Sunday, July 8, 2012

वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग


स्वरगोष्ठी – ७८ में आज

‘घन छाए गगन अति घोर घोर...’


‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब रसिकजनों का, स्वरों की रिमझिम फुहारों के बीच स्वागत करता हूँ। इन दिनों आप प्रकृति-चक्र के अनुपम वरदान, वर्षा ऋतु का आनन्द ले रहे हैं। तप्त, शुष्क और प्यासी धरती पर वर्षा की फुहारें पड़ने पर जो सुगन्ध फैलती है वह अवर्णनीय है। ऐसे ही मनभावन परिवेश में आपके उल्लास और उमंग को द्विगुणित करने के लिए हम लेकर आए हैं यह नई श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग’। इस श्रृंखला में वर्षा ऋतु में गाये-बजाये जाने वाले रागों पर आपसे चर्चा करेंगे और इन रागों में निबद्ध वर्षा ऋतु के रस-गन्ध में पगे गीतों को प्रस्तुत भी करेंगे।

भारतीय साहित्य और संगीत को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दो ऋतुएँ हैं; बसंत और पावस। संगीत शास्त्र के अनुसार मल्हार के सभी प्रकार पावस ऋतु की अनुभूति कराने में समर्थ हैं। इसके साथ ही कुछ सार्वकालिक राग; वृन्दावनी सारंग, देस और जैजैवन्ती भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। वर्षाकालीन रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है। आज के अंक में हम राग मेघ अथवा मेघ मल्हार की ही चर्चा करेंगे। इस राग पर चर्चा आरम्भ करने से पहले आइए सुनते हैं, राग मेघ में निबद्ध दो मोहक रचनाएँ। पटियाला (कसूर) गायकी में सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में पहले मध्यलय झपताल की रचना- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’ और उसके बाद द्रुत लय तीनताल में निबद्ध पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष की रचना- ‘घन छाए गगन अति घोर घोर...’ की रसानुभूति आप भी कीजिए।

राग मेघ मल्हार : गायक - पण्डित अजय चक्रवर्ती



राग मेघ काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग का सर्वाधिक प्रचलित रूप औड़व-औड़व जाति का होता है। अर्थात आरोह-अवरोह में ५-५ स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। श्री देवनाथ के अनुसार उस्ताद सलामत और नज़ाकत अली खाँ मेघ मल्हार गाते समय गांघार और धैवत का अनूठा प्रयोग करते थे। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है।

इस राग के माध्यम से मेघों की प्रतीक्षा, काले मेघों से आच्छादित आकाश और उमड़-घुमड़ कर वर्षा के आरम्भ होने के परिवेश की सार्थक अनुभूति होती है। आइए, अब हम आपको सितार पर राग मेघ सुनवाते है। सितार वाद्ययंत्र पर राग मेघ मल्हार की अवतारणा एक अलग ही इन्द्रधनुषी रंग बिखेरता है। सुविख्यात सितार-वादक पण्डित निखिल बनर्जी ने अपने तंत्र-वाद्य पर राग मेघ की अत्यन्त आकर्षक अवतारणा की है। आरम्भ में थोड़ा आलाप और उसके बाद झपताल में निबद्ध गत आप सुनेंगे। इस आकर्षक सितार-वादन को सुनते समय आप थोड़ा ध्यान दीजिएगा, तबला-संगत आरम्भ होने से ठीक पहले एक स्थान पर पण्डित जी ने धैवत स्वर का प्रयोग किया है। परन्तु केवल एक ही बार, रचना के शेष भाग में कहीं भी इस स्वर का दोबारा प्रयोग नहीं किया है। लीजिए, सुनिए सितार पर राग मेघ मल्हार-


सितार पर राग मेघ : वादक – पण्डित निखिल बनर्जी



स्वरों के माध्यम से वर्षा ऋतु के परिवेश की सार्थक सृष्टि रच देने में समर्थ राग मेघ के आधार पर फिल्मों के कई संगीतकारों ने गीत रचे हैं। इस सन्दर्भ में संगीतकार बसन्त देसाई का स्मरण प्रासंगिक है। वे ऐसे संगीतकार थे, जिन्होने मल्हार के लगभग सभी प्रकारों में फिल्मी गीत स्वरबद्ध किये हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों में हम आपको उनके स्वरबद्ध गीत सुनवाएँगे। आज हम आपको संगीतकार राजकमल का राग मेघ मल्हार पर आधारित स्वरबद्ध गीत सुनवा रहे हैं। उन्होने भी इस गीत में धैवत का प्रयोग किया है। यह गीत हमने १९८१ में प्रदर्शित, सईं परांजपे की फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ से लिया है। कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत को येशुदास और हेमन्ती शुक्ला ने स्वर दिया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

फिल्म चश्मेबद्दूर : ‘कहाँ से आए बदरा...’ : येशुदास और हेमन्ती शुक्ला


आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, राग आधारित एक फिल्मी गीत का अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी तीसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – गीत की गायिका कौन है?


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८०वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के उत्तर

‘स्वरगोष्ठी’ के ७६वें अंक की पहेली में हमने आपको पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के बाँसुरी वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग हंसध्वनि और दूसरे का सही उत्तर है- ताल सितारखानी या पंजाबी तीनतान। इस बार की पहेली में हमारे एक नए पाठक, मुम्बई से अखिलेश दीक्षित जुड़े हैं। अखिलेश जी ने दोनों प्रश्नों के सही उत्तर देने के साथ ही १६ मात्रा के सितारखानी ताल के बारे में विस्तृत जानकारी भी दी है। इनके साथ ही दोनों प्रश्नों का सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने भी दिया है। दोनों प्रतियोगियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक से हमने मल्हार अंग के रागों का सिलसिला शुरू किया है। अगले अंक में भी हम आपसे मल्हार के एक अन्य प्रकार पर चर्चा करेंगे। वर्षा ऋतु से सम्बन्धित कोई राग अथवा रचना आपको प्रिय हो और आप उसे सुनना चाहते हों तो आज ही अपनी फरमाइश हमें swargoshthi@gmail.com पर मेल कर दें। इसके साथ ही यदि आप इनसे सम्बन्धित आडियो ‘स्वरगोष्ठी’ के माध्यम से संगीत प्रेमियों तक पहुँचाना चाहते हों तो वह क्लिप MP3 रूप में भेज दें। हम आपकी फरमाइश को और आपके भेजे आडियो क्लिप को ‘स्वरगोष्ठी’ में शामिल करने का हर-सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप भी हमारे सहभागी बनिए।

कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, July 7, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (6) कॉकटेल, अहा ज़िंदगी और आपकी बात

संगीत समीक्षा - कॉकटेल



संगीतकार प्रीतम और गीतकार इरशाद कामिल की जोड़ी आज के दौर की एक कामयाब जोड़ी मानी जा सकती है. इस जोड़ी की नयी पेशकश है कॉकटेल. जैसा कि नाम से ही विदित है कि संगीत का एक मिश्रित रूप यहाँ श्रोताओं को मिलेगा, इस उम्मीद पर अल्बम निश्चित ही खरी उतरती है. 
इरशाद ने तुम्ही हो माता पिता तुम्हीं हो में से माता पिता का नाम हटा कर खुदा को बस बंधू और सखा का नाम देकर और भी आत्मीय बना दिया है और इस तेज रिदम के गीत में भी उनके बोल दिल को गहराईयों से छू जाते हैं,
जग मुझे पे लगाये पाबंदी, मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की...वाह...और उस पर कविता सेठ की आवाज़ एक अलग ही मुकाम दे देती है गीत को, नीरज श्रीधर ने अच्छा साथ निभाया है, तुम्हीं हो बंधू से अल्बम की शानदार शुरुआत होती है और  इसी सिलसिले को आगे बढ़ाता है अगला गीत दारु देसी, इश्कजादे में परेशान गाकर अपनी शानदार उपस्थिती दर्ज कराने वाली शामली खोलगादे हैं बेन्नी दयाल के साथ जिनकी मदभरी आवाजों में ये गीत भी खूब जमा है.

बेस गिटार और रिदम का शानदार प्रयोग यारियाँ गीत को गजब की ऊंचाईयां प्रदान कर देता है, ये प्रीतम के बहतरीन गीतों में से एक है, गायक मोहन कानन और शिल्पा राव की आवाजें और इरशाद के शब्द मिलकर इस गीत में जान भर देते हैं, बार बार सुनने लायक है यारियाँ.

नेहा कक्कड ने बहुत जोशीले अंदाज़ में सेकेण्ड हैंड जवानी गया है, यहाँ बोल है अमिताभ भट्टाचार्य के जिनका ये अल्बम में इकलौता गीत है. 
पैप्पी गीत है मजेदार अंदाज़ का. तेरा नाम जापदी फिरां और लुटना प्रीतम इरशाद के सिग्नेचर गीतों की तरह असरकारक हैं.

इनके अलावा एक गीत ऐसा है, जिसके सदके में पूरी कि पूरी अल्बम वारी जा सकती है. ये है आरिफ लोहार और हर्षदीप कौर की युगल आवाजों में जुगनी, इस गीत की खूबसूरती को केवल और केवल सुनकर महसूस ही किया जा सकता है. दरअसल ये गीत पाकिस्तान के कोक स्टूडियो के लिए रिकॉर्ड हुआ था. जो यू ट्यूब पर ख़ासा लोकप्रिय भी हुआ. इस अल्बम में इसे शामिल कर फिल्म के निर्माता ने संगीत प्रेमियों को एक मधुर सौगात दी है. 
अल्बम को रेडियो प्लेबैक की और से मिलते हैं ४.२ की रेटिंग.   

 


पुस्तक चर्चा - अहा जिंदगी – सिनेमा विशेष  


वैसे तो हम पुस्तकों की समीक्षा करते हैं. पर अहा जिंदगी पत्रिका का ताज़ा संस्करण हमारे फिल्म और संगीत प्रेमियों के लिए बेहद जरूरी है संग्रहनीय है. तो हमने सोचा कि क्यों न इस बार इस साप्ताहिक स्तंभ में अहा जिंदगी के सिनेमा विशेषांक की चर्चा की जाए,  जैसा कि हम सब जानते हैं कि भारतीय फिल्में अपने उदगम के १०० शानदार वर्ष पूरे करने की कगार पर है. इसी बात को ध्यान में रखकर कर इस अंक को आकार दिया गया है.  स्वप्न, सौन्दर्य और सिनेमा के इस दर्शन में जहाँ युनुस खान फिल्म संगीत में आये परिवर्तनों का जिक्र कर रहे हैं तो वहीँ निधि सक्सेना ने सिनेमा में काव्यात्मक अभिव्यक्ति को तरजीह दी है. गीता यादव ने कुछ यादगार प्रसगों की चर्चा की है तो पारुल की कलम ने सिनेमा के बदलते आयामों पर नज़र दौडाई है.  इस अंक में फ़िल्मी फैशन, ताम झाम, ग्लैमर और रंग बदलती इस मायावी दुनिया की बेहद दिलचस्प जानकारियों के साथ है वहीदा रहमान की जीवनी भी. परत दर परत उनके फ़िल्मी सफर को देखना हिंदी सिनेमा के एक पूरे दौर को देखने जैसा है. रेडियो प्लेबैक इस प्रयास के के लिए अहा जिंदगी और पूरे भास्कर ग्रुप को बधाईयाँ प्रेषित करता है...आप भी इसे अवश्य पढ़ें और सहेजें.     
 
 


और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Friday, July 6, 2012

कहानी पॉडकास्ट: नज़ीर मियाँ की खिचड़ी (श्रीमती रीता पाण्डेय)

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अर्चना चावजी की आवाज़ में प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हरिशंकर परसाई की कथा "बाप बदल" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं श्रीमती रीता पाण्डेय का व्यंग्य "नज़ीर मियाँ की खिचड़ी", जिसको स्वर दिया है शेफाली गुप्ता ने।

नज़ीर मियाँ की खिचड़ी का टेक्स्ट श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय के प्रसिद्ध ब्लॉग मानसिक हलचल पर अतिथि पोस्ट के रूप में उपलब्ध है।

इस कहानी का कुल प्रसारण समय 5 मिनट 8 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

जब तक कसा न जाये, तब तक कोई सक्रिय नहीं होता, न व्यक्ति न तन्त्र।
~ श्रीमती रीता पाण्डेय
(श्रीमती रीता पाण्डेय गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही से हैं। वे सपरिवार शिवकुटी (उ.प्र.) में रहती हैं।)

हर शनिवार को "बोलती कहानियाँ" पर सुनें एक नयी कहानी

"खिचड़ी की सुगंध हम बच्चों को चूल्हे तक खींच लाती थी। पत्तल पर मुन्नू मामा तो अक्सर खिचड़ी खाया करता था। एक आध बार मैने भी स्वाद लिया।" (श्रीमती रीता पाण्डेय की "नज़ीर मियाँ की खिचड़ी" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
 यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
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#24th Story, Nazir Miyan: Rita Pandey/Hindi Audio Book/2012/24. Voice: Shaifali Gupta

Thursday, July 5, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 4


भूली-बिसरी यादें

भारतीय सिनेमा-निर्माण के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला ‘स्मृतियों के झरोखे से’ की एक नई कड़ी में आप सबका हार्दिक स्वागत है। दोस्तों, आज बारी है, ‘भूली-बिसरी यादें’ की, जिसके अन्तर्गत हम मूक और सवाक फिल्मों के आरम्भिक दौर की कुछ रोचक बातें आपसे बाँटेंगे।

‘राजा हरिश्चन्द्र’ से पहले : सावे दादा की सृजनशीलता

‘राजा हरिश्चन्द्र’ को प्रथम भारतीय मूक कथा-फिल्म माना जाता है। 1913 में इस फिल्म के निर्माण और प्रदर्शन से पहले जो प्रयास किए गए, हम इस स्तम्भ में उनकी चर्चा कर रहे हैं। पिछले अंक में हमने वर्ष 1896 और 1898 में किए गए प्रयासों का उल्लेख किया था। इसके बाद 1899 में हरिश्चन्द्र सखाराम भटवाडेकर उर्फ सावे दादा ने इंग्लैंड से एक फिल्म-कैमरा मंगाया और अखाड़े में दो पहलवानों के बीच कुश्ती का फिल्मांकन किया। मुम्बई के हैंगिंग गार्डेन में कुश्ती का यह आयोजन कृष्ण नहवी और पुंडलीक नामक दो पहलवानों के बीच किया गया था। सावे दादा ने इसी कैमरे से ‘मैन ऐंड मंकी’ नामक एक लघु फिल्म भी बनाई, जिसका प्रदर्शन पेरी थियेटर में किया गया था। सावे दादा ने सिनेमा को मनोरंजन के अलावा सूचना और शिक्षा का माध्यम बनाने का प्रयास भी किया था। वर्ष 1901 में उन्होने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पुरस्कृत होकर लंदन से लौटे जाने-माने शिक्षाविद आर.पी. परांजपे पर एक वृत्त-चित्र ‘दि फ्रेश इंडियन रेगुलर ऑफ कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी’ का निर्माण किया था।

सवाक युग के धरोहर : 'अयोध्या का राजा' और दुर्गा खोटे
गोविंदराव तेम्बे

र्ष 1931 की तुलना में 1932 में चार गुना ज़्यादा सवाक फ़िल्में बनी। ‘आलम-आरा’ और 1931 की अन्य फ़िल्मों की सफलता से प्रेरित होकर कई फ़िल्म-निर्माण कम्पनियों ने मूक से सवाक फ़िल्मों के निर्माण में क़दम रखा। इनमें एक प्रमुख नाम है पुणे के ‘प्रभात स्टुडियो’ का। व्ही. शांताराम, जो उन दिनों बाबूराव पेण्टर की ‘महाराष्ट्र फ़िल्म कम्पनी’ में सहायक का काम कर रहे थे, अपने चार और मित्रों– वी.जी. दामले, एस. फ़त्तेलाल, के.आर. धैबर और एस.बी. कुलकर्णी के साथ मिलकर ‘प्रभात फ़िल्म कम्पनी’ की स्थापना की, और इस बैनर तले अपनी पहली फ़िल्म ‘अयोध्या चा राजा’ का मराठी में निर्माण किया। मराठी में निर्माण होने वाली यह प्रथम सवाक्‍ फ़िल्म थी। हालाँकि 1931 में ही सवाक्‍ फ़िल्मों का निर्माण शुरू हो गया था, लेकिन आज 'अयोध्या चा राजा' ही सबसे पुरानी सवाक्‍ फ़िल्म है जिसका प्रिण्ट उपलब्ध है। गोविंदराव तेम्बे, दुर्गा खोटे, दिगम्बर, बाबूराव पेण्ढारकर, निंबलकर, बी. देसाई, विनायक और माने अभिनीत यह फ़िल्म एक बड़ी बजट की फ़िल्म थी जिसकी कहानी रामायण से ली गई थी। यह सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र और उनकी रानी तारामती की विख्यात कहानी थी। शांताराम निर्देशित इस फ़िल्म की अपार सफलता को देख इसे हिंदी में भी बनाया गया- ‘अयोध्या का राजा’ शीर्षक से। ‘अयोध्या का राजा’ के संगीतकार भी गोविंदराव तेम्बे ही थे।

फिल्म में उनके गाये कई गीत स्मरणीय हैं। इन्हीं गीतों में से एक दुर्लभ गीत आज हम आपको सुनवाते हैं।

फिल्म – अयोध्या चा राजा : ‘सत्व पालना...’ : गोविन्दराव तेम्बे

दुर्गा खोटे

फ़िल्म में दुर्गा खोटे ने तारामती का किरदार निभाया। यह उन दिनों की बात है जब औरतों का फ़िल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। फ़िल्मों में काम करना तो दूर की बात है, लड़कियों का गाना-बजाना और नृत्य करना भी अशोभनीय माना जाता था। इन सब चीज़ों के लिए कोठेवालियाँ होती थीं। इसलिए थिएटर और फ़िल्मों में या तो पुरुष ही महिला का वेश धारण कर अभिनय करते थे या फिर कोठे से औरतों को बुलाया जाता था, जिनके नाम के पीछे अक्सर "बाई" लगाया जाता था। इस वजह से अच्छे घर की औरतें फ़िल्मों से दूर ही रहती थीं। दुर्गा खोटे ने इस विचारधारा के ख़िलाफ़ जाकर फ़िल्म जगत में प्रवेश किया और दूसरी महिलाओं के लिए इस राह पर चलने का मार्ग आसान बनाया। दुर्गा खोटे के फ़िल्म जगत में पदार्पण की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। 'लिस्नर्स बुलेटिन' के नवंबर 1991 के अंक-87 में प्रकाशित देवीशंकर कनौजिया के एक लेख के अनुसार सन्‍ 1930 में मोहन भवनानी, वाडिया के साथ मिलकर एक मूक फ़िल्म बना रहे थे। फ़िल्म लगभग पूरी हो चुकी थी। उसी समय बोलती फ़िल्मों की लहर ने भवनानी को इसी फ़िल्म में एक सवाक्‍ अंश जोड़ने के लिए विवश किया जिसके लिए वो एक नई युवती चाहते थे। यह कार्य उन्होंने वाडिया को सौंप दिया। वाडिया शालिनी के मित्र थे। उन्होंने उस भूमिका हेतु शालिनी के समक्ष प्रस्ताव रखा जिसे शालिनी ने तुरन्त अस्वीकार कर दिया। काफ़ी आग्रह करने पर उन्होंने अपनी छोटी बहन दुर्गा का नाम प्रस्तावित किया तथा वाडिया को वो दुर्गा के पास भी ले गईं। परिस्थितिवश दुर्गा ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस प्रकार दुर्गा खोटे को पहली फ़िल्म 'ट्रैप्ड' उर्फ़ 'फ़रेबी जाल' (1931) में सिर्फ़ 10 मिनट की भूमिका मिली जिसमें उनके गाए तीन गीत भी सम्मिलित थे। फ़िल्म की शूटिंग्‍ पूरी होने पर उन्हें 250 रुपये का चेक मिला जिससे उस समय उनके आवश्यक खर्चे निकल आए। इस फ़िल्म के प्रदर्शित होने पर दुर्गा की बड़ी दुर्गति हुई। अपनी समस्याओं का निराकरण तो दूर, उल्टे और उलझती गईं किन्तु साहसिक दुर्गा न तो भटकीं और न धैर्य को छोड़ा। इन्हीं दिनों प्रभात कम्पनी ने प्रथम सवाक्‍ फ़िल्म 'अयोध्या चा राजा' में तारामती की भूमिका के लिए उन्हें अवसर दिया। शान्ताराम जी छत्र-छाया में उन्होंने बहुत कुछ सीखा और अपने अभिनय का लोहा दर्शकों से मनवाया। बाद में यही फ़िल्म हिन्दी में बनी और वो पूरे देश में विख्यात हो गईं। आज दुर्गा खोटे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन सिने जगत में अभिनय को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली और महिलाओं को स्वावलंबन का सबक देने वाली रजत-पर्दे की परी दुर्गा खोटे के लिए इतिहास सदैव सुर्ख़ियाँ सुरक्षित रखने में गौरव समझेगा।

इस फिल्म में दुर्गा खोटे ने भी अपने गीत स्वयं गाये थे। आपको उनका गाया एक दुर्लभ गीत सुनवाते हैं।

फिल्म – अयोध्या चा राजा : ‘आधि सुमन दे...’ : दुर्गा खोटे



इसी गीत के साथ इस अंक से हम विराम लेते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता की। पिछले दो अंकों में हमने अपने संचालक मण्डल के गैर-प्रतियोगी आलेख को शामिल किया था। हमारे अगले अंक में जो आलेख शामिल होगा वह प्रतियोगी वर्ग से होगा। आपके आलेख हमें जिस क्रम से प्राप्त हुए हैं, उनका प्रकाशन हम उसी क्रम से करेंगे। 
यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपनी प्रविष्टि नहीं भेजी है तो हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर मेल करें। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम अपने इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं।

आलेख - सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति – कृष्णमोहन मिश्र 



“मैंने देखी पहली फिल्म” : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता

दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के १०० वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। १०० से ५०० शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव swargoshthi@gmail.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा "मैंने देखी पहली फिल्म"। सर्वश्रेष्ठ ३ आलेखों को ५०० रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कार स्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, की-बोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव, प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि ३१ अक्टूबर २०१२ है।

Tuesday, July 3, 2012

बिम्ब एक प्रतिबिम्ब अनेक


शब्दों की चाक पर - एपिसोड 05

शब्दों की चाक पर हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 


1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.


2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगें. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से ये बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

चलिए अब लौटते हैं अनुराग शर्मा और अभिषेक ओझा की तरफ जो आज आपके लिए लेकर आये हैं कुछ मार्मिक कवितायेँ जो ऊपर दी हुई तस्वीर को देखकर हमारे कवि मनों से उभरी हैं, आज का एपिसोड यक़ीनन आपको कुछ सोचने के लिए मजबूर करेगा. तो दोस्तों सुनिए सुनाईये और छा जाईये...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)





या फिर यहाँ से डाउनलोड करें 

Monday, July 2, 2012

आपके नाम भी हो सकता है 5000 रुपये का इनाम, आज से ही भाग लीजिए 'सिने-पहेली' में


सिने-पहेली # 27 (2 जुलाई, 2012) 


'सिने पहेली' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हमारे कुछ प्रतियोगियों ने हमें यह सूचित किया है कि 'सिने पहेली' में सोमवार से शुक्रवार तक का समय होने की वजह से उन्हें जवाब भेजने में परेशानी हो रही है क्योंकि इनमें कोई छुट्टी का दिन शामिल नहीं है, इसलिए हमें 'सिने पहेली' का दिन इस तरह से निर्धारित करना चाहिए ताकि शनिवार और रविवार जवाब भेजने वाले दिनों में शामिल हो जाए। तो दोस्तों, इसके जवाब में हम फ़िलहाल यही कहना चाहेंगे कि ऐसा कर पाना अभी मुमकिन नहीं है क्योंकि 'सिने पहेली' पोस्ट करने के लिए हमें भी छुट्टी के दिन की ज़रूरत पड़ती है। हाँ, हम इतना ज़रूर कर सकते हैं कि शुक्रवार की जगह अब आप शनिवार शाम 5 बजे तक अपना जवाब भेज सकते हैं। इस तरह से अब आपको शनिवार का पूरा दिन मिल गया जवाबों को ढूंढ कर हमें भेजने के लिए। चलिए शुरू करते हैं आज की पहेली


आज की पहेली: गान पहचान 

दोस्तों, आज बहुत दिनों बाद हम रुख़ कर रहे हैं ऑडियो की तरफ़। हमने ख़ास आपके लिए तैयार किया है एक फ़िल्मी मेडली। सुनिए इस मेडली को और पहचानिए इस मेडली में शामिल गीतों को। हर सही गीत के पहचानने पर आपको मिलेंगे 1 अंक।





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और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

२. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 27" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम व स्थान लिखें।

३. आपका ईमेल हमें शनिवार 7 जुलाई शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद की प्रविष्टियों को शामिल कर पाना हमारे लिए संभव न होगा।

४. आप अपने जवाब एक ही ईमेल में लिखें। किसी प्रतियोगी का पहला ईमेल ही मान्य होगा। इसलिए सारे जवाब प्राप्त हो जाने के बाद ही अपना ईमेल भेजें।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और 100 एपिसोड्स (10 सेगमेण्ट्स) के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा जिन्हे दिया जाएगा 5000 रुपये का नगद इनाम। 


और अब पिछले सप्ताह पूछे गए सवालों के सही जवाब...

'सिने पहेली - 26' के सही जवाब 




१) सलेटी (GREY) - छम छमा छम, आसमान और बाज़ - तीनों फिल्मों में ओ पी नैयर का संगीत था। ये तीनों नय्यर साहब की पहली तीन फ़िल्में थीं।

२) नारंगी (ORANGE) - काला पत्थर, क़ानून और अचानक - तीनों फ़िल्मों का पार्श्व संगीत सलिल चौधरी ने तैयार किया था। तीनों फिल्मों के मुख्य पात्र पर हत्या/ अपराध का आरोप है। तीनों फ़िल्मों के लिए फ़िल्म के निर्देशक को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का नामांकन मिला था फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार में।

३) लाल (RED) - "दीवाना मुझसा नहीं" जुमले वाला गीत शम्मी कपूर पर 'तीसरी मंज़िल' फ़िल्म में फ़िल्माया गया था, और आमिर ख़ान पर भी 'दीवाना मुझसा नहीं' फ़िल्म का शीर्षक गीत फ़िल्माया गया था जिसे उदित नारायण ने गाया था।

४) भूरा (BROWN) - शंकर राव, अविनाश और भरत - तीनों का पारिवारिक नाम व्यास है। 

५) गुलाबी (PINK) - सुधा मल्होत्रा, मुकेश और तलत महमूद - इन तीनों गायकों को हिन्दी फ़िल्म में प्लेबैक करने का पहला मौका संगीतकार अनिल बिस्वास ने दिया था।

६) नीला (BLUE) - कुदरत, मधुमती और नील कमल - तीनों फिल्मों की कहानी पुनर्जन्म पर आधारित है। 

७) आसमानी (SKY) - आतिफ़ असलम, ज़ेबा बख्तियार और राहत फ़तेह अली खां - तीनों पाकिस्तान से आये कलाकार हैं।

८) पीला (YELLOW) - रफू चक्कर, क़िस्मत और बाज़ी- तीनों फिल्मों के नायक स्त्री वेश में गाना गाते हैं। 

९) प्याजी (ONION)- तुम मिले, आप तो ऐसे न थे और साया - तीनों फिल्मों में एक गीत ऐसा है जिसके तीन संस्करण है - 'आप तो ऐसे न थे' में "तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है" को रफ़ी, हेमलता और मनहर ने गाया है। 'तुम मिले' का शीर्षक गीत जावेद अली, नीरज श्रीधर और शफ़कत अमानत अली ने गाया है। 'साया' का "दिल चुरा लिया" गीत सोनू निगम, श्रेया घोषाल और उदित-अलका ने गाया है।

१०) हरा (GREEN) - संगम, साजन और हम दिल दे चुके सनम - तीनों फ़िल्में प्रेम-त्रिकोण की कहानी पर आधारित है और एक नायक को अपने प्यार की कुर्बानी देनी पड़ती है।

चलिए अब 'सिने पहेली # 26' के विजेयताओं के नाम ये रहे -----

'सिने पहेली - 26' के विजेता 


1. शुभ्रा शर्मा, नयी दिल्ली --- 10 अंक 
2. सलमन ख़ान, अलीगढ़ --- 10 अंक 
3. अल्पना वर्मा, अल आइन, यू.ए.ई --- 10 अंक 
4. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 10 अंक 
5. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 10 अंक 
6. क्षिति तिवारी, इंदौर --- 10 अंक 
7. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 10 अंक 
8. रीतेश खरे, मुंबई --- 10 अंक 
9. अमित चावला, दिल्ली --- 10 अंक 
10. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 5 अंक 
11. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 1 अंक 

पंकज मुकेश ने हमें सूचित किया है  वो पूरा सप्ताह थे, फिर भी 'सिने पहेली' के समय-सीमा समाप्त होने से थोड़ी देर पहली जितना हो सका उतने का जवाब भेज दिया। पंकज जी, हम आपके स्पोर्ट्समैनशिप की दाद देते हैं कि इस तरह की खेल भावना से इस प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं। चाहे प्रतियोगिता में जीत किसी की भी हो, असली जीत उसी की होती है जो एक सच्चे खिलाड़ी की मनोभावना से प्रतियोगिता में भाग लेता है। आपके जल्द कुशलता की हम कामना करते हैं।

'सिने पहेली' प्रतियोगिता के तीसरे सेगमेण्ट में अब तक का सम्मिलित स्कोर-कार्ड यह रहा...


इस तरह से हम देखते हैं कि अब तक की लड़ाई में प्रकाश गोविंद, सलमन ख़ान और क्षिति तिवारी सबसे उपर चल रहे हैं, और उनके बिल्कुल कंधे पर सांसें डाल रहे हैं शुभ्रा शर्मा और रीतेश खरे।गौतम केवलिया, पंकज मुकेश और शरद तैलंग ने भी अच्छी लड़ाई लड़ी है अब तक। देखते हैं तीसरे सेगमेण्ट का विनर कौन बनता है। बड़ा दिलचस्प मोड़ ले चुका है यह सेगमेण्ट!

सभी प्रतियोगियों को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। 

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी १००% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, आपकी और मेरी दोबारा मुलाक़ात होगी अगले सोमवार इसी स्तंभ में, नमस्कार!

Sunday, July 1, 2012

७५वें वर्ष में प्रवेश पर अभिनन्दन, पं . चौरसिया जी


स्वरगोष्ठी – ७७ में आज
बाँस की बाँसुरी और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया

ज ‘स्वरगोष्ठी’ का यह ७७ वाँ अंक है और आज की इस बैठक में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने सभी संगीत-प्रेमी पाठकों/श्रोताओं का हार्दिक स्वागत करते हुए बाँसुरी के अनन्य साधक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से, अपनी ओर से और आप सब संगीत-प्रेमियों की ओर से अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, आज जुलाई की पहली तारीख है। आज ही के दिन १९३८ में इस महान संगीतज्ञ का जन्म हुआ था। एक साधारण सी दिखने वाली बाँस की बाँसुरी लेकर पूरे विश्व में भारतीय संगीत की विजय-पताका फहराने वाले पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का आज ७५वाँ जन्म-दिवस अर्थात अमृत महोत्सव मनाने का दिवस है। आज ही वे अपने जीवन के सुरीले ७४ वर्ष पूर्ण कर ७५वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। आइए, ‘स्वरगोष्ठी’ में आज हम सब उन्हीं की कुछ रचनाओं से उनका अभिनन्दन करते हैं।

बाँस से बनी बाँसुरी सम्भवतः सबसे प्राचीन स्वर-वाद्य है। महाभारत काल से पहले भी बाँसुरी का उल्लेख मिलता है। विष्णु के कृष्णावतार को तो ‘मुरलीधर’, ‘बंशीधर’, ‘वेणु के बजइया’ आदि नामों से सम्बोधित किया गया है। श्रीकृष्ण से जुड़ी तमाम पौराणिक कथाएँ बाँसुरी के गुणगान से भरी पड़ी हैं। यह एक ऐसा सुषिर वाद्य है जो लोक, सुगम से लेकर शास्त्रीय मंचों पर भी सुशोभित है। भारतीय संगीत के क्षेत्र में बाँसुरी के अनेक साधक हुए हैं, जिन्होने इस साधारण से दिखने वाले सुषिर वाद्य को असाधारन गरिमा प्रदान की है। वर्तमान में पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया बाँसुरी के ऐसे साधक हैं जिन्होने देश-विदेश में इस वाद्य को प्रतिष्ठित किया है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए, बाँसुरी पर उनके बजाये राग जैजैवन्ती का आनन्द लेते हैं। सुविख्यात तबला वादक पण्डित समर साहा संगति की है।

राग – जैजैवन्ती : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया



हरिप्रसाद चौरसिया का जन्म १ जुलाई, १९३८ को इलाहाबाद के एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ सभी सदस्यों को कुश्ती का शौक था। उनके पिता भी जाने-माने पहलवान थे और चाहते थे कि उनका पुत्र भी कुश्ती के दाँव-पेंच सीखे। बालक हरिप्रसाद पिता के साथ अखाड़ा जाते तो थे किन्तु उनका मन इस कार्य में कभी नहीं लगा। उनका बाल-मन तो सुरीली ध्वनियों की ओर आकर्षित होता था। किशोरावस्था में हरिप्रसाद की भेंट बनारस (अब वाराणसी) के पण्डित राजाराम से हुई। उन्होने इस किशोर की छिपी प्रतिभा को पहचाना और संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्होने ही दी। एक बार हरिप्रसाद ने पण्डित भोलानाथ प्रसन्ना का बाँसुरी-वादन सुना और इसी वाद्य को अपनाने का निश्चय कर लिया। १५ वर्ष की आयु में वे प्रसन्ना जी के शिष्य हुए और १९ की आयु के होने तक बाँसुरी-वादन में इतने कुशल हो गए कि उनकी नियुक्ति आकाशवाणी में हो गई। उनकी पहली तैनाती ओडिसा स्थित कटक केन्द्र पर बाँसुरी-वादक के रूप में हुई। यहाँ वे लगभग पाँच वर्ष तक रहे। इस दौरान उन्होने अनेक संगीतज्ञों को सुना और क्षेत्रीय सगीत का अध्ययन भी किया।

आइए, यहाँ थोड़ा विराम लेकर पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया का बजाया राग हंसध्वनि में दो रचनाएँ सुनवाते हैं। राग हंसध्वनि अत्यन्त मधुर राग है, जो उत्तर और दक्षिण, दोनों संगीत पद्यतियों में समान रूप से लोकप्रिय है। इस राग में पण्डित जी द्वारा प्रस्तुत पहली मध्य लय की रचना सितारखानी में और दूसरी द्रुत तीनताल में निबद्ध है।

राग – हंसध्वनि : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया



लगभग पाँच वर्ष तक कटक केन्द्र पर कार्यरत रहने के बाद हरिप्रसाद जी का स्थानान्तरण कटक से आकाशवाणी के मुम्बई केन्द्र पर हो गया। मुम्बई आ जाने के बाद संगीत के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा को एक नई पहचान मिली। अब उन्हें प्रतिष्ठित संगीत सभाओं में मंच-प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया जाने लगा था। यहीं रह कर उनका सम्पर्क मैहर घराने के संस्थापक और सन्त-संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की सुपुत्री विदुषी अन्नपूर्णा देवी से हुआ। उन दिनों अन्नपूर्णा जी एकान्तवास कर रहीं थी। परन्तु हरिप्रसाद जी की प्रतिभा से प्रभावित होकर इनका मार्गदर्शन करना स्वीकार किया। अन्नपूर्णा जी से मार्गदर्शन पाकर हरिप्रसाद जी के वादन में भरपूर निखार आया। उन्होने रागों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोक-संगीत का भी गहन अध्ययन किया था। आज भी विभिन्न संगीत-समारोहों में अपने बाँसुरी-वादन को विराम देने से पहले वे कोई लोकधुन अवश्य प्रस्तुत करते हैं। आइए, अब हम आपको बाँसुरी पर प्रस्तुत भटियाली धुन सुनवाते हैं। पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत इस भटियाली धुन के साथ तबला संगति पण्डित योगेश समसी ने की है।

भटियाली धुन : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया






देश-विदेश के अनेकानेक सम्मान और पुरस्कारों से अलंकृत पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया ने सुप्रसिद्ध संतूर-वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा के साथ जोड़ी बना कर वर्ष १९८९ से फिल्मों में भी संगीत देना आरम्भ किया। शिव-हरि के नाम से इन दिग्गज संगीतज्ञों ने चाँदनी, विजय, सिलसिला, लम्हे, डर आदि फिल्मों में अनेक लोकप्रिय गीत दिये हैं। आज के इस अंक को विराम देने से पहले आपके लिए प्रस्तुत है फिल्म ‘चाँदनी’ का एक प्यारा सा गीत।

फिल्म – चाँदनी : ‘तेरे मेरे होठों पे मीठे मीठे गीत सजना...’ : लता मंगेशकर और बावला



आज की पहेली

आज की संगीत-पहेली में हम आपको सुनवा रहे हैं, फिल्मी गीत का एक अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक/श्रोता हमारी तीसरी पहेली श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – इस गीत में दो गायक कलाकारों के स्वर हैं। एक स्वर सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक येशुदास का हैं। गायिका की आवाज़ पहचानिए।

आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ७९वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ७५ वें अंक में हमने आपको संगीत-मार्तण्ड ओमकारनाथ ठाकुर के स्वर में स्वतंत्र भारत के प्रथम सूर्योदय पर रेडियो से सजीव रूप से प्रसारित ‘वन्देमातरम’ गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग देस और दूसरे का उत्तर है- बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ की अरुंधति चौधरी तथा पटना की अर्चना टण्डन ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, इन दिनों देश के कई भागों में वर्षा ऋतु ने दस्तक दे दी है और कुछ भागों में अभी भी कजरारे बादलों की प्रतीक्षा हो रही है। अगले अंक से हम मल्हार शीर्षक से एक लघु श्रृंखला प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला में हम आपसे वर्षा ऋतु के प्रचलित संगीत शैलियों और रागों पर चर्चा करेंगे। इस विषय पर यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें तुरन्त लिखें। रविवार को प्रातः ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

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