Saturday, December 12, 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 08: आशा भोसले


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 08
 
आशा भोसले 

यंत्रणा इतनी बढ़ गई कि दोनों बच्चों और गर्भ में पल रहे तीसरे सन्तान को लेकर आशा ने अपना ससुराल हमेशा के लिए छोड़ दिया


’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है फ़िल्म जगत सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोसले पर।
  

आशा भोसले एक ऐसा नाम है जो किसी परिचय का मोहताज नहीं। उनकी अपार सफलता और लोकप्रियता का आलम यह है कि आज अपने आठवें दशक में भी वो बच्चों, युवाओं और बड़ों, सभी में समान रूप से प्रिय हैं। हर दौर के श्रोताओं को अब तक वो अपनी आवाज़ और गीतों की ओर आकृष्ट कर रखी हैं, ऐसे मिसाल कम ही देखने को मिलते हैं। आज आशा भोसले की अपार सफलता को देख कर शायद लोग उनके शुरुआती जीवन और संघर्ष को अक्सर भूल जाते हैं। आज की पीढ़ी को तो शायद पता भी नहीं होगा कि आशा भोसले किन अंगारों पर चल कर आशा भोसले बनी हैं। आज वही दास्तान पेश है। आशा का जन्म 8 सितंबर 1933 को हुआ था, यानी कि वो बड़ी बहन लता से चार वर्ष छोटी हैं। घर पर अपने पिता (दीनानाथ मंगेशकर) से ही संगीत से आशा का परिचय हुआ। पर पिता-पुत्री का साथ बहुत दिनों तक नहीं चल सका। आशा केवल 8 वर्ष की थीं जब पिता ने इस संसार को अलविदा कह दिया। परिवार में अकेला कमाने वाले पिता के आकस्मिक चले जाने पर पाँच भाई-बहनों और माँ समेत छह लोगों के उस मंगेशकर परिवार की आर्थिक दुर्दशा हो गई। ऐसे में सबसे बड़ी सन्तान लता को कमर कस रोज़गार के क्षेत्र में उतरना पड़ा। ना चाहते हुए भी मेक-अप लगा कर वो फ़िल्मों में अभिनय करतीं, गीत गातीं, और इस तरह से परिवार के सदस्यों को दो वक़्त की रोटी नसीब होती रही। कुछ ही समय के पश्चात आशा ने भी अपनी बड़ी बहन की राह पर चलने लगी और वो भी अभिनय और गायन से थोड़ा बहुत कमाने लगीं। उनका गाया पहला गीत था 1943 की मराठी फ़िल्म ’माझा बाल’ का जिसके बोल थे "चला चला नव बाला..."। इसके बाद छोटे-मोटे रोल और गायन करते रहने के बाद 1948 में उन्हे अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म ’चुनरिया’ में गीत गाने का अवसर मिला। यहाँ से फिर एक नई यात्रा उनकी शुरू हुई, पर अभी उनके और दुर्दिन आने ही वाले थे।


1949 के आते-आते बड़ी बहन लता स्थापित हो चुकी थीं ’महल’, ’लाहौर’, ’ज़िद्दी’, ’बरसात’ आदि फ़िल्मों में सुपरहिट गीत गा कर। अब वो ऐसी स्थिति में थीं कि अपना पर्सोनल सेक्रेटरी रख सकती थीं। लता ने गणपतराव भोसले नामक सज्जन को अपना पर्सोनल सेक्रेटरी बनाया। और यहीं पर एक गड़बड़ हो गई। बहन आशा और गणपतराव एक दूसरे से प्रेम करने लगे। जैसे ही लता को उनके प्रेम-संबंध का पता चला तो उन्हे अच्छा नहीं लगा। आशा के गणपतराव से विवाह करने के प्रस्ताव को मंगेशकर परिवार ने विरोध किया और विवाह की अनुमति नहीं दी। ऐसे में आशा घर छोड़ कर गणपतराव से विवाह कर लिया और ससुराल चली गईं। पति और नए परिवार के साथ नए जीवन की शुरुआत हुई। आशा जी बताती हैं कि विवाह के बाद 100 रुपये की अपनी पहली कमाई को दोनों ने फ़ूटपाथ पर लगे बटाटा वडा खा कर मनाया था। आशा ने काम करना बन्द नहीं किया। बोरीवली में उनका ससुराल था; सुबह-सुबह लोकल ट्रेन से काम पर जातीं और शाम को घर लौटतीं। दिन गुज़रते गए, पर आशा को केवल या तो छोटी बजट की फ़िल्मों में या फिर खलनायिका के चरित्र पर फ़िल्माये जाने वाले गीत गाने के ही अवसर मिलने लगे। कारण, बड़ी बहन लता की अलौकिक आवाज़ जो फ़िल्मी नायिका पर बिल्कुल फ़िट बैठती थी। ऐसे में किसी अन्य नई आवाज़ का टिक पाना संभव नहीं था। आशा एक हिट गीत के लिए तरसती रहीं। दिन, महीने, साल गुज़रने लगे, पर आशा को कोई बड़ी फ़िल्म नसीब नहीं हुई। उधर अब आशा दो बच्चों की माँ भी बन चुकी थीं। एक तरफ़ बड़ी गायिका बनने की चाह, दूसरी तरफ़ घर-परिवार-बच्चे, और जो सबसे ख़तरनाक बात थी वह यह कि अब आशा के ससुराल वाले उन्हें परेशान करने लगे थे। आशा पर ससुराल में ज़ुल्म होने लगी। धीरे-धीरे यंत्रणा इतनी बढ़ गई कि दोनों बच्चों और गर्भ में पल रहे तीसरे सन्तान को लेकर आशा ने अपना ससुराल हमेशा के लिए छोड़ दिया और अपनी माँ के पास वापस आ गईं। लेकिन रिश्तों की जो दीवार आशा और मंगेशकर परिवार के बीच खड़ी हो गई थी, वह कभी पूरी तरीक़े से ढह नहीं पायी। एक तरफ़ बड़ी बहन एक के बाद एक सुपरहिट गीत गाती चली जा रही थीं, और दूसरी तरह आशा एक के बाद एक फ़्लॉप फ़िल्मों में गीत गा कर अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रही थीं। आशा का जो संघर्ष 1943 में शुरू हुआ था, वह संघर्ष पूरे 13 वर्षों तक चला। और फिर 1957 में उनकी नई सुबह हुई जब फ़िल्म ’तुमसा नहीं देखा’ और ’नया दौर’ में उनके गाये गीतों ने बेशुमार लोकप्रियता प्राप्त की। फिर इसके बाद आशा भोसले को ज़िन्दगी में कभी पीछे मुड़ कर देखने की आवश्यक्ता नहीं पड़ी। और बाक़ी इतिहास है! ज़िन्दगी ने आशा भोसले से शुरुआती 13 सालों में कठिन परीक्षा ली, और अन्त में उन्हे गले लगा कर कहा कि आशा, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Tuesday, December 8, 2015

असगर वजाहत की जब वह बुलाएगा

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार हरिशंकर परसाई की लघुकथा "समझौता" का पाठ सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, असगर वजाहत की लघुकथा जब वह बुलाएगा, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी जब वह बुलाएगा का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 47 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। असगर वजाहत की निम्न कहानियाँ भी रेडियो प्लेबैक इंडिया पर सुनी जा सकती हैं:
यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


रात के वक्त़ रूहें अपने बाल-बच्चों से मिलने आती हैं।
 ~ असगर वजाहत

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"जन्नत के दरवाजे खुल जाएँगे। हूरें मिलेंगी।”
 (असगर वजाहत की लघुकथा "जब वह बुलाएगा" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
जब वह बुलाएगा MP3

#Twenty Sixth Story, Jab Woh Bulayega; Asghar Wajahat; Hindi Audio Book/2015/26. Voice: Anurag Sharma

Sunday, December 6, 2015

मोहनवीणा और विश्वमोहन भट्ट : SWARGOSHTHI – 247 : MOHAN VEENA & VISHWAMOHAN BHATT




स्वरगोष्ठी – 247 में आज

संगीत के शिखर पर – 8 : पण्डित विश्वमोहन भट्ट

मोहनवीणा के अन्वेषक और वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट



रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की आठवीं कड़ी में हम पश्चिम के लोकप्रिय तंत्रवाद्य हवाइयन गिटार या स्लाइड गिटार के परिवर्तित भारतीय रूप ‘मोहनवीणा’ के अन्वेषक और विश्वविख्यात वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही इस वाद्य के मूल उद्गम पर भी चर्चा करेंगे। आज हम आपको पण्डित विश्वमोहन भट्ट द्वारा मोहनवीणा पर बजाया राग हंसध्वनि और राग किरवानी की रचनाएँ सुनवाएँगे। 



भारतीय संगीत के कई वाद्ययंत्र ऐसे हैं, जिनका उद्गम वैदिककालीन माना जाता है। एक ऐसा ही तंत्रवाद्य है “मोहनवीणा”। आज के अंक में हम तंत्रवाद्य मोहनवीणा के अन्वेषक और वादक के व्यक्तित्व पर चर्चा कर रहे हैं। यह वाद्य विश्व-संगीत-जगत की लम्बी यात्रा कर आज पुनः भारतीय संगीत का हिस्सा बन चुका है। वर्तमान में “मोहनवीणा” नाम से हम जिस वाद्ययंत्र को पहचानते हैं, वह पश्चिम के 'हवाइयन गिटार' या 'स्लाइड गिटार' का संशोधित रूप है। इस वाद्य के प्रवर्तक हैं, सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित विश्वमोहन भट्ट, जिन्होंने अपने इस अनूठे वाद्य से समूचे विश्व को सम्मोहित किया है। श्री भट्ट इस वाद्य के सर्जक ही नहीं, बल्कि उच्चकोटि के वादक भी हैं। सुप्रसिद्ध सितार वादक पण्डित रविशंकर के शिष्य विश्वमोहन भट्ट का परिवार मुग़ल सम्राट अक़बर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन और उनके गुरु स्वामी हरिदास से सम्बन्धित है। प्रारम्भ में उन्होंने सितार वादन की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु 1966 की एक रोचक घटना ने उन्हें एक नये वाद्य के सृजन की ओर प्रेरित कर दिया। एक बातचीत में श्री भट्ट ने बताया था – ‘1966 के आसपास एक जर्मन हिप्पी लड़की अपना गिटार लेकर मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि मैं उसे उसके गिटार पर ही सितार बजाना सिखा दूँ। उस लड़की के इस आग्रह पर मैं गिटार को इस योग्य बनाने में जुट गया कि इसमें सितार के गुण आ जाएँ।‘ श्री भट्ट के वर्तमान 'मोहनवीणा' में केवल सितार और गिटार के ही नहीं बल्कि प्राचीन वैदिककालीन तंत्रवाद्य विचित्रवीणा और सरोद के गुण भी हैं। मोहनवीणा का मूल उद्‍गम 'विचित्रवीणा' ही है। श्री भट्ट मोहनवीणा पर सभी भारतीय संगीत शैलियों – ध्रुपद, धमार, ठुमरी आदि का वादन करने में समर्थ हैं। आइए, पहले पण्डित विश्वमोहन भट्ट से मोहनवीणा पर राग 'हंसध्वनि' की एक मोहक रचना सुनते हैं। यह रचना तीनताल में निबद्ध है। तबला-संगति पण्डित रामकुमार मिश्र ने की है।


राग हंसध्वनि : मोहन वीणा पर तीनताल में निबद्ध रचना : विश्वमोहन भट्ट




प्राचीन काल से प्रचलित वाद्य 'विचित्रवीणा' के स्वरूप में समय चक्र के अनुसार बदलाव आते रहे। पाश्चात्य संगीत का हवाइयन गिटार वैदिककालीन विचित्रवीणा का ही सरलीकृत रूप है। वीणा के तुम्बे से ध्वनि में जो गमक उत्पन्न होती है, पाश्चात्य संगीत में उसकी बहुत अधिक उपयोगिता नहीं होती। यूरोप और अमेरिका के संगीत विद्वानों ने अपनी संगीत पद्यति के अनुकूल इस वाद्य में परिवर्तन किया। विचित्रवीणा में स्वर के तारों पर काँच का एक बट्टा फेर (Slide) कर स्वर का परिवर्तन किया जाता है। तारों पर एक ही आघात से श्रुतियों के साथ स्वर परिवर्तन होने से यह वाद्य गायकी अंग में वादन के लिए उपयोगी होता है। प्राचीन ग्रन्थों में गायन के साथ वीणा की संगति का उल्लेख मिलता है। हवाइयन गिटार बन जाने के बाद भी यह गुण बरकरार रहा, इसीलिए पश्चिमी संगीत के गायक कलाकारों का भी यह प्रिय वाद्य रहा। पं. विश्वमोहन भट्ट ने गिटार के इस स्वरुप में परिवर्तन कर इसे भारतीय संगीत वादन के अनुकूल बनाया। उन्होंने एक सामान्य गिटार में 6 तारों के स्थान पर 19 तारों का प्रयोग किया। यह अतिरिक्त तार 'तरब' और 'चिकारी' के हैं जिनका उपयोग स्वरों में अनुगूँज के लिए किया जाता है। श्री भट्ट ने इसकी बनावट में भी आंशिक परिवर्तन किया है। मोहनवीणा के वर्तमान स्वरूप में भारतीय संगीत के रागों को 'गायकी' और 'तंत्रकारी' दोनों अंगों में बजाया जा सकता है। अपने आकार-प्रकार और वादन शैली के बल पर यह वाद्य पूरे विश्व में चर्चित हो चुका है। अब हम आपको मोहनवीणा पर राग किरवानी का रसास्वादन कराते हैं। राग हंसध्वनि की भाँति राग किरवानी भी मूलतः दक्षिण भारतीय राग है, जो उत्तर भारतीय संगीत में समान रूप से प्रचलित है। राग किरवानी की इस रचना में तबला संगति सुखाविन्दर सिंह नामधारी ने की है। आप पण्डित विश्वमोहन भट्ट का बजाया राग किरवानी सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग किरवानी : कहरवा ताल में रचना : विश्वमोहन भट्ट




संगीत पहेली


 ‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक स्वर-वाद्य पर संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में की जाएगी।



1 – वाद्ययंत्र पर कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस वाद्ययंत्र की आवाज़ है? वाद्य का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 12 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 249वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 245वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको रुद्रवीणा के सुविख्यात वादक उस्ताद असद अली खाँ द्वारा प्रस्तुत वादन का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – आसावरी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – चौताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – रुद्रवीणा

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपको पाश्चात्य वाद्य हवाइयन गिटार के भारतीय रूपान्तरण, मोहनवीणा पर दो दक्षिण भारतीय राग सुनवाया। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




 


Saturday, December 5, 2015

"जाँ की यह बाज़ी आख़िरी बाज़ी खेलेंगे हम..." - क्यों इस गीत की धुन चुराने पर भी अनु मलिक को दोष नहीं दिया जा सकता!


एक गीत सौ कहानियाँ - 71
 

'जाँ की यह बाज़ी आख़िरी बाज़ी खेलेंगे हम...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 71-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की फ़िल्म ’आख़िरी बाज़ी’ के शीर्षक गीत "जाँ की यह बाज़ी आख़िरी बाज़ी खेलेंगे हम..." के बारे में जिसे अमित कुमार ने गाया था। बोल इंदीवर के और संगीत अनु मलिक का।

अनु मलिक
मेरे पोलैंड का सफ़र जारी है। आज एक आश्चर्यजनक बात हुई। कार्यालय में एक पोलिश कर्मचारी के मोबाइल का रिंग् टोन बज उठते ही मैं चौंक उठा। अरे, यह तो एक हिन्दी फ़िल्मी गीत की धुन है! याद करने में बिल्कुल समय नहीं लगा कि यह 1989 की हिट फ़िल्म ’आख़िरी बाज़ी’ के शीर्षक गीत की धुन है। बचपन में यह गीत बहुत बार रेडियो पर सुना है। मुझे यक़ीन हो गया कि इस गीत की धुन ज़रूर किसी विदेशी गीत या कम्पोज़िशन से प्रेरित या ’चोरित’ होगा जो अभी-अभी उस रिंग् टोन में सुनाई दी है। कार्यालय से वापस आकर जब गूगल पर खोजने लगा तो हैरान रह गया कि कहीं पर भी इस गीत के किसी विदेशी गीत से प्रेरित होने की बात नहीं लिखी है। ऐसे बहुत से वेबसाइट हैं जिनमें लगभग सभी प्रेरित गीतों की सूची दी गई है, और कहीं कहीं तो संगीतकारों के नाम के अनुसार क्रमबद्ध सूची दी गई है। उसमें अनु मलिक के प्रेरित गीतों की सूची में इस गीत को न पाकर एक तरफ़ हताशा हुई और दूसरी तरफ़ एक रोमांच सा होने लगा यह सोच कर कि एक ऐसे गीत की खोज की है जो विदेशी धुन से प्रेरित है पर किसी को अब तक इसका पता नहीं है, कम से कम इन्टरनेट पर तो नहीं! अब मुश्किल यह थी कि कैसे पता लगाएँ, कहीं कोई सूत्र मिले भी तो कैसे मिले? ’आख़िरी बाज़ी’ के गीत की धुन को लगातार गुनगुनाते हुए अनु मलिक के प्रेरित गीतों की सूची को ध्यान से देख ही रहा था कि एक गीत पे जाकर मेरी नज़र टिक गई। गीत था 1995 की मशहूर फ़िल्म ’अकेले हम अकेले तुम’ का "राजा को रानी से प्यार हो गया..."। चौंक उठा, इस गीत की पहली पंक्ति की धुन भी तो कुछ हद तक ’आख़िरी बाज़ी’ के गीत के धुन से मिलती जुलती है। पाया कि यह गीत प्रेरित है 1972 की फ़िल्म ’The Godfather' के गीत "speak softly, love" से, जिसका एक instrumental version भी है जिसे ’The Godfather Theme' शीर्षक दिया गया है। संगीतकार हैं निनो रोटा।


निनो रोटा
यू-ट्युब पर ’The Godfather Theme' सुनने पर एक और रोचक बात पता चली। फ़िल्म ’आख़िरी बाज़ी’ का गीत हू-ब-हू इस धुन पर आधारित है, कोई प्रेरणा नहीं, सीधी चोरी है। दूसरी ओर "राजा को रानी से..." गीत में इस धुन से बेशक़ सिर्फ़ प्रेरणा ली गई है, चोरी नहीं। जो गीत हू-ब-हू नकल है (आख़िरी बाज़ी...), उसका कहीं कोई उल्लेख नहीं जबकि एक अच्छी प्रेरणा के उदाहरण (राजा को रानी से...) को लोगों ने चोरी करार दिया है। उसी सूची वाले वेब-पेज पर जब "Godfather" लिख कर खोजा तो पाया कि एक और गीत इसी धुन से प्रेरित है। और वह गीत है वर्ष 2000 की फ़िल्म ’आशिक़’ का गीत "तुम क्या जानो दिल करता तुमसे कितना प्यार...", जिसके संगीतकार हैं संजीव-दर्शन। इस तरह से ’Godfather' के उस धुन पर तीन-तीन हिन्दी फ़िल्मी गीत बन चुके हैं। एक रोचक तथ्य यह भी है कि जिस ’The Godfather Theme' की हम बात कर रहे हैं, वह धुन भी प्रेरित है (या कुछ समानता है) वर्ष 1951 के एक कम्पोज़िशन से। फ़िल्म ’High Noon' में दिमित्री तिओमकिन के संगीत निर्देशन में "Do not forsake me o my darling..." गीत की धुन को अगर ग़ौर से सुनें तो निनो रोटा के कम्पोज़िशन से हल्की समानता महसूस की जा सकती है। दिमित्री को अपने गीत के लिए ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। और निनो को क्या कोई पुरस्कार मिला? इसमें भी एक रोचक कहानी है। निनो रोटा ने ’The Godfather' में जो धुन बनाई थी, उस धुन को एक अलग अंदाज़ में (comedic version) उन्होंने 1958 की फ़िल्म ’Fortunella' के लिए बनाया था। ऑस्कर कमिटी ने शुरू-शुरू में 'The Godfather' की धुन को Best Original Score की श्रेणी के नामांकन में जगह दी थी, पर जैसे ही ’Fortunella' के धुन का सच्चाई सामने आई तो उसे पुरस्कार के अयोग्य ठहराया गया। इसके अगले ही साल जब ’The Godfather Part II' फ़िल्म बनी तो निनो रोटा ने यही धुन फिर एक बार प्रयोग कर एक नई कम्पोज़िशन बनाई। लेकिन इस बार ऑस्कर कमिटी ने न केवल उनकी धुन को नामांकित किया, बल्कि Best Score का पुरस्कार भी दिया।

निनो रोटा की यह धुन इतना ज़्यादा लोकप्रिय हुआ समूचे विश्व में कि बहुत से कलाकारों ने इसे अपने-अपने ऐल्बमों में शामिल किया। जहाँ एक तरफ़ कलाकारों ने मूल गीत को ही अपनी आवाज़ में रेकॉर्ड करवाया, बहुत से कलाकार ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी-अपनी भाषाओं के बोलों को इस धुन पर फ़िट किया। अब एक नज़र ऐसे ही कुछ गीतों और भाषाओं पर डालते हैं। 

इटली - "Parla più piano..."
फ़्रांस - "Parle Plus Bas..."
यूक्रेन - "Skazhy scho lyubysh..."
यूगोस्लाविया - "Govori Tiše..."
हंगरी - "Gyöngéden ölelj át és ringass szerelem..."
कम्बोडिया - "Khum Joll Snaeha..."
स्लोवाकिया - "Býval som z tých..."
पोर्तुगल - "Fale Baixinho..."
इरान - "Booye Faryad..."

ये तो थे कुछ ऐसे उदाहरण जिनमें इस धुन पर अलग-अलग भाषाओं के गीत बने। इनके अलावा और भी असंख्य कलाकारों ने अपनी-अपनी साज़ पर इस धुन को instrumental के रूप में रेकॉर्ड करवाया। ऐसे में जहाँ दुनिया भर के कलाकारों ने इस धुन को गले लगाया, तो फिर क्या अनु मलिक या संजीव दर्शन पर इस धुन की चोरी का इलज़ाम लगाना ठीक होगा? फ़ैसला आप पर छोड़ते हैं, फ़िल्हाल सुनते हैं ’The Godfather' की धुन पर आधारित फ़िल्म ’आख़िरी बाज़ी’ का शीर्षक गीत। 


फिल्म आखिरी बाज़ी : 'जाँ की यह बाज़ी आखिरी बार...' : अमित कुमार : इन्दीवर : अनु मालिक





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, November 29, 2015

रुद्रवीणा और उस्ताद असद अली खाँ : SWARGOSHTHI – 246 : RUDRAVEENA & USTAD ASAD ALI KHAN



स्वरगोष्ठी – 246 में आज

संगीत के शिखर पर – 7 : उस्ताद असद अली खाँ

वैदिक तंत्रवाद्य रुद्रवीणा के साधक उस्ताद असद अली खाँ




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की सातवीं कड़ी में हम आज हम वैदिककालीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा अनन्य साधक उस्ताद असद अली खाँ की संगीत साधना के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। आज हम आपको उस्ताद असद अली खाँ द्वारा रुद्रवीणा पर बजाया ध्रुपद अंग में राग आसावरी और आभोगी की रचनाएँ सुनवाएँगे।


वैदिककालीन वाद्य रूद्रवीणा को परम्परागत रूप से आधुनिक संगीत जगत में प्रतिष्ठित कराने वाले अप्रतिम कलासाधक उस्ताद असद अली खाँ जयपुर बीनकार की बारहवीं पीढ़ी के कलासाधक थे। यह घराना जयपुर के सेनिया घराने का ही एक हिस्सा है। असद अली खाँ का जन्म 1937 में अलवर रियासत (राजस्थान) में हुआ था। परन्तु उनके संगीत की शिक्षा-दीक्षा रामपुर में हुई। उनके पिता उस्ताद सादिक अली खाँ रामपुर दरबार में रूद्रवीणा के प्रतिष्ठित वादक थे। उनके प्रपितामह उस्ताद रज़ब अली खाँ जयपुर घराने के दरबारी वीणावादक थे तथा रूद्रवीणा के साथ-साथ सितार और दिलरुबावादन में भी दक्ष थे। असद अली खाँ के पितामह उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ को भी जयपुर के दरबारी वीणावादक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

आज हम जिसे संगीत का जयपुर घराना के नाम से पहचानते हैं, उसकी स्थापना में असद अली खाँ के प्रपितामह (परदादा) उस्ताद राजब अली खाँ का योदान रहा है। उस्ताद रजब अली खाँ जयपुर दरबार के केवल संगीतज्ञ ही नहीं; बल्कि महाराजा मानसिंह के गुरु भी थे। महाराजा ने उन्हें जागीर के साथ ही एक विशाल हवेली दे रखी थी तथा उन्हें किसी भी समय बेरोक-टोक महाराजा के महल में आने-जाने की स्वतन्त्रता थी। असद अली खाँ के दादा जी उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ ने भी जयपुर दरबार में वही प्रतिष्ठा प्राप्त की। वीणावादकों का यह घराना ध्रुवपद संगीत के खण्डहार वाणी में वादन करता रहा है; जिसका पालन उस्ताद असद अली खाँ ने भी किया और अपने शिष्यों को भी इसी वाणी की शिक्षा दी। ध्रुवपद संगीत में चार वाणियों का वर्गीकरण तानसेन के समय में ही हो चुका था। ‘संगीत रत्नाकर’ ग्रन्थ में यह वर्गीकरण शुद्धगीत, भिन्नगीत, गौड़ीगीत और बेसरागीत नामों से हुआ है; जिसे आज गौड़हार वाणी, डागर वाणी, खण्डहार वाणी और नौहार वाणी के नाम से जाना जाता है। उस्ताद असद अली खाँ और उनके पूर्वजों का वादन खण्डहार वाणी का था। इसके अलावा खाँ साहब दूसरी वाणियों की विशेषताओं को प्रदर्शित करने से नहीं हिचकते थे। ध्रुवपद अंग में वीणावादन का चलन कम होने के बावजूद उन्होंने परम्परागत वादन शैली से कभी समझौता नहीं किया। आइए, उनकी वादन शैली की सार्थक अनुभूति करते हैं। इस प्रस्तुति में उस्ताद असद अली खाँ ने ध्रुवपद अंग में राग आसावरी के स्वरों में लयबद्ध किन्तु तालरहित झाला और फिर चौताल में एक बन्दिश का वादन किया है। नाथद्वारा परम्परा के पखावज वादक पण्डित डालचन्द्र शर्मा ने पखावज पर संगति की है।


राग आसावरी : रुद्रवीणा पर झाला और चौताल में बन्दिश : उस्ताद असद अली खाँ





उस्ताद असद अली खाँ ने अपने पिता उस्ताद सादिक अली खाँ से रामपुर दरबार में लगभग 15 वर्षों तक रूद्रवीणा के वादन की शिक्षा ग्रहण की, और फिर प्रतिदिन कई घण्टों तक निरन्तर रियाज करके उन्होंने इस वैदिककालीन वाद्य को सिद्ध कर लिया। उन्होंने ध्रुवपद अंग में रूद्रवीणा की ‘खान दरबारी’ शैली विकसित की और उस शैली को यही नाम दिया। खाँ साहब 17 वर्षों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में संगीत के प्रोफ़ेसर रहे। वे आजन्म अविवाहित रहे। अपने भतीजे अली जाकी हैदर को उन्होंने दत्तक पुत्र बना लिया था और उन्हें रूद्रवीणा वादन में प्रशिक्षित किया था। अली जाकी के अलावा अन्य कई शिष्यों को भी उन्होंने संगीत शिक्षा दी है; जो इस परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रचार-प्रसार करने में संलग्न संस्था ‘स्पीक मैके’ के साथ जुड़ कर खाँ साहब ने स्कूल-कालेज के विद्यार्थियों के बीच रुद्रवीणा से नई पीढ़ी को परिचित कराने का अभियान चलाया था, जो खूब सफल रहा। नई पीढी को रूद्रवीणा की वादन शैली से परिचित कराने के साथ-साथ उस्ताद असद अली खाँ उन्हें यह बताना नहीं भूलते थे कि यह तंत्रवाद्य विश्व का सबसे प्राचीन वाद्य है और ध्वनि के वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आज भी खरा उतरता है। वे भगवान शिव को रूद्रवीणा का निर्माता मानते थे। उस्ताद असद अली खाँ को अनेक सम्मान और पुरस्कार से नवाज़ा गया था; जिनमें 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2008 में पद्मभूषण सम्मान, तानसेन सम्मान आदि प्रमुख हैं। 14 जून, 2011 को उनके निधन से भारतीय संगीत जगत में रिक्तता तो आई है; किन्तु यह विश्वास भी है कि उनके शिष्यगण रुद्रवीणा वादन की वैदिककालीन परम्परा को आगे बढ़ाएँगे। इस आलेख को विराम देने से पहले लीजिए सुनिए, उस्ताद असद अली खाँ का रूद्रवीणा पर बजाया राग आभोगी में एक ध्रुवपद बन्दिश। पखावज संगति वरिष्ठ पखावजी पण्डित गोपाल दास ने की है। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग आभोगी : ध्रुपद बन्दिश : उस्ताद असद अली खाँ






संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 246वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक तंत्रवाद्य पर वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग की झलक प्रस्तुत करता है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप संगीत वाद्य को पहचान रहे हैं? यदि हाँ, तो हमें उस वाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 5 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 248वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 244 की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ की आवाज़ में प्रस्तुत दादरा का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- पहली बार ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में भाग लेने वाले प्रतिभागी, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल। प्रफुल्ल जी, संगीत प्रेमियों की इस महफिल में हार्दिक स्वागत है। हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह सातवाँ अंक था। इस अंक में हमने प्राचीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली खाँ के व्यक्तित्व और उनके वादन पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। अगले अंक में हम भारतीय संगीत की किसी अन्य विधा के किसी शिखर व्यक्तित्व के कृतित्व पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Saturday, November 28, 2015

बातों बातों में - 14 : गीतकार असद भोपाली के बारे में उनके सुपुत्र ग़ालिब असद भोपाली से बातचीत



बातों बातों में - 14

गीतकार असद भोपाली के बारे में उनके बेटे ग़ालिब असद भोपाली से बातचीत

जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं...



नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। इस बार हम आपके लिए लेकर आए हैं जाने-माने गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में उनके बेटे गालिब असद भोपाली से की गई लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश। इनसे बातचीत की है कृष्णमोहन मिश्र ने। 



असद भोपाली
फिल्म-जगत में कुछ ऐसे भी सृजनशील रचनाकार हुए हैं, जिन्होने गुणबत्ता से कभी भी समझौता नहीं किया, चाहे फिल्म उन्हें किसी भी श्रेणी की मिली हो। फिल्म-जगत के एक ऐसे ही प्रतिभावान, स्वाभिमानी और संवेदनशील शायर-गीतकार असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर “बातों बातों में” के इस अंक में हम चर्चा करेंगे। पिछले दिनों फिल्म और टेलीविज़न धारावाहिक के पटकथा, संवाद और गीत लेखक ग़ालिब खाँ से हमारा सम्पर्क हुआ। मालूम हुआ कि अपने समय के चर्चित गीतकार असद भोपाली के आप सुपुत्र हैं। अपने स्वाभिमानी पिता से ही प्रेरणा पाकर ग़ालिब खाँ फिल्म और टेलीविज़न के क्षेत्र में सफलतापूर्वक सक्रिय हैं। हमने ग़ालिब साहब से अनुरोध किया कि वो अपने पिता असद भोपाली के बारे में हमारे साथ बातचीत करें। अपनी व्यस्तता के बावजूद उन्होने हमसे बातचीत की। प्रस्तुत है चार दशकों तक फिल्म-गीतकार के रूप में सक्रिय श्री असद भोपाली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनके सुपुत्र ग़ालिब खाँ से किये गये साक्षात्कार के सम्पादित अंश।

ग़ालिब असद भोपाली
कृष्णमोहन- ग़ालिब खाँ साहब, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के इस मंच पर हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं।

ग़ालिब खाँ- धन्यवाद। आपने इस मंच पर मुझे अपने पिता जी के बारे में कुछ कहने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।

कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, करोड़ों फिल्म संगीत प्रेमी आपके पिता को असद भोपाली के नाम से जानते हैं। हम उनका वास्तविक नाम जानना चाहते हैं साथ ही यह भी जानना चाहेंगे कि आपके खानदान का सम्बन्ध भोपाल से किस प्रकार से जुड़ा हुआ है?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता असद उल्लाह खाँ का जन्म 10 जुलाई 1921 को भोपाल में हुआ था। उनके पिता यानि मेरे दादा मुंशी अहमद खाँ का भोपाल के आदरणीय व्यक्तियों में शुमार था। वे एक शिक्षक थे और बच्चों को अरबी-फारसी पढ़ाया करते थे। पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा भी उनके शिष्यों में से एक थे। वो घर में ही बच्चों को पढ़ाया करते थे, इसीलिए मेरे पिताजी भी अरबी-फारसी के साथ साथ उर्दू में भी वो महारत हासिल कर पाए जो उनकी शायरी और गीतों में हमेशा झलकती रही। उनके पास शब्दों का खज़ाना था। एक ही अर्थ के बेहिसाब शब्द हुआ करते थे उनके पास। इसलिए उनके जाननेवाले संगीतकार उन्हें गीत लिखने की मशीन कहा करते थे।

कृष्णमोहन- फिल्म-जगत में आने से पहले एक शायर के रूप वो कितने लोकप्रिय थे?

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता को शायरी का शौक़ किशोरावस्था से ही था। उस दौर में जब कवियों और शायरों ने आज़ादी की लड़ाई में अपनी कलम से योगदान किया था, उस दौर में उन्हें भी अपनी क्रान्तिकारी लेखनी के कारण जेल की हवा खानी पड़ी थी।

कृष्णमोहन- इसका अर्थ हुआ कि असद भोपाली साहब स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे।

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, आज़ादी की लड़ाई में हर वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया था। इनमें साहित्यकारों की भी भूमिका रही है। मेरे पिता ने एक बुद्धिजीवी के रूप में इस लड़ाई में अपना योगदान किया था। क्रान्तिकारी लेखनी के कारण अँग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में बन्द कर दिया था। ये और बात है कि अँग्रेज़ जेलर भी उनकी 'गालिबी' का प्रशंसक हो गया था। (जी हाँ; वो अँग्रेज़ जेलर शायरी को 'गालिबी' कहा करता था)। जेल से छूटने के बाद मेरे पिता मुशायरों में हिस्सा लेते रहे।

कृष्णमोहन- स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी लेखनी से योगदान करने वाले शायर असद भोपाली साहब फिल्मी दुनिया में कैसे पहुंचे?

सुरैया
ग़ालिब खाँ- तब देश आज़ाद हो चुका था। उन दिनों हर छोटे-बड़े मुशायरे में उन्हें सम्मान से बुलाया जाता था। इसी शायरी ने उन्हें फिल्मनगरी मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) पहुँचा दिया। हुआ यूँ कि भोपाल टाकीज कि तरफ से एक मुशायरे का आयोजन किया गया था और शायरों की जबान में कहा जाए तो उन्होंने ये ‘मुशायरा लूट लिया’ था। नतीजा ये हुआ कि भोपाल टाकिज के मैनेजर मिस्बाह साहब ने उन्हें पाँच सौ रूपये दिये और फाजली ब्रदर्स का पता दिया, जिन्हें अपनी नयी फिल्म के गीतों के लिए एक माहिर शायर कि दरकार थी। वो सन 1949 में बम्बई आये और हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गए। 'दुनिया' उनकी पहली फिल्म थी। संगीतकार थे सी. रामचन्द्र और मुख्य भूमिकाओं में करण दीवान, सुरैया, और याकूब जैसे महान कलाकार थे। इस फिल्म का गीत “अरमान लुटे दिल टूट गया...” लोकप्रिय भी हुआ था।

कृष्णमोहन- ग़ालिब साहब, 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘दुनिया’ में आपके पिता असद भोपाली के लिखे इस पहले गीत को क्यों न हम श्रोताओं को सुनवाते चलें? 

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, मेरे पिता के इस पहले फिल्मी गीत को श्रोताओं को ज़रूर सुनवाइए। 


फिल्म – दुनिया : “अरमान लुटे दिल टूट गया...” : गायिका - सुरैया 


 
कृष्णमोहन- बहुत दर्द भरा गीत है। अब आपसे हम यह जानना चाहेंगे कि फिल्म-जगत में स्थापित हो जाने के बाद असद साहब के शुरुआती दौर का सबसे लोकप्रिय गीत कौन सा है? 

ग़ालिब खाँ- शुरुआती दौर में उन्होंने संगीतकार श्यामसुन्दर और हुस्नलाल भगतराम जैसे नामी संगीतकारों के साथ काम किया था। बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्देशित सफलतम फिल्म 'अफसाना' के गीतों से उन्होने अपनी लेखनी का लोहा भी मनवा लिया। फिल्म का एक गीत -“किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली, फिर कौन किसी का होता है, ऐ दुनिया वालों सच तो कहो क्या प्यार भी झूठा होता है...” आज भी लोगों को याद है। मुझे अपने पिता के लिखे गीतों में यह गीत बेहद पसंद है। कृष्णमोहन जी, क्या यह गीत हम श्रोताओं को सुनवा सकते हैं? 

कृष्णमोहन- अवश्य, मैं स्वयं आपसे यही कहना चाह रहा हूँ। तो “बातों बातों में” के प्रिय पाठकों-श्रोताओं, आप सुनिए हमारे आज के अतिथि जनाब ग़ालिब खाँ की पसन्द का गीत, जिसे उनके पिता और सुप्रसिद्ध शायर-गीतकार असद भोपाली ने 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘अफसाना’ के लिए लिखा था। आप यह गीत सुनें। 


फिल्म – अफसाना : “किस्मत बिगड़ी दुनिया बदली...” : गायक – मुकेश 




ग़ालिब खाँ- फिल्म ‘अफसाना’ के गीत से उन्हें लोकप्रियता तो मिली, परन्तु फिल्म की सफलता के सापेक्ष उन्हें काम नहीं मिला। उस समय के कलाकारों को काम से ज्यादा संघर्ष करना पड़ता था, उन्होंने भी किया। 1963 में प्रदर्शित फिल्म 'पारसमणि' के गीत लिखने का उन्हें प्रस्ताव मिला। यह एक फेण्टेसी फिल्म थी। फिल्म की संगीत-रचना के लिए नये संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल को अनुबन्धित किया गया था। मेरे पिता ने उस समय की जन-रुचि और फिल्म की थीम के मुताबिक इस फिल्म के लिए गीत लिखे थे। फिल्म ‘पारसमणि’ के गीत- "हँसता हुआ नूरानी चेहरा..." और "वो जब याद आये, बहुत याद आये..." ने लोकप्रियता के परचम लहरा दिये थे। ये गीत वर्षों बाद आज भी लोकप्रियता के शिखर पर हैं। 

कृष्णमोहन- आगे बढ़ने से पहले क्यों न हम इस फिल्म का एक गीत अपने पाठकों-श्रोताओं को सुनवाते चलें। 

ग़ालिब खाँ- जी हाँ, मेरे खयाल से हम अपने पाठकों को ‘पारसमणि’ का बेहद लोकप्रिय गीत– “हँसता हुआ नूरानी चेहरा...” सुनवाते हैं। 


फिल्म – पारसमणि : “हँसता हुआ नूरानी चेहरा...” : स्वर – लता मंगेशकर और कमल बरोट 



कृष्णमोहन- बहुत ही मधुर गीत आपने सुनवाया। ग़ालिब साहब; अब हम जानना चाहेंगे की आपके पिता असद भोपाली ने किन-किन संगीतकारों के साथ काम किया और किन संगीतकारों से उनके अत्यन्त मधुर सम्बन्ध रहे? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने संगीतकार सी. रामचन्द्र, हुस्नलाल-भगतराम, खैय्याम, हंसराज बहल, एन. दत्ता, नौशाद, ए.आर. कुरैशी (मशहूर तबलानवाज़ अल्लारक्खा), चित्रगुप्त, रवि, सी. अर्जुन, सोनिक ओमी, राजकमल, लाला सत्तार, हेमन्त मुखर्जी, कल्याणजी-आनन्दजी जैसे दिग्गज संगीतकरों के साथ काम किया। परन्तु ‘पारसमणि’ में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जैसे नए संगीतकारों के साथ सफलतम गीत देने के बाद नए संगीतकारों के साथ काम करने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अन्त तक चलता रहा। नए संगीतकारों में गणेश और उषा खन्ना के साथ वो अधिक सहज थे। संगीतकार राम लक्ष्मण उनके अन्तिम संगीतकार साथियों में से हैं, जिनके पास आज भी उनके कई मुखड़े और गीत लिखे पड़े हैं। 

कृष्णमोहन- असद भोपाली जी ने हर श्रेणी की फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत लिखे हैं, किन्तु उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका, जो उन्हें बहुत पहले ही मिलना चाहिए था। इस सम्बन्ध में आपका और आपके परिवार का क्या मत है? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता ने 1949 से 1990 तक लगभग चार सौ फिल्मों में दो हज़ार से ज्यादा गीत लिखे परन्तु फिल्म ‘दुनिया’ से लेकर ‘मैंने प्यार किया’ के गीत "कबूतर जा जा जा..." तक उन्हें वो प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसके वो हकदार थे। इस अन्तिम फिल्म के लिए ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड प्राप्त हुआ था। दरअसल इस स्थिति के लिए वो खुद भी उतने ही ज़िम्मेदार थे, जितनी ये फिल्म नगरी। कवियों और शायरों वाली स्वाभाविक अकड़ उन्हें काम माँगने से रोकती थी और जीवनयापन के लिए जो काम मिलता गया वो करना पड़ा। बस इतना ध्यान उन्होने अवश्य रखा था कि कभी अपनी शायरी का स्तर नहीं गिरने दिया। कम बजट की स्टंट फिल्मों में भी उन्होंने "हम तुमसे जुदा हो के, मर जायेंगे रो-रो के..." जैसे गीत लिखे। अपेक्षित सफलता न मिलने से या यूँ कहूँ कि उनकी असफलता ने उन्हें शराब का आदी बना दिया था और उनकी शराब ने पारिवारिक माहौल को कभी सुखद नहीं होने दिया। पर आज जब मैं उनकी स्थिति को अनुभव कर पता हूँ तो समझ में आता है कि जितना दुःख उनकी शराब ने हमें दिया उससे ज्यादा दुःख वो चुपचाप पी गए और हमें एहसास तक नहीं होने दिया। 

प्रसिद्ध शायर ग़ालिब के हमनाम (असद उल्लाह् खाँ) होने के साथ-साथ स्वभाव, संयोग और भाग्य भी उन्होंने कुछ वैसा ही पाया था। मेरे पिता के अन्तर्मन का दर्द उनके गीतों में झलकता है। दर्द भरे गीतों की लम्बी सूची में से फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का एक गीत मैं पाठकों को सुनवाना चाहता हूँ। 

कृष्णमोहन- दोस्तों, ग़ालिब खाँ के अनुरोध पर हम आपको 1957 की फिल्म ‘मिस बॉम्बे’ का यह गीत सुनवा रहे हैं। स्वर मोहम्मद रफी का और संगीत हंसराज बहल का है। 


फिल्म – मिस बॉम्बे : “ज़िंदगी भर ग़म जुदाई का..” : स्वर – मोहम्मद रफी


 
कृष्णमोहन- साहित्य क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के बारे में भी हमें बताएँ। क्या उनके गीत / ग़ज़ल के संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं? 

ग़ालिब खाँ- इस मामले में भी दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनकी लिखी हजारों नज्में और गजले जिस डायरी में थी वो डायरी बारिश कि भेंट चढ़ गयी। उन दिनों हम नालासोपारा के जिस घर में रहा करते थे, वह पहाड़ी के तल पर था और वहाँ मामूली बारिश में भी बाढ़ कि स्थिति पैदा हो जाती थी और ऐसी ही एक बाढ़, असद भोपाली की सारी "गालिबी" को बहा ले गयी। तब उनकी प्रतिक्रिया, मुझे आज भी याद है। उन्होने कहा था- 'जो मैं बेच सकता था मैं बेच चुका था, और जो बिक ही नहीं पाई वो वैसे भी किसी काम की नहीं थी'। एक शायर के पूरे जीवन की त्रासदी इस एक वाक्य में निहित है। 

कृष्णमोहन- आप अपने बारे में भी हमारे पाठको को कुछ बताएँ। यह भी बताएँ कि अपने पिता का आपके ऊपर कितना प्रभाव पड़ा? 

ग़ालिब खाँ- मेरे पिता मिर्ज़ा ग़ालिब से कितने प्रभावित थे इसका अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि उन्होने मेरा नाम ग़ालिब ही रखना पसन्द किया। वो अक्सर कहते थे कि वो असदउल्लाह खाँ "ग़ालिब" थे और ये 'ग़ालिब असदउल्लाह खाँ’ है। अब ये कुछ उस नाम का असर है और कुछ धमनियों में बहते खून का, कि मैंने भी आखिरकार कलम ही थाम ली। शायरी और गीत लेखन से शुरुआत की, फिर टेलीविज़न सीरियल के लेखन से जुड़ गया। ‘शक्तिमान’ जैसे धारावाहिक से शुरुआत की। फिर ‘मार्शल’, ‘पैंथर’, ‘सुराग’ जैसे जासूसी धारावाहिकों के साथ ‘युग’, ‘वक़्त की रफ़्तार’, ‘दीवार’ के साथ-साथ ‘माल है तो ताल है’, ‘जीना इसी का नाम है’, ‘अफलातून’ जैसे हास्य धारावाहिक भी लिखे। ‘हमदम’, ‘वजह’ जैसी फिल्मो का संवाद-लेखन किया। एक फिल्म ‘भिन्डी बाज़ार इंक’ की पटकथा-संवाद लिखने का सौभाग्य मिला, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा। बस मेरी इतनी ही कोशिश है कि मैं अपने पिता के नाम का मान रख सकूँ और उनके अधूरे सपनों को पूरा कर पाऊँ। 

कृष्णमोहन- आपका बहुत-बहुत आभार, आप “बातों बातों में” के मंच पर आए और अपने पिता असद भोपाली की शायरी के विषय में हमारे पाठकों के साथ चर्चा की। अब चलते –चलते आप अपनी पसन्द का कोई गीत हमारे पाठकों/श्रोताओं को सुनवा दें। 

ग़ालिब खाँ- ज़रूर, पाठको को मैं एक ऐसा गीत सुनवाना चाहता हूँ, जिसे जब भी मैं सुनता हूँ अपने पिता को अपने आसपास पाता हूँ। यह फिल्म ‘एक नारी दो रूप’का गीत है जिसे रफी साहब ने गाया है और संगीतकार हैं गणेश। चूँकि फिल्म चली नहीं इसलिए गीत भी अनसुना ही रह गया। आप इस गीत को सुने और मुझे इजाज़त दीजिए। 


फिल्म – एक नारी दो रूप : “दिल का सूना साज तराना ढूँढेगा...” : स्वर – मोहम्मद रफी 




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



वार्ताकार : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 


Tuesday, November 24, 2015

हरिशंकर परसाई की समझौता

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की लघुकथा "महावीर और गाड़ीवान" का पाठ सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार हरिशंकर परसाई की लघुकथा समझौता, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी समझौता का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 18 सेकंड है। इस लघुकथा का गद्य हिन्दी समय पर उपलब्ध है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

मेरी जन्म-तारीख 22 अगस्त 1924 छपती है। यह भूल है। तारीख ठीक है। सन् गलत है। सही सन् 1922 है। ।
 ~ हरिशंकर परसाई (1922-1995)

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"अंधा है क्‍या? दिखता भी नहीं।”
 (हरिशंकर परसाई की लघुकथा "समझौता" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
समझौता MP3

#Twenty Fifth Story, Samjhauta; Harishankr Parsai; Hindi Audio Book/2015/25. Voice: Anurag Sharma

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ