशन है ये जग सारा।

कितना क़दीम, कितना नईम, सब दुनिया से न्यारा,

करती है जरखेज जिसे, गंग-ओ-जमुन की धारा।

ऊपर बर्फ़ीला पर्वत है पहरेदार हमारा,

नीचे साहिल पर बजता, सागर का नक्कारा।

आया फिरंगी दूर से, ऐसा मन्तर मारा,

लूटा दोनों हाथ से प्यारा वतन हमारा।

आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा,

तोड़ो गुलामी की जंजीरें बरसाओ अंगारा।

हिन्दू मुसलमान सिख हमारा भाई-भाई प्यारा,

यह है आज़ादी का झण्डा, इसे सलाम हमारा।




दोस्तों, यह अज़ीमुल्ला खाँ रचित सुप्रसिद्ध ‘झण्डा-गीत’ है, जिसके उग्र तेवर से डर कर अंग्रेजों ने इसे प्रतिबन्धित कर दिया था। और अब हम आपको एक ऐसा गीत सुनवाते हैं जिसमे भारत का गौरव-गान है। स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान अज़ीमुल्ला खाँ ने जिस प्रकार इंग्लैंड की धरती पर जाकर अपने देश का गुण-गान किया था, ठीक उसी प्रकार अभिनेता, लेखक और निर्देशक मनोज कुमार ने 1970 की अपनी फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ में एक गीत के माध्यम से भारतीय गौरव का प्रसार इंग्लैंड की धरती पर किया था। कवि इन्दीवर के गीत को कल्याणजी आनन्दजी ने संगीतबद्ध किया है और इसे महेन्द्र कपूर ने स्वर दिया है। लीजिए, आप भी सुनिए देश के इस गौरव-गान को-







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - गीत के गीतकार को लगातार ३ वर्षों को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर प्राप्त हुआ था साठ के दशक में.

सूत्र २ - संगीतकार वो हैं जिनके साथ इन्होने सबसे अधिक काम किया है.

सूत्र ३ - पहले अंतरे में शब्द है -"जन्नत" .



अब बताएं -

गीतकार बताएं - ३ अंक

गायक बताएं - २ अंक

संगीतकार बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

इंदु जी आपको वापस देखकर बेहद बेहद खुशी हुई आशा है अब आप स्वस्थ लाभ पा चुकी होंगी पूरी तरह. इश्वर आपको लंबी उम्र दे. और हाँ हमारे रेडियो को शोर तो न कहिये, बहुत मेहनत करते हैं इसके पीछे, वैसे थोडा सा ढूंढिए इसे बंद करने का ओप्शन भी आपको मिल जायेगा :)



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सीमा सिंघल के कविता-संग्रह 'अर्पिता' का विमोचन अपने कर-कमलों द्वारा करें

सभी साहित्यप्रेमियों को जन्माष्टमी की बधाइयाँ!

आज हम इस अवसर पर हिन्द-युग्म प्रकाशन की नवीनतम पुस्तक 'अर्पिता' का ऑनलाइन विमोचन कर रहे हैं। यह पुस्तक युवा कवयित्री सीमा सिंघल का प्रथम काव्य-संग्रह है। चूँकि हिन्द-युग्म का यह मंच ज्यादा बोलने-सुनने और कम लिखने का है। इसलिए हम पुस्तक पर अधिक कलम न चलाकर, सर्वप्रथम तो आपको विमोचन का अवसर प्रदान करते हैं। उसके पश्चात अर्चना चावजी की आवाज़ में पुस्तक पर उनके विचार जानते हैं और उनकी आवाज़ में चुनिंदा कविताएँ सुनते हैं।

पहले यहाँ से फीटा काटकर विधिवत लोकार्पण करें।



अब नीचे के प्लेयर से अर्चना जी की आवाज़ में पुस्तक-चर्चा सुनें।

Monday, August 22, 2011

वतन पे जो फ़िदा होगा....जब आनंद बख्शी की कलम ने स्वर दिए मंगल पाण्डेय की कुर्बानी को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 727/2011/167



‘ओल्ड इज गोल्ड’ पर जारी श्रृंखला ‘वतन के तराने’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। दोस्तों, इस श्रृंखला में देशभक्ति से परिपूर्ण गीतों के माध्यम से हम अपने उन पूर्वजों का स्मरण कर रहे हैं, जिनके त्याग और बलिदान के कारण आज हम उन्मुक्त हवा में साँस ले रहे हैं। आज के अंक में हम 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के नायक और प्रथम बलिदानी मंगल पाण्डेय के अदम्य साहस और आत्मबलिदान की चर्चा करेंगे, साथ ही गीतकार आनन्द बक्शी का इन्हीं भावों से ओतप्रोत एक प्रेरक गीत भी सुनवाएँगे।



कानपुर के बिठूर में निर्वासित जीवन बिता रहे पेशवा बाजीराव द्वितीय का निधन 14जनवरी, 1851 को हो गया था। उनके दत्तक पुत्र नाना साहब को पेशवा का पद प्राप्त हुआ। अंग्रेजों ने नाना साहब को पेशवा बाजीराव का वारिस तो मान लिया था, किन्तुपेंशन देना स्वीकार नहीं किया। तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति के जानकार नाना साहब अन्दर ही अन्दर अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति की योजना बनाने लगे। तीर्थयात्रा के बहाने उन्होने स्थान-स्थान पर अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति के लिए लोगों को संगठित करना प्रारम्भ कर दिया। दूसरी ओर तात्या टोपे ने अंग्रेजों की फौज के भारतीय सिपाहियों के बीच अपनी पैठ बना ली और उन्हें भी सशस्त्र क्रान्ति के लिए तैयार कर लिया। अंग्रेजों को इस महाक्रान्ति की भनक भी नहीं थी। ठीक ऐसे ही समय एनफ़िल्ड राइफलों में प्रयोग की जाने वाली कारतूसों की खोल पर गाय और सूअर की चर्वी मिलाने के प्रसंग ने भारतीय सैनिकों को उद्वेलित कर दिया। इस घटना के बाद भी अंग्रेज़ बेखबर थे। इधर क्रान्ति की तिथि 31मई, 1857 निश्चित कर गुप्त रूप से पूरे देश में सूचना दे दी गई।



बंगाल के बैरकपुर छावनी में 24वीं पलटन का एक सिपाही था- मंगल पाण्डेय। 29मार्च,1857 को परेड के दौरान एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में बन्दूक लेकर पंक्ति से बाहर निकला और अन्य सिपाहियों को धर्मयुद्ध में शामिल होने का आह्वान करने लगा। सूचना मिलते ही अंग्रेज़ मेजर ह्यूसन आया और वहाँ खड़े अन्य सिपाहियों को मंगल पाण्डेय को गिरफ्तार करने का आदेश दिया, किन्तु कोई भी सिपाही आगे न बढ़ा। उत्तेजित मंगल पाण्डेय ने निशाना साध कर 1857 क्रान्ति की पहली गोली मेजर ह्यूसन पर चला दी और क्रान्ति की वेदी पर पहली बलि चढ़ गई। कुछ ही क्षण में लेफ्टिनेंट बाघ और सार्जेंट हडसन वहाँ आए। मंगल पाण्डेय ने एक तोप की आड़ लेकर इन पर भी गोलियों की बौछार कर दी। एक गोली लेफ्टिनेंट बाघ के घोड़े को लगी और वह वहीं गिर पड़ा। अचानक मंगल पाण्डेय ने तलवार निकली और द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकारा। तलवार-युद्ध में दोनों अंग्रेज़ अधिकारी शिथिल पड़ने लगे और दोनों घटनास्थल से भागने में ही अपनी भलाई समझी। अब जनरल हियरसे वहाँ आया और अन्य सिपाहियों को मंगल पाण्डेय को पकड़ने का आदेश दिया, परन्तु इस बार भी उन्होने उत्तर दिया- ‘गिरफ्तार करना तो दूर, हम इस पवित्र ब्राह्मण को हाथ भी नहीं लगाएंगे’। शरीर पर लगे चोटों और द्वन्द्वयुद्ध की शिथिलता के कारण मंगल पाण्डेय भी निढाल होता जा रहा था। जनरलहियरसे या किसी अंग्रेज़ की गोली से मरने अथवा अंग्रेजों की कैद में मरने के बजाय उसने आत्मघात कर देश पर बलिदान हो जाना उचित समझा। उसने बन्दूक अपनी ओर कर गोली चला दी। गोली सीने के बजाय मंगल पाण्डेय की भुजाओं को छेदती हुई निकल गई और वह अचेत होकर गिर पड़ा। उसे गिरफ्तार कर कोर्ट मार्शल किया गया और 8अप्रैल, 1857 को फाँसी की सजा सुनाई गई।



एक साधारण सिपाही के इस दुस्साहस से जनमानस में और अंग्रेजों की फौज में भी मंगल पाण्डेय के प्रति इतनी श्रद्धा हो गई थी कि बैरकपुर छावनी का कोई भी जल्लाद फाँसी देने को तैयार नहीं था। अन्ततः अंग्रेजों को कलकत्ता (अब कोलकाता) से चार जल्लादों को बुलाना पड़ा। 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के इस पहले बलिदान की गाथा देश भर की छावनियों में तेजी से फ़ेल गई। क्रान्ति के लिए निर्धारित तिथि से पहले ही क्रान्ति की शुरुआत हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि हमे स्वतन्त्रता के लिए 90वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम असफल अवश्य हुआ, किन्तु मंगल पाण्डेय के बलिदान से असंख्य स्वतन्त्रता सेनानियो ने प्रेरणा ग्रहण की। स्वयं को देश पर बलिदान करते समय मंगल पाण्डेय के हृदय से जो उद्गार निकल रहे थे, उन्हीं भावों को गीतकार आनद बक्शी ने आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत में पिरोया है। 1963 मेंप्रदर्शित फिल्म ‘फूल बने अंगारे’ के इस गीत को कल्याणजी आनन्दजी के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी ने गाया है। आइए सुना जाए, देशभक्ति भावों से परिपूर्ण यह प्रेरक गीत-







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - प्रमुख अभिनेता ही निर्देशक थे फिल्म के.

सूत्र २ - गीत में भारत की विश्व को दी गयी उपलब्धियों का वर्णन है.

सूत्र ३ - एक अंतरे का पहला शब्द है - "काले" .



अब बताएं -

गीतकार बताएं - ३ अंक

गायक बताएं - २ अंक

संगीतकार बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

कल अमित जी पहली बार में चूक गए पर आश्चर्य कि किसी ने उनकी इस गलती का फायदा नहीं उठाया, वरन ऐसा लगता है कि कोई और सही गीत पहचान ही नहीं पाया



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, August 21, 2011

ए वतन ए वतन हमको तेरी कसम....प्रेम धवन ने दी बलिदानियों के जज़्बात को जुबाँ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 726/2011/166



शृंखला ‘वतन के तराने’ की छठी कड़ी में आपका पुनः स्वागत है। इस श्रृंखला के गीतों के माध्यम से हम उन बलिदानियों का पुण्य स्मरण कर रहे हैं, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में अपने प्राणों की आहुतियाँ दी। जिनके त्याग, तप और बलिदान के कारण ही हम उन्मुक्त हवा में साँस ले पा रहे हैं। आज जो गीत हम आपके लिए प्रस्तुत करने जा रहे हैं, वह भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक ऐसे महानायक से सम्बन्धित है, जिसे नाम के स्थान पर दी गई ‘शहीद-ए-आजम’ की उपाधि से अधिक पहचाना जाता है। जी हाँ, आपका अनुमान बिलकुल ठीक है, हम अमर बलिदानी भगत सिंह की स्मृति को आज स्वरांजलि अर्पित करेंगे।



भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अमर बलिदानी भगत सिंह का जन्म एक देशभक्त परिवार में 28सितम्बर, 1907 को ग्राम बंगा, ज़िला लायलपुर (अब पाकिस्तान में) हुआ था। उनके पूर्वज महाराजा रणजीत सिंह की सेना के योद्धा थे। भगत सिंह के दो चाचा स्वर्ण सिंह व अजीत सिंह तथा पिता किशन सिंह ने अपना पूरा जीवन अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ने में लगा दिया। ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकले भगतसिंह के हृदय में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने की भावना को और अधिक सबल बना दिया। 13अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में जनरल डायर ने भीषण नरसंहार किया था। तब भगत सिंह मात्र 12 वर्ष के थे। घर पर बिना किसी को बताए भगत सिंह लाहौर से अमृतसर के जलियाँवाला पहुँच गए और एक शीशी में वहाँ की रक्तरंजित मिट्टी लेकर लौटे। उन्होने वह शीशी अपनी बहन को दिखाया और उस पर फूल चढ़ा कर बलिदानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसी प्रकार 1921 में जब वे नौवीं कक्षा में थे, अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ हुआ। ऐसे में भला भगत सिंह कहाँ पीछे रहते। अपने साथियों की एक टोली बना कर विदेशी कपड़ों की होली जलाने में जुट गए। इसी बीच 5फरवरी, 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरीचौरा में प्रदर्शनकारियों ने एक थानेदार और 21 सिपाहियों को थाने में बन्दकर आग लगा दिया। इस घटना ने भगत सिंह को हिंसा और अहिंसा मार्ग के अलावा एक ऐसे मार्ग पर चलने का संकेत दिया, जिसपर चलकर जन-चेतना जागृत करते हुए आत्मोत्सर्ग के लिए सदा तत्पर रहने का आग्रह था।



आगे चल कर भगत सिंह ने इसी मार्ग का अनुसरण किया और 17दिसम्बर, 1928 के दिन लाला लाजपत राय के हत्यारे सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्सको उसके अत्याचार की सजा दी। इस काण्ड में उनका साथ अमर बलिदानी राजगुरु ने दिया था। क्रान्तिकारियों के जीवन-चरित्र का अध्ययन करते समय भगत सिंह को फ्रांसीसी क्रान्तिकारी बेलाँ का चरित्र खूब भाया था। संसद में बम विस्फोट कर अपने सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाने और स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए जनचेतना जगाने की अनूठी योजना की प्रेरणा भगत सिंह को बेलाँ से ही मिली थी। बिना किसी को हताहत किये संसद में बम फेक कर स्वयं को बन्दी बनवा लेने की इस योजना में भगत सिंह का साथ बटुकेश्वर दत्त ने दिया। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार उन्होने जोरदार आवाज़ के साथ विस्फोट किया और स्वयं को गिरफ्तार करा दिया। हुआ वही जो होना था। 7मई, 1929 से जेल में ही अदालत का आयोजन कर सुनवाई आरम्भ हुई। सुनवाई के दौरान भगत सिंह ने ब्रिटिश सरकार और उनकी नीतियों की खूब धज्जियाँ उड़ाईं।



अन्ततः 7अक्तूबर, 1930 को मुकदमे का नाटक पूरा हुआ और साण्डर्स हत्याकाण्ड में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की सजा सुना दी गई। तीनों क्रान्तिवीर अपना कार्य कर चुके थे। 23मार्च, 1931 का दिन, उस दिन भगत सिंह अपनी आयु के मात्र 23वर्ष, 5मास और 26 दिन पूरे किये थे। इतनी कम आयु के बावजूद उन्होने उस साम्राज्य की चूलें हिला दीं, जिनके राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था।



आज हम आपको जो गीत सुनवाने जा रहे हैं वह इन्हीं तीनों बलिदानियों, विशेष रूप से अमर बलिदानी भगत सिंह के जीवन-दर्शन पर आधारित फिल्म‘शहीद’ से लिया गया है। इस फिल्म के गीतकार और संगीतकार, दोनों का दायित्व प्रेम धवन ने ही निभाया था। फिल्मांकन की दृष्टि से आज का गीत इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह गीत भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को जेल की कोठरी से फाँसी-स्थल तक ले जाने के दौरान फिल्माया गया था। मोहम्मद रफी और साथियों के स्वरों में आइए सुनते हैं, यह प्रेरक गीत और हँसते-हँसते फाँसी का फन्दा चूमने वाले क्रान्तिवीरों को भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - पहले स्वतन्त्रता संग्राम का नायक था ये वीर, जिसने आने वाले समय में देश में जाग्रति भरी.

सूत्र २ - आवाज़ है रफ़ी साहब की.

सूत्र ३ - एक अंतरे का पहला शब्द है - "हिमाला" .



अब बताएं -

संगीतकार बताएं - ३ अंक

फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

गीतकार बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

अमित जी को एक बार फिर बधाई



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, August 20, 2011

फिर मत कहना कि सिस्टम ख़राब है...

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 55



ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नम्स्कार! दोस्तों, अभी इसी हफ़्ते हमनें अपने देश की आज़ादी का ६५-वाँ वर्षगांठ मनाया। हम अक्सर इस बात पर ख़ुश होते हैं कि विदेशी ताक़तों नें जब भी हम पर आक्रमण किया या जब भी हमें ग़ुलाम बनाने की कोशिशें की, तो हर बार हमनें अपने आप को आज़ाद किया, दुश्मनों की धज्जियाँ उड़ाईं। पर 'स्वाधीनता दिवस' की ख़ुशियाँ मनाते हुए या कारगिल विजय पर नाज़ करते हुए हम यह अक्सर भूल जाते हैं कि हम अब भी ग़ुलाम हैं हमारी सरज़मीन पर ही पनपने वाले भष्टाचार के। क्या आप यह जानते हैं कि अंग्रेज़ों नें २०० साल में इस देश को इतना नहीं लूटा जितना इस देश के भ्रष्टाचारियों ने इन ६४ सालों में लूट लिया। इन दिनों देश के हर शहर में, हर गाँव में, हर कस्बे में एक नई क्रान्ति की लहर आई है जिसकी चर्चा हर ज़बान पर है। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' के ज़रिए हम आप तक पहुँचाना चाहते हैं एक अपील।



"अगर हम अपनी प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष करने को तैयार नहीं है तो हम आज़ादी के हकदार भी नहीं है। देश सेवा एक क़ुर्बानी नहीं, एक सौभाग्य है। क्या हम आने वाले ६० साल वैसे ही गुज़ारना चाहते हैं कि जैसे पिछले ६० साल गुज़ारे हैं? हमारे युवा इस देश की १०० प्रतिशत जनसंख्या तो नहीं लेकिन १०० प्रतिशत इस देश का भविष्य ज़रूर बनाते हैं। समय की पुकार है, भारत की मांग है और अच्छे क़ानून द्वारा अच्छा शासन। देश सिर्फ़ नारे लगाने से महान नहीं बनता, देश महान तब बनता है जब उसके नागरिक महान काम करते हैं। हमारा विश्वास है कि भारत में ९९ प्रतिशत लोग सच्चे और ईमानदार हैं, वह भष्टाचार में भागीदार नहीं है लेकिन समुद्र में बूंद के समान इन १ प्रतिशत भष्टाचारियों ने ९९ फ़ीसदी भारत को बंधक बना लिया है। गांधीजी ने मद्रास में कहा था कि "सहयोग देना हर नागरिक का तब तक फ़र्ज़ बनता है जब तक सरकार उनके सम्मान की रक्षा करती है और असहयोग का भी उतना ही फ़र्ज़ बनता है जब सरकार उनके सम्मान की हिफ़ाज़त के बजाय उसे लूटने लगती है"। संघर्ष औतर तक़लीफ़ के लिए तैयार रहें। आज़ादी कभी मिलती नहीं है, बल्कि हमेशा हासिल करनी पड़ती है। अपने पैरों पर खड़े होने की कीमत चुकानी पड़ती है, और अपने घुटनों को टेक कर भी जीने की कीमत चुकानी पड़ती है। फ़ैसला आपका, आख़िर देश है आपका। याद रहे, अभी नहीं तो कभी नहीं। फिर मत कहना कि सिस्टम खराब है!" (अधिक जानकारी के लिए इस वेबसाइट पर पधारें - www.indiaagainstcorruption.org)



दोस्तों, वक्त आ गया है अब जागने का। बहुत हो चुका। अगर एक ७४ वर्ष का वृद्ध इस महायुद्ध को लड़ने की हिम्मत रख सकता है, तो हम कम से कम उन्हें अपना सहयोग देकर इस महान मिशन को कामयाब करने में थोड़ा सा योगदान तो दे ही सकते हैं! आख़िर 280 लाख करोड़ का भी तो सवाल है! जी हाँ, "भारतीय गरीब है लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा", ये कहना है 'स्विस बैंक' के डाइरेक्टर का। स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह भी कहा है कि भारत का लगभग 280 लाख करोड़ रुपये उनके स्विस बैंक में जमा है। ये रकम इतनी है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट बिना टैक्स के बनाया जा सकता है। या यूँ कहें कि 60 करोड़ रोजगार के अवसर दिए जा सकते है। या यूँ भी कह सकते है कि भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4 लेन रोड बनाया जा सकता है। ऐसा भी कह सकते है कि 500 से ज्यादा सामाजिक प्रोजेक्ट पूर्ण किये जा सकते है। ये रकम इतनी ज्यादा है कि अगर हर भारतीय को 2000 रुपये हर महीने भी दिए जाये तो 60 साल तक ख़त्म ना हो। यानी भारत को किसी 'वर्ल्ड बैंक' से लोन लेने कि कोई जरुरत नहीं है। जरा सोचिये, हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और नोकरशाहों ने कैसे देश को लूटा है और ये लूट का सिलसिला अभी 2011 तक जारी है। इस सिलसिले को अब रोकना बहुत ज्यादा जरूरी हो गया है। अंग्रेजो ने हमारे भारत पर करीब 200 सालो तक राज करके करीब 1 लाख करोड़ रुपये लूटा। मगर आजादी के केवल 64 सालों में हमारे भ्रष्टाचार ने 280 लाख करोड़ लूटा है। एक तरफ 200 साल में 1 लाख करोड़ है और दूसरी तरफ केवल 64 सालों में 280 लाख करोड़ है। यानि हर साल लगभग 4.37 लाख करोड़, या हर महीने करीब 36 हजार करोड़ भारतीय मुद्रा 'स्विस बैंक' में इन भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा करवाई गई है। भारत को किसी वर्ल्ड बैंक के लोन की कोई दरकार नहीं है। सोचो की कितना पैसा हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और उच्च अधिकारीयों ने ब्लाक करके रखा हुआ है। हमे भ्रष्ट राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ जाने का पूर्ण अधिकार है। हाल ही में हुए घोटालों का आप सभी को पता ही है - CWG घोटाला, 2G स्पेक्ट्रुम घोटाला, आदर्श होउसिंग घोटाला, और न जाने कौन कौन से घोटाले अभी उजागर होने वाले हैं। दोस्तों, आइए, हम सब मिलकर इस महामुहीम में ऐसे भाग लें कि यह एक आन्दोलन बन जाये, एक ऐसा आन्दोलन जो 'स्वाधीनता संग्राम' के बाद पहली बार हुआ हो। और सच भी तो है, यह हमारी दूसरी आज़ादी की लड़ाई ही तो है!



आइए आज चलते चलते सुनें फ़िल्म 'भ्रष्टाचार' का शीर्षक गीत मोहम्मद अज़ीज़ और साथियों की आवाज़ों में।



गीत - ये जनता की है ललकार, बन्द करो ये भ्रष्टाचार (भ्रष्टाचार)







इसी के साथ आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' यहीं समाप्त होता है, फिर मुलाक़ात होगी, अब अपने दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार!



और अब एक विशेष सूचना:



२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

सुनो कहानी - अपील का जादू - हरिशंकर परसाई

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने संज्ञा टंडन की आवाज़ में पद्म भूषण भीष्म साहनी की कहानी "चील" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हरिशंकर परसाई का व्यंग्य "अपील का जादू", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 9 मिनट 48 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।





मेरी जन्म-तारीख 22 अगस्त 1924 छपती है। यह भूल है। तारीख ठीक है। सन् गलत है। सही सन् 1922 है। ।
~ हरिशंकर परसाई (1922-1995)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

प्रधानमंत्री ने चिढकर कहा, "मैं गोबर में से नैतिक शक्ति पैदा कर रहा हूँ।"
(हरिशंकर परसाई की "अपील का जादू" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3

#141th Story, Appeal ka Jadoo: Harishankar Parsai/Hindi Audio Book/2011/22. Voice: Anurag Sharma

Thursday, August 18, 2011

झंकारो झंकारो झंकारो अग्निवीणा....कवि प्रदीप के शब्दों से निकलती आग

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 725/2011/165



भारत नें हमेशा अमन और सदभाव का राह चुनी है। हमनें कभी किसी को नहीं ललकारा। हज़ारों सालों का हमारा इतिहास गवाह है कि हमनें किसी पर पहले वार नहीं किया। जंग लड़ना हमारी फ़ितरत नहीं। ख़ून बहाना हमारा धर्म नहीं। लेकिन जब दुश्मनों नें हमारी इस धरती को अपवित्र करने की कोशिश की है, हम पर ज़ुल्म करने की कोशिश की है, तो हमने भी अपनी मर्यादा और सम्मान की रक्षा की है। न चाहते हुए भी बंसी के बदले बंदूक थामे हैं हम प्रेम-पुजारियों नें। अंग्रेज़ी सरकार नें 200 वर्ष तक इस देश पर राज किया। 1857 से ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ आवाज़ उठनी शुरु हुई थी, और 90 वर्ष की कड़ी तपस्या और असंख्य बलिदानों के बाद 1947 में ब्रिटिश राज से इस देश को मुक्ति मिली।



भारत के स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में एक महत्वपूर्ण नाम है नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का। उनके वीरता की कहानियाँ हम जानते हैं, और उन पर एकाधिक फ़िल्में भी बन चुकी हैं। ऐसी ही एक फ़िल्म आई थी 'नेताजी सुभाषचन्द्र बोस' और इस फ़िल्म में एक जोश पैदा कर देने वाला गीत था हेमन्त कुमार, सबिता चौधरी और साथियों की आवाज़ों में। सलिल चौधरी के संगीत में इसके गीतकार थे कवि प्रदीप। कवि प्रदीप की कलम से निकले कई ओजस्वी गीत। उन्होने न केवल गहरे अर्थपूर्ण गीत लिखे,बल्कि अनेक गीतों को दक्षता के साथ गायन भी किया। फ़िल्म 'जागृति' का "आओ बच्चों तुम्हें दिखायें" हमेशा इस देश की महान संस्कृति और इस देश के वीरों की शौर्यगाथा सुनाता रहेगा। 'नेताजी सुभाषचन्द्र बोस' फ़िल्म के जिस गीत को आज की कड़ी के लिए हमनें चुना है, उसके बोल हैं "झंकारो झंकारो झननन झंकारो, झंकारो अग्निवीणा,आज़ाद होके बंधुओं जियो, ये जीना क्या जीना"।



जहाँ भारतीय कांग्रेस कमेटी स्वाधीनता को अध्याय दर अध्याय के रूप में चाहते थे, जबकि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश सरकार की कोई शर्त मंज़ूर नहीं था। फिर भगत सिंह का शहीद होना और कांग्रेस नेताओं का भगत सिंह की ज़िंदगी को न बचा सकने की व्यर्थता नें नेताजी को इतना क्रोधित कर दिया कि उन्होंने 'गांधी-इरविन पैक्ट' के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ दिया। नेताजी को गिरफ़्तार कर लिया गया और भारत से भी निकाला गया। इस देश-निकाले को अमान्य करते हुए नेताजी देश वापस आये और फिर से गिरफ़्तार हुए। नेताजी दो बार 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' के प्रेसिडेण्ट भी चुने गए,पर महात्मा गांधी के विचारधारा से एकमत न हो पाने की वजह से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा। कांग्रेस से मिलकर उन्होंने कांग्रेस को सीधी चुनौती दे दी। उनका यह मानना था कि सत्याग्रह से कभी स्वतंत्रता हासिल नहीं हो सकती। नेताजी नें अपनी पार्टी 'ऑल इण्डिया फ़ॉरवार्ड ब्लॉक' का गठन किया और ब्रिटिश राज से सीधा टक्कर ले लिया। ब्रिटिश सरकार को दाँतों तले चने चबवाया और 11 बार गिरफ़्तार हुए। कई बार अंग्रेज़ों की आँखों में धूल झोंक कर वो फ़रार भी हो गए थे। देशवासियों के लिए उनका एक ही पैग़ाम और निवेदन था - "तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा"। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वो सोवियत यूनियन, नाज़ी जर्मनी और इम्पीरियल जापान का दौरा किया और भारत की आज़ादी के लिए उनसे गठबंधन की गुज़ारिश की। जापान की मदद से उन्होंने ''आज़ाद हिंद फ़ौज' का गठन किया जिसके जंगबाज़ बनें भारतीय युद्ध-बंदी, ब्रिटिश मलय और सिंगापुर के प्लैण्टेशन वर्कर्स। बर्मा से होते हुए अपनी फ़ौज को लेकर उन्होने इम्फाल के रास्ते भारत में प्रवेश किया पर असफल हुए। कहा जाता है कि ताइवान में 18 अगस्त 1945 में एक प्लेन-क्रैश में उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन इसमें भी घोर संशय है। आइए आज 18 अगस्त को हम नेताजी को श्रद्धा सुमन अर्पित करें और सुनें उन्हीं पर बनी फ़िल्म का यह जोशीला गीत।



फिल्म – नेताजी सुभाषचन्द्र बोस : 'झंकारो झंकारो झननन अग्निवीणा....' गीतकार – प्रदीप





और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - एक और अमर स्वतंत्रता सेनानी के जीवन पर है ये फिल्म भी.

सूत्र २ - गीतकार और संगीतकार एक ही व्यक्ति थे.

सूत्र ३ - गीत के एक अंतरे में देश के विभिन्न प्रान्तों का जिक्र है.



अब बताएं -

किस दिन इस अमर शहीद को अंग्रेज सरकार ने फांसी की सजा सुनाई थी (मुक़दमे की अंतिम तारीख़ आपको बतानी है)- ३ अंक

किस क्रांतिकारी की जीवनी से प्रेरित था ये अमर शहीद - ३ अंक

गीतकार बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

लगता है कल की पहेली काफी मुश्किल रही सबके लिए, फिर भी अमित और क्षिति जी को बधाई सही जवाब के लिए.



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, August 17, 2011

कर चले हम फ़िदा...कैफी आज़मी के इन बोलों ने चीर कर रख दिया था हर हिन्दुस्तानी कलेजा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 724/2011/164



‘वतन के तराने’ श्रृंखला की चौथी कड़ी में आपका स्वागत है। इस श्रृंखला की पिछली दो कड़ियों मे आप नारी शक्ति की प्रतीक, झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के त्याग और बलिदान की अमर गाथा के कुछ चुने हुए प्रसंगों के भागीदार हुए हैं। आज के अंक में भी इस गाथा को जारी रखते हुए आगे के कुछ प्रसंग आपके लिए प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही बलिदानियों द्वारा अपने से आगे की पीढ़ी के लिए दिये गए सन्देश से परिपूर्ण गीत भी आपको सुनवाएँगे। पिछले अंक में आपने पढ़ा कि झाँसी के उत्तराधिकारी की असमय मृत्यु से महाराज गंगाधर राव अवसादग्रस्त होकर राजकीय कार्यों से विमुख हो गए। ऐसी परिस्थिति में लक्ष्मीबाई ने समस्त शासन-सूत्र अपने हाथों में ले लिये।



कुछ समय बाद शोकग्रस्त गंगाधर राव का भी निधन हो गया। यह 1853 का वर्ष था। पूरे देश में अंग्रेजों के अत्याचार से जनता त्रस्त थी। उस समय झाँसी में अंग्रेज़ अधिकारी मेजर मालकम तैनात था। उसने दामोदर राव को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया। धीरे-धीरे संघर्ष की स्थिति बनती जा रही थी। लक्ष्मीबाई तो पहले से ही तैयार थीं। उधर तात्याटोपे राष्ट्रभक्त शक्तियों को एकजुट कर अंग्रेजों के विरुद्ध महासंग्राम की तैयारी के लिए गुप्त रूप से भ्रमण कर रहे थे। अचानक एक दिन तात्या झाँसी आकर लक्ष्मीबाई से भी मिले। अन्ततः 1857 भी आ पहुँचा। देश के अलग-अलग हिस्सों में अन्दर ही अन्दर चिंगारी ज्वाला बनने के लिए धधक रही थी, किन्तु अंग्रेज़ इससे अनभिज्ञ थे। क्रान्ति की ज्वाला धधकने का दिन 31 मई, 1857 का दिन निश्चित था, किन्तु 29 मार्च को ही बंगाल में बैरकपुर छावनी में मंगल पाण्डेय ने समय से पहले क्रान्ति का शंखनाद कर दिया। लक्ष्मीबाई की चौकस दृष्टि क्रान्ति पर जमी हुई थी। अचानक एक दिन रानी को सूचना मिली कि झाँसी में तैनात अंगेजों की 12वीं पैदल सेना और घुड़सवार सेना की टुकड़ी ने विद्रोह कर दिया है।



सेनाधिकारी डनलप और कुछ अन्य अंग्रेज़ परिवार झाँसी किले में छिप गए और क्रान्तिकारियों ने किले को घेर लिया।लक्ष्मीबाई ने किले में कैद अंग्रेज़ महिलाओं और बच्चों को क्रान्तिकारियों से मुक्त कराने का प्रयास किया किन्तु डनलप की जिद के सामने ऐसा न हो सका। अन्ततः क्रान्तिकारियों ने हमला कर किले पर कब्जा कर लिया और किला रानी को सौंप दिया।



भारतीय सैनिको द्वारा अँग्रेजी सेना से विद्रोह कर देने से गोरों के डगमगाए कदम धीरे-धीरे सहज हो रहे थे। स्थिति कुछ सामान्य होते ही गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग की आँख में अब झाँसी खटकने लगी। उसने जनरल ह्यूरोज को एक बड़ी सेना के साथ झाँसीविजय के लिए भेजा। तेरह दिनों तक रानी ने हयूरोज से भीषण युद्ध किया, किन्तुमुट्ठीभर देशभक्तों की सेना के साथ वह अधिक प्रतिरोध न कर सकी। झाँसी के नागरिकों और सैनिकों को रक्तपात से बचाने के लिए रानी ने युद्धभूमि से हट कर कर कालपी जाने का निर्णय लिया। कालपी पहुँच कर लक्ष्मीबाई ने नानासाहब और तात्या टोपे के साथ विचार-विमर्श किया और कानपुर की ओर बढ़ते ह्यूरोज के रोकने के लिए भीषण युद्ध किया। रानी ने घोड़े की लगाम को अपने मुख से पकड़ा और दोनों हाथों में तलवार लेकर लड़ते हुए अंग्रेजों के तोपखाने पर कब्जा कर लिया। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूरोज से रानी का तीसरा और निर्णायक युद्ध ग्वालियर में हुआ। इससे पूर्व रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने ग्वालियर नरेश की अंग्रेज़-भक्ति का सबक सिखाते हुए ग्वालियर और मुरार किले पर नियंत्रण कर लिया। एक विशाल सेना लेकर ह्यूरोज फिर ग्वालियर को रानी से मुक्त कराने पहुँच गया। रानी ने उस विशाल सेना से भीषण युद्ध किया। युद्ध करते-करते रानी एक ऐसे स्थान पर पहुँच गईं जहाँ सामने एक बड़ी खाईं थी और पीछे गोरों की एक बड़ी फौज थी। रानी के घोड़े के लिए उस खाईं को पार करना असम्भव था। रानी क्रुद्ध बाघिन सी अँग्रेजी सेना पर टूट पड़ी। उस दिन उसने अपने प्राणोत्सर्ग करने का निश्चय कर लिया था। रानी चारो ओर से घिर गई थी। अचानक एक सैनिक के वार से बचने के लिए रानी घूमी ही थी कि दूसरी ओर से कई सैनिकों ने एक साथ वार किया। यह वार घातक था। मृत्यु की गोद मे जाने से पहले लक्ष्मीबाई ने वार करने वाले सैनिक को स्वर्ग पहुँचा दिया था। आसमान को चीर कर रानी लक्ष्मीबाई स्वर्ग की ओर कूच कर गईं। उनके मृत शरीर को रघुनाथ अंग्रेजों के व्यूह से निकाल कर निकट के एक साधु के आश्रम ले गए और वहीं उनका अन्तिम संस्कार कर दिया। इस प्रकार भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का त्याग और बलिदान से परिपूर्ण एक अध्याय पूरा हुआ।



बलिदानी लक्ष्मीबाई के अन्तिम क्षणों में सम्भवतः यही भाव प्रस्फुटित हुए होंगे जो भाव आज के इस गीत में व्यक्त है। आज हम आपको 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘हक़ीक़त’ का गीत सुनवा रहे हैं। कैफी आज़मी के गीत को मदनमोहन ने संगीतबद्ध किया है और इसे मुहम्मद रफी ने गाया है। फिल्म ‘हक़ीक़त’ भारत-चीन युद्ध पर बनी थी। देशभक्ति भावों से भरे इस फिल्म के गीत आज भी प्रेरक बने हुए हैं। लीजिए प्रस्तुत है एक बलिदानी के अन्तिम मनोभावों की अभिव्यक्ति करता यह गीत-



फिल्म हक़ीक़त : ‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों....’ – गीतकार : कैफी आज़मी





(समय के अभाव के चलते कुछ दिनों तक हम ऑडियो प्लेयर के स्थान पर यूट्यूब लिंक लगा रहे हैं, आपका सहयोग अपेक्षित है)



और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - एक महान क्रांतिकारी के नाम पर था फिल्म का नाम भी.

सूत्र २ - दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित ये कवि अपने राष्ट्रीय प्रेम से भरे गीतों के लिए अधिक जाने गए .

सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "आज़ाद".



अब बताएं -

इस महान स्वतंत्रता सेनानी का मशहूर नारा क्या था - ३ अंक

संगीतकार कौन हैं - २ अंक

गीतकार बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

अमित जी एक बार फिर सही जवाब के साथ सबसे पहले आये, हिन्दुस्तानी जी और सत्यजीत जी को भी बधाई



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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