Saturday, December 3, 2011

विशेष - सिने-संगीत के कलाकारों के लिए उस्ताद सुल्तान ख़ाँ का योगदान

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 70
एक बार सुल्तान ख़ाँ साहब नें कहा था कि जो कलाकार संगत करते हैं उन्हें अपने अहम को त्याग कर मुख्य कलाकार से थोड़ा कम कम बजाना चाहिए। उन्होंने बड़ा अच्छा उदाहरण दिया था कि अगर आप बाराती बन के जा रहे हो किसी शादी में तो आपकी साज-सज्जा दुल्हे से बेहतर तो नहीं होगी न! पूरे बारात में दुल्हा ही केन्द्रमणि होता है। ठीक उसी तरह, संगत देने वाले कलाकार को भी (चाहे वो कितना भी बड़ा कलाकार हो) मुख्य कलाकार के साथ सहयोग देना चाहिए।

Friday, December 2, 2011

विथ लव डेल्ही - एक फिल्म हौंसलों की, हिम्मतों की, युवा ख्वाबों की और विश्वास की

कवर स्टोरी - 01/01/11/2011

दोस्तों "३ इडियट्स" फिल्म याद हैं न आपको. फिल्म का सन्देश भी याद होगा. पर अक्सर हम ये सोचते हैं कि फिल्मों की बात अलग है, कहाँ वास्तविक जीवन में ऐसा होता है कि जमे जमाये करियर को छोड़ कर कोई अपने सपनों का पीछा करने निकल पड़े. पर साथियों, कभी कभी बहुत से फ़िल्मी किरदार हमें वास्तविक दुनिया में हमारे आस पास ही मिल जाते हैं. ऐसे ही एक किरदार से मैं आज आपका परिचय करवाने जा रहा हूँ. ये हैं उभरते हुए अभिनेता आशीष लाल. एक इंजीनियरिंग विद्यार्थी से अभिनेता बने आशीष ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक फुल लेंथ फिल्म बना डाली, जबकि इससे पहले उनमें से किसी का भी बॉलीवुड से कोई रिश्ता नाता नहीं था. आईये आशीष से ही जाने उनकी फिल्म "विथ लव डेल्ही" के बनने की कहानी -

Thursday, December 1, 2011

एक राधा एक मीरा, दोनों ने श्याम को चाहा...दादु की दिव्य चेतना में कायम रहे उनकी संगीत साधना

टी.पी. साहब ने ज़िक्र किया कि दादु, राज साहब को गाना सुनाओ। यह गीत मैंने 'जीवन' फ़िल्म के लिए लिखा था, 'राजश्री' वालों के लिए। दो ऐसे गीत हैं जो दूसरी फ़िल्म में आ गए, उसमें से एक है 'अखियों के झरोखों से' का टाइटल सॉंग, सिप्पी साहब के लिए लिखा था जो 'घर' फ़िल्म बना रहे थे, लेकिन वो कुछ ऐसी बात हो गई कि उनके डिरेक्टर को पसन्द नहीं आया, उनको गाना ठंडा लगा। तो मैंने राज बाबू को सुना दिया तो उन्होंने यह टाइटल रख लिया। फिर सिप्पी साहब ने वही गाना माँगा मुझसे, मैंने कहा कि अब तो मैंने गाना दे दिया किसी को। बाद में ज़रा वो नाख़ुश भी हो गए थे। तो यह गाना 'जीवन' फ़िल्म के लिए, प्रशान्त नन्दा जी डिरेक्ट करने वाले थे, उसके लिए "एक राधा एक मीरा" लिखा था मैंने। तो राज साहब वहाँ बैठे थे। तो यह गाना जब सुनाया तो राज साहब ने दिव्या से पूछा कि यह गीत किसी को दिया तो नहीं? मैंने कहा कि नहीं, दिया तो नहीं! राज साहब तीन दिन थे और तीनो दिन वो मुझसे यह गाना सुनते रहे। और टी.पी. भाईसाहब से सवा रुपय लिया और मुझे देकर कहा कि आज से यह गाना मेरा हो गया, मुझे दे दो।

Wednesday, November 30, 2011

सांची कहे तोरे आवन से हमरे....याद आया ये मासूम सा गीत दादु के संगीत से संवरा

आज के अंक में हम आपको सुनवा रहे हैं फिर एक बार 'राजश्री' और 'रवीन्द्र जैन की जोड़ी की एक और ज़बरदस्त हिट फ़िल्म 'नदिया के पार' (१९८२) का गीत जसपाल सिंह की आवाज़ में। बोल हैं "सांची कहे तोरे आवन से हमरे अंगना में आये बहार भौजी"। फ़िल्म का पार्श्व ग्रामीण था, इसलिए फ़िल्म के गीतों में संगीत भी भोजपुरी शैली के थे। पर जब 'राजश्री' ने ९० के दशक में इसी फ़िल्म का शहरी रूपान्तर कर 'हम आपके हैं कौन' के रूप में पेश किया, तब इसी गीत का शहरी रूप बन गया "धिकताना धिकताना धिकताना, भाभी तुम ख़ुशियों का ख़ज़ाना"।

Tuesday, November 29, 2011

ऐ मेरे उदास मन चल दोनों कहीं दूर चलें...येसुदास ने अपने सबसे बेहतरीन गीत गाये दादु के लिए

एक दिन बासु भट्टाचार्य जी ने येसुदास को लाकर कहा कि यह लड़का गाएगा, इसे सुन लो। हम लोग अमोल पालेकर के लिए एक नई आवाज़ की तलाश कर रहे थे, तो येसुदास जी की आवाज़ उन पर बिल्कुल फ़िट हो गई, बहुत ही अच्छे गुणी कलाकार हैं। और यह जो गाना है न, "जब दीप जले आना", इसकी धुन मैंने पहले कलकत्ते में तैयार किया था एक नाटक के लिए, 'मृच्छ कटिका'। इसके बाद हम तो चल पड़े, मंज़िल की जिसको धुन हो, उसे कारवाँ से क्या!" दोस्तों, इसी बात पर येसुदास का गाया फ़िल्म 'मान अभिमान' का वह गीत यकायक याद आ गया, जिसके बोल हैं "ऐ मेरे उदास मन चल दोनों कहीं दूर चलें, मेरे हमदम, तेरी मंज़िल, ये नहीं ये नहीं कोई और है

Monday, November 28, 2011

एक दिन तुम बहुत बड़े बनोगे...और दिल से बहुत बड़े बने दादु हमारे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 797/2011/237

'मेरे सुर में सुर मिला ले' शृंखला की सातवीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। रवीन्द्र जैन के लिखे और स्वरबद्ध किए गीतों की इस शृंखला में आइए आज आपको बतायें कि दादु को बम्बई में पहला मौका किस तरह से मिला। "झुनझुनवाला जी नें मुझे कहा कि तुम अभी थोड़ा धैर्य रखो, यहाँ बैठ के काम करो, अपने घर में जगह दी, और काम करता रहा, उनको धुनें बना बना के सुनाता था, उन्होंने एक फ़िल्म प्लैन की 'लोरी', जिसके लिए हम बम्बई गानें रेकॉर्ड करने आए थे, जिसका मुकेश जी नें दो गानें गाये। मुकेश जी का एक गाना मैं आपको सुनाता हूँ, जो कुछ मैं कलकत्ते से यहाँ लेके आया था - "दुख तेरा हो कि दुख मेरा हो, दुख की परिभाषा एक है, आँसू तेरे हों कि आँसू मेरे हों, आँसू की भाषा एक है"।"

Sunday, November 27, 2011

ले तो आए हो हमें सपनों के गाँव में...दादू की धुनों पर खूब सजी हेमलता की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 796/2011/236

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी संगीत-रसिकों को सुजॉय चटर्जी और सजीव सारथी का प्यार भरा नमस्कार! आज रविवार, छुट्टी का यह दिन आपनें हँसी-ख़ुशी मनाया होगा, ऐसी हम उम्मीद करते हैं। और अब शाम ढल चुकी है भारत में, कल से नए सप्ताह का शुभारम्भ होने जा रहा है, फिर से ज़िन्दगी रफ़्तार पकड़ लेगी, दफ़्तर के कामों में, दैनन्दिन जीवन के उलझनों में फिर एक बार हम डूब जाएंगे। इन सब से अगर हमें कोई बचा सकता है तो वह है सुरीला संगीत। और इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जो शृंखला चल रही है वह भी बड़ा ही सुरीला है, क्योंकि जिन कलाकार पर यह शृंखला केन्द्रित है, वो बहुत ज़्यादा सुरीले हैं, स्तरीय हैं। रवीन्द्र जैन के लिखे और स्वरबद्ध किए गीतों से सजी शृंखला 'मेरे सुर में सुर मिला ले' की आज है छठी कड़ी।

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