Saturday, April 27, 2013

‘बूझ मेरा क्या नाम रे...’ भाग 2


पार्श्वगायिका शमशाद बेगम को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की श्रद्धांजलि

‘ना बोल पी पी मोरे अँगना पंछी जा रे जा...'


फिल्म संगीत के सुनहरे दौर की गायिकाओं में शमशाद बेगम का 23 अप्रैल को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। खनकती आवाज़ की धनी इस गायिका ने 1941 की फिल्म खजांची से हिन्दी फिल्मों के पार्श्वगायन क्षेत्र में अपनी आमद दर्ज कराई थी। आत्मप्रचार से कोसों दूर रहने वाली इस गायिका को श्रद्धांजलि-स्वरूप हम अपने अभिलेखागार से अगस्त 2011 में अपने साथी सुजॉय चटर्जी द्वारा प्रस्तुत दस कड़ियों की लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे…' के सम्पादित अंश का दूसरा भाग प्रस्तुत कर रहे हैं।

मशाद बेगम के गाये गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे' की तीसरी कड़ी में सुजॉय चटर्जी का नमस्कार। कुछ वर्ष पहले वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के नेतृत्व में विविध भारती की टीम पहुँची थी शमशाद जी के पवई के घर में, और उनसे लम्बी बातचीत की थी। उसी बातचीत का पहला अंश पिछली कड़ी में हमनें पेश किया था, आइए आज उसी से आगे की बातचीत के कुछ और अंश पढ़ें।

शमशाद जी : मैंने मास्टर जी (गुलाम हैदर) से पूछा कि क्या दूसरा गाना गाउँ? इस पर उन्होने कहा कि नहीं, इतना ठीक है। फिर १२ गानों का ऐग्रीमेण्ट हो गया, हर गाने के लिए 12 रुपये। मास्टरजी नें उन लोगों से कहा कि इस लड़की को वो सब फ़ैसिलिटीज़ दो जो सब बड़े आर्टिस्टों को देते हो। उस ज़माने में 6 महीनों का कांट्रैक्ट हुआ करता था। 6 महीने बाद फिर रेकॉर्डिंग् वाले आ जाते थे। सुबह 10 से शाम 5 बजे तक हम रिहर्सल किया करते, म्युज़िशियन्स के साथ। मास्टरजी भी रहते थे। आप हैरान होंगे कि उन्हीं के गाने गा-गा कर मैं आर्टिस्ट बनी हूँ।

कमलजी : आप में भी लगन रही होगी?

शमशाद जी : मास्टर गुलाम हैदर साहब कहा करते थे कि इस लड़की में गट्स है, आवाज़ भी प्यारी है। शुरु में हर गीत के लिए 12 रूपए देते थे। पूरा सेशन ख़त्म होने पर मुझे पाँच हजार रूपए मिले। जब रब मेहरबान तो सब मेहरबान... (यहाँ शमशाद जी भावुक हो जाती हैं और रो पड़ती हैं) ...जब अच्छा काम करने के बाद रिजल्ट निकलता है तो फिर क्या कहने।

कमल जी : आप फिर रेडियो से भी जुड़ गईं, इस बारे में कुछ बताएँ।

शमशाद जी : जब मैंने गाना शुरू किया था रेडियो नहीं था, सिर्फ ग्रामोफोन कम्पनियाँ थीं, और बहुत मंहगा भी था। 100 रूपए कीमत थी ग्रामोफ़ोन की और एक रेकॉर्ड की कीमत ढाई रुपए होती थी। दो साल बाद जब हम तैयार हो गए, तब रब ने रेडियो खोल दिया और मैं पेशावर रेडियो में शामिल हो गई।

कमल जी : रेडियो में किसी प्रोड्यूसर को आप जानती थीं, आपको मौका कैसे मिला?

शमशाद जी : उस वक्त प्रोड्यूसर नहीं, स्टेशन डिरेक्टर होते थे, उनके लिए गाने वाले कहाँ से आयेंगे? तो इसके लिए वो ग्रामोफ़ोन कम्पनी वालों से पूछते थे, गायकों के बारे में। जिएनोफ़ोन कम्पनी से भी उन्होंने पूछा और इस तरह से मेरा नाम उन्हें मिल गया। मैंने पेशावर रेडियो से शुरुआत की, पश्तो, परशियन, हिन्दी, उर्दू और पंजाबी प्रोग्राम करने लगी। फिर लाहौर और दिल्ली रेडियो से भी जुड़ी।

दोस्तों, जुड़े हुए तो हम हैं पिछले 6 दशकों से शमशाद बेगम के गाये हुए गीतों के साथ। उनकी आवाज़ में जो आकर्षण है, रौनक है, जो चंचलता है, जो शोख़ी है, उसके जादू से कोई भी नहीं बच सकता। तीन दशकों में उनकी खनकती आवाज़ ने सुनने वालों पर जो असर किया था, वह असर आज भी बरकरार है। आइए आज की कड़ी में भी एक और असरदार गीत सुनते हैं 1949 की फ़िल्म 'दुलारी' से। ग़ुलाम हैदर और राम गांगुली के बाद, आज बारी है संगीतकार नौशाद साहब की। जैसा कि पहली कड़ी में हमनें ज़िक्र किया था कि नौशाद साहब के मुताबिक़ शमशाद जी की आवाज़ में पंजाब के पाँच दरियाओं की रवानी है। आइए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत को सुनते हुए नौशाद साहब के इसी बात को महसूस करने की कोशिश करते हैं। नौशाद साहब को याद करते हुए शमशाद जी नें अपनी 'जयमाला' में कहा था, "संगीतकार नौशाद साहब के साथ मैंने कुछ 16-17 फिल्मों में गाये है, जैसे- 'शाहजहाँ', 'दर्द', 'दुलारी', 'मदर इण्डिया', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'दीदार', 'अनमोल घड़ी', 'आन', 'बैजू बावरा', वगैरह। मेरे पास उनके ख़ूबसूरत गीतों का ख़ज़ाना है। लोग आज भी उनके संगीत के शैदाई हैं। मेरे स्टेज शोज़ में भी लोग ज़्यादातर उनके गीतों की ही फ़रमाइश करते हैं"। लीजिए, नौशाद साहब और शमशाद जी, इन दोनों को समर्पित, फिल्म ‘दुलारी’ का यह गीत सुनते हैं।


फिल्म दुलारी : ‘ना बोल पी पी मोरे अँगना पंछी जा रे जा...' : संगीत – नौशाद


‘शरमाए काहे, घबराए काहे, सुन मेरे राजा...’

दोस्तों, आजकल फ़िल्मों में आइटम नम्बर का बड़ा चलन हो गया है। शायद ही कोई ऐसी फ़िल्म बनती हो जिसमें इस तरह का गीत न हो। लेकिन यह परम्परा आज की नहीं है, बल्कि पचास के दशक से ही चली आ रही है। आज जिस तरह से कुछ विशेष गायिकाओं से आइटम साँग गवाये जाते हैं, उस ज़माने में भी वही हाल था। उन दिनों इस जौनर में शीर्ष स्थान शमशाद बेग़म का था। बहुत सी फ़िल्में ऐसी बनीं, जिनमें मुख्य नायिका का पार्श्वगायन किसी और गायिका नें किया, जबकि शमशाद बेगम से कोई ख़ास आइटम गीत गवाया गया। आज की कड़ी में आप सुनेंगे दादा सचिनदेव बर्मन की धुन पर शमशाद जी की मज़ाहिया आवाज़ और अंदाज़। ऐसा अनुभव होता है कि उस जमाने में किशोर कुमार जिस तरह की कॉमेडी अपने गीतों में करते थे, गायिकाओं में, और इस शैली में उन्हें टक्कर देने के लिए केवल एक ही नाम था, और वह था शमशाद बेगम का। 1951 में 'नवकेतन' की फ़िल्म आई थी 'बाज़ी', जिसमें मुख्य गायिका के रूप में गीता रॉय नें अपनी आवाज़ दीं और एक से एक लाजवाब गीत फ़िल्म को मिले, जिनमें शामिल हैं- “सुनो गजर क्या गाये...”, "तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले...”, "देख के अकेली मोहे बरखा सताये", "ये कौन आया" और "आज की रात पिया दिल ना तोड़ो...”। इन कामयाब और चर्चित गीतों के साथ फिल्म में एक गीत शमशाद बेगम का भी था, जिसनें भी ख़ूब मकबूलियत हासिल की उस ज़माने में। वह गीत है, "शरमाये काहे, घबराये काहे, सुन मेरे राजा, ओ राजा, आजा आजा...”। इस गीत में उन्होंने न केवल अपनी गायकी का लोहा मनवाया, बल्कि अजीब-ओ-गरीब हरकतों और तरह-तरह की आवाज़ें निकालकर कॉमेडी का वह नमूना पेश किया जो उससे पहले किसी गायिका नें शायद ही की होगी। और इसी वजह से आज की कड़ी के लिए हमने इस गीत को चुना है। साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ यह गीत है।

दोस्तों, आज के प्रस्तुत गीत में शमशाद जी भले ही हमे ना घबराने और ना शरमाने की सीख दे रही हैं, लेकिन हक़ीक़त यह भी है कि वो ख़ुद मीडिया से दूर भागती रहीं, पब्लिक फ़ंक्शन्स में वो नहीं जातीं, और यहाँ तक कि अपना पहला स्टेज शो भी पचास वर्ष की आयु होने के बाद ही उन्होंने दिया था। शमशाद जी तो सामने नहीं आतीं, लेकिन उनके गाये गीतों के रीमिक्स आज भी बाज़ार में छाये हैं। कैसा लगता है उनको? इस सवाल पर वो कहती हैं- "मुझे रीमिक्स से कोई शिकायत नहीं है। आज शोर-शराबे का ज़माना है, रिदम का ज़माना है, बच्चे लोग ऐसे गाने सुन कर ख़ुश होते हैं, झूमते हैं। मुझे भी अच्छा लगता है, पर कोई इन गीतों में हमारा नाम भी तो ले। लोग जब तक मुझे याद करते हैं, जब तक मेरे गाने बजाए जाते हैं, मैं ज़िन्दा हूँ”। शमशाद जी के गाये गीत हमेशा ज़िन्दा रहेंगे इसमें कोई शक़ नहीं है। तीन दशकों तक उन्होंने फिल्म संगीत जगत पर राज किया है। उनकी आवाज़ की खासियत ही यह है कि उनकी आवाज़ की ख़ुद की अलग पहचान है, खनक है, जो किसी अन्य गायिका से नहीं मिलती, और इसलिए उनकी प्रतियोगिता भी अपने आप से ही रही है। शमशाद जी के गाये ज़्यदातर गानें चर्चित हुए। मास्टर ग़ुलाम हैदर, नौशाद, ओ.पी. नैयर, सी. रामचन्द्र जैसे संगीतकारों ने उनकी आवाज़ को नई दिशा दी, और साज़ और आवाज़ के इस सुरीले संगम से उत्पन्न हुआ एक से एक कामयाब, सदाबहार गीत। आइए आज का सदाबहार गीत सुना जाये, लेकिन संगीतकार हैं, दादा बर्मन और फिल्म है, ‘बाज़ी’।


फिल्म बाज़ी : ‘शरमाए काहे, घबराए काहे, सुन मेरे राजा...’ : संगीत – सचिनदेव बर्मन


अगले अंक में जारी...

आपको हमारा यह विशेष श्रद्धांजलि अंक कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिए। इस श्रृंखला का अगला अंक हम गुरुवार, 2 मई को प्रकाशित करेंगे। हमें आपके सुझावों और विचारों की प्रतीक्षा रहेगी। आप हमें radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Friday, April 26, 2013

शमशाद बेगम को श्रद्धांजलि : भाग 1


पार्श्वगायिका शमशाद बेगम को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की श्रद्धांजलि

‘बूझ मेरा क्या नाम रे...’

फिल्म संगीत के सुनहरे दौर की गायिकाओं में शमशाद बेगम का 23 अप्रैल को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। खनकती आवाज़ की धनी इस गायिका ने 1941 की फिल्म खजांची से हिन्दी फिल्मों के पार्श्वगायन क्षेत्र में अपनी आमद दर्ज कराई थी। आत्मप्रचार से कोसों दूर रहने वाली इस गायिका को श्रद्धांजलि-स्वरूप हम अपने अभिलेखागार से अगस्त 2011 में अपने साथी सुजॉय चटर्जी द्वारा प्रस्तुत दस कड़ियों की लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे…' के सम्पादित अंश प्रस्तुत कर रहे हैं।

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, स्वागत है आप सभी का इस सुरीले सफ़र में। आज से एक नई श्रृंखला के साथ, मैं सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ हाज़िर हो गया हूँ। आज से शुरु होने वाली लघु श्रृंखला ‘बूझ मेरा क्या नाम रे...’, समर्पित है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की एक लाजवाब पार्श्वगायिका को। ये वो गायिका हैं दोस्तों, जिनकी आवाज़ की तारीफ़ में संगीतकार नौशाद साहब नें कहा था कि इसमें पंजाब की पाँचों दरियाओं की रवानी है। उधर ओ. पी. नय्यर साहब नें इनकी शान में कहा था कि इस आवाज़ को सुन कर ऐसा लगता है जैसे किसी मन्दिर में घंटियाँ बज रही हों। इस अज़ीम गुलुकारा नें कभी हमसे अपना नाम बूझने को कहा था, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि आज भी जब हम इनका गाया कोई गीत सुनते हैं तो इनका नाम बूझने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि इनकी खनकती आवाज़ ही इनकी पहचान है। प्रस्तुत है फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे…'

शमशाद बेगम के गाये गीतों की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आज 6 दशक बाद भी उनके गाये हुए गीतों के रीमिक्स जारी हो रहे हैं। आइए इस श्रृंखला में उनके गाये गीतों को सुनने के साथ-साथ उनके जीवन और करीयर से जुड़ी कुछ बातें भी जानें, और शमशाद जी के व्यक्तित्व को ज़रा करीब से जानने की कोशिश करें।

विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को सम्बोधित करते हुए शमशाद बेगम नें बरसों पहले अपनी दास्तान कुछ यूँ बयान की थीं- "देश के रखवालों, आप सब को मेरी दुआएँ। मेरे लिए गाना तो आसान है, पर बोलना बहुत मुश्किल। समझ में नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरु करूँ। आप मेरे गाने अपने बचपन से ही सुनते चले आ रहे होंगे, पर आज पहली बार आप से बातें कर रही हूँ। जगबीती बयान करना मेरे लिये बहुत मुश्किल है। दास्तान यूँ है कि मेरा जन्म लाहौर में 1919 में हुआ। उस समय लड़कियों को जो ज़रूरी तालीम दी जाती थी, मुझे भी दी गई। गाने का शौक घर में किसी को भी नहीं था, मेरे अलावा। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौक़ीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी-कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। मास्टर ग़ुलाम हैदर मेरे वालिद के अच्छे दोस्त थे। एक बार उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी और उनको मेरी आवाज़ पसन्द आ गई। मास्टरजी नें एक रेकॉर्डिंग कम्पनी ‘jien-o-phone’ के ज़रिये मेरा पहला रेकॉर्ड निकलवा दिया। 14 साल की उम्र में मेरा पहला गाना रेकॉर्ड हुआ, जो था- "हाथ जोड़ा लई पखियंदा ओये क़सम ख़ुदा दी चन्दा..."। उस रेकॉर्ड कम्पनी नें फिर मेरे 100 रेकॉर्ड्स निकाले। 1937 में मैं पेशावर रेडियो की आर्टिस्ट बन गई, जहाँ मैंने पश्तो, परशियन, हिन्दी, उर्दू और पंजाबी में प्रोग्राम पेश किए। पर मैंने कभी संगीत की कोई तालीम नहीं ली। 1939 में मैं लाहौर और फिर दिल्ली में रेडियो प्रोग्राम करने लगी। पंचोली जी नें पहली बार मुझे प्लेबैक का मौका दिया 1940 की पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' में, जिसमें मेरा गीत- "आ सजना…" काफ़ी हिट हुआ था। मेरी पहली हिन्दी फ़िल्म थी पंचोली साहब की 'ख़ज़ांची'। उन्होंने मुझसे फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाये। यह फ़िल्म 52 हफ़्तों से ज़्यादा चली।" दोस्तों, शमशाद जी नें बहुत ही कम शब्दों में अपने शुरुआती दिनों का हाल बयान कर दिया। लेकिन इतनी आसानी से हम भला सन्तुष्ट क्यों हों? इसलिये श्रृंखला के अगले अंक में हम उनसे इन्ही दिनों के बारे में विस्तार से जानेंगे। लेकिन फिलहाल सुना जाये, शमशाद जी की पहली हिन्दी फ़िल्म 'ख़ज़ांची' से उनका गाया यह गीत "सावन के नज़ारे हैं…"। मास्टर ग़ुलाम हैदर का संगीत है, और गीत लिखा है वली साहब ने। 1941 में बनी इस फ़िल्म को निर्देशित किया था मोती गिडवानी नें और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे एम. इस्माइल, रमोला और नारंग।

फिल्म खजांची : "सावन के नज़ारे हैं…" : संगीत – गुलाम हैदर




‘काहे कोयल शोर मचाए रे...’ :

पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है। जैसा कि पिछली कड़ी में हमने वादा किया था कि शमशाद जी के बचपन और शुरुआती दौर के बारे में हम विस्तार से चर्चा करेंगे, तो आइए आज प्रस्तुत है विविध भारती द्वारा शमशाद जी से किये गए एक साक्षात्कार के अंश। उनसे बातचीत कर रहे हैं वरिष्ठ उद्‍घोषक श्री कमल शर्मा।

शमशाद जी : मेरे को गाना नहीं सिखाया किसी ने, ग्रामोफ़ोन पर सुन-सुन कर मैंने सीखा। मेरे घरवालों ने एक पैसा नहीं खर्च किया। लड़कों का ही फ़िल्मों में गाना-बजाना अच्छा नहीं माना जाता था, फिर लड़कियों की क्या बात थी। मैं गाने लगती तो घर में तो सब चुप करा देते थे कि क्या हर वक़्त ‘चैं चैं’ करती रहती है।

कमल जी : शमशाद जी, आपने किस उम्र से गाना शुरु किया था?

शमशाद जी : आठ साल की उम्र से गाना शुरु किया, यूँ समझिए, जब से होश आया तभी से गाती थी।

कमल जी : आप जिस स्कूल में पढ़ती थीं, वहाँ आपके म्युज़िक टीचर ने आपका हौसला बढ़ाया होगा?

शमशाद जी : उन्होंने कहा कि आवाज़ अच्छी है, पर घरवालों ने इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया। मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी, वह एक ब्रिटिश ने बनाया था। उर्दू ज़बान में, मैंने पाँचवी स्टैण्डर्ड तक पढ़ाई की। हम चार बहनें और तीन भाई थे। एक मेरा चाचा थे, उनको गाने का शौक था। वो कहते थे कि हमारे घर में यह लड़की आगे चलकर अच्छा गायेगी। वो मेरे बाबा के सगे भाई थे। वो उर्दू इतना अच्छा बोलते थे कि तबीयत ख़ुश हो जाती थी। लगता ही नहीं कि वो पंजाब के रहने वाले हैं। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौकीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी-कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। लेकिन वो मेरे गाने से डरते थे। वो कहते कि चार-चार लड़कियाँ हैं घर में, तू गायेगी तो इन सबकी शादी करवानी मुश्किल हो जायेगी।

कमल जी : शमशाद जी, आपकी गायकी की फिर शुरुआत कैसे और कब हुई?

शमशाद जी : मेरे उस चाचा ने मुझे जिएनोफ़ोन (Jien-o-Phone) कम्पनी में ले गए, वो एक नई ग्रामोफ़ोन कम्पनी थी। उस समय मैं बारह साल की थी। वहाँ पहुँचकर पता चला कि ऑडिशन होगा। उन लोगों ने तख़्तपोश बिछाया, हम चढ़ गए, उस पर बैठ गए (हँसते हुए)। वहीं पर मौजूद थे संगीतकार मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब। इतने कमाल के आदमी मैंने देखा ही नहीं था। वो मेरे वालिद साहब को पहचानते थे। वो कमाल का पखावज बजाते थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि आपके साथ कौन बजायेगा? मैंने कहा मैं ख़ुद ही गाती हूँ, मेरे साथ कोई बजानेवाला नहीं है। फिर उन्होंने कहा कि थोड़ा गा के सुनाओ। मैंने ज़फ़र की ग़ज़ल शुरु की, "मेरे यार मुझसे मिले तो...", एक अस्थाई, एक अन्तरा, बस, उन्होंने मुझे रोक दिया। मैंने सोचा कि गये काम से, ये तो गाने ही नहीं देते। ये मैंने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि मैं प्लेबैक आर्टिस्ट बन जाऊँगी, मेरा इतना नाम होगा। मैं सिर्फ़ चाहती थी कि मैं खुलकर गाऊँ।

दोस्तों, शमशाद जी का कितना नाम हुआ, और कितना खुल कर वो गाईं, ये सब तो अब इतिहास बन चुका है। आइए अब बात करते हैं आज के गाने की। श्रृंखला की शुरुआत हमने कल मास्टर ग़ुलाम हैदर के कम्पोज़िशन से की थी। आइए आज सुनें संगीतकार राम गांगुली के संगीत निर्देशन में 1948 की राज कपूर की पहली निर्मित फ़िल्म 'आग' से, शमशाद जी का गाया फ़िल्म का एक बेहद लोकप्रिय गीत "काहे कोयल शोर मचाये रे, मोहे अपना कोई याद आये रे..."। गीतकार हैं बहज़ाद लखनवी और गीत फ़िल्माया गया है नरगिस पर। इस गीत में कुछ ऐसा जादू है कि गीत को सुनने वाला हर कोई अपनी यादों में खो जाता है, उसे भी कोई अपना सा याद आने लगता है। इस गीत के बारे में शमशाद जी नें कहा था- "राज कपूर अपनी पहली फ़िल्म 'आग' बना रहे थे। वे मेरे पास आए और कहा कि मैं पृथ्वीराज कपूर का बेटा हूँ। मैं कहा, बहुत ख़ुशी की बात है। फिर उन्होंने कहा कि आपको मेरी फ़िल्म में गाना पड़ेगा। मैंने कहा, गा दूँगी।" इस फ़िल्म के सारे गानें बहुत ही मक़बूल हुए, संगीतकार थे राम गांगुली। इस फ़िल्म का एक गीत सुनिये।

फिल्म आग : "काहे कोयल शोर मचाये रे..." : संगीत - राम गांगुली


अगले अंक में जारी...

आपको हमारा यह विशेष श्रद्धांजलि अंक कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिए। इस श्रृंखला का अगला अंक हम कल प्रकाशित करेंगे। हमें आपके सुझावों और विचारों की प्रतीक्षा रहेगी। आप हमें radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, April 25, 2013

कारवाँ सिने-संगीत का : 1933 की दो उल्लेखनीय फिल्में



भारतीय सिनेमा के सौ साल – 42

कारवाँ सिने-संगीत का

वाडिया मूवीटोन की फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ और हिमांशु राय की ‘कर्म’



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1933 में ‘वाडिया मूवीटोन’ के गठन और इसी संस्था द्वारा निर्मित फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ का ज़िक्र कर रहे हैं। इसके साथ ही देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत पहली ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म ‘कर्म’ की चर्चा भी कर रहे हैं।

1933 की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन। वाडिया भाइयों, जे. बी. एच. वाडिया और होमी वाडिया, ने इस कंपनी के ज़रिए स्टण्ट और ऐक्शन फ़िल्मों का दौर शुरु किया। दरअसल वाडिया भाइयों ने मूक फ़िल्मों के जौनर में ‘तूफ़ान मेल’ शीर्षक से एक लो-बजट थ्रिलर फ़िल्म बनाई थी, जिसे ख़ूब लोकप्रियता मिली थी। इसी सफलता से प्रेरित होकर इन दो भाइयों ने ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन किया और इस बैनर तले पहली सवाक फ़िल्म ‘लाल-ए-यमन’ 1933 में प्रदर्शित की। ऐक्शन फ़िल्मों में ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं होती है और इसी वजह से ‘वाडिया’ की फ़िल्मों में गीत-संगीत का पक्ष अन्य फ़िल्मों के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ करता था। ज़बरदस्ती गीत डालने से थ्रिलर फ़िल्मों की रोचकता में कमी आती है, इस बात का वाडिया भाइयों को पूरा अहसास था, इसीलिए इस कंपनी ने बाद के वर्षों में संगीत-प्रधान लघु फ़िल्मों का अलग से निर्माण किया।
फिरोज दस्तूर 

इन लघु फ़िल्मों के ज़रिए कई संगीतज्ञों ने लोकप्रियता भी हासिल की, जिनमें शामिल थे अहमद जान थिरकवा, सखावत हुसैन ख़ान, हबीब ख़ान, मलिका पुखराज, बाल गंधर्व, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और फ़िरोज़ दस्तूर। दस्तूर ने पहली बार ‘लाल-ए-यमन’ में संगीतकार जोसेफ़ डेविड के निर्देशन में गीत गाये जिनमें शामिल थे “अब नहीं धरत धीर”, “जाओ सिधारो फ़तेह पाओ”, “खालिक तोरी नजरिया”, “मशहूर थे जहाँ में जो”, “तसवीर-ए-ग़म बना हूँ” और “तोरी हरदम परवर आस” आदि। फ़िल्म के संगीतकार मास्टर मोहम्मद ने इस फ़िल्म में एक सूफ़ी फ़कीर की भूमिका निभाने के अतिरिक्त “गाफ़िल बंदे कुछ सोच ज़रा” गीत भी गाया। अब हम आपको फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ से फिरोज दस्तूर का गाया गीत- ‘मशहूर थे जहाँ में...’ सुनवाते हैं।


फिल्म लाल-ए-यमन : ‘मशहूर थे जहाँ में...’ : फिरोज दस्तूर



अभिनेत्री सरदार अख़्तर अभिनीत पहली फ़िल्म 1933 में बनी, ‘ईद का चांद’ शीर्षक से ‘सरोज मूवीटोन’ के बैनर तले। पिछले वर्ष की तरह सुंदर दास भाटिया का संगीत ‘सरोज’ की फ़िल्मों में सुनने को मिला। संवाद व गीतकार के रूप में अब्बास अली और एम. एस. शम्स ने इस फ़िल्म में काम किया था। हरिश्चन्द्र बाली, जो ख़ुद एक संगीतकार थे, सरदार अख़्तर के साथ फ़िल्म ‘नक्श-ए-सुलेमानी’ में अभिनय किया। सुंदर दास के ही संगीत में ‘सरोज’ की एक और उल्लेखनीय फ़िल्में रही ‘रूप बसंत’ जिसके गीतकार थे मुन्शी ‘शम्स’। इन सभी फ़िल्मों में गुजराती नाट्य जगत से आये गायक अशरफ़ ख़ान ने कई गीत गाये जो लोगों को ख़ूब भाये।

देविका रानी और हिमांशु रॉय 
‘कर्म’ पहली भारतीय बोलती फ़िल्म थी जिसका प्रदर्शन इंग्लैण्ड में हुआ था। इसके अंग्रेज़ी संस्करण का शीर्षक था ‘फ़ेट’। देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत यह फ़िल्म एक ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म थी जिसका प्रीमियर लंदन में 1933 के मई के महीने में हुआ था। इसका हिन्दी संस्करण 27 जनवरी, 1934 को बम्बई में रिलीज़ हुआ था। ‘कर्म’ के संगीतकार थे अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट, जिन्होंने देविका रानी से एक अंग्रेज़ी गीत “now the moon her light has shed” भी गवाया था। टैगोर ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाली देविका रानी, जिन्हें ‘फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ इण्डियन स्क्रीन’ की उपाधि दी जाती है, लंदन के ‘रॉयल अकादमी ऑफ़ आर्ट ऐण्ड म्युज़िक’ गई थीं पढ़ाई के सिलसिले में। वहाँ उनकी मुलाक़ात हिमांशु राय से हुई और उनसे शादी कर ली। 1929 की मूक फ़िल्म ‘प्रपांच पाश’ में देविका रानी एक ‘फ़ैशन डिज़ाइनर’ के रूप में काम किया, जिसके लिए दुनिया भर में उनके काम को सराहा गया। ‘प्रपांच पाश’ और ‘कर्म’ के बाद देविका और हिमांशु भारत चले आये और 1934 में गठन किया ‘बॉम्बे टॉकीज़’ का। इस बैनर तले बहुत सारी कामयाब फ़िल्मों का निर्माण हुआ, बहुत से कलाकारों (जिनमें अभिनेता, निर्देशक, गीतकार, संगीतकार शामिल हैं) को ब्रेक दिया जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के स्तंभ कलाकार बने। फ़िल्म-संगीत को भी एक नया आयाम देने का श्रेय ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को दिया जा सकता है। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को पहली भारतीय ‘पब्लिक लिमिटेड “फ़िल्म” कंपनी’ होने का गौरव प्राप्त है। लीजिए, अब आप फिल्म ‘कर्म’ का एक दुर्लभ गीत सुनिए।


फिल्म कर्म : ‘मेरे हाथ में तेरा हाथ रहे...’ : संगीतकार - अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें। 


शोध व आलेख सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Wednesday, April 24, 2013

राग बागेश्री में निबद्ध फिल्म गीतों की झंकार संज्ञा टंडन के साथ


प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट - राग बागेश्री 
स्वर एवं प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 
स्क्रिप्ट - कृष्णमोहन मिश्र

Tuesday, April 23, 2013

लातों का देव - पुरुषोत्तम पाण्डेय

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने हरीशंकर परसाई का व्यंग्य "यस सर" सुना था  अनुराग शर्मा के स्वर में।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं पुरुषोत्तम पाण्डेय की कहानी लातों का देव जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "लातों का देव" का गद्य पुरुषोत्तम पाण्डेय के ब्लॉग जाले पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 6 मिनट 30 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

मेरी कहानियों का स्रोत आस-पास समाज में घटित घटनाओं तथा कहीं सुनी-पढ़ी बातें ही होती है। किसी व्यक्ति विशेष को चित्रित नहीं करता हूँ। अगर किसी घटना या चरित्र का कहीं साम्य लगता है तो ये एक संयोग ही होगा। ~ पुरुषोत्तम पाण्डेय

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

बाबा गिड़गिड़ाते हुए बोला, “आपके रूपये लौटा देता हूँ”
 (पुरुषोत्तम पाण्डेय की "लातों का देव" से एक अंश)


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लातों का देव MP3

#14th Story, Laton Ke Bhoot: Purushottam Pandey/Hindi Audio Book/2013/14. Voice: Anurag Sharma

Monday, April 22, 2013

क्या प्यार की मदहोशियाँ और सुरीली सरगोशियाँ लौटेगीं ‘आशिकी’ के नए दौर में

प्लेबैक वाणी -43 - संगीत समीक्षा - आशिकी 2



महेश भट्ट और गुलशन कुमार ने मिलकर जब आशिकी की संकल्पना की थी नब्बे के दशक में, तो शायद ये अपने तरह की पहली फिल्म थी जिसके लिए गीतों का चयन पहले हुआ और फिर उन गीतों को माला में पिरोकर एक प्रेम कहानी लिखी गयी. फिल्म के माध्यम से राहुल रॉय और अनु अग्रवाल का फिल्म जगत में पदार्पण हुआ. ये कैसेट्स क्रांति का युग था जिसके कर्णधार खुद गुलशन कुमार थे. गुलशन कुमार हीरों के सच्चे पारखी थे, जिन्होंने चुना कुमार सानु, अलका याग्निक, अनुराधा पौडवाल और नितिन मुकेश को पार्श्वगायन के लिए, संगीत का जिम्मा सौंपा नदीम श्रवण को और गीतकार चुना समीर को. ये सभी कलाकार अपेक्षाकृत नए थे, मगर इस फिल्म के संगीत की सफलता के बाद ये सभी घर घर पहचाने जाने लगे. ये विज़न था गुलशन कुमार और महेश भट्ट का, जिसने तेज रिदम संगीत के सर चढ कर बोलते काल में ऐसे सरल, सुरीले और कर्णप्रिय संगीत को मार्केट किया. फिल्म के पोस्टर्स तक बेहद रचनात्मक रूप से रचे गए थे, जिसमें बेहद सफाई से युवा नायक और नायिका का चेहरा उजागर होने से बचाया गया था. ये आत्मविश्वास था उस निर्माता निर्देशक टीम का जिन्होंने साबित कर दिया कि चमकते सितारों के चेहरों के परे भी संगीत का वजूद संभव है.

हिंदी फिल्म संगीत के सफर में आशिकी एक मील का पत्थर था, लगभग दो दशक बाद गुलशन कुमार के सुपत्र भूषण ने फिर एक बार वही आशिकी का दौर लौटने की सोची फिर एक बार महेश भट्ट के मार्गदर्शन में. पर जाहिर है दौर बदल चुका है, दो दशकों में देश की दिशा, दशा और सोच सब कुछ बदल चुका है. तो यक़ीनन बहुत कुछ आशिकी २  में भी बदलना लाजमी है. नई आशिकी के निर्देशक हैं मोहित सूरी, संगीत का जिम्मा आजकल के चलन अनुरूप सीमित हाथों में न होकर एक पूरी टीम ने मिल बाँट कर संभाला है. रोक्क् संगीत ने मेलोडी की जगह भर दी है, पर बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं बदला है यहाँ भी संगीत नामी गिरामी चेहरों का मोहताज नहीं है, किसी भी आईटम गीत का जबरदस्ती का दखल नहीं है और सबसे बढ़कर, ये आशिकी भी संगीत प्रेमियों के दिलो-जेहन में अच्छे और सच्चे संगीत के प्रति आस्था और उम्मीद का संचार करता है, चलिए एक नज़र डालें एल्बम के गीतों पर

बर्फी के फिर ले आया दिल की मधुरता को सुनकर ही सही पर भूषण ने अरिजीत सिंह को प्रमुख गायक के रूप में चुनकर अपने पिता के हुनर को (सही घोड़े पर दांव लगाने के) एक कदम आगे ही बढ़ाया है. अरिजीत की मखमली और जूनून से भरी आवाज़ में तुम ही हो सुनकर आनंद आ जाता है. गिटार का क्या खूब इस्तेमाल किया है संगीतकार मिथुन ने. शब्द सरल और बेहद रोमानियत से भरपूर है. ये गीत जवां दिलों को धड्कायेगा और मासूम आशिकी का सुनहरा दौर फिर से लौटा लाएगा यक़ीनन.

सुन रहा है न तू के संगीतकार गायक हैं अंकित तिवारी. गीत सोफ्ट सूफी रोक्क् जोनर का है, जहाँ गीतकार संदीप नाथ शब्दों के मानों को लेकर कुछ उलझन में सुनाई देते हैं मंजिलें रुसवा हैं और करम की अदाएं जैसे फ्रेस अपने नए थीम के बावजूद शाब्दिक रूप से गीत को कमजोर बना देते हैं, पर कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनमें किसी एक पक्ष के कमजोर होने पर भी अन्य पक्षों की उत्कृष्टता उन कमियों को छुपा से देते हैं, ये शानदार गीत भी उसी श्रेणी का है. अंत में कोरस का प्रयोग गीत को और जानदार बना देता है

चाहूँ मैं आना और हम मर जायेंगें में अल्बम रोक्क् जोनर से निकल कर मेलोडी में प्रवेश करने की एक हल्की सी कोशिश करती है. गीत बुरे नहीं है, पर ये आज के दौर के श्रोताओं को लुभा पायेगा या नहीं ये कहना जरा मुश्किल है. अगला गीत मेरी आशिकी दरअसल तुम ही हो का फेमेल संस्करण है जिसमें अरिजीत के साथ आवाज़ मिलायी है पलक मुछल ने.

पिया आये न,  के के और तुलसी कुमार की आवाज़ में नयेपन से भरपूर है, वहीँ सुन रहा है न तू का भी एक फेमेल संस्करण है जिसे श्रेया घोषाल ने भी बहुत खूब निभाया है. ये संस्करण भारतीय जोनर में है जिसमें बाँसुरी और संतूर को भी जोड़ा गया है, गीत बढ़िया है पर व्यक्तिगत तौर पर मुझे अंकित का खुद का संस्करण अधिक दमदार लगा.

जीत गंगुली का स्वरबद्ध किया और संजय मासूम का लिखा भुला देना, पाकिस्तानी गायक मुस्तफा जाहिद की आवाज़ में है. यानी भट्ट कैम्प का ये टोटका भी सही काम कर गया. वहीँ आसान नहीं यहाँ में इरशाद को गीतकार चुनकर भूषण ने एक सटीक दांव खेला है पर मिलने है मुझेसे आई एक सामान्य सा गीत है

कुल मिलकार आशिकी २ एक धीमा नशा है, जिसका असर धीरे धीरे श्रोताओं पर चढेगा. अब भूषण के मार्केटिंग स्किल्स गुलशन कुमार के विज़न की कितनी बराबरी कर पाते हैं ये देखना दिलचस्प होगा. बहरहाल हम तो चाहेंगें कि आशिकी २ का संगीत फिर से माहौल में प्रेम की सरगोशियाँ बढ़ा दे और संगीत का माधुर्य फिर एक बार सर चढ कर बोले. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को ४.३ की रेटिंग.    


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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Sunday, April 21, 2013

ऋतु आधारित राग हैं इस रागमाला गीत में



स्वरगोष्ठी – 117 में आज

रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 4


‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री मन के मीत न आए...’



‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक के साथ मैं, कृष्णमोहन मिश्र अपने संगीत-प्रेमी पाठकों-श्रोताओं के बीच एक बार पुनः उपस्थित हूँ। आज के अंक में हम एक बार फिर लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ की अगली कड़ी प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के पिछले दो अंकों में हमने जो गीत शामिल किये थे, उनमे रागों के क्रम प्रहर के क्रमानुसार थे। परन्तु आज के रागमाला गीत में रागों का क्रम बदलते मौसम के अनुसार है। इस गीत में ग्रीष्म ऋतु का राग गौड़ सारंग, वर्षा ऋतु का राग गौड़ मल्हार, पतझड़ का राग जोगिया और बसन्त ऋतु का राग बहार क्रमशः शामिल किया गया है। रागमाला का यह गीत हमने 1953 प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ से लिया है। फिल्म के संगीतकार हैं, अनिल विश्वास और इसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने गाया है। 



अनिल विश्वास और लता मंगेशकर 
‘रागमाला’ संगीत का वह प्रकार होता है, जिसमे किसी गीत में एक से अधिक रागों का प्रयोग हो और सभी राग स्वतंत्र रूप से रचना में उपस्थित हों। रागमाला गीतों में रागों का संयोजन प्रायः प्रहर के क्रम में, ऋतु के क्रम में अथवा थाट के क्रम में किया जाता है। आज के अंक में प्रस्तुत किया जाने वाला गीत 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ से लिया गया है और ऋतु के रागों के क्रम में है। गीत में चार अन्तरे हैं, जिन्हें संगीतकार अनिल विश्वास ने चार अलग-अलग रागों में निबद्ध किया था। इस फिल्म और इसके गीतों के बारे में फिल्म संगीत के प्रख्यात शोधकर्त्ता पंकज राग ने अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखा है- “फिल्म ‘हमदर्द’ (1953) तो शास्त्रीय संगीत आधारित कम्पोज़ीशन के लिए हिन्दी फिल्म संगीत के इतिहास में अमर हो चुकी है। स्वयं अनिल विश्वास की ही प्रोडक्शन (निर्मात्री- आशालता विश्वास) के बैनर तले बनी इस फिल्म में ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री...’ (मन्ना डे, लता) एक बेहतरीन रागमाला थी, जिसमें खयाल अंग का प्रयोग था और गौड़ सारंग, गौड़ मल्हार, जोगिया और बहार पर आधारित लाजवाब टुकड़े थे। कम्पोज़ीशन और गायकी के इतने सुन्दर उदाहरण फिल्म संगीत में कम ही मिलते हैं”। संगीतकार अनिल विश्वास ने इस रागमाला गीत के लिए मन्ना डे और लता मंगेशकर को चुना था।

मन्ना डे 
अनिल विश्वास मन्ना डे की प्रतिभा से बहुत अच्छी तरह परिचित थे। उन्होने इस गीत के चारो अन्तरों को चार अलग-अलग रागों में खयाल अंग में संगीतबद्ध किया था। उन दिनों यह चलन था कि पक्के रागों पर आधारित गीतों को गाने के लिए संगीत जगत के सिद्ध गायकों से फिल्मों में गीत गवाया जाता था। परन्तु अनिल विश्वास ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पुरुष स्वर के लिए मन्ना डे को और नारी स्वर के लिए लता मंगेशकर पर भरोसा किया और फिल्म संगीत जगत का यह कालजयी गीत तैयार हुआ। एक बार अनिल विश्वास ने इस गीत की रचना प्रक्रिया के बारे में अपने एक साक्षात्कार में कहा था- “आजकल गायक कलाकारों के पास रिहर्सल का समय नहीं होता, मगर फिल्म ‘हमदर्द’ के इस गीत को रिकार्ड करने से पहले मन्ना डे और लता ने लगातार 15 दिनों तक इस गीत का रिहर्सल किया था”। एक अन्य साक्षात्कार में मन्ना डे ने बताया था- “इस गीत को रिकार्ड करने में 6-7 घण्टे का समय लगा था। हम सब बुरी तरह थक गए थे, लेकिन रिकार्डिंग के बाद गाना सुन कर अनिल दा खुशी के मारे सचमुच नाचने लगे। उन्हें नाचते देख कर लगा कि वो हमारी मेहनत से सन्तुष्ट थे”

फिल्म 'हमदर्द' के इस गीत के प्रसंग में अभिनेता शेखर एक अन्ध-गायक की भूमिका में हैं, जो नायिका निम्मी को संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। गीत के पहले भाग के बोल हैं- ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री, मन के मीत न आए...’। गीत के इस अन्तरे में ग्रीष्म ऋतु की दोपहरी का परिवेश चित्रित है और ऐसे परिवेश के चित्रण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त राग गौड़ सारंग ही है। अनिल विश्वास ने गीत का दूसरा अन्तरा राग गौड़ मल्हार में निबद्ध किया था, जिसके बोल हैं- ‘बरखा ऋतु बैरी हमार...’। प्रचण्ड गर्मी के बाद जब वर्षा की बूँदें भूमि की तपिश को शान्त करने का प्रयत्न करती हैं, तब विरही मन और भी व्याकुल हो जाता है। गीत के इस भाग के शब्द भी परिवेश के अनुकूल रचे गए हैं। सुविधा की दृष्टि गीत के चारो अन्तरों को दो भाग में हमने बाँट दिया है। लीजिए गीत के प्रथम दो अन्तरे सुनिए।


रागमाला गीत : फिल्म हमदर्द : राग गौड़ सारंग और गौड़ मल्हार : मन्ना डे और लता मंगेशकर


गीतकार प्रेम धवन 
फिल्म ‘हमदर्द’ के इस रागमाला गीत के तीसरे अन्तरे में पतझड़ के परिवेश में नायिका के विरह भाव का चित्रण है। इस अन्तरे को संगीतकार अनिल विश्वास ने राग जोगिया में बाँधा है। इस अन्तरे के बोल हैं- 'पी बिन सूना री...'। गीत का चौथा और अन्तिम अन्तरा उल्लासपूर्ण परिवेश का चित्रण करता है। इसे राग बसन्त बहार के स्वर दिये गए हैं, जिसके बोल हैं- ‘आई मधु ऋतु बसन्त बहार रे...’। गीत के चारो अन्तरों को मन्ना डे और लता मंगेशकर ने रागानुकूल स्वरों की शुद्धता बनाए रखते हुए इस अनूठे गीत को भावपूर्ण ढंग से तीनताल में गाया है। गीतकार प्रेम धवन हैं। इस गीत को ऐतिहासिक बनाने में वाद्य संगीत के श्रेष्ठतम कलाकारों का योगदान भी रहा। गीत में सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पन्नालाल घोष और सारंगी वादक पण्डित रामनारायण ने संगति की थी। रिकार्डिंग पूरी हो जाने के बाद जाने-माने सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ ने टिप्पणी की थी- ‘फिल्म संगीत जगत में आज एक श्रेष्ठतम गीत रिकार्ड हुआ है'। स्वयं मन्ना डे भी इस गीत को अपने श्रेष्ठ गीतों की श्रेणी में शीर्ष पर मानते हैं। आइए हम प्रेम धवन के लिखे, अनिल विश्वास द्वारा संगीतबद्ध किये तथा मन्ना डे व लता मंगेशकर के स्वरों में 'हमदर्द' फिल्म के इस 'रागमाला' गीत का तीसरा और चौथा अन्तरा सुनते हैं-


रागमाला गीत : फिल्म हमदर्द : राग जोगिया और बहार : मन्ना डे और लता मंगेशकर


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 117वीं संगीत पहेली में हम आपको आधी शताब्दी पूर्व के एक फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

2 – गीत के संगीतकार का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 119वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 115वें अंक में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म 'गोदान' से पार्श्वगायक मुकेश की आवाज़ में पारम्परिक चैती की धुन पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- संगीत शैली चैती और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार पण्डित रविशंकर। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ को हम एक बार फिर विराम देंगे और उसके स्थान पर एक विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। दरअसल इस माह एक क्षेत्रीय भाषा की फिल्म अपने प्रदर्शन की आधी शताब्दी पूर्ण कर चुकी है। इस अवसर पर हम अपने एक अतिथि लेखक और युवा फिल्म पत्रकार रविराज पटेल का शोधपरक् आलेख प्रस्तुत करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 

 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


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