Saturday, March 10, 2018

चित्रकथा - 59: शम्मी आंटी को श्रद्धांजलि उनके संघर्ष की कहानी के साथ

अंक - 59

शम्मी आंटी को श्रद्धांजलि


"प्यार की दुनिया में यह पहला क़दम..."




24 April 1929 – 6 March 2018


6 मार्च 2018 को जानीमानी अभिनेत्री शम्मी (शम्मी आंटी) का 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। एक सशक्त अभिनेत्री, एक मिलनसार इंसान, और एक ख़ूबसूरत सितारा, यानी कि शम्मी आंटी। जी हाँ, प्यार से लोग उनके नाम के साथ "आंटी" लगाते हैं। शम्मी आंटी ने शुरुआत बतौर फ़िल्म नायिका की थीं, फिर आगे चल कर चरित्र अभिनेत्री और फिर टेलीविज़न के परदे पर भी ख़ूब लोकप्रियता हासिल की। अधिकतर कलाकारों का संघर्ष जहाँ उनके अरिअर के शुरुआती समय में होता है, वहाँ शम्मी जी का संघर्ष उस समय शुरु हुआ जब वो अपने करिअर के शीर्ष पर थीं। ऐसा क्यों? यही हम जानने की कोशिश करेंगे आज के ’चित्रकथा’ के इस अंक में। तो आइए पढ़ें शम्मी आंटी के संघर्ष की कहानी। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है अभिनेत्री शम्मी (आंटी) की पुण्य स्मृति को!






म्मी आंटी का असली नाम था नरगिस रबाड़ी। मात्र तीन वर्ष की आयु में पिता को खोने के बाद, उनकी माँ ने धार्मिक कार्यक्रमों में खाना बनाने का काम कर के नरगिस और उनकी बहन मणि की परवरिश की। 13 वर्ष की आयु में अपनी माँ का हाथ बंटाने के लिए नरगिस ने दवाई के कारखाने में दवाई पैकिंग् करने की नौकरी कर ली जिसके लिए उन्हें 100 रुपये मासिक वेतन मिलते थे। फ़िल्मों में उनका आना अचानक ही हुआ। उनके पारिवारिक मित्र चिनू मामा फ़िल्मकार महबूब ख़ान के साथ काम कर रहे थे और अभिनेता-निर्माता शेख मु्ख्तार से भी उनकी अच्छी जान पहचान थी। उन्हीं दिनों शेख़ मुख्तार अपनी अगली फ़िल्म के लिए दूसरी नायिका की तलाश कर रहे थे जिसमें पहली नायिका के रूप में बेगम पारा का चयन हो चुका था। जब चिनू मामा ने नरगिस रबाड़ी को यह बात बताई तो वो अपनी क़िस्म्त आज़माने के लिए तैयार हो गईं। स्क्रीन टेस्ट में पास भी हो गईं लेकिन एक शर्त पर कि वो अपना नाम बदल लेंगी क्योंकि नरगिस के नाम से एक सफल अभिनेत्री इंडस्ट्री में मौजूद हैं। इस तरह से फ़िल्म के निर्देशक तारा हरिश ने उनका नाम रख दिया "शम्मी" और यह फ़िल्म थी ’उस्ताद पेड्रो’ जो 1949 में बन कर प्रद्रशित हुई। 18 वर्ष की आयु में फ़िल्म साइन कर यह फ़िल्म उनके 20 वर्ष की आयु में प्रदर्शित हुई। बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म कामयाब सिद्ध हुई। तारा हरिश गायक मुकेश द्वारा निर्मित फ़िल्म ’मल्हार’ भी निर्देशित कर रहे थे। इस फ़िल्म में उन्होंने शम्मी को बतौर मुख्य नायिका चुना। ’मल्हार’ के सुमधुर हिट गीतों ने शम्मी को स्टार का दर्जा दिलवा दिया। शम्मी की तीसरी फ़िल्म आई 1952 में - ’संगदिल’। दिलीप कुमार और मधुबाला के साथ किया हुआ यह फ़िल्म ख़ास नहीं चली। लेकिन के. आसिफ़ की हिट फ़िल्म ’मुसाफ़िरख़ाना’ की सफलता के बाद शम्मी को एक के बाद एक फ़िल्मों के ऑफ़र आते चले गए। शम्मी की ख़ास बात यह थी कि उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि उन्हें नायिका के ही रोल चाहिए। नायिका, दूसरी नायिका, खलनायिका, हास्य और अन्य चरित्र भूमिकाओं में लगातार फ़िल्में करती चली गईं। 1970 तक उनके अभिनय से सजी महत्वपूर्ण फ़िल्में रहीं ’इलज़ाम’, ’पहली झलक’, ’बंदिश’, ’आज़ाद’, ’हलाकू’, ’सन ऑफ़ सिन्दबाद’, ’राज तुलक’, ’ख़ज़ांची’, ’घर संसार’, ’आख़िरी दाव’, ’कंगन’, ’भाई-बहन’, ’दिल अपना और प्रीत पराई’, ’हाफ़ टिकट’, ’इशारा’, ’जब जब फूल खिले’, ’प्रीत न जाने रीत’, ’आमने सामने’, ’उपकार’, ’इत्तेफ़ाक़’, ’साजन’, ’डोली’, ’राजा साब’ और ’दि ट्रेन’ प्रमुख।

70 के दशक के आते आते अब वो 40 वर्ष की आयु की हो चुकी थीं। लगातार काम करते हुए उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति काफ़ी मज़बूत बना ली थी और उन्होंने अब शादी करके घर-परिवार बसाने का निर्णय लिया। इसी दौरान उनकी मित्रता एक आकांक्षी निर्देशक सुल्तान अहमद से हुई, जो फ़िल्म जगत में स्थापित होने के लिए उन दिनों संघर्षरत थे। शम्मी की फ़िल्म जगत में उस समय काफ़ी जान-पहचान थी, उन्हें लोग इज़्ज़त करते थे। इस वजह से सुल्तान अहमद को इंडस्ट्री में काम दिलाने में शम्मी जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ’प्यार का रिश्ता’ (’73), 'हीरा’ (’73), ’गंगा की सौगंध’ ('78) जैसी फ़िल्मों में सुल्तान अहमद को दाख़िला शम्मी जी की वजह से ही मिली थी। शम्मी जी के ज़रिए राजेश खन्ना, सुनिल दत्त और आशा पारेख जैसे नामी अभिनेता सुल्तान अहमद की फ़िल्मों में काम करने के लिए राज़ी हो गए क्योंकि ये सभी शम्मी जी को पहचानते थे और उनकी इज़्ज़त करते थे। शम्मी और सुल्तान अहमद भी एक दूसरे के क़रीब आने लगे और दोनों ने शादी कर ली। शम्मी ने फिर सुल्तान अहमद की फ़िल्मों के बाहर अभिनय करना भी बन्द कर दिया और परिवार की तरफ़ ध्यान देने लगीं। शादी के सात साल बाद भी शम्मी माँ नहीं बन सकीं। दो बार उनका गर्भपात हो गया। इसी दौरान शम्मी और सुल्तान अहमद ने एक घर ख़रीदने का निर्णय लिया। हालाँकि सुल्तान अहमद ने यह मकान शम्मी जी के नाम से ही ख़रीदना चाहा, पर शम्मी जी ने यह कहा कि इसे उनकी ननंद के नाम ख़रीदना चाहिए क्योंकि उनकी ननंद के पास न कोई नौकरी थी और न कोई सहारा। कोई औरत अपने पैसों से ख़रीदा हुआ घर अपनी ननंद के नाम कर दे, ऐसा आज तक किसे ने सुना है कहीं!! ऐसी थीं शम्मी जी। उधर सुल्तान अहमद के भाई का परिवार भी उनके साथ ही रहता था। क्योंकि भाई की पत्नी अशिक्षित थीं, इसलिए शम्मी जी उनके बच्चे का ख़याल रखती थीं और उन्होंने उस बच्चे का दाख़िला शिमला के एक अच्छे स्कूल में करवाया। इस तरह से शम्मी जी ने उस परिवार की निस्वार्थ सेवा की और अपना पूरा अर्थ परिवार के लिए लगा दिया।

शम्मी जी की सुल्तान अहमद को फ़िल्म जगत में स्थापित करने की मदद तथा उनके परिवार के लिए किया गया निस्वार्थ त्याग और सेवा का मूल्य सुल्तान अहमद ने चुकाया उन्हें तलाक़ देकर। सुल्तान अहमद का एक दूसरी औरत से संबंध स्थापित हुआ जिस वजह से शम्मी जी के साथ उनके रिश्ते में दरार पड़ गई। अपने आत्मसम्मान को बरक़रार रखते हुए शम्मी जी 1980 में एक दिन अपना घर, अपना पैसा, अपनी गाड़ी, अपना परिवार, सब कुछ छोड़ कर अपनी माँ के पास अपने पुराने घर में चली गईं। इस घटना की वजह से सुल्तान अहमद पर फ़िल्म जगत की कई बड़ी हस्तियाँ नाराज़ हुईं जिनमें नरगिस और सुनिल दत्त शामिल थे। अब शम्मी जी के लिए फ़िल्म जगत में दूसरी पारी शुरु करने की बारी थी अपने आप को दुबारा अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए। फ़िल्म जगत में लोग उनकी इज़्ज़त करते थे, सुनिल दत्त के सहयोग से आठ दिनों के अन्दर उन्हें 'The Burning Train' में एक रोल दिलवाया। राजेश खन्ना ने भी ’रेड रोज़’, ’आँचल’, ’कुदरत’, ’आवारा बाप’ और ’स्वर्ग’ जैसी फ़िल्मों में उन्हें रोल दिलवाये जिस वजह से वो एक बार फिर से सबकी नज़र में आ गईं और फिर एक बार उनकी गाड़ी चल पड़ी। इस सफलता को देखते हुए शम्मी जी ने ’पिघलता आसमान’ नामक एक फ़िल्म बनाने की सोची। राजेश खन्ना नायक थे और उन्हीं के ज़रिए इसमाइल श्रॉफ़ निर्देशक चुने गए। पर खन्ना और श्रॉफ़ के बीच किसी मतभेद की वजह से खन्ना इस फ़िल्म से निकल गए। शशि कपूर ने शम्मी जी की ख़ातिर फ़िल्म को स्वीकार कर लिया पर इसमाइल श्रॉफ़ अपनी आदतों से बाज़ नहीं आए। अन्त में निर्देशन का कोई तजुर्बा न होते हुए भी शम्मी जी को ख़ुद इस फ़िल्म को निर्देशित करना पड़ा, और फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई, और शम्मी जी का सारा पैसा डूब गया। वो फिर एक बार ज़ीरो पर पहुँच गईं।


अब उनकी तीसरी पारी के शुरु होने की बारी थी। उनके करिअर को फिर एक बार पुनर्जीवित करने के लिए राजेश खन्ना ने दूरदर्शन के कुछ कार्यक्रमों को प्रोड्युस करने के लिए शम्मी जी का नाम रेकमेण्ड कर दिया। टेलीविज़न जगत में वो बेहद लोकप्रिय हो उठीं। ’देख भाई देख’, ’ज़बान सम्भाल के’, ’श्रीमान श्रीमती’, ’कभी ये कभी वो’ और ’फ़िल्मी चक्कर’ जैसे धारावाहिकों ने कामयाबी के झंडे गाढ़ दिए। और इस कामयाबी से वो फिर एक बार फ़िल्मों में भी नज़र आने लगीं। ’कूली नंबर वन’, ’हम’, ’मर्दों वाली बात’, ’गुरुदेव’, ’गोपी किशन’, ’हम साथ-साथ हैं’ और ’इम्तिहान’ जैसी फ़िल्में उनकी इस दौर की फ़िल्में रहीं। टीवी और इन फ़िल्मों में अभिनय की वजह से उनकी आर्थिक स्थिति सुधर गई और अपने अन्तिम समय तक वो शारीरिक रूप से सक्रीय थीं और अन्त तक अभिनय करने की लालसा उनके मन में थी। अभी पाँच साल पहले 83 वर्ष की आयु में वो ’शिरीं फ़रहाद की निकल पड़ी’ फ़िल्म में नज़र आई थीं। इस फ़िल्म की ख़ास बात यह है कि इसमें डेज़ी इरानी ने भी अभिनय किया है। डेज़ी इरानी इसमें शम्मी आंटी की पुत्रवधु का चरित्र निभाया, और मज़ेदार बात यह कि डेज़ी इरानी की पहली फ़िल्म ’बंदिश’ (1955) में भी शम्मी जी ने अभिनय किया था। शम्मी आंटी एक ऐसी शख़्सियत हैं जिन्होंने अपनी सहनशीलता, संघर्ष करने के जसबे और हर बार अपने आप को मुसीबतों से बाहर निकालने के दृढ़ संकल्प का परिचय एक बार नहीं बल्कि बार बार दिया। अभी 6 मार्च को शम्मी आंटी हम सबको छोड कर चली गईं और इसके ठीक दो दिन बाद 8 मार्च को हमने अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया। इस विशेष दिन पर शम्मी जी बार बार याद आती रहीं। आख़िर शम्मी आंटी जैसी महिला बहुत कम पैदा होती हैं, है ना? ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की तरफ़ से हम शम्मी आंटी को देते हैं अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि। उनके अभिनय से सजी फ़िल्में और धारावाहिक आने वाली पीढ़ियों को लम्बे समय तक प्रेरित करते रहेंगे अच्छा और सहज अभिनय करने के लिए, और यह भी सिखाते रहेंगे कि किसी भी अभिनेत्री को टाइप-कास्ट ना होकर हर तरह के किरदार निभाने रहने चाहिए। यही एक सच्चे कलाकार की पहचान है!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, March 6, 2018

चित्रकथा - 58: श्रीदेवी के होठों पर कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़

अंक - 58

श्रीदेवी के होठों पर कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़


"तुम्हें क्या मर जाऊँ तो मर जाऊँ मैं तुम किस काम के..."




चली गईं श्रीदेवी! बॉलीवूड की पहली फ़ीमेल सुपरस्टार का दर्जा रखने वाली इस ख़ूबसूरत अभिनेत्री के अचानक इस तरह चले जाने से पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई है। आज ’चित्रकथा’ में श्रीदेवी की ही बातें। श्रीदेवी की लोकप्रियता का अंदाज़ा केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके अंतिम संस्कार में 25,000 से भी अधिक लोग शामिल हुए। श्रीदेवी एक सशक्त अदाकारा तो थीं ही, उनकी एक ख़ास बात यह भी थी कि उन पर जो गीत फ़िल्माए जाते, उनमें से अधिकतर अपने ज़माने के सुपरहिट गीत बन जाते। यूं तो उनके लिए सबसे अधिक पार्श्वगायन आशा भोसले ने किया है, लेकिन श्रीदेवी का नाम लेते ही जिस गीत की याद सबसे पहली आती है, वह है "हवा हवाई", जिसकी गायिका हैं कविता कृष्णमूर्ति। कविता जी ने भी श्रीदेवी के लिए बहुत से गाने गायी हैं। तो क्यों ना आज के इस अंक में हम उन गीतों की चर्चा करें जो कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में सजे थे श्रीदेवी के होठों पर! प्रस्तुत है यह विशेषालेख ’श्रीदेवी के होठों पर कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़’। आजे के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है अभिनेत्री श्रीदेवी की पुण्य स्मृति को!




नायकों पर किसी एक पार्श्वगायक की आवाज़ (स्क्रीन वॉइस) का चलन शुरु से ही रहा है। राज कपूर के लिए मुकेश, शम्मी कपूर के लिए मोहम्मद रफ़ी, राजेश खन्ना के लिए किशोर कुमार, फिर बाद के वर्षों में ॠषि कपूर के लिए पहले शैलेन्द्र सिंह और बाद में सुरेश वाडकर, सलमान ख़ान के लिए एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम, आमिर ख़ान के लिए उदित नारायण और शाहरुख़ ख़ान के लिए अभिजीत की आवाज़ के बारे में हम सभी को पता है। लेकिन नायिकाओं के लिए ऐसी कोई बात नहीं थी, कारण चाहे जो भी हो। श्रीदेवी की बात करें तो उनकी शुरुआती फ़िल्मों में बप्पी लाहिड़ी का संगीत होता था और उन फ़िल्मों में अधिकतर गीत आशा भोसले गाया करती थीं। लेकिन फ़िल्म ’Mr India’ के "हवा हवाई" के बाद कविता कृष्णामूर्ति बन गईं श्रीदेवी की आवाज़। यह सच है कि 80 के दशक में आशा भोसले, अलका याग्ञ्निक और अनुराधा पौडवाल ने भी उनके लिए गीत गाए, लेकिन उनके लिए कविता कृष्णमूर्ति के गाए गीत भीड़ से अलग सुनाई दिए। पहली बार श्रीदेवी पर कविता की आवाज़ सुनाई पड़ी थी 1986 की फ़िल्म ’नगीना’ में। फ़िल्म के पाँच गीतों में केवल एक गीत कविता की आवाज़ में था - "बलमा आख़िर बलमा हो मेरे ख़ाली नाम के, तुम्हें क्या मर जाऊँ तो मर जाऊँ मैं तुम किस काम के"। मीठी शिकायत वाले इस गीत में जो अनजाने में मर जाने की बात कही गई थी, वह अब श्रीदेवी के जाने के बाद जैसे और भी ज़्यादा जीवित हो उठी है। फ़िल्म ’नगीना’ के ज़बरदस्त हिट होने के बाद 1989 में इस फ़िल्म का सीक्वील ’निगाहें’ बनी। हिन्दी फ़िल्म इतिहास में इसे पहला सीक्वील माना जाता है। ’निगाहें’ में भी कविता कृष्णमूर्ति का गाया एक महत्वपूर्ण गीत था। ’नगीना’ में लता मंगेशकर का गाया "मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा, मैं नागिन तू सपेरा" सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था। इसलिए ’निगाहें’ में भी इसी धुन पर एक गीत रचा गया जिसे कविता ने गाया। इस गीत के बोल थे "खेल वही तू फिर आज खेला, पहले गुरु आया अब चेला, ओ पागल नादान शिकारी, जान अगर है तुझको प्यारि, तो छोड़ दे मेरी गलियों का फेरा, मैं नागन तू सपेरा..."। ’नगीना’ में लता के गाए इस एक गीत के अलावा ’नगीना’ और ’निगाहें’ के अन्य सभी गीत अनुराधा पौडवाल ने गाए थे। आनन्द बक्शी और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल दोनों फ़िल्मों के गीतकार और संगीतकार थे।

1987 में श्रीदेवी-कविता की जोड़ी का गीत आया फ़िल्म ’वतन के रखवाले’ में। मिथुन और श्रीदेवी पर फ़िल्माया यह गीत था "तेरे मेरे बीच में कौन आएगा, आएगा तो जगह नहीं पाएगा"। कहना ज़रूरी है कि जीतेन्द्र-श्रीदेवी की सुपरहिट जोड़ी बनने के बाद मिथुन और श्रीदेवी की भी कामयाब जोड़ी बनी थी जो ख़ूब हिट रही। ’वक़्त की आवाज़’ और ’गुरु’ इस जोड़ी की सर्वाधिक हिट फ़िल्में हैं। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे और लक्ष्मी-प्यारे की धुन पर मोहम्मद अज़ीज़ और कविता कृष्णमूर्ति का गाया यह डुएट अपने ज़माने का मशहूर गीत रहा और रेडियो पर ख़ूब ख़ूब बजे। इसी फ़िल्म में श्रीदेवी-कविता जोड़ी का एक और गीत था "टनाटन बज गई घण्टी सजन, प्यार रुकता है कहाँ करे कोई लाख जतन"। मनहर उधास और मोहम्मद अज़ीज़ के साथ गाया यह गीत चल्ताऊ किस्म का गीत था जो हिट नहीं हुआ। फ़िरोज़ नडियाडवाला निर्मित इस फ़िल्म के अलावा 1987 में ही के. सी. बोकाडिया की फ़िल्म आई ’जवाब हम देंगे’ जिसमें श्रीदेवी के नायक बने जैकी श्रॉफ़। गीत-संगीत का भार इस बार समीर और लक्ष्मी-प्यारे पर था। फ़िल्म में दो गीत कविता ने गाए जिनमें से एक श्रीदेवी पर फ़िल्माया गया। भगवान को कोसता हुआ यह दर्द भरा गीत था "मेरे किस कुसूर पर तू मालिक मुझे रुलाए, मेरे आँसुओं में एत्रा संसार बह ना जाए"। श्रीदेवी को हम उन दिनों ग्लैमरस किरदारों और रंगीन किस्म के गीतों में देखते आए थे, ऐसे में यह गीत इस तरह का दर्द भरा शुरुआती गीत रहा उन पर फ़िल्माए जाने वाला। 1987 में ही विजय सदानाह की फ़िल्म आई ’औलाद’। इस फ़िल्म में लक्ष्मी-प्यारे के संगीत पर गाने लिखे एस. एच. बिहारी ने। यूं तो फ़िल्म के कई गीतों में कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ थी, लेकिन उनमें से केवल दो गीत श्रीदेवी पर फ़िल्माए गए थे। पहला गीत था शास्त्रीय संगीत आधारित भक्ति रचना "जीवन ज्योत जले"। लाल-सफ़ेद साड़ी और सिंदूर की बिंदी में श्रीदेवी बहुत ख़ूबसूरत दिखाई देती हैं इस गीत में और गीत भी बहुत ही प्यारा है - "हुआ सवेरा पंछी जागे, शीतल पवन चले, डाल डाल से किरणें छलके, जीवन ज्योत जले, भोर भये जो मन से पुकारे, प्रभु जाने उसके द्वारे, वो घर फूले फले..."। फ़िल्म का दूसरा गीत एक मस्ती भरा डुएट था किशोर कुमार के साथ - "धक धक धक धड़के किया पास नहीं आना, दिल का लगाना पिया क्या है नहीं जाना, जानू ना वो रातें ना प्यार भरी बातें, तेरी बातों से दिल मेरा घबराये, तो फिर हो जाए, हो जाए..."। जीतेन्द्र-श्रीदेवी की हिट जोड़ी पर फ़िल्माया यह गीत भी उस दौर में ख़ूब लोकप्रिय हुआ था। 1987 में राजेश खन्ना और शबाना आज़मी के साथ दूसरी नायिका के रूप में श्रीदेवी ने अभिनय किया था फ़िल्म ’नज़राना’ में। फ़िल्म में कविता का गाया एक गीत था "ए बाबा रिका..."। हालाँकि यह गीत नहीं चला, लेकिन इस गीत में श्रीदेवी का अभिनय और नृत्य देखने लायक है। माइकल जैक्सन जैसा गेट-अप लिए जिस तरह से उन्होंने डान्स किया है, कमाल है बस! और उस दौर की सफलतम अभिनेत्रियों में इस तरह का डान्स शायद ही कोई और कर पातीं। "ए बाबा रिका रिका रिका रिका, हमने जो सीखा वो दुनिया से सीखा, जीने का तरीका तरीका तरीका, दिल दो किसी को दिल लो किसी का..."।


लेकिन 1987 की जिस फ़िल्म ने सही अर्थ में श्रीदेवी और कविता कृष्णमूर्ति की जोड़ी को यादगार बना दिया, वह फ़िल्म थी ’Mr. India’। "हवा हवाई" गीत आज एक अमर गीत बन चुका है श्रीदेवी के कमाल के अभिनय और अदाओं की वजह से। इस गीत के बारे में कुछ कहने की आवश्यक्ता नहीं है सिवाय इसके कि इस गीत में कविता से एक ग़लती हो गई थी। गड़बड़ी पर आने से पहले आपको इस गीत के निर्माण से जुड़ी एक दिलचस्प जानकारी देना चाहेंगे। इस गीत के शुरुआती जो बोल हैं, जिसमें "होनोलुलु, हॊंगकॊंग, किंगकॊंग, मोमबासा" जैसे अर्थहीन शब्द बोले जाते हैं, दरसल ये शब्द डमी के तौर पर लिखे गये थे गीत को कम्पोज़ करने के लिए। लेकिन ये शब्द आपस में इस तरह से जुड़ गये और गीत में हास्य रस के भाव को देखते हुए सभी को ये शब्द इतने भा गये कि इन्हें गीत में रख लेने का तय हो गया। जावेद अख़्तर ने यह गीत लिखा और संगीतकार थे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल। अब आते हैं इस गीत में हुई ग़लती पर। इस गीत का एक अंतरा कुछ इस तरह का है -



"समझे क्या हो नादानों, 
मुझको भोली ना जानो,
मैं  हूँ सपनों की रानी,
काटा माँगे ना पानी,
सागर से मोती छीनूँ, 
दीपक से ज्योति छीनूँ,
पत्थर से आग लगा दूँ, 
सीने से राज़ चुरा लूँ,
जीना जो तुमने बात छुपाई,
जानू जो तुमने बात छुपाई,
कहते हैं मुझको हवा हवाई"।

इस अंतरे में सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, लेकिन "जीना जो तुमने बात छुपाई" कुछ अजीब सा नहीं लग रहा आपको? कविता कृष्णमूर्ति ने एक साक्षात्कार में बताया कि उन्होंने ग़लती से "जानू" को "जीना" गा गईं, लेकिन अगले ही अन्तरे में जब इसी पंक्ति को दोबारा गाना था, उसमें उन्होंने ग़लती को सुधारते हुए "जानू" ही गाया। सभी को लगा कि इतनी छोटी ग़लती किसी के ध्यान में नहीं आएगी, इसलिए गीत को दोबारा रिकार्ड नहीं किया गया। कविता की गायकी और श्रीदेवी के चुलबुले अंदाज़ में अभिनीत यह गीत आज सदाबहार गीत बन गया है और इस गीत के बाद श्रीदेवी "हवा हवाई गर्ल" के नाम से जानी जाती रहीं। इस गीत के कम से कम दो रीमेक बने। पहला रीमेक 2011 की फ़िल्म ’शैतान’ में था जिसे सुमन श्रीधर की आवाज़ में रिकार्ड किया गया, और दूसरी बार 2017 की फ़िल्म ’तुम्हारी सुलु’ में था जिसमें मूल गीत और कविता की आवाज़ को रखा गया था लेकिन संगीतकार तनिष्क बागची के अतिरिक्त संगीत और गायिका शाशा तिरुपति के अतिरिक्त गायकी ने इस गीत को एक नया जामा पहनाया। वापस आते हैं ’Mr. India' पर। फ़िल्म का शीर्षक गीत किशोर कुमार और कविता ने गाया - "करते हैं हम प्यार मिस्टर इण्डिया से"। रोमान्टिक डुएट होते हुए भी इस गीत में हास्य और मस्ती भरा अंदाज़ है और अनिल कपूर व श्रीदेवी के जीवन्त, चुलबुले और शरारती अभिनय ने गीत में जान डाल दी। 1989 में जब के. सी. बोकाडिया ने जया प्रदा और श्रीदेवी को लेकर ’मैं तेरा दुश्मन’ बनाने की योजना बनाई तब उनके मन में भी "हवा हवाई" जैसे एक गीत रखने की इच्छा थी। उनका यह सपना साकार हुआ जब अनजान और लक्ष्मी-प्यारे लेकर आए "जुगनी डिस्को", एक बार फिर कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में। यह गीत भी हिट हुआ लेकिन "हवा हवाई" के मुक़ाबले टिक नहीं सका। गीत की ख़ास बात यह है कि जया प्रदा और श्रीदेवी, दोनों ही नज़र आती हैं इस गीत में। इस गीत में लोक-संगीत और पाश्चात्य रिदम, दोनों का फ़्युज़न है। हास्य का पुट भी है तथा पंजाबी और बांग्ला शब्दों के प्रयोग से गीत और भी ज़्यादा मज़ेदार बन पड़ा है। 


क्वांटिटी और क्वालिटी के पैमाने पर अगर एक साथ तोला जाए तो श्रीदेवी और कविता की जोड़ी की जो फ़िल्म सबसे पहले याद की जाएगी, वह है ’चालबाज़’। 1989 की इस फ़िल्म के सभी गीतों में श्रीदेवी के होठों पर कविता की ही आवाज़ सुनाई दी, फिर चाहे वह किरदार अंजु का हो या मंजु का। सीता और गीता की तरह अंजु-मंजु वाले डबल रोल में श्रीदेवी ने इस फ़िल्म में अदाकारी के वो नमूने पेश किए कि फ़िल्म उन्हीं की बन कर रह गई। फ़िल्म के दोनों नायक सनी देओल और रजनीकान्त जैसे बाजु हट गए उनके अभिनय की चमक से। आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे के गीतों ने भी तहल्का मचा दिया। फ़िल्म के सभी पाँच गीतों में श्रीदेवी-कविता मौजूद थीं। मोहम्मद अज़ीज़ के साथ युगल गीत "तेरा बीमार मेरा दिल, मेरा जीना हुआ मुश्किल" में श्रीदेवी और सनी देओल के बीच का रोमान्स और सेन्सुअल अंदाज़ सर चढ़ कर बोला, तो अमित कुमार के साथ "न जाने कहाँ से आई है" गीत तो बारिश और सड़क वाले गीतों की पहली श्रेणी में शुमार है। "बड़ी छोटी है मुलाक़ात, बड़े अफ़सोस की है बात, किसी के हाथ ना आएगी ये लड़की..." - ये पंक्तियाँ जैसे कानों में गूंज उठी जिस दिन श्रीदेवी के इस दुनिया से चले जाने की ख़बर मिली। कविता और साथियों की आवाज़ों में "नाम मेरा प्रेम कली... रस्ते में वो खड़ा था, कब से मेरे पीछे पड़ा था" भी एक चुल्बुली लड़की का अंदाज़-ए-बयाँ था, यह गीत उतना मशहूर नहीं हुआ पर लक्ष्मी-प्यारे के ज़बरदस्त म्युज़िकल कम्पोज़िशन का यह भी एक अच्छा उदाहरण था। फ़िल्म का चौथा गीत हास्य पैरोडी गीत है जिसमें कविता के साथ अमित कुमार और जॉली मुखर्जी की भी आवाज़ें हैं। "सोचा था क्या, क्या हो गया, गड़बड़ हो गई, सीटी बज गई" में श्रीदेवी, अनुपम खेर, रोहिणी हत्तंगड़ी, अन्नु कपूर और शक्ति कपूर के अभिनय की जितनी तारीफ़ें की जाए कम है। ये सभी चार गीत मंजु के किरदार पर फ़िल्माया गया था। बस एक आख़िरी पाँचवाँ गीत अंजु पर फ़िल्माया गया। यह भी एक हास्य रस का गीत था जिसे कविता, सूदेश भोसले, जॉनी लीवर और साथियों ने गाया - "ओ भूत राजा, जल्दी से आजा.... कोई बताए समझ में ना आए के हाय ये क्या है पहेली, अरे फँस गई मुश्किल में भूतों की महफ़िल में, मैं एक लड़की अकेली..."। हास्य गीत होते हुए भी इसमें श्रीदेवी के चमत्कृत कर देने वाले नृत्य का स्वाद चखने को मिला दर्शकों को। कुल मिलाकर ’चालबाज़’ के गीतों ने अपने ज़माने में धूम मचा दी थी और आज भी लोग इन गीतों को सुनते ही झूम उठते हैं।


90 के दशक में भी श्रीदेवी-कविता का जादू बरकरार रहा। 1991 की फ़िल्म ’पत्थर के इंसान’ में इंदीवर के गीत और बप्पी लाहिड़ी का संगीत था। नृत्य प्रधान संगीत वाले इस फ़िल्म के गीतों में महिला कंठ की अगर बात करें तो कई गायिकाओं ने फ़िल्म के गीत गाए जैसे कि अलका याज्ञ्निक, अनुराधा पौडवाल, कविता कृष्णमूर्ति, एस. जानकी, अलिशा चिनॉय और सपना मुखर्जी। इस वजह से श्रीदेवी-कविता की जोड़ी का बस एक ही गीत था "सूरज नाचे सागर नाचे, सारा जग गीतों पर नाचे, गीत बिना ज़िन्दगी क्या..."। इस गीत की ख़ास बात यह है कि इसे एक स्टेज शो के रूप में फ़िल्माया गया है। सितार हाथ में लिए पूनम ढिल्लों इस गीत को गा रही हैं और उस पर श्रीदेवी नृत्य कर रही हैं। अक्सर डिस्को और पाश्चात्य संगीत के अधिकाधिक प्रयोग की वजह से बदनाम बप्पी लाहिड़ी ने इस शास्त्रीय संगीत आधारित रचना को इतनी ख़ूबसूरती से सजाया है कि एक ही झटके में उन्होंने सभी आलोचकों के मुख पर ताले लटका दिए थे। गीत के अगले हिस्से में पूनम ढिल्लों भी नृत्य करती नज़र आती हैं और दोनों में जैसे एक जुगलबन्दी हो रही हो। इन दोनों ख़ूबसूरत अभिनेत्रियों ने इस गीत को जीवन्त कर दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश यह गीत बहुत ज़्यादा सुना नहीं गया, और अब तो हर कोई इसे भूल चुका है। वैसे 1991 की जो उल्लेखनीय फ़िल्म थी, वह है ’ख़ुदा गवाह’ जिसमें अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी की जोड़ी दूसरी बार नज़र आई। पहली बार यह जोड़ी नज़र आई थी फ़िल्म ’आख़िरी रास्ता’ में। ’ख़ुदा गवाह’ एक ब्लॉक बस्टर सिद्ध हुई और एक बार फिर श्रीदेवी ने अपने डबल रोल से यह सिद्ध किया कि अभिनेत्रियों में वो ही सर्वोपरि हैं। अफ़्ग़ानिस्तान की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म में गीत-संगीत का पक्ष आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे ने संभाला था। फ़िल्म के सभी गीत ख़ूब हिट हुए जिनमें तीन गीत कविता कृष्णमूर्ति और मोहम्मद अज़ीज़ के गाए युगल गीत थे। फ़िल्म का शीर्षक गीत "तू मुझे क़ुबूल, मैं तुझे क़ुबूल, इस बात का गवाह ख़ुदा, ख़ुदा गवाह" सर्वाधिक लोकप्रिय रहा। बाकी के दो गीत थे "रब को याद करूं, इक फ़रियाद करूं, बिछड़ा यार मिला दे, ओय रब्बा..." और "मैं ऐसी चीज़ नहीं जो घबरा के पलट जाऊँगी..."। इसके अगले ही साल 1992 में फिर एक बार अनिल कपूर के साथ श्रीदेवी नज़र आईं अमर प्रेम कहानी ’हीर रांझा’ में। फ़िल्म फ़्लॉप रही लेकिन आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे के गीतों की वजह से लोगों ने इस फ़िल्म को लम्बे समय तक याद रखा। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "रब ने बनाया तुझे मेरे लिए" लता मंगेशकर-अनवर की आवाज़ों में था, लेकिन कविता कृष्णमूर्ति का गाया "ओ रांझा रांझा करते करते हीर दीवानी हुई" का भी अपना अलग अंदाज़ था। मोहम्मद अज़ीज़ के साथ कविता का गाया युगल गीत "यह पेड़ है पीपल का, तू है खरा सोना, सारा जग पीतल का..." चर्चा में नहीं आई। फ़िल्म के पिट जाने की वजह से इस फ़िल्म के गीतों पर कुछ ख़ास तवज्जु किसी ने नहीं दिया।

1993 में बोनी कपूर की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’रूप की रानी चोरों का राजा’ बन कर प्रदर्शित हुई। इसे उस ज़माने की सबसे महंगी फ़िल्म मानी गई। ’Mr. India’ के निर्देशक शेखर कपूर ने इस फ़िल्म को निर्देशित करना शुरु तो किया लेकिन बीच में उन्होंने फ़िल्म छोड़ दी जिसके बाद सतिश कौशिक ने कमान संभाला। अनिल-श्रीदेवी के अलावा जैकी श्रॉफ़, अनुपम खेर, जॉनी लीवर अभिनीत यह फ़िल्म ’Mr India' के तुरन्त बाद 1978 में बनना शुरु होने के बावजूद किसी ना किसी वजह से देर होती गई, और 1993 में जब यह रिलीज़ हुई तो दुर्भाग्यवश पिट गई। इस फ़िल्म के अत्यधिक प्रचार की वजह से लोगों की उम्मीदें इतनी बढ़ गई कि जब लोगों ने फ़िल्म देखी तो फ़िल्म में कहानी और आत्मा, दोनों ही कमज़ोर लगी। उस पर जैकी श्रॉफ़ को कम फ़ूटेज देना भी दर्शकों को रास नहीं आया। जावेद अख़्तर - लक्ष्मी-प्यारे ने जो कमाल ’Mr. India’ के पाँच गीतों में दिखाए थे, वह कमाल वे इस फ़िल्म के दस गीतों में भी दिखा नहीं पाए। ना फ़िल्म चली ना इसे गाने कुछ ख़ास चले। इन दस गीतों में से सात गीतों में श्रीदेवी और कविता की जोड़ी दिखाई व सुनाई दी। विनोद राठौड़ के साथ सेन्सुअस "जाने वाले ज़रा रुक जा", अमित कुमार के साथ फ़िल्म का हिट शीर्षक गीत "तू रूप की रानी, तू चोरों का राजा, सुन प्रेम कहानी, तू आके सुना जा", ROFL करवाने वाला चीनी शैली में "चीनी में चाय चीनी में चाय, चनाली ची मेरी चि चि चाय", बॉलीवूड टिपिकल डुएट "मैं एक सोने की मूरत हूँ" और दुश्मन के डेरे में गाए जाने वाले गीतों के जौनर का "करले तू हौसला, परदा उठा", तथा कविता की एकल आवाज़ में "हवा हवाई" के गेट-अप जैसा "दुश्मन दिल का जो है मेरे, सुना है आज आएगा" और "यारों को जान है प्यारी, मैं हूँ रूप की रानी" कब आए कब गए पता भी नहीं चला। इसी साल 1993 में संजय दत्त के साथ श्रीदेवी नज़र आईं फ़िल्म ’गुमराह’ में। इस फ़िल्म में श्रीदेवी-कविता का एक ही गीत था - "ये ज़िन्दगी का सफ़र मुश्किल बड़ा था मगर, तुम राह में मिल गए, हम बन गए हमसफ़र"। फ़िल्म के फ़्लॉप हो जाने के बावजूद आनन्द बक्शी - लक्ष्मी-प्यारे का रचा तलत अज़ीज़ के साथ कविता का गाया यह गीत हिट हुआ था। 1993 में ही सभी को चकित कर श्रीदेवी नज़र आईं सलमान ख़ान के साथ। फ़िल्म ने साबित किया कि वक़्त का कोई असर नहीं श्रीदेवी की ख़ूबसूरती पर। गीतकार-संगीतकार की जोड़ी के रूप में अगली पीढ़ी आ गई लेकिन श्रीदेवी के माथे पर जैसे वक़्त की कोई भी शिकन नहीं। समीर के लिखे गीत और आनन्द-मिलिन्द के संगीत में श्रीदेवी पर फ़िल्माए कविता के गाए कुल तीन गीत इस फ़िल्म में शामिल हुए। ये सभी युगल गीत हैं जिनमें से दो में एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम और एक में आनन्द की आवाज़ें हैं। कविता - एस.पी के गाए गीतों में पहला गीत है फ़िल्म का शीर्षक गीत "चन्द्रमुखी, आ पास आ तो ज़रा, तू है मेरी अपसरा"। इस गीत में समूह स्वरों में "चन्द्रमुखी चन्द्रमुखी" और अन्तराल संगीत में आलाप के अलावा इस गीत के बारे में बताने लायक कुछ नहीं है।  दूसरा गीत "तेरी ही आरज़ू है, तेरा इन्तज़ार है, कैसे बताऊँ तुझसे मुझे कितना प्यार है" भी एक बेहद साधारण 90 के दशक के स्टाइल का गीत है। आनन्द कुमार के साथ डुएट में शुरुआती संगीत को सुन कर भले ही आगे कुछ अच्छा सुन पाने का आभास होता है, लेकिन जब कविता "मेरे होठों पे एक ऐसी कहानी है..." गाने लगती हैं, तब पता चल जाता है कि यह भी अन्य दो गीतों ही की तरह औसत स्तर का गीत है। यह सच है कि श्रीदेवी और सलमान ख़ान की जोड़ी को दर्शक हज़म नहीं कर सके, कारण चाहे जो भी हो, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अगर इस फ़िल्म के गाने हिट हो जाते तो हो सकता है कि सलमान-श्री की जोड़ी को भी लोकप्रियता मिलती!

ॠषि कपूर और श्रीदेवी की जोड़ी एक कामयाब जोड़ी रही है। ’नगीना’, ’बंजारन’, ’गुरुदेव’ और ’चांदनी’ के बाद 1997 में ॠषि-श्रीदेवी की जोड़ी की अन्तिम फ़िल्म आई ’कौन सच्चा कौन झूठा’। राकेश रोशन निर्मित इस फ़िल्म में समीर और राजेश रोशन ने गीत-संगीत की रचना की, लेकिन फ़िल्म फ़्लॉप रही। फ़िल्म के गीतों में महिला कंठ के लिए अलका, कविता और प्रीति उत्तम को लिया गया। कविता और अभिजीत का गाया "हम दो दीवाने मिले इश्क़ में दुनिया भुलाए" में ऋषि कपूर और श्रीदेवी दुश्मनों की गोलियों से अपने आप को बचते बचाते हुए भाग रहे हैं और यह गीत पार्श्व में बज रहा है। सिचुएशन के अनुरूप गीत की अगली पंक्ति है "गोलियाँ चलाए चाहे पहरे लगाए, कोई दिलवालों को जुदा कर ना पाए। श्रीदेवी और कविता कृष्णमूर्ति की जोड़ी की आख़िरी फ़िल्म आई 2005 में - ’मेरी बीवी का जवाब नहीं’। ऐसा प्रतीत होता है कि अक्षय कुमार और श्रीदेवी अभिनीत यह फ़िल्म बनी 90 के दशक में बनी होगी, लेकिन प्रदर्शित हुई देर से। एस. एम. इक़बाल निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म में आनन्द बक्शी ने गीत लिखे और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने संगीत दिया। फ़िल्म के तीन गीतों में कविता की आवाज़ थी जो फ़िल्माए गए श्रीदेवी पर। पहला गीत अभिजीत के साथ गाया हुआ युगल गीत है "तारों की छाँव में, फूलों के गाँव में, इक छोटा सा घर होगा..." जो फ़िल्म के पहले ही सीन में नामावली के दौरान पार्श्व में गाया जाता है। गीत में नायक-नायिका के चेहरे तो नज़र नहीं आते, कैमरा उनके पीछे ही रहता है। ना यह फ़िल्म चली और ना ही यह गीत चल पाया। दूसरा गीत कविता ने कुमार सानू के साथ गाया है जो फ़िल्म का शीर्षक गीत है "ऐसा तो कोई दूजा जनाब नहीं, ओ मेरी बीवी का जवाब नहीं"। बेहद औसत स्तर का गीत। तीसरा गीत कविता का गाया एकल गीत है "सब प्यार मोहब्बत झूठ, शूट, हर वादा जाए टूट..." जिसमें हास्य का एक अंग है। ख़ास तौर से "शूट" वाला अंदाज़ फ़िल्मी गीतों में एक नया प्रयोग था। इस तरह से यहाँ आकर पूरी होती है श्रीदेवी पर फ़िल्माए कविता कृष्णमूर्ति के गाए गीतों की बातें। इतने सारे गीतों में से श्रीदेवी और कविता की इस जोड़ी को अगर याद किया जाएगा तो मुखत: ’Mr. India' और ’चालबाज़’ के गीतों के लिए। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की ओर से श्रीदेवी की पुण्य स्मृति को नमन!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, March 4, 2018

राग विभास : SWARGOSHTHI – 359 : RAG VIBHAS




स्वरगोष्ठी – 359 में आज

पाँच स्वर के राग – 7 : “साँझ ढले गगन तले…”

पण्डित उल्हास कशालकर से राग विभास की बन्दिश और सुरेश वाडकर से फिल्म का गीत सुनिए




सुरेश वाडकर 
पण्डित उल्हास कशालाकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग विभास का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात पण्डित उल्हास कशालाकर के स्वरों में राग विभास की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग विभास के स्वरों का फिल्मी गीतों में बहुत कम उपयोग किया गया है। राग विभास के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1985 में प्रदर्शित फिल्म “उत्सव” से लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का स्वरबद्ध किया एक गीत –“साँझ ढले गगन तले, हम कितने एकाकी…”, सुरेश वाडकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



पाँच स्वर के रागों की श्रृंखला में आज का राग है, विभास। इस राग पर आधारित 1985 में प्रदर्शित फिल्म “उत्सव” का एक गीत हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। इस फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल थे। इसी वर्ष लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के ही संगीत निर्देशन में बनी एक और फिल्म, “सुर संगम” का राग आधारित गीत हम अगले अंक में प्रस्तुत करेंगे। लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल उन बिरले संगीतकारों में थे, जिनकी पहली फिल्म “पारसमणि” का संगीत लोकप्रियता की कसौटी पर खरा उतरा। उनकी लोकप्रियता का आधार राग आधारित अथवा लोकसंगीत आधारित रचनाओं की धुनें हैं। उनके संगीत में तालों का अनूठा प्रयोग परिलक्षित होता है। फिल्म “उत्सव” एक संस्कृत नाटक के आधार पर प्राचीन पाटलीपुत्र के परिवेश में बनी फिल्म है। इसके सभी गीत रागों का आधार लिये हुए है। फिल्म में राग विभास पर आधारित दो गीत हैं, -“साँझ ढले गगन तले...” और –“नीलम के नभ...”। आज के अंक में हमने पार्श्वगायक सुरेश वाडकर के स्वर में गाया गया गीत –“साँझ ढले गगन तले...” का चयन हमने आपके लिए किया है। वसन्त देव की गीत रचना को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने राग विभास के स्वरों में निबद्ध किया है।

राग विभास : “साँझ ढले गगन तले...” : सुरेश वाडकर : फिल्म – उत्सव


कोमल रिखबरू धैवतहि, सुर म नि बिना उदास,
वादी ध संवादी रे, औडव राग विभास।
इस राग का सम्बन्ध भैरव थाट से माना जाता है। इसमें मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। केवल पाँच स्वर होने से राग की जाति औड़व-औड़व होती है। ऋषभ और धैवत स्वर कोमल इस्तेमाल होता है और शेष स्वर शुद्ध इस्तेमाल किया जाता है। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग विभास का गायन-वादन दिन के पहले प्रहर में सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। यह राग उत्तरांग प्रधान है, अतः इसका चलन मध्य सप्तक के उत्तर अंग और तार सप्तक के पूर्व अंग में अधिक होता है। राग विभास के तीन प्रकार होते हैं। भैरव थाट के अलावा अन्य दो प्रकार पूर्वी और मारवा थाट जन्य राग होते है। तीनों विभास राग एक दूसरे से अलग होते हैं। परन्तु भैरव थाट जन्य राग विभास का प्रचलन अधिक है। इस राग की प्रकृति शान्त और गम्भीर होती है। इसमें धैवत स्वर पर सावकाश आन्दोलन किया जाता है। राग विभास में ऋषभ स्वर कोमल और गान्धार स्वर शुद्ध होता है, अतः यह प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश राग माना जाता है। पूर्वी थाट जन्य राग रेवा में राग विभास के ही स्वरे लगते हैं। अन्तर यह है कि राग रेवा पूर्वांग प्रधान राग है और इसका गायन-वादन समय सायंकाल सन्धिप्रकाश का है, जबकि विभास भैरव थाट जन्य उत्तरांग प्रधान प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश काल में गाया-बजाया जाने वाला राग है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में आपको राग विभास, तीनताल में निबद्ध एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं। खयाल के बोल हैं –“कहे कुम्हरवा जायल हमरा...”। आप यह रचना सुनिए और मुझे “स्वरगोष्ठी” के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग विभास : “कहे कुम्हरवा जायल हमरा...” : पण्डित उल्हास कशालकर



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 359वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस प्रसिद्ध गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 361वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 357वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – चन्द्रकौंस, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; बीकानेर, राजस्थान के लक्ष्मीनारायण सोनी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” की सातवीं कड़ी में आपने राग चन्द्रकौंस का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर से राग विभास के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन किया था। साथ ही आपने फिल्म “उत्सव” से राग विभास के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत सुरेश वाडकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग विभास : SWARGOSHTHI – 359 : RAG VIBHAS : 4 Mar., 2018

Thursday, March 1, 2018

होली विशेष:: श्रीदेवी पर फ़िल्माया संभवत: एकमात्र होली गीत


होली विशेष: श्रीदेवी पर फ़िल्माया एकमात्र होली गीत


"होली आयी रे, आयी रे, रंग बरसे.."





’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! आप सभी को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

इस अवसर पर अभिनेत्री श्रीदेवी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए आइए सुनें उन पर फ़िल्माया हुआ सम्भवत: एकमात्र होली गीत। यह गीत है 1979 की फ़िल्म ’सोलवाँ सावन’ का, जो श्रीदेवी की बतौर नायिका पहली हिन्दी फ़िल्म रही। इस गीत को गाया है वाणी जयराम और साथियों ने, गीत लिखा है नक्श ल्यालपुरी ने, और संगीतबद्ध किया है जयदेव ने।




प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Wednesday, February 28, 2018

चित्रकथा - 57: इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 9)

अंक - 57

इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 9)


"फ़टा पोस्टर निकला हीरो..."




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! स्वागत है आप सभी का ’चित्रकथा’ स्तंभ में। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम लेकर आते हैं सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े विषय। श्रद्धांजलि, साक्षात्कार, समीक्षा, तथा सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर शोधालेखों से सुसज्जित इस साप्ताहिक स्तंभ की आज 57-वीं कड़ी है।

हर रोज़ देश के कोने कोने से न जाने कितने युवक युवतियाँ आँखों में सपने लिए माया नगरी मुंबई के रेल्वे स्टेशन पर उतरते हैं। फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर स्टार बनने का सपना लिए छोटे बड़े शहरों, कसबों और गाँवों से मुंबई की धरती पर क़दम रखते हैं। और फिर शुरु होता है संघर्ष। मेहनत, बुद्धि, प्रतिभा और क़िस्मत, इन सभी के सही मेल-जोल से इन लाखों युवक युवतियों में से कुछ गिने चुने लोग ही ग्लैमर की इस दुनिया में मुकाम बना पाते हैं। और कुछ फ़िल्मी घरानों से ताल्लुख रखते हैं जिनके लिए फ़िल्मों में क़दम रखना तो कुछ आसान होता है लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कुछ बात होती है। हर दशक की तरह वर्तमान दशक में भी ऐसे कई युवक फ़िल्मी दुनिया में क़दम जमाए हैं जिनमें से कुछ बेहद कामयाब हुए तो कुछ कामयाबी की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। कुल मिला कर फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है यहाँ टिके रहने के लिए। ’चित्रकथा’ के अन्तर्गत पिछले कुछ समय से हम चला रहे हैं इस दशक के नवोदित नायकों पर केन्द्रित यह लघु श्रॄंखला जिसमें हम बातें करते हैं वर्तमान दशक में अपना करीअर शुरु करने वाले नायकों की। प्रस्तुत है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रॄंखला की नौवीं कड़ी।





र्ष 2017 में ’इस दशक के नवोदित नायक’ नामक इस सीरीज़ के कुल आठ अंकों में हमने 90 से अधिक नायकों की बातें की हैं। यह कारवाँ 2018 में भी जारी है और तब तक जारी रहेगा जब तक कि हर नवोदित नायक का ज़िक्र हम कर ना लें। आज के इस अंक में सबसे पहले बातें चार ऐसे अभिनेताओं की जिनका नाम एक है - करण। टेलीविज़न की दुनिया का जाना पहचाना नाम है करण वाही जिनके हँसमुख स्वभाव और अच्छी मेज़बानी करने की वजह से वो घर घर में पसन्द किए जाते हैं। 9 जून 1986 को दिल्ली के एक पंजाबी परिवार में जन्में करण वाही ने अपनी स्कूली पढ़ाई St. Mark's Senior Secondary Public School से पूरी की, और उच्च शिक्षा भी दिल्ली में ही रह कर दिल्ली विश्वविद्यालय के अधीन IILM Institute से प्रबंधन में पूरी की। अपने स्कूल के दिनों में वो बहुत अच्छा क्रिकेट खेलने लगे थे जिस वजह से उन्हें अपना करीयर क्रिकेट में नज़र आने लगा था। वर्ष 2003 में 17 वर्ष की आयु में करण का निर्वाचन दिल्ली के Under-19 क्रिकेट टीम में हो गया। कहना आवश्यक है कि इसी सीलेक्शन में विराट कोहली और शिखर धवन जैसे आज के सफल खिलाड़ियों का भी चयन हुआ था। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि करण वाही भी किस स्तर के खिलाड़ी रहे होंगे। लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर थी। एक बार खेल के दौरान करण को भयानक चोट लग गई, जिसकी वजह से उनका परिवार इस खेल के खिलाफ़ हो गए और करण को क्रिकेटर बनने का सपना छोड़ना पड़ा। उच्च-माध्यमिक की परीक्षा के बाद करण ने प्रबन्धन के एक कोर्स में भर्ती हो गए इस सोच के साथ कि इस कोर्स के बाद वो अपने पिता का हाथ बँटाएंगे उनके व्यवसाय में। लेकिन फिर एक बार क़िस्मत को कुछ और मंज़ूर थी। इंसान की क़िस्मत जहाँ लिखी हो, वो वहीं जा पहुँचता है। 2004 में करण ने अभिनय में अपना हाथ आज़माने के लिए "Rose Audio Visuals" की टेलीविज़न सीरीज़ ’Remix’ में रणवीर सिसोदिया का किरदार निभाया। यह किरदार एक "angry lover boy" का किरदार था जिसे करण इतनी ख़ूबसूरती और प्राकृतिक अंदाज़ से निभाया कि वो काफ़ी मशहूर हो गए थे युवा वर्ग में। उनके इस दमदार अदाकारी ने उन्हें उस वर्ष का Best Male Newcomer का Indian Telly Award भी दिलवाया। इस तरह के फ़िक्शन शोज़ के बाद वर्ष 2009 में करण वाही मुख्य नायक के रूप में नज़र आए धारावाहिक ’मेरे घर आयी एक नन्ही परी’ में। 2010 में उनका सर्वाधिक लोकप्रिय धारावाहिक शुरु हुआ ’दिल मिल गए’ जिसमें वो करण सिंह ग्रोवर के साथ काम किया। करण सिंह ग्रोवर की चर्चा हम अपने इस सीरीज़ में पहले ही कर चुके हैं। अत: करण वाही की बातें जारी रखते हुए यह बता दें कि 2011 में करण वाही का अगला धारावाहिक आया ’कुछ तो लोग कहेंगे’। इसमें उनके साथ मोहनीष बहल जैसे दिग्गज अभिनेता भी थे। 2012 में ’तेरी मेरी लव स्टोरीज़’ और इसके बाद ’कहानी हमारी... दिल दोस्ती दीवानेपन की’ में भी मुख्य नायक का किरदार निभाया। करण वाही रियलिटी शोज़ और अवार्ड फ़ंक्शनों के सफल मेज़बान माने जाते हैं। उनकी मेज़बानी में उनका सेन्स ऑफ़ ह्युमर चार चाँद लगा देते हैं। मेज़बानी के लिए भी उन्हें कई टेलीविज़न पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। 2011 में करण ने भ्रमण पर आधारित रियलिटी शो ’Jee Le Ye Pal’ में भाग लिया और इसके विजेता बने। इसी दौरान करण वाही का रुझान फ़िल्मों की तरफ़ झुकने लगा था। इसके लिए उन्हें अपने शरीर पर काम करने की आवश्यक्ता आन पड़ी। बहुत कम समय में करण ने कड़ी मेहनत से अपना शारीरिक गठन मज़बूत किया जिसका नतीजा उन्हें हाथोंहाथ मिला। मतलब यह कि 2013 में उन्हें UK की अख़बार Eastern Eye ने "Sexiest Asian Man on the Planet" की सूची में 46-वें स्थान पर बिठा दिया, जो उनके लिए सम्मान की बात थी। अब फ़िल्मकारों की भी नज़र उन पर पड़ने लगी, और 2014 में हबीब फ़ैसल की रोमांटिक कॉमेडी फ़िल्म ’दावत-ए-इश्क़’ में आदित्य रॉय कपूर और परिनीति चोपड़ा के साथ करण वाही को भी सह-अभिनेता के रूप में कास्ट किया गया। इस फ़िल्म में उनके द्वारा निभाये गए अमजद के किरदार को दर्शकों ने हाथों हाथ ग्रहण किया और उनकी काफ़ी प्रशंसा हुई। मुख्य नायक के रूप में 2014 में ही अमृतपाल सिंह बिंद्रा की फ़िल्म ’बब्बू की जवानी’ में उन्हें मौका मिला जिसमें उनकी नायिका थीं रिया चक्रवर्ती। यह फ़िल्म नहीं चली जिस वजह से करण एक फ़िल्मी नायक के रूप में स्थापित नहीं हो सके। 2018 में करण की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म आने जा रही है ’हेट स्टोरी 4’ जिसमें वो नायक की भूमिका में नज़र आएंगे। इस सीरीज़ की पहले की तीन फ़िल्में काफ़ी चर्चित रहीं, इसलिए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस फ़िल्म से करण वाही को प्रसिद्धी मिलने के आसार बहुत अधिक है। अब देखना यह है कि इस फ़िल्म में राजवीर की भूमिका को करण कितना सजीव कर पाते हैं।

करण वाही के बाद अब दूसरे नंबर पर बात करते हैं करण सिंह छाबरा की। चंडीगढ़ में जन्में और पले बढ़े करण सिंह छाबरा बचपन से ही बहुत स्मार्ट और जोशीले रहे हैं। स्कूल और कॉलेज में वो बहुत लोकप्रिय रहे और तमाम प्रतियोगिताओं में भाग लिया करते थे। आकर्षक चेहरे और सुडौल कदकाठी के धनी करण ने अपने कॉलेज में एक मॉडलिंग् प्रतियोगिता में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया जिसकी वजह से उनका इस क्षेत्र में गंभीरता से पाँव रखने की इच्छा हुई। ग्लैमर जगत में शोहरत हासिल करने की ख़्वाहिश लेकर करण चंडीगढ़ से दिल्ली आ गए और संघर्ष करने लगे। 2007 में सफलता की पहली सीढ़ी उन्होंने लांघी जब Super Model Hunt प्रतियोगिता में वो विजयी बन कर निकले। इससे फ़ैशन जगत के नामचीन लोग उन्हें जानने लगे और नतीजा यह हुआ कि उन्हें काम मिलने शुरु हो गए। कई नामी ब्रैण्ड्स के रैम्प शोज़ के ऑफ़र उन्हें मिले और हर बार अपना जल्वा उन्होंने रैम्प पर दिखा कर दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। उनका नाम इसलिए भी मशहूर हुआ कि वो पहले ऐसे राष्ट्रीय स्तर के मॉडल थे जिन्होंने अपनी पगड़ी को अपने से अलग नहीं किया। इस वजह से पंजाब में उनका लोग बहुत सम्मान करते हैं। हाँ, यह ज़रूर सच है कि आगे चल कर उन्हें प्रतियोगिता के चलते पगड़ी और लम्बे बालों के साथ समझौता करना पड़ा। 2007 से लगभग सात साल तक मॉडलिंग् करने के बाद फ़िल्म जगत का दरवाज़ा उनके लिए खुला जब 2014 में उन्हें ’हीरोपन्ती’ में एक किरदार निभाने का मौका मिला। इसी फ़िल्म से टाइगर श्रॉफ़ का भी फ़िल्मी सफ़र शुरु हुआ था जिनकी चर्चा हम पहले ही इस सीरीज़ में कर चुके हैं। इस फ़िल्म के बाद करण सिंह छाबरा नज़र आए 2016 की फ़िल्म ’Chalk n Duster’ में जिसमें शबाना आज़मी और जुही चावला मुख्य किरदारों में थीं। इस फ़िल्म में उनके निभाये किरदार को सराहा गया। इसके बाद 2017 की फ़िल्म ’राब्ता’ में वो दिखे। फ़िल्म शुरु शुरु में चर्चा में रही लेकिन रिलीज़ के बाद ज़्यादा सफल सिद्ध नहीं हुई। इसी दौरान करण कुछ रियलिटी शोज़ में भी नज़र आए जैसे कि 'MTV Splitsvilla 9', 'MTV Love School' और 'Bindass Super Stud 2011'। जैसा कि नाम में सुपर स्टड है, करण सिंह छाबरा ने अपने आप को एक सुपर स्टड के रूप में ढाला और ’हर मर्द का दर्द’, ’ब्रह्मराक्षस’ और ’सबसे बड़ा कलाकार’ जैसे शोज़ में नज़र आए। इन दिनों करण चर्चे में हैं क्योंकि वो जून 2018 में प्रदर्शित होने वाली बड़ी फ़िल्म ’फ़न्ने ख़ान’ में काम कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि इस फ़िल्म में उनका एक power packed cameo रोल है। ’फ़न्ने ख़ान’ एक म्युज़िकल कॉमेडी फ़िल्म है जिसे अतुल मांजरेकर निर्देशित कर रहे हैं। अनिल कपूर, ऐश्वर्या राय बच्चन और राजकुमार राव जैसे सफल कलाकारों के बीच करण सिंह छाबरा अपनी छाप किस हद तक छोड़ पाएंगे यह तो 15 जून को फ़िल्म प्रदर्शित होने के बाद ही पता चल पाएगी। यह फ़िल्म वर्ष 2000 की ऑस्कर मनोनीत बेलजियन फ़िल्म ’Everybody's Famous’ का आधिकारिक रीमेक है, इस वजह से इस फ़िल्म से काफ़ी उम्मीदें लगाई जा रही हैं और इस फ़िल्म की सफलता पर कुछ हद तक करण की सफलता भी जुड़ी होंगी। हक़ीक़त वक़्त ही बयाँ करेगी।

करण कापड़िया अभिनेत्री व डिज़ाइनर सिम्पल कापड़िया (डिम्पल कापड़िया की छोटी बहन) के सुपुत्र हैं। यानी ट्विंकल खन्ना के मौसेरे भाई और अक्षय कुमार के साले साहब। फ़िल्मी परिवार से ताल्लुख़ रखने की वजह से और एक आकर्षक कदकाठी व सुन्दर चेहरे के धनी करण कापड़िया को फ़िल्म जगत में एन्ट्री आसानी से ही मिल गई। ऊपर से बचपन से ही फ़िल्म निर्माण को बहुत क़रीब से देखने की वजह से उन्हें सहायक के रूप में काम भी बड़ी आसानी से मिल गया। राहुल ढोलकिया जब ’सोसायटी काम से गई’ बना रहे थे, तब करण ने उसमें उनके सहायक के रूप में काम किया और फ़िल्म निर्माण की बारीकियाँ सीखी। उनका अभिनय सफ़र ’अज़हर’ फ़िल्म से शुरु होना था, लेकिन किसी कारण से हो ना सका। ’अज़हर’ के निर्देशक टोनी ड’सूज़ा ने अपना वादा पूरा करते हुए अपनी अगली फ़िल्म में उन्हें लौंच करने का निर्णय लिया है। यह फ़िल्म 2018 में बन कर तैयार होगी जिसका अभी तक नामकरण नहीं हुआ है। करण कापड़िया को भले एक सहायक के रूप में काम मिल गया हो लेकिन अभिनय के लिए उन्हें भी कई ऑडिशनों का सामना करना पड़ा और बहुत बार उन्हें रिजेक्ट भी किया गया यह कहते हुए कि उनमें कोई ख़ास बात नज़र नहीं आ रही। उन्होंने अपने अभिनय पर मेहनत की और बाद में उन्हें अच्छी प्रतिक्रियाएँ मिलनी शुरु हुईं। टोनी ड’सूज़ा ने निश्चित रूप से मीडिया को बताया है कि उनकी अगली फ़िल्म में करण ही नायक बनेंगे और दर्शकों एक नया स्टार मिलने वाला है। टोनी ने करण पर जो भरोसा दिखाया है, करण को इस खरा उतरने के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी जिसमें कोई संदेह नहीं है। उधर करण का ट्विंकल खन्ना और अक्षय कुमार के साथ भी बहुत अच्छी दोस्ती है; करण ने एक साक्षात्कार में बताया है कि उन दोनों को भी उनसे बहुत सारी उम्मीदें हैं। बताया जाता है कि फ़िल्म जगत में उतरने से पहले करण का वज़न 112 किलो था, लेकिन नियमित रूप से कसरत कर के अपनी वज़न को 88 किलो तक लाने में कामयाब हुए हैं। इसके अलावा तैराकी और घुड़सवारी में भी प्रशिक्षित हो कर अपने आप को एक नायक बनने के क़ाबिल बनाया है। अक्षय कुमार के नक्श-ए-क़दम पर चलते हुए करण ने भी बैंकाक का रुख़ किया और वहाँ से छह महीने मार्शल आर्ट सीखा। Jeff Goldberg Studio से अभिनय का कोर्स भी किया। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि नवोदित नायक करण कापड़िया ने अपने आप को हर संभव तरीके से संवारा है, तैयार किया है। उधर अक्षय कुमार का टोनी डी’सूज़ा के साथ बहुत अच्छा संबंध है; दोनों ने ’ब्लू’ और ’बॉस’ जैसी फ़िल्मों में साथ काम किया है। ’बॉस’ फ़िल्म में करण ने टोनी को असिस्ट किया था जिस वजह से टोनी को उनमें एक नायक बनने के गुण दिखाई दिए। अपनी माँ सिम्पल कापड़िया के 2009 में निधन हो जाने के बाद करण पनी मासी डिम्पल कापड़िया को ही अपनी दूसरी माँ मानते हैं। करण कापड़िया को एक उज्वल भविष्य के लिए हम देते हैं ढेरों शुभकामनाएँ!

पुष्पेन्दर कुमार वोहरा के किरदार में 2017 की फ़िल्म ’भंवरे’ से फ़िल्म जगत में क़दम रखने वाले करहन देव टेलीविज़न का एक जानामाना नाम रहे हैं। हाँ, यह ज़रूर है कि टेलीविज़न पर वो करहन देव के नाम से नहीं, बल्कि करण ठाकुर के नाम से जाने गए, पहचाने गए। टीवी पर करण एक अभिनेता और एक मेज़बान, दोनों भूमिकाओं में नज़र आए। ’भाग्यविधाता’, ’बड़ी दूर से आए हैं;, ’सावधान इण्डिया’, ’CID', 'Crime Patrol' और 'Haunted Nights' जैसे शोज़ में वो देखे गए, सराहे गए। कई नामचीन ब्रैण्ड्स के विज्ञापनों में भी करण ठाकुर नज़र आए। करण ठाकुर का जन्म मुंबई में ही हुआ था, लेकिन उनके जन्म के कुछ ही समय के भीतर उनका परिवार दिल्ली स्थानान्तरित हो गया। इस वजह से करण की शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में हुई। दिल्ली के थिएटर जगत से करण छुटपन से ही जुड़ गए और नाटकों, ड्रामाओं और अन्य कई कलात्मक क्षेत्रों में निरन्तर भाग लेते रहे। इस वजह से अभिनय के क्षेत्र में उनका आधार बहुत मज़बूत हो गया था और आगे चल कर इस क्षेत्र में गंभीरता से क़दम रखने में ज़्यादा असुविधा नहीं हुई। मुंबई में रहते उनकी स्कूली शिक्षा स्वामी विवेकानन्द स्कूल से शुरु हुई जो दिल्ली जाकर युवाशक्ति स्कूल से पूरी हुई। उच्च-माध्यमिक उत्तीर्ण करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु कॉलेज से करण ने बी.ए. की पढ़ाई की और स्नातक बने। यहीं पे आकर उनकी पढ़ाई का सिलसिला ख़त्म नहीं हुआ। नई दिल्ली के भारतीय विद्या भवन से ’रेडियो ऐण्ड टेलीविज़न जर्नलिज़्म’ में पोस्ट ग्रजुएशन डिप्लोमा तथा हिसार, हरियाणा के गुरु जम्बेश्वर विश्वविद्यालय से मास कमुनिकेशन में मास्टर्स (स्नातकोत्तर) किया। इस तरह से पूरी पढ़ाई अच्छी तरह से सम्पन्न होने के बाद ही करण देव व्यावसायिक रूप से अभिनेता बने। पहली ब आर टेलीविज़न के परदे पर वो नज़र आए ’ससुराल गेंदा फूल’ धारावाहिक में एक अतिथि कलाकार के रूप में। लेकिन जल्दी ही ’भाग्यविधाता’, ’बड़ी दूर से आए हैं;, ’सावधान इण्डिया’, ’CID', 'Crime Patrol' और 'Haunted Nights' में उन्होंने काम किया और लोग उन्हें पहचानने लगे। ’ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा’ में उन्होंने नेगेटिव रोल निभाया और उसके बाद ’वो तेरी भाभी है पगले’ में हास्य किरदार में नज़र आए। करण अपने स्कूल के दिनों से ही ऐंकरिंग् किया करते थे। स्कूल और कॉलेज के फ़ंक्शनों में उन्हें ऐंकरिंग् का भार दिया जाता था। इसलिए टेलीविज़न में भी उन्हें मेज़बानी के कई अवसर प्राप्त हुए जिनमें ’रेडियो मिर्ची म्युज़िक अवार्ड्स’ फ़ंक्शन सर्वोपरि है। 2010 से टीवी का सफ़र शुरु करने के बावजूद फ़िल्मों में क़दम रखने के लिए उन्हें पूरे सात साल का इन्तज़ार करना पड़ा। 2017 में लेखक, निर्माता, निर्देशक और अभिनेता शौर्य सिंह जब ’भंवरे’ की कहानी पर काम कर रहे थे, जो तीन दोस्तों की कहानी थी, तभी उन्होंने यह निर्णय लिया था कि इन तीन दोस्तों के किरदारों में कौन कौन होंगे। एक तो वो ख़ुद ही हैं, दूसरे हैं जशन सिंह और तीसरे करहन देव। डार्क कॉमेडी पर आधारित यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर जम नहीं पाई, लेकिन युवाओं में फ़िल्म चर्चित रही। इस फ़िल्म में करहन देव के अभिनय की भी प्रशंसा हुई। अभी तो उनका फ़िल्मी सफ़र बस शुरु ही हुआ है। उनके अभिनय क्षमता को देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भविष्य में वो अपने अनोखे अभिनय से कई फ़िल्मों को संवारेंगे, और क्रिटिकल अक्लेम के साथ साथ कमर्शियली भी उनके फ़िल्म कामयाब होंगे।

Hasan & Himansh
चार करण के बाद अब आगे बढ़ते हैं हसन ज़ैदी के साथ। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जन्में हसन ज़ैदी लखनऊ के पास हरदोई से ताल्लुख़ रखते हैं। ओमान की राजधानी मसकट में भी अपनी शुरुआती ज़िन्दगी का लम्बा सफ़र तय किया हसन ने। साइप्रस के Eastern Mediterranean University से Bachelor of Tourism and Hospitality Management की पढ़ाई पास करने के बाद उन्होंने माया नगरी मुंबई में अपना करीअर बनाने का निर्णय लिया। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि हसन के वालिद अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर हैं और उर्दू के जानेमाने शायर, और उनकी वालिदा हिन्दी शिक्षिका रही हैं। इस तरह से हसन ज़ैदी के अन्दर संस्कृति के अंकुर छुटपन से ही फूट पड़े थे। स्कूल के ड्रामा सोसायटी में हसन सक्रीय भूमिका निभाया करते और बहुत लोकप्रिय बन चुके थे। हसन ज़ैदी ने मुंबई में अपनी शुरुआत की टेलीविज़न धारावाहिकों के माध्यम से। उनके अभिनय से सजे उल्लेखनीय धारावाहिक रहे ’हमने ली है शपथ’, खोटे सिक्के’, ’रिश्ता.कॉम’, ’कुमकुम’, ’सबकी लाडली बेबो’, ’सुन यार चिल मार’, ’एक लड़की अनजानी सी’, ’नाम गुम जाएगा’, ’हमसे है ज़माना’, ’क्योंकि सास भी कभी बहू थी’, ’तुम साथ हो जब अपने’ प्रमुख। विक्रम भट्ट की नज़र उन पर पड़ने में ज़्यादा देर नहीं लगी और 2013 की उनकी फ़िल्म ’Horror Story’ में हसन को कास्ट किया गया। इस फ़िल्म में उनके साथ करण कुन्द्रा, निशान्त मलकानी और रविश देसाई भी थे।करण और निशान्त की चर्चा हम इस सीरीज़ में कर चुके हैं, रविश की बातें हम आगे करेंगे। ख़ैर, ’Horror Story’ की कहानी कुछ ऐसी थी कि सात युवक-युवतियाँ एक बार एक बहिष्कृत होटल में एक रात बिताने की सोचते हैं। किसी भी हॉरर फ़िल्म में अभिनय करने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण बात होती है एक अभिनेता के लिए, वह है एक्सप्रेशन। बताने की ज़रूरत नहीं कि हसन ज़ैदी ने कमाल का अभिनय किया है इस फ़िल्म में। आयुष राणा निर्देशित इस फ़िल्म से हसन का बॉलीवूड में प्रवेश हुआ और फिर इसके बाद वो कई और फ़िल्मों में नज़र आए - 2014 में ’डिश्कियाऊँ’ और 2017 में ’सरग़ोशियाँ’। कश्मीरी पार्श्व पर बनी ’सरग़ोशियाँ’ में आर्यन रैना के किरदार में हसन ज़ैदी को काफ़ी सराहन मिली थी। इसी साल उन्होंने ’For Bindiya Call Jugnu’ में भी अभिनय किया। इन सभी फ़िल्मों में हसन ज़ैदी मुख्य नायक के रोल में नज़र नहीं आए। लेकिन बहुत जल्द फ़िल्म ’कभी कभी’ आने जा रही है जिसमें हसन ज़ैदी मुख्य किरदार में नज़र आएंगे। एक और अभिनेता जो इन दिनों चर्चा में हैं, ये हैं हिमांश कोहली। टीवी धारावाहिक ’हमसे है लाइफ़’ के लोकप्रिय राघव ओबेरोय की भूमिका में हिमांश कोहली घर घर में जाने गए। 3 नवंबर 1989 को दिल्ली में जन्में हिमांश ने K. R. Mangalam World School से पढ़ाई सम्पन्न की Mass Media में स्नातक की। बचपन से ही हिमांश राजेश खन्ना से बहुत ज़्यादा मुतासिर थे। उनके मैनरिज़्म्स, उनके बोलने का अंदाज़, आँखों से बात करने का हुनर, ये सब हिमांश ग़ौर से महसूस किया करते थे और उनका कहना है कि अपने अभिनय में भी वो राजेश खन्ना को ही अपना गुरु मानते आए हैं। वैसे हिमांश ने अपना सफ़र एक RJ के रूप में 2011 में दिल्ली के Radio Mirchi में शुरु की थी। उसी साल ’हमसे है लाइफ़’ में उन्हें मौका मिल गया और 2012 तक इसमें काम करने के बाद फ़िल्म का ऑफ़र मिलते ही टेलीविज़न छोड़ दिया। 2012 में निर्देशन दिव्य कुमार आज के दौर के युवाओं को लेकर एक फ़िल्म बना रहे थे ’यारियाँ’। इसमें लक्ष्य के किरदार के लिए उन्होंने हिमांश को चुना। यह किरदार फ़िल्म के मुख्य किरदारों में से एक था। 2014 में जब यह फ़िल्म बन कर प्रदर्शित हुई तो बहुत हिट हुई और हिमांश युवावर्ग में हिट हो गए। ’यारियाँ’ की सफलता के चलते हिमांश को अगले ही साल ’अभी नहीं तो कभी नहीं’ में मुख्य नायक का रोल मिल गया। यह फ़िल्म 2016 में रिलीज़ हुई थी। 2017 में हिमांश कई फ़िल्मों में नज़र आए जैसे कि ’जीना इसी का नाम है’, ’स्वीटी वेड्स NRI', 'रांची डायरीज़’, और ’दिल जो ना कह सका’। दुर्भाग्यवश इनमें से एक भी फ़िल्म चली नहीं और हिमांश को ’यारियाँ’ के बाद जिस सफलता की तलाश थी, वह उनसे दूर दूर ही भारती रही। करण जोहर की 2018 की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’Student of the Year 2’ में हिमांश को कास्ट किया गया है जो अपने आप में उनके लिए एक सम्मान की बात है। जिस तरह से ’’Student of the Year’ से वरुण धवन और सिद्धार्थ मल्होत्रा की गाड़ी चल पड़ी थी, देखना यह है कि क्या ’Student of the Year 2’ में हिमांश की भी क़िस्मत चमकेगी? इस फ़िल्म में टाइगर श्रॉफ़ मुख्य नायक रहेंगे। 

यहाँ आकर समाप्त होती है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रृंखला की नौवीं कड़ी। अगली बार फिर कुछ और नए अभिनेताओं की बातें लेकर हाज़िर होंगे। बने रहिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के ’चित्रकथा’ के साथ।




आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, February 25, 2018

राग चन्द्रकौंस : SWARGOSHTHI – 358 : RAG CHANDRAKAUNS




स्वरगोष्ठी – 358 में आज


पाँच स्वर के राग – 6 : “सन सनन सनन जा री ओ पवन…”


प्रभा अत्रे से राग चन्द्रकौंस की बन्दिश और लता मंगेशकर से फिल्म का गीत सुनिए




डॉ. प्रभा अत्रे
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की छठी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग चन्द्रकौंस का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात गायिका विदुषी प्रभा अत्रे के स्वरों में राग चन्द्रकौंस की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग चन्द्रकौंस के स्वरों का फिल्मी गीतों में बहुत कम उपयोग किया गया है। राग चन्द्रकौंस के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” से वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया एक गीत –“सन सनन सनन जा री ओ पवन…”, लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



आज का राग “चन्द्रकौंस” है। इस राग में हम आपको दो रचनाएँ सुनवाएँगे। सबसे पहले आप 1961 में प्रदर्शित “सम्पूर्ण रामायण” फिल्म से राग चन्द्रकौंस पर आधारित एक मोहक गीत सुनेंगे। गीतकार भरत व्यास का लिखा और संगीतकार वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया यह गीत है। फिल्मी गीतों में रागों का प्रयोग और इस मामले में कभी भी समझौता न करने में संगीतकर वसन्त देसाई अग्रणी थे। फिल्म संगीत की बदलती प्रवृत्तियों के बावजूद उन्होने अपने शुरुआती दौर से लेकर वर्ष 1975 तक अपनी अन्तिम फिल्म “शक” तक अपने संगीत में रागों का साथ नहीं छोड़ा। इस प्रतिबद्धता के कारण लोकप्रियता को एक कसौटी के र्रोप में बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा गया और यही कारण है कि उनके लोकप्रिय गीतों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। आज का गीत लता मंगेशकर का गाया हुआ है। परन्तु वसन्त देसाई कभी भी लता मंगेशकर पर आश्रित नहीं थे। लता मंगेशकर के बिना भी उनके राग आधारित संगीत के बल पर आठवें दशक की फिल्म “गुड्डी” का गीत –“बोले रे पपीहरा...” वाणी जयराम के स्वर में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। ऐसे ही सिद्धान्तवादी, स्वाभिमानी और आत्मविश्वास से परिपूर्ण संगीतकार वसन्त देसाई द्वारा स्वरबद्ध राग चन्द्रकौंस पर आधारित गीत –“सन सनन सनन जा री ओ पवन...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनिए।

राग चन्द्रकौंस : “सन सनन सनन जा री ओ पवन...” : लता मंगेशकर : फिल्म – सम्पूर्ण रामायण



रे प वर्जित, कोमल ग नि, औड़व कर विस्तार,
म स वादी-संवादी सों, चन्द्रकौंस तैयार।
राग चन्द्रकौंस को भैरवी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर कोमल लगाए जाते हैं। ऋषभ और पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। केवल पाँच स्वर का राग होने से इस राग की जाति औड़व-औड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग चन्द्रकौंस का गायन-वादन मध्यरात्रि के समय सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। राग मधुवन्ती की तरह यह भी आधुनिक राग है जिसकी रचना राग मालकौंस के कोमल निषाद को शुद्ध निषाद में परिवर्तित करने से हुई है। यह राग भैरवी थाट के अन्तर्गत माना जाता है, किन्तु सत्य तो यह है की राग चन्द्रकौंस पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित दस थाट में से किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आता। उच्चस्तर के कई राग हैं, जैसे अहीर भैरव, आनन्द भैरव, मधुवन्ती, चन्द्रकौंस आदि, जो दस थाट में से किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आते। राग चन्द्रकौंस तीनों सप्तकों में समान रूप से प्रयोग किया जाता है और तीनों सप्तकों में खिलता है। इस राग में विलम्बित व द्रुत खयाल, तराना आदि गाया जाता है, किन्तु ठुमरी नहीं गायी जाती। इस राग को गाते-बजाते समय बीच-बीच में शुद्ध निषाद प्रयोग करने की आवश्यकता होती है, इससे एक ओर राग चन्द्रकौंस के स्वरूप की स्थापना होती है तो दूसरी ओर राग मालकौंस से बचाव भी होता रहता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी प्रभा अत्रे के स्वर में भक्तिरस से परिपूर्ण एक खयाल रचना। यह रचना एकताल में निबद्ध है। आप इस खयाल रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग चन्द्रकौंस : “सगुण स्वरूप नन्दलाल...” : डॉ. प्रभा अत्रे


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 358वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 3 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 360वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 356वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – वृन्दावनी सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल व कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले और मुहम्मद रफी

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में आपने राग चन्द्रकौंस का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में राग चन्द्रकौंस के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन किया था। साथ ही आपने फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” से राग चन्द्रकौंस के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में सुना। पिछले अंक में संगीतकार चाँद परदेशी का चित्र हम सबके लिए उपलब्ध कराने वाले पाठक बीकानेर, राजस्थान के लक्ष्मीनारायण सोनी अब हमारे नियमित पाठक बन गए हैं। हमें विश्वास है कि श्री सोनी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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