Tuesday, September 30, 2008

मिलिए ग़ज़ल गायकी की नई मिसाल रफ़ीक़ शेख से

कर्नाटक के बेलगाम जिले में जन्मे रफ़ीक़ शेख ने मरहूम मोहम्मद हुसैन खान (पुणे)की शागिर्दी में शास्त्रीय गायन सीखा तत्पश्चात दिल्ली आए पंडित जय दयाल के शिष्य बनें. मखमली आवाज़ के मालिक रफ़ीक़ के संगीत सफर की शुरुवात कन्नड़ फिल्मों में गायन के साथ हुई, पर उर्दू भाषा से लगाव और ग़ज़ल गायकी के शौक ने मुंबई पहुँचा दिया जहाँ बतौर बैंक मैनेजर काम करते हुए रफ़ीक़ को सानिध्य मिला गीतकार /शायर असद भोपाली का जिन्होंने उन्हें उर्दू की बारीकियों से वाकिफ करवाया. संगीत और शायरी का जनून ऐसा छाया कि नौकरी छोड़ रफ़ीक़ ने संगीत को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया.

आज रफ़ीक़ पूरे भारत में अपने शो कर चुके हैं. वो जहाँ भी गए सुनने वालों ने उन्हें सर आँखों पर बिठाया. २००४ में औरंगाबाद में हुए अखिल भारतीय मराठी ग़ज़ल कांफ्रेंस में उन्होंने अपनी मराठी ग़ज़लों से समां बाँध दिया, भाषा चाहे कन्नड़ हो, हिन्दी, मराठी या उर्दू रफ़ीक़ जानते हैं शायरी /कविता का मर्म और अपनी आवाज़ के ढाल कर उसे इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि सुनने वालों पर जादू सा चल जाता है, महान शायर अहमद फ़राज़ को दी गई अपनी दो श्रद्धांजली स्वरुप ग़ज़लों को सुनने के बाद आवाज़ के श्रोताओं ने भी इस बात को महसूस किया. हिंद युग्म पर मिली इस सफलता ने रफ़ीक़ को प्रेरित किया कि हिन्दी/उर्दू ग़ज़लों के एक एल्बम पर काम शुरू करें.


आल इंडिया रेडियो द्वारा सत्यापित कलाकार रफ़ीक़ चंदन टी वी और डी डी ०१ पर लाइव परफॉर्मेंस दे चुके हैं.अब तक उनकी एक मराठी एल्बम 'पाउस पहिला" और एक कन्नड़ एल्बम "नेने" बाज़ार में धूम मचा चुकी है. लता मंगेशकर और आशा भोंसले जैसे दिग्गजों के साथ गाने का इन्हे मौका मिला है जिसे रफ़ीक़ अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं.

हिंद युग्म से जुड़ कर रफ़ीक़ बेहद खुश हैं, उन्हें विश्वास है युग्म के साथ उन्हें अपने पहले उर्दू ग़ज़ल एल्बम के सपने को साकार करने में मददगार साबित होगा. बीते शुक्रवार आवाज़ पर ओपन हुई उनकी ग़ज़ल "सच बोलता है" बेहद सराही गई. युग्म परिवार इस बेहद प्रतिभाशाली और संगीत के प्रति समर्पित कलाकार को अपनी समस्त शुभकामनायें दे रहा है. रफ़ीक़ जल्दी ही कमियाबी की नई मंजिलें पायें, इसी कामना के साथ आईये एक बार फ़िर सुनें उनकी बारीक, सुरीली और सधी हुई आवाज़ में उन्ही के द्वारा स्वरबद्ध ये शानदार ग़ज़ल.

(सुनने के लिए नीचे के पोस्टर पर क्लिक करें. इस नए उभरते कलाकार को अपना प्रोत्साहन अवश्य दें)




आप भी इसका इस्तेमाल करें

देखिये रफ़ीक़ शेख का सफर इन चित्रों में -
(आशा जी के साथ रफ़ीक़)


(बप्पी लहरी के साथ)


(संगीतकार राम लक्ष्मण के साथ)


(और ये हैं आज के रफ़ीक़)

तेरी नज्म से गुजरते वक्त खदशा रहता है...

चाहे बात हो गुलज़ार साहब की या जिक्र छिड़े अमृता प्रीतम का, एक नाम सभी हिन्दी चिट्टाकारों के जेहन में सहज ही आता है- रंजना भाटिया का, जिन्होंने इन दोनों हस्तियों पर लगातार लिखा है और बहुत खूब लिखा है, आज हम जिस एल्बम का जिक्र आवाज़ पर कर रहें हैं उसमें संवेदनायें हैं अमृता की तो आवाज़ है गुलज़ार साहब की. अब ऐसे एल्बम के बारे में रंजना जी से बेहतर हमें कौन बता सकता है. तो जानते हैं उन्हीं से क्या है इस एल्बम की खासियतें -

तेरी नज्म से गुजरते वक्त खदशा रहता है
पांव रख रहा हूँ जैसे ,गीली लैंडस्केप पर इमरोज़ के
तेरी नज्म से इमेज उभरती है
ब्रश से रंग टपकने लगता है

वो अपने कोरे कैनवास पर नज्में लिखता है ,
तुम अपने कागजों पर नज्में पेंट करती हो


-गुलजार

अमृता की लिखी नज्म हो और गुलजार जी की आवाज़ हो तो इसको कहेंगे सोने पर सुहागा .....दोनों रूह की अंतस गहराई में उतर जाते हैं ..रूमानी एहसास लिए अमृता के लफ्ज़ हैं तो मखमली आवाज़ में गुलजार के कहे बोल हैं इसको गाये जाने के बारे में गुलजार कहते हैं की यह तो ऐसे हैं जैसे "दाल के ऊपर जीरा" किसी ने बुरक दिया हो ..गुलजार से पुरानी पीढी के साथ साथ आज की पीढी भी बहुत प्रभावित है ..उनके लिखे बोल .गाए लफ्ज़ हर किसी के दिल में अपनी जगह बना लेते हैं ..पर गुलजार ख़ुद भी कई लिखने वालों से बहुत ही प्रभावित रहे हैं ..अमृता प्रीतम उन में से एक हैं ...अमृता प्रीतम पंजाबी की जानी मानी लेखिका रही हैं ...

गुलजार जी पुरानी यादों में डूबता हुए कहते हैं कि .मुझे ठीक से याद नही कि मैं पहली बार उनसे कब मिला था ...पर जितना याद आता है .तो यह कि तब मैं छात्र था और साहित्य कारों को सुनने का बहुत शौक था ..अमृता जी से शायद में पहली बार "एशियन राईटर की कान्फ्रेंस" में मिला था एक लिफ्ट मैं जब मैं वहां ऊपर जाने के लिए चढा तब उसी लिफ्ट मैं अमृता प्रीतम और राजगोपालाचारी भी थे .जब उनसे मिला तो उनसे बहुत प्रभावित हुआ उनकी नज्मों को पढ़ते हुए ही वह बड़े हुए और उनकी नज्मों से जुड़ते चले गए और जब भी दिल्ली आते तो उनसे जरुर मिलते ..तब तक गुलजार भी फ़िल्म लाइन में आ चुके थे.

अमृता जी की लिखी यह नज्में गुलजार जी की तरफ़ से एक सच्ची श्रद्दांजली है उनको ..उनकी लिखी नज्में कई भाषा में अनुवादित हो चुकी है .पर गुलजार जी आवाज़ में यह जादू सा असर करती हैं ..इस में गाई एक नज्म अमृता की इमरोज़ के लिए है .

मैं तुम्हे फ़िर मिलूंगी ...
कहाँ किस तरह यह नही जानती
शायद तुम्हारे तख्यिल की कोई चिंगारी बन कर
तुम्हारे केनवास पर उतरूंगी
या शायद तुम्हारे कैनवास के ऊपर
एक रहस्यमय रेखा बन कर
खामोश तुम्हे देखती रहूंगी


गुलजार कहते हैं की यदि इस में से कोई मुझे एक नज्म चुनने को कहे तो मेरे लिए यह बहुत मुश्किल होगा ..क्योँ की मुझे सभी में पंजाब की मिटटी की खुशबू आती है ..और मैं ख़ुद इस मिटटी से बहुत गहरे तक जुडा हुआ हूँ ..यह मेरी अपनी मात्र भाषा है .. अमृता की लिखी एक नज्म दिल को झंझोर के रख देती है ...और उसको यदि आवाज़ गुलजार की मिल गई हो तो ..दिल जैसे सच में सवाल कर उठता है ...

आज वारिस शाह से कहती हूँ
अपनी कब्र से बोलो !
और इश्क की किताब का कोई नया वर्क खोलो !
पंजाब की एक बेटी रोई थी ,
तुने उसकी लम्बी दास्तान लिखी
आज लाखों बेटियाँ रो रही है वारिस शाह !
तुमसे कह रही है :


इसकी एक एक नज्म अपने में डुबो लेती है ..और यह नशा और भी अधिक गहरा हो जाता है ..जब गुलजार जी की आवाज़ कानों में गूंजने लगती है ..यह नज्में वह बीज है इश्क के जो दिल कि जमीन पर पड़ते ही कहीं गहरे जड़े जमा लेते हैं ..और आप साथ साथ गुनगुनाने पर मजबूर हो जाते हैं ..

एक जमाने से
तेरी ज़िन्दगी का पेड़
कविता ,कविता
फूलता फलता और फैलता
तुम्हारे साथ मिल कर देखा है
और जब
तेरी ज़िन्दगी के पेड़ ने
बीज बनना शुरू किया
मेरे अन्दर जैसे कविता की
पत्तियां फूटने लगीं है ..

और जिस दिन तू पेड़ से
बीज बन गई
उस रात एक नज्म ने
मुझे पास बुला कर पास बिठा कर
अपना नाम बताया
अमृता जो पेड़ से बीज बन गई


गुलज़ार की आवाज़ में अमृता प्रीतम की कविताओं की यह CD टाईम्स म्यूजिक ने जारी की है, इसकी कुछ झलकियाँ आप आज आवाज़ पर सुन सकते हैं (कृपया नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें).पूरी CD आप यहाँ से खरीद सकते हैं,आप भी इस नायाब संकलन को हमेशा के लिए अपनी संगीत लाइब्रेरी का हिस्सा अवश्य बनाना चाहेंगे.



प्रस्तुति - रंजना भाटिया "रंजू"

Monday, September 29, 2008

लता संगीत पर्व- महीने भर चला संगीत प्रेमियों का उत्सव

आवाज़ पर आयोजित लता संगीत उत्सव पर एक विशेष रिपोर्ट और सुनें लता जी के चुने हुए २० गीत एक साथ.

जब हमने लता संगीत उत्सव की शुरुवात की थी इस माह के पहले सप्ताह में, तब दो उद्देश्य थे, एक भारत रत्न और संगीत के कोहिनूर लता मंगेशकर पर हिन्दी भाषा में कुछ सहेजनीये आलेखों का संग्रह बने और दूसरा लता दी के चाहने वाले इंटरनेटिया श्रोताओं को हम प्रेरित करें की वो लता जी के बारे में हिन्दी भाषा में लिखें. जहाँ तक दूसरे उद्देश्य का सवाल है, हमें बहुत अधिक कमियाबी नही मिल पायी है. कुछ लिखते लिखते रह गए तो कुछ जब तक लिखना सीख पाते समय सीमा खत्म हो चली. प्रतियोगिता की दृष्टि से मात्र एक ही प्रवष्टि हमें मिली जिसे हम आवाज़ पर स्थान दे पाते. नागपुर के २२ वर्षीय अनूप मनचलवार ने अपनी मुक्कम्मल प्रस्तुति से सब का मन मोह लिया, सुंदर तस्वीरें और slide शो से अपने आलेख को और सुंदर बना दिया. हमारे माननीय निर्णायक श्री पंकज सुबीर जी ने अनूप जी को चुना है लता संगीत पर्व के प्रथम और एक मात्र विजेता के रूप में, अनूप जी को मिलेंगीं ५०० रुपए मूल्य की पुस्तकें और "पहला सुर" एल्बम की एक प्रति. अनूप जी का आलेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं. अनूप मनचलवार जी को बधाई देते हुए हम आगे बढ़ते हैं, अगर हम अपने पहले उद्देश्य की बात करें तो हम इस आयोजन को एक बहुत बड़ी सफलता कहेंगे. पेश है इस सफर की कुछ झलकियाँ-



किसी भी सफल आयोजन के लिए जरूरी है एक सफल शुरुवात. और ये शुरुवात हमें मिली जब आयोजन के कर्णधार और हमारे प्रिये पंकज सुबीर भाई ने लता जी की आवाज़ में रूह की वादियों में बह रही दिलरुबा नदी से मिलवाया. लता जी की मुंहबोली बहन और स्वर्गीय कवि/गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री लावण्या शाह ने जब लता जी के साथ बीते उनके व्यक्तिगत जीवन के कुछ मधुर क्षणों को याद किया तो पाठकों की आँखें सजल हो उठीं.

फ़िर आमद हुई इस आयोजन में संजय पटेल भाई की, जो लाये साथ में लता जी का सुगम संगीत. कुछ ऐसी ग़ज़लें और नगमें जिन्हें सिर्फ़ सुनना काफ़ी नही उन्हें समझना भी जरूरी है, लता जी के गायन की उंचाईयों की झलक पाने के लिए. संजय भाई ने जिस खूबी से इसे अपने पहले और दूसरे आलेख में प्रस्तुत किया उसे पढ़ कर और सुनकर हमरे श्रोताओं ने हमें ढेरों बधाईयाँ भेजीं, जिसे हम सादर संजय भाई को प्रेषित कर रहे हैं. फ़िर लौटे पंकज भाई अपनी शीग्र प्रकाशनीये कहानी में लता जी का जिक्र लेकर. हिंद युग्मी तपन शर्मा ने जानकारीपूर्ण आलेख दिया सुर की देवी के नाम, वहीँ लता जी के जन्मदिवस की पूर्वसंध्या पर संजय भाई ने पेश की माया गोविन्द की एक अद्भुत कविता,स्वर कोकिला को समर्पित. और कल यानी जब लता जी ने अपने परिवार के साथ अपना ७९ वां जन्मदिन मना रही थी, तब यहाँ हिंद युग्म पर संजय भाई ने एलान किया कि प्रलय के बाद भी बचा रहेगा लता मंगेशकर का पावन स्वर. इससे बेहतर भेंट हम संगीत प्रेमी क्या दे सकते थे साक्षात् माँ सरस्वती का रूप लेकर धरती पर आयी इस आवाज़ को, जिसका नाम है लता मंगेशकर. इस सफल आयोजन के लिए हिंद युग्म आवाज़ परिवार आप सब का एक बार फ़िर आभार व्यक्त करता है. चलते चलते संजय भाई ने जो कहा लता जी के लिए उसे दोहरा दें क्योंकि यही हम सब के मन की दुआ है -

आइये भगवान से प्रार्थना करें लताजी दीर्घायु हों और उनकी पाक़ आवाज़ से पूरी क़ायनात सुरीली होती रहे...बरसों बरस.

सुनिए आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए २० नायाब गीत लता जी के, एक साथ. हमने कोशिश की है कि लता जी के हर अंदाज़ की एक झलक इन गीतों में आपको मिले, आनंद लें -

तीसरी बार हुई अगस्त के अश्वारोही गीतों की परख

पहले चरण की तीसरी और अन्तिम समीक्षा को प्रस्तुत करने में कुछ विलंब हुआ, दरअसल हमारे माननीय समीक्षक जब पहले दो गीतों की समीक्षा हमें भेज चुकें थे तब उन्हें किसी व्यक्तिगत कारणों के चलते समयाभाव का सामना करना पड़ा. इसी कारण अन्तिम तीन गीतों की समीक्षा उन्होंने काफ़ी संक्षिप्त की है पहले दो गीतों की तुलना में. लेकिन अंक समीकरण हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं सरताज गीत चुनने की प्रक्रिया में. तो प्रस्तुत है पहले चरण के अन्तिम समीक्षक के विचार हमारे ऑगस्त के अश्वारोही गीतों पर.

मैं नदी
गाना शुरू हुआ और सिग्‍नेचर मूजिक शुरू हुआ तो बहुत उम्मीदें बंधी ।
सुंदर सिग्‍नेचर तैयार किया है । और जब मानसी पिंपले की आवाज़ की आमद होती है तो एक तरह की ताज़गी का अहसास होता है । गाने का मुखड़ा बेहतरीन है । रिदम बेहतरीन तरीक़े से रखा गया है । पर पता नहीं क्‍यों मुझे हिंदी सिनेमा संसार के किसी गाने की झलक लगी इस गाने की ट्यून में ।
जब हम पहले अंतरे पर पहुंचे तो ये सुनकर कष्ट हुआ कि मिक्सिंग में कमी रह गयी है और गायिका मानसी की आवाज़ डूब गयी है । वाद्यों की आवाज़ ने बोलों की स्पष्ट कर ली है । पहले अंतरे के बाद का इंटरल्‍यूड बढिया है ।
दूसरे अंतरे में भी गायिका की आवाज़ स्पष्ट नहीं है । जहां तक लिरिक्‍स का सवाल है तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि संगीतकार के लिए इस गाने को ट्यून में उतारना मुश्किल काम रहा होगा । गीत के विन्‍यास में ‘गेय तत्व’ की कमी है । पर गाने की भावभूमि सुंदर है ।
इसके अलावा एक बात और कहना चाहता हूं । मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि गाने की रिकॉर्डिंग साफ़ नहीं है । मैं आवाज़ की नहीं ऑरकेस्‍ट्रा की बात कर रहा हूं । बहुत ही दबा-दबा सा संगीत लग रहा है । चमक क्यों नहीं आ रही है ।
मेरी राय है कि इस गाने की धुन एक बार और बनाई जाये ।
गीत सुंदर है । गायिका में भी संभावनाएं हैं और संगीतकार में भी ।
तो फिर इतनी अच्‍छी रचना को क्यों ना फिर से सजाएं ।
गीत ४/५ । धुन और संगीत संयोजन ३/५ । गायकी और आवाज़ पर ३/5 और ओवर ऑल २/५ । कुल १२/२० यानी
6/10

कुल अंक अब तक - १९ / ३०

बेंतेहा प्यार
इस शानदार गाने के लिए मैं सुदीप यशराज को बधाई देता हूं । सुदीप कितने बरस हैं पता नहीं । तस्वीर से इनका बचपना साफ़ नज़र आता है ।
पर संगीत के मामले में सुदीप बचपने की बजाय परिपक्वता से पेश होते लगते हैं ।
शायद सुदीप जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए । उन्हें क्या करना है ।
पिछले जितने भी गीतों की समीक्षा मैंने की है उनमें से ये गाना मुझे बेहद सधा हुआ लगा । कहूं कि सबसे ज्यादा सधा हुआ ।
जिस तरह वे अंतरे पर जाकर 'सम' लगाते हैं और फिर 'वो हो हो ' शुरू करते हैं वो भी कमाल है ।
गीत सुंदर है । गायकी बढि़या है । गीत रचना में एक जगह 'मैंने बूंद बूंद भरी है अपने आंसू से' की बजाय 'अपने आंसुओं से- होना चाहिए था ।
पर इस बात को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है ।
गिटार का इसा गाने में सुंदर प्रयोग किया है ।
सुदीप इंडीपॉप सर्किट पर सक्रिय कई नामी कलाकारों को मात देने की हैसियत रखते हैं । चाहे रिदम हो । म्यूजिक का बाकी अरेन्जमेन्ट या फिर गायकी और लेखन ।
सभी पक्ष सुंदर । गाने को दस में से दस नंबर ।

कुल अंक अब तक - २०.५ / ३०


जीत के गीत
इस गाने के नंबर इस तरह हैं ।
१. गीत- 4
२. धुन और संगीत संयोजन—4
३. गायकी और आवाज़—4
४. ओवारोल प्रस्तुति—5
ये गाना बिना भारी भरकम शब्दों के बड़ी सरलता के साथ जोश और उमंग की बात करता है । गायकी और संगीत संयोजन भी कमाल का है । कुल मिलाकर 17/ 20 अंक । यानी ८.५/१०

कुल अंक अब तक - २४.५ / ३०

चले जाना
१. गीत--- 4/5
२. धुन और संगीत संयोजन 4/5
३. गायकी और आवाज़—5/5
४. ओवारोल प्रस्तुति—5/5
एक रचना के स्‍तर पर ग़ज़ल औसत है । लेकिन रूपेश की आवाज़ में एक ग़ज़ल गायक का पूरा संयम है । और जब धुन भी खुद उन्‍होंने बनाई तो ये ग़ज़ल निखर आई है ।
कुल 18 / 20 यानी ९/१०

कुल अंक अब तक - २१.५ / ३०


इस बार
1. गीत—2/5
2. धुन और संगीत संयोजन—3/5
3. गायकी और आवाज़—3/5
4. ओवारोल प्रस्तुति- 3/5
बेहद औसत गीत । बेहद आसान गायकी । बेहद औसत प्रस्‍तुति ।
इस गीत को बेहद शोख़ और चमकीला रूप दिया जा सकता था ।
कुल मिलाकर ११ /२० यानी ५.५/१०

कुल अंक अब तक - १६.५ / ३०.

चलते चलते -
तो इस तरह अब तक सभी गीतों में सबसे आगे है "जीत के गीत" और ठीक पीछे है "संगीत दिलों का ..." और "आवारा दिल". वहीँ "मैं नदी" और "मेरे सरकार" " बढे चलो" और "बेंतेहा प्यार" सभी समीक्षकों की उम्मीदों पर एक से खरे नही उतर पाये. " चले जाना" और "तेरे चहरे पर" कभी भी बाज़ी पलट सकते हैं. अगले सप्ताह मिलेंगे आपसे सितम्बर के सिकंदर गीतों कि पहली समीक्षा लेकर. तब तक इजाज़त.

Sunday, September 28, 2008

प्रलय के बाद भी बचा रहेगा लता मंगेशकर का पावन स्वर !

लता मंगेशकर का जन्मदिन हर संगीतप्रेमी के लिये उल्लास का प्रसंग है. फ़िर हमारे प्रिय चिट्ठाकार संजय पटेल के लिये तो विशेष इसलिये है कि वे उसी शहर इन्दौर के बाशिंदे हैं जहाँ दुनिया की सबसे सुरीली आवाज़ का जन्म हुआ था. लताजी और उनका संगीत संजय भाई के लिये इबादत जैसा है. वे लताजी के गायन पर लगातार लिखते और अपनी अनूठी एंकरिंग के ज़रिये बोलते रहे हैं.आज आवाज़ के लिये लता मंगेशकर पर उनका यह भावपूर्ण लेख लता –मुरीदों के लिये एक विशिष्ट उपहार के रूप में पेश है.

आइये भगवान से प्रार्थना करें लताजी दीर्घायु हों और उनकी पाक़ आवाज़ से पूरी क़ायनात सुरीली होती रहे...बरसों बरस.



आप शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत या चित्रपट या सुगम संगीत के पूरे विश्व इतिहास पर दृष्टि डाल लीजिये, किंतु आप निराश ही होंगे यह जानकर कि एक भी नाम ऐसा नहीं है जो अमरता का वरदान लेकर इस सृष्टि में आया हो; एक अपवाद छोड़कर और वह नाम है स्वर-साम्राज्ञी भारतरत्न लता मंगेशकर। लताजी के जन्मोत्सव की बेला में मन-मयूर जैसे बावला-सा हो गया है। दिमाग पर ज़ोर डालें तो याद आता है कि लताजी अस्सी के अनक़रीब आ गईं.श्रोताओं की चार पीढ़ियों से राब्ता रखने वाली लता मंगेशकर के वजूद को अवाम अपने से अलग ही नहीं कर सकता। यही वजह है कि जीवन की अस्सी वीं पायदान पर आ रही स्वर-कोकिला देखकर वक्त की बेरहमी पर गुस्सा-सा आता है कि कमबख़्त तू इतना तेज़ी से क्यों चलता है ?

बहरहाल २८ सितम्बर संगीतप्रेमियों की पूरी जमात के जश्न मनाने का दिन होता है. कुदरत के इस नायाब हीरे पर कौन फ़ख्र नहीं करेगा। दुनिया के दिग्गज देश अपनी इकॉनामी, प्राकृतिक सुंदरता, सकल उत्पादन और उच्च शिक्षा पर नाज़ करते हैं। डींगें मारते हैं बड़ी-बड़ी कि हमारे पास फलॉं चीज़ है, दुनिया में किसी और के पास नहीं। किबला! मैं आपसे पूछता हूँ- क्या आपके पास लता मंगेशकर हैं ? हिन्दुस्तान के ख़ज़ाने का ऐसा कोहिनूर जिसकी कीमत अनमोल है, जिसकी चमक बेमिसाल है।



लता मंगेशकर से सिर्फ़ अज़ीम मौसिक़ारों का संगीत, गीतकारों के शब्द ही रोशन नहीं; उनकी आवाज़ से अमीर का महल और किसी फटेहाल गरीब का झोपड़ा दोनों ही आबाद हैं। लताजी सिर्फ़ होटल ताज, संसद भवन, षणमुखानंद या अल्बर्ट हॉल तक महदूद नहीं, वे गॉंव की पगडंडियों, गाड़ी-गडारों और पनघट पर किलकती तितली हैं। वे शास्त्र का महिमागान नहीं; आम आदमी के होठों पर थिरकता एक प्यारा-सा मुखड़ा हैं, जिसमें ज़िंदगी के सारे ग़म और तमाम ख़ुशियॉं आकर एक निरापद आनंद पा जाती हैं। लताजी का स्वर है तो ज़िंदगी का सारा संघर्ष बेमानी है और सारी कामयाबियॉं द्विगुणित। लता की आवाज़ से मोहब्बत करने के लिए आई.आई.एम से एम.बी.ए. करने की ज़रूरत नहीं, आप अनपढ़ ही भले। आपके तमाम हीनभावों और अशिक्षा को धता बताकर लता की आवाज़ आपको इस बात का गौरव प्रदान कर सकती है कि आप लता के संगीत के दीवाने हैं और आपका यही दीवानापन आपकी बड़ी काबिलियत है।

लता की आवाज़ में जीवन के सारे रस और प्रकृति की सारी गंध सम्मिलित है। आदमी की हैसियत, उसका रुतबा, उसका सामर्थ्य माने नहीं रखता; माने यह बात रखती है कि क्या उसने लता मंगेशकर के गीत सुने हैं; गुनगुनाया है कभी उनको, यदि हॉं तो मूँगफली खाता एक गरीब लता का गीत गुनगुनाते हुए अपने आपको रायबहादुर समझने का हक रखता है। आप हिन्दुस्तान के किसी भी प्रदेश में चले जाइए; आपको लता मंगेशकर एक परिचित नाम मिलेगा। "ब्रांडनेम' की होड़ के ज़माने में लता मंगेशकर भारत का एक निर्विवाद ब्रांड है पचास बरसों से। ऐसा ब्रांड जिस पर भारत की मोनोपाली है और जिसका मार्केट-शेयर शत-प्रतिशत है। इस ब्रांड का जलवा ऐसा है कि संगीतप्रेमियों के शेयर बाज़ार में इसका सेंसेक्स सबसे ऊपर रहता है कभी वह नीचे गिरा ही नहीं।

अपने आपको ताज़िंदगी विद्यार्थी समझने वाली लता मंगेशकर का संघर्ष, तप और समर्पण विलक्षण है। उनका करियर ऐसी ख़ूबियों से पटा पड़ा है, जिस पर रचनाकारों और संगीत सिरजने वालों को फ़ख्र है। जीते जी लता मंगेशकर ऐसी किंवदंती बन गई हैं कि उनकी आवाज़ को पाकर शब्द अमर हो जाते हैं; धुन निहाल हो जाती है; नायिकाएं सुरीली हो जाती हैं और श्रोता बिना धेला दिए मालामाल। यहोँ अनायास इस मालवी-जीव को दादा बालकवि बैरागी रचित फ़िल्म "रेशमा और शेरा' का गीत तू चंदा मैं चॉंदनी' याद हो आता है। संगीतकार जयदेव और बैरागीजी को इस गीत ने जो माइलेज दिया है वह बेमिसाल है। बैरागीजी की क़लम की ताब और लताजी के सुरों की आब इस गीत के विभिन्न शेड्स आपके मन को बावरा बनाकर रेगिस्तान में नीम के दरख्त की छॉंह मिल जाए वैसी अनुभूति देते हैं।

( ख़ुद ही अनुभव करें )



आज परिवारों में आपको ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएँगे जहॉं परदादा ने, दादा, पिता और पुत्र ने लता के गायनामृत का रसपान किया होगा। लताजी के गाए गीत पूरे मुल्क की अमानत हैं। इसलिए यह कहने में गर्व है कि हमें इस बात से क्या लेना-देना कि हमारे राष्ट्रीय कोष में कितने ख़रबों रुपए हैं; हमें इस बात का अभिमान है कि हज़ारों गीतों ने लता के स्वर का आचमन किया है। सदियॉं गुज़र जाएँगी, आदमी ख़ूब आगे बढ़ जाएगा, दुनिया विशालतम होती जाएगी लेकिन लता के स्वरों का जादू कभी फीका नहीं पड़ेगा। सृष्टि के पंचभूतों में छठा तत्व है "लता', जो अजर-अमर है। संगीत के सात सुरों का आठवॉं सुर है लता मंगेशकर। मैं कम्प्यूटर युग में प्रगति का ढोल बजा रही पीढ़ी से गुज़ारिश करना चाहूँगा; दोस्तों ! गफ़लत छोड़ो और इस बात का मद पालो कि तुम उस भारत में पैदा हुए हो जहॉं लता मंगेशकर ने संगीत साधना की; अपने स्वरों से इस पूरी कायनात का अभिषेक किया; इंसान के मन-मंडप में अपने संगीत के तोरण बॉंधे। ज़िंदगी के रोने तो चलते ही रहेंगे, जश्न मनाओ कि लता हमारे बीच हैं. कहते हैं प्रलय के बाद मनुष्य नहीं बचेगा, लेकिन यदि कुछ बचेगा तो सिर्फ़ लता मंगेशकर की आवाज़ क्योंकि उसने संगीत को दिया है अमरता का अमृत।


लता carricature - कुलदीप दिमांग

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का तीसरा अंक

कविता वाचन की इंटरनेटीय परम्परा

Doctor Mridul Kirt - image courtesy: www.mridulkirti.com
डॉक्टर मृदुल कीर्ति
इंतज़ार की घडियां ख़त्म हुईं। लीजिये आपके सेवा में प्रस्तुत है सितम्बर २००८ का पॉडकास्ट कवि सम्मलेन। पिछली बार की तरह ही इस बार भी इस ऑनलाइन आयोजन का संयोजन किया है हैरिसबर्ग, अमेरिका से डॉक्टर मृदुल कीर्ति जी ने।

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन भौगौलिक दूरियाँ कम करने का माध्यम है और इसमें भारत व अमेरिका के कवियों ने भाग लिया है। इस बार के पॉडकास्ट कवि सम्मेलन ने पोंडिचेरी से स्वर्ण-ज्योति, फ़रीदाबाद से शोभा महेन्द्रू, दिल्ली से मनुज मेहता, ग़ाज़ियाबाद से कमलप्रीत सिंह, अशोकनगर (म॰प्र॰) से प्रदीप मानोरिया, रोहतक से डॉक्टर श्यामसखा "श्याम", भारत से विवेक मिश्र, पिट्सबर्ग (अमेरिका) से अनुराग शर्मा, तथा हैरिसबर्ग  (अमेरिका) से डॉक्टर मृदुल कीर्ति को युग्मित किया है।

पिछले सम्मलेन की सफलता के बाद हमने आपकी बढ़ी हुई अपेक्षाओं को ध्यान में रखा है. हमें आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि इस बार का सम्मलेन आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा और आपका सहयोग हमें इसी जोरशोर से मिलता रहेगा।

नीचे के प्लेयरों से सुनें।

(ब्रॉडबैंड वाले यह प्लेयर चलायें)


(डायल-अप वाले यह प्लेयर चलायें)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)


VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis


हम सभी कवियों से यह गुज़ारिश करते हैं कि अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। (अक्टूबर अंक के लिए रिकॉर्डिंग भेजने की आखिरी तिथि है १९ अक्टूबर २००८। )

रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हिन्द-युग्म के नियंत्रक शैलेश भारतवासी ने इसी बावत एक पोस्ट लिखी है, उसकी मदद से आप रिकॉर्डिंग सीख जायेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया   यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 3. Month: Sept 2008.

चलो, एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

मशहूर पार्श्व गायक महेन्द्र कपूर को अनिता कुमार की श्रद्धाँजलि

दोस्तो,

जन्म- ९ जनवरी १९३४
मूल- अमृतसर, पंजाब
मृत्यु- २७ सितम्बर, २००८
अभी-अभी खबर आयी कि शाम साढ़े सात बजे महेंद्र कपूर सदा के लिए रुखसत हो लिए। सुनते ही दिल धक्क से रह गया। अभी कल ही तो हेमंत दा की बरसी थी और वो बहुत याद आये, और आज महेंद्र कपूर चल दिये।

कानों में गूंजती उनकी आवाज के साथ साथ अपने बचपन की यादें भी लौट रही हैं। 1950 के दशक में जब महोम्मद रफ़ी, तलत महमूद, मन्ना डे, हेमंत दा, मुकेश और कालांतर में किशोर दा की तूती बोलती थी ऐसे में भी महेंद्र कपूर साहब ने अपना एक अलग मुकाम बना लिया था। एक ऐसी आवाज जो बरबस अपनी ओर खींच लेती थी। यूं तो उन्होंने उस जमाने के सभी सफ़ल नायकों को अपनी आवाज से नवाजा लेकिन मनोज कुमार भारत कुमार न होते अगर महेंद्र कपूर जी की आवाज ने उनका साथ न दिया होता। महेंद्र कपूर जी का नाम आते ही जहन में 'पूरब और पश्चिम' के गाने गूंजते लगते हैं

"है प्रीत की रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूँ, भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ"

आज भी इस गीत को सुनते-सुनते कौन भारतीय साथ में गुनगुनाने से खुद को रोक सकता है और किस भारतीय की छाती इस गाने के साथ चौड़ी नहीं होती। लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था "जय जवान, जय किसान", भारत के इस सपूत ने शास्त्री जी के इस नारे को अपने गीतों में न सिर्फ़ जिया बल्कि उस नारे को अमर भी कर दिया। जहां एक तरफ़ 'शहीद' फ़िल्म में उनकी आवाज गूंजी

"मेरा रंग दे बसंती चौला, माय , रंग दे बंसती चौला"

तो दूसरी तरफ़ 'उपकार' फ़िल्म के किसान की आवाज बन उन्हों ने गर्व से कहा

"मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती," ।

गीत सुनें

चलो इक बार फिर से


शेष गाने आप नीचे के प्लेयर से सुनें।
मोहम्मद रफ़ी को अपना गुरु मानने वाले, महेंद्र जी ने 1956 में ही फ़िल्मी गीतों के गायन की दुनिया में प्रवेश किया, लोगों ने शुरू-शुरू में कहा कि मोहम्मद रफ़ी को कॉपी करता है, लेकिन महज तीन साल बाद ही सन 1959 में उनका गाया 'नवरंग' फ़िल्म का गाना

-"आधा है चंद्रमा रात आधी, रह न जाये तेरी-मेरी बात आधी"

कालजयी गीत हमारे दिलों पर अपनी मोहर लगा गया। इसके पहले कि लोग कहते कि अरे ये तो तुक्का था जो लग गया, 1959 में ही एक और फ़िल्म 'धूल का फूल' का वो प्यारा सा गीत

"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ, वफ़ा कर रहा हूँ वफ़ा चाहता हूँ"

ऐसा लोकप्रिय हुआ कि हर कोई उनसे वफ़ा करने को मजबूर हो गया।

फ़िर तो महेंद्र जी की शोहरत को मानो पंख लग गये, 1963 में आयी फ़िल्म 'गुमराह' का वो सदा बहार गीत

-" चलो इक बार फ़िर से अजनबी बन जाएं हम दोनों"

तान छेड़ते महेन्द्र
सुनिल दत्त और माला सिन्हा पर फ़िल्माया गया ये गीत हर टूटे दिल की आवाज बन गया और आज भी है। इस गाने पर महेंद्र जी को पहली बार फ़िल्म फ़ेअर अवार्ड भी मिला। इसी जैसा एक और गीत जो हमें याद आ रहा है वो है फ़िल्म 'वक़्त' का। हम लगभग दस साल के रहे होंगे जब फ़िल्म आयी "वक़्त", इस फ़िल्म के दो गाने बहुत लोकप्रिय हुए, एक तो मन्ना डे का गाया हुआ सदाबहार गीत जो आज भी हर किसी को गुदगुदाता है "ऐ मेरी जोहरा जबीं" और दूसरा गीत जो बहुत लोकप्रिय हुआ वो था महेंद्र जी का गाया
" दिन हैं बहार के ",

शशी कपूर और शर्मिला टैगोर पर फ़िल्माये इस गीत में महेंद्र जी ने जमाने भर की बेबसी भर शशी कपूर के किरदार को नयी ऊंचाई पर पहुंचा दिया था।

जहां ये गमगीन गाने हमारे गमों के साथी बने वहीं 'बहारें फ़िर भी आयेगीं' फ़िल्म का गीत
"बदल जाए अगर माली चमन होता नहीं खाली"

हर दिल की हौसलाअफ़्जाई करता मिल जाता है।
'किस्मत' फ़िल्म का वो गाना
"लाखों है यहां दिल वाले पर प्यार नहीं मिलता"
और
"तुम्हारा चाहने वाला खुदा की दुनिया में मेरे सिवा भी कोई और हो खुदा न करे"
कितने प्रेमियों को जबान दे गया

क्या क्या याद करें? अगर उन्होंने देश प्रेम, विरह, रोमान्स, आशावाद दिया तो भक्ति का रंग भी खूब जमाया। पूरब पश्चिम में उनकी गायी आरती
"ॐ जय जगदीश हरे "
तो आज मेरे ख्याल से हर घर में पूजा के अवसर पर बजती है। किसने सोचा था कि फ़िल्म का हिस्सा बन कर भी ये आरती फ़िल्मी रंग से अछूती रहेगी। बिना किसी लटके-झटके के सीधे सादे ट्रेडिशनल ढंग से गायी ये आरती आज भी मन को शांती देती है।
74 साल की उम्र में भी गुर्दे की बीमारी से जूझते हुए भी इस भारत के सपूत ने चैन से घर बैठना स्वीकार नहीं किया और देश-विदेश में घूम-घूम के भारतीय संगीत का जादू बिखेरता रहा, फ़िर वो जादू चाहे हिन्दी में हो या पंजाबी, गुजराती या मराठी में। मानो कहते हों

"तुम अगर साथ देने का वादा करो मैं यूं ही मस्त नगमें लुटाता रहूँ"

---अनिता कुमार

Saturday, September 27, 2008

स्वर कोकिला लता मंगेशकर के लिये एक अदभुत कविता-तुम स्वर हो,स्वर का स्वर हो

माया गोविंद देश की जानी मानी काव्य हस्ताक्षर हैं.हिन्दी गीत परम्परा को मंच पर स्थापित करने में मायाजी ने करिश्माई रचनाएँ सिरजीं हैं.आवाज़ पर भाई संजय पटेल के माध्यम से हमेशा नई – नई सामग्री मिलती रही है.लता दीदी के जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले आवाज़ पर प्रस्तुत है समर्थ कवयित्री माया गोविंद की यह भावपूर्ण रचना.


तुम स्वर हो, तुम स्वर का स्वर हो
सरल-सहज हो, पर दुष्कर हो।
हो प्रभात की सरस "भैरवी'
तुम "बिहाग' का निर्झर हो।

चरण तुम्हारे "मंद्र सप्तकी'
"मध्य सप्तकी' उर तेरा।
मस्तक "तार-स्वरों' में झंकृत
गौरवान्वित देश मेरा।
तुमसे जीवन, जीवन पाए
तुम्हीं सत्य-शिव-सुंदर हो।
हो प्रभात की...

"मेघ मल्हार' केश में बॉंधे
भृकुटी ज्यों "केदार' "सारंग'।
नयन फागुनी "काफ़ी' डोले
अधर "बसंत-बहार' सुसंग।
कंठ शारदा की "वीणा' सा
सप्त स्वरों का सागर हो।
हो प्रभात की...

सोलह कला पूर्ण गांधर्वी
लगती हो "त्रिताल' जैसी।
दोनों कर जैसे "दो ताली'
"सम' जैसा है भाल सखी।
माथे की बिंदिया "ख़ाली' सी
"द्रुत लय" हो, गति मंथर हो।
हो प्रभात की...

"राग' मित्र, "रागिनियॉं'सखियॉं
"ध्रुपद-धमार' तेरे संबंधी।
"ख़याल-तराने' तेरे सहोदर
"तान' तेरी बहनें बहुरंगी।
"भजन' पिता, जननी "गीतांजलि'
बस स्वर ही तेरा वर हो।
हो प्रभात की...

ये संसार वृक्ष "श्रुतियों' का
तुम सरगम की "लता' सरीखी।
"कोमल' "शुद्ध' "तीव्र' पुष्पों की
छंद डोर में स्वर माला सी।
तेरे गान वंदना जैसे

Friday, September 26, 2008

सच बोलता है मुंह पर, चाहे लगे बुरा सा

दूसरे सत्र के तेरहवें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज.

नए गीतों को प्रस्तुत करने के इस चलन में अब तक ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई कलाकार अपने पहले गीत के ओपन होने से पहले ही एक जाना माना नाम बन जाए कुछ इस कदर कि आवाज़ के स्थायी श्रोताओं को लगातार ये जानने की इच्छा रही कि अपने संगीत और आवाज़ से उन पर जादू करने वाले रफ़ीक शेख का गीत कब आ रहा है. तो दोस्तों आज इंतज़ार खत्म हुआ. आ गए हैं रफ़ीक शेख अपनी पहली प्रवष्टि के साथ आवाज़ के इस महा आयोजन में. साथ में लाये हैं एक नए ग़ज़लकार अजीम नवाज़ राही को, रिकॉर्डिंग आदि में मदद रहा अविनाश जी का जो रफ़ीक जी के मित्र हैं. दोस्तों हमें यकीन है रफ़ीक शेख की जादू भरी आवाज़ में इस खूबसूरत ग़ज़ल का जादू आप पर ऐसा चलेगा कि आप कई हफ्तों, महीनों तक इसे गुनगुनाने पर मजबूर हो जायेंगे. तो मुलाहजा फरमायें युग्म की नयी पेशकश,ये ताज़ा तरीन ग़ज़ल - " सच बोलता है ....."

ग़ज़ल को सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें -





After creating a lot of buzz by his rendition of Ahmed Faraz sahab's ghazals (as a musical tribute to the legend) singer/composer Rafique Sheikh, of Pune, Maharashtra is here with his first entry for this season. This ghazal "sach bolta hai" is penned by another new comer of this awaaz team Azeem Nawaaz Rahi, recording help has been done by another online friend of Rafique, Avinaash. So guys, just enjoy this beautiful ghazal today and please don't forget to spare a moment to give your valuable comments.

To listen to the ghazal, please click on the player below-




ग़ज़ल के बोल -

सच बोलता है मुंह पर, चाहे लगे बुरा सा,
किरदार उसका हमको लगता है आईना सा.

कहने को चंद लम्हें था साथ वो सफर में,
यूँ लग रहा था जैसे बरसों का है शनासा.

कलियाँ अगर न होती लफ्जों की मुट्ठियों में,
होता न जिंदगी का चेहरा कभी नया सा.

"राही" मुझे तसल्ली देते हैं मेरे आंसू,
जी हो गया है हल्का रोया जो मैं जरा सा.

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)




VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis



SONG # 13, SEASON # 02, "SACH BOLTA HAI..." OPENED ON AWAAZ HIND YUGM 26/09/2008.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion


ब्लॉग/वेबसाइट/ऑरकुट स्क्रैपबुक/माईस्पैस/फेसबुक में 'खुशमिज़ाज मिट्टी' का पोस्टर लगाकर नये कलाकारों को प्रोत्साहित कीजिए

बेकरार कर के हमें यूँ न जाइए, आप को हमारी कसम लौट आइए

हेमंत कुमार की 19वीं बरसी पर अनिता कुमार की ख़ास पेशकश


आज 26 सितम्बर, हेमंत दा की 19वीं पुण्यतिथि। बचपन की यादों के झरोंखों से उनकी सुरीली मदमाती आवाज जहन में आ-आ कर दस्तक दे रही है। पचासवें दशक के किस बच्चे ने 'गंगा-जमुना' फ़िल्म का उनका गाया ये गीत कभी न कभी न गाया होगा!
"इंसाफ़ की डगर पे बच्चों दिखाओ चल के, ये देश है तुम्हारा"।

हेमंत कुमार
हेमंत कुमार मुखोपाध्य जिन्हें हम हेमंत दा के नाम से जानते हैं, 16 जून 1920 को वाराणसी के साधारण से परिवार में जन्में लेकिन बचपन में ही बंगाल में स्थानातरित हो लिए। उनके बड़े भाई कहानीकार थे, माता पिता ने सपना देखा कि कम से कम हेमंत इंजीनियर बनेगें। लेकिन नियति ने तो उनकी तकदीर में कुछ और ही लिखा था। औजारों की टंकार उनके कवि हृदय को कहां बाँध पाती, कॉलेज में आते न आते वो समझ गये थे कि संगीत ही उनकी नियति है और महज तेरह वर्ष की आयु में 1933 में ऑल इंडिया रेडियो के लिए अपना पहला गीत गा कर उन्होंने गीतों की दुनिया में अपना पहला कदम रखा और पहला फ़िल्मी गीत गाया एक बंगाली फ़िल्म 'निमयी संयास' के लिए।

1943 में आये बंग अकाल ने उस समय के हर भारतीय पर अपनी अमिट छाप छोड़ी थी। रबींद्र संगीत का ये महारथी उससे कैसे अछूता रहता। 1948 में उसी अकाल से प्रेरित होकर उन्होंने सलिल चौधरी का लिखा एक गैर फ़िल्मी गीत गाया "गणयेर बधु" । इस गाने से हेमंत दा और सलिल चौधरी जी को बंगाल में इतनी प्रसिद्धी मिली कि फिर कभी पीछे मुड़ कर न देखा, बंगाली फ़िल्मों में बतौर गायक उन्हें टक्कर देने वाला कोई न था।

1951 में उनके मित्र हेमेन गुप्ता बंगाल से बम्बई की ओर चल दिये हिन्दी फ़िल्मों में अपना हाथ आजमाने। हेमेन ने "आनंदमठ" बनाने का फ़ैसला किया और जब उसमें संगीत देने की बात आयी तो उन्होंने हेमंत दा को याद किया। उनके इसरार पर हेमंत दा कलकत्ता से बम्बई आ गये और पहली बार किसी फ़िल्म का संगीत दिया।

सुजलाम-सुफलाम सुनें
देश प्रेम पर आधारित ये फ़िल्म तो इतनी ज्यादा न चली लेकिन लता जी से गवाया हेमंत दा का गाना "सुजलाम सुफलाम…" कौन भूल सकता है। समय के साथ नयी पीढ़ी के संगीत की बदलती रुचि के चलते ये गाना अब रेडियो में भी इतना नहीं बजता। कुछ महीने पहले जब यूनूस जी ने अपने ब्लोग पर इस गाने का जिक्र किया और इसे अपने ब्लोग पर सुनवाया तो इस गाने को वहां से उठाये बिना रह न सके और आज भी अक्सर ये गीत हमारी शामों का साथी बनता है। जितने अच्छे बोल हैं उतना ही मधुर संगीत, और लता जी की आवाज गीत की आत्मा बन गयी।

गीत सुनें

छुपा लो यूँ दिल में


इंसाफ की डगर पे


बेक़रार करके हमें


ज़रा नज़रों से कह दो जी


तुम पुकार लो


ना तुम हमें जानो


जाने वो कैसे लोग थे


तेरी दुनिया में जीने से


या दिल की सुनो
वो कहते हैं न बम्बई है ही ऐसा मायाजाल, जो एक बार आया वो फ़िर जिन्दगी भर मुम्बई का ही हो कर रह जाता है। हेमंत दा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। आनंदमठ से बतौर संगीतकार शुरु हुआ सफ़र कब गायकी की तरफ़ मुड़ गया पता ही न चला। हेमंत दा उस समय के बहुचर्चित हीरो देवानंद की आवाज बन गये। सचिन देव बर्मन के संगीत में पगी उनकी आवाज हर रंग बिखरा सकती थी।
'बीस साल बाद' फ़िल्म के शोख गाने

"बेकरार कर के हमें यूं न जाइए, आप को हमारी कसम लौट आइए"और

" जरा नज़रों से कह दो जी"
आज भी दिल को गुदगुदा देते हैं तो दूसरी तरफ़ 'खामोशी' फ़िल्म में धर्मेंद्र की आवाज बन वहीदा से इसरार " तुम पुकार लो" ,

'ममता' फिल्म का लता मंगेशकर के साथ गाया मेलोडियस गीत 'छुपा लो यूँ दिल में प्यार मेरा' हर एक की जुबान पर है।

'बात रात की' फ़िल्म से "न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जानें मगर लगता है कुछ ऐसा मेरा हमदम मिल गया"
इश्क और रोमांस की पराकाष्ठा है।
गुरुदत्त की प्यासा में "जाने वो कैसे लोग थे जिनको…"
या फ़िर हाऊस नं॰ 44 का गीत
"तेरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएं"
सुनते-सुनते किस के मुंह से आह न निकलेगी.

और 'अनुपमा' का 'या दिल की सुनो दुनिया वालों॰॰' धीर-गंभीर मगर मधुर गीत के जिक्र के बिना यह आलेख तो अधूरा ही रहेगा।

गीता दत्त के साथ
जहां बम्बई में आनंदमठ के बाद अनुपमा, जाग्रती, मां-बेटा, मंझली दीदी,साहब बीबी और गुलाम, नागिन जैसी फ़िल्मों में हिट संगीत दे कर हेमंत दा संगीतकार और देवानंद, धर्मेंद्र जैसे कई चोटी के नायकों की आवाज बन सफ़ल गीतकार बन गये थे वहीं उन्होनें बंगाली फ़िल्मों में भी अपनी जादुई आवाज से धूम मचा रखी थी। 1955 में जहां उन्हें हिन्दी फ़िल्मों में बतौर संगीतकार पहला फ़िल्म फ़ेअर अवार्ड मिला, वहीं उसी साल बंगाल के मशहूर नायक उत्तम कुमार के लिए पाशर्व गायक बन उन्होनें एक नयी साझेदारी की नींव रखी जो लंबे दशक तक चली। उनके गैर फ़िल्मी गीत भी उतने लोकप्रिय हुए जितने फ़िल्मी गीत। उनका परचम बंगाली और हिन्दी दोनों फ़िल्म जगत में समान रूप से लहराया। पर हेमंत दा को कहां चैन था। 1959 में उन्होंने अपनी पहली बंगाली फ़िल्म "नील अकशेर नीचे" फ़िल्म बना कर फ़िल्म प्रोडकशन में हाथ आजमाया। कहानी कलकत्ता में रह रहे चीनी फ़ेरीवालों की मुसीबतों पर आधारित थी। पहली ही पिक्चर राष्ट्रपति स्वर्ण पदक से सम्मानित हुई। फ़िर तो उन्होंने हिन्दी में भी कई यादगार फ़िल्में बनायी जैसे बीस साल बाद, कोहरा, बीबी और मकान, फ़रार, राहगीर, और खामोशी, बालिका-वधू। पर हर शह और हर शक्स जो आता है उसे जाना होता है, अस्सी के दशक में उन्हें पहला दिल का दौरा पड़ा। इस दिल के दौरे ने कइयों का दिल तोड़ दिया। हेमंत दा की आवाज पर इस दौरे का गहरा असर पड़ा। इसके बावजूद वो कई एलबम निकालते रहे, म्यूजिक कॉन्सर्टस में भाग लेते रहे लेकिन स्वास्थय उनका साथ नहीं दे रहा था और 26 सितम्बर 1989 को संगीत की दुनिया का ये चमकता हुआ सितारा सदा के लिए लुप्त हो गया और छोड़ गया पीछे यादें। उनके गये 19 साल हो गये लेकिन आज भी ग्रामोफ़ोन कंपनी उनके गाये गीतों की नयी एलबम हर साल निकालती है और हाथों हाथ लपकी जाती है।
हेमंत दा शारीरिक रूप से अब हमारे बीच नहीं है पर उनकी आवाज हमारे दिलों पर आज भी राज करती है। कितने ही गाने हैं जो यहां जोड़ नहीं पाये लेकिन वो मेरी यादों में हिलोरे ले रहे हैं। साहब बीबी गुलाम के गाने कोई भूल सकता है क्या?

----अनिता कुमार


हेमंत कुमार- संक्षिप्त परिचय


हेमंत दा
हिन्दी फ़िल्म जगत में बहु प्रतिभाशाली (multi talented) कलाकारों के नामों की सूचि में हेमंत कुमार या हेमंतदा का नाम सम्मान से लिया जाता है| बंगाली परिवार में जन्मे हेंमत कुमार का नाम हेमंत कुमार मुखोपाध्याय था| अभियात्रिकी (engineering) की पढ़ाई छोड़ संगीत की दुनिया को जानने निकले हेमंत पूरी तरह से संगीत के लिए ही बने रहे | १९३३ से आल इंडिया से शुरुवात करके हेमंत दा ने विदेशों तक सफर तय किया| शुरुवाती बरसों में केवल बंगाली भाषा कि फिल्मों के लिए ही काम करते रहे| गीत गाये, संगीत बनाया| गैर बंगाली फिल्मों में लोकप्रियता इतनी थी कि मशहूर संगीत कंपनी Grampphone Company Of India (GCI) प्रति वर्ष उनका एक गीतों का संग्रह प्रस्तुत करती रही| यह उनके ना रहने के कई सालों तक होता रहा |

बंगला का कोई गायक भला रविन्द्र संगीत से अनछुया कैसे रह सकता है? हेमंत दा ने भी इसके गीत गाये| बंगला फिल्मो में भी गाये| खासकर बंगला के गीत-संगीत के लिए वे मशहूर रहे| बतौर संगीतकार उन्होंने १९४७ में बंगला फ़िल्म 'अभियात्री' में काम किया| १०० से अधिक बंगला फिल्मों में उन्होंने गीत-संगीत के लिए काम किए| बंगाल के इस अनोखे रत्न ने हिन्दी फिल्मो में भी प्रयोग किए|

कुछ अमर कृतियाँ -
प्यासा का गीत - जाने वो कैसे लोग थे ..... या फ़िर ये गीत - ये नयन डरे डरे .... ये जाम भरे भरे ....खामोशी का गीत 'तुम पुकार लो॰॰तुम्हारा इंतज़ार है' । हिन्दी फ़िल्म नागीन (१९५१) में उन्हें संगीत के लिए फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला| उन्होंने सलील चौधरी , सचिन देव बर्मन, गुरुदत्त, देव आनद आदि प्रसिद्ध कलाकारों के साथ काम किया| बंगला गायिका बेला जी के साथ शादी की| उनकी दो संतानें भी संगीत से ही जुड़ी रहीं| अपने जीवन के अन्तिम कुछ बरसों में उन्होंने देश-विदेश में स्टेज शो किए, दूरदर्शन और रेडियो पर अपने कार्यक्रम प्रतुत किए| २६ सितम्बर १९८९ को इस सफल कलाकार ने हमसे विदाई ली |
आज के इस दिन पर हम उनको अपनी भाव पूर्ण श्रद्धाँजली देते हैं|

हिन्दी फिल्मों जिनमें संगीत कार के रूप में काम किए -
खामोशी, गर्ल फ्रेंड, हमारा वतन, नागिन, जागृति, बंदिश, साहिब बीबी और गुलाम , एक झलक , फरार, आनंद मठ, अनजान, अनुपमा, इंसपेक्टर, लगान, पायल, रहीर, सहारा, ताज, उस रात के बाद, यहूदी की लड़की, दो दिल, दो दुनी चार, एक ही रास्ता, फेर्री, इन्साफ कहाँ है, हिल स्टेशन, फैशन, चाँद, चम्पाकली, बंधन, बंदी, सम्राट , सन्नाटा आदि।

अवनीश एस॰ तिवारी की पेशकश

Thursday, September 25, 2008

लता मंगेशकर- संगीत की देवी

लता मंगेशकर का जीवन परिचय

लता का परिवार
लता मंगेशकर का जन्म इंदौर, मध्यप्रदेश में सितम्बर २८, १९२९ को हुआ। लता मंगेशकर का नाम विश्व के सबसे जानेमाने लोगों में आता है। इनका जन्म संगीत से जुड़े परिवार में हुआ। इनके पिता प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे व उनकी एक अपनी थियेटर कम्पनी भी थी। उन्होंने ग्वालियर से संगीत की शिक्षा ग्रहण की। दीनानाथ जी ने लता को तब से संगीत सिखाना शुरू किया, जब वे पाँच साल की थी। उनके साथ उनकी बहनें आशा, ऊषा और मीना भी सीखा करतीं थीं। लता अमान अली खान, साहिब और बाद में अमानत खान के साथ भी पढ़ीं। लता मंगेशकर हमेशा से ही ईश्वर के द्वारा दी गई सुरीली आवाज़, जानदार अभिव्यक्ति व बात को बहुत जल्द समझ लेने वाली अविश्वसनीय क्षमता का उदाहरण रहीं हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण उनकी इस प्रतिभा को बहुत जल्द ही पहचान मिल गई थी। जब १९४२ में उनके पिता की मृत्यु हुई तब वे परिवार में सबसे बड़ी थीं इसलिये परिवार की जिम्मेदारी उन्हें के ऊपर आ गई। अपने परिवार के भरण पोषण के लिये उन्होंने १९४२ से १९४८ के बीच हिन्दी व मराठी में करीबन ८ फिल्मों में काम किया। उनके पार्श्व गायन की शुरुआत १९४२ की मराठी फिल्म "कीती हसाल" से हुई। परन्तु गाने को काट दिया गया!!

वे पतली दुबली किन्तु दृढ़ निश्चयी थीं। उनकी बहनें हमेशा उनके साथ रहतीं। मुम्बई की लोकल ट्रेनों में सफर करते हुए उन्हें आखिरकार "आप की सेवा में (’४७)" पार्श्व गायिका के तौर पर ब्रेक मिल गया। अमीरबाई , शमशाद बेगम और राजकुमारी जैसी स्थापित गायिकाओं के बीच उनकी पतली आवाज़ ज्यादा सुनी नहीं जाती थी। फिर भी, प्रमुख संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने लता में विश्वास दिखाते हुए उन्हें मजबूर और पद्मिनी(बेदर्द तेरे प्यार को) में काम दिया जिसको थोड़ी बहुत सराहना मिली। पर उनके टेलेंट को सच्ची कामयाबी तब मिली जब १९४९ में उन्होंने तीन जबर्दस्त संगीतमय फिल्मों में गाना गाया। ये फिल्में थीं- नौशाद की "अंदाज़", शंकर-जयकिशन की "बरसात" और खेमचंद प्रकाश की "महल"। १९५० आते आते पूरी फिल्म इंडस्ट्री में लता की हवा चल रही थी। उनकी "हाई-पिच" व सुरीली आवाज़ ने उस समय की भारी और नाक से गाई जाने वाली आवाज़ का असर खत्म ही कर दिया था। लता की आँधी को गीता दत्त और कुछ हद तक शमशाद बेग़म ही झेल सकीं। आशा भोंसले भी ४० के दशक के अंत में आते आते पार्श्व गायन के क्षेत्र में उतर चुकीं थी।

आशा, मीना, लता, हृदयनाथ और ऊषा मंगेशकर
शुरुआत में लता की गायिकी नूरजहां की याद दिलाया करती पर जल्द ही उन्होंने अपना खुद का अंदाज़ बना लिया था। उर्दू के उच्चारण में निपुणता प्राप्त करने हेतु उन्होंने एक शिक्षक भी रख लिया! उनकी अद्भुत कामयाबी ने लता को फिल्मी जगत की सबसे मजबूत महिला बना दिया था। १९६० के दशक में उन्होंने प्लेबैक गायकों के रायल्टी के मुद्दे पर मोहम्मद रफी के साथ गाना छोड़ दिया। उन्होंने ५७-६२ के बीच में एस.डी.बर्मन के साथ भी गाने नहीं गाये। पर उनका दबदबा ऐसा था कि लता अपने रास्ते थीं और वे उनके पास वापस आये। उन्होंने ओ.पी नैय्यर को छोड़ कर लगभग सभी संगीतकारों और गायकों के साथ ढेरों गाने गाये। पर फिर भी सी.रामचंद्र और मदन मोहन के साथ उनका विशेष उल्लेख किया जाता है जिन्होंने उनकी आवाज़ को मधुरता प्रदान करी। १९६०-७० के बीच लता मजबूती से आगे बढ़ती गईं और इस बीच उन पर इस क्षेत्र में एकाधिकार के आरोप भी लगते रहे।

उन्होंने १९५८ की मधुमति फिल्म में "आजा रे परदेसी..." गाने के लिये फिल्म फेयर अवार्ड भी जीता। ऋषिकेष मुखर्जी की "अनुराधा" में पंडित रवि शंकर की धुनों पर गाने गाये और उन्हें काफी तारीफ़ मिली। उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू लता के गैर फिल्मी देशभक्ति गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों..." से अति प्रभावित हुए और उन्हें १९६९ में पद्म भूषण से भी नवाज़ा गया।

७० और ८० के दशक में लता ने तीन प्रमुख संगीत निर्देशकों लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन और कल्याण जी-आनंदजी के साथ काम किया। चाहें सत्यम शिवम सुंदरम हो, शोले या फिर मुकद्दर का सिकंदर, तीनों में लता ही केंद्र में रहीं। १९७४ में लंदन में आयोजित लता के "रॉयल अल्बर्ट हॉल" कंसेर्ट से बाकि शो के लिये रास्ता पक्का हो गया। ८० के दशक के मध्य में डिस्को के जमाने में लता ने अचानक अपना काम काफी कम कर दिया हालांकि "राम तेरी गंगा मैली" के गाने हिट हो गये थे। दशक का अंत होते होते, उनके गाये हुए "चाँदनी" और "मैंने प्यार किया" के रोमांस भरे गाने फिर से आ गये थे। तब से लता ने अपने आप को बड़े व अच्छे बैनरों के साथ ही जोड़े रखा। ये बैनर रहे आर. के. फिल्म्स (हीना), राजश्री(हम आपके हैं कौन...) और यश चोपड़ा (दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे, दिल तो पागल है, वीर ज़ारा) आदि। ए.आर. रहमान जैसे नये संगीत निर्देशक के साथ भी, लता ने ज़ुबैदा में "सो गये हैं.." जैसे खूबसूरत गाने गाये।

आजकल, लता मास्टर दीनानाथ अस्पताल के कार्यों में व्यस्त हैं। वे क्रिकेट और फोटोग्राफी की शौकीन हैं। लता, जो आज भी अकेली हैं, अपने आप को पूरी तरह संगीत को समर्पित किया हुआ है। वे अभी भी रिकॉर्डिंग के लिये जाने से पहले कमरे के बाहर अपनी चप्पलें उतारती हैं। लता मंगेशकर जैसी शख्सियतें विरले ही जन्म लेती हैं। लता जी को जन्मदिन की अग्रिम बधाई...

२६ सितम्बर को हेमन्त कुमार की १९वीं पुण्यतिथि है, तो क्यों न इस अवसर हेमन्त कुमार द्वारा संगीतबद्ध लता मंगेशकर की आवाज़ में 'खामोशी' (१९६९) फिल्म अमर गीत 'हमने देखी हैं इन आँखों की महकती खुश्बू' सुन लिया जाय। यह एक महान संगीतकार-गायक को हमारी श्रद्दाँजलि होगी। इस अमर गीत को गुलज़ार ने लिखा है।



प्रस्तुति- तपन शर्मा चिंतक
स्रोत- अंग्रेजी विकिपीडिया तथा अन्य इंटरनेटीय सजाल

आशा, मीना, लता, हृदयनाथ और ऊषा मंगेशकर
लता, आशा, ऊषा, मीना और शिवाजी गणेशन की विवाह की एक पॉर्टी के मौके पर


चित्र साभार- हामराफोटोज़

बहा के लहू इंसां का मिलेगी क्या...तुमको वो जन्नत...

आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ की 'ऑडियो-वीडियो' पहल


सड़कों पर पड़े लोथड़ों में
ढूँढ रहा फिरदौस है जो,
सौ दस्त, हज़ार बाजुओं पे
लिख गया अजनबी धौंस है जो,
आँखों की काँच कौड़ियों में
भर गया लिपलिपा रोष है जो,
ईमां तजकर, रज कर, सज कर
निकला लिए मुर्दा जोश है जो,
बेहोश है वो!!!!

ओ गाफ़िल!
जान इंसान है क्या,
अल्लाह है क्या, भगवान है क्या,
कहते मुसल्लम ईमान किसे,
पाक दीन इस्लाम किसे,
दोजख है कहाँ, जन्नत है कहाँ,
उल्फत है क्या, नफ़रत है कहाँ,
कहें कुफ़्र किसे, काफ़िर है कौन,
रब के मनसब हाज़िर है कौन,
गीता, कुरान का मूल है क्या,
तू जान कि तेरी भूल है क्या!!!!

सबसे मीठी जुबान है जो,
है तेरी, तू अंजान है क्यों?
उसमें तू रचे इंतकाम है क्यों?

पल शांत बैठ, यह सोच ज़रा,
लहू लेकर भी तेरा दिल न भरा,
सुन सन्नाटे की सरगोशी,
अब तो जग, तज दे बेहोशी,
अब तो जग, तज दे बेहोशी।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

ऊपर लिखी 'तन्हा' की कविता से स्पष्ट हो गया होगा कि हम क्या संदेश लेकर हाज़िर हुए हैं। आज दुनिया में हर जगह आतंक का साया है। कोई रोज़ी-रोटी कमाकर नहीं लौट पा रहा है, तो कोई दवा लेकर नहीं वापिस हो पा रहा है। इंसानियत के वाहक अपनी-अपनी तरह से इन खून-खराबों के खिलाफ़ लड़ाई लड़ भी रहे हैं। हमें मिली ऐसी ही "डी-लैब" की उत्साही टीम, जिसने इच्छा जताई ऐसे युवाओं को जो मजहब के नाम पर बरगलाये गए हैं और दहशत का रास्ता अपनाए हुए हैं, उनसे ये कायराना हरकत छोड़ देने का संदेश अपने संगीत और वीडियो के मध्यम से लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं. हमारी टीम ने उनके साथ दिया और किया एक प्रयास आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का। हर इंसानी रूह आतंकवाद के साये से मुक्ति चाहती है। आईये मिलकर हम सब एक रचनात्मक जंग का आगाज़ करें इस घिनौने आतंकवाद के ख़िलाफ़.



(डी-लैब की टीम)

गीत के बोल -

खुदा को दो न ये तोहमत,
सिखाता नही ये मजहब,
बहा के लहू इंसां का मिलेगी क्या...तुमको वो जन्नत,
छोड़ो ये नापाक हसरत,
ये काफिरों सी फितरत,
सुनो ये शौके-दहशत....काम है,
ये कायराना
तुम छोड़ दो न,
छोड़ दो न ....तुम छोड़ दो न...

ये सहमे चेहरे,
ये उजडे मंज़र,
देखो ये जलते घर,
पागल न बन कायर...

देखो ये जलते घर.....

ऑडियो सुनें


देखें ये वीडियो और हमें बताएं कितना सार्थक रहा हिंद युग्म और "डी" लैब का ये साँझा प्रयास -



विडियो निर्माण - "डी" लैब, हैदराबाद
सहयोगी संस्था - हिंद युग्म


संगीत और गायन -

डेनिस नोर्टन
डेनिअल विल्फ्रेड

रिदम प्रोग्रम्मिंग -

जॉन मार्टिन

गीत -

सजीव सारथी



आवाज़ की टीम इस बात पर विश्वास करती है कि समसामयिक विषयों पर ऑडियो और वीडियो फॉर्मेट में कही गई बात देखने सुनने वालों पर बेहद गहरा प्रभाव डालती है, जिस तरह की कोशिश "डी लैब" के इन युवकों ने की है, समाज में तेज़ी से फ़ैल रहे नासूर आतंकवाद पर अपनी बात इस गीत और उसके विडियो के मध्यम से कहने की, आप भी कर सकते हैं. आप अपने डी वी कैम या handycam से लघु फिल्में (विषय आधारित) बना कर हमें भेज सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए podcast.hindyugm@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं .

जितनी सुरीली हैं ग़ालिब की ग़ज़लें; गाने में दोगुना तप मांगती हैं

आज एक बार फ़िर आवाज़ पर हमारे प्रिय संगीत समीक्षक और जानेमाने चिट्ठाकार संजय पटेल तशरीफ़ लाए हैं और बता रहे हैं लता मंगेशकर की गायकी की कुछ अदभुत ख़ासियतें.हमें उम्मीद है कि इस पोस्ट को पढ़कर संगीत विषय से जुड़े विद्यार्थी,गायक,संगीतकार बहुत लाभान्वित होंगे.आशा है आवाज़ पर जारी सुगम समारोह में सुनी और सराही जा रही ग़ालिब की ग़ज़लों का आनंद बढ़ाने वाली होगी संजय भाई की ये समीक्षा.मुलाहिज़ा फ़रमाएँ......



एक बात को तो साफ़ कर ही लेना चाहिये कि लता मंगेशकर अपने समय की सबसे समर्थ गायिका हैं.मीरा के भजन,डोगरी,मराठी,गुजराती,और दीगर कई भाषाओं के लोकगीत,भावगीत,भक्तिगीत और सुगम संगीत गाती इस जीवित किंवदंती से रूबरू होना यानी अपने आपको एक ऐसे सुखद संसार में ले जाना है जहाँ सुरों की नियामते हैं और संगीत से उपजने वाले कुछ दिव्य मंत्र हैं जो हमारे मानस रोगों और कलुष को धो डालने के लिये इस सृष्टि में प्रकट हुआ हैं.

लता मंगेशकर के बारे में गुलज़ार कहते हैं कि लताजी के बारे में कोई क्या कह सकता है.उनके बारे में कोई बात करने की ज़रूरत ही नहीं है बल्कि उनको एकाग्र होकर सुनने की ज़रूरत है. उनके गायन के बारे में कोई अपनी राय नहीं दे सकता,सिर्फ़ अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है. ख़ाकसार की प्रतिक्रिया है कि लता मंगेशकर दुनिया की सबसे बेहतरीन गायिका तो हैं ही, सबसे अव्वल विद्यार्थी भी हैं. उन्होंने जिस तरह से अपने संगीतकारों को सुना,गुना और गाया है वह कितना सहज और सरल है ; ऐसा कह देना बेहद आसान है लेकिन ज़रा अपने कानों को इन बंदिशों की सैर तो करवाइये,आप जान जाएंगे किस बला का नाम लता है.

ग़ालिब को गाते वक़्त लता मंगेशकर पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर की विद्यार्थी हैं.सुन रहीं है,किस किस लफ़्ज़ पर वज़न देना है,कहाँ कितनी हरकतें है और कहाँ आवाज़ को हौले से साधना है और कहाँ देनी है परवाज़.ज़रा यह भी समझते चलें कि शास्त्रीय संगीत और लोक-संगीत में हर बार आप नया रच सकते हैं.जैसे बागेश्री गा रहे हैं तो इस बार तानों को थोड़ा छोटा कर लें,विलम्बित को ज़रा जल्द ख़त्म कर द्रुत पर आ जाएं,सरगम लें ही नहीं सिर्फ़ तानों से सजा लें पूरा राग. लोक-संगीत की रचनाओं को किसी सुर विशेष में बांधने की ज़रूरत नहीं,लय-घटाएँ,बढ़ाएँ;चलेगा.लेकिन हुज़ूर ये जो सुगम संगीत नाम की विधा है और ख़ास कर रेकॉर्डिंग का मामला हो तो सुगम से विकट कोई दूसरी आफ़त नहीं है. समय है कि बांध दिया गया है....तीन मिनट में ही कीजिये पूरी ये ग़ज़ल या भजन या गीत.आभूषण सारे चाहिये गायन के प्रस्तुति में.और बंदिश है संगीतकार या कम्पोज़र की कि ऐसा ही घुमाव चाहिये. सबसे बढ़कर यह कि गायकी की श्रेष्ठता के साथ संगीतकार या गीतकार/शायर चाहता है कि जो शब्द लिखे गए हैं उनकी अदायगी स्पष्ट हो,उच्चारण एकदम ख़ालिस हों और गायकी के वैभव के साथ ग़ज़ल या गीत का भाव जैसा लिखा गया है उसे दूगुना करने वाला हो.ये सारी भूमिका मैने इसलिये बांध दी है कि लता मंगेशकर की गायकी पर बहस करना बहुत आसान है ; उन प्रेशर्स को महसूस करना बहुत मुश्किल जो ग़ालिब या दीगर एलबम्स को रेकॉर्ड करते वक़्त लताजी ने जिये हैं.

लता मंगेशकर ने कहा है कि संगीतकार सज्जाद और ह्र्दयनाथ मंगेशकर के कम्पोज़िशन्स गाते हुए वे विशेष रूप से सतर्क हो जाती हैं,बात सही भी है. इन दोनो संगीतकारों ने अपने समय से अलग हटकर संगीत रचा है. आज जो बात मैंने लता मंगेशकर के बारे में कही है वह संभवत: पहली बार आवाज़ के ज़रिये ही कह पाया हूँ और उम्मीद करता हूँ कि ग़ालिब जैसा क्लिष्ट और लीक के हट कर रचा गया एलबम सुनते वक़्त आप मेरी बातों का स्मरण बनाए रखेंगे. तो सुनिए जनाब...लता+हृदयनाथ जुगलबंदी का करिश्मा.......ग़ालिब.

कभी नेकी भी उसके जी में गर....(ये ग़ज़ल आशा ने भी गई बाद में, जो आपको फ़िर कभी सुनवायेंगे)



नक्श फरियादी है...



हजारों ख्वाहिशें ऐसी...



बाज़ीच-ऐ-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे...



फ़िर मुझे दीदा-ऐ-दर याद आया...



रोने से और इश्क में बेबाक हो गए... (इस ग़ज़ल की धुन को हृदयनाथ मंगेशकर ने बरसों बाद फ़िल्म लेकिन में भी इस्तेमाल किया)


एक दुर्लभ चित्र स्मृति :आज आवाज़ पर नज़र आ रहे चित्र में -एक रेकॉर्डिंग के दौरान बतियाते हुए लताजी और उनके संगीतकार अनुज ह्र्दयनाथजी

Wednesday, September 24, 2008

सुनिए 'मुगलों ने सल्तनत बख़्श दी'

भगवती चरण वर्मा की प्रसिद्ध कहानी का पॉडकास्ट

आज हम लेकर आए हैं भगवती चरण वर्मा जी की एक सुंदर कहानी 'मुग़लों ने सल्तनत बख़्श दी'। यह एक व्यंग्य
हैं, जिसमें लेखक ने अंग्रेजों द्वारा भारत पर धीरे -धीरे कब्जा कर लेने की घटना को बड़े ही रोचक रूप मैं प्रस्तुत किया है। इसमें तत्कालीन मुग़ल साम्राज्य मैं व्याप्त राग, रंग और अकर्मण्यता पर करारी चोट की है। सुनिए शोभा महेन्द्रू की आवाज़ में, और आनंद लीजिये इस व्यंग्य कथा का जिसको सुना रहे हैं इस कथा के मुख्य पात्र हीरो जी।

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)



यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)

VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis


आज भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं, तो यहाँ देखें।

#First Story, : Mughalon Ne Saltanat Bakhsh Dee, Bhagvati Charan Varma/Hindi Audio Book/2008/07. Voice: Shobha Mahendru

एक गीत मेरी जीवन संगिनी के लिए - जे एम सोरेन

किशोर कुमार के जबरदस्त फैन जे एम सोरेन ख़ुद को एक गायक पहले मानते हैं, उनके अपने शब्दों में अगर कहें तो संगीत उनका पहला प्यार, पहला जनून है और संगीत ही उनकी आत्मा उनकी सांसें और जीवन का ओक्सिजेन है. सोरेन गीटार सिखाते हैं साथ ही सीखना भी जारी है. आज कल CAC कोच्ची से पाश्चात्य संगीत में ग्रेड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं. फ़िल्म जगत में बतौर गायक / संगीतकार अपनी पहचान बनाने के इच्छुक सोरेन आर डी बर्मन उर्फ़ पंचम को अपना गुरु मानते हैं.
हमने की ओ मुनिया के रचेता जे एम् सोरेन से कुछ ख़ास बातें -

हिंद युग्म - सम्मोहन और ओ मुनिया दोनों बिल्कुल अलग अलग फ्लेवर के गीत है सोरेन, क्या ये एक सोची समझी कोशिश थी मुक्तलिफ़ अंदाज़ में ख़ुद को परोसने की...?

सोरेन -नहीं ऐसी कोई बात नहीं है की ये एक सोची समझी कोशिश थी. हाँ ये बात ज़रूर है की सम्मोहन और मुनिया दोनों अलग अलग किस्म के गाने हैं. चाहें जिस फ्लेवर के गाने हों ये दोनों अपने को प्रिय हैं. क्योंकि गाने की डिमांड थी इसलिए गाना ऐसा बनाया मैंने. पहले वैसे मैंने किसी डांस गीत पर उतना ज़्यादा काम नहीं किया था. हाँ इच्छा ज़रूर थी और मैं सोचता हूँ कि मेरी कोशिश कामयाब हुई.

हिंद युग्म- आपके बारे में हमारे श्रोता अक्सर confuse रहते हैं, कभी हम बताते हैं की आप लखनऊ से हैं कभी वो देखते हैं कि कोची में रिकॉर्डिंग हो रही है, मूल रूप से आप कहाँ से हैं, कुछ अपने बारे में बताएं ?

सोरेन - मैं वैसे झारखण्ड से हूँ. परवरिश मेरी लखनऊ में हुई चूँकि मेरे पिताजी वहां रेलवे में कार्यरत थे. पढ़ाई पूरी करने के उपरांत मेरी नौकरी बैंक में लग गई. चूँकि मैं ऑफिसर हूँ इसलिए मेरा इस वक्त कोच्ची में पोस्टिंग है. कोच्ची में आने की वजह ये है कि मुझे हिन्दुस्तानी में रूचि तो है लेकिन पाश्चात्य संगीत में थोड़ा ज़्यादा है. मैं वैसे गिटारिस्ट हूँ और पाश्चात्य संगीत में शिक्षा के उद्देश्य से ही मैंने कोच्ची में पोस्टिंग मांगी और ईश्वर की कृपा से मिल भी गई..

हिंद युग्म - ज्योति मुन्ना सोरेन, उर्फ़ मार्टिन सोरेन इन नामों के पीछे सोरेन के कितने चेहरे हैं ?

सोरेन -ज्योति मुन्ना सोरेन और मार्टिन सोरेन एक ही हैं. हकीक़त ये है की मैंने ऑरकुट प्रोफाइल पहले मार्टिन क नाम से बनाया था. मैं ज़्यादा सीरियस नहीं था ऑरकुट में लेकिन जब देखा की मेरे जानने वाले मुझे पहचान नहीं पा रहे हैं तो मुझे अपना असली नाम सामने रखना पड़ा. वैसे भी नाम में क्या रखा हैं . Shakespeare ने कहा है की अगर गुलाब को आप गुलाब नहीं कहोगे तो भी वो गुलाब की तरह ही महकेगा.

हिंद युग्म - आने वाले सालों के लिए संगीत को लेकर क्या योजनायें हैं ?

सोरेन -बहुत सी हैं भाई. अभी बहुत काम करना है. समय निकालना है करने के लिए. अब क्योंकि मेरा परिवार मेरे साथ है तो समय ही समय है. अभी मेरे म्यूजिक बैंक में काफी tracks मैंने save करके रखे हैं. उनको थोड़ा सा पोलिश करके श्रोताओं के सामने परोसना है. और सजीव का साथ तो रहेगा ही रहेगा. क्योंकि मैं कुछ और दुसरे प्रोजेक्ट से कोन्नेक्टेद हूँ इसीलिए कुछ व्यस्त ज़रूर हूँ. हिन्द युग्म के लिए वैसे समय ही समय है. कुछ नया करने की ख्वाहिश है. कुछ बड़ा प्रोजेक्ट मिलने की उम्मीदें भी हैं. एक पर काम भी चल रहा है.. वक्त आने पर मैं ज़रूर बताऊँगा

हिंद युग्म - हिंद युग्म आवाज़ के साथ अब तक का अनुभव कैसा रहा आपका, आपको लगता है क्या की आवाज़ संगीत की दिशा में एक सही पहल है ?

सोरेन -बहुत ही अच्छा अनुभव है और हमेशा याद रहेगा. पहले लोग जहाँ पर मैं रहता था वहां जानते थे परन्तु अब देश के कोने कोने में लोग जानने लगे हैं. एक सपना सच होते हुए दिख रहा है. हर चीज़ का एक वक्त होता है. सबका समय आयेगा. और हाँ आवाज़ एक बहुत ही अच्छी पहल है. किसी ने सोचा नहीं और आप लोगों ने कर दिखाया. IT' S DIFFERENT. अगर आपको जिंदगी में कुछ करना है तो आपको कुछ अलग करना पड़ेगा. तभी आप SUCCESSFUL कहलायेंगे. हिंद युग्म एक SUCCESS है लोगों की प्रतिभा लोगों के सामने लाने का पहला कदम और वो भी सफल प्रयास. HATS OFF TO हिंद युग्म

हिंद युग्म - चलते चलते युग्म के श्रोताओं के लिए कुछ ख़ास हो जाए सोरेन.

सोरेन - I remember when I was in the 1st standard, everybody was getting a prize for something or the other on the final day of our school. I also wished that I should get something and lo my name was called and I got the first prize for singing. Sorry to say I lost that prize but I still treasure those moments.

Because of music only I fell in love with a girl who too fell in love with me Today i am a happily married man and ya friends she is my wife now. We share the same interests. She is not so good at singing becoz she is not confident although she can sing, but nonetheless she is a good listener and this is what I want. Today is 24th of September, My wife's birthday. So I am going to present a song for my wife.

हिंद युग्म - अरे वाह सोरेन ये तो बहुत ही खूबसूरत इत्तेफाक है, सुनाईये -

सोरेन - इसे मैंने ख़ुद लिखा, स्वरबद्ध किया और गाया भी है ( जाहिर है ) और मुझे लगता है कि ये गीत मेरी अर्धागिनी और जीवन संगिनी के लिए एक PERFECT तोहफा होगा उनके जन्मदिन पर. सुनिए -



God bless हिंद युग्म and all those who are directly or indirectly connected to it.

शुक्रिया सोरेन, इसी बात पर दोस्तों एक बार फ़िर से सुनें सोरेन का ये नया गीत "ओ मुनिया"(नीचे के पोस्टर पर क्लिक करें)और अपने विचार देकर इस उभरते हुए बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार /गायक को प्रोत्साहित करें -



आप भी इसका इस्तेमाल करें

Tuesday, September 23, 2008

जिंदगी से यही गिला है मुझे...

भारी फरमाईश पर एक बार फ़िर रफ़ीक शेख़ लेकर आए हैं अहमद फ़राज़ साहब का कलाम

पिछले सप्ताह हमने सदी के महान शायर अहमद फ़राज़ साहब को एक संगीतमय श्रद्धाजंली दी,जब हमारे संगीतकार मित्र रफ़ीक शेख उनकी एक ग़ज़ल को स्वरबद्ध कर अपनी आवाज़ में पेश किया. इस ग़ज़ल को मिली आपार सफलता और हमें प्राप्त हुए ढ़ेरों मेल और स्क्रैप में की गयी फरमाईशों से प्रेरित होकर रफीक़ शेख ने फ़राज़ साहब की एक और शानदार ग़ज़ल को अपनी आवाज़ में गाकर हमें भेजा है. हमें यकीन है है उनका ये प्रयास उनके पिछले प्रयास से भी अधिक हमारे श्रोताओं को पसंद आएगा. अपनी बेशकीमती टिप्पणियों से इस नवोदित ग़ज़ल गायक को अपना प्रोत्साहन दें.



ग़ज़ल - जिंदगी से यही...
ग़ज़लकार - अहमद फ़राज़.
संगीत और गायन - रफ़ीक शेख




ghazal - zindagi se yahi gila hai mujhe...
shayar / poet - ahmed faraz
singer and composer - rafique sheikh

जिदगी से यही गिला है मुझे,
तू बहुत देर से मिला है मुझे.

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल,
हार जाने का हौंसला है मुझे.

दिल धड़कता नही, टपकता है,
कल जो ख्वाहिश थी आबला है मुझे.

हमसफ़र चाहिए हुजूम नही,
एक मुसाफिर भी काफिला है मुझे.

ये भी देखें -

फ़राज़ साहब की शायरी का आनंद लें उनकी अपनी आवाज़ में

सुनिए 'हाहाकार' और 'बालिका से वधू'

सूखी रोटी खायेगा जब कृषक खेत में धरकर हल,
तब दूँगी मैं तृप्ति उसे बनकर लोटे का गंगाजल।
उसके तन का दिव्य स्वेदकण बनकर गिरती जाऊँगी,
और खेत में उन्हीं कणों से मैं मोती उपजाऊँगी।
फूलों की क्या बात? बाँस की हरियाली पर मरता हूँ।
अरी दूब, तेरे चलते, जगती का आदर करता हूँ।
इच्छा है, मैं बार-बार कवि का जीवन लेकर आऊँ,
अपनी प्रतिभा के प्रदी से जग की अमा मिटा जाऊँ।-विश्चछवि ('रेणुका' काव्य-संग्रह से)


उपर्युक्त पंक्तियाँ पढ़कर किस कवि का नाम आपके दिमाग में आता है? जी हाँ, जिसने खुद जैसे जीव की कल्पना की जीभ में भी धार होना स्वीकारा था। माना था कि कवि के केवल विचार ही बाण नहीं होते वरन जिसके स्वप्न के हाथ भी तलवार से लैश होते हैं। आज यानी २३ सितम्बर २००८ को पूरा राष्ट्र या यूँ कह लें दुनिया के हर कोने में हिन्दी प्रेमी उसी राष्ट्रकवि रामधारी दिनकर की १००वीं जयंती मना रहे हैं। आधुनिक हिन्दी काव्य राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का शंखनाद करने वाले युग-चारण नाम से विख्यात, "दिनकर" का जन्म २३ सितम्बर १९०८ ई. को बिहार के मुंगेर ज़िले के सिमरिया घाट नामक गाँव में हुआ था. इन की शिक्षा मोकामा घाट के स्कूल तथा फिर पटना कॉलेज से हुई जहाँ से उन्होंने इतिहास विषय लेकर बी. ए. (ऑनर्स) की परीक्षा उत्तीर्ण की. एक विद्यालय के प्रधानाचार्य, सब-रजिस्ट्रार, जन-संपर्क विभाग के उप निदेशक, भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार आदि विभिन्न पदों पर रहकर उन्होंने अपनी प्रशासनिक योग्यता का परिचय दिया. साहित्य-सेवाओं के लिए उन्हें डी. लिट. की मानक उपाधि, विभिन्न संस्थाओं ने उनकी पुस्तकों पर पुरस्कार ( साहित्य अकादमी तथा ज्ञानपीठ ) और भारत सरकार ने पद्मभूषण के उपाधि प्रदान कर उन्हें समानित किया.

कभी इसी कवि ने कहा था-

प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों के शृंगार माँगता हूँ। -- 'आग की भीख' ('सामधेनी' से)


इसी सप्ताह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन अग्रयुवक शहीद भगत सिंह की भी जयंती है। क्या संयोग है कि एक ही सप्ताह में राष्ट्रकवि और राष्ट्रपुत्र का जन्मदिवस है! शायद राष्ट्रकवि ने भगत सिंह के सम्मान में और उनके जैसे वीरों में देशप्रेम की आग भरने के लिए ही कहा होगा-

यह झंडा, जिसको मुर्दे की मुट्ठी जकड़ रही है,
छिन न जाय, इस भय से अब भी कसकर पकड़ रही है,
थामो इसे, शपथ लो, बलि का कोई क्रम न रुकेगा,
चाहे जो हो जाय, मगर यह झण्डा नहीं झुकेगा।
इस झण्डे में शान चमकती है मरनेवालों की,
भीमकाय पर्वत से मुट्ठी भर लड़नेवालों की। --- 'सरहद के पार' से ('सामधेनी' से)


इस राष्ट्रकवि ने कविता को परिभाषित करते हुए कहा था-

बड़ी कविता कि जो इस भूमि को सुंदर बनाती है,
बड़ा वह ज्ञान जिससे व्यर्थ की चिन्ता नहीं होती।
बड़ा वह आदमी जो जिन्दगी भर काम करता है,
बड़ी वह रूह जो रोये बिना तन से निकलती है।---- 'स्वप्न और सत्य' ('नील कुसुम' से)



"दिनकर" के कुछ काव्य संकलन :

१ रश्मिरथी
२ कुरुक्षेत्र
३ चक्रवाल
४ रसवंती
५ नीम के पत्ते
६ संचयिता
७ आत्मा की आँखें
८ उर्वशी
९ दिनकर की सूक्तियां
१० मुक्ति - तिलक
११ सीपी और शंख
१२ दिनकर के गीत
१३ हारे को हरिनाम
१४ राष्मिलोक
१५ धुप और धुंआ
१६ कोयला और कवित्व ..... इत्यादि ..

हम रामधारी जी के साहित्य की मीमांसा करें तो छोटी मुँह बड़ी बात होगी। हमने सोचा कि आवाज़ के माध्यम से इस महाकवि को कैसे श्रद्धासुमन अर्पित करें। जिन खोजा, तिन पाइयाँ, अमिताभ मीत मिले, जो साहित्यकारों में सबसे अधिक दिनकर से प्रभावित हैं। मीत का परिवार भी साहित्य का रसज्ञ था। मीत को बचपन में इस राष्ट्रकवि का सानिध्य भी मिला। मीत का सपना ही है कि दिनकर की 'रश्मिरथी' को इस मंच से दुनिया के समक्ष 'आवाज़' के रूप में लाया जाय।

मीत ने दिनकर की दो प्रसिद्ध कविताओं 'हाहाकार' ('हुंकार' कविता-संग्रह से) और 'बालिका से वधू' ('रसवन्ती' कविता-संग्रह से) अपनी आवाज़ दी है। सुनें और राष्ट्रकवि को अपनी श्रद्धाँजलि दें।

हाहाकार


बालिका से वधू




प्रस्तुति- अमिताभ 'मीत'


कविता पृष्ठ पर पढ़ें वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश रावतानी की कलम से 'दिनकर-चंद स्मृतियाँ'


कलम आज उनकी जय बोल- शोभा महेन्द्रू की प्रस्तुति

Monday, September 22, 2008

ख़ुसरो निज़ाम से बात जो लागी

भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित सूफ़ी संगीत की विधाओं में सबसे लोकप्रिय है क़व्वाली. इस विधा के जनक के रूप में पिछली कड़ी में अमीर ख़ुसरो का ज़िक़्र भर हुआ था.

उत्तर प्रदेश के एटा जिले के पटियाली गांव में १२५३ में जन्मे अमीर खुसरो का असली नाम अबुल हसन यमीनुद्दीन मुहम्मद था. कविता और संगीत के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियां अपने नाम कर चुके अमीर खुसरो को तत्कालीन खिलजी बादशाह जलालुद्दीन फ़ीरोज़ खिलजी ने को तूती-ए-हिन्द का ख़िताब अता फ़रमाया था. 'अमीर' का बहुत सम्मानित माना जाने वाला ख़िताब भी उन्हें खिलजी बादशाह ने ही दिया था.

भीषणतम बदलावों, युद्धों और धार्मिक संकीर्णता का दंश झेल रहे तेरहवीं-चौदहवीं सदी के भारतीय समाज की मूलभूत सांस्कृतिक एकता को बचाए रखने और फैलाए जाने का महत्वपूर्ण कार्य करने में अमीर खुसरो ने साहित्य और संगीत को अपना माध्यम बनाया.

तब तक भारतीय उपमहाद्वीप में सूफ़ीवाद अपनी जड़ें जमा चुका था और उसे इस विविधतापूर्ण इलाक़े के हिसाब से ढाले जाने के लिये जिस एक महाप्रतिभा की दरकार थी, वह अमीर ख़ुसरो के रूप में इस धरती पर आई. सूफ़ीवाद के मूल सिद्धान्त ने अमीर खुसरो को भी गहरे छू लिया और वे इस बात को जान गये कि बरबादी की कगार पर पहुंच चुके भारतीय समाज को बचाने का इकलौता रास्ता हिन्दू-मुस्लिम समरसता में निहित है. इसी बीच उन्होंने दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को उन्होंने अपना रूहानी उस्ताद मान लिया था. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का उनके जीवन पर ताज़िन्दगी असर रहा. गुरु को ईश्वर से बड़ा दर्ज़ा दिए जाने की ख़ास उपमहाद्वीपीय परम्परा का निर्वहन अमीर ख़ुसरो ने जिस शिद्दत से किया, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है.

गंगा-जमनी ख़ून उनके रक्त तक में इस लिहाज़ से मौजूद था कि उनके पिता मुस्लिम थे और मां हिन्दू राजपूत. घर पर दोनों ही धर्मों के रस्म-त्यौहार मनाए जाने की वजह से अमीर ख़ुसरो साहब को इन दोनों धर्मों की नैसर्गिक रूप से गहरी समझ थी. सोने में सुहागा इस बात से हुआ कि उनकी काव्य प्रतिभा बहुत बचपन में ही प्रकट हो गई थी. उनकी असाधारण काव्यप्रतिभा और प्रत्युत्पन्नमति के बारे में सैकड़ों क़िस्से-कहानियां प्रचलित हैं. सो उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों समाजों की धार्मिक और अन्य परम्पराओं को गहरे समझते हुए कविता की सान पर जो ज़मीन तैयार की उसमें साहित्य के शुद्धतावादियों द्वारा बिसरा दी जाने वाली छोटी-छोटी डीटेल्स को जगह मिली और सूफ़ीवाद को नया रास्ता.

उनके जीवन का एक क़िस्सा यूं है कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को एक बार स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए. इस के बाद उन्होंने अमीर ख़ुसरो से कृष्ण-चरित्र को आमफ़हम हिन्दवी ज़ुबान में लिखने का आदेश दिया. 'हालात-ए-कन्हैया' नामक यह ग्रन्थ अब उनकी काव्य-यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में अपनी जगह बना चुका है.

बाद में क़व्वाली जैसी पारलौकिक संगीत विधा को रच देने के बाद उन्होंने जो काव्य रचा वह अब काल-समय की सीमाओं से परे है. पहले सुनिये नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब की आवाज़ में उन्हीं की एक बहुत विख्यात रचना:



क़व्वाली को स्थापित कर चुकने के बाद उन्होंने भाषा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रयोग करने आरम्भ किये - ग़ज़ल, मसनवियां, पहेलियां बोल-बांट और तक़रार इत्यादि विधाओं में उनका कार्य देखा जाए तो एकबारगी यक़ीन नहीं होता कि फ़क़त बहत्तर साल की उम्र में एक शख़्स इतना सारा काम कर सकता है.

उनके सारे रचनाकर्म में सूफ़ीवाद की गहरी छाया होती थी और वे उस निराकार परमशक्ति को अपना मेहबूब मानते थे जिस तक पहुंचना ही सूफ़ीवाद का मुख्य उद्देश्य माना गया है. अन्य सूफ़ीवादियों से वे इस मायने में अलहदा थे कि वे भाषा के स्तर पर भी सतत प्रयोग करते रहे. मिसाल के तौर पर सुनिये छाया गांगुली के स्वर में एक और रचना, जिसकी उत्कृष्टता इस बात में निहित है कि ग़ज़ल का रदीफ़ फ़ारसी में है और क़ाफ़िया हिन्दवी में. आप की सहूलियत के लिए इसका अनुवाद भी किये दे रहा हूं:



ज़ेहाल-ए-मिस्किन मकुन तग़ाफ़ुल, दुराये नैना बनाए बतियां
कि ताब-ए-हिज्रां नदारम अय जां, न लेहो काहे लगाए छतियां

चो शाम-ए-सोज़ां चो ज़र्रा हैरां हमेशा गिरियां ब इश्क़ आं माह
ना नींद नैनां ना अंग चैना ना आप ही आवें ना भेजें पतियां

यकायक अज़ दिल बज़िद परेबम बबुर्द-ए-चश्मश क़रार-ओ-तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनाएं प्यारे पी को हमारी बतियां

शबान-ए-हिज्रां दराज़ चो ज़ुल्फ़ वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह
सखी़ पिया को जो मैं ना देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां

(आंखें फ़ेरकर और कहानियां बना कर यूं मेरे दर्द की अनदेखी न कर
अब बरदाश्त की ताब नहीं रही मेरी जान! क्यों मुझे सीने से नहीं लगा लेता

मोमबत्ती की फड़फड़ाती लौ की तरह मैं इश्क़ की आग में हैरान-परेशान फ़िरता हूं
न मेरी आंखों में नींद है, न देह को आराम, न तू आता है न कोई तेरा पैगाम

अचानक हज़ारों तरकीबें सूझ गईं मेरी आंखों को और मेरे दिल का क़रार जाता रहा
किसे पड़ी है जो जा कर मेरे पिया को मेरी बातें सुना आये

विरह की रात ज़ुल्फ़ की तरह लम्बी, और मिलन का दिन जीवन की तरह छोटा
मैं अपने प्यारे को न देख पाऊं तो कैसे कटे यह रात)

पंकज सुबीर की कहानी "शायद जोशी" में लता मंगेशकर

(ये आलेख नहीं है बल्कि मेरी एक कहानी ''शायद जोशी'' का अंश है ये कहानी मेरे कहानी संग्रह ''ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी'' की संभावित कहानियों में से एक है ।)

- पंकज सुबीर

अचानक उसे याद आया कल रात को रेडियो पर सुना लता मंगेशकर का फिल्म शंकर हुसैन का वो गाना 'अपने आप रातों में' । उसे नहीं पता था कि शंकर हुसैन में एक और इतना बढ़िया गाना भी है वरना अभी तक तो वो 'आप यूं फासलों से गुज़रते रहे' पर ही फिदा था । हां क्या तो भी शुरूआत थी उस गाने की 'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं, चौंकते हैं दरवाज़े सीढ़ियाँ धड़कती हैं' उफ्फ क्या शब्द हैं, और कितनी खूबसूरती से गाया है लता मंगेशकर ने ।

'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े सीढियां धड़कती हैं
अपने आप.....'

और उस पर खैयाम साहब का संगीत, कोई भारी संगीत नहीं, हलके हल्‍के बजते हुए साज और बस मध्यम मध्यम स्वर में गीत । और उसके बाद 'अपने आप' शब्दों को दोहराते समय 'आ' और 'प' के बीच में लता जी का लंबा सा आलाप उफ्फ जानलेवा ही तो है । एक तो फिल्म का नाम ही कितना विचित्र है 'शंकर हुसैन' पता नहीं क्या होगा इस फिल्म में । काश वो इसे देख पता । कुछ चीज़ें होती हैं न ऐसी, जिनको लेकर आप हमेशा सोचते रहते हैं कि काश आप इसे देख पाते । बचपन में जब इतिहास के टीचर इतिहास पढाते थे तब उसकी बहुत इच्छा होती थी कि काश उसे एक बार सिकंदर देखने को मिल जाए । वो छूकर देख पाए कि अच्छा ऐसा है सिकंदर । ऐसा ही कुछ वो काश्मीर में खिलने वाले क्वांग पोश, दामपोश फूलों के बारे में भी सोचता था । शंकर हुसैन को लेकर भी उसको ऐसी ही उत्सुकता है कि क्या होगा इस फिल्म में । और शंकर के साथ हुसैन कैसे लग गया ।

मुखडे क़े बाद जो अंतरा शुरू होता है वो भी कमाल का ही था

'एक अजनबी आहट आ रही है कम कम सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम सी
बिन किसी की याद आए दिल के तार हिलते हैं
बिन किसी के खनकाए चूडियां खनकती हैं
अपने आप.........'

पहले तो उसने पक्का सोच लिया था कि ये गीत गुलज़ार का ही है । वही लिखते हैं इस तरह शब्दों के साथ खेल खेल कर । खामोशी का गीत 'हमने देखी है उन आंखों की....' भी तो इसी तरह का है । उत्सुकता के साथ उसने गीत के खत्म होने का इंतज़ार किया था और जब गीतकार का नाम लिया गया था तो चौंक गया था वो । कैफ भोपाली....? उनका गीत था ये......? थोडा अच्छा भी लगा था उसे, अपने ही शहर वाले ने लिखा है इतना सुंदर गीत ।

दूसरा मुखडा तो पहले से भी यादा अच्छा था

'कोई पहले दिन जैसे घर किसी को जाता हो
जैसे खुद मुसाफिर को रास्ता बुलाता हो
पांव जाने किस जानिब बेउठाए उठते हैं
और छम छमा छम छम पायलें छनकती हैं
अपने आप........'

आश्चर्य चकित रह गया था वो, इतना सुंदर गीत उसने आज तक सुना क्यों नही था। कितनी सीधी सीधी सी बात कही है । पांव जाने किस जानिब बेउठाए उठते हैं । जाने किस जानिब और वो भी बेउठाए ....। क्या बात कही है ये गीत छुपा कहाँ था अब तक ? कितने मशहूर गीत सुन चुका है वो अब तक, फिर ये गीत कहाँ छुपा था ? वैसे कैफ भोपाली और लता मंगेशकर की जुगलबंदी में पाकीज़ा के सारे गाने उसे पंसद हैं । विशेषकर 'यूं ही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते ' वो तो अद्भुत गीत है ।

गाने का तीसरा अंतरा शायद पूरी शिद्दत के साथ लिखा गया था । उसी अज्ञात की तरफ बार बार इशारा करते हुए शब्दों को पिरोया गया है जो शायद उन सबके जीवन में होता है जिनके सारे स्वपन अभी स्थगित नहीं हुए हैं । एक अज्ञात, जो होता है पर दिखाई नहीं देता । सारी समस्याओं का मूल एक ही है, जीवन से अज्ञात की समाप्ति । जब तक आपको लगता है कि न जाने कौन है, पर है ज़रूर, तब तक आप सपने देखते हैं । सपने देखते हैं, उस न जाने कौन के सपने। वो न जाने कौन आपके आस पास फिरता है, मगर दिखता नहीं है । वही आपको जिन्दा रखता है । जैसे ही आपको यकीन हो जाता है कि हम तो इतने दिन से फिज़ूल ही परेशान हैं, कोई भी नहीं है, उसी दिन आपको सपने आने भी बंद हो जाते हैं (स्थगित हो जाते हैं) ।

'जाने कौन बालों में उंगलियां पिरोता है
खेलता है पानी से तन बदन भिगोता है
जाने किसके हाथों से गागरें छलकती हैं
जाने किसी बाँहों से बिजलियां लपकती हैं
अपने आप.......'


क्या डिफाइन किया है अज्ञात को । 'जाने कौन बालों में उंगलिया पिरोता है' ज्ञात और अज्ञात के बीच एक महीन से सूत बराबर गुंजाइश को छोड़ा गया है, यह कह कर कि जाने किसकी बाँहों से बिजलियां लपकती हैं। कैफ भोपाली ऐसा ही लिखते थे 'फिरते हैं हम अकेले बाँहों में कोई ले ले....' । कौन ले ले....? कुछ पता नहीं हैं । बस वही, जो है, पर नहीं है । यहाँ पर भी उसकी बांहों से बिजलियाँ लपक रही हैं। पता नहीं ये शंकर हुसैन अब उसको देखने को मिलेगी या नहीं । क्या होगा जब वो मर रहा होगा? क्या ये तब तक भी उसको परेशान करेगी ? कशमीर के क्वांगपोश और दामपोश फूलों की तरह । क्या सचमुच इतने सारे अनुत्तरित प्रश्नों को साथ लेकर ही मरेगा वो ? फिर उन प्रश्नों का होता क्या होगा जो उस आदमी के साथ जीवन भर चलते आए हैं, जो अभी अभी मर गया है ।

आखिर में एक बार फिर लता मंगेशकर की आवाज़ उसी मुखड़े को दोहराती है....

'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े सीढियां धड़कती हैं
अपने आप.....'

और विस्मय में डूबा हुआ छोड़कर गीत खत्म भी हो जाता है ।



प्रस्तुति - - पंकज सुबीर


लता संगीत उत्सव की एक और कड़ी

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ