Tuesday, August 31, 2010

हमें तो लूट लिया मिलके हुस्न वालों ने...फ़िल्म 'अल-हिलाल' की मशहूर सदाबहार क़व्वाली जो आज कव्वाल्लों की पहली पसंद है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 473/2010/173

मज़ान के मुबारक़ मौक़े पर आपके इफ़्तार की शामों को और भी ख़ुशनुमा बनाने के लिए इन दिनों हर शाम हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल को रोशन कर रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कुछ शानदार क़व्वालियों के ज़रिए। और इन्ही क़व्वालियों के ज़रिए ४० के दशक से ८० के दशक के बीच क़व्वालियों का मिज़ाज किस तरह से बदलता रहा, इसका भी आप ख़ुद ही अंदाज़ा लगा पाएँगे और महसूस भी करेंगे एक के बाद एक इन क़व्वालियों को सुनते हुए। पिछली दो कड़ियों में आपने ४० के दशक की दो क़व्वालियाँ सुनी, आइए आज एक लम्बी छलांग मार कर पहुँच जाते हैं साल १९५८ में। इस साल एक ऐसी क़व्वाली आई थी जिसने इतनी ज़्यादा लोकप्रियता हासिल की कि आने वाले सालों में बहुत से क़व्वालों ने इस क़व्वाली को गाया और आज भी गाते हैं। इस तरह से इस क़व्वाली के बहुत से संस्करण बन गए हैं लेकिन जो मूल क़व्वाली है वह १९५८ के उस फ़िल्म में थी जिसका नाम है 'अल-हिलाल'। जी हाँ, "हमें तो लूट लिया मिलके हुस्नवालों ने, काले काले बालों ने, गोरे गोरे गालों ने"। इस्माइल आज़ाद और साथियों की गाई इस क़व्वाली को लिखा था शेवन रिज़्वी ने। फ़िल्म में संगीत था बुलो सी. रानी का। १९५४ में 'बिलवामंगल' फ़िल्म में लोकप्रिय संगीत देने के बाद 'अल-हिलाल' की यह क़व्वाली उनकी मशहूर हुई थी। वैसे यह बताना मुश्किल है कि इस क़व्वाली में उनका योगदान कितना था और इस्माइल आज़ाद के क़व्वाली वाले अंदाज़ का कितना! लेकिन इस कामयाबी के बावजूद बुलो सी. रानी का करीयर ग्राफ़ ढलान पर ही चलता गया और धीरे धीरे वो फ़िल्म जगत से दूर होते चले गए। 'अल-हिलाल' के निर्देशक थे राम कुमार, और फ़िल्म के नायक नायिका थे महिपाल और शक़ीला।

और आइए अब कुछ बातें की जाए क़व्वाली के विशेषताओं की। कल हमने आपको क़व्वाली के उत्स की जानकारी दी थी, आज बात करते हैं कि किन किन भाषाओं में क़व्वाली गाई जाती है। वैसे तो सामान्यत: क़व्वाली में उर्दू और पंजाबी भाषा का ज़्यादा इस्तेमाल होता है, लेकिन बहुत सी क़व्वालियाँ परशियन, ब्रजभाषा और सिरैकी में भी गाई जाती है। कुछ स्थानीय भाषाओं में भी क़व्वालियाँ बनती है, मसलन, बंगला में छोटे बाबू क़व्वाल की गाई हुई क़व्वालियाँ मशहूर हैं, हालाँकि ये संख्या में बहुत कम है। इन बंगला क़व्वालियों की गायन शैली भी इस तरह की है कि उर्दू क़व्वालियों से बिल्कुल अलग सुनाई देती है। इनमें बाउल गायन शैली का ज़्यादा प्रभाव महसूस किया जा सकता है। आज ये बंगला क़व्वालियाँ बंगलादेश में ही गाई और सुनी जाती है। किसी भी क़व्वाली का उद्देश्य है आध्यात्म की खोज। क़व्वाली का जो मूल अर्थ है, वह यही है कि इसे गाते गाते ऐसे ध्यानमग्न हो जाएँ कि ईश्वर के साथ, अल्लाह के साथ एक जुड़ाव सा महसूस होने लगे। क़व्वाली केन्द्रित होती है प्रेम, श्रद्धा और आध्यात्म के खोज पर। वैसे हल्के फुल्के और सामाजिक क़व्वालियाँ भी ख़ूब मशहूर हुआ करती हैं। हिंदी फ़िल्मों में मज़हबी और सामाजिक, दोनों तरह की क़व्वालियों का ही चलन शुरु से रहा है। हम इस शृंखला में ज़्यादातर सामाजिक क़व्वालियाँ ही पेश कर रहे हैं, जिनमें है प्यार, मोहब्बत, हुस्न-ओ-इश्क़ की बातें हैं, मीठी नोक झोक और तकरार की बातें हैं, जीवन दर्शन की बातें भी होंगी आगे चलकर किसी क़व्वाली में। लेकिन प्यार मोहब्बत और इश्क़ भी तो ईश्वर से जुड़ने का ही साधन होता है। इसलिए ये हुस्न-ओ-इश्क़ की क़व्वालियों में भी स्पिरिचुअलिटी समा ही जाती है। तो आनंद लेते रहिए इस शुंखला का और अब सुनिए फ़िल्म 'अल-हिलाल' की मशहूर सदाबहार क़व्वाली।



क्या आप जानते हैं...
कि मशहूर बैनर रणजीत मूवीटोन के जानेमाने संगीतकारों में शुमार होता है बुलो सी. रानी का। रणजीत मूवीटोन में स्वतंत्र संगीतकार बनने से पहले वो ज्ञान दत्त और खेमचंद प्रकाश जैसे संगीतकारों के सहायक हुआ करते थे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ये है एक क्लास्सिक एतिहासिक फिल्म की मशहूर कव्वाली, फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
२. किस संगीतकार गीतकार जोड़ी ने रचा है ये गीत - २ अंक.
३. लता का साथ किस गायिका ने दिया है इस कव्वाली में - ३ अंक.
४ मुखड़े में शब्द है -"नजदीक". फिल्म के निर्देशक बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी, नवीनजी, प्रतिभा जी, और किशोर जी को बधाई, दादी और शरद जी ने आकर महफ़िल की शान दुगनी की है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

किलिमांजारो में बूम बूम रोबो डा.. रोबोट की हरकतों के साथ हाज़िर है रहमान, शंकर और रजनीकांत की तिकड़ी

ताज़ा सुर ताल ३३/२०१०

सुजॊय - आज है ३१ अगस्त! यानी कि आज 'ताज़ा सुर ताल' इस साल का दो तिहाई सफ़र पूरा कर रहा है। पीछे मुड़ कर देखें तो इस साल बहुत ही कम फ़िल्में ऐसी हैं जिन्होंने बॊक्स ऒफ़िस पर कामयाबी के झंडे गाड़े हैं।

विश्व दीपक - हाँ, लेकिन फ़िल्म संगीत की बात करें तो इन फ़िल्मों के अलावा भी कई फ़िल्मों का संगीत सुरीला रहा है। 'वीर', 'इश्क़िया', 'कार्तिक कॊलिंग‍ कार्तिक', 'आइ हेट लव स्टोरीज़', 'मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेस मेहता', 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' जैसे फ़िल्मों के गानें काफ़ी अच्छे हैं। अब देखते हैं कि २०१० का बेस्ट क्या अभी आना बाक़ी है!

सुजॊय - अच्छा विश्व दीपक जी, क्या आप ने कोई ऐसा कम्प्युटर देखा है जिसका स्पीड १ टेरा हर्ट्ज़ हो, और मेमरी १ ज़ीटा बाइट, जिसका प्रोसेसर पेण्टियम अल्ट्रा कोर मिलेनिया वी-२, और एफ़. एच. पी-४५० मोटर हिराटा, जापान का लगा हो?

विश्व दीपक - अरे अरे ये सब क्या पूछे जा रहे हैं आप? यह 'टी. एस. टी' है भई!

सुजॊय - तभी तो! आज हम जिस फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं यह उसी से ताल्लुख़ रखता है। ये जो स्पेसिफ़िकेशन्स मैंने अभी बताए, यह दरसल किसी कम्प्युटर का नहीं, बल्कि एक अत्याधुनिक रोबोट का होगा जिसका निर्माण कर रहे हैं फ़िल्म निर्माता कलानिथि मारन निर्देशक शंकर के साथ मिल कर अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'रोबोट' में।

विश्व दीपक - 'रोबोट' इस देश में बनने वाली सब से महँगी फ़िल्म है और इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं साउथ सुपरस्टार रजनीकांत और ऐश्वर्या राय बच्चन। फ़िल्म में संगीत दिया है ए. आर. रहमान ने और गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे। दोस्तों, इससे पहले कि हम 'रोबोट' की बातों को आगे बढ़ाएँ, आइए फ़िल्म का पहला गाना सुन लेते हैं जिसे गाया है ए. आर. रहमान, सुज़ेन, काश और क्रिसी ने।

गीत - नैना मिले


सुजॊय - फ़िल्म की कहानी और प्लॊट के हिसाब से ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म के गानें हाइ टेक्नो बीट्स वाले होंगे और गायन शैली भी उसी तरह का रोबोट वाले अंदाज़ का होगा, और अभी अभी जो हमने गीत सुना उसमें इन सभी बातों का पूरा पूरा ख़याल रखा गया है। "नैना मिले, तुम से नैना मिले", स्वानंद किरकिरे के बोलों को ध्यान से सुना जाए तो उनका ख़ास अंदाज़ महसूस किया जा सकता है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि 'ध्यान से सुना जाए', क्योंकि टेक्नो बीट्स के चलते गीत के बोल पार्श्व में चले गए हैं और संगीत ही सर चढ़ कर बोल रहा है।

विश्व दीपक - वाक़ई एक 'रोबोटिक' गाना है। हाल में एक फ़िल्म आई थी 'लव स्टोरी २०५०' जिसका संगीत भी कुछ इसी तरह का डिमाण्ड करता था। "मिलो ना मिलो" गीत मशहूर हुआ था लेकिन कुल मिलाकर फ़िल्म पिट गई थी। ख़ैर, 'रोबोट' का दूसरा गीत पहले गीत की तुलना में टेक्नो बीट्स के मामले में हल्का है और एक रोमांटिक युगल गीत है मोहित चौहान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में। सुनते हैं फिर चर्चा करते हैं।

गीत - पागल अनुकन (प्यारा तेरा गुस्सा भी)


विश्व दीपक - भले ही एक नर्मोनाज़ुक रूमानीयत से भरा गीत है, लेकिन स्वानंद किरकिरे इसमें भी वैज्ञानिक शब्दों को डालना नहीं भूले हैं। हिंदी सिनेमा का यह पहला गीत है जिसमें "न्युट्रॊन" और "ईलेक्ट्रॊन" शब्दों का इस्तमाल हुआ है।

सुजॊय - आइए अब इस फ़िल्म के प्रमुख किरदार रोबोट का परिचय आप से करवाया जाए। इस ऐण्ड्रो-ह्युमानोएड रोबोट का नाम है 'चिट्टी'। यह एक इंसान है जिसने जन्म नहीं लिया, बल्कि जिसका निर्माण हुआ है। चिट्टी गा सकता है, नाच सकता है, लड़ सकता है, पानी और आग का उस पर कोई असर नहीं होता। वो हर वो सब कुछ कर सकता है जो एक इंसान कर सकता है लेकिन शायद उससे भी बहुत कुछ ज़्यादा। वो विद्युत-चालित है और वो झूठ नहीं बोल सकता। चिट्टी की कुछ विशेषताओं के बारे में हमने आपको बताया, आइए अब सुनते हैं 'चिट्टी डान्स शोकेस'।

विश्व दीपक - 'चिट्टी डान्स शोकेस' एक डान्स नंबर है प्रदीप विजय, प्रवीन मणि, रैग्ज़ और योगी बी. का।

गीत - चिट्टी डान्स शोकेस


सुजॊय - वाक़ई ज़बरदस्त इन्स्ट्रुमेन्टल पीस था। हिप-हॊप डान्स के शौकीनों के लिए बहुत अच्छा पीस है। इस फ़्युज़न ट्रैक का इस्तमाल टीवी पर होने वाले डान्स रियल्टी शोज़ में किया जा सकता है।

विश्व दीपक - और अब एक ऐसा गीत जिसे सुनते हुए आप शायद ९० के दशक में पहुँच जाएँगे। और वह इसलिए कि इसमें आवाज़ें हैं हरिहरण और साधना सरगम की। लेकिन गाने के अंदाज़ में ९० के दशक की कोई छाप नहीं है। यह तो इसी दौर का गीत है। यह गीत दर-असल इस रोबोट की गरिमा और महिमा का बखान करता है। रहमान के शुरुआती दिनों में दक्षिण के फ़िल्मों में वो जिस तरह का संगीत दिया करते थे, इस गीत में कुछ कुछ उस शैली की छाया मिलती है। सुनते हैं "अरिमा अरिमा"।

गीत - अरिमा अरिमा


विश्व दीपकव - स्वानंद किरकिरे ने केवल "ईलेक्ट्रॊन" और "न्युट्रॊन" तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखा, अब एक ऐसा गीत जिसमें किलिमांजारो और मोहंजोदारो का उल्लेख है, और उल्लेख क्या, गीत के मुखड़े में ही ये दो शब्द हैं जिन पर इस गीत को आधार किया गया है। इस तरह के शब्दों के चुनाव का तो यही उद्येश्य हो सकता है कि धुन पहले बनी होगी और उस धुन पर ये शब्द फ़िट किए गए होंगे।

सुजॊय - जावेद अली और चिनमयी का गाया यह गीत एक मस्ती भरा गीत है जिसमें वह रोबोटिक शैली नहीं है, बल्कि तबले का भी इस्तमाल हुआ है। जावेद अली धीरे धीरे कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं। आज के दौर के गायकों में उन्होंने अपनी एक अलग जगह बना ही ली है और फ़िल्म संगीत संसार में उन्होंने अपने क़दम मज़बूती से जमा लिए हैं। आइए सुनते हैं "किलिमांजारो"।

गीत - किलिमांजारो


विश्व दीपक - फ़िल्म के शुरु में चिट्टी कोई भी काम तो कर सकता है, लेकिन वो इंसान के जज़्बातों को समझ नहीं सकता। उसमें कोई ईमोशन नहीं है। और तभी डॊ. वासी चिट्टी के प्रोसेसर को अपग्रेड करते हैं और उसमें ईमोशन्स का सिम्युलेशन करते हैं यह सोचे बिना कि इसके परिणाम क्या क्या हो सकते हैं। अब चिट्टी महसूस कर सकता है और सब से पहले जो वो महसूस करता है, वह है प्यार। क्या यही प्यार डॊ. वासी के रास्ते पे दीवार बन कर खड़ा हो जाएगा? क्या डो. वासी का क्रिएशन ही उनका विनाश कर देगा? यही कहानी है 'रोबोट' की।

सुजॊय - और अब एक और रोबोटिक नंबर, फिर से टेक्नो बीट्स की भरमार लिए यह है "बोम बूम रोबोडा", जिसे गाया है रैग्ज़, योगी बी., मधुश्री, कीर्ति सगठिया और तन्वी शाह ने। मधुश्री को ए. आर. रहमान ने कई ख़ूबसूरत गीतों में गवाया है। बहुत ही मिठास है उनकी आवाज़ में। यह ताज्जुब की ही बात है कि मुंबई के फ़िल्मी संगीतकार क्यों उनसे गानें नहीं गवाते! ख़ैर, सुनते हैं यह गीत।

गीत - बूम बूम रोबोडा


विश्व दीपक - और अब फ़िल्म का अंतिम गीत "ओ नए इंसान"। श्रीनिवास और खतिजा रहमान का गाया यह गीत है। श्रीनिवास ने बिलकुल रोबोटिक अंदाज़ में यह गाया है। श्रीनिवास ने इस गीत में दो अलग अलग आवाज़ें निकाली हैं, जो एक दूसरे से बिलकुल अलग है। ऒर्केस्ट्रेशन पूरी तरह से ईलेक्ट्रॊनिक है और इस गीत को सुनते हुए एक साइ-फ़ाइ फ़ील आता है।

सुजॊय - और जिन्हें मालूम नहीं है, उन्हें हम यह बताना चाहेंगे कि खतिजा रहमान ए. आर. रहमान की बेटी है जो इस गीत के ज़रिए हिंदी पार्श्व गायन में क़दम रख रही है। चलिए सुनते हैं यह गीत।

गीत - ओ नए इंसान


सुजॊय - हाँ तो विश्व दीपक जी, कैसा रहा इन रोबोटिक गीतों का अनुभव? मुझे तो बुरा नहीं लगा। हाल के कुछ फ़िल्मों में रहमान का जिस तरह का संगीत आ रहा था, ज़्यादातर सूफ़ियाने अंदाज़ का, उससे बिलकुल अलग हट के, बहुत दिनों के बाद इस तरह का संगीत सुनने में आया है। वैसे हाल में 'शिवाजी' में रहमान ने इस तरह का संगीत दिया था, लेकिन हिंदी के श्रोताओं में 'शिवाजी' के गानें कुछ ख़ास असर नहीं कर सके थे। अब देखना है कि 'रोबोट' के गीतों को किस तरह का रेसपॊन्स मिलता है! "पागल अनुकन" और "किलिमांजारो", ये दोनों गीत मुझे सब से ज़्यादा पसंद आए।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, भले हीं गाने सुनने के दौरान मैंने इलेक्ट्रान, प्रोटॉन, किलिमांजारो और मोहनजोदाड़ो जैसे शब्दों के लिए स्वानंद किरकिरे को क्रेडिट दिया था, लेकिन एक बात मेरे दिल में चुभ-सी रही थी.. शुरू में सोचा कि रहने देता हूँ, हर बात कहनी ज़रूरी नहीं होती, लेकिन जब हम समीक्षा हीं कर रहे हैं तो हमें कुछ भी छुपाने का हक़ नहीं मिलता। शायद आपने रोबोट के तमिल वर्ज़न ऐंदिरन के गाने नहीं सुने। मैंने सुने हैं.. गाने के बोल तो समझ नहीं आए लेकिन ऊपर बताए गए शब्द पकड़ में आ गए थे} और जब मैंने हिन्दी के गाने सुने और हिन्दी में उन्हीं शब्दों की पुनरावृत्ति मिली तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि गीतकार ने गाने का बस अनुवाद हीं किया है और कुछ नहीं। नहीं तो तमिल का "डा" (बूम बूम रोबो डा), जो हिन्दी के "रे" या "अरे" के समतुल्य है, हिन्दी में भी "डा" हीं क्यों होता। और भी ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं.. जिन्हें सुनने पर मुझे लगा था कि किसी साधारण-से गीतकार से गाने लिखवाए (अनुवाद करवाए) गए हैं। लेकिन गीतकार के रूप में "स्वानंद किरकिरे" का नाम देखकर मुझे झटका-सा लगा। अब जैसा कि आपके साथ हुआ और दूसरे हिन्दी-भाषी श्रोताओं के साथ होने वाला है, हम तो बस हिन्दी के गाने हीं सुनते हैं और उसी को "असल" समझ बैठते हैं। अब यहाँ पर दोषी कौन है, यह तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन स्वानंद साहब से मुझे ऐसी उम्मीद न थी। वे "गुलज़ार" और "महबूब" की तरह मिसाल बन सकते थे, जो तमिल के गानों (जिसे वैरामुतु जैसे बड़े कवि/गीतकार लिखा करते हैं) से बोल नहीं उठाते, बल्कि रहमान की धुनों पर अपने नए बोल लिखते हैं। बस इतना है कि स्वानंद साहब से निराश होने के बावजूद रहमान के संगीत के कारण हीं मैं इस एलबम को पसंद कर पा रहा हूँ। सुजॊय जी, आपने इस एलबम के लिए साढे तीन अंक निर्धारित किए थे, लेकिन मैं आधे अंक की कटौती गीतकार के कारण कर रहा हूँ। एक गीतकार/कवि के मन में शब्दों के लिए जो टीस उठती है, वह तो आप समझ हीं सकते हैं.. है ना? खैर.. मैं भी किस भावनात्मक दरिया में बह गया... हाँ तो, आज की समीक्षा को विराम देने का वक्त आ गया है, अगली बार "अनजाना अनजानी" के साथ हम फिर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए शुभदिन एवं शुभरात्रि!!

आवाज़ रेटिंग्स: रोबोट: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९७- हरिहरण और साधना सरगम की आवाज़ में उस मशहूर गीत का मुखड़ा बताइए जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "ये दिल बेज़ुबाँ था आज इसको ज़ुबाँ मिल गई, मेरी ज़िंदगी को एक हसीं दास्ताँ मिल गई"?

TST ट्रिविया # ९८- फ़िल्म 'रोबोट' के साउण्डट्रैक में आपने जितनी भी आवाज़ें सुनीं, उनमें से एक गायिका हैं जिनका असली नाम है सुजाता भट्टाचार्य। बताइए इस गायिका को अब हम किस नाम से जानते हैं?

TST ट्रिविया # ९९- परिवार की नाज़ुक आर्थिक स्थिति के चलते ए. आर. रहमान को कक्षा-९ में स्कूल छोड़ना पड़ा था। बताइए रहमान उस वक़्त किस स्कूल में पढ़ रहे थे?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. खुदा जाने (बचना ए हसीनों)
२. ६७
३. इन दोनों फ़िल्मों में विदेशी गीत की धुन का इस्तेमाल किया गया है। 'वी आर फ़मिली' में एल्विस प्रेस्ली के "जेल-हाउस रॊक" तथा 'कल हो ना हो' में रॊय ओरबिसन के "प्रेटी वोमेन"।

एक बार फिर सीमा जी २ सही जवाबों के साथ हाज़िर हुई, बधाई

Monday, August 30, 2010

क्या बताएँ कितनी हसरत दिल के अफ़साने में है...ज़ोहराबाई अम्बालेवाली की आवाज़ में एक और दमदार कव्वाली

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 472/2010/172

मज़ान के पाक़ अवसर पर आपके इफ़्तार की शामों को और भी ख़ुशनुमा बनाने के लिए 'आवाज़' की ख़ास पेशकश इन दिनों आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'मजलिस-ए-क़व्वाली' के तहत। कल हमने १९४५ की मशहूर फ़िल्म 'ज़ीनत' की क़व्वाली सुनी थी। आज भी हम ४० के ही दशक की एक और ख़ूबसूरत क़व्वाली सुनेंगे, लेकिन उसका ज़िक्र करने से पहले आइए आज आपको क़व्वाली के बारे में कुछ दिलचस्प बातें बतायी जाए। मूल रूप से क़व्वाली सूफ़ी मज़हबी संगीत को कहते हैं, लेकिन समय के साथ साथ क़व्वाली सामाजिक मुद्दों पर भी बनने लगे। क़व्वाली का इतिहास ७०० साल से भी पुराना है। जब क़व्वाली की शुरुआत हुई थी, तब ये दक्षिण एशिया के दरगाहों और मज़ारों पर गाई जाती थी। लेकिन जैसा कि हमने बताया कि धीरे धीरे ये क़व्वालियाँ आम ज़िंदगी में समाने लगी और संगीत की एक बेहद लोकप्रिय धारा बन गई। क़व्वाली की जड़ों की तरफ़ अगर हम पहुँचना चाहें, तो हम पाते हैं कि आठवी सदी के परशिया, जो अब ईरान और अफ़ग़ानिस्तान है, में इस तरह के गायन शैली की शुरुआत हुई थी। ११-वीं सदी में जब परशिया से पहला प्रमुख स्थानांतरण हुआ, उस वक़्त संगीत की यह विधा, जिसे समा कहा जाता था, परशिया से निकलकर दक्षिण एशिया, तुर्की और उज़बेकिस्तान जा पहुँची। चिश्ति परिवार के सूफ़ी संतों के अमीर ख़ुसरौ दहल्वी ने परशियन और भारतीय तरीकों को एक ही ढांचे में समाहित कर क़व्वाली को वह रूप दिया जो आज की क़व्वाली का रूप है। यह बात है १३-वीं सदी की। आज 'समा' शब्द का इस्तेमाल मध्य एशिया और तुर्की में होता है और जो क़व्वाली के बहुत करीब होते हैं; जब कि भारत, पाक़िस्तान और बांगलादेश जैसे देशों में क़व्वालियों की महफ़िल को 'महफ़िल-ए-समा' कहा जाता है। अब आपको 'क़व्वाली' शब्द का अर्थ भी बता दिया जाए! अरबी में 'क़ौल' शब्द का अर्थ है 'अल्लाह की आवाज़' या ईश्वर की वाणी। 'क़व्वाल' वो होता है जो किसी 'क़ौल' का दोहराव करता है, और इसी को 'क़व्वाली' कहते हैं। तो दोस्तों, आज हमने आपको क़व्वाली की उत्पत्ति के बारे में बताया, कल क़व्वाली के किसी और पहलु पर बात करेंगे।

और अब आज की क़व्वाली का ज़िक्र किया जाए। दोस्तों, १९४७ में पहली बार नौशाद साहब और शक़ील बदायूनी की जोड़ी बनी थी ए. आर. कारदार की फ़िल्म 'दर्द' में। जहाँ एक तरफ़ इस फ़िल्म के गीतों ने अपार शोहरत हासिल की थी, वहीं दूसरी तरफ़ इसी साल कारदार साहब की ही अन्य फ़िल्म 'नाटक' कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा सकी। इस फ़िल्म में भी शक़ील और नौशाद थे। एस. यू. सनी निर्देशित इस फ़िल्म में अमर और सुरैय्या की जोड़ी पर्दे पर नज़र आई थी। फ़िल्म के ना चलने से फ़िल्म के गानें भी कुछ पीछे रह गए थे। सुरैय्या, उमा देवी और ज़ोहराबाई जैसी गायिकाओं से नौशाद साहब ने इस फ़िल्म में गीत गवाए। सुरैया और सखियों का गाया लोक शैली में "काले काले आए बदरवा आओ सजन मोरे आओ", और उमा देवी का गाया "दिलवाले दिलवाले, जल जल कर ही मर जाना, तुम प्रीत ना कर पछताना" इस फ़िल्म के दो अलग अलग क़िस्म के गानें थे। इसी फ़िल्म में ज़ोहराबाई अम्बालेवाली की गायी एक क़व्वाली भी थी जिसे ज़्यादा सुना नहीं गया, लेकिन अल्फ़ाज़ों के मामले में, तर्ज़ के मामले में, और गायकी के मामले में यह किसी भी चर्चित क़व्वाली से कम नहीं थी। क़व्वाली के बोल हैं "क्या बताएँ कितनी हसरत दिल के अफ़साने में है, सुबह गुलशन में हुई और शाम वीराने में है"। ४० के दशक के अग्रणी गयिकाओं में शुमार होता है ज़ोहराबाई अम्बालेवाली का। फ़िल्म 'नाटक' १९४७ की फ़िल्म थी और इसी साल कुछ दूसरी फ़िल्मों में भी ज़ोहराबाई ने यादगार गीत गाए थे, जिनमें शामिल हैं "टूटा हुआ दिल गाएगा क्या गीत सुहाना, हर बात में ढूंढ़ेगा वो रोने का बहाना" (दूसरी शादी '४७), "भीगी भीगी पलकें हैं और दिल में याद तुम्हारी है" (बेला '४७), "आई मिलन की बहार रे आ जा साँवरिया" (नैया '४७), "सामने गली में मेरा घर है पता मेरा भूल ना जाना" (मिर्ज़ा साहिबाँ '४७) आदि। और आइए अब सुना जाए यह क़व्वाली और ज़रा महसूस कीजिए ४० के दशक के उस ज़माने को, उस दौर में बनने वाली फ़िल्मों को, और उस दौर के अमर फ़नकारों को।



क्या आप जानते हैं...
कि ज़ोहराबाई अम्बालेवाली का २१ फ़रवरी १९९० को लगभग ६८ वर्ष की आयु में बम्बई में निधन हो गया। मृत्यु से मात्र एक माह पूर्व किसी टेलीफ़िल्म के लिए जब उनके घर पर शूटींग्‍ की गई तो बड़ी ही मुश्किल से उन्होंने दो लाइनें "अखियाँ मिलाके जिया भरमाके" गाकर सुनाईं थीं।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस मशहूर कव्वाली के गीतकार बताएं - ३ अंक.
२. निर्देशक राम कुमार की इस फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
३. किस फनकार की टीम ने गाया है इस लाजवाब कव्वाली को - २ अंक.
४ संगीतकारा बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी आपका बहुत बहुत स्वागत है. पर जवाब गलत है :), हाँ अवध जी को हम २ अंक अवश्य देंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, August 29, 2010

आहें ना भरी शिकवे ना किए और ना ही ज़ुबाँ से काम लिया....इफ्तार की शामों में रंग भरती एक शानदार कव्वाली

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 471/2010/171

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों का फिर एक बार स्वागत है इस सुरीली महफ़िल में। दोस्तों, माह-ए-रमज़ान चल रहा है। रमज़ान के इन पाक़ दिनों में इस्लाम धर्म के लोग रोज़ा रखते हैं, सूर्योदय से सूर्यास्त तक अन्न जल ग्रहण नहीं करते, और फिर शाम ढलने पर रोज़े की नमाज़ के बाद इफ़्तार आयोजित किया जाता हैं, जिसमें आस-पड़ोस, और रिश्तेदारों को दावत देकर सामूहिक भोजन कराया जाता है। तो दोस्तों, हमने सोचा कि इन इफ़्तार की शामों को थोड़ा सा और रंगीन किया जाए फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कुछ बेमिसाल क़व्वालियों की महफ़िल सजाकर। इसलिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आज से लेकर अगले दस अंकों में सुनिए ऐसी ही कुछ नायाब फ़िल्मी क़व्वालियों से सजी हमारी नई लघु शृंखला 'मजलिस-ए-क़व्वाली'। इन क़व्वालियों को सुनते हुए आप महसूस कर पाएँगे कि किस तरह से ४० के दशक से लेकर ८० के दशक तक फ़िल्मी क़व्वालियों का चलन बदलता रहा है। इस शृंखला में क़व्वालियों को सुनवाते हुए हम आपको क़व्वालियों के बारे में भी बताएँगे, किस तरह से इसकी शुरुआत हुई, किस किस तरह से ये गाया जाता है, वगैरह। बहरहाल आज जिस क़व्वाली को हमने चुना है उसे फ़िल्म जगत की पहली लोकप्रिय क़व्वाली होने का गौरव प्राप्त है। और यही नहीं यह पहली ऐसी क़व्वाली भी है जिसे केवल महिला गायिकाओं ने गाया है। १९४५ की फ़िल्म 'ज़ीनत' की यह क़व्वाली है "आहें ना भरी शिकवे ना किए और ना ही ज़ुबाँ से काम लिया", जिसे गाया था नूरजहाँ, ज़ोहराबाई, कल्याणीबाई और साथियों ने। इस फ़िल्म में दो संगीतकार थे - मीर साहब और हाफ़िज़ ख़ान (ख़ान मस्ताना)। युं तो नूरजहाँ के गाए कई एकल गीत इस फ़िल्म में मशहूर हुए थे जैसे कि "आंधियाँ ग़म की युं चली", "बुलबुलो मत रो यहाँ" आदि, पर यह क़व्वाली सब से ज़्यादा चर्चित रही और इसने वह धूम मचाई कि इसके बाद फ़िल्मों में क़व्वालियों का चलन बढ़ा और इसी धुन को कम ज़्यादा बदलाव कर फ़िल्मी संगीतकार बार बार क़व्वालियाँ बनाते रहे। बस अफ़सोस की बात यह है कि 'ज़ीनत' के बाद हाफ़िज़ ख़ान को बहुत ज़्यादा सफलता और किसी फ़िल्म में ना मिल सका।

फ़िल्म 'ज़ीनत' की यह क़व्वाली फ़िल्मायी गयी थी शशिकला, श्यामा और शालिनी पर। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में जब शशिकला जी तशरीफ़ लाई थीं, उन्होंने इस क़व्वाली का ज़िक्र किया था, आइए उसी अंश को यहाँ आज पेश किया जाए!

कमल शर्मा: आप ने 'ज़ीनत' का ज़िक्र किया, १९४५ में यह फ़िल्म आई थी, इसमें एक मशहूर क़व्वाली जो है....

शशिकला: जी हाँ, आप कोई यक़ीन नहीं करेंगे, अगर वह पिक्चर आज भी लगे तो सिर्फ़ उस क़व्वाली को देखने और सुनने के लिए लोग वहाँ पे बैठते थे, थिएटर्स में। और उन दिनों जो है क़व्वाली आदमी लोग गाया करते थे, मगर सारी लेडीज़ लोगों ने गाया है, हम लोगों ने उसमें काम किया है।

कमल शर्मा: शशि जी, आप ने नूरजहाँ जी के साथ काम किया है। जैसा उनका अभिनय था, उससे भी ज़्यादा अच्छा वो गाती थीं। आप ने उनको कैसा पाया?

शशिकला: मैं बतायूँ आपको, उन दोनों को मैं भाई साहब और आपा जी कह कर ही बुलाती थी। भाई साहब और आपा जी, इसके सिवा बात नहीं होती थी।

कमल शर्मा: क्या बात है!

शशिकला: और ख़ूबसूरत तो थीं वो, और शौक़त भाई साहब भी उतने ही ख़ूबसूरत थे। मैं कराची गई थी और आपा जी को मिल नहीं सकी। शौक़त भाई साहब से मेरी मुलाक़ात हुई, बहुत रोये वो, बहुत रोये वो, क्योंकि उस वक़्त उनका सेपरेशन हो गया था। और जब कभी मैं वहाँ से गुज़रती हूँ जहाँ वो रहते थे, अपने भी वो दिन याद आ जाते हैं। अगर वो आज होतीं तो मेरी ज़िंदगी कुछ ना कुछ हो जाती। मगर उसके लिए अब मुझे अफ़सोस नहीं है। मदर टेरेसा के पास आने के बाद मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है।

कमल शर्मा: तो 'ज़ीनत' की वही क़व्वाली सुनी जाए!

शशिकला: ज़रूर, ज़रूर!

तो चलिए दोस्तों, 'मजलिस-ए-क़व्वाली' की पहली क़व्वाली कर रहे हैं आपकी नज़र...



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'चौदहवीं का चाँद' में रवि के संगीत से सजी क़व्वाली "शर्मा के युं फिर पर्दानशीं आँचल को सँवारा करते हैं" की धुन फ़िल्म 'ज़ीनत' के इसी क़व्वाली की धुन से प्रेरीत थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस कव्वाली की गायिका बताएं - ३ अंक.
२. ए आर कारदार की इस फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
३. धुन थी नौशाद साहब की, गीतकार बताएं - २ अंक.
४ मुखड़े में शब्द है "सुबह", कव्वाली के बोल बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
प्रतिभा जी, किशोर जी, नवीन जी और अवध जी को सही जवाबों की बधाई. प्रतिभा जी आपने आपने बारे आपने थोडा बहुत बताया, कुछ अधिक बताना चाहें तो oig@gmail.com पर जरूर लिखें. स्वप्निल जी आपने एकदम सही कहा, "कोई बात चले" में केवल दो ही त्रिवेनियाँ है. भूल सुधारने के लिए धन्यवाद.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार सुबह की कॉफी और एक और क्लास्सिक "अंदाज़" के दो अप्रदर्शित और दुर्लभ गीत

नौशाद अली की रूहानियत और मजरूह सुल्तानपुरी की कलम जब जब एक साथ मिलकर परदे पर चलीं तो एक नया ही इतिहास रचा गया. उस पर महबूब खान का निर्देशन और मिल जाए तो क्या बात हो, जैसे सोने पे सुहागा. राज कपूर और नर्गिस जिस जोड़ी ने कितनी ही नायाब फ़िल्में भारतीय सिनेमा को दीं हैं उस पर अगर दिलीप कुमार का अगर साथ और मिल जाए तो कहने की ज़रुरत नहीं कि एक साथ कितनी ही प्रतिभाओं को देखने का मौका मिलेगा......अब तक तो आप समझ गए होंगे के हमारी ये कलम किस तरफ जा रही है...जी हाँ सही अंदाजा लगाया आपने लेकिन यहाँ कुछ का अंदाजा गलत भी हो सकता है. साहब अंदाजा नहीं अंदाज़ कहिये. साथ में मुराद, कुक्कु वी एच देसाई, अनवरीबाई, अमीर बानो, जमशेदजी, अब्बास, वासकर और अब्दुल. सिनेमा के इतने लम्बे इतिहास में दिलीप कुमार और राज कपूर एक साथ इसी फिल्म में पहली और आखिरी बार नजर आये. फिल्म की कहानी प्यार के त्रिकोण पर आधारित थी जिस पर अब तक न जाने कितनी ही फिल्मे बन चुकी हैं. फिल्म में केवल दस गीत थे जिनमे आवाजें थीं लता मंगेशकर, मुकेश, शमशाद बेगम और मोहम्मद रफ़ी साब की. फिल्म को लिखा था शम्स लखनवी ने, जी बिलकुल वोही जिन्होंने सेहरा १९६३ के संवाद लिखे थे. फिल्म १४८ मिनट की बनी थी जो बाद में काटकर १४२ मिनट की रह गयी. ये ६ मिनट कहाँ काटे गए इसका जवाब हम आज लेकर आये हैं.

फिल्म में जैसे कि मैं कह चुका हूँ और आप भी जानते हैं दस गीत थे लेकिन बहुत कम लोग ये जानते होंगे के इस फिल्म में दो और गीत थे एक मुकेश के अकेली आवाज़ में और दूसरा मोहम्मद रफ़ी तथा लता मंगेशकर कि आवाज़ में. आज हम यहाँ दोनों ही गीतों को सुनवाने वाले हैं.पहला गीत है क्यूँ फेरी नज़र मुकेश कि आवाज़ में जिसकी अवधि कुल २ मिनट ५८ सेकंड है. दूसरा गीत जो युगल मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर कि आवाज़ में है जिसकी अवधि २ मिनट ४५ सेकंड है, गीत के बोल हैं सुन लो दिल का अफसाना मेरा अपना जो विचार है कि फिल्म के जो ६ मिनट कम हुए होंगे वो शायद इन्ही दो गीतों कि वजह से हुए होंगे जिनकी कुल अवधि ५ मिनट ५६ सेकंड है. बातें तो इस फिल्म और इसके गीतों के बारे में इतनी है के पूरी एक वेबसाइट बनायीं जा सके लेकिन आपका ज्यादा वक़्त न लेते हुए सुनते हैं ये दोनों गीत.

Song- Kyon feri nazar (mukesh), An Unreleased Song From the movie "Andaaz"


Song - Sun lo dil ka afsana (Lata-Rafi), An Unreleased song from the movie "Andaaz"


प्रस्तुति- मुवीन



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Saturday, August 28, 2010

ओल्ड इस गोल्ड - ई मेल के बहाने यादों के खजाने - ०५...जब खानसाब ने सुनाई गज़ल

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साप्ताहिक अंक 'ईमेल के बहाने, यादों के ख़ज़ाने' में आप सभी का स्वागत है। पिछले हफ़्ते की प्रस्तुति के लिए हमें दो टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं थीं। उसमें पहली टिप्पणी थी इंदु जी की जिन्होंने शरद तैलंग जी की आवाज़ में गानें सुनना चाहा हैं। तो शरद जी, इंदु जी ने जो ज़िम्मेदारी हमें सौंपी थीं, वह अब हम आपको सौंप रहे हैं। जल्द से जल्द आप अपने स्वरबद्ध किए हुए द्ष्यंत कुमार की ग़ज़ल अपनी आवाज़ में रेकॊर्ड कर हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर भेजें। और उस प्रस्तुति की दूसरी टिप्पणी थी महेन्द्र वर्मा जी का जिन्होंने हमसे ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल करने का अनुरोध किया है। तो महेन्द्र जी, इसके जवाब में हम यही कह सकते हैं कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का जो स्वरूप है, उसमें हम केवल सुनहरे दौर के फ़िल्मी गीत ही सुनवाते हैं और उनसे जुड़ी बातें करते हैं। ग़ैर फ़िल्मी गीतों और ग़ज़लों के लिए 'आवाज़' का एक दूसरा स्तंभ है 'महफ़िल-ए-ग़ज़ल' जो हर बुधवार को पेश होता है। उसमें आप अपनी पसंद पूरी कर सकते हैं और अपने सुझाव आप उस स्तंभ मे रख सकते हैं।

और अब आज के ईमेल की बारी। आज के इस अंक के लिए हमने हमारे जिस दोस्त का ईमेल चुना है, वो हैं ख़ानसाब ख़ान। इन्होंने हमें कई ईमेल भेजे हैं समय समय पर और 'ओल्ड इज़ गोल्ड'की तारीफ़ भी की है। उनके कुछ चुनिंदे ईमेलों का मिला-जुला रूप हम नीचे प्रस्तुत कर रहे हैं। **********************************************************************

आदाब,

मैं आपकी इस शानदार जानदार महफ़िल में १३ अप्रैल को शामिल हुआ हूँ। मैं तो युंही शम्मी कपूर जी के बारे में पढ़ना चाह रहा था कि ये साइट खुल गई और आप से मुलाक़ात हो गई। मैं इससे पहले रेडियो पर भी ऐसे प्रोग्रामों में भाग ले चुका हूँ। मुझे इस तरह के प्रोग्राम बहुत बहुत अच्छे लगते हैं।

'सेहरा में रात फूलों की', इस शृंखला में आप ने तो, युं कहें कि फ़िल्म संगीत की ग़ज़लों के १० बेहतरीन मोती चुन कर हम सब को निहाल कर दिया है। ये सब कुछ पढ़कर, सुन कर इतना दिल को भाया कि ऐसा लगता है कि बस इन्हीं को सुनते जाएँ, सुनते जाएँ, बस सुनते ही जाएँ। काश कि ये शृंखला कुछ और लम्बी होती। आख़िर में जो ग़ज़ल आप ने चुनी, "फिर छिड़ी रात बात फूलों की", यह तो दिल-ओ-दिमाग़ में ही उतर गई है। ख़य्याम साहब का संगीत वाक़ई लाजवाब है। इतनी सुंदर शृंखला के लिए आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद।

रोज़ शाम को इस क़दर आप से मुलाक़ात होती है,
जाने आमने सामने ही हमारी युं बात होती है।

आपकी इस महफ़िल का क्या कहना, जितनी भी इसकी तारीफ़ की जाए कम लगता है। इतनी प्यारी प्यारी जानकारियाँ मिलती है कि पूछिए मत कि दिल को कितना अच्छा लगता है। मैं भी कभी कभी छोटी मोटी ग़ज़लें आसान उर्दू में ख़ुद बना लेता हूँ। मैं पिछले सात सालों से ऐसी करगुज़ारियाँ कर रहा हूँ। कभी मौका मिलता है तो कहीं छपवा भी देता हूँ। मैं आपकी इस महफ़िल में भी यह क़दम आगे बढ़ाना चाहता हूँ। अपनी लिखी हुई एक ग़ज़ल भेज रहा हूँ - आशिक़ी।


दिल में आशिक़ी का छाया जो सुरूर है,
दो दिलों के दरमियां कुछ तो जरूर है।

मिलते हैं तो धडकने लगता है ये दिल,
अब आप ही बताएं, ये क्या मेरे हुजूर है।

दूर नजरों से जाना अब और अच्छा नहीं,
नजरों की रूमानीयत में हम मगरूर हैं।

पल दो पल नहीं, सदियों तक साथ रहो,
तेरा साथ, मेरी दीवानगी का ग़ुरूर है।

मिल जाया कीजिए कभी इधर से जाते हुए,
मुलाकातें राहे-मुहब्बत का हंसी नूर है।

चले आओ, हम तन्‍हा तुम भी तन्‍हा हो,
फिजा में बहारें, चमन के कब रहती दूर है।

ख़ुदा हाफ़िज़!

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बहुत ख़ूब ख़ानसाब। आपका बहुत बहुत धन्यवाद, आप ने जिस तरह से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की तारीफ़ की है, हम सचमुच बहुत ख़ुश हुए हैं और जैसे एक नया जोश आ गया है इसे और भी बेहतर बनाने के लिए। आपको 'सेहरा में रात फूलों की' शृंखला अच्छी लगी यह जानकर हमें भी बहुत अच्छा लगा। वाक़ई ख़य्याम साहब का संगीत बहुत ही सुकूनदायक है। जब भी उनके स्वरबद्ध गानें सुनें तो मन को एक अजीब सी शांति मिलती है। आप ने अपने ईमेल में लिखा है शम्मी कपूर जी के बारे में ढूंढ़ते हुए आप हमारी साइट पर आ धमके और युंही हमारे साथ आपकी मुलाक़ात हो गई। तो इसी बात पर हम कहेंगे वही जो नक्श ल्यालपुरी ने कहे थे ख़य्याम साहब की तर्ज़ पर कि "ये मुलाक़ात एक बहाना है, प्यार का सिलसिला पुराना है"। क्यों ना इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल का आनंद लिया जाए आज यहाँ पर! लता जी की आवाज़ में यह ग़ज़ल भी आपको उतनी ही अच्छी लगेगी जितनी "फिर छिड़ी रात" लगी थी। इस ग़ज़ल से जुड़ी यादें नक्श साहब ने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहे थे, आइए उन पर भी नज़र दौड़ाते चलें।

"मैं उस वक़्त बहुत तंग हालातों से घिरा था जब ख़य्याम साहब ने पहली बार मुझे अपनी फ़िल्म में गाने लिखवाने के लिए बुलाया था। मेरी बीवी प्रेगनेण्ट थी और बच्चा उल्टा था। मेरे पास बहुत काम था और बीवी के लिए टेनशन तो थी ही। इसलिए मैंने पहले ख़य्याम साहब को मना कर दिया क्योंकि मैं मेन्टली अपसेट था। ख़य्याम साहब मुझसे दो गीत और जाँनिसार अख़्तर से दो गीत लिखवाना चाहते थे। उसके कुछ समय बाद हम लोग साथ में आए 'ट्रेन टू पाक़िस्तान' में जिसमें कैफ़ी आज़्मी साहब भी हमारे साथ थे। लेकिन वह फ़िल्म कभी नहीं बनी क्योंकि पाक़िस्तान में शूटिंग् करने का परमिशन नहीं मिल सकी। एक दिन मैं अपनी बैल्कनी पर बैठे अखबार पढ़ रहा था, जुहु में, कि ख़य्याम साहब ने सामने सड़क पर से आवाज़ दी कि एक प्रोड्युसर सुबह १० बजे उनसे मिलने आ रहे हैं अपनी नई फ़िल्म 'ख़ानदान' के लिए, और इसलिए ख़य्याम साहब चाहते हैं कि मैं उस फ़िल्म में गानें लिखूँ। मुझे दो गानें लिखने को कहा गया, दो गानें अनजान के पास गए और दो गानें मिले एम. जी, हशमत को। फ़िल्म के निर्देशक थे अनिल गांगुली जिनका 'कोरा काग़ज़' बहुत बड़ा हिट था और जिसमें हशमत साहब ने गानें लिखे थे। इसलिए वो चाहते थे कि हशमत साहब ही 'ख़ानदान' में गानें लिखे। किसी तरह से ख़य्याम साहब ने उन्हें राज़ी करवाया कि फ़िल्म के पहले दो गीत नक्शल्यालपुरी लिखेंगे। तब मैंने लिखा "ये मुलाक़ात एक बहाना, प्यार का सिलसिला पुराना है"। इस को सुनने के बाद सब ने अपना मन बदल दिया और मुझे फ़िल्म के सभी के सभी गीत लिखने का ऒफ़र दे दिया।"


ये मुलाक़ात एक बहाना है,
प्यार का सिलसिला पुराना है।

धड़कनें धड़कनों में खो जाएँ,
दिल को दिल के क़रीब लाना है।

मैं हूँ अपने सनम की बाहों में,
मेरे क़दमों तले ज़माना है।

ख़्वाब तो काँच से भी नाज़ुक है,
टूटने से इन्हें बचाना है।

मन मेरा प्यार का शिवाला है,
आपको देवता बनाना है।

गीत - ये मुलाक़ात एक बहाना है (ख़ानदान)


आप सभी के लिए हम कहेंगे कि मुलाक़ातों का सिलसिला युंही बनाए रखिएगा आगे भी। आप सभी तमाम दोस्त हमें ईमेल भेजते रहें, हमारा हौसला अफ़ज़ाई करते रहें, अपनी यादें, यादगार लम्हें, पसंद के गानें और उनसे जुड़ी बातें और यादें हमारे साथ बांटिये हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर ईमेल भेज कर। कल फिर मुलाक़ात होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमीत अंक में, तब तक के लिए दीजिए इजाज़त, और अब सुनिए फ़िल्म 'ख़ानदान' का यह मीठा सा गीत। नमस्कार!

प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

सुनो कहानी का सौवाँ अंक: सुधा अरोड़ा की "रहोगी तुम वही"

सुनो कहानी के शतकांक पर आवाज़ की टीम की ओर से सभी श्रोताओं का हार्दिक आभार!

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में कृश्न चन्दर की कहानी "एक गधे की वापसी" का अंतिम भाग सुना था।

आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं शतकांक की विशेष प्रस्तुति - प्रसिद्ध लेखिका सुधा अरोड़ा की बहुचर्चित कहानी "रहोगी तुम वही", जिसको स्वर दिया है रंगमंच, दूरदर्शन और सार्थक सिनेमा के प्रसिद्ध कलाकार राजेन्द्र गुप्ता ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 11 मिनट 9 सेकंड।

सुधा अरोड़ा की कथा अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी को आप पहले ही प्रीति सागर की आवाज़ में सुन चुके हैं।


रहोगी तुम वही में पति का एकालाप, ज़ाहिरा तौर पर पत्नी से मुखातिब है। पति के पास, पत्नी से शिक़ायतों का अन्तहीन भन्डार है, जिन्हें वह मुखर हो कर पत्नी पर ज़ाहिर कर रहा है। रोज़मर्रा की आम बातें हैं। उसे पत्नी के हर रूप से शिक़ायत है; और ये रूप अनेक है। वह उन्हें स्वीकारना नहीं चाहता; इसलिए कहे चले जा रहा है कि रहोगी तुम वही, यानी हर हाल, मेरे अयोग्य। निहितार्थ, न मैं बदल सकता हूँ, न तुम्हारे बदलते स्वरूप को सहन कर सकता हूँ, इसलिए रहोगी तुम वही, मुझ से पृथक। पत्नी के पास कहने को बहुत कुछ है पर लेखक को उससे कुछ कहलाने की ज़रूरत नहीं है; अनकहा ज़्यादा मारक ढंग से पाठक तक पहुँच रहा है। क्या कोई पाठक इतना संवेदनहीन हो सकता है कि इस विडम्बना को ग्रहण न कर पाये? शायद हो। मुझे ज़्यादा मुमकिन यह लगता है कि ग्रहण कर लेने के कारण ही, अपने बचाव के लिए वह वही ढोंग करे , जा कहानी का प्रवक्ता पति कर रहा है।~मृदुला गर्ग

सुधा अरोड़ा से उर्मिला शिरीष की बातचीत
सुनो कहानी कार्यक्रम ने आज अपना पहला शतक लगाया है। इस शुभ अवसर पर सभी श्रोताओं को "आवाज़" की टीम की ओर से हार्दिक आभार! ~अनुराग शर्मा

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



आत्माएं कभी नहीं मरतीं। इस विराट व्योम में, शून्य में, वे तैरती रहती हैं - परम शान्त होकर।
~ सुधा अरोड़ा

परिचय: चार अक्तूबर १९४६ को लाहौर में जन्मी सुधा जी की शिक्षा-दीक्षा कोलकाता में हुई जहां उन्होंने अध्यापन भी किया। एकदम विशिष्ट पहचान वाली अपनी कहानियों के लिए जानी गयी सुधा जी की जहां अनेकों पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं वहीं वे सम्पादन और स्तम्भ लेखन से भी जुडी हैं। वे आजकल मुम्बई में रहती हैं।

ऐसी ही बीवियों के शौहर फिर खुले दिमाग वाली औरतों के चक्कर में पड़ जाते हैं और तुम्हारे जैसी बीवियां घर बैठ कर टसुए बहाती हैं। पर अपने को सुधरने की कोशिश बिलकुल नहीं करेंगी!
(सुधा अरोड़ा की "रहोगी तुम वही" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
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#100th Story, Rahogi Tum Vohi: Sudha Arora/Hindi Audio Book/2010/32. Voice: Rajendra Gupta

Friday, August 27, 2010

हिंदी या उर्दू का उच्चारण ठीक करना चाहते है....आज ही इस मौके का लाभ उठायें

दोस्तों नए गीतों के सिलसिले को एक बार फिर रोक कर आज हम उपस्थित हुए हैं एक जरूरी सूचना आप तक पहुंचाने के लिए. यदि आप सफल समाचार वाचक, रिपोर्टर, आर. जे. या voice over आर्टिस्ट या गायक बनना चाहते हैं? या आप अपना हिंदी या उर्दू का उच्चारण ठीक करना चाहते है, तो आपके लिए एक सुनहरा मौका हम लेकर आये है. रेडियो और टीवी के जाने माने वरिष्ठ commentator, newsreader और आर. जे. प्रदीप शर्मा २५ घंटों की एक विशेष वर्कशॉप का आयोजन कर रहे हैं. आवाज़ की पहल पर प्रदीप जी इस वर्कशॉप के लिए तैयार हुए हैं. भाषा की शुद्धता और अदायगी दोनों ही सभी भाषा के सिपाहियों के लिए अति आवश्यक है, तो इस मौके को बिलकुल भी हाथ से न जाने दें.

इस वर्कशॉप में practicals पर विशेष जोर दिया जाएगा. इच्छुक अपना पंजीकरण ५ सितम्बर २०१० तक pramadu@gmail.com पर या हिंद युग्म के मेल यानी hindyugm@gmail.com पर करवा सकते हैं.


प्रदीप शर्मा
प्रदीप शर्मा देश विदेश में क्रिकेट commentary तथा स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की कई वर्षों से commentary कर रहे हैं. आपका तजुर्बा ऑडियो मीडिया में लगभग ३५ वर्षों का है. ढेरों टीवी कार्यक्रमों, धारावाहिकों, और फिल्म्स के लिए भी आप डब्बइंग कर चुके हैं. अब तक सैकड़ों युवा प्रतिभाओं और प्रोफेशनल्स को प्रशिक्षण दे चुके हैं. फिल्म और संगीत जगत के ढेरों जानी मानी हस्तियों के प्रदीप जी द्वारा लिए गए कई साक्षात्कार रेडियो से प्रसारित हो चुके हैं.

Thursday, August 26, 2010

जाने क्या सोच कर नहीं गुजरा....गुलज़ार साहब के गीतों से सजा हर लम्हा कुछ सोचता रुक जाता है हमारे जीवन में भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 470/2010/170

ल्ड इज़ गोल्ड' पर गुलज़ार साहब के लिखे गीतों की लघु शृंखला 'मुसाफ़िर हूँ यारों' की अंतिम कड़ी में आपका स्वागत है। दोस्तों, अभी शायद कल ही हमने ज़िक्र किया था गुलज़ार साहब के ग़ैर पारम्परिक रूपक और उपमाओं का। जिस ख़ूबसूरती से वो रूपकों का इस्तेमाल करते है, उसी अंदाज़ में विरोधाभास का एक उदाहरन देखिए कि जब वो लिखते हैं "जाने क्या सोच कर नहीं गुज़रा, एक पल रात भर नहीं गुज़रा"। एक पल जो हक़ीक़त में एक पल में ही गुज़र जाता है, गुलज़ार साहब ने उस पल को रात भर नहीं गुज़रने दिया। विरोधाभास का इससे बेहतर इस्तेमाल भला और क्या हो सकता है। आज फ़िल्म 'किनारा' के इसी गीत के साथ इस शृंखला का समापन कर रहे हैं। राहुल देव बर्मन की तर्ज़ पर यह गीत किशोर कुमार ने गाया था। गुलज़ार साहब के शब्दों में ये रही इस गीत की भूमिका - "ज़िंदगी कभी पलों में गुज़र जाती है, कभी ज़िंदगी भर एक पल नहीं गुज़रता। इंदर की ज़िंदगी में भी ऐसा ही एक पल ठहर गया था जिसे वो आरति के नाम से पहचान सकता था। रात गुज़र रही थी लेकिन वह एक पल सारी रात पे भारी था। जाने क्या सोच कर नहीं गुज़रा, एक पल रात भर नहीं गुज़रा।" 'किनारा' १९७७ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण प्राणलाल मेहता और गुलज़ार ने मिलकर किया था। कहानी, संवाद और निर्देशन गुलज़ार साहब का ही था। यानी कि पूरी तरह से यह गुलज़ार साहब की ही फ़िल्म थी। जीतेन्द्र, हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र और श्रीराम लागू अभिनीत इस फ़िल्म की शूटिंग मध्य प्रदेश के माण्डू में किया गया था। इस फ़िल्म के सभी गानें हिट हुए थे। आज के प्रस्तुत गीत के अलावा लता और भूपेन्द्र का गाया "नाम गुम जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा" और "मीठे बोल बोले, बोले पायलिया", भूपेन्द्र और हेमा मालिनी का गाया "एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैने", और लता का गाया "अब के ना सावन बरसे" बेहद सुरीले गानें हैं जिन्हें राहुल देव बर्मन ने शास्त्रीय संगीत के आधार पर स्वरबद्ध किया था।

और अब गुलज़ार साहब के लेखनी की कुछ और बात की जाए! गुलज़ार साहब ने कविता लेखन की एक नई परम्परा की शुरुआत की है जिसे उन्होंने नाम दिया है 'त्रिवेणी'। इस तरह की कविताओं के हर अंतरे में तीन पंक्तियाँ होती हैं जो आपस में तुकबंद होते हैं। उनकी प्राइवेट ऐल्बम 'कोई बात चले' के सभी गीत इसी त्रिवेणी शैली में लिखे हुए हैं जिन्हे गाया है जगजीत सिंह ने। गुलज़ार साहब के जीवन की पूरी जानकारी अगर आप पाना चाहते हैं तो उन पर लिखी किताब 'Because he is...' को पढ़ें जो उनकी जीवनी है और जिसे लिखा है उन्ही की सुपुत्री मेघना गुलज़ार ने, जो ख़ुद भी एक निर्देशिका हैं। गुलज़ार साहब के बारे में और क्या बताएँ, उनके गानें, जो लगातार आते जा रहे हैं, और हर बार कुछ नया उनसे मिलता है, गुलज़ार साहब इसी तरह से लिखते चले जाएँ, इसी तरह से शब्दों के साथ खेलते रहें और हर बार कुछ अलग हट के लिख कर हमें चौंकाते रहें, 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम उन्हें दे रहे हैं ढेरों शुभकामनाएँ। गुलज़ार साहब पर केन्द्रित इस लघु शृंखला को समाप्त करने से पहले हम फिर एक बार आपको याद दिलाना चाहेंगे कि अब आप भी अपने पसंद के गीतों को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन सकते हैं अपने नाम के साथ। आपको बस इतना करना होगा कि अपने मनपसंद गीत की फ़रमाइश और उस गीत से जुड़ी अपनी यादों को संक्षिप्त में लिख कर oig@hindyugm.com के ईमेल पते पर लिख भेजना होगा। आपकी फ़रमाइश हम पूरी करेंगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में जो प्रस्तुत होता है हर शनिवार की शाम। आप चाहें तो किसी भी विषय पर अपने अनुभव और संस्मरण भी हमें लिख सकते हैं। तो इसी उम्मीद के साथ कि आपके ईमेल हमें जल्दी ही प्राप्त होंगे, अब आज के लिए आप से इजाज़त चाहते हैं, शनिवार को आपसे फिर मुलाक़ात होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में। और लीजिए अब सुनिए फ़िल्म 'किनारा' का गीत किशोर दा की आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि किशोर कुमार के गाए फ़िल्म 'किनारा' का यह गीत "जाने क्या सोच कर नहीं गुज़रा" राग केदार पर आधारित है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. शशिकला, श्यामा और शालिनी पर फिल्माई गयी ये कव्वाली किस फिल्म से है - १ अंक.
२. केवल महिला गायिकाओं की आवाजें हैं इसमें, तीनों प्रमुख गायिकाओं के नाम बताएं - ३ अंक.
३. संगीतकार बताएं - २ अंक.
४ फिल्म चौदहवीं का चाँद में भी एक कव्वाली थी जो इस कव्वाली की धुन से प्रेरित थी, याद करें और बताएं इसके बोल- २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी बहुत बहुत मुबारक आपने १०० का आंकड़ा छू कर एक बार फिर अपनी काबिलियत साबित कर दी है. आपके लिए एक विशेष पुरस्कार हमने सुरक्षित रखा है हमारे सालाना कार्यक्रम में. ५०० वें एपिसोड तक जो भी अन्य प्रतिभागी इस आंकड़े को छू लेगा उसे भी पुरस्कार अवश्य मिलेगा. तो जल्दी कीजिये अब तक अन्य सदस्यों के स्कोर इस तरह हैं- अवध जी - ७०, इंदु जी ३८, पवन जी २६, और किशोर, नवीन और प्रतिभा जी १८ अंको पर हैं. ई मेल नोटिफिकेशन में समय लग सकता है, आप सीधे ६.३० पर आवाज़ पर पधार सकते हैं और जवाब देने में फुर्ती दिखा सकते हैं रोमेंद्र जी, शुभकामनाएँ

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, August 25, 2010

रोज अकेली आये, चाँद कटोरा लिए भिखारिन रात.....गुलज़ार साहब की अद्भुत कल्पना और सलिल दा के सुर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 469/2010/169

'मुसाफ़िर हूँ यारों', गुलज़ार साहब के लिखे गीतों के इस लघु शृंखला की आज नवी कड़ी है। अब तक इसमें आपने गुलज़ार साहब के साथ जिन संगीतकारों के गीत सुनें, वो हैं राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, शंकर-जयकिशन, वसंत देसाई, इलैयाराजा और कल्याणजी-आनंदजी। आज बारी है संगीतकार सलिल चौधरी की। गुलज़ार साहब और सलिल दा के कम्बिनेशन का कौन सा गीत हमने चुना है, उस पर हम अभी आते हैं, उससे पहले गुलज़ार साहब की शान में कुछ कहने को जी चाहता है। गुलज़ार साहब ने अपने अनोखे अंदाज़ में पुराने शब्दों को भी जैसे नए पहचान दिए हों। उनके ख़ूबसूरत रूपक और उपमाएँ सचमुच हमें हैरत में डाल देते हैं और यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि ऐसा भी कोई सोच सकता है! उनके गीतों में कभी तारे ज़मीं पर चलते हैं तो कभी सर से आसमान उड़ जाता है। धूप, मिट्टी, रात, बारिश, ज़मीन, आसमान और बूंदों को नए नए रूप में हमारे सामने लाते रहे हैं गुलज़ार साहब। अब रात और चांद जैसे शब्दों को ही ले लीजिए। न जाने कितने असंख्य गीत बनें हैं "चाँद" और "रात" पर। लेकिन जब गुलज़ार साहब ने इन पर गीत लिखना चाहा तो उन्होंने रात को भिखारन के रूप में देखा जो चाँद रूपी कटोरा लेकर भीख माँगने निकली है। किसी और गीतकार ने ऐसा क्यों नहीं सोचा इससे पहले? लेकिन आप अब तक ज़रूर समझ गए होंगे कि सलिल दा और गुलज़ार साहब का कौन सा गीत आज हम सुनवाने जा रहे हैं। जी हाँ, फ़िल्म 'मेरे अपने' का "रोज अकेली आए, रोज बेचारी जाए, चाँद कटोरा लिए भिखारन रात"। लता जी की आवाज़ है इस ख़ूबसूरत गीत में। एन. सी. सिप्पी, राज एन. सिप्पी और रोमू एन. सिप्पी निर्मित १९७१ की इस फ़िल्म के निर्देशक थे गुलज़ार और उन्होंने ही इंद्र मित्र की मूल कहानी को फ़िल्मी जामा पहनाया। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे मीना कुमारी, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिंहा, सुमिता सान्याल, रमेश देओ, देवेन वर्मा, अभि भट्टाचार्य प्रमुख। फ़िल्म के संगीत विभाग की बात करे तो लता मंगेशकर, किशोर कुमार और मुकेश के गाए गानें थे, सेबास्टियन डी'सूज़ा और कानू घोष सलिल दा के सहायक थे, और बतौर सॊंग रेकॊर्डिस्ट इस फ़िल्म के गीतों को रेकॊर्ड किया डी.ओ. भन्साली, मंगेश देसाई, कौशिक, मीनू कात्रक और ब्रह्मानंद शर्मा ने।

'मेरे अपने' की कहानी जहाँ एक तरफ़ गाँव और शहरों के बीच की दूरी को दर्शाती है, वहीं दूसरी तरफ़ इंसानी रिश्तों की भी कहानी है। आनंदी (मीना कुमारी) एक विधवा औरत है जो अकेली अपने गाँव में रहती है। एक दिन अचानक कोई अरुण गुप्ता (रमेश देओ) उसके पास आ खड़ा होता है और अपने आप को उसका रिश्तेदार कहता है, और उसे वो अपने साथ चल कर शहर में उसके परिवार का हिस्सा बनने को कहता है। आनंदी मान जाती है। लेकिन शहर में आते ही आनंदी को अहसास हो जाता है गाँव और शहर के बीच के फ़र्क का। यहाँ शहर में ना किसी के दिल में ममता है, चारों तरफ़ मार-धाड़, चोरी डकैती हो रही है, बच्चों का शोषण हो रहा है। ऐसे ही एक शोषित बच्चे को वो घर ले आती है, लेकिन घरवाले उसे अपनाने से इंकार कर देते हैं। आनंदी को भी इस बात का अहसास हो जाता है कि अरुण ने दरअसल उसे हमदर्दी या प्यार से अपने परिवार में शामिल नहीं किया था, बल्कि उसे अपने घर के काम काज और बच्चे की देखभाल के लिए बुला लाया था ताकि मुफ़्त में एक आया मिल जाए। आनंदी घर छो़ड़ कर चली जाती है उस बेसहारा बच्चे के साथ और एक टूटे फूटे घर में रहने लगती है इस उम्मीद के साथ कि कभी कोई आए और आकर कहे कि वही है उसका अपना। फ़िल्म में आगे आनंदी दो मोहल्ले के बेरोज़गार युवकों की रंजीशों का शिकार हो जाती है। 'मेरे अपने' तपन सिंहा की बांगला फ़िल्म 'आपोन जोन' पर आधारित था। और दोस्तों, अब गीत सुनने से पहले पढ़िए कि गुलज़ार साहब ने 'जयमाला' में इस गीत को बजाने से पहले किस तरह की भूमिका पेश की थी - "लता जी की आवाज़ से जी तो नहीं भरता, आप का भी नहीं भरा होगा! मेरी बेसुरी आवाज़ आपको नाराज़ कर रही होगी! मैं आप को ख़फ़ा नहीं करूँगा और ना ही लता जी की आवाज़ की लड़ी को टूटने दूँगा। उसी रात का ज़िक्र सुनिए जो बीतानी पड़ी थी। भिखारन रात को चाँद कटोरा लिए गाते हुए कभी सुना है? कभी रात को आँखें खुल गई हो और दूर से किसी की आलप सुनाई दे रही हो?"



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'मेरे अपने' गुलज़ार द्वारा निर्देशित पहली फ़िल्म थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. किशोर के गाये इस गीत के संगीतकार कौन हैं - २ अंक.
२. गुलज़ार निर्देशित इस फिल्म का नाम बताये - १ अंक.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"सोच", संगीतकार बताएं - २ अंक.
४ फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री कौन है - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी, शरद जी और इंदु जी सही जवाबों के साथ हाज़िर मिले. कनाडा वाली टीम नदारद रही.....कहाँ ????

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, August 24, 2010

तुम्हें जिंदगी के उजाले मुबारक....एक गैर-गुलज़ारनुमा गीत, जो याद दिलाता है मुकेश और कल्याणजी भाई की भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 468/2010/168

क्षाबंधन के शुभवसर पर सभी दोस्तों को हम अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए आज की यह प्रस्तुति शुरु कर रहे हैं। दोस्तों, आज रक्षाबंधन के साथ साथ २४ अगस्त भी है। आज ही के दिन सन् २००० को संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के कल्याणजी भाई हम से हमेशा के लिए दूर चले गए थे। आज जब हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर गुलज़ार साहब के लिखे गीतों की शृंखला प्रस्तुत कर रहे हैं, तो आपको यह भी बता दें कि गुलज़ार साहब ने एक फ़िल्म में कल्याणजी-आनंदजी के लिए गीत लिखे थे। और वह फ़िल्म थी 'पूर्णिमा'। आज कल्याणजी भाई के स्मृति दिवस पर आइए उसी फ़िल्म से एक बेहद प्यारा सा दर्द भरा गीत सुनते हैं मुकेश की आवाज़ में - "तुम्हे ज़िंदगी के उजाले मुबारक़, अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं, तुम्हे पाके हम ख़ुद से दूर हो गए थे, तुम्हे छोड़ कर अपने पास आ गए हैं"। अभी दो दिन बाद, २७ अगस्त को मुकेश जी की भी पुण्यतिथि है। इसलिए आज के इस गीत के ज़रिए हम कल्याणजी भाई और मुकेश जी, दोनों को ही श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं।'पूर्णिमा' १९६५ की फ़िल्म थी और उन दिनों गुलज़ार साहब नए नए फ़िल्मी गीतकार बने थे। इस गीत को सुनते हुए आप महसूस करेंगे कि इसमें गुलज़ार साहब का वह ग़ैर पारम्परिक स्टाइल तब तक डेवेलप नहीं हुआ था जिसके लिए बाद में वो जाने गए; बल्कि इस गीत में उस ज़माने के गीतकारों की झलक ज़्यादा मिलती है। फिर भी गीत के अंतरों में बहुत सुंदर बातें उन्होंने कहे हैं, जैसे कि "तुम्हारी वफ़ाओं से शिकायत नहीं है, निभाना तो कोई रवायत नहीं है, जहाँ तक क़दम आ सके आ गए हैं, अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं"। दूसरे अंतरे में गुलज़ार साहब लिखते हैं "चमन से चले हैं ये इलज़ाम लेकर, बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर, मुरादों की मंज़िल से दूर आ गए हैं, अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं"। मुकेश, जो ज़्यादातर यादगार दर्द भरे गीतों के लिए जाने जाते हैं, यह गीत भी उन्ही यादगार गीतों में से एक है। मुकेश की आवाज़ में ये सभी गीत जैसे आम आदमी के गले से निकले हुए लगते हैं। आज का यह प्रस्तुत गीत फ़िल्माया गया है धर्मेन्द्र पर और इस फ़िल्म में उनकी नायिका बनीं थीं मीना कुमारी।

आज बहुत दिनों बाद हम रुख़ कर रहे हैं उसी आनंदजी के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम की तरफ़ और आज उस लम्बे इंटरव्यु से उस अंश को पेश कर रहे हैं जिसमें चला था फ़िल्म 'पूर्णिमा' के गीतों का ज़िक्र। आनंदजी से बात कर रहे हैं कमल शर्मा।

प्र: 'पूर्णिमा' के गानों का ज़िक्र हम कर रहे हैं तो उसमें एक बड़ा ही संजीदा गाना मुकेश जी की आवाज़ में, और बड़ा ही दिल को छू लेने वाला गाना है, "तुम्हे ज़िंदगी के उजाले मुबारक़"।

उ: अच्छा, इस फ़िल्म में गुलज़ार जी ने पहली बार हमारी फ़िल्म में गाना लिखा था। कमल जी, 'पूर्णिमा' में, आपको मालूम है दो गानें गुलज़ार जी ने लिखे, प्रकाश मेहरा जी ने भी गाना लिखा था इसमें, पहली बार, और कॊमेडी गाना था, भरत व्यास जी ने भी लिखा था, इस फ़िल्म का "हमसफ़र मेरे हमसफ़र पंख तुम परवाज़ हम" गाना बहुत चला था, इसमें एक और गाना भी था जिसे मुकेश जी ने गाया था, "गोरी नैन तुम्हारे क्या कहने", उन दिनों आशिक़ महबूबा को हाथ नहीं लगाते थे, बातों से ही काम निबटा लेते थे। (कमल शर्मा ज़ोर से हंस पड़ते हैं)

प्र: सांकेतिक था सबकुछ, ताकि मर्यादा भी बनी रहे, बात भी हो जाए!

उ: यह भी बहुत बोल्ड है, क्योंकि किसी को 'आप सुंदर हैं' यह कहना उन दिनों में हिम्मत नहीं होती थी, मन ही मन समझ जाते थे, आँखें उनकी तरफ़ करके स्माइल कर देंगे, लेकिन कह नहीं सकते। लेकिन आज के दिनों में अगर आप अपने बीवी को भी कहदो कि 'आज आप अच्छी लग रही हो' तो वो कहेगी कि 'कल बुरी लग रही थी क्या?'

दोस्तों, मुकेश की आवाज़ में आज का यह प्रस्तुत गीत राग दरबारी कानाड़ा पर आधारित है। उपर आनंदजी ने इस फ़िल्म के कई गीतों का उल्लेख किया, एक और गीत इस फ़िल्म का जिसका भी उल्लेख होना चाहिए, वह है सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में "शरदचन्द्र की पूर्णिमा", जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी है। तो लीजिए सुनिए मुकेश की आवाज़ में कल्याणजी-आनंदजी की संगीत रचना, और शब्दकार हैं गुलज़ार। 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से कल्याणजी भाई और मुकेश जी को स्मृति सुमन!



क्या आप जानते हैं...
कि गुलज़ार साहब को सन्‍ २००४ में पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया था और सन्‍ २००२ में उनकी लघु कहानियों की किताब 'धुआँ' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. मुखड़े में शब्द है "कटोरा", संगीतकार बताएं - २ अंक.
२. किस लेखक की मूल कहानी पर आधारित है ये फिल्म, जिसे लिखा और निर्देशित किया भी गुलज़ार साहब ने था - ३ अंक.
३. गायिका बताएं - १ अंक.
४ फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री का नाम बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ठीक है प्रतिभा जी, हमें इंतज़ार रहेगा. शरद जी अब मात्र ४ अंक दूर हैं..सभी को बधाई....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

दिल खोल के लेट्स रॉक....करण जौहर लाये हैं एक बार फिर "फैमिली" में शंकर एहसान लॉय के संगीत का तड़का

ताज़ा सुर ताल ३२/२०१०

सुजॊय - नमस्कार! आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनएँ और विश्व दीपक जी, आपको भी।

विश्व दीपक - सभी श्रोताओं व पाठकों और सुजॉय, तुम्हे भी मेरी ओर से ढेरों शुभकमानाएँ! सुजॉय, रक्षाबंधन भाई बहन के प्यार का पर्व है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधते हुए उसके सुरक्षा की कामना करती है और भाई भी अपनी बहन को ख़ुश रखने और उसकी रक्षा करने का प्रण लेता है। कुल मिलाकर पारिवारिक सौहार्द का यह त्योहार है।

सुजॉय - जी हाँ, यह एक पारिवारिक त्योहार है और आपने परिवार, यानी फ़ैमिली का ज़िक्र छेड़ा तो मुझे याद आया कि पिछले हफ़्ते हमने वादा किया था कि इस हफ़्ते हम 'टी.एस.टी' में 'वी आर फ़ैमिली' के गानें सुनवाएँगे। तो लीजिए, रक्षाबंधन पर आप सभी अपने फ़मिली के साथ आनंद लीजिए इसी फ़िल्म के गानों का। आज छुट्टी का दिन है, आप सब के फ़ैमिली मेम्बर्स घर पर ही मौजूद होंगे, तो राखी पर्व की ख़ुशियाँ मनाइए 'वी आर फैमिली' के गीतों को सुनते हुए।

विश्व दीपक - इससे पहले की फ़िल्म का पहला गाना सुनें, मैं यह बता दूँ कि यह धर्मा प्रोडक्शन्स यानी कि करण जोहर की निर्मित फ़िल्म है, जिसका निर्देशन किया है सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने। फ़िल्म में संगीत भी करण जोहर के पसंदीदा संगीतकार तिकड़ी शंकर-अहसान-लॉय ने दिया है तथा गानें इसमें लिखे हैं इरशाद कामिल और अन्विता दत्तगुप्तन ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं काजोल, करीना कपूर, अर्जुन रामपाल, आँचल मुन्जल, नोमिनाथ जिन्स्बर्ग और दीया सोनेचा। आइए सुनते हैं फ़िल्म का पहला गीत राहत फ़तेह अली ख़ान, श्रेया घोषाल और शंकर महादेवन की आवाज़ों में।

गीत - आँखों में नींदें


सुजॉय - सुरीला गाना है, शंकर-अहसान-लॉय का स्टाइल साफ़ झलकता है, बीट्स भी उनके पिछले करण जोहर की फ़िल्मों के गीतों की तरह है। श्रेया और राहत साहब के जो शास्त्रीय शैली में आलाप गाए हैं, उससे गीत को एक अलग मुकाम मिला है। श्रेया और राहत साहब के गाए "तेरी ओर" गीत की तरह यह गीत भी बहुत सुरीला है और इसे भी ख़ूब सुना जाएगा ऐसा मेरा विश्वास है।

विश्व दीपक - और गीतकार की बात करें तो इरशाद कामिल ने प्रीतम के साथ ही सब से ज़्यादा काम किया है। पहली बार शंकर-अहसान-लॉय के लिए उन्होंने गीत लिखा है इस फ़िल्म में। आपने बीट्स की बात की तो मुझे भी फ़ील हुआ कि इस तिकड़ी ने यही बीट्स 'कल हो ना हो' फ़िल्म के "कुछ तो हुआ है"। चलिए अब आगे बढ़ा जाए, और सुना जाए इस फ़िल्म का शायद सब से चर्चित गीत जिसे फ़िल्म के प्रोमोज़ में ख़ूब दिखाया और बजाया गया है। एल्विस प्रेस्ली के मशहूर रॉक सॉन्ग "जेल-हाउस रॉक" से इन्स्पायर्ड यह गीत है "दिल खोल के लेट्स रॉक", सुनते हैं...

गीत -दिल खोल के लेट्स रॉक


सुजॉय - सुनने में आया है कि एल्विस प्रेस्ली की इस धुन का इस्तेमाल करने से पहले इसकी अनुमति ली गई है। फ़िल्म में यह गीत काजोल, करीना और अर्जुन पर फ़िल्माया गया है और आवाज़ें हैं अनुष्का मनचन्दा, आकृति कक्कर और सूरज जगन की। शंकर-अहसान-लॉय ने एल्विस के कॉम्पोज़िशन और अरेंजमेण्ट के साथ भी छेड़-छाड़ नहीं किया है और ्जैसा कि हमने बताया कि इसकी अनुमति ली गई है, तो एक तरह से इसे एल्विस के गीत का official adaptation भी कह सकते हैं।

विश्व दीपक - इस गीत को लिखा है अन्विता दत्तगुप्तन ने जो आज के दौर की सक्रीय गीतकार बनती जा रही हैं। उन्होंने बस यही गीत इस फ़िल्म में लिखा है। "मुझे नहीं पता मैं क्या गाउँगी, उल्टे सीधे लफ़्ज़ों से बनाउँगी", "मैं तो भूल गई फिर क्या वर्डिंग्स थे" जै्सी लाइनों की कल्पना शायद दस साल पहले भी फ़िल्मी गीतों में नहीं की जा सकती थी। इसमें कोई शक़ नहीं धीरे धीरे फ़िल्मों की कहानियाँ और गानें हक़ीक़त की ज़िंदगी के ज़्यादा करीब आती जा रही हैं।

सुजॉय - वैसे तो जैसा कि आपने कहा कि एल्विस का ही अरेंजमेण्ट बरकरार है, बस दूसरे इंटरल्युड में कुछ देसी ठेकों का भी मज़ा लिया जा सकता है। कुल मिलाकर सिचुएशनल गीत है, लेकिन इसे अलग सुनते हुए भी ख़ूब मज़ा आता है। यह गीत भी मेरे ख़याल से लम्बे समय तक पसंद किया जाएगा। और अब फ़िल्म का तीसरा गीत जो पिछले गीत के मुकाबले बिलकुल ही अलग हट कर है, आइए पहले सुन लेते हैं।
गीत - रहम-ओ-करम


विश्व दीपक - "रहम-ओ-करम" शंकर महादेवन और विशाल दादलानी की आवाज़ों में था और इसे सुनते हुए 'माइ नेम इज़ ख़ान' के "नूर-ए-ख़ुदा" की याद आ ही जाती है जिसे शंकर महादेवन के साथ अदनान सामी और श्रेया घोषाल ने गाया था। "रहम-ओ-करम" दरसल एक फ़्युज़न है, एक तरफ़ सूफ़ी रंग भी है और संगीत में सॉफ्ट रॉक अपील भी। शंकर और विशाल ने एक प्रार्थना की तरह इस गीत को गाया है और कोरस का इस्तेमाल भी सुंदर तरीके से किया गया है।

सुजॉय - जब कोरस "रहम-ओ-करम" गाते हैं, तो ज़रा सी "तेरी है ज़मीं तेरा आसमाँ" की भी शायद एक हल्की सी झलक मिल जाती है। शायद वजह है चर्च में कॊयर की जो गायन शैली होती है, उस तरह की गायकी इन दोनों में प्रयोग हुआ है। ईलेक्ट्रिक गीटार और परक्युशन्स का इस्तेमाल इस गीत के अरेंजमेण्ट की विशेषताएँ हैं। अब अगले गीत की तरफ़ बढ़ा जाए, सोनू निगम और श्रेया घोषाल की आवाज़ें इस हफ़्ते भी जारी है, एक और नर्मो-नाज़ुक रोमांटिक डुएट। सुनिए...

गीत - हमेशा ऐण्ड फ़ॉरेवर दिल में तू


विश्व दीपक - सुजॉय, आपने अभी कुछ देर पहले चर्च-कॉयर की बात की थी, तो इस गीत में भी कोरल का जिस तरह से इस्तेमाल किया गया है, वह भी उसी अंदाज़ का है। पियानो का बड़ा ही सुरीला इस्तेमाल पूरे गीत में होता है। यह भी एक सॊफ़्ट रॊक नंबर है और सोनू और श्रेया की आवाज़ों ने गीत के साथ पूरा पूरा न्याय किया है। यह गीत भले चार्ट-बस्टर ना साबित हो, लेकिन इस तरह के गानों के क़द्रदानों की भी कोई कमी नहीं है, और अच्छे संगीत के क़द्रदान इस गीत को हाथों-हाथ ग्रहण करेंगे, ऐसी उम्मीद हम रखते हैं।

सुजॉय - "हमेशा ऐण्ड फ़ॉरएवर" की धुन को ही जारी रखते हुए शंकर-अहसान-लॉय ने बनाया है एक और ऐसा ही सॉफ़्ट नंबर "सुन ले दुआ ये आसमान", जिसे बेला शेण्डे ने गाया है। यह पिछले गीत से भी ज़्यादा धीमा है, और जो शायद करण जोहर स्टाइल के जज़्बाती थीम म्युज़िक की श्रेणी में स्थान रखता है। चलिए यह गीत भी सुन लिया जाए और फिर उसके बाद हम इस पूरे ऐल्बम के बारे में अपनी राय बताएँगे।

गीत - सुन ले दुआ ये आसमान


सुजॉय - तो फ़िल्म के सभी ५ गानें हमने सुनें। हर गीत को अलग अलग सुना जाए तो सभी गानें अच्छे हैम इसमें कोई शक़ नहीं, लेकिन जो गानें मुझे ख़ास पसंद आए, वो हैं "आँखों में नींदें" और "रहम-ओ-करम"। 'वी आर फ़ैमिली' ऐल्बम को 'अबव ऐवरेज' ही माना जाना चाहिए, सभी गानें सिचुएशनल है या थीम बेस्ड हैं, और फ़िल्म की कामयाबी पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। फ़िल्म चल पड़ी तो इन गीतों भी बढ़ावा मिलेगा। तो मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ३.५ की रेटिंग, और आप सभी को यही कहेंगे कि आज इस ख़ुशी के अवसर पर, यानी रक्षाबंधन पर दिल खोल के लेट्स रॉक!!!

विश्व दीपक - वैसे कोई भी गीत ऐसा नहीं है जिसके बारे में कहा जा सके कि धूम मचा देंगें, पर सभी गीत सुरीले और सोलफुल अवश्य हैं. फिल्म में काजोल है तो एक जबरदस्त अभिनय की उनसे उम्मीद रहेगी. आपने सही कहा गारा फिल्म दर्शकों के मन छू पाए तो इसके संगीत भी चल निकलेगा....

आवाज़ रेटिंग्स: वी आर फैमिली: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९४- अन्विता दत्तगुप्तन का लिखा वव कौन सा गीत है जिसे गा कर शिल्पा राव को पुरस्कार मिला था?

TST ट्रिविया # ९५- एल्विस प्रेस्ली के "जेल-हाउस रॉक" गीत को Rolling Stone's List of The 500 Greatest Songs of All Time में कौन सा स्थान मिला है?

TST ट्रिविया # ९६- करण-जोहर और शंकर-अहसान-लॉय के अलावा 'कल हो ना हो' और 'वी आर फ़मिली' के संगीत में और क्या समानता आप ढूँढ़ सकते हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. ज़ी सा रे गा मा
२. "छोटी छोटी रातें लम्बी हो जाती हैं" (तुम बिन)
३. दोनों में राहत फ़तेह अली ख़ान - श्रेया घोषाल तथा सोनू निगम - श्रेया घोषाल के गाए युगल गीत हैं।

एक बार फिर सीमा जी २ सही जवाबों के साथ हाज़िर हुई, बधाई

Monday, August 23, 2010

सुरमई अंखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे.....एक स्वर्ग से उतरी लोरी, येसुदास की पाक आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 467/2010/167

च्चों के साथ गुलज़ार साहब का पुराना नाता रहा है। गुलज़ार साहब को बच्चे बेहद पसंद है, और समय समय पर उनके लिए कुछ यादगार गानें भी लिखे हैं बिल्कुल बच्चों वाले अंदाज़ में ही। मसलन "लकड़ी की काठी", "सा रे के सा रे ग म को लेकर गाते चले", "मास्टरजी की आ गई चिट्ठी", आदि। बच्चों के लिए उनके लिखे गीतों और कहानियों में तितलियाँ नृत्य करते हैं, पंछियाँ गीत गाते हैं, बच्चे शैतानी करते है। जीवन के चिर परिचीत पहलुओं और संसार की उन जानी पहचानी ध्वनियों की अनुगूंज सुनाई देती है गुलज़ार के गीतों में। बच्चों के गीतों की बात करें तो एक जौनर इसमें लोरियों का भी होता है। गुलज़ार साहब के लिखे लोरियों की बात करें तो दो लोरियाँ उन्होंने ऐसी लिखी है कि जो कालजयी बन कर रह गई हैं। एक तो है फ़िल्म 'मासूम' का "दो नैना और एक कहानी", जिसे गा कर आरती मुखर्जी ने फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता था, और दूसरी लोरी है फ़िल्म 'सदमा' का "सुरमयी अखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे"। येसुदास की नर्म मख़मली आवाज़ में यह लोरी जब भी सुनें दिल को एक सुकून दे जाती है। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इसी लोरी की बारी। हालाँकि हमने बच्चों की बात की, लेकिन आपको पता होगा कि फ़िल्म 'सदमा' में यह लोरी किसी बच्चे को सुलाने के लिए नहीं, बल्कि कमल हासन दिमागी तौर पर असंतुलित श्रीदेवी को सुलाने के लिए गा रहे होते हैं। 'सदमा' फ़िल्म आप में से अधिकतर लोगों ने देखी होगी, और देखनी भी चाहिए। यह भी हिंदी सिनेमा की एक क्लासिक फ़िल्म है जिसकी तारीफ़ जितनी भी की जाए कम है। 'सदमा' का निर्माण किया था राज एन. सिप्पी और रोमू एन. सिप्पी ने, कहानी, निर्देशन, स्क्रीनप्ले और सिनेमाटोग्राफ़ी था बालू महेन्द्र का। गुलज़ार साहब ने फ़िल्म के संवाद और गीत लिखे। फ़िल्म में संगीत था इलैयाराजा का। फ़िल्म की कहानी जितनी मर्मस्पर्शी थी, उतने ही मर्मस्पर्शी अभिनय से परदे पर इसे साकार किया कमल हासन और श्रीदेवी ने। फ़िल्म का वह रेल्वे स्टेशन का अंतिम सीन जैसे भुलाए नहीं भूलता!

आज हम गुलज़ार साहब द्वारा प्रस्तुत विशेष जयमाला कार्यक्रम का एक शुरुआती अंश पेश कर रहे हैं जिसमें गुलज़ार साहब फ़ौजी भाइयों से मुख़ातिब कुछ दिल की बातें शेयर कर रहे हैं, और जिन्हे पढ़ते हुए आपको अंदाज़ा होता रहेगा गुलज़ार साहब के वर्सेटायलिटी का। "फ़ौजी भाइयों, आदाब! बहुत दिन बाद फिर आपकी महफ़िल में शामिल हो रहा हूँ। इससे पहले जब भी आपके पास आया तो कोई ना कोई नई तरक़ीब, कोई ना कोई नई आग़ाश लेकर गानों की, जिसमें मैंने कई तरह के गानें आपको सुनाए, जैसे रेल की पटरी पर चलते हुए गानें सुनाए थे एक बार, वो तमाम गानें जिनमें रेल के पटरी की आवाज़ सुनाई देती है। और एक बार आम आदमी के मसलों पर गाने आपको सुनाए जो लक्ष्मण के कारटूनों जैसे लगते हैं। लेकिन मज़ाक के पीछे कहीं बहुत गहरे बहुत संजीदे दर्द भरे हुए हैं इन गानों में। बच्चों के साथ गाए गानें भी आपको सुनाए, खेलते कूदते हुए गानें, लोरियाँ सुनाए आपको। और बहुत से दोस्तों की चिट्ठियाँ जब आई, चाहने वालों की चिट्ठियाँ आई, जिनमें शिकायतें भी, गिले भी, शिकवे भी। उनमें एक बात बहुत से दोस्तों ने कही कि हर बार आप कुछ मज़ाक करके, हंस हंसाकर रेडियो से चले जाते हैं, जितनी बार आप आते हैं, हर बार हम आप से कुछ संजीदा बातें सुनना चाहते हैं, कि संजीदा सिचुएशन्स पर आप कैसे लिखते हैं, क्या लिखते हैं, और हाँ, ये किसी ने नहीं कहा कि क्यों लिखते हैं। फ़ौजी भाइयों, आप तो वतन की सरहदों पर बैठे हैं, और मैं आपको बहलाते हुए आपके परिवारों को भी बहलाने की कोशिश करता रहता हूँ। हाँ, उन सरहदों की बात कभी नहीं करता जो दिलों में पैदा हो जाती हैं। कभी जुड़ती हुई, कभी टूटती हुई, कभी बनती हुई, गुम होती हुई सरहदें, या सिर्फ़ हदें। इस तरह के रिश्ते सभी के ज़िंदगी से गुज़रते हैं, वो ज़िंदगी जिसे एक सुबह एक मोड़ पर देखा था तो कहा था, हाथ मिला ऐ ज़िंदगी, आँख मिलाकर बात कर।" दोस्तों, कुछ ऐसी ही बात फ़िल्म 'सदमा' के एक दूसरे गीत में गुलज़ार साहब ने लिखा था। याद आया "ऐ ज़िंदगी गले लगा ले"? इस गीत को भी हम आगे चलकर ज़रूर सुनवाएँगे कभी। आज अभी के लिए आइए सुनते हैं येसुदास की गाई लोरी, लेकिन ध्यान रहे कहीं सो मत जाइएगा...



क्या आप जानते हैं...
कि गुलज़ार साहब की पत्नी और अभिनेत्री राखी का जन्म तारीख है १५ अगस्त १९४७, यानी कि जिस दिन भारत को आज़ादी मिली थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ये दर्द भरा गीत किस गायक की आवाज़ में हैं - २ अंक.
२. ये फिल्माया गया गया है धर्मेन्द्र पर. फिल्म की नायिका बताएं - ३ अंक.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से - "चमन", फिल्म बताएं - १ अंक.
४ संगीतकार बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी विजय लक्ष्य के करीब है और अवध जी भी सही चल रहे हैं. प्रतिभा और किशोर जी की जोड़ी सही जवाबों के साथ हाज़िर हो रही हैं. कनाडा वाले हमारे सभी बंधुओं से गुजारिश है कि अपने बारे में कुछ परिचय स्वरुप सबके साथ बांटिय, अब आप इस ओल्ड इस गोल्ड परिवार का हिस्सा हैं अब

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, August 22, 2010

जीवन से लंबे हैं बंधु, ये जीवन के रस्ते...गुलज़ार साहब की कलम और मन्ना दा की आवाज़, एक बेमिसाल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 466/2010/166

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों का एक बार फिर से स्वागत है पुराने सदाबहार गीतों की इस महफ़िल में। जैसा कि आप जानते हैं इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है गीतकार, शायर, लेखक व फ़िल्मकार गुलज़ार साहब के लिखे फ़िल्मी गीतों पर केन्द्रित शृंखला 'मुसाफ़िर हूँ यारों', तो आज जिस गीत की बारी है, वह भी कुछ मुसाफ़िर और रास्तों से ताल्लुख़ रखता है। और ये रास्ते हैं ज़िंदगी के रास्ते। इस गीत में भी ज़िंदगी का एक कड़वा सत्य उजागर होता है, जिसे बहुत ही मर्मस्पर्शी शब्दों से संवारा है गुलज़ार साहब ने। "जीवन से लम्बे हैं बंधु ये जीवन के रस्ते, एक पल रुक कर रोना होगा, एक पल चल के हँस के, ये जीवन के रस्ते"। दादामुनि अशोक कुमार पर फ़िल्माये और मन्ना डे के गाए फ़िल्म 'आशिर्वाद' के इस गीत को सुन कर भले ही दिल उदास हो जाता है, आँखें नम हो जाती हैं, लेकिन जीवन के इस कटु सत्य को नज़रंदाज़ भी तो नहीं किया जा सकता। सुखों और दुखों का मेला है ज़िंदगी, और निरंतर चलते रहने का नाम है ज़िंदगी, बस यही दो सीख हैं इस गीत में। वसंत देसाई के संगीत ने इस गीत के बोलों में ऐसा जान डाला है कि गीत का शुरुआती संगीत ही एक अजीब सी हलचल पैदा कर देती है सुनने वाले के मन में। गीत के फ़िल्मांकन में दादामुनि को बैल गाड़ी में बैठ कर अपने गाँव जाते हुए दिखाया जाता है, इसलिए गीत की धुन में भी बैलों के गले के घण्टियों की आवाज़ें शामिल की गई हैं और पूरे गाने का रिदम इन्ही घण्टियों की ध्वनियों पर आधारित है। कुल मिलाकर एक मास्टरपीस गीत हम इसे कह सकते हैं।

'आशिर्वाद' ॠषीकेश मुखर्जी की फ़िल्म थी जिसके संवाद और गीत लिखे थे गुलज़ार साहब ने। कहानी व स्क्रीनप्ले ॠषी दा का ही था। अशोक कुमार, संजीव कुमार और सुमिता सान्याल अभिनीत यह फ़िल्म हिंदी सिनेमा के इतिहास की एक बेहद यादगार फ़िल्म रही है। ख़ास कर दादामुनि के अभिनय ने इस फ़िल्म को अविस्मरणीय बना दिया है, जिसके लिए उन्हे उस साल सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। इस फ़िल्म के गानें भी ख़ासा लोकप्रिय हुए थे। ख़ुद दादामुनि की आवाज़ में "रेल गाड़ी" और "नानी की नाव चली" जैसे गीत उनके जीनियस होना का एक और प्रमाण देते हैं। लता जी की आवाज़ में "झिर झिर बरसे सावनी अखियाँ" और "एक था बचपन" भी सदाबहार गीतों में शामिल हैं। और मन्ना दा का गाया प्रस्तुत गीत तो शायद इन सब से उपर है। उनकी गम्भीर आवाज़ ने इस गीत की वज़न को और भी बढ़ा दिया है। हाल ही में विविध भारती पर सुनिधि चौहान ने एक टेलीफ़ोनिक इंटरव्यु में मन्ना दा के बारे में कहा था कि "मन्ना दा की गायकी गायकी से एक लेवल उपर है। वो जब कोई गीत गाते हैं, तो वो सिर्फ़ गीत बन कर नहीं रह जाता, बल्कि उससे थोड़ा और उपर होता है। उनका गाना सिर्फ़ गाना ना सुनाई दे, कुछ और हो। जब फ़ीलिंग्स कुछ और हो और आप महसूस करने लगे उस आवाज़ को, उस बात को, उस बात को जो वो कहना चाह रहे हैं, तो उसका मज़ा कुछ और ही होता है। वो मन्ना दा पूरी तरीके से उसको करते थे, मेरे उपर पूरा असर होता था, होता है आज भी।" और दोस्तों, क्योंकि यह शृंखला केन्द्रित है गुलज़ार साहब पर, आइए आज आपको बताया जाए कि किन किन फ़िल्मों के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। ये फ़िल्में हैं - १९७२ - कोशिश (सर्वश्रेष्ठ पटकथा), १९७५ - मौसम (द्वितीय सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म), १९८८ - "मेरा कुछ सामान" - इजाज़त (सर्वश्रेष्ठ गीत), १९९१ - "यारा सिलि सिलि" - लेकिन (सर्वश्रेष्ठ गीत), १९९६ - माचिस (सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म)। और आइए अब मन्ना डे की आवाज़ में आज का गीत सुना जाए...



क्या आप जानते हैं...
कि गुलज़ार साहब का पहला फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड था १९७१ में फ़िल्म 'आनंद' के संवाद के लिए।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ये एक लोरी है जिसे एक पुरुष गायक ने गाया है, कौन हैं ये गायक - ३ अंक.
२. संगीतकार बताएं - २ अंक.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"सच्चा". फिल्म बताएं - १ अंक.
४ फिल्म के मुख्या कलाकार कौन कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी और अवध जी की टीम लौट आई है कनाडा वाले प्रतिभा जी और किशोर जी से लोहा लेने, पवन जी गायब है कुछ दिनों से

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार सुबह की कॉफी और हिंदी सिनेमा में मुस्लिम समाज के चित्रण पर एक चर्चा

भारतीय फिल्म जगत में समय समय पर कई प्रकार के दौर आये हैं. और इन्ही विशेष दौर से मुड़ते हुए भारतीय सिनेमा भी चल्रता रहा कभी पथरीली सड़क की तरह कम बजट वाली फ़िल्में तो कभी गृहस्थी में फसे दांपत्य जीवन को निशाना बनाया गया, लेकिन हर दौर में जो भी फ़िल्में बनीं हर एक फिल्म किसी न किसी रूप से किसी न किसी संस्कृति से जुड़ीं रहीं. जैसे बैजू बावरा (१९५२) को लें तो इस फिल्म में नायक नायिका के बीच प्रेम कहानी के साथ साथ एतिहासिक पृष्ठभूमि, गुरु शिष्य के सम्बन्ध, संगीत की महिमा का गुणगान भी किया गया है. भारतीय फिल्मों में एक ख़ास समाज या धर्म को लेकर भी फ़िल्में बनती रहीं और कामयाब भी होती रहीं. भारत बेशक हिन्दू राष्ट्र है लेकिन यहाँ और धर्मों की गिनती कम नहीं है. अपनी भाषा शैली, संस्कृति और रीति रिवाजों से मुस्लिम समाज एक अलग ही पहचान रखता है. भारतीय सिनेमा भी इस समाज से अछूता नहीं रहा और समय समय पर इस समाज पर कभी इसकी भाषा शैली, संस्कृति और कभी रीति रिवाजों को लेकर फ़िल्में बनीं और समाज को एक नयी दिशा दी. सिनेमा जब से शुरू हुआ तब से ही निर्माताओं को इस समाज ने आकर्षित किया और इसकी शुरुआत ३० के दशक में ही शुरू हो गयी ४० के दशक में शाहजहाँ १९४६ और ५० एवं ६० के दशक में अनारकली (१९५३), मुमताज़ महल (१९५७), मुग़ल ए आज़म (१९६०), चौदहवीं का चाँद (१९६०), छोटे नवाब (१९६१), मेरे महबूब (१९६३), बेनजीर (१९६४), ग़ज़ल (१९६४), पालकी (१९६७), बहु बेगम (१९६७) आदि फ़िल्में बनीं. उस दौर में जो भी इस समाज को लेकर फ़िल्में आयीं ज्यादातर एतिहासिक ही थीं. इस प्रकार की फिल्मों में ख़ास संगीत और ख़ालिश इसी समाज की भाषा प्रयोग की जाती थी. फिल्मांकन और कलाकारों के हाव भाव से ही इनको पहचान लिया जाता है.

संगीत की द्रष्टि से देखा जाए तो इनका संगीत भी दिल को छू लेने वाला बनाया जाता था. जिसके माहिर नौशाद अली साहब थे. कौन भूल सकता है "ये जिंदगी उसी की है जो किसी का हो लिया (अनारकली १९५३), प्यार किया तो डरना क्या, जब प्यार किया तो डरना क्या, ये दिल की लगी कम क्या होगी (मुग़ल ए आज़म, १९६०), रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ (ग़ज़ल १९६४) हम इंतज़ार करेंगे क़यामत तक, खुदा करे के क़यामत हो और तू आये (बहु बेगम, १९६७) ये कुछ वो झलकियाँ थीं जो इस समाज के संगीत की छाप दिल ओ दिमाग पर छोडती है….

गीत : ये जिंदगी उसी की है जो किसी का हो गया - लता मंगेशकर - अनारकली -१९५३



थोडा आगे चलकर ७० और ८० के दशक में इस समाज की फिल्मों में कुछ बदलाव ज़रूर आये लेकिन भाषा शैली और संस्कृति अब भी वही रही. इस दशक ने इस समाज के परदे को हटाकर कोठो पर ला खड़ा किया. अब नवाब या सामंती स्वामी पान चबाते हुए अपना धन कोठो पर नाचने वाली तवायफों पर लुटाते नज़र आते हैं. उमराव जान (१९८२) और पाकीज़ा (१९७२) ने इस समाज की शकल ही बदलकर रख दी. लेकिन भाषा शैली और संस्कृति से इस दौर में कोई छेड़छाड़ नहीं की गयी. ७० के दशक से ही समानांतर सिनेमा की शुरुआत हुयी तो इससे ये समाज भी अछूता नहीं रहा और एलान (१९७१) और सलीम लंगड़े पर मत रो (१९९०) जैसी फ़िल्में आई. सलीम लंगड़े पर मत रो (१९९०) निम्न मध्य वर्गीय युवाओं की अच्छी समीक्षा करती है. गरम हवा (१९७३) उस दौर की एक और उत्तम फिल्मों की श्रेणी में खड़ी हो सकती है जो विभाजन के वक़्त लगे ज़ख्मों को कुरेदती है.

इस दौर की दो इसी समाज पर बनी फ़िल्में जो इस पूरे समाज की फिल्मों का प्रतिनिधित्व करती है एक निकाह (१९८२) और बाज़ार (१९८२). एक तरफ निकाह (१९८२) में जहाँ मुस्लिम समाज में प्रचलित तलाक शब्द पर वार किया गया है तो वहीँ दूसरी तरफ बाज़ार (१९८२) में एक नाबालिग लड़की को एक ज्यादा उम्र के व्यक्ति के साथ शादी की कहानी है. यहाँ हम बताते चलें कि उमराव जान १९०५ में मिर्ज़ा रुसवा नामक उपन्यास पर आधारित थी. ७० के दशक में कुछ फिल्मों में एक समाज के किरदार भी डाले गए और वो किरदार भी खूब चले यहाँ तक के फिल्म को नया मोड़ देने के लिए काफी थे. मुक़द्दर का सिकंदर (१९७८) में जोहरा बाई और शोले (१९७५) में रहीम चाचा इसके अच्छे उदाहरण हो सकते हैं. अलीगढ कट शेरवानी, मुंह में पान चबाते हुए, जुबां पर अल्लामा इकबाल या मिर्ज़ा ग़ालिब कि ग़ज़ल गुनगुनाते हुए एक अलग ही अंदाज़ में चलना तो बताने की ज़रुरत नहीं थी के ये किरदार किस समाज से ताल्लुक रखता है. घर कि औरतें या तो पारंपरिक बुर्के मैं या फिर भारी बर्कम लहंगा और घाघरा पहने नज़र आती हैं. बड़ी उमर की औरतें जैसे अम्मीजान नमाज़ में मशगूल होती हैं या फिर पान चबाते हुए घमंडी तरीके की चाल में जब दरवाजे का पर्दा उठाते हुए बाहर आती हैं तो दर्शक समझ जाते हैं कि ये वक़्त ग़ज़ल का आ पहुंचा है जो मुजरे की शक्ल में होगा.

गीत : चलते चलते यूंही कोई मिल गया था - लता मंगेशकर - पाकीज़ा - १९७२


८० के दशक का अंत होते होते और ९० के दशक कि शुरुआत में इस समाज कि फिल्मों का चेहरा पूरी तरह से बदल चुका था. अब जो किरदार पहले रहीम चाचा कि शकल में डाले जाते थे अब वो तस्कर बन चुके हैं.फिल्म अंगार (१९८०) को हम उदाहरण के लिए ले सकते हैं. जहाँ एक तरफ खालिश इस समाज के प्रति समर्पित फ़िल्में बनी तो वहीँ दूसरी तरफ हिन्दू मुस्लिम के मिलाने के लिए भी इस समाज कि फिल्मों का सहारा लिया गया. याद दिला दूं ६० के दशक का वो गीत 'तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान कि औलाद है इंसान बनेगा' इसका अच्छा खाका खीचता है. इस प्रकार कि श्रेणी में ईमान धरम (१९७७), क्रांतिवीर (१९९४) आदि को ले सकते हैं. ९० से अब तक इस समाज का दूसरा रूप ही सामने आया है जिसे आतंकवाद का नाम दिया गया है. इस तर्ज़ पर भी अनगिनत फ़िल्में बनीं और बन रहीं है कुछ के नाम लें तो सरफ़रोश (१९९९), माँ तुझे सलाम , पुकार (२०००), फिजा (२०००), मिशन कश्मीर (२०००), के नाम लिए जा सकते हैं. छोटे छोटे घरों से गाँव बनता है, छोटे छोटे गाँवों से जिला और स्टेट बनकर देश बनता है. इसी प्रकार छोटे छोटे समाजों और संस्कृतियों से सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति बनी हुई है. लेकिन इतना तो तय है के समाज कोई भी हो संस्कृति कोई भी हो, भारतीय समाज अपने आप में एक सम्पूर्ण समाज और संस्कृति है जिसमे न कुछ जोड़ा जा सकता है और न कुछ निकाला जा सकता है.

गीत : तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा - मोहम्मद रफ़ी - धूल का फूल - १९५९


प्रस्तुति- मुवीन



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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