Friday, January 10, 2014

साल की शुरुआत दो बेहद सुरीले प्रेम गीतों से

ताज़ा सुर ताल - 2014 - 01 

दोस्तों, हमने सोचा कि इस बार हम ताज़ा सुर ताल का कलेवर थोडा सा बदल दें. बजाय पूरी एल्बम की चर्चा करने के अब से हम हर सप्ताह दो चुनिंदा गीतों का जिक्र करेंगें, तो चलिए साल की शुरुआत करें कुछ मीठा सुनकर. अब आप ही कहें कि क्या प्रेम से मधुर कुछ है इस दुनिया में ? दोस्तों वर्ष २०१३ के सबसे सफल गायक साबित हुए अरिजीत सिंह, और आशिकी २ में तो उन्होंने प्रेम गीतों को एक अलग ही मुकाम तक पहुँचाया, सच कहें तो मोहित चौहान के बाद अरिजीत पहले ऐसे गायक हैं जिनमें एक लंबी पारी खेलने की कुव्वत नज़र आती है. कभी जो बादल बरसे मैं देखूँ तुझे ऑंखें भर के , तू लगे मुझे पहले बारिश की दुआ ... पैशन से भरे इस गीत में एक अजब सा नशा है. तुराज़ के शब्दों को शरीब तोशी ने बहुत ही प्यार से संवारा है. और अरिजित के तो कहना ही क्या, तो लीजिए सुनिए फिल्म जैकपोट  का ये गीत. 


अब इससे इत्तेफाक ही कहगें कि आज के हमारे दूसरे ताज़ा गीत में भी बारिश की झमाझम है,  बल्कि यहाँ तो गीत का नाम भी 'बारिश' ही है. आशिकी २ के निर्माताओं की ही ताज़ा पेशकश है फिल्म यारियाँ . यहाँ भी वर्ष २०१३ के सबसे सफल गीत तुम ही हो  के संगीतकार मिथुन ही हैं संचालक जो इस तरह के पैशनेट रोमांटिक गीतों के गुरु माने जाते हैं. गायक मोहम्मद इरफ़ान अली ने इस पूरे दिलोजान से निभाया है. बेहद कम समय में मोहम्मद इरफ़ान ने अपनी एक खास पहचान बना ली है. रहमान की खोज माने जाने वाले इरफ़ान ने फिर मोहब्बत  और बहने दे  जैसे हिते गीतों का प्लेबैक कर चुके हैं, और बारिश  गीत से इरफ़ान ने श्रोताओं को साल २०१४ की पहली संगीतमयी बारिश दे दी है. उन्हें बधाई देते हुए आईये सुनें इस गीत को यहाँ.
   

Thursday, January 9, 2014

सारंगी वादक राम नारायण का भी योगदान रहा इस यादगार गीत में

खरा सोना गीत - तुम क्या जानो
प्रस्तोता - अंतरा चक्रवर्ती
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 


Monday, January 6, 2014

Sunday, January 5, 2014

कुमार गन्धर्व, जसराज और मन्ना डे ने भी कबीर को गाया

  
स्वरगोष्ठी – 149 में आज

रागों में भक्तिरस – 17

‘दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की सत्रहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का नये वर्ष की पहली कड़ी में हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्तिरस कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने पन्द्रहवीं शताब्दी के सन्त कवि कबीर के व्यक्तित्व और उनके एक पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा की थी। पिछले अंक में हमने यह पद ध्रुवपद, भजन और मालवा की लोक संगीत शैली में प्रस्तुत किया था। कबीर का यही पद आज हम सुविख्यात गायक पण्डित कुमार गन्धर्व, पण्डित जसराज और पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। 
  


बीर एक सन्त कवि ही नहीं समाज सुधारक भी थे। उन्होने हिन्दू और मुस्लिम, दोनों धर्मों में व्याप्त रूढ़ियों के विरुद्ध अभियान चलाया था। अन्धविश्वासों पर कुठाराघात करते हुए कबीर ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल दिया। उन्होने अपने काव्य में बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। उनके काव्य में भरपूर व्यंग्य मौजूद है, जो अन्धविश्वास पर जोरदार प्रहार करते हैं। भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। कबीर की रचनाओं में अनेक भाषाओं के शब्द मिलते हैं। खड़ीबोली, ब्रज, भोजपुरी और पंजाबी के शब्द तो प्रचुर मात्रा में हैं। इसके अलावा तत्कालीन शासकों की अरबी और फारसी के शब्दों का भी उन्होने प्रयोग किया है। इसीलिए उनकी भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा जाता है। पिछले अंक में हमने कबीर के पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ पर चर्चा की थी। आज हम उस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए यही पद पहले पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। रागदारी संगीत में घरानों के घेरे को तोड़ कर अपनी एक अलग शैली का सूत्रपात करने वाले कुमार गन्धर्व मालवा के सबसे दिव्य सांस्कृतिक विभूति हैं। कुमार गन्धर्व एकमात्र ऐसे संगीतज्ञ हुए हैं जिन्होंने मालवा क्षेत्र की बोली मालवी और उसके लोकगीतों को रागों से सुसज्जित कर बन्दिशों का स्वरूप दिया। कबीर की रचनाओं पर उनका शोध भारतीय संगीत के भण्डार को समृद्ध करता है। स्वरों के माध्यम से मानो उन्होने कबीर के रहस्यवाद को पर्त-दर-पर्त खोल कर रख दिया हो। लोक संगीत को रागदारी संगीत के समकक्ष ले जाने वाले कुमार जी ने कबीर को जैसा गाया वैसा कोई नहीं गा सकेगा। आज के अंक में प्रस्तुत कबीर के पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ को कुमार जी ने राग जोगिया के स्वरों में बाँधा है। राग जोगिया भक्तिरस में छिपे वैराग्य भाव को अभिव्यक्त करने में पूर्ण समर्थ है। प्रथम प्रहर अर्थात सूर्योदय के समय गाया-बजाया जाने वाला यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। कर्नाटक संगीत पद्यति का राग सावेरी, इस राग के समतुल्य होता है। राग जोगिया के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। आरोह में ऋषभ और धैवत कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। अवरोह के दो रूप प्रचलित है। अवरोह के पहले रूप में गान्धार और निषाद स्पष्ट होता है। यह रूप कर्नाटक पद्यति के राग सावेरी के निकट होता है। दूसरे रूप में कोमल गान्धार स्वर केवल अवरोह में प्रयोग होता है, वह भी मात्र कण रूप में। यह रूप राग गुणकली के निकट हो जाता है। अवरोह में सात स्वर का प्रयोग होता है। इस प्रकार यह राग औड़व-सम्पूर्ण जाति का है। राग जोगिया में शुद्ध मध्यम स्वर पर न्यास अर्थात ठहराव दिया जाता है, जबकि राग भैरव में ऐसा नहीं होता। इसी प्रकार राग जोगिया में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का आन्दोलन नहीं होता, जबकि राग भैरव में ऐसा होता है। इस राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर मध्यम होता है। आइए, अब आप पण्डित कुमार गन्धर्व से कबीर का पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ सुनिए, जिसे उन्होने राग जोगिया और चाँचर ताल में प्रस्तुत किया है।


कबीर पद : ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व : राग - जोगिया : चाँचर ताल



कबीर के इस पद को अनेक श्रेष्ठ गायकों ने स्वर दिया है। इन्हीं में विश्वविख्यात कलासाधक हैं, पण्डित जसराज। कबीर के इस भक्तिपद का पण्डित जसराज के स्वरों से जो योग हुआ है, उसमें आध्यात्म पक्ष खूब मुखरित हुआ है। पण्डित जसराज की आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की गायन शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याममनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसन्धान कर कई नवीन बन्दिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है उनके द्वारा प्रवर्तित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो प्राचीन शास्त्रोक्त मूर्छना पद्यति को पुनर्जीवित करता है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में दो भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। जसराज जी के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। भक्तिरस तो इनकी हर रचना में परिलक्षित होता ही है। पण्डित जी ने कबीर के इस पद को राग अहीर भैरव के स्वरों का आवरण प्रदान किया है। अहीर भैरव एक प्राचीन राग है, जिसमें अप्रचलित और लुप्तप्राय राग अभीरी या अहीरी और भैरव का मेल है। स्वरों के माध्यम से भक्तिरस को उकेरने में सक्षम इस राग में कोमल ऋषभ और कोमल निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी शुद्ध स्वर होते हैं। राग अहीर भैरव के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है, अर्थात यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। यह राग भैरव थाट के अन्तर्गत माना जाता है। दक्षिण भारतीय कर्नाटक पद्यति का राग चक्रवाक, इस राग के समतुल्य है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। उत्तरांग प्रधान इस राग का गायन-वादन दिन के प्रथम प्रहर में अत्यन्त सुखदायी होता है। कबीर का पद- ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ अब आप पण्डित जसराज से राग अहीर भैरव के स्वरों में सुनिए।


कबीर पद : ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ : पण्डित जसराज: राग – अहीर भैरव





इसी क्रम में आज हम आपको मानव जीवन की उपमा एक चादर से करते कबीर के इस पद का एक फिल्मी संस्करण भी सुनवाते हैं। 1954 में कबीर के जीवन पर एक फिल्म ‘महात्मा कबीर’ बनी थी, जिसके संगीतकार अनिल विश्वास थे। इस फिल्म के संगीत के विषय में फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखते हैं- “1953 में मन्ना डे से फिल्म ‘हमदर्द’ के शास्त्रीय संगीत आधारित कंपोज़ीशन गवाने के बाद अनिल विश्वास ने ‘महात्मा कबीर’ में पुनः मन्ना डे के स्वर में ‘झीनी झीनी रे बीनी चदरिया...’, ‘घूँघट का पट खोल रे...’, ‘मनुआ तेरा दिन दिन बीता जाए...’ और ‘सतगुरु मोरा रंगरेज...’ जैसी रचनाएँ निर्गुण भक्ति की एक बेहद प्रभावशाली संगीत धारा का सृजन करती हैं। फिल्म संगीत में कबीर के दोहों और भजनों का इतना सुन्दर उदाहरण फिर नहीं मिलता।” दरअसल अनिल विश्वास ने इस पद को कीर्तन शैली में संगीतबद्ध किया है और मन्ना डे ने शब्दों को पूरी भावाभिव्यक्ति से गाया है। आप कबीर के इस पद का यह फिल्मी रूप भी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को विराम देने की अनुमति दीजिए। परन्तु पहेली में भाग लेना न भूलिए। 


कबीर पद : ‘चदरिया झीनी रे बीनी...’ : गायक - मन्ना डे : संगीत – अनिल विश्वास : फिल्म – महात्मा कबीर



  
आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 149वीं संगीत पहेली में हम आपको एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला तथा वर्ष का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – यह किस गायिका की आवाज़ है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 151वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

  
पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 147वीं संगीत पहेली में हमने आपको भजन गायक अनूप जलोटा की आवाज़ में कबीर के पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग देश और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी और चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


  
झरोखा अगले अंक का


मित्रों, नये वर्ष में भी ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे एक बार फिर निर्गुण ब्रह्म के उपासक सन्त कबीर के ही पद का रसास्वादन कराया। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि सूरदास की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसके माध्यम से अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Saturday, January 4, 2014

अभिनेता फ़ारूख़ शेख़ की पुण्य स्मृति को समर्पित है आज की 'सिने पहेली'

सिने पहेली –95



'सिने पहेली' के सभी चाहनेवालों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! और साथ ही नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें! दोस्तों, पिछले दिनों छुट्टियों का मौसम रहा। साल का अन्तिम सप्ताह पर्यटन का सप्ताह होता है, और आप भी ज़रूर कहीं न कहीं घूम आये होंगे। लेकिन साल के उस अन्तिम सप्ताह में अभिनेता फ़ारूख़ शेख़ के देहान्त का समाचार सुन कर दिल ग़मगीन हो गया। फ़ारूख़ शेख़ एक लाजवाब अभिनेता थे, उनका अपना ही एक अन्दाज़ था, जो सबसे अलग, सबसे जुदा था। अभिनय में इतनी सहजता थी कि उनके द्वारा निभाया हुआ कर किरदार बिल्कुल सच्चा लगता था। शारीरिक गठन, चेहरा और अभिनय, कुल मिला कर उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि उनके द्वारा निभाया किरदार हमारे परिवार का ही कोई सदस्य जैसा जान पड़ता था। और शायद यही वजह है कि फ़ारूख़ साहब हम सब के चहेते रहे। लगता ही नहीं कि वो आज हमारे बीच मौजूद नहीं हैं। आइए इस बेमिसाल फ़नकार की पुण्य स्मृति को समर्पित करते हैं आज की यह 'सिने पहेली'। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से फ़ारूख़ शेख़ को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि।


आज की पहेली : फ़ारूख़ शेख़ विशेष




फ़ारूख़ शेख़ को समर्पित आज की पहेली में हम आप से पूछ रहे हैं दो सवाल। नीचे फ़ारूख़ शेख़ अभिनीत दो फ़िल्मों की कहानियाँ दी गई हैं। इन कहानियों को पढ़ कर आपको इन फ़िल्मों को पहचानना होगा। 80 के दशक में दूरदर्शन पर आप ने इन फ़िल्मों को ज़रूर देखा होगा, इसलिए आज की यह पहेली ज़्यादा मुश्किल नहीं होनी चाहिये आपके लिए। है न? तो चलिए, पढ़िये इन कहानियों को झट से पहचान लीजिये इनकी फ़िल्मों को। (5 + 5 = 10 अंक)


1. ओमी और जय, दो युवक, लड़कियों को प्रभावित करने की प्रवृत्ति रखते हैं। जब उनके पड़ोस में एक नई लड़की नेहा आती है, तो उसे भी प्रभावित करने की कोशिश करते हैं पर बुरी तरह से असफल होते हैं। लेकिन ओमी और जय के साथ ही रूम शेअर करने वाले तीसरे युवक हैं सिद्धार्थ, जो काफ़ी शर्मीले स्वभाव का है और किताबों में डूबा रहता है। सिद्धार्थ और नेहा एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं। ओमी और जय से यह सहन नहीं होता, और दोनों मिल कर सिद्धार्थ और नेहा को अलग करने की हास्यास्पद तरीके इख़्तियार करते हैं। बड़ी मज़ेदार फ़िल्म रही थी यह।


2. राजाराम पी. जोशी एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुख़ रखने वाला क्लर्क है जो बम्बई के एक चाल में रहते हैं। वो अपने पड़ोसी संध्या से मन ही मन प्यार करते हैं, पर अपने दिल की बात उससे कह नहीं पाते। राजाराम के बातूनी दोस्त वासुदेव उसके यहाँ रहने आते हैं। वासुदेव और संध्या को एक दूसरे से प्यार हो जाता है, और राजाराम के परिवार वाले दोनों की शादी भी तय कर देते हैं। राजाराम अब भी कुछ नहीं कह पाते। लेकिन वासुदेव और संध्या के मंगनी के दिन वासुदेव गायब हो जाते हैं और मंगनी रद्द हो जाती है। संध्या टूट जाती है। राजाराम संध्या से इस क़दर प्यार करता है कि वो उससे अब भी शादी करने को तैयार हो जाता है और अपने दिल की बात उसे कह देता है। पर संध्या उसे बताती है कि वो वासुदेव के बच्चे की माँ बनने वाली है। क्या राजाराम अब भी संध्या को अपनाते हैं, या फिर क्या वासुदेव वापस आता है, यही है इस फ़िल्म की कहानी।



अपने जवाब आप हमें cine.paheli@yahoo.com पर 9 जनवरी शाम 5 बजे तक ज़रूर भेज दीजिये।


पिछली पहेली का हल


1. "जॉन जॉनी जनार्दन..." (नसीब) -- चित्र में दिखाये गये अभिनेता इस गीत में नज़र आते हैं।

2. "गुणी जनो, भक्त जनो..." (आँसू और मुस्कान) -- चित्र में दिखाये गये अभिनेताओं के नाम इस गीत में आते हैं।

3. a) "मैं लगती हूँ श्रीदेवी लगती हूँ" (नाकाबन्दी) -- चित्र में दिखाये गये अभिनेत्रियों के नाम इस गीत में आते हैं।

3. b) "कभी तू छलिया लगता है" (पत्थर के फूल) -- चित्र में दिखाये गये अभिनेत्रियों द्वारा अभिनीत फ़िल्मों के नाम इस गीत में आते हैं।

4. "सुन सुन सुन मेरी श्रीदेवी" (हम फ़रिश्ते नहीं) -- चित्र में दिखाये गये अभिनेत्रियों के नाम इस गीत में आते हैं।

5. "देखो देखो है शाम बड़ी दीवानी" (ओम शान्ति ओम) -- चित्र में दिखाये गये अभिनेता इस गीत में नज़र आते हैं। 




पिछली पहेली के विजेता


इस बार केवल एक खिलाड़ी ने 100% सही जवाब भेजा है और आप हैं बीकानेर के श्री विजय कुमार व्यास। 'सरताज प्रतियोगी' बनने पर आपको बहुत बहुत बधाई। आपके अलावा प्रकाश गोविन्द और पंकज मुकेश ने 80% सही जवाब भेजे। चन्द्रकान्त जी ने हमें सूचित किया कि उनके लिए यह पहेली कठिन रही और इसका हल वो न कर सके। कोई बात नहीं चन्द्रकान्त जी, आज की पहेली को सुलझानी की कोशिश कीजिये ज़रा!
इस सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोर कार्ड कुछ इस तरह का बना...






और अब महाविजेता स्कोर-कार्ड पर भी एक नज़र डाल लेते हैं।





इस सेगमेण्ट की समाप्ति पर जिन पाँच प्रतियोगियों के 'महाविजेता स्कोर कार्ड' पर सबसे ज़्यादा अंक होंगे, वो ही पाँच खिलाड़ी केवल खेलेंगे 'सिने पहेली' का महामुकाबला और इसी महामुकाबले से निर्धारित होगा 'सिने पहेली महाविजेता'। 


एक ज़रूरी सूचना:


'महाविजेता स्कोर कार्ड' में नाम दर्ज होने वाले खिलाड़ियों में से कौछ खिलाड़ी ऐसे हैं जो इस खेल को छोड़ चुके हैं, जैसे कि गौतम केवलिया, रीतेश खरे, क्षिति तिवारी, सलमन ख़ान, और महेश बसन्तनी। आप चारों से निवेदन है (आपको हम ईमेल से भी सूचित कर रहे हैं) कि आप इस प्रतियोगिता में वापस आकर महाविजेता बनने की जंग में शामिल हो जायें। इस सेगमेण्ट के अन्तिम कड़ी तक अगर आप वापस प्रतियोगिता में शामिल नहीं हुए तो महाविजेता स्कोर कार्ड से आपके नाम और अर्जित अंख निरस्त कर दिये जायेंगे और अन्य प्रतियोगियों को मौका दे दिया जायेगा।


तो आज बस इतना ही, नये साल में फिर मुलाक़ात होगी 'सिने पहेली' में। लेकिन 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के अन्य स्तंभ आपके लिए पेश होते रहेंगे हर रोज़। तो बने रहिये हमारे साथ और सुलझाते रहिये अपनी ज़िंदगी की पहेलियों के साथ-साथ 'सिने पहेली' भी, अनुमति चाहूँगा, नमस्कार!

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Thursday, January 2, 2014

साल २०१३ के कुछ बहतरीन गीत रेडियो प्लेबैक की टीम द्वारा चुने हुए

रेडियो प्लेबैक इंडिया के टॉप २५ गीत एक साथ सुनें संज्ञा टंडन के साथ. एक बार फिर नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ 

Wednesday, January 1, 2014

स्वागत 2014



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी पाठकों/श्रोताओं को 

नववर्ष की मंगलकामनाएँ 




मंगल ध्वनि : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ : शहनाई : राग – वृन्दाबनी सारंग, एक ताल


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