Saturday, April 25, 2015

बातों बातों में - 07 : INTERVIEW OF LYRICIST AMIT KHANNA

बातों बातों में - 07

गीतकार अमित खन्ना से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

"मैं अकेला अपनी धुन में मगन..." 




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते; काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज अप्रैल 2015 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार अमित खन्ना से की गई हमारी टेलीफ़ोनिक बातचीत के सम्पादित अंश। यह साक्षात्कार साल 2011 में किया गया था। 





अमित जी, बहुत बहुत स्वागत है आपका 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर। और बहुत बहुत शुक्रिया हमारे मंच पर पधारने के लिये, हमें अपना मूल्यवान समय देने के लिए। 


नमस्कार और धन्यवाद जो मुझे आपने याद किया!


सच पूछिये अमित जी तो मैं थोड़ा सा संशय में था कि आप मुझे कॉल करेंगे या नहीं, आपको याद रहेगा या नहीं। पर आपने बिल्कुल आपके द्वारा दिए गए समय पर कॉल कर मुझे चौंका ज़रूर दिया है। और एक बार फिर मैं आपको धन्यवाद देता हूँ।

मैं कभी कुछ भूलता नहीं।



मैं अपने पाठकों को यह बताना चाहूँगा कि मेरी अमित जी से फ़ेसबूक पर मुलाकात होने पर जब मैंने उनसे साक्षात्कार के लिए आग्रह किया तो वो न केवल बिना कुछ पूछे राज़ी हो गये, बल्कि यह कहा कि वो ख़ुद मुझे टेलीफ़ोन करेंगे। यह बात है 3 जून 2011 की और साक्षात्कार का समय ठीक हुआ 11 जून दिन के 12:30 बजे। इस दौरान मेरी उनसे कोई बात नहीं हुई, न ही किसी तरह का कोई सम्पर्क हुआ। इसलिये मुझे लगा कि शायद अमित जी भूल जायेंगे और कहाँ इतने व्यस्त इन्सान को याद रहेगा मुझे फ़ोन करना। लेकिन 11 जून ठीक 12:30 बजे उन्होंने वादे के मुताबिक़ मुझे कॉल कर मुझे चौंका दिया। इतने व्यस्त होते हुए भी उन्होंने समय निकाला, इसके लिए हम उन्हें जितना भी धन्यवाद दें कम है। एक बार फिर यह सिद्ध हुआ कि फलदार पेड़ हमेशा झुके हुए होते हैं। सच कहूँ कि उनका फ़ोन आते ही अमित जी का लिखा वह गीत मुझे याद आ गया कि "आप कहें और हम न आयें, ऐसे तो हालात नहीं"। एकदम से मुझे ऐसा लगा कि जैसे यह गीत उन्हीं पर लागू हो गया हो। ख़ैर, बातचीत का सिलसिला शुरू करते हैं। अमित जी, आपकी पैदाइश कहाँ की है? अपने माता-पिता और पारिवारिक पृष्ठभूमि  के बारे में कुछ बताइये। क्या कला, संस्कृति या फ़िल्म लाइन से आप से पहले आपके परिवार का कोई सदस्य जुड़ा हुआ था?

मेरा ताल्लुक दिल्ली से है। मेहरोली रोड पर हमारा घर है। मेरा स्कूल था सेण्ट. कोलम्बस और कॉलेज था सेण्ट. स्टीवेन्स। हमारे घर में कला-संस्कृति से किसी का दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था। हमारे घर में सब इंजीनियर थे, और नाना के तरफ़ सारे डॉक्टर थे।



तो फिर आप पर भी दबाव डाला गया होगा इंजीनियर या डॉक्टर बनने के लिए?

जी नहीं, ऐसी कोई बात नहीं थी, मुझे पूरी छूट थी कि जो मैं करना चाहूँ, जो मैं बनना चाहूँ, वह बनूँ। मेरा रुझान लिखने की तरफ़ था, इसलिए किसी ने मुझे मजबूर नहीं किया।



यह बहुत अच्छी बात है, और आजकल के माता-पिता जो अपने बच्चों पर इंजीनियर या डॉक्टर बनने के लिए दबाव डालते हैं, और कई बार इसके विपरीत परिणाम भी उन्हें भुगतने पड़ते हैं, उनके लिए यह कहना ज़रूरी है कि बच्चा जो बनना चाहे, उसकी रुझान जिस फ़ील्ड में है, उसे उसी तरफ़ प्रोत्साहित करना चाहिए।

सही बात है!



अच्छा अमित जी, बाल्यकाल में या स्कूल-कॉलेज के दिनों में आप किस तरह के सपने देखा करते थे अपने करीयर को लेकर? वो दिन किस तरह के हुआ करते थे? अपने बचपन और कॉलेज के ज़माने के बारे में कुछ बताइए।

मैं जब 14-15 साल का था, तब मैंने अपना पहला नाटक लिखा था। फिर कविताएँ लिखने लगा, और तीनों भाषाओं में - हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी। फिर उसके बाद थियेटर से भी जुड़ा जहाँ पर मुझे वी. बी. कारन्त, बी. एम. शाह, ओम शिवपुरी, सुधा शिवपुरी जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला। वो सब NSD (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) से ताल्लुक रखते थे।



आपने भी NSD (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) में कोर्स किया था?

नहीं, मैंने कोई कोर्स नहीं किया।



आपने फिर किस विषय में पढ़ाई की?

मैंने इंगलिश लिटरेचर में एम.ए. किया है।



इंगलिश में एम.ए. कर हिन्दी के गीतकार बने। आपने अपना यह करीयर किस तरह से शुरू किया?


कॉलेज में रहते समय मैं 'टेम्पस' नामक लातिन पत्रिका का सम्पादक था, 1969 से 1971 के दौरान। दिल्ली यूनिवर्सिटी में 'डीबेट ऐण्ड ड्रामाटिक सोसायटी' का सचिव भी था। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भी फ़िल्म सम्बन्धी लेख लिखता था। कॉलेज में रहते ही मेरी मुलाक़ात हुई देव (आनंद) साहब से, जो उन दिनों दिल्ली में अपने 'नवकेतन' का एक डिस्ट्रिब्यूशन ऑफ़िस खोलना चाहते थे। तो मुझे उन्होंने कहा कि तुम भी कभी कभी चक्कर मार लिया करो। इस तरह से मैं उनसे जुड़ा और उस वक़्त फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' बन रही थी। मुझे उस फ़िल्म के स्क्रिप्ट में काम करने का उन्होंने मौका दिया और मुझे उस सिलसिले में वो नेपाल भी लेकर गए। मुझे कोई स्ट्रगल नहीं करना पड़ा। यश जोहर नवकेतन छोड़ गये थे और मैं आ गया।


अच्छा, फिर उसके बाद आपने उनकी किन किन फ़िल्मों में काम किया?

'नवकेतन' में मेरा रोल था 'एग्ज़ेक्युटिव प्रोड्यूसर' का। 1971 में देव साहब से जुड़ने के बाद 'हीरा-पन्ना' (1973), 'शरीफ़ बदमाश' (1973), 'इश्क़ इश्क़ इश्क़' (1974), 'देस परदेस' (1978), 'लूटमार' (1980), इन फ़िल्मों में मैं 'एग्ज़ेक्यूटिव प्रोड्यूसर' था। 'जानेमन' (1976) और 'बुलेट' (1976) में मैं बिज़नेस एग्ज़ेक्यूटिव और प्रोडक्शन कन्ट्रोलर था।



एग्ज़ेक्यूटिव प्रोड्यूसर से प्रोड्युसर आप कब बनें?

फ़िल्म 'मन-पसंद' से। 1980 की यह फ़िल्म थी, इसके गीत भी मैंने ही लिखे थे। फ़िल्म के डिरेक्टर थे बासु चटर्जी और म्यूज़िक डिरेक्टर थे राजेश रोशन।





वाह! इस फ़िल्म के गीत तो बहुत ही कर्णप्रिय हैं। "होठों पे गीत जागे, मन कहीं दूर भागे", "चारु चंद्र की चंचल चितवन", "मैं अकेला अपनी धुन में मगन", एक से एक लाजवाब गीत। अच्छा राजेश रोशन के साथ आपने बहुत काम किया है, उनसे मुलाक़ात कैसे हुई थी?

राजेश रोशन के परिवार को मैं जानता था, राकेश रोशन से पहले मिल चुका था, इस तरह से उनके साथ जान-पहचान थी।



एक राजेश रोशन, और दूसरे संगीतकार जिनके साथ आपने अच्छी पारी खेली, वो थे बप्पी लाहिड़ी साहब। उनसे कैसे मिले?

इन दोनों के साथ मैंने कुछ 20-22 फ़िल्मों में काम किये होंगे। मेरा पहला गीत जो है 'चलते चलते' का शीर्षक गीत, वह मैंने बप्पी लाहिड़ी के लिए लिखा था। उन दिनों वो नये नये आये थे और हमारे ऑफ़िस में आया करते थे। मैं उनको प्रोड्यूसर भीष्म कोहली के पास लेकर गया था। तो वहाँ पर उनसे कहा गया कि फ़िल्म के टाइटल सॉंग के लिये कोई धुन तैयार करके बतायें। केवल 15 मिनट के अंदर धुन भी बनी और मैंने बोल भी लिखे।



वाह! केवल 15 मिनट में यह कालजयी गीत आपने लिख दिया, यह तो सच में आश्चर्य की बात है!

देखिये, मेरा गीत लिखने का तरीका बड़ा स्पॉन्टेनीयस हुआ करता था। मैं वहीं ऑफ़िस में ही लिखता था, घर में लाकर लिखने की आदत नहीं थी। फ़िल्म में गीत लिखना एक प्रोफ़ेशनल काम है; जो लोग ऐसा कहते हैं कि उन्हें घर पर बैठे या प्रकृति में बैठ कर लिखने की आदत है तो यह सही बात नहीं है। फ़िल्मी गीत लिखना कोई काविता या शायरी लिखना नहीं है। आज लोग कहते हैं कि आज धुन पहले बनती है, बोल बाद में लिखे जाते हैं, लेकिन मैं यह कहना चाहूँगा कि उस ज़माने में भी धुन पहले बनती थी, बोल बाद में लिखे जाते थे, 'प्यासा' में भी ऐसा ही हुआ था, 'देवदास' में भी ऐसा ही हुआ था।



किशोर कुमार के गाये 'चलते चलते' फ़िल्म का शीर्षक गीत "कभी अलविदा ना कहना" तो जैसे एक ऐन्थेम सॉंग् बन गया है। आज भी यह गीत उतना ही लोकप्रिय है जितना उस ज़माने में था, और अब भी हम इस गीत को सुनते हैं तो एक सिहरन सी होती है तन-मन में। "हम लौट आयेंगे, तुम यूँही बुलाते रहना" सुन कर तो आँखें भर जाती हैं।  और अब तो एक फ़िल्म भी बन गई है 'कभी अलविदा ना कहना' के शीर्षक से। अच्छा अमित जी, 'चलते चलते' फ़िल्म का ही एक और गीत था लता जी का गाया "दूर दूर तुम रहे, पुकारते हम रहे..."। इसके बारे में भी कुछ बताइए?

जी हाँ, इस गीत के लिए उन्हें अवार्ड भी मिला था। इस गीत की धुन बी. जे. थॉमस के मशहूर गीत "raindrops keep falling on my head" की धुन से इन्स्पायर्ड थी।



अच्छा, 'चलते चलते' के बाद फिर आपकी कौन सी फ़िल्में आईं?

उसके बाद मैंने बहुत से ग़ैर-फ़िल्मी गीत लिखे, 80 के दशक में, करीब 100-150 गानें लिखे होंगे। फ़िल्मी गीतों की बात करें तो 'रामसे ब्रदर्स' की 4-5 हॉरर फ़िल्मों में गीत लिखे, जिनमें अजीत सिंह के संगीत में 'पुराना मन्दिर' भी शामिल है।



सुजॉय - 'पुराना मन्दिर' का आशा जी का गाया "वो बीते दिन याद हैं" गीत तो ख़ूब मकबूल हुआ था। अच्छा अमित जी, यह बताइए कि जब आप कोई गीत लिखते हैं तो आप की रणनीति क्या होती है, किन बातों का ध्यान रखते हैं, कैसे लिखते हैं?

देखिए मैं बहुत spontaneously लिखता हूँ। मैं दफ़्तर या संगीतकार के वहाँ बैठ कर ही लिखता था। घर पे बिल्कुल नहीं लिखता था। फ़िल्म में गीत लिखना कोई कविता लिखना नहीं है कि किसी पहाड़ पे जा कर या तालाब के किनारे बैठ कर लिखने की ज़रूरत है, जो ऐसा कहते हैं वो झूठ कहते हैं। फ़िल्मों में गीत लिखना एक बहुत ही कमर्शियल काम है, धुन पहले बनती है और आपको उस हिसाब से सिचुएशन के हिसाब से बोल लिखने पड़ते हैं। हाँ कुछ गीतकार हैं जिन्होंने नए नए लफ़्ज़ों का इस्तमाल किया, जैसे कि राजा मेहन्दी अली ख़ाँ साहब, मजरूह साहब, साहिर साहब। इनके गीतों में आपको उपमाएँ मिलेंगी, अन्य अलंकार मिलेंगे।



अच्छा अलंकारों की बात चल रही है तो फ़िल्म 'मन-पसन्द' में आपने अनुप्रास अलंकार का एक बड़ा ख़ूबसूरत प्रयोग किया था, उसके बारे में बताइए।

'मन-पसन्द' मैंने ही प्रोड्यूस की थी। फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसा आया कि जिसमे छन्दों की ज़रूरत थी। देव आनन्द टिना मुनीम को गाना सिखा रहे हैं। तो मैंने उसमें जयदेव की कविता से यह लाइन लेकर गीत पूरा लिखा।



बहुत सुन्दर!

मैं यह समझता हूँ कि जो एक गीतकार लिखता है उस पर उसके जीवन और तमाम अनुभवों का असर पड़ता है। उसके गीतों में वो ही सब चीज़ें झलकती हैं। सबकॉनशियस माइण्ड में वही सबकुछ चलता रहता है गीतकार के।



'मनपसन्द' के सभी गीत इतने सुन्दर हैं कि कौन सा गीत किससे बेहतर है बताना मुश्किल है। "सुमन सुधा रजनीगंधा" भी लाजवाब गीत है। अच्छा, अमित जी, राजेश रोशन और बप्पी लाहिड़ी के अलावा और किन किन संगीतकारों के साथ आपने काम किया है?

लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के साथ फ़िल्म 'भैरवी' में काम किया, एक और फ़िल्म थी उनके साथ जो बनी नहीं। भूपेन हज़ारिका के साथ NFDC की एक फ़िल्म 'कस्तूरी' में गीत लिखा। दान सिंह के साथ भी काम किया है। जगजीत सिंह के साथ भी काम किया है, दूरदर्शन का एक सीरियल था, जलाल आग़ा साहब का, उसमें। अनु मलिक की 2-3 फ़िल्मों में गीत लिखे, रघुनाथ सेठ के साथ 1-2 फ़िल्मों में। इस तरह से कई संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला।



अमित जी, कई नए कलाकार आप ही के लिखे गीत गा कर फ़िल्म-जगत में उतरे थे, उनके बारे में बताइए।

अलका याग्निक ने अपना पहला गीत 'हमारी बहू अलका' में गाया था जिसे मैंने लिखा था। उदित नारायण ने भी अपना पहला गीत रफ़ी साहब के साथ 'उन्नीस बीस' फ़िल्म में गाया था जो मेरा लिखा हुआ था। शरण प्रभाकर, सलमा आग़ा ने मेरे ग़ैर फ़िल्मी गीत गाए। पिनाज़ मसानी का पहला फ़िल्मी गीत मेरा ही लिखा हुआ था। शंकर महादेवन ने पहली बार एक टीवी सीरियल में गाया था मेरे लिए। सुनीता राव भी टीवी सीरियल से आई हैं। फिर शारंग देव, जो पंडित जसराज के बेटे हैं, उनके साथ मैंने 2-3 फ़िल्मों में काम किया।



जी हाँ, फ़िल्म 'शेष' में आप प्रोड्यूसर, डिरेक्टर, गीतकार, कहानीकार, पटकथा, संवाद-लेखक सभी कुछ थे और संगीत दिया था शारंग देव ने।

फिर इलैयाराजा के लिए भी गीत लिखे। गायकों में किशोर कुमार ने सबसे ज़्यादा मेरे गीत गाये, रफ़ी साहब नें कुछ 8-10 गीत गाये होंगे। लता जी, आशा जी, मन्ना डे साहब, और मुकेश जी ने भी मेरे दो गीत गाये हैं, दोनों डुएट्स थे, एक बप्पी लाहिड़ी के लिए, एक राजेश रोशन के लिए। इनके अलावा अमित कुमार, शैलेन्द्र सिंह, कविता कृष्णमूर्ति, अलका, अनुराधा, उषा उथुप ने मेरे गीत गाये हैं। भीमसेन जोशी जी के बेटे के साथ मैंने एक ऐल्बम किया है। नॉन-फ़िल्म में नाज़िया हसन और बिद्दू ने मेरे कई गीत गाए हैं। मंगेशकर परिवार के सभी कलाकारों ने मेरे ग़ैर-फ़िल्मी गीत गाए हैं। मीना मंगेशकर का भी एक ऐल्बम था मेरे लिखे हुए गीतों का। मीना जी ने उसमें संगीत भी दिया था, वर्षा ने गीत गाया था।



अमित जी, ये तो थीं बातें आपके फ़िल्मी गीतकार की, अब मैं जानना चाहूँगा 'प्लस चैनल' के बारे में।

'प्लस चैनल' हमने 1990 में शुरु की थी पार्टनर्शिप में, जिसने मनोरंजन उद्योग में क्रान्ति ला दी। उस समय ऐसी कोई संस्था नहीं थी टीवी प्रोग्रामिंग की। महेश भट्ट भी 'प्लस चैनल' में शामिल थे। हमनें कुछ 10 फ़ीचर फ़िल्मों और 3000 घंटों से उपर टीवी प्रोग्रामिंग और 1000 म्युज़िक ऐल्बम्स बनाए। 'बिज़नेस न्यूज़', 'ई-न्यूज़' हमने शुरु की थी। पहला म्युज़िक विडियो हमने ही बनाया, नाज़िया हसन को लेकर।



'प्लस चैनल' तो काफ़ी कामयाब रहा, पर आपने इसे बन्द क्यों कर दिया?

रिलायन्स में आने के बाद बन्द कर दिया।



क्या आपने गीत लिखना भी छोड़ दिया है?

जी हाँ, अब बस मैं नए लोगों को सिखाता हूँ, मेन्टरिंग का काम करता हूँ। रिलायन्स एन्टरटेन्मेण्ट का चेयरमैन हूँ, सलाहकार हूँ, बच्चों को सिखाता हूँ।



अच्छा अमित जी, चलते चलते अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए।

मैं अकेला हूँ, मैंने शादी नहीं की।



अच्छा अच्छा। फिर तो 'मनपसन्द' का गीत "मैं अकेला अपनी धुन में मगन, ज़िन्दगी का मज़ा लिए जा रहा था" गीत आपकी ज़िन्दगी से भी कहीं न कहीं मिलता-जुलता रहा होगा। ख़ैर, अमित जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका, इतनी व्यस्तता के बावजूद आपने हमें समय दिया, फिर कभी सम्भव हुआ तो आपसे दुबारा विस्तार से बातचीत होगी। बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

धन्यवाद!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Tuesday, April 21, 2015

शाहिद अजनबी की लघुकथा माँ तो सबकी एक-जैसी होती है

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में गिरिजेश राव की लघुकथा "मुक्ति" का वाचन सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं शाहिद मंसूर "अजनबी" की लघुकथा माँ तो सबकी एक-जैसी होती है, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी का गद्य सुख़नफ़हम ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है। इस कहानी का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 15 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

लफ़्ज़ों को तोड़ता हूँ, रदीफ़-काफिया जोड़ता हूँ
यूँ समझो दिल की उलझन को, काग़ज़ पे उतारता हूँ

 ~ शाहिद मंसूर "अजनबी"

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"माँ का खत पढ़ने से पूर्व मैं सहम गया। जरूर पैसे भेजने को लिखा होगा।”
 (शाहिद मंसूर "अजनबी" की लघुकथा "माँ तो सबकी एक-जैसी होती है" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
माँ तो सबकी एक-जैसी होती है MP3

#Seventh Story, Maa;  Shahid Ajnabi; Hindi Audio Book/2015/07. Voice: Anurag Sharma

Sunday, April 19, 2015

बिलावल थाट के राग : SWARGOSHTHI – 215 : BILAWAL THAAT




स्वरगोष्ठी – 215 में आज


दस थाट, दस राग और दस गीत – 2 : बिलावल थाट


'तेरे सुर और मेरे गीत दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...' 





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे बिलावल थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग बिलावल में निबद्ध एक खयाल प्रस्तुत करेंगे। साथ ही इस थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग बिहाग के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे।



भारतीय संगीत के रागों को उनमें लगने वाले स्वरों के अनुसार वर्गीकृत करने की प्रणाली को थाट कहा जाता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने कुल दस थाट के अन्तर्गत सभी रागों का वर्गीकरण किया था। उन्होने थाट के कुछ लक्षण बताए हैं। किसी भी थाट में कम से कम सात स्वरों का प्रयोग ज़रूरी है। थाट में ये सात स्वर स्वाभाविक क्रम में रहने चाहिये। अर्थात सा के बाद रे, रे के बाद ग आदि। थाट को गाया-बजाया नहीं जा सकता। इसके स्वरों के अनुकूल किसी राग की रचना की जा सकती है, जिसे गाया बजाया जा सकता है। एक थाट से कई रागों की रचना हो सकती है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने आपको ‘कल्याण’ थाट का परिचय दिया था। आज का दूसरा थाट है- ‘बिलावल’। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि अर्थात सभी शुद्ध स्वर का प्रयोग होता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे कृत ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ (भाग-1) के अनुसार ‘बिलावल’ थाट का आश्रय राग ‘बिलावल’ ही है। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग हैं- अल्हैया बिलावल, बिहाग, देशकार, हेमकल्याण, दुर्गा, शंकरा, पहाड़ी, भिन्न षडज, हंसध्वनि, माँड़ आदि। राग ‘बिलावल’ में सभी सात शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गांधार होता है। इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल का प्रथम प्रहर होता है।

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ 
अब हम आपको राग ‘बिलावल’ पर आधारित एक खयाल रचना सुनवाते हैं। यह रचना एक ऐसे महान संगीतज्ञ की आवाज़ में है, जो उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। किराना घराने के इस महान कलासाधक को हम उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के नाम से जानते हैं। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। सुप्रसिद्ध गायिका रोशन आरा बेग़म सबसे छोटे भाई अब्दुल हक़ की सुपुत्री थीं। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत की सभाओं गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। आइए, खाँ साहब की आवाज़ में सुनिए राग बिलावल की एक दुर्लभ रिकार्डिंग।


राग बिलावल : ‘प्यारा नज़र नहीं आवे...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ




संगीतकार बसन्त देसाई 
राग बिलावल का उल्लेख ‘गुरुग्रन्थ साहब’ में भी मिलता है। सम्पूर्ण गुरुवाणी को 31 रागों में बाँधा गया है। इसके 16वें क्रम पर राग बिलावल में निबद्ध पद हैं। ग्रन्थ के पृष्ठ संख्या 795 से लेकर 859 तक की रचनाएँ इसी राग में निबद्ध हैं। बिलावल थाट के अन्तर्गत आने वाले रागों में एक प्रमुख राग बिहाग भी है, जिसमे सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। बिहाग, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग बिहाग के आरोह के स्वर हैं- साग मप निसां और अवरोह के स्वर हैं- सां निधप मग रेसा। यह राग रात्रि के दूसरे प्रहर में गाया-बजाया जाता है। अब हम आपको राग बिहाग में पिरोया एक आकर्षक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से लिया है। भरत व्यास के लिखे गीत को संगीतकार बसन्त देसाई ने राग बिहाग के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। गीत के बोल हैं- ‘तेरे सुर और मेरे गीत, दोनों मिल कर बनेगी प्रीत...’ जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग बिहाग : ‘तेरे सुर और मेरे गीत...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गूँज उठी शहनाई : संगीत – बसन्त देसाई


संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 215वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको फिल्म में शामिल एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 25 अप्रेल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 217वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 213वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ द्वारा प्रस्तुत खयाल का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे गए थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- उस्ताद राशिद खाँ। इस बार की पहेली में पहले और दूसरे प्रश्न के सही उत्तर देकर तीनों प्रतिभागियों ने पूरे दो-दो अंक अर्जित किये हैं। तीसरे प्रश्न के उत्तर में तीनों प्रतिभागी भ्रमित हुए। जबलपुर से क्षिति तिवारी ने इस प्रश्न कोई उत्तर नहीं दिया है। हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने गायक कलाकार को उस्ताद अमीर खाँ के रूप में पहचाना है। पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया ने एकदम सही उत्तर तो नहीं दिया है, किन्तु उस्ताद राशिद खाँ के साथ पण्डित राजन मिश्र के नाम का विकल्प भी दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे बिलावल थाट और राग पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक और थाट के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Saturday, April 18, 2015

"फूल तुम्हें भेजा है ख़त में..." - किस प्रेम-पत्र से मिला था इस गीत को लिखने की प्रेरणा?


एक गीत सौ कहानियाँ - 57
 

फूल तुम्हें भेजा है ख़त में...’




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 57-वीं कड़ी में आज जानिये 1968 की पुरस्कृत फ़िल्म 'सरस्वतीचन्द्र' के सदाबहार युगल गीत "फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर और मुकेश ने गाया था। 
 
पन्यासों को आधार बना कर बनने वाली फ़िल्मों में 1968 की नूतन और मनीष अभिनीत फ़िल्म ’सरस्वतीचन्द्र’ एक उल्लेखनीय फ़िल्म थी। गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी की इसी शीर्षक से मूल उपन्यास को फ़िल्म के परदे पर उतारा निर्देशक गोविन्द सरय्या ने। 19-वीं सदी की सामन्तवाद के पार्श्व पर लिखी इस उपन्यास के फ़िल्मी संस्करण को उस वर्ष के राष्ट्रीय और फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कारों में ख़ास जगह मिली। जहाँ सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफ़ी और सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए क्रम से नरिमन इरानी और कल्याणजी-आनन्दजी को राष्ट्रीय पुरस्कार मिले, वहीं फ़िल्मफ़ेअर में सर्वश्रेष्ठ संवाद के लिए अली रज़ा को पुरस्कार मिला। इसके अतिरिक्त फ़िल्मफ़ेअर में इस फ़िल्म के कई पक्षों को नामांकन मिले। फ़िल्म में इन्दीवर के लिखे गीत और कल्याणजी-आनन्दजी का संगीत वाकई यादगार साबित हुआ और फ़िल्म के सभी छह गीत आज तक लोकप्रिय हैं। "चंदन सा बदन चंचल चितवन" के दो संसकर्ण सहित अन्य चार गीत हैं "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए", "मैं तो भूल चली बाबुल का देस", "हमने अपना सब कुछ खोया" और एकमात्र योगल गीत "फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है"। 

Lata, Indeevar & Mukesh
आज इस युगल गीत के बनने की दिलचस्प कहानी प्रस्तुत है। आज कलाकारों को उनकी कला की प्रतिक्रिया फ़ेसबूक, ट्विटर, एस.एम.एस, ई-मेल, वाट्स-ऐप आदि के माध्यम से मिल जाते हैं, पर एक ज़माना ऐसा था जब डाक के ज़रिए कलाकारों को ’fan mails'  आते थे। ख़तों के ज़रिए लोग अपने चहीते फ़नकारों को अपने दिल की बात, तारीफ़ें, शिकायतें पहुँचाते थे। कल्याणजी-आनन्दजी को भी ऐसे ख़त ढेरों मिलते थे। इसका एक कारण यह भी था कि लोग जानते थे कि कल्याणजी-आनन्दजी भाई केवल नए गायकों को ही नहीं बक्लि अभिनेताओं, निर्देशकों, लेखक-गीतकारों को भी मौका दिलवा देते हैं। तो एक बार यूं हुआ कि एक ख़त आया उनके घर जिस पर एक सफ़ेद फूल बना हुआ था और एक लिप-स्टिक से सिर्फ़ होंठ बने हुए थे। बस इतना ही था, कुछ और नहीं लिखा हुआ था सिवार "To Dear" के। कल्याणजी और आनन्दजी ने जब यह ख़त देखा तो दुविधा में पड़ गए कि यह प्रेम-पत्र भला किसके लिए आया है! इन्होंने इन्दीवर जी को यह ख़त दिखाया और कहा कि देखो ऐसे-ऐसे ख़त अब आने लगे हैं! इन्दीवर जी बोले कि "यह कौन है, होगी तो कोई लड़की, ये होंठ भी तो छोटे हैं तो लड़की की ही होगी"। उन्होंने पूछा कि किसके नाम पे आया है। आनन्दजी मज़ा लेते हुए कहा कि "To Dear" के नाम से आया है, आप अपना नाम लिख लो, मैं अपने नाम पे लिख लूँ या कल्याणजी भाई के नाम पे लिख देता हूँ। इन्दीवर जी बोले कि "इस पर तो गाना बन सकता है, फूल तुम्हें भेजा है ख़त में फूल नहीं मेरा दिल है, वाह वाह वाह वाह, अरे वाह वाह करो तुम!" आनन्दजी भाई ने कहा "और यह लिपस्टिक?" "भाड में जाए लिप-स्टिक, इसको आगे बढ़ाते हैं", इन्दीवर जी का जवाब था। और इस तरह से उन्होंने यह गाना पूरा लिख डाला।

Kalyanji-Anandji
गाना पूरा हो जाने के बाद बारी आई इसे धुन में पिरोने की। इस बारे में भी आनन्दजी ने अपने एक साक्षात्कार में विस्तृत जानकारी दी है। उन्हीं के शब्दों में पढ़िए इस गीत के रचना प्रक्रिया की आगे की दास्तान। "अब गाना बनने के बाद हुआ कि प, फ, ब, भ, ये आप या तो क्रॉस करके गाइए या लास्ट में आएगा। तो इसके लिए क्या करना पड़ता है, ये मुकेश जी गाने वाले थे, तो जब यह गाना पूरा बन गया तो यह लगा कि ऐसे सिचुएशन पे जो मंझा हुआ चाहिए, वह है कि भाई कोई सहमा हुआ कोई, डिरेक्ट बात भी नहीं की है, "फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है, प्रियतम मेरे मुझको लिखना क्या यह तुम्हारे क़ाबिल है", मतलब वो भी एक इजाज़त ले रही है कि आपके लायक है कि नहीं। यह नहीं कि नहीं नहीं यह तो अपना ही हो गया, वो भी पूछ रही है मेरे से। तो ये मुकेश जी हैं तो पहले "फूल", "भूल", "भेजा" भी आएगा। मैंने इन्दीवर जी को बोला कि देखिए ऐसा ऐसा है। बोले कि तुम बनिये के बनिये ही रहोगे, कभी सुधरोगे नहीं तुम। जिसपे गाना हो रहा है, उनको क्या लगेगा? जिसने लिखा है उसको कितना बुरा लगेगा? ऐसे ही रहेगा, तो हमने बोला कि चलो ऐसे ही रखते हैं! तो उसको फिर गायकी के हिसाब से क्या कर दिया, उसमें ’ब्रेथ इनटेक’ डाल दिया, साँस लेके अगर गाया जाए तो "phool" होगा "PHoool" नहीं होगा। "फूल तुम्हें भेजा है..", बड़ा डेलिकेट है कि वह फूल है, बहुत नरम वस्तु। तो उस नरम वस्तु को नरम तरीके से ही गाया जाए! गीत को सुन कर आप महसूस कर सकते हैं कि कितनी नरमी और नाज़ुक तरीक़े से लता जी और मुकेश जी ने "फूल" शब्द को गाया है। तो इस तरह से यह गाना बन गया, और यह गाना आज भी लोगों को पसन्द आता है, क्यों आता है यह समझ में नहीं आता, यह इन्दीवर जी का कमाल है, लोगों का कमाल है, उस माहौल का कमाल है।"

आनन्दजी भाई ने सबकी तारीफ़ें की अपने को छोड़ कर। यही पहचान होती है एक सच्चे कलाकार की। कल्याणजी-आनन्दजी के करीअर का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है ’सरस्वतीचन्द्र’ जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय सम्मान मिला। अभी हाल ही में फ़िल्मकार संजय लीला भनसाली ने ’सरस्वतीचन्द्र’ को छोटे परदे पर उतारा है जिसमें मुख्य चरित्रों में गौतम रोडे और जेनिफ़र विन्गेट ने अभिनय किया। गोविन्द सरय्या की फ़िल्म तो फ़्लॉप रही, और भनसाली का टीवी धारावाहिक भी बहुत ख़ास कमाल नहीं दिखा सकी। कमाल की बात बस यह है कि फ़िल्म ’सरस्वतीचन्द्र’ के गीतों को संगीत रसिक आज तक भूल नहीं पाए हैं और आज भी अक्सर रेडियो चैनलों पर सुनाई दे जाता है "फूल तुम्हें भेजा है ख़त में"। ख़त शीर्षक पर बनने वाले गीतों में निस्सन्देह यह गीत सर्वोपरि है।  लीजिए अब आप फिल्म 'सरस्वतीचन्द्र' का वही गीत सुनिए। 


फिल्म - सरस्वती चन्द्र : 'फूल तुम्हें भेजा है खत में...' : लता मंगेशकर और मुकेश : कल्याणजी आनंदजी




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।

खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र



Sunday, April 12, 2015

कल्याण थाट के राग : SWARGOSHTHI – 214 : KALYAN THAAT



स्वरगोष्ठी – 214 में आज

दस थाट, दस राग और दस गीत – 1 : कल्याण थाट

राग यमन की बन्दिश- ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ एक नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम आपसे कल्याण थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग यमन और भूपाली में निबद्ध गीतों के उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे। 



भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था।

भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट क्रमानुसार हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, भैरवी, और तोड़ी। इन दस थाटों के क्रम में पहला थाट है कल्याण। कल्याण थाट के स्वर होते हैं- सा, रे,ग, म॑, प ध, नि, अर्थात इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र होता है और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। कल्याण थाट का आश्रय राग कल्याण अथवा यमन होता है। आश्रय राग का अर्थ होता है, ऐसा राग, जिसमें थाट में प्रयुक्त स्वर की उपस्थिति हो। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- भूपाली, हिंडोल, हमीर, केदार, कामोद, नन्द, मारू बिहाग, छायानट, गौड़ सारंग आदि। इस थाट के आश्रय राग कल्याण अथवा यमन में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी छः स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। वादी स्वर गान्धार और संवादी निषाद होता है। इसका गायन-वादन समय गोधूली बेला अर्थात सूर्यास्त से लेकर रात्रि के प्रथम प्रहर तक होता है। राग कल्याण अथवा यमन के आरोह के स्वर हैं- सा रेग, म॑ प, ध, निसां  तथा अवरोह के स्वर सांनिध, पम॑ग, रेसा  होते हैं। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, राग यमन में निबद्ध एक खयाल, जिसे रामपुर सहसवान घराने के संवाहक उस्ताद राशिद खाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं- ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’


राग यमन : ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’ : उस्ताद राशिद खाँ




राग यमन, कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। मध्यकालीन ग्रन्थों में इस राग का यमन नाम से उल्लेख मिलाता है। परन्तु प्राचीन ग्रन्थों में इसका नाम केवल कल्याण ही मिलता है। आधुनिक ग्रन्थों में यमन एक सम्पूर्ण जाति का राग है। कल्याण थाट के अन्य रागों में एक अन्य प्रमुख राग भूपाली है। यह औड़व जाति का राग है, जिसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का पहला प्रहर इस राग के गायन-वादन का समय होता है। 

अब हम आपको राग भूपली के स्वरों में पिरोया एक मधुर फिल्मी गीत- ‘ज्योतिकलश छलके...’ सुनवाते हैं। यह गीत 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘भाभी की चूड़ियाँ’से है, जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। इसके संगीतकार सुधीर फडके और गीतकार हैं पण्डित नरेन्द्र शर्मा। जाने-माने संगीत समीक्षक और ‘संगीत’ मासिक पत्रिका के परामर्शदाता डॉ. मुकेश गर्ग ने इस गीत पर एक सार्थक टिप्पणी की है, जिसे हम इस स्तम्भ में रेखांकित कर रहे हैं।

सुधीर फड़के और नरेन्द्र शर्मा की कालजयी कृति। कैसे अद्भुत कम्पोजर और गायक थे सुधीर फड़के! रचना के बीच में उनके बोल-आलाप बताते हैं कि शब्दों को वह सिर्फ़ धुन में नहीं बाँधते, शब्द की सीमा से परे जा कर उसके अर्थ का अपनी गायकी से विस्तार भी करते हैं। इसी गीत को जब लता मंगेशकर गाती हैं तो हमें दाँतों-तले उँगली दबानी पड़ती है। सुधीर जी तो इसके संगीत-निर्देशक थे। इसलिए अपनी गायकी के अनुसार उन्होंने उसे रचा और गाया भी। पर लता दूसरे की रचना को कण्ठ दे रही हैं। ऐसी स्थिति में उन्होंने सुधीर जी की रचना में सुरों के अन्दर जो बारीक़ कारीगरी की है वह समझने से ताल्लुक़ रखती है। सुरों की फेंक, ऊर्जा, कोमलता और सूक्ष्म नक़्क़ाशी के कलात्मक मेल का यह स्तर हमें सिर्फ़ लता मंगेशकर में देखने को मिलता है। अन्य सभी गायिकाएँ तो उन्हें बस छूने की कोशिश ही कर पाती हैं।

अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भूपाली : ‘ज्योतिकलश छलके...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – भाभी की चूड़ियाँ






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 214वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुराने, हिन्दी फिल्म के एक राग आधारित सदाबहार गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस सदाबहार गीत के अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 220वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – या गीत किस गायिका की आवाज़ में है?

3 – इस गीत के संगीतकार की पहचान कीजिए और हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 18 अप्रैल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 216वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 212वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर की आवाज़ में प्रस्तुत एक टप्पा का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल अद्धा त्रिताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- टप्पा शैली। इस बार पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने दिये हैं। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से हमने नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की शुरुआत की है। इसके अन्तर्गत हम प्रत्येक अंक में भारतीय संगीत के प्रचलित दस थाट और उनके आश्रय रागों की चर्चा करेंगे। इसके थाट से जुड़े अन्य रागों पर आधारित फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। आपको यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें अवश्य लिखिएगा। यदि आप भी भारतीय संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा का सदुपयोग करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। आज बस इतना ही, अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


Saturday, April 11, 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 01 (रवीन्द्र जैन)


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 01
 

मन की आँखें हज़ार होती हैं...!’
रवीन्द्र जैन




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी। आज से हम इसी शीर्षक से एक नई शृंखला शुरू कर रहे हैं जिसमें हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किए हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है गीतकार, संगीतकार, कवि और गायक रवीन्द्र जैन को।


28 फ़रवरी 1944 के दिन पंडित इन्द्रमणि ज्ञान प्रसाद जी के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। परिवार में ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। पर जल्द ही यह पता चला कि उस बच्चे की आँखें बन्द हैं। डॉ. मोहनलाल ने जन्म के अगले दिन एक ऑपरेशन किया, उन्होंने उस बच्चे की आँखें खोली। पर जाँच करने के बाद उन्होंने ज्ञान प्रसाद जी को यह कठोर सत्य बता ही दिया कि भले आँखों की रोशनी धीरे धीरे आ सकती है, पर पढ़ना मुनासिब नहीं रहेगा क्योंकि ऐसा करने पर नुकसान होगा। परिवार में जैसे अन्धेरा छा गया। इस नवजात शिशु का नाम रखा गया रवीन्द्र। उनके पिता ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए यह निर्णय लिया था कि अपने पुत्र के जीवन का लक्ष्य संगीत ही होगा और संगीत में ही उसकी पहचान बनेगी। और यही हुआ। अपनी इस कमी को रवीन्द्र जैन ने भी कभी अपने उपर हावी नहीं होने दिया और अपनी लगन और बुद्धि के सहारे वो ना केवल एक गायक-संगीतकार बने बल्कि काव्य और साहित्य के भी विद्‍वान बने। 80 के व्यावसायिक दशक में भी उन्होंने अर्थपूर्ण गीत लिखे और कभी पैसे के पीछे भाग कर सस्ते गीत नहीं लिखे। रवीन्द्र जैन का नाम सुनते ही दिल श्रद्धा से भर जाता है, उन्हें प्रणाम करने को जी चाहता है।

रवीन्द्र जैन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्हें कभी भी अपने नेत्रहीनता पर अफ़सोस नहीं हुआ। उन्हीं के शब्दों में, "मैं जानता हूँ कि दुनिया में हर आदमी किसी ना किसी पहलू से विकलांग है, चाहे वो शरीर से हो, मानसिक रूप से हो या कोई अभाव जीवन में हो। विकलांगता का मतलब यह नहीं कि शारीरिक असुविधा है, कहीं ना कहीं लोग मोहताज हैं, अपाहिज हैं, और उसी पर विजय पाना है। उससे निराश होने की ज़रूरत नहीं है। disability can be your ability also, उससे आपकी क्षमता दुगुनी हो जाती है।"

और यही संदेश उन्होंने एक बार अंध-विद्यालय के छात्रों को भी दिया। उन्हें एक बार एक ब्लाइन्ड स्कूल में मुख्य अतिथि के रूप में आमन्त्रित किया गया। जब उन्हें बच्चों को संबोधित करने को कहा गया, तो उन्होंने संदेश के रूप में यह कविता पढ़ी...

तन की आँखें तो दो ही होती हैं
मन की आँखें हज़ार होती हैं
तन की आँखें तो सो ही जाती हैं
मन की आँखें कभी ना सोती हैं।

चाँद सूरज के हैं जो मोहताज
भीख ना माँगो उन उजालों से,
बन्द आँखों से तुम वो काम करो
आँख खुल जाए आँख वालों की।

हैं अन्धेरे बहुत सितारे बनो
दूसरों के लिए किनारे बनो,
है ज़माने में बेसहारे बहुत
तुम सहारे ना लो, सहारे बनो।

’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ रवीन्द्र जैन जी को दिल से करती है सलाम!




खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Sunday, April 5, 2015

टप्पा गीतों का लालित्य : SWARGOSHTHI – 213 : TAPPA



स्वरगोष्ठी – 213 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 11 : टप्पा

ऊँटों के काफिले के सौदागरों से उपजी टप्पा गायकी 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हमने भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत किया है, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली पिछली तीन कड़ियों में हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय ‘ठुमरी’ शैली पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपको ठुमरी के साथ-साथ विकसित हुई गीत शैली, टप्पा पर चर्चा करेंगे और उसका रसास्वादन भी करा रहे हैं। आज हम इस गोष्ठी में विख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर और उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ का गाया टप्पा प्रस्तुत कर रहे हैं। 


पंजाब की धरती पर विकसित संगीत शैली ‘टप्पा’ भी एक श्रृंगाररस प्रधान गायकी है। इस शैली में खयाल और ठुमरी, दोनों की विशेषताएँ उपस्थित रहती है। टप्पा गायन के लिए खयाल और ठुमरी, दोनों शैलियों का प्रशिक्षण और अभ्यास आवश्यक है। इसका विकास चूँकि पंजाब और सिन्ध के पहाड़ी क्षेत्रों में हुआ है, अतः अधिकतर टप्पा पंजाबी भाषा में मिलता है। सिन्ध क्षेत्र में ‘टप्पे’ नामक एक लोकगीत शैली का प्रचलन रहा है। यह लोकगीत आज भी पंजाब में सुनने में आता है। रागदारी संगीत के अन्तर्गत गाया जाने वाला टप्पा, ‘टप्पे’ लोकगीत से काफी भिन्न होता है। कुछ विद्वानों के मतानुसार पंजाब के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में ऊँटों पर अपना व्यापारिक सामान ढोने वाले सौदागरों द्वारा जो लोकगीत गाया जाता था, उनमें रागों का रंग भर कर टप्पा गायन शैली का विकास हुआ। इसे विकसित करने का श्रेय शोरी मियाँ को दिया जाता है। शोरी मियाँ का वास्तविक नाम गुलाम नबी था और ये सुप्रसिद्ध खयाल गायक गुलाम रसूल के पुत्र थे। शोरी मियाँ अठारहवीं शताब्दी में लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला के समकालीन थे। उनका कण्ठ खयाल गायकी के अनुकूल नहीं थी, इसीलिए उन्होने अपने गले के अनुकूल टप्पा गायकी को विकसित किया। काफी समय तक पंजाब प्रान्त में रहने के कारण पंजाबी भाषा और उस क्षेत्र के लोक संगीत का उन्हें ज्ञान हो गया था। शोरी मियाँ के पंजाबी भाषा में रचे अनेक टप्पा गीत आज भी गाये जाते हैं। शोरी मियाँ के पंजाब से लखनऊ आने के बाद टप्पा गायन का प्रचार-प्रसार लखनऊ संगीत जगत में भी हुआ। आगे चल कर पूरे उत्तर भारत में टप्पा गाया जाने लगा। पंजाब और लखनऊ के अलावा बनारस और ग्वालियर के प्रमुख खयाल गायकों ने टप्पा को अपना लिया।

अब हम प्रस्तुत करते हैं, ग्वालियर परम्परा में टप्पा गायन का एक उदाहरण, देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वरों में। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, उनके मधुर स्वर में सुनिए, राग भैरवी और अद्धा त्रिताल में निबद्ध एक पारम्परिक टप्पा।


टप्पा राग भैरवी : ‘लाल वाला जोबन मियाँ...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर




शोरी मियाँ के प्रमुख शिष्य मियाँ गम्मू और ताराचन्द्र थे। इन्होने भी टप्पा गायकी का भरपूर प्रचार किया। मियाँ गम्मू के पुत्र शादी खाँ भी टप्पा गायन में दक्ष थे और तत्कालीन काशी नरेश के दरबारी गवैये थे। लखनऊ, बनारस और ग्वालियर के ख्याल गायन पर भी टप्पा का प्रभाव पड़ा। नवाब वाजिद अली खाँ के समय में तो टप्पा अंग से खयाल गाना, गायक की एक विशेष योग्यता मानी जाती थी। टप्पा अंग से खयाल गायकी को लोकप्रियता मिलने के कारण एक नई गायन शैली का चलन हुआ, जिसे ‘ठप्प खयाल’ कहा जाने लगा। टप्पा की प्रकृति चंचल, लच्छेदार ताने, मुर्की, खटका आदि के प्रयोग के कारण खयाल और ठुमरी की गम्भीरता से दूर है। टप्पा गायन में शुरू से ही छोटी-छोटी दानेदार तानों से सजाया जाता है। स्वरों में किसी प्रकार की रुकावट नहीं होती। बोल आलाप का प्रयोग नहीं किया जाता। खयाल की तरह टप्पा गायन के घराने नहीं होते, किन्तु विभिन्न स्थानों पर विकसित टप्पा गायकी की प्रस्तुतियों में थोड़ा अन्तर मिलता है। ग्वालियर में प्रचलित टप्पा गायकी में खयाल का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है। इसी प्रकार बनारस में गेय टप्पा पर ठुमरी का प्रभाव परिलक्षित होता है। टप्पा का साहित्य श्रृंगाररस प्रधान होता है और ठुमरी की तरह अधिकतर खमाज, भैरवी, काफी, झिंझोटी, तिलंग, पीलू, बरवा आदि रागों में गायी जाती है। इसी प्रकार अधिकतर टप्पा पंजाबी, अद्धा त्रिताल, सितारखानी जैसे सोलह मात्रा के तालों में निबद्ध मिलता है। अब हम आपको रामपुर सहसवान घराने के सुविख्यात गायक उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ का गाया राग काफी का एक टप्पा सुनवाते हैं। आप इस टप्पा गायकी का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


टप्पा राग काफी : आ जा गले लग जा...’ : उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 213वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक घरानेदार गायक की आवाज़ में खयाल गायन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायक स्वर पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 11 अप्रेल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 215वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और पहली श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 211वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विख्यात गायिका विदुषी रसूलन बाई के स्वरों में प्रस्तुत की गई ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्नों के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दीपचन्दी। इस बार की पहेली में पूछे गए प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

इसके अलावा ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली क्रमांक 201 से 210, अर्थात दस अंकों की पहली श्रृंखला में उपरोक्त तीनों प्रतिभागियों- जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने सभी प्रश्नों के सही उत्तर देकर 20-20 अंक अर्जित कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है। तीनों विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से एक बार पुनः बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे टप्पा शैली पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला शुरू कर रहे है। इस श्रृंखला में हम उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित दस प्रकार के थाट पर चर्चा करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। पिछले दिनों हमारी एक नियमित प्रतिभागी पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘I would like more students be exposed to this kind of Quizes. It's a good exercise to review the subject and hope you can spread this message to all music lovers. I am doing it only for the fun and enjoy it too. I appreciate very much what you are doing in service to classical music and hope there will be some more ways to add to your website for this purpose’.
विजया जी के प्रति हम आभार प्रदर्शित करते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



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