Saturday, September 30, 2017

चित्रकथा - 38: रामायण पर आधारित महत्वपूर्ण हिन्दी फ़िल्में

अंक - 38

विजयदशमी विशेष


रामायण पर आधारित महत्वपूर्ण हिन्दी फ़िल्में  




आज विजयदशमी का पावन पर्व हर्षोल्लास के साथ पूरे देश भर में मनाया जा रहा है। विजयदशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस शुभवसर पर ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हम अपने सभी श्रोताओं व पाठकों को देते हैं ढेरों शुभकामनाएँ और ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि इस संसार से बुराई समाप्त हो और चारों तरफ़ केवल अच्छाई ही अच्छाई हो; लोग एक दूसरे का सम्मान करें, कोई किसी को हानी ना पहुँचाएँ, ख़ुशहाली हो, हरियाली हो, बस! आइए आज इस पवित्र पर्व पर ’चित्रकथा’ में पढ़ें उन महत्वपूर्ण फ़िल्मों के बारे में जो रामायण की कहानी पर आधारित हैं।





पौराणिक फ़िल्मों का चलन मूक फ़िल्मों के दौर से ही शुरु हो चुका था। बल्कि यह कहना उचित होगा
अन्ना सालुंके
कि 1920 के दशक में, जब मूक फ़िल्में बना करती थीं, उस समय पौराणिक विषय पर बनने वाली फ़िल्में बहुत लोकप्रिय हुआ करती थीं। रामायण पर आधारित मूक फ़िल्मों में सर्वाधिक लोकप्रिय फ़िल्म रही दादा साहब फाल्के द्वारा निर्मित फ़िल्म ’लंका दहन’। इसका निर्माण 1917 में हुआ। 1913 में ’राजा हरिश्चन्द्र’ का सफल निर्माण के बाद यह दादा साहब फाल्के की दूसरी फ़ीचर फ़िल्म थी। अभिनेता अन्ना सालुंके, जिन्होंने ’राजा हरिश्चन्द्र’ में रानी तारामती का रोल निभाया था, ’लंका दहन’ में दो दो किरदार निभाए। उन दिनों औरतों का फ़िल्मों में अभिनय करने को अच्छा नहीं माना जाता था, इसलिए अच्छे घर की लड़कियाँ फ़िल्मों में काम नहीं करती थीं। इसलिए अधिकतर नारी चरित्र पुरुष ही निभाया करते थे। उल्लेखनीय बात यह है कि ’लंका दहन’ में अन्ना सालुंके ने राम और सीता, दोनों ही चरित्र एक साथ निभाए, और इस तरह से ’डबल रोल’ का यह पहला उदाहरण किसी भारतीय फ़िल्म में दिखाई दिया। यहीं से भारतीय फ़िल्मों में डबल रोल की प्रथा शुरु हुई। इस फ़िल्म में हनुमान का किरदार गणपत जी. शिंडे ने निभाया था। ’लंका दहन’ फ़िल्म ज़बरदस्त हिट हुई। जब बम्बई में यह फ़िल्म थिएटरों में लगी, तब भगवान राम को परदे पर देखते ही दर्शक अपने जूते पैरों से उतार लेते थे। दादा साहब की ट्रिक फ़ोटोग्राफ़ी और स्पेशल इफ़ेक्ट्स ने दर्शकों को मन्त्रमुग्ध कर दिया था। फ़िल्म इतिहासकार अमृत गांगर के अनुसार सिनेमाघरों के टिकट काउन्टरों से सिक्कों को थैलों में भर भर कर बैल गाड़ियों के ज़रिए निर्माता के दफ़्तर तक पहुँचाया गया। बम्बई के मैजेस्टिक सिनेमा के बाहर लम्बी कतारें लगती थीं टिकटों के लिए। लोगों में हाथापाई के किस्से भी सुने गए। हाउसफ़ुल होने की वजह से दूर दराज़ के गावों से आने वाले बहुत से लोगों को जब टिकट नहीं मिलती तो निराश हो जाते थे।


मूक फ़िल्मों का दौर ख़त्म हुआ और सवाक फ़िल्में शुरु हो गईं। पौराणीक विषयों पर बनने वाली फ़िल्में अब तो और भी सर चढ़ कर बोलने लगीं। इस दौर में रामायण पर बनने वाली पहली फ़िल्म थी 1933 की ’रामायण’। फ़िल्म ’मदन थिएटर्स’ के बैनर तले बनी थी और जिसके संगीतकार थे उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब। पृथ्वीराज कपूर व मुख़्तार बेगम अभिनीत इस फ़िल्म में मुख़्तार बेगम के गाए बहुत से गीत थे। इसके अगले ही साल 1934 में एक बार फिर से ’रामायण’ शीर्षक से फ़िल्म बनी। सुदर्शन और प्रफ़ुल्ल राय निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे दादीभाई सरकारी, राजकुमारी नायक (सीता की भूमिका में), देवबाला, इंदुबाला (मंथरा की भूमिका में), अब्दुल रहमान काबुली (रावण की भूमिका में) प्रमुख। इस फ़िल्म में संगीतकार नागरदास नायक ने संगीत दिया और इसमें उन्होने फ़िदा हुसैन से तुलसीदास कृत “श्री रामचन्द्र कृपालु भजमन’ गवाया था। ‘रामायण’ हिंदू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण महाकाव्य है और इस पर फ़िल्म बनाना आसान काम नहीं। और शायद उससे भी कठिन रहा होगा ‘रामायण’ का गीत-संगीत तय्यार करना। लेकिन नागरदास ने यह दायित्व भली-भाँति निभाया। फ़िदा हुसैन के गाये गीतों के अलावा राजकुमारी का गाया “भूल गये क्यों अवध बिहारी” भी एक बहुत ही सुंदर भक्ति रचना है। फ़िल्म के गीत लिखे पंडित सुदर्शन ने। 1935 की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही ’चन्द्रसेना’ जिसके निर्देशक थे व्ही. शांताराम, और जिसकी कहानी रामायण की एक कथा पर आधारित थी। इस फ़िल्म में भगवान राम की भूमिका निभाई सुरेश बाबू माणे ने और चन्द्रसेना के चरित्र में अभिनय किया नलिनी तरखड ने। प्रभात के बैनर तले निर्मित इस फ़िल्म के संगीतकार थे केशवराव भोले जिन्होंने इस फ़िल्म में अपने संगीत की अलग पहचान बनाते हुए “मदिरा छलकन लागी”, “रंगीली रसवाली” और “नेक ठहर मेरे मन अस आए” जैसे गीतों की रचना की जिन्हें लोगों ने ख़ूब पसंद किया। इसी फ़िल्म का निर्माण मराठी और तमिल भाषा में भी किया गया था। दरसल यह फ़िल्म 1931 की शान्ताराम की ही इसी शीर्षक की मराठी फ़िल्म की रीमेक थी।

प्रेम अदीब
भले तीस के दशक में बहुत सी ऐसी फ़िल्में बनीं लेकिन रामायण पर आधारित जिस फ़िल्म ने अपनी ख़ास पहचान बनाई वह थी 1943 की ’राम राज्य’। विजय भट्ट निर्देशित इस फ़िल्म में राम-सीता के चरित्र में प्रेम अदीब और शोभना समर्थ ने चारों तरफ़ धूम मचा दी और उस वर्ष बॉक्स ऑफ़िस पर यह फ़िल्म तीसरे नंबर पर थी। किसी पौराणीक विषय पर बनने वाली फ़िल्म का इससे पहले इस तरह की सफलता देखी नहीं गई थी। यह फ़िल्म इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह वह एकमात्र फ़िल्म थी जिसे महात्मा गांधी ने देखी थी। और यह पहली भारतीय फ़िल्म थी जिसका प्रदर्शन संयुक्त राज्य अमरीका में हुआ था। वाल्मिकी रचित रामायण का फ़िल्मीकरण किया लेखक कानु देसाई ने। शंकर राव व्यास फ़िल्म के संगीतकार थे और फ़िल्म के कुछ गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे जैसे कि सरस्वती राणे का गाया "वीणा मधुर मधुर कछु बोल"। फ़िल्म के गीत लिखे रमेश गुप्ता ने, तथा गीतों में आवाज़ें दीं अमीरबाई कर्णाटकी, मन्ना डे और सरस्वती राणे ने। इसी फ़िल्म का पुनर्निर्माण (रीमेक) विजय भट्ट ने सन् 1967 में इसी शीर्षक से किया। राम और सीता की भूमिका में इस बार चुने गए कुमारसेन और बीना राय। शंकर राव व्यास की जगह संगीत का भार संभाला वसन्त देसाई ने और गीत लिखे भरत व्यास ने। भरत व्यास पौराणिक फ़िल्मों के गीतकार के रूप में जाने जाते रहे हैं। इस फ़िल्म की ख़ास बात यह रही कि इसमें वाल्मिकी रामायण भी है, तुल्सीदास रामचरितमानास भी और भावभूति के नाटक ’उत्तर रामचरित’ का स्वाद भी मिलता है। इस बार यह फ़िल्म रंगीन फ़िल्म थी। ’Illustrated Weekly of India' के अनुसार बीना राय द्वारा सीता के किरदार को दर्शकों ने पसन्द नहीं किया। इस फ़िल्म का लता मंगेशकर का गाया "डर लागे गरजे बदरिया सावन की..." बहुत लोकप्रिय हुआ। फ़िल्म में बहुत से गीत थे जिनमें आवाज़ें थीं लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, सुमन कल्याणपुर, उषा तिमोथी, और मन्ना डे की।

महिपाल
1961 में बनी बाबूभाई मिस्त्री निर्देशित महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’सम्पूर्ण रामायण’ जिसमें भगवान राम के चरित्र में थे महिपाल और सीता के चरित्र में थीं अनीता गुहा। यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर सफल रही और 1943 के ’राम राज्य’ के बाद भगवान राम पर बनने वाली फ़िल्मों में यही फ़िल्म सर्वाधिक सफ़ल रही। स्पेशल इफ़ेक्ट्स के लिए मशहूर बाबूभाई मिस्त्री ने इस फ़िल्म में ऐसे ऐसे करिश्मे दर्शकों को परदे पर दिखाए जो उस ज़माने के हिसाब से आश्चर्यजनक थे। इस फ़िल्म ने अभिनेत्री अनीता गुहा को घर घर में चर्चा का विषय बना दिया। लता मंगेशकर के गाए दो गीत "सन सनन, सनन, जा रे ओ पवन" तथा "बादलों बरसो नयन की ओर से" अपने ज़माने के मशहूर गीतों में से थे। फ़िल्म के अन्य गायक थे मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे, महेन्द्र कपूर और आशा भोसले। इस फ़िल्म के अन्य चरित्रों में भी कई जानेमाने नाम शामिल हैं जैसे कि ललिता पवार (मंथरा), हेलेन (सुर्पनखा), अचला सचदेव (कौशल्या) आदि। आगे चल कर जब दूरदर्शन के लिए ’रामायण’ धारावाहिक की योजना बनी तब मंथरा के किरदार के लिए एक बार फिर से ललिता पवार को ही चुना गया।

रवि कुमार - जया प्रदा
70 के दशक में रामायण आधारित दो फ़िल्में आईं जो तेलुगू-हिन्दी डबल वर्ज़न फ़िल्में थीं। 1976 में आई ’सीता स्वयंवर’ जो पहले तेलुगू में ’सीता कल्याणम’ शीर्षक से बनी और दूसरी फ़िल्म थी 1977 की ’श्री राम वनवास’। दूसरी फ़िल्म पहली की सीक्वील थी और दोनों फ़िल्मों का निर्माण ’आनन्द लक्ष्मी आर्ट मूवीज़’ के बैनर तले ही हुआ था। इन फ़िल्मों में श्री राम की भूमिका में रवि कुमार थे और सीता की भूमिका में जया प्रदा। बापू निर्देशित ’सीता कल्याणम’ को उस साल का फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार मिला था सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए। इस फ़िल्म का प्रदर्शन 1978 में BFI London Film Festival, Chicago International Film Festival, San Reno and Denver International Film Festivals में हुआ था तथा British Film Institute के पाठ्यक्रम में इस फ़िल्म को शामिल किया गया है। ’श्री राम वनवास’ का निर्देशन किया था कमलाकर कमलेश्वर राव ने जबकि बाकी के टीम मेम्बर्स वही थे। इन दोनों फ़िल्मों में संगीत दिया के. वी. महादेवन ने और गीत लिखे मधुकर ने। गीतों में आवाज़ें थीं वाणी जयराम, बी. वसन्था, महेन्द्र कपूर की। 90 और बाद के दशकों में रामायण की कहानियों पर कई ऐनिमेटेद फ़िल्में बनीं जो अन्तराष्ट्रीय स्तर पर जा पहुँची। उदाहरण के लिए 1992 की ऐनिमेटेद फ़िल्म ’रामायणा: दि लिजेन्ड ऑफ़ प्रिन्स रामा’ जिसका निर्माण हिन्दी के अलावा अंग्रेज़ी और जापानी भाषाओं में हुआ।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, September 24, 2017

ठुमरी भैरवी : SWARGOSHTHI – 336 : THUMARI BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 336 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 3 : ठुमरी भैरवी

श्रृंगार रस की ठुमरी को मन्ना डे ने हास्य रस में रूपान्तरित किया - “फूलगेंदवा न मारो...”





रसूलन बाई
मन्ना डे
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक में हम आपसे पूरब अंग की एक विख्यात ठुमरी गायिका रसूलन बाई के व्यक्तित्व पर और उन्हीं की गायी एक अत्यन्त प्रसिद्ध ठुमरी- ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में जाय...’ पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही इस ठुमरी के फिल्म ‘दूज का चाँद’ में संगीतकार रोशन और पार्श्वगायक मन्ना डे द्वारा किये प्रयोग पर भी आपसे चर्चा करेंगे।



ठुमरी भैरवी : “फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में जाय...” : रसूलन बाई
ठुमरी भैरवी : “फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट...” : मन्ना डे : फिल्म – दूज का चाँद




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 336वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस विख्यात गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 30 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 338वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 334वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित फिल्म – “मंज़िल” से लिये गए दादरा का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – पार्श्वगायक – मन्ना डे

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस तीसरी कड़ी में आपने राग भैरवी की ठुमरी का रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।
  
वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, September 23, 2017

चित्रकथा - 37: इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 6)

अंक - 37

इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 6)


"हम हैं मुंबई के हीरो..." 




हर रोज़ देश के कोने कोने से न जाने कितने युवक युवतियाँ आँखों में सपने लिए माया नगरी मुंबई के रेल्वे स्टेशन पर उतरते हैं। फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर स्टार बनने का सपना लिए छोटे बड़े शहरों, कसबों और गाँवों से मुंबई की धरती पर क़दम रखते हैं। और फिर शुरु होता है संघर्ष। मेहनत, बुद्धि, प्रतिभा और क़िस्मत, इन सभी के सही मेल-जोल से इन लाखों युवक युवतियों में से कुछ गिने चुने लोग ही ग्लैमर की इस दुनिया में मुकाम बना पाते हैं। और कुछ फ़िल्मी घरानों से ताल्लुख रखते हैं जिनके लिए फ़िल्मों में क़दम रखना तो कुछ आसान होता है लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कुछ बात होती है। हर दशक की तरह वर्तमान दशक में भी ऐसे कई युवक फ़िल्मी दुनिया में क़दम जमाए हैं जिनमें से कुछ बेहद कामयाब हुए तो कुछ कामयाबी की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। कुल मिला कर फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है यहाँ टिके रहने के लिए। ’चित्रकथा’ में आज से हम शुरु कर रहे हैं इस दशक के नवोदित नायकों पर केन्द्रित एक लघु श्रॄंखला जिसमें हम बातें करेंगे वर्तमान दशक में अपना करीअर शुरु करने वाले शताधिक नायकों की। प्रस्तुत है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रॄंखला की छठी कड़ी।




’इस दशक के नवोदित नायक’ सीरीज़ में अब तक की पाँच कड़ियों में हम कई जानेमाने और कुछ कमचर्चित नायकों का ज़िक्र कर चुके हैं। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज की कड़ी में भी हम कुछ ऐसे नवोदित सितारों को लेकर आए हैं जिनमें से कुछ दर्शकों के दिलों में जगह बना चुके हैं और कुछ इस प्रयास में हैं। आज सबसे पहले ज़िक्र सौरभ रॉय का। फ़ाइन आर्ट्स में स्नातक तथा ग्रासिम मिस्टर इंडिया 2006 के विजेता सौरभ रॉय फ़ैशन वर्ल्ड में एक जाना माना नाम है। वो एक क्रिकेटर भी हैं जो टीम रॉयल पटियालवी में खेल चुके हैं। टीवी सीरीज़ ’Fear Factor: Khatron Ke Khiladi (season 4)’ में भाग लेकर उन्हें प्रसिद्धी मिली। फिर उन्होंने बिल्कुल विपरीत दिशा में जाते हुए पौराणिक धारावाहिक ’महाभारत’ में द्रौपदी के पिता द्रौपद का चरित्र निभाया जिसके लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ी। टीवी शो ’अमीता का अमित’ में भी वो चर्चित रहे। फ़िल्मों में उनकी एन्ट्री हुई 2014 की फ़िल्म ’ब्लैक मनी’ से जिसमें उन्होंने एक ड्रग-ऐडिक्ट का किरदार निभाया। फ़ैशन इन्डस्ट्री के चमक-दमक के पीछे के अंधकार को दर्शाती यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर नाकामयाब रही। बदक़िस्मती से सौरभ की दूसरी फ़िल्म ’लव फिर कभी’ भी असफल रही और सौरभ का फ़िल्मों में सफलता के लिए संघर्ष जारी है। पंजाबी मूल के कनाडा में जन्में सनी गिल ने अपना बॉलीवूड का सफ़र शुरु किया 2011 की फ़िल्म ’जो हम चाहें’ से। इस फ़िल्म में उनके अभिनय की वजह से उन्हें ’टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के "Most Promising Newcomers of 2011" में सातवाँ स्थान मिला था। वैंकोवर कनाडा में बचपन की दहलीज़ पार करने के बाद उन्होंने मुंबई का रुख़ किया जहाँ उन्हें फ़ैशन डिज़ाइनर अबु जानी और संदीप खोसला ने मॉडलिंग् के काम दिलाए। कई नामी ब्रैण्ड्स के फ़ैशन शोज़ और प्रसिद्ध फ़िल्म अवार्ड शोज़ में रैम्प वाक, और कई विज्ञापनों और म्युज़िक विडियोज़ में नज़र आने के बाद उन्हें फ़िल्मों में एन्ट्री मिली। ’जो हम चाहें’ में मिस इंडिया यूनिवर्स सिमरन मुंडी के विपरीत उन्होंने अभिनय किया। हालाँकि यह फ़िल्म नहीं चली, पर वो इंडस्ट्री की नज़र में आ गए। उनके ख़ूबसूरत कदकाठी, नायक वाला चेहरा और प्राकृतिक अभिनय से उन्होंने क्रिटिक्स के दिल जीते। 2014 में उन्होंने एक पंजाबी हास्य फ़िल्म ’मुंडया ते बचके रईं’ में नायक का रोल अदा किया जिसे दर्शकों ने सराहा। हम सनी गिल के अगले फ़िल्म की प्रतीक्षा में हैं। मथुरा निवासी कृष्णा चतुर्वेदी उस समय पूरे देश में परिचित हो गए जब नामी फ़ैशन कंपनियों के शोज़ में उन्होंने रैम्प वाक किया। मथुरा से दिल्ली और फिर दिल्ली से मुंबई तक का सफ़र संघर्षपूर्ण रहा। लेकिन फ़िल्मों में आने के लिए उन्हें बिल्कुल मेहनत नहीं करनी पड़ी। मॉडलिंग् की वजह से मुंबई में लोग उन्हें जानने लगे थे। 2013 की फ़िल्म ’दि कॉरनर टेबल’ में कृष्णा ने एक छोटा सा रोल किया था, लेकिन सही मायने डेब्यु के लिए उन्हें तीन साल की प्रतीक्षा करनी पड़ी। एक दिन उन्हें फ़िल्म निर्माता शब्बीर बॉक्सवाला का संदेश मिला फ़ेसबूक पर। उनके लिए फ़िल्म ’इश्क़ फ़ॉरेवर’ में बतौर नायक अभिनय करने का निमंत्रण था। कृष्णा ने एक साक्षात्कार में बताया कि उन्हें भी संघर्ष के दिनों से लेकर आज तक कास्टिंग् कूच का सामना करना पड़ रहा है और यही इस इंडस्ट्री की हक़ीक़त है। संगीतकार नदीम सैफ़ी (नदीम-श्रवण वाले) और गीतकार समीर के गाने होने के बावजूद 2016 की फ़िल्म ’इश्क़ फ़ॉरेवर’ फ़्लॉप सिद्ध हुई और कृष्णा की एक सफल फ़िल्म के लिए संघर्ष जारी है।

तेलुगू और हिन्दी फ़िल्मों के अभिनेता हर्षवर्धन राणे को ’तकिटा तकिटा’ (2010), ’प्रेम इश्क़ काधल’ (2013) और ’अनामिका’ (2013) जैसी तेलुगू फ़िल्मों में उनके द्वारा निभाए किरदारों की वजह से जाना जाता है। हिन्दी फ़िल्मों में उनका पदार्पण हुआ 2016 की फ़िल्म ’सनम तेरी क़सम’ में। कहा जाता है कि संजय लीला भंसाली ने शुरु शुरु में उन्हें ’गोलियों की रासलीला राम लीला’ में लेना चाहते थे, लेकिन ग्यारह महीनों का कॉनट्रैक्ट होने की वजह से हर्षवर्धन उपलब्ध नहीं थे। ’सनम तेरी क़सम’ फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर पिट गई, हाँ, अगर वो ’राम लीला’ में होते तो हो सकता है कि आज हिन्दी फ़िल्मों का एक जाना माना नाम बन जाते। आजकल हर्षवर्धन जॉन एब्रहम की फ़िल्म ’सत्रह को शादी है’ की शूटिंग् में व्यस्त हैं। देखना यह है कि क्या वो हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में टिक पाते हैं या फिर तेलुगू की तरफ़ ही रुख़ कर लेते हैं! ऐक्शन डिरेक्टर श्याम कौशल के पुत्र तथा सहयोगी निर्देशक सनी कौशल के भाई विक्की कौशल का ताल्लुख़ फ़िल्मी परिवार से ही था, लेकिन उन्होंने ईलेक्ट्रॉनिक्स ऐण्ड टेलीकम्युनिकेशन में इंजिनीयरिंग् की और नौकरी के कई प्रस्ताव उनके सामने आए। आख़िरकार उन्होंने अभिनय जगत में ही पाँव रखने का निर्णय लिया और थिएटर करने लगे। किशोर नमित कपूर के यहाँ अपने अभिनय क्षमता को तराशने के बाद कुछ एक फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल किए जैसे कि ’लव शव ते चिकन खुराना’, ’गीक आउट’ और ’बॉम्बे वेलवेट’। साथ ही साथ नसीरुद्दीन शाह और मानव कौल के ड्रामा ग्रूप में थिएटर भी कर रहे थे। उनके करीअर का टर्निंग् पॉइन्ट था 2015 की फ़िल्म ’मसान’ जिसमें वो नायक भी भूमिका में थे। पंजाबी मुंडा विक्की ने इस फ़िल्म में बनारस के लड़के का चरित्र निभाया और क्या ख़ूब निभाया। एक समीक्षक ने लिखा कि इस फ़िल्म में एक पल के लिए भी ऐसा नहीं लगा कि विक्की अभिनय कर रहे हैं। ’मसान’ के बाद विक्की की अगली फ़िल्म आई ’ज़ुबान’ और उसके बाद अनुराग कश्यप की ’रमन राघव 2.0’ जिसमें विक्की ने एक ड्रग ऐडिक्ट का रोल निभाया। 2017 में उनकी फ़िल्म ’मनमर्ज़ियाँ’ बस आने ही वाली है। इन दिनों विक्की कौशल संजय दत्त के बायोपिक फ़िल्म में अभिनय कर रहे हैं जिसका सभी को बेसबरी से इन्तज़ार है। जम्मु के सिद्धांत गुप्ता जम्मु कश्मीर की तरफ़ से राष्ट्रीय स्तर पर under-14 cricket, under-17 swimming और under-19 basketball खेल चुके थे। सुन्दर चेहरे और ख़ूबसूरत कदकाठी की वजह से उन्हें मॉडलिंग् में आसानी से मौका मिल गया और वो एक सुपर मॉडल बन कर उभरे। 2013 में उन्हें भले दो फ़िल्मों - ’बैंग् बैंग् बैंग्कॉक’ और ’टुटिया दिल’ - में अभिनय करने का मौका मिला, इनसे कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली। फिर 2015 में सिद्धांत ने टीवी धारावाहिक ’टशन-ए-इश्क़’ में कुंज सरना का किरदार अदा की जिसे लोगों ने बहुत सराहा और सिद्धांत घर घर में पहुँच गए। इससे उन्हें फिर एक बार 2015 की फ़िल्म ’बदमाशियाँ’ में बतौर नायक अभिनय करने का मौका मिला। यह फ़िल्म पिचली दो फ़िल्मों से बेहतर थी, लेकिन जो सफलता उन्हें टेलीविज़न पर मिली, वह सफलता अब तक फ़िल्मों में नहीं मिल पायी है। 2017 में उनकी अगली फ़िल्म ’भूमि’ आ रही है, जो उनके फ़िल्मी भविष्य का फ़ैसला करेगी। तब तक हम इन्तज़ार करेंगे उनका।

करणवीर शर्मा एक और नौजवान नायक हैं जिन्होंने अपने अभिनय से समीक्षकों और दर्शकों के दिलों पर दस्तक दी है। 2012 की हास्य फ़िल्म ’सड्डा अड्डा’ में उन्हें लौंच किया गया था। वैसे तो करण पाकिस्तान के नागरिक हैं, लेकिन हिन्दी फ़िल्मों के प्रति लगाव और एक फ़िल्म हीरो बनने का सपना उन्हें मुंबई खींच लाया। पाकिस्तान में कई विज्ञापनों में नज़र आने के अलावा वो मध्य एशिया के कई देशों में फ़ैशन शोज़ कर चुके हैं। ’सड्डा अड्डा’ में करणवीर के अभिनय को काफ़ी सराहा गया था। मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग् कर चुके करणवीर को टैप, जैज़, जिव, ऑस्कर, बोस्को सीज़र, मैम्बो, साल्सा और क्रम्पिंग् जैसे नृत्य शैलियाँ आती हैं। ’सड्डा अड्डा’ के दो साल बाद करण नज़र आए 2014 की फ़िल्म ’ज़िद’ में। यह एक थ्रिलर फ़िल्म थी जिसमें करणवीर ने एक क्राइम रिपोर्टर के किरदार में अभिनय किया। सुन्दर अभिनय, अच्छी कहानी और सुरीले गीत-संगीत के बावजूद यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पायी। करणवीर विज्ञापन क्षेत्र में एक जाना माना नाम है। अब देखना यह है कि क्या बॉलीवूड में भी वो एक ऊँचा मुकाम हासिल कर पाते हैं या नहीं! भोपाल में जन्में ज़ुबेर ख़ान ने बी.टेक की लेकिन उसके बाद एक अभिनेता बनने का फ़ैसला लिया। रैम्प शोज़ किए और उच्चस्तरीय फ़ैशन ब्रैण्ड्स के साथ मॉडलिंग् का काम किया। साल्सा, जैज़, हिप-हॉप जैसी नृत्य शैलियों में उन्हें महारथ हासिल है। मॉडलिंग् करते हुए उन्होंने मिस्टर मध्य प्रदेश का ख़िताब जीता, और 2012 में बने मिस्टर इंडिया। 2014 में उन्हें सुनहरा मौका मिला ’लेकर हम दीवाना दिल’ फ़िल्म में अभिनय करने का। फ़िल्म तो नहीं चली, पर ज़ुबेर को तीन फ़िल्में मिल गईं लीड रोल वाली। ये फ़िल्में थीं ’सोल’, ’मुन्ना भाई सल्लु भाई’, ’ड्रीम जॉब’, और ’वो कौन थे’। उनके अभिनय से सजी आख़िरी फ़िल्म आई 2016 में -’आख़िरी सौदा’। इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कमाल नहीं दिखा सकी। ज़ुबेर ने ग़लत फ़िल्में चुन ली अपने लिए, ये सभी फ़िल्में बी-ग्रेड मसाला फ़िल्में थीं। अब देखना है कि क्या ज़ुबेर आने वाले समय में ए-ग्रेड की फ़िल्मों में क़दम रख पाते हैं या नहीं। राजनीति के क्षेत्र से भी कई बार कलाकारों ने जन्म लिया है। ऐसे ही एक हैं सांसद और मंत्री राम विलास पासवान के सुपुत्र चिराग पासवान जो ख़ुद भी लोक जनशक्ति पार्टी से जुड़े हुए हैं। वर्ष 2014 में 16-वीं लोक सभा के चुनाव में वो बिहार के जमुई चुनाव क्षेत्र से चुनाव जीते और उसी चुनाव में उनके पिता हाजीपुर से जीते। चिराग पासवान कम्प्युटर साइन्स में इंजिनीयरिंग् की है और बचपन से उनकी तमन्ना थी कि वो फ़िल्मी हीरो बने। इसी सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने मुंबई का रुख़ किया। वर्ष थी 2011 और फ़िल्म थी ’मिले ना मिले हम’। फ़िल्म में चिराग की नायिका बनीं कंगना रनौत और साथ में कई नामी कलाकारों ने भी अभिनय किया जिनमें कबीर बेदी, दलीप ताहिल, पूनम ढिल्लों शामिल हैं। साजिद-वाजिद के सुमधुर गीतों के बावजूद यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह से असफल रही। शायद चिराग को ऐसा लगा कि फ़िल्म लाइन उनके लिए नहीं है। तभी उन्होंने फिर इसके बाद किसी और फ़िल्म में अभिनय नहीं किया और फिर एक बार राजनीति की तरफ़ मुड़ गए। लेकिन यह बात भी सत्य है कि ’मिले ना मिले हम’ में उनके जानदार अभिनय के लिए उन्हें 2012 स्टार डस्ट अवार्ड्स के तहत ’Superstar Of Tomorrow’ का पुरस्कार प्रदान किया गया था। अभिनय की काबलियत तो चिराग में है, अब देखना यह है कि क्या वो दोबारा इस क्षेत्र में अपनी क़िस्मत आज़माने का फ़ैसला लेते हैं या नहीं।

मॉडल और अभिनेता ताहा शाह 2011 की फ़िल्म ’लव का दि एन्ड’ से चर्चा में आए थे। संयुक्त अरब अमीरात के अबु धाबी में जन्में ताहा शाह के पिता शाह सिकन्दर बदुशा और माँ महनाज़ सिकन्दर बदुशा दक्षिण भारत से ताल्लुख़ रखते हैं। एक शिक्षित ्व प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुख़ रखने की वजह से ताहा की पढ़ाई-लिखाई भी बहुत अच्छी तरह से हुई। BBA की पढ़ाई के दौरान उनका मन पढ़ने-लिखने से ऊब गया और पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर वो नौकरी करने लगे। बिज़नेस के तरह तरह की कंपनियों में काम किया और साथ ही साथ शौकिया तौर पर मॉडलिंग् भी करते रहे। 16 वर्ष की आयु से मॉडलिंग् की शुरुआत करते हुए ताहा शाह ने कई नामी-ग्रामी ब्रैण्ड्स के विज्ञापनों और रैम्प शोज़ में हिस्स लिया। इसी दौरान उन्होंने स्टील इम्पोत की अपनी ख़ुद की कंपनी खोली जिसके लिए उन्हें ’successful entrepreneur’ का ख़िताब भी मिला। पर दुर्भाग्यवश यह बिज़नेस ज़्यादा नहीं चल सकी और आर्थिक संकटों से वो घिर गए। तभी उन्होंने फ़िल्म जगत में अपनी किस्मत आज़माने का फ़ैसला किया। अभिनय सीखने के लिए उन्होंने अबु धाबी में New York Film Academy (NYFA) में दाख़िला लिया। छह महीने का कोर्स करने के बाद वो लॉस ऐजेलीस के लिए निकलने ही वाले थे कि उनके पिता ने उन्हें पहले मुंबई जाने की सलाह दी। पिता की सलाह को मानते हुए ताहा मुंबई चले आए और करीब नौ महीने के संघर्ष के बाद उन्हें मिल ही गई उनकी पहली फ़िल्म ’लव का दि एन्ड’। फ़िल्म के नायक होते हुए भी उनका किरदार ऐन्टि-हीरो का था जिसमें कॉमेडी भी थी, खलनायकी भी, कामुकता भी और ऐटिट्युड भी। ताहा के अभिनय को देख कर करण जोहर, रमेश तौरानी, रेन्सिल डी’सिल्वा, निखिल अडवानी और अन्य कई लोगों ने उनकी प्रशंसा की। यह 2011 की बात थी। इस फ़िल्म को मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली, लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा सकी। इसके दो साल बाद 2013 में ताहा की दूसरी फ़िल्म आई ’गिप्पी’ जिसमें उनके अभिनय की सराहना हुई। ताहा शाह के चेहरे और शारीरिक गठन के अनुरूप उन्हें कामुक फ़िल्मों के ऑफ़र मिलने लगे। 2014 में सेक्स सायरेन सनी लियोन के साथ उन्हें ’टिना ऐन्ड लोलो’ का ऑफ़र मिला, लेकिन आगे चल कर यह फ़िल्म बनी नहीं। महेश भट्ट, जो प्राप्त वयस्क मुद्दों वाली फ़िल्में बनाने के लिए जाने जाते रहे हैं, और जिनकी इस तरह की फ़िल्मों में कामुक दृश्यों का ढेर होता है, 2015 में ताहा शाह और पाकिस्तानी नायिका सारा लोरेन को लेकर बनाई फ़िल्म ’बरखा’। यह फ़िल्म तो ख़ास नहीं चली लेकिन इसके कुछ गीत हिट ज़रूर हुए। 2016 में ताहा नज़र आए थे ’बार बार देखो’ फ़िल्म में जिसमें नायक थे सिद्धार्थ मल्होत्रा। 2017 में इन दिनों ताहा जे. पी. दत्ता की नई फ़िल्म में अभिनय कर रहे हैं। अब तक का सफ़र अगर देखा जाए तो ताहा शाह को कोई बड़ी सफलता नहीं मिल पायी है। देखना यह है कि जे. पी. दत्ता की फ़िल्म उनकी क़िस्मत को बदल पाती है या नहीं।

’लव का दि एन्ड’ फ़िल्म में ताहा शाह के सह-नायक थे महरज़ान माज़दा जो टेलीविज़न की दुनिया का एक जानामाना नाम है। इस फ़िल्म से महरज़ान ने भी बॉलीवूड में क़दम रखा था। मुंबई से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित दहाणु नामक जगह में पले बढ़े महरज़ान ने पुणे के सिम्बायोसिस कॉलेज से कॉमर्स में स्नातक की पढ़ाई पूरी की और MTV Splitsvilla Season 2 के लिए चुने गए। इससे वो छोटे परदे पर काफ़ी लोकप्रिय हुए और इस शो के ख़त्म होते ही उन्हें ’मस्तिष्क’ धारावाहिक का ऑफ़र मिल गया। फिर इसके बाद महरज़ान ने कई और टीवी धारावाहिकों में काम किया जैसे कि ’निशा और उसके कज़िन्स’, ’ढाई किलो प्रेम’, ’खोटे सिक्के’ आदि। ’लव का दि एन्ड’ में उन्होंने एक समलैंगिक किरदार निभाया जो फ़िल्म के नायक ताहा शाह के प्रति आकृष्ट होते हैं। महरज़ान की अगली फ़िल्म है ’बस्ती है सस्ती’ जो 2018 में बन कर तैयार होगी। टेलीविज़न जगत में सफल पारी खेलने वाले महरज़ान की अगली फ़िल्म यह निर्णय करेगी कि क्या फ़िल्मों में भी वो उतने ही कामयाब हैं या नहीं। पत्रकार एकांश भारद्वाज ने फ़िल्म जगत में क़दम रखा 2015 की फ़िल्म ’मदमस्त बरखा’ से। जसपाल सिंह द्वारा निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म की कहानी बरखा (लीना कपूर) के इर्द-गिर्द घूमती है जो रणबीर नामक आर्मी-मैन की पत्नी है। रणबीर को एक मिशन पर जाना पड़ता है जिस वजह से बरखा अकेली रह जाती है। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वो अपने पति के ही दोस्त आकाश (एकांश भारद्वाज) के साथ प्रेम-संबंध शुरु कर बैठती है। यह एक बी-ग्रेड फ़िल्म थी जिसने एकांश को किसी भी तरह की मदद नहीं कर सकी। लेकिन कुछ फ़िल्म क्रिटिक्स ने एकांश के अभिनय को सराहा जिसका नतीजा यह हुआ कि 2013 के मुज़फ़्फ़र नगर के दंगों पर बनने वाली फ़िल्म ’मुज़फ़्फ़र नगर 2013’ में उन्हें अभिनय का मौका मिला। यह फ़िल्म 2017 में प्रदर्शित होने जा रही है।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Friday, September 22, 2017

गीत अतीत || सीसन 01 || 30 एपिसोड्स

Show name : Geet Ateet - Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai
हर गीत जो आपके कानों तक पहुँचता है, वो रचना के बहुत से पडावों से होकर गुजरता है, यानी हर गीत का एक अतीत होता है, और हर गीत की एक कहानी होती है. इसी तरह के किसी ख़ास गीत से जुड़े किसी कलाकार की जुबानी हम सुनेगें उस गीत के बनने की कहानी गीत अतीत में 

गीत अतीत 01 || हर गीत की एक कहानी होती है || ओ रे रंगरेज़ा || जॉली एल एल बी || जुनैद वसी

गीत अतीत 02 || हर गीत की एक कहानी होती है || मैनरलेस मजनूँ || रंनिंग शादी डॉट कॉम || सुकन्या पुरकायस्थ
गीत अतीत 03 || हर गीत की एक कहानी होती है || रंग || अरविन्द तिवारी || चाणक्य शुक्ला || सजीव सारथी
गीत अतीत 04 || हर गीत की एक कहानी होती है || हमसफ़र || बदरी की दुल्हनिया || अखिल सचदेवा ||
गीत अतीत 06 || हर गीत की एक कहानी होती है || हौले हौले || साहिल सुल्तानपुरी
गीत अतीत 07 || हर गीत की एक कहानी होती है || कागज़ सी है ज़िन्दगी || जीना इसी का नाम है || नाजिम के अली
गीत अतीत 08 || हर गीत की एक कहानी होती है || बेखुद || बिस्वजीत नंदा || हेमा सरदेसाई
गीत अतीत 09 || हर गीत की एक कहानी होती है || इतना तुम्हें || मशीन || अराफात महमूद
गीत अतीत 10 || हर गीत की एक कहानी होती है || आ गया हीरो || आ गया हीरो || आर्घ्या बैनर्जी
गीत अतीत ११ ||हर गीत की एक कहानी होती है || ये मैकदे ||अजय सहाब || पंकज उधास  
गीत अतीत 13  दम दम - फिल्लौरी - शाश्वत सचदेव 
गीत अतीत १४ धीमी - अलोकानन्दा दासगुप्ता
गीत अतीत १५ कारे कारे बदरा || ब्लू माउंटेन्स || सुनील सिरवैया 
गीत अतीत १६ : रेज़ा रेज़ा : सलाम मुंबई : दिलशाद शब्बीर शैख़ 
गीत अतीत १७ - रिश्ता - लाली की शादी में लड्डू दीवाना - गुलाम मोहम्मद खावर 
गीत अतीत १८ - जियो रे बाहुबली - संजीव चिमाल्गी 
गीत अतीत १९ - ओ रे कहारों - कल्पना पटवारी 
गीत अतीत २० - लॉस्ट विथआउट यू  
गीत अतीत २१ - जाने क्या हो गया - देश दीपक
गीत अतीत २२ - इश्क ने ऐसा शंख बजाया - लव यू फॅमिली 
गीत अतीत २३ - बुरी बुरी (डियर माया)
गीत अतीत २४ - बनजारा (सुदीप जयपुरवाले )
गीत अतीत २५ - कहना ही क्या (बॉम्बे)
गीत अतीत २६ : तेरी ज़मीन (राग देश)
गीत अतीत २७ : चढ़ता सूरज (इंदु सरकार)
गीत अतीत २८ : बखेड़ा /हंस मत पगली (टॉयलेट एक प्रेम कथा )
गीत अतीत २९ - बर्फानी - ओरुनिमा भट्टाचार्य 
गीत अतीत ३० - बावली बूच (लाल रंग)

Tuesday, September 19, 2017

अभिमन्यु अनत की लघुकथा 'रंग'

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में कुणाल शर्मा की लघुकथा निशक्त घुटने का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार श्री अभिमन्यु अनत की एक लघुकथा रंग जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

"रंग" का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 35 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।




भारतीय साहित्य अकादमी के मानद महत्तर सदस्य (ऑनरेरी फ़ैलो) श्री अभिमन्यु अनत मॉरिशस के प्रसिद्ध साहित्यकार और चित्रकार हैं। वे कविता, उपन्यास, निबंध, नाटक आदि विधाओं के लिये प्रसिद्ध हैं। अनत जी का जन्म 9 अगस्त 1937 को हुआ था। अभिमन्यु अनत का साहित्य अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में सम्मलित है। भारत और मॉरिशस में उन पर अनेक शोधकार्य किए जा चुके हैं। उनकी रचनाओं का अनुवाद अंग्रेज़ी, और फ्रेंच सहित विश्व की अनेक भाषाओं में किया जा चुका है।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"लेकिन साहब, मैंने तरबूज नहीं चुराया। आप चोर पहचानने में भूल कर रहे हैं!”
(अभिमन्यु अनत कृत "रंग" से एक अंश)


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#16th Story, Rang: Abhimanyu Unnuth / Hindi Audio Book 2017/16. Voice: Anurag Sharma

Monday, September 18, 2017

फ़िल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड ०७ || ऋषिकेश मुखर्जी

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 07
Hrishikesh Mukherjee

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के छठे एपिसोड में सुनिए कहानी अद्भुत ऋषिकेश मुख़र्जी की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -
किशोर कुमार
शैलेन्द्र 
संजीव कुमार 
आनंद बक्षी
सलिल चौधरी 
नूतन 

Sunday, September 17, 2017

भैरवी दादरा : SWARGOSHTHI – 335 : BHAIRAVI DADARA




स्वरगोष्ठी – 335 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी - 2 : भैरवी दादरा

उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का गाया दादरा जब मन्ना डे ने दुहराया- “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...”




उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ
मन्ना डे
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक में हम ‘आफ़ताब-ए-मौसिकी’ के खिताब से नवाज़े गए उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। साथ ही उनका गाया भैरवी का एक दादरा- “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...” और इसी ठुमरी का पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में फिल्म “मंज़िल” में किये गए रोचक उपयोग की चर्चा करेंगे। यह दादरा 1960 में प्रदर्शित, देव आनन्द, नूतन और महमूद अभिनीत फिल्म ‘मंज़िल’ में संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने पहले दादरा ताल में और अन्त में तीनताल में प्रयोग किया था।


भैरवी दादरा : “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...” : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ
भैरवी दादरा : “बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी...” : मन्ना डे : फिल्म – मंज़िल




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 335वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।






1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह कौन सा राग है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस फिल्मी पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 23 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 337वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 333वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वर में प्रस्तुत राग झिझोटी की ठुमरी का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग - झिझोटी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल - सोलह मात्रा का तिलवाड़ा अथवा जत ताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – उस्ताद अब्दुल करीम खाँ

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस दूसरी कड़ी में आपने राग भैरवी के दादरा का रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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