Saturday, September 16, 2017

चित्रकथा - 36: हाल के फ़िल्मी गीतों में शास्त्रीय संगीत की छाया

अंक - 36

हाल के फ़िल्मी गीतों में शास्त्रीय संगीत की छाया


"साजन आयो रे, सावन लायो रे..." 




एक ज़माना था जब हिन्दी फ़िल्मी गीतों में शास्त्रीय रागों का समावेश होता था। राग आधारित रचनाओं ने उन फ़िल्मों के ऐल्बमों के स्तर को ही केवल उपर नहीं उठाया बल्कि सुनने वालों को भी मंत्रमुग्ध कर दिया। फिर धीरे धीरे बदलते समय के साथ-साथ फ़िल्मी गीतों का चदल बदला; पाश्चात्य संगीत उस पर हावी होने लगा और 80 के दशक के आते-आते जैसे शास्त्रीय संगीत फ़िल्मी गीतों से पूरी तरह से ग़ायब ही हो गया। फिर भी समय-समय पर फ़िल्म की कहानी, चरित्र और ज़रूरत के हिसाब से भारतीय शास्त्रीय संगीत आधारित रचनाएँ हमारी फ़िल्मों में आती रही हैं। आज के दौर की फ़िल्मों में भी कई गीत शास्त्रीय संगीत की छाया लिए होते हैं। भले इनमें रागों का शुद्ध रूप से प्रयोग ना हो, लेकिन एक छाया उनमें ज़रूर होती है। आज ’चित्रकथा’ के इस अंक में हम नज़र डालेंगे हाल के कुछ बरसों में बनने वाली फ़िल्मों के उन गीतों पर जिनमें भारतीय शास्त्रीय संगीत की छाया दिखाई देती है। इस लेख को तैयार करने में कृष्णमोहन मिश्र जी का विशेष योगदान रहा है।




र्ष 2015 में एक फ़िल्म आई थी ’दम लगा के हइशा’ जिसके संगीतकार थे अनु मलिक। इस फ़िल्म में एक गीत है "ये मोह मोह के धागे, तेरी उंगलियों से जा उलझे"। इसके दो संस्करण हैं, एक मोनाली ठाकुर की आवाज़ में और दूसरा पापोन का गाया हुआ है। यह गीत शास्त्रीय संगीत की छाया लिए है जिसे लिखा है वरुण ग्रोवर ने। दोनों संस्करण अपनी अपनी जगह सुन्दर है, एक तरफ़ मोनाली की सुमधुर आवाज़ तो दूसरी तरफ़ पापोन का कशिश भरा अंदाज़। अनु मलिक ने हमेशा मेलडी प्रधान गीतों की रचना की है, यह गीत भी उन्हीं में से एक है और निस्संदेह उनके संगीत सफ़र की उत्कृष्ट रचनाओं में से एक है। इस गीत की शुरुआत स्पष्ट यमन राग से होती है, किन्तु शीघ्र ही दोनों मध्यम स्वर लगा दिया गया है, इसीलिए यह यमन कल्याण और बाद में पूरिया धनाश्री की अनुभूति कराता है। अनु मलिक के संगीत में ढल कर 2017 की एक चर्चित फ़िल्म आई ’बेगम जान’। इस फ़िल्म के ऐल्बम में एक होली गीत है "होली खेले बृज की हर बाला" जिसे श्रीया घोषाल और अनमोल मलिक ने गाया है। शास्त्रीय संगीत आधारित यह नृत्य प्रधान गीत निस्संदेह एक अरसे के बाद आने वाले स्तरीय होली गीतों में से एक है। जहाँ तक राग की बात है, इस गीत में राग सारंग का प्रकार अनुभव किया जा सकता है। श्रेया की मधुर आवाज़ और अनमोल के रैप शैली के अन्तरे गीत को मज़ेदार बनाते हैं।

वर्ष 2016 में फ़िल्म आई थी ’रिबेलियस फ़्लावर’ जो ओशो के शुरुआती जीवन की कहानी पर आधारित है। फ़िल्म के संगीतकार हैं अमानो मनीष और गीतकार हैं जगदीश भारती। इस फ़िल्म में गायिका प्राचि दुबाले की आवाज़ में "काहे व्याकुल भये रे मनवा" दर्द के रंग में रंगी एक शास्त्रीय संगीत आधारित रचना है। यह एक पार्श्व गीत है और दृश्य में बैलगाड़ी में जा रहे हैं राजा, उसकी माँ और उसका नाना। नाना को दिल का दौरा पड़ा है और वो अपनी अन्तिम साँसे ले रहे हैं। गीत के बोल भी इस सिचुएशन को कॉम्प्लिमेन्ट कर रहे हैं जब जगदीश भारती लिखते हैं, "कौन रोक पाया है मुक्त पवनवा"। गीत के संगीत संयोजन में बाँसुरी और तबले का सुन्दर प्रयोग है और प्राचि दुबाले की आवाज़ में वह दर्द है जिसकी इस गीत को ज़रूरत थी। इस गीत में राग भैरव और राग कलिंगड़ा दोनों का अनुभव हो रहा है। दोनों ही रागों में एक समान स्वर ही लगते हैं। अन्तर बहुत मामूली है। 2016 के अप्रैल में अंग्रेज़ी शीर्षक वाली एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी ’दि ब्लुबेरी हंट’ जिसमें नसीरुद्दीन शाह ने अभिनय किया था। फ़िल्म के संगीतकार हैं परेश कामत और नरेश कामत। ’रिबेलियस फ़्लावर’ की तरह ’दि ब्लुबेरी हंट’ को भी व्यावसायिक सफलता नहीं मिली, लेकिन दोनों फ़िल्मों की ख़ास बात यह रही कि इनके गाने बहुत ही सुरीले, भावुक और कर्णप्रिय रहे। परेश-नरेश के संगीत निर्देशन में गायिका तत्व कुंडलिनी ने एक शास्त्रीय आधारित रचना को गाया है जिसके बोल हैं “सजनवा, कैसी ख़ुमारी छायी बलमवा”। राग भैरवी की छाया लिए इस गीत में इसके गीतकार सौम्या ने भी आवाज़ मिलाई है। गीत के बोलों को शास्त्रीय अंदाज़ में गाया गया है जबकि संगीत संयोजन पूरी तरह से पाश्चात्य शैली का है। इस तरह से यह फ़्युज़न का उदाहरण है। अन्तरे की पंक्ति "अंधियारी रतिया, दिन उजियारा, पी गए हम तो इस्क का प्याला..." हमें "रात उजियारी दिन अंधेरा है, तू जो सजन नहीं मेरा है" गीत की याद दिला जाती है। कुल मिला कर एक सुन्दर रचना है पर मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि अगर पाश्चात्य संगीत की जगह भारतीय वाद्यों के प्रयोग से इसे पूर्णत: शास्त्रीय संगीत आधारित रचना के रूप में पेश किया जाता तो इसका स्तर कई गुणा बढ़ जाता। शायद आज की पीढ़ी को अपील करवाने के उद्देश्य से फ़्युज़न को चुना गया होगा!

2016 के मई में एक फ़िल्म आई थी ’बुड्ढा इन ए ट्रैफ़िक जैम’। इस फ़िल्म का गीत-संगीत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी है। पल्लवी जोशी की आवाज़ में "चन्द रोज़ और मेरी जाँ चन्द रोज़..." एक अनूठी रचना है। फ़िल्मी गीत की प्रचलित शैली से हट कर फ़ैज़ की इस शायरी को क्या ख़ूब अंजाम दिया है संगीतकार रोहित शर्मा ने और पल्लवी जोशी ने भी क्या ख़ूब निभाया है। राग बिहाग की छाया लिए इस गीत के पार्श्व में केवल हारमोनियम/सारंगी की मृदु ध्वनियों पर पल्लवी की साफ़ उचारण लिए फ़ैज़ के ये शेर सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे हम किसी मुशायरे में पहुँच गए हैं। "चन्द रोज़ और मेरी जान फ़क़त चन्द ही रोज़, ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम, और कुछ देर सितम सह लें तड़प लें रो लें, अपने अज़दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम..."। शास्त्रीय गायन की छाया लिए पल्लवी जोशी की अदायगी वाक़ई कमाल की है। जी हाँ, ये वो ही पल्लवी जोशी हैं जिन्हें आप बरसों पहले दूरदर्शन के धारावाहिकों में देखा करते थे। 80 के दशक में मजरूह सुल्तानपुरी ने फ़ैज़ के इसी नज़्म की पहली पंक्ति का इस्तमाल ’सितम’ फ़िल्म के नग़में "चन्द रोज़ और मेरी जान चन्द रोज़" में किया था जिसे किशोर और लता ने गाया था। ख़ैर, वापस आते हैं 2016 में। अध्ययन सुमन अभिनीत फ़िल्म ’इश्क़ क्लिक’ में एक गीत है "का देखूँ मैं चाँद पिया रे, तू जो नज़र ना आए" जो राग खमाज पर आधारित रचना है। इस गीत के तीन संस्करण हैं, पहला संस्करण है अमानत अली ख़ान और अनामिका की आवाज़ों में। कम्पोज़िशन में फ़्युज़न है और भारतीय ध्वनियों को सिम्फ़नी जैसे इन्टरल्युड्स में ढाला गया है। दूसरे संस्करण में अनामिका के साथ हैं अजय जैसवाल। तीसरा संस्करण है अनामिका और अविनाश की आवाज़ों में। यूं तो तीनों संस्करणों की धुन और संयोजन एक जैसा ही है, लेकिन तीन अलग गायकों के अलग अंदाज़ और आवाज़ ने तीन अलग तरह का समा बांधा है। यह कहना मुश्किल है कि अमानत, अविनाश और अजय में कौन श्रेष्ठ हैं। तीनों ने अपने अपने संस्करण को बख़ूबी निभाया है। गायिका अनामिका सिंह ने अच्छा साथ निभाया है। 2016 की एक चर्चित फ़िल्म थी ’मिर्ज़्या’ जिसमें अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन कपूर को लौंच किया गया। गुलज़ार के गीतों को स्वरबद्ध किया था शंकर अहसान लॉय ने। शास्त्रीय गायन के लौह स्तंभ पंडित अजय चक्रवर्ती को कौन नहीं जानता! उनकी पुत्री कौशिकी चक्रवर्ती भी एक सशक्त शास्त्रीय गायिका हैं और इस फ़िल्म में उनकी गाई रचना ने फ़िल्म के ऐल्बम को एक बहुत ऊँचा स्तर दे दिया है। "कागा रे कागा पिया की ख़बर सुनाना, प्यासी ना मर जाए कोई चोंच में जल भर लाना" एक उत्कृष्ट रचना है जो कौशिकी की विशुद्ध शास्त्रीय संगीत पर दक्षता का उदाहरण है। इस गीत में राग बसन्त एकदम मुखर है। परंतु इस गीत के आरम्भिक और अन्तराल संगीत से राग का स्वरूप बिलकुल स्पष्ट नहीं होता। शंकर-अहसान-लॉय ने इन्टरल्युड में वेस्टर्ण क्लासिचल का टच दिया है जिससे यह एक फ़्युज़न कम्पोज़िशन बन गया है। इसी साल अक्टुबर के दूसरे सप्ताह रिलीज़ हुई थी ’बे‍ईमान लव’। रजनीश दुग्गल और सनी लीओन अभिनीत इस फ़िल्म के ऐल्बम की शुरुआत होती है "रंगरेज़ा" गीत से जिसे असीस कौर ने गाया है। रक़ीब ख़ान का लिखा और असद ख़ान का स्वरबद्ध किया यह गीत इस दौर की उत्कृष्ट रचनाओं में से एक है। "प्रीत की धानी रंग से चुनरिया रंग डाला रंगरेज़ रे, मैं उस राह पे चल ही पड़ी जिस राह से था परहेज़ रे, ओ रंगरेज़ा, तू तो निकला बड़ा ही तेज़ रे..."। इस गीत की म्युज़िक प्रोग्रामिंग् की है शराज़ ख़ान और मार्क ने, इन्टरल्युड में रॉक शैली में लाइव गीटार्स पर उंगलियाँ फेरीं केबा और संजीव ने। साथ में अतिरिक्त गायन किया शदाब फ़रीदी ने। सनी लीओन पर फ़िल्माये गए गीतों की बात करें तो शायद यह सबसे उम्दा गीत रहा है। भारतीय शास्त्रीय, सूफ़ी और रॉक के फ़्युज़न से सुसज्जित इस गीत का एक पुरुष संस्करण भी है यासिर देसाई की आवाज़ में और यह संस्करण भी उतना ही सुन्दर है। यासिर ने एक हस्की आकर्षक आवाज़ में गीत को अंजाम दिया है। इस गीत में हमें राग बिलावल की छाया मिलती है।

2017 में भी शास्त्रीय संगीत की छाया लिए कुछ फ़िल्मी गीत बने हैं। आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर अभिनीत फ़िल्म ’ओके जानु’ एक चर्चित फ़िल्म रही। गुलज़ार और ए. आर. रहमान का साथ इस फ़िल्म के गीत-संगीत में हुआ और कुछ सुन्दर रचनाएँ हमें सुनने को मिली। जोनिता गांधी और नकश अज़ीज़ की आवाज़ों में "साजन आयो रे, सावन लायो रे" एक अद्‍भुत शास्त्रीय संगीत आधारित वर्षाकालीन रचना है जिसमें राग दरबारी कान्हड़ा की छाया मिलती है। गुलज़ार साहब को इसमें बहुत कुछ लिखने का मौका तो नहीं मिला, पर दो पंक्तियों का यह गीत इससे जुड़े सभी कलाकारों की प्रतिभा के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। इसी तरह से गुलज़ार साहब का ही लिखा और शाशा तिरुपति का गाया "सुन भँवरा" भी एक शास्त्रीय संगीत आधारित रचना है, जो लेखन, संगीत और गायकी की दृष्टि से एक उत्कृष्ट रचना है। यह गीत आधारित है राग आशा-मांड पर। इन दो गीतों को सुन कर जैसे एक उम्मीद जाग उठा है कि अच्छे गीत-संगीत का दौर अभी समाप्त नहीं हुआ है। 2017 के फ़रवरी के अन्तिम सप्ताह में रिलीज़ होने वाली फ़िल्म ’वेडिंग् ऐनिवर्सरी’ के संगीतकार अभिषेक राय ने इस ऐल्बम में अच्छा काम किया है। राशिद ख़ाँ की आवाज़ में "आए बिदेसिया मोरे द्वारे, हम तो अपनी सुध-बुध हारे" शास्त्रीय संगीत आधारित गीत होते हुए भी पाश्चात्य संगीत का फ़्युज़न है। मानवेन्द्र का लिखा यह गीत इस कमचर्चित फ़िल्म का एक मुख्य आकर्षण है। उस पर नाना पाटेकर का अभिनय। गीत के इन्टरल्युड में अंग्रेज़ी बोल "द स्ट्रेन्जर कम्स नॉकिंग् ऑन द डोर" फ़्युज़न ईफ़ेक्ट को सहारा देते हैं। भूमि त्रिवेदी का गाया "आए सैयां मोरे द्वारे" की धुन "आए बिदेसिया" वाली ही है। भूमि ने एक बार फिर इस शास्त्रीय रचना में कमाल करती हैं। इन दोनों रचनाओं में राग मिश्र भैरवी महसूस की जा सकती है। स्वरा भास्कर अभिनीत ’अनारकली ऑफ़ आरा’ एक कामोत्तेजक गीतों की गायिका की कहानी है। इसलिए ज़ाहिर सी बात है कि फ़िल्म के संगीत में लोक शैली का रंग है और साथ ही गीतों के बोल ऐसे हैं जो परिवार के साथ मिल बैठ कर नहीं सुने जा सकते। रोहित शर्मा स्वरबद्ध इस फ़िल्म के गीतों में दोहरे अर्थ की पंक्तियाँ भर भर कर डाली गई हैं। स्वाति शर्मा, पावनी पांडे और इन्दु सोनाली के गाए इस तरह के गीतों के अलावा एक स्तरीय गीत भी है रेखा भारद्वाज की आवाज़ में जिसमें शास्त्रीय संगीत की छटा बिखरती है। यह एक राग किरवानी आधारित ठुमरी है "बदनाम जिया दे गारी, बड़ी ढीठ रे प्रीत तिहारी, जगाए रैन सारी साजना, तू ने ही मोहे बरबाद किया सोना" जिसमें उस नर्तकी के दर्द का वर्णन है। कम्पोज़िशन मेलडी प्रधान होते हुए दर्दीला है। उस पर वायलिन, सितार, सारंगी और तबले के संगीत ने इसे एक आकर्षक गीत बना दिया है। फ़िल्म ’पूर्णा’ के संगीतकार हैं सलीम-सुलेमान। राज पंडित और विशाल ददलानी की आवाज़ों में "है पूरी क़ायनात तुझमें कहीं" बाहरी रूप से एक पाश्चात्य रचना प्रतीत होने के बावजूद शास्त्रीय संगीत की छाया भी मिलती है। सॉफ़्ट रॉक के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत और भारतीय वाद्यों (सितार) के फ़्युज़न से और राज पंडित के शास्त्रीय अंदाज़ में गायकी ने इसे एक ख़ूबसूरत जामा पहनाया है। विशाल ददलानी के सशक्त सहयोग ने भी गीत में चार चाँद लगाया है। अमिताभ भट्टाचार्य के लिखे इस गीत के संगीत संयोजन में प्रमुख भूमिकाएँ रहीं नाइज़ेल डी’लिमा (गीटार), चिराग कट्टी (सितार), रुशाद मिस्त्री (बास), सलीम मर्चैन्ट और जर्विस मेनेज़ेस (की-बोर्ड), दर्शन दोशी (ड्रम्स) और सुलेमान मर्चैन्ट (ज़ेन ड्रम) की। इस गीत में राग सारंग का एक प्रकार नज़र आता है। इसी फ़िल्म में एक और गीत है "बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए"। इस कालजयी रचना को फिर से गाना साहस का काम है और अरिजीत सिंह ने इस दर्द भरे गीत को बेहद सुन्दरता से गाया है। सलीम-सुलेमान ने इस गीत का भार अरिजीत पर डाल कर ग़लती नहीं की और अरिजीत ने भी अपना ज़िम्मा निभाया। राग मिश्र भैरवी पर आधारित इस गीत में अपने सीधे सच्चे शास्त्रीय हरकतों से अरिजीत ने जान फूँक दी है।

’बाहूबली 2’ इस साल की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही। इस फ़िल्म में एक अरसे के बाद मधुश्री की मधुर आवाज़ में "कान्हा सो जा ज़रा" को सुनना एक अत्यन्त सुखद अनुभूति है। शास्त्रीय मांड शैली में स्वरबद्ध यह गतिमय लोरी लोरी से ज़्यादा होली गीत प्रतीत होता है, लेकिन बाँसुरी, वीणा और मृदंग की धुनों से सुसज्जित यह गीत इतना कर्णप्रिय है कि गीत के शुरु से ही मन मोह लेता है। कोरस का भी बहुत सुन्दर योगदान रहा है इस गीत में। मनोज मुन्तशिर के बोलों को धुनों में पिरोया है एम. एम. क्रीम ने जिन्होंने जब भी किसी फ़िल्म में संगीत दिया, बस मेलडी ही उत्पन्न हुई। इस वर्ष मधुश्री की कुछ और गीत भी सुनाई दिए हैं। जून के दूसरे सप्ताह प्रदर्शित हुई थी फ़िल्म ’लव यू फ़ैमिली’। संगीतकार रॉबी बादल के संगीत में गीतकार तनवीर ग़ाज़ी का लिखा "इश्क़ ने ऐसा शंख बजाया, गूंज उठी तन्हाई मेरी" मधुश्री और सोनू निगम की आवाज़ों में एक बेहद कर्णप्रिय रचना है जिसमें राग यमन कल्याण की छाया साफ़ महसूस की जा सकती है। पूरे दस बरस बाद सोनू निगम और मधुश्री ने साथ में कोई डुएट गाया है। इससे पहले 2008 में ’जोधा अकबर’ में इनका गाया "इन लम्हों के दामन में" गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था। अभी हाल ही में आई फ़िल्म ’मेरी प्यारी बिन्दु’। आयुष्मान खुराना - परिनीति चोपड़ा अभिनीत इस फ़िल्म में सचिन-जिगर ने संगीत दिया और गीत लिखे कौसर मुनीर और प्रिया सरय्या ने। अन्य कई अभिनेताओं की तरह परिनीति ने भी अपनी गायन क्षमता का पहली बार परिचय दिया इस फ़िल्म में। यह ग़ज़ल है "माना के हम यार नहीं, लो तय है के प्यार नहीं"। कौसर मुनीर ने इस ग़ज़ल से वापसी की है अर्थपूर्ण बोलों वाले गीतों की तरफ़। परिनीति ने आशातीत गायकी का परिचय देते हुए इस शास्त्रीय संगीत की छाया में स्वरबद्ध रचना को बेहद सुन्दर तरीक़े से गाया है। तेज़ रफ़्तार का कोई गीत होता तो बात अलग थी, लेकिन राग खमाज पर आधारित ऐसे ठहराव वाले गीत में सुरों को संभाल कर गाना बेहद मुश्किल काम है। इस ग़ज़ल का एक युगल संस्करण भी है जिसे परिनीति ने सोनू निगम के साथ मिल कर गाया है। भारतीय वाद्यों के प्रयोग से इस ग़ज़ल को चार चाँद लग गया है। 2017 के मई के अन्तिम सप्ताह में प्रदर्शित होने वाली सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म रही सचिन तेन्दुलकर की बायोपिक ’सचिन- ए बिलियन ड्रीम्स’। इस फ़िल्म में गीतों की ज़्यादा गुंजाइश नहीं थी। ए. आर. रहमान और इरशाद कामिल ने तीन गीत रचे हैं। पहला गीत तो हमें सीधा क्रिकेट स्टेडियम में पहुँचा देता है। "सचिन सचिन" का शोर, और ड्रम्स के बीट्स ने इस गीत को एक पावरफ़ुल ट्रैक बना दिया है। इस गीत की ख़ासियत यह है कि इसके चौदह संस्करण बने हैं अलग अलग भारतीय भाषाओं में। ऐसा पिछली बार शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म ’फ़ैन’ में देखा गया था। ख़ैर, इस गीत में कैली ने रैप किया है और सुखविन्दर सिंह की बुलन्द आवाज़ खुल कर आई है जैसा उन्होंने "चक दे इंडिया" में गाया था। शास्त्रीय संगीत की छोटी-छोटी बारीकियों को क्या ख़ूब उभारा है उन्होंने। इस तरह से आज भी फ़िल्मी गीतों में यदा कदा शास्त्रीय संगीत की छाया मिल ही जाती है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब जब संगीतकारों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत का दामन पकड़ा, तब तब सुन्दर सुमधुर कर्णप्रिय रचनाएँ बन कर तैयार हुईं।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Friday, September 15, 2017

गीत अतीत 30 || हर गीत की एक कहानी होती है || बावली बूच || लाल रंग || दुष्यंत || रणदीप हूडा

Geet Ateet 30
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Bawali Booch
Laal Rang
Dushyant
Also featuring Mathias Duplessy & Vikas Kumar


"जो पहला ड्राफ्ट मैंने लिखा था, उसमें बावली बूच  शब्द नहीं था " -    दुष्यंत 

रणदीप हूडा अभिनीत फिल्म लाल रंग पिछले साल प्रदर्शित हुई थी और अपने अलग विषय चयन के लिए काफी चर्चित हुई थी, फिल्म का एक गीत 'बावली बूच' श्रोताओं को खूब पसंद आया था, आज गीत अतीत पर इस गीत के गीतकार दुष्यंत हैं हमारे साथ इस गीत की कहानी लेकर. दोस्तों ये गीत अतीत के इस पहले सीसन का अंतिम एपिसोड है, उम्मीद है ३० गीतों की ३० दिलचस्प कहानियों का आपने भरपूर आनंद लिया होगा... लीजिये आज के अंतिम एपिसोड में सुनिए, कहानी बावली बूच की, गीतकार दुष्यंत की जुबानी....प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)
रिश्ता (लाली की शादी में लड्डू दीवाना)
जियो रे बाहुबली (बाहुबली 2 द कांकलूशन)
ओ रे कहारों (बेगम जान)
लॉस्ट विथआउट यू (हाफ गर्लफ्रेंड)  
जाने क्या हो
इश्क ने ऐसा शंख बजाया (लव यू फैमिली)
बुरी बुरी (डिअर माया)
बनजारा (मॉम) 
कहना ही क्या (बोम्बे) 
तेरी ज़मीन (राग देश)
चदता सूरज (इंदु सरकार)
बखेड़ा /हंस मत पगली (टॉयलेट एक प्रेम कथा )
बर्फानी (बबुमोशाय बन्दूकबाज़)

Tuesday, September 12, 2017

निशक्त घुटने (लघुकथा) - कुणाल शर्मा

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन के अवसर पर आपने अनुराग शर्मा के स्वर में मुंशी प्रेमचंद की भावमय कथा राष्ट्र का सेवक का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं युवा लेखक कुणाल शर्मा की एक लघुकथा निशक्त घुटने जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रस्तुत कथा का गद्य "सेतु द्वैभाषिक पत्रिका" पर उपलब्ध है। "निशक्त घुटने" का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 56 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।




27 अप्रैल 1981 को अम्बाला (हरियाणा) में जन्मे कुणाल शर्मा कहानी, लघुकथा, तथा कविताएँ लिखते हैं।

एम. ए. (अंग्रेजी) बी.एड शिक्षित कुणाल आजकल एक सरकारी विद्यालय में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"लेकिन पिताजी, आपके घुटनों का दर्द भी तो बढ़ता जा रहा है!”
 (कुणाल शर्मा कृत "निशक्त घुटने" से एक अंश)


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(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
निशक्त घुटने MP3

#15th Story, Rashtra Ka Sewak: Kunal Sharma / Hindi Audio Book 2017/15. Voice: Anurag Sharma

Monday, September 11, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 06 || नूतन

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 06
Nutan 

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के छठे एपिसोड में सुनिए कहानी लाजवाब बेमिसाल नूतन की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -
किशोर कुमार
शैलेन्द्र 
संजीव कुमार 
आनंद बक्षी
सलिल चौधरी 

Sunday, September 10, 2017

ठुमरी झिझोटी : SWARGOSHTHI – 334 : THUMARI JHINJHOTI




स्वरगोष्ठी – 334 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी - 1 : “पिया बिन नाहीं आवत चैन...”

जब सहगल ने उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी ठुमरी को अपना स्वर दिया




उस्ताद अब्दुल करीम खाँ
कुन्दनलाल सहगल
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की इस पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज हम आपके लिए फिल्म देवदास की जिस ठुमरी को लेकर उपस्थित हुए हैं वह 1936 में हिन्दी भाषा में निर्मित फिल्म देवदास की है। राग झिंझोटी की यह ठुमरी 1925 -26 में महाराज कोल्हापुर के राजगायक रहे उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में है। आज के अंक में आप खाँ साहब की आवाज़ में पारम्परिक और हिन्दी फिल्मों के यशस्वी गायक और नायक कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में फिल्मी संस्करण सुनेंगे।


राग - झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म - देवदास 1936
राग - झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ : पारम्परिक ठुमरी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 334वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी अथवा दादरा गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह कौन सा राग है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस फिल्मी पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 16 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 336वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 332वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथियों द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत एक धुन का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, वाद्य – शहनाई, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, वादक – उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हो चुकी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की यह पहली कड़ी थी। आज की इस कड़ी में आपने राग झिंझोटी की ठुमरी का रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, September 9, 2017

चित्रकथा - 35: शायर व गीतकार ज़फ़र गोरखपुरी का फ़िल्म संगीत में योगदान

अंक - 35

शायर व गीतकार ज़फ़र गोरखपुरी का फ़िल्म संगीत में योगदान


"समझ कर चाँद जिसको आसमाँ ने दिल में रखा है..." 




82 बरस की उम्र में लम्बी बीमारी के बाद शायर व गीतकार ज़फर गोरखपुरी ने 29 जुलाई 2017 की रात मुम्बई में अपने परिवार के बीच आखिरी सांस ली। गोरखपुर की सरज़मी पर पैदा ज़फर गोरखपुरी की शायरी उन्हें लम्बे समय तक लोगों के दिल-ओ-दिमाग में ज़िंदा रखेगी। ज़फ़र साहब उर्दू के उम्दा शायर तो थे ही, साथ ही कुछ हिन्दी फ़िल्मों के लिए गाने भी लिखे। आइए फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत पार आधारित स्तंभ ’चित्रकथा’ में आज ज़िक्र छेड़ें उन गीतों की जिन्हें ज़फ़र गोरखपुरी ने लिखा है। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है ज़फ़र साहब की पुण्य स्मृति को।



Zafar Gorakhpuri (5 May 1935 - 29 July 2017)

फर गोरखपुरी को श्रद्धांजलि देते हुए साहित्यकार दयानंद पाण्डेय अपनी वाल पर लिखते हैं कि ‘अजी बड़ा लुत्फ था जब कुंवारे थे हम तुम, या फिर धीरे धीरे कलाई लगे थामने, उन को अंगुली थमाना ग़ज़ब हो गया! जैसी क़व्वालियों की उन दिनों बड़ी धूम थी। उस किशोर उम्र में ज़फर की यह दोनों कव्वाली सुन जैसे नसे तड़क उठती थी, मन जैसे लहक उठता था।’ लेकिन ज़फर के साथ ऐसे अनुभव का नाता नई पीढ़ी से भी जुड़ा जब शाहरूख ख़ान पर फिल्माया फिल्म बाज़ीगर का गीत ‘किताबें बहुत सी पढ़ीं होंगी तुमने’ गुनगुनाते हुए बड़ी हुई। ज़फर गोरखपुरी को मुम्बई के चार बंगला अंधेरी पश्चिम के कब्रिस्तान में 30 जुलाई को दोपहर डेढ़ बजे सुपुर्द-ए-खाक किया गया और इसी के साथ अन्त हुआ एक और अदबी शायर का। 

ज़फ़र गोरखपुरी बासगांव तहसील के बेदौली बाबू गांव में 5 मई 1935 को जन्मे। प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त करने के बाद उन्होंने मुंबई को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। मुम्बई वे मजदूरी करने गए थे। बताते हैं कि पढ़ाई लिखाई तो ज्यादा थी नहीं, घर चलाने के लिए पिता ने उन्हें मुम्बई बुला लिया जहाँ उन्होंने मिट्टी तक ढोया। मज़दूरी करते हुए पढ़ाई की, फिर मुम्बई नगर निगम के स्कूल में पढ़ाने भी लगे। शुरूआती दौर में परिवार बच्चे गांव ही रहते थे। तमाम आर्थिक कठिनाइयों के बीच उनकी ख़ुशकिस्मती थी कि उन्हें फ़िराक़ गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, मजाज़ लखनवी और जिगर मुरादाबादी सरीखे शायरों को सुनने और उनसे अपने कलाम के लिए दाद हासिल करने का मौका मिला था। सन 1952 में उन्होंने शायरी की शुरूआत की थी। सिर्फ 22 साल की उम्र में फ़िराक़ साहब के सामने ग़ज़ल पढ़ी, "मयक़दा सबका है सब हैं प्यासे यहाँ मय बराबर बटे चारसू दोस्तो, चंद लोगों की ख़ातिर जो मख़सूस हों तोड़ दो ऐसे जामो-सुबू दोस्तो"। फ़िराक़ साहब ने दाद दी, बल्कि ऐलान किया कि नौजवान बड़ा शायर बनेगा। 

ज़फ़र गोरखपुरी प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े थे। कवि देवमणि पाण्डेय अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं कि फ़िराक़ साहब ने उन्हें समझाया- "सच्चे फ़नकारों का कोई संगठन नहीं होता। वाहवाही से बाहर निकलो।" नसीहत का असर हुआ वे संजीदगी से शायरी में जुट गए। ज़फ़र साहब जब गोरखपुर आते तो डा. अज़ीज़ अहमद को उनकी मेहमान नवाजी का जब-तब मौका मिलता। डा. अज़ीज़ अहमद कहते हैं कि ज़फ़र गोरखपुरी में न केवल विशिष्ट और आधुनिक अंदाज़ था, बल्कि उर्दू ग़ज़ल के क्लासिकल मूड को नया आयाम दिया। हरे भरे खेतों से निकल मुम्बई के कंकरीट के जंगलों में उन्होंने ज़िन्दगी गुज़ारी लेकिन यहां आने के लिए तड़पते रहते थे। उन्हें हदय की बीमारी थी, लेकिन वो तीसरी मंजिल पर रहते थे। हमने कोशिश की उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी उन्हें सम्मानित करे, उनकी आर्थिक मदद करे लेकिन हाकिम-ए-वक्त इर्द-गिर्द रहने वालों को ही मदद मिलती है। आवाम से जुड़ाव की ताज़गी ने उनकी ग़ज़लों को आम आदमी के बीच लोकप्रिय बनाया। एक नई काव्य परम्परा को जन्म दिया। प्राइमरी विद्यालय में शिक्षक के रूप में उन्होंने बाल साहित्य को भी परियों और भूत प्रेत के जादूई एवं डरावने संसार से न केवल बाहर निकाला, बाल साहित्य को सच्चाई के धरातल पर खड़ा करके जीवंत, मानवीय एवं वैज्ञानिक बना दिया। उनकी रचनाएं महाराष्ट्र के शैक्षिक पाठ्यक्रम में पहली से लेकर स्नातक तक के कोर्स में पढ़ाई जाती हैं। बच्चों के लिए उनकी दो किताबें कविता संग्रह ‘नाच री गुड़िया’ 1978 में प्रकाशित हुई जबकि कहानियों का संग्रह ‘सच्चाइयाँ’ 1979 में आया। ज़फ़र गोरखपुरी का पहला संकलन ’तेशा’ (1962), दूसरा ’वादिए-संग’ (1975), तीसरा ’गोखरु के फूल’ (1986), चौथा ’चिराग़े-चश्मे-तर’ (1987), पांचवां संकलन ’हलकी ठंडी ताज़ा हवा’ (2009) प्रकाशित हुई। हिंदी में उनकी ग़ज़लों का संकलन ’आर-पार का मंज़र’ 1997 में प्रकाशित हुई। रचनात्मक उपलब्धियों के लिए ज़फ़र गोरखपुरी को महाराष्ट्र उर्दू आकादमी का राज्य पुरस्कार (1993), इम्तियाज़े मीर अवार्ड (लखनऊ) और युवा-चेतना सम्मान समिति गोरखपुर द्वारा फ़िराक़ सम्मान 1996 में मिला। 1997 में संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा कर कई मुशायरों में हिंदुस्तान का प्रतिनिधित्व किया।

1972 में 37 वर्ष की आयु में ज़फ़र गोरखपुरी ने फ़िल्म जगत में भी अपनी क़िस्मत आज़माई। बी. के. आदर्श निर्मित व अशोक राय निर्देशित डाकू पुतलीबाई के जीवन पर आधारित ’पुतलीबाई’ नामक फ़िल्म में कुल तीन गीत थे। दो गीत अनजान ने लिखे और तीसरे गीत के लिए ज़फ़र साहब को न्योता मिला। संगीतकार जयकुमार के संगीत निर्देशन में ज़फ़र साहब ने एक क़व्वाली लिखी "कैसे बेशर्म आशिक़ हैं आज के, इनको अपना बनाना ग़ज़ब हो गया"। उनकी पहली क़व्वाली ही की तरह यह क़व्वाली भी हिट हो गई भले फ़िल्म ना चल पायी हो। रशीदा ख़ातून और यूसुफ़ आज़ाद की गाई हुई इस क़व्वाली में ज़फ़र गोरखपुरी ने क्या ख़ूब उपमा दी है जब वो लिखते हैं कि "संगदिल पत्थर से ली, ख़ामोशी तसवीर से, कहर तूफ़ानों से मांगा, और ग़ज़ब शम्शीर से, पंछी से दर्द और धरती से सब्र लिया"। साढ़े दस मिनट अवधि की इस क़व्वाली ने युवा वर्ग में उन दिनों तहल्का मचा दिया था, ऐसा उस पीढ़ी के फ़िल्मी गीतों के रसिक बताते हैं। 1976 में ज़फ़र गोरखपुरी को फिर एक बार किसी फ़िल्म में क़व्वाली लिखने का मौक़ा मिला। फ़िल्म थी ’नूर-ए-इलाही’। शेख़ निसार निर्देशित इस फ़िल्म में संगीतकार थे बबलू धीरज। राम भारद्वाज और क़मर शाद के साथ-साथ ज़फ़र साहब को भी फ़िल्म में गीत लिखने का न्योता मिला। इसमें उन्होंने मज़हबी क़व्वाली लिखी "अब दरबार-ए-चिश्तिया में बोलो तो कुछ ज़बान से, है सब कुछ तुम्हे मिलेगा ख़्वाजा के आस्ता से"। यूसुफ़ आज़ाद ही की गाई हुई इस क़व्वाली को जब भी कभी सुनते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे हम ट्रान्स में चले गए हों। "भर भर के अपनी झोली, लौटे हैं सब यहाँ से, परिशा हाल हैं परेशान मिले ख़्वाजा जी, परिशा हाल हैं अजमेरे आले आसरा दीजे"। आज के दौर में "भर दो झोली मेरीऐ मोहम्मद" क़व्वाली को ख़ूब गाया जा रहा है, लेकिन इसी अंदाज़ की यह क़व्वाली ज़फ़र साहब दशकों पहले ही लिख चुके थे।

80 के दशक के शुरु में ही ज़फ़र गोरखपुरी को एक और फ़िल्म में गीत लिखने का मौका मिला। 1981 की यह फ़िल्म थी ’शमा’ जिसके संगीतकार थे उषा खन्ना। यह क़ादर ख़ान निर्मित फ़िल्म थी जिसमें गिरिश कारनाड और शबाना आज़मी ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। फ़िल्म के गाने असद भोपाली और ज़फ़र साहब ने लिखे। पिछली फ़िल्मों में दो क़व्वालियाँ लिखने के बाद अब की बार ज़फ़र साहब ने इस फ़िल्म के लिए एक ग़ज़ल लिखी जिसे लता मंगेशकर ने अपनी मधुर आवाज़ दी। ग़ज़ल के तमाम शेर इस तरह से हैं...

चाँद अपना सफ़र ख़त्म करता रहा, शम्मा जलती रही रात ढलती रही
दिल में यादों के नश्तर से टूटा किए, एक तमन्ना कलेजा मसलती रही।

बदनसीबी शराफ़त की दुश्मन बनी, सज-सँवर के भी दुल्हन ना दुल्हन बनी,
टीका माथे पे एक दाग़ बनता गया, मेहन्दी हाथों से शोले उगलती रही।

ख़्वाब पलकों से गिर कर फ़ना हो गए, दो क़दम चल के तुम भी जुदा हो गए,
मेरी हर एक हँसी आँख से रात दिन, एक नदी आँसुओं की उबलती रही।

सुबह मांगी तो ग़म का अंधेरा मिला, मुझको रोता सिसकता सवेरा मिला,
मैं उजालों की नाकाम हसरत लिए, उमर भर मोम बन कर पिघलती रही।

चाँद यादों की परछाइयों के सिवा कुछ भी पाया ना तन्हाइयों के सिवा,
वक़्त मेरी तबाही पे हँसता रहा, रंग तक़दीर क्या क्या बदलती रही।

इस फ़िल्म के बाद  लगभग बारह साल तक ज़फ़र गोरखपुरी ने कोई भी फ़िल्मी गीत नहीं लिखे। लेकिन 1993 में शाहरुख़ ख़ान की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म के महत्वाकांक्षी गीत-संगीत के लिए संगीतकार अनु मलिक की धुनों पर गाने लिखने के लिए निर्माता गणेश जैन और निर्देशक अब्बास-मस्तान ने ज़फ़र साहब को निमंत्रण दिया। नवाब आरज़ू, रानी मलिक, देव कोहली और गौहर कानपुरी के साथ-साथ ज़फ़र साहब ने भी फ़िल्म के दो गीत लिखे और दोनों ही गीत सुपरहिट हुए। पहला गीत तो ऐसा लगा कि जैसे उपर लिखी ’शमा’ फ़िल्म की उस ग़ज़ल का ही एक्स्टेन्शन हो। विनोद राठौड़ और अलका याज्ञ्निक की आवाज़ों में "समझ कर चांद जिसको आसमाँ ने दिल में रखा है, मेरी महबूब की टूटी हुई चूड़ी का टुकड़ा है"। इससे पहले चाँद की तुलना टूटी हुई चूड़ियों से किसी शायर ने नहीं किया होगा। अच्छी शायरी और अच्छा संगीत ही गीत को कामयाबी की मंज़िल तक पहुँचाती है, और इस गीत ने भी इसी बात को साबित किया। ’बाज़ीगर’ फ़िल्म का ज़फ़र साहब का लिखा दूसरा गीत था "किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुमने, मगर कोई चेहरा भी तुमने पढ़ा है"। आशा भोसले और विनोद राठौड़ का गाया यह गीत भी बेहद मशहूर हुआ और आज भी रेडियो पर अक्सर सुनाई दे जाता है। इस गीत में भले कोई ख़ास शेर-शायरी ना हो, लेकिन एक हिट फ़िल्मी गीत के सारे गुण मौजूद हैं और यही एक सफल फ़िल्मी गीतकार के लक्षण हैं। 

’बाज़ीगर’ के तुरन्त बाद 1994 में ज़फ़र गोरखपुरी के साथ अनु मलिक को फिर एक बार काम करने का मौका मिला। फ़िल्म थी ’ज़ालिम’। अक्षय कुमार की इस फ़िल्म में ज़फ़र साहब का लिखा कुमार सानू व अलका याज्ञ्निक का गाया गीत था "मुबारक हो, मोहब्बत गुनगुनाती है, तुम्हारा दिल धड़कता है, मुझे आवाज़ आती है"। अफ़सोस की बात यह है कि इस गीत को फ़िल्म में नहीं रखा गया था जिस वजह से यह गीत जनता जनार्दन में ख़ास लोकप्रिय नहीं हो सका। 1995 में ज़फ़र साहब और अनु मलिक का एक बार फिर साथ हुआ, इस बार हिट फ़िल्म थी ’गुंडाराज’। इसमें ज़फ़र साहब ने दो हिट गीत लिखे। पहला गीत था "कह दो कह दो दिल की बातें, ऐसा पल फिर हो ना हो, मुझे तुमसे मोहब्बत है मगर मैं कह नहीं सकता, करूँ तो क्या करूँ बोले बिना भी रह नहीं सकता"। कुमार सानू और साधना सरगम के गाए इस गीत के बाद कुमार सानू और अलिशा चिनॉय का गाया इससे भी ज़्यादा हिट गीत रहा "न जाने इक निगाह में क्या ले गया कोई, मेरी तो ज़िन्दगी चुरा ले गया कोई"। यह गीत उस साल के काउन्टडाउन चार्ट्स में अच्छी जगह बना ली थी। ज़फ़र साहब ने जब भी कोई गीत लिखा, उनका लिखा गीत हिट रहा। 1996 में भी संगीत नरेश शर्मा के लिए फ़िल्म ’खिलौना’ के लिए एक गीत लिखा। ’बाज़ीगर’ की तरह इस गीत को विनोद राठौड़ और अलका याज्ञ्निक से गवाया गया और संगीत संयोजन भी कुछ कुछ उसी गीत की तरह रखा गया, लेकिन अफ़सोस कि यह गीत हिट नहीं हुआ। गीत के बोल थे "हम जानते हैं तुम हमें नाशाद करोगे, तोड़ोगे मेरा दिल मुझे बरबाद करोगे, दिल फिर भी तुम्हे देते हैं क्या याद करोगे"। सच ही तो है, ज़फ़र गोरखपुरी को हम कभी भुला नहीं पाएंगे। उनकी शायरी, उनकी ग़ज़लें, क़व्वालियाँ, बच्चों की कविताएँ व कहानियाँ, और फ़िल्मी नग़में, उनकी ये सारी दौलत हमारे पास हैं। वो भले शरीरी रूप से हमारे साथ ना हों, लेकिन अपनी कला के ज़रिए वो हमेशा ज़िन्दा रहेंगे।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Friday, September 8, 2017

गीत अतीत 29 || हर गीत की एक कहानी होती है || बर्फानी || ओरुनिमा भट्टाचार्य || गौरव डगओंकर || ग़ालिब असद भोपाली || नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी

Geet Ateet 29
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Barfani 
Babumoshai Bandookbaaz 
Orunima Bhattacharya
Also featuring Gaurav Dagaonkar, Ghalib Asad Bhopali & Armaan Malik


"जिन एलिमेंट्स की ज़रुरत थी गाने में , मेरी सर्दी , गले की खर्राश भी  उसमें सही काम कर गयी..." -    ओरुनिमा भट्टाचार्य 

अलौकिक माधुर्य और रहस्यमयी उत्तेजना का पुट है आज के गीत अतीत गीत में. ताज़ा प्रदर्शित फिल्म "बाबुमोशाय बन्दूक्बाज़" का ये मीठी मीठी सिहरन से भरपूर गीत है जिसका नाम है बर्फानी. गौरव डगओंकर द्वारा स्वरबद्ध और ग़ालिब असद भोपाली के लिखे इस गीत का पुरुष संस्करण जहाँ अरमान मालिक ने गाया है वहीँ महिला संस्करण को आवाज़ दी है हमारी आज की मेहमान ओरुनिमा भट्टाचार्य ने. सुनिए ओरुनिमा से बर्फानी की कहानी. प्ले पर क्लिक करें और सुने अपने दोस्त अपने साथी सजीव सारथी के साथ आज का एपिसोड.



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
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इश्क ने ऐसा शंख बजाया (लव यू फैमिली)
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बनजारा (मॉम) 
कहना ही क्या (बोम्बे) 
तेरी ज़मीन (राग देश)
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बखेड़ा /हंस मत पगली (टॉयलेट एक प्रेम कथा )

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