Saturday, June 20, 2009

बचना ज़रा ज़माना है बुरा...रफी और गीता दत्त में खट्टी मीठी नोंक झोंक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 117

हाँ तक मोहम्मद रफ़ी और गीता दत्त के गाये युगल गीतों की बात है, हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कई बार ऐसे गीत बजाये हैं। और वो सभी के सभी नय्यर साहब के संगीत निर्देशन में थे। आज भी एक रफ़ी-गीता डुएट लेकर हम ज़रूर आये हैं लेकिन ओ. पी. नय्यर के संगीत में नहीं, बल्कि एन. दत्ता के संगीत निर्देशन में। जी हाँ, यह गीत है फ़िल्म 'मिलाप' का। वही देव आनंद - गीता बाली वाली 'मिलाप' जो बनी थी सन् १९५५ में और जिसमें एन. दत्ता ने पहली बार बतौर स्वतंत्र संगीतकार संगीत दिया था। केवल एन. दत्ता का ही नहीं, बल्कि फ़िल्म के निर्देशक राज खोंसला का भी यह पहला निर्देशन था। इससे पहले उन्होने गुरु दत्त के सहायक निर्देशक के रूप में फ़िल्म 'बाज़ी' ('५१), 'जाल' ('५२), 'बाज़' ('५३) और 'आर पार' (१९५४) काम कर चुके थे। इसलिए एक अच्छे फ़िल्म निर्देशक बनने के सारे गुण उनमे समा चुके थे। जिस तरह से इस फ़िल्म में उन्होने नायिका गीता बाली की 'एन्ट्री' करवाई है "हमसे भी कर लो कभी कभी तो" गीत में, यह हमें याद दिलाती है गुरु दत्त साहब की जिन्होने कुछ इसी अंदाज़ में शक़ीला का 'एन्ट्री' करवाया था "बाबुजी धीरे चलना" गीत में, फ़िल्म 'आर पार' में। फ़िल्म 'मिलाप' फ़्रैंक काप्रा के मशहूर कृति 'मिस्टर डीड्स गोज़ टु टाउन' (१९३६) से प्रेरीत था। इस फ़िल्म के पहले दिन की शूटिंग से संबंधित एक हास्यास्पद घटना आपको बताते हैं। हुआ यूँ कि राज खोंसला साहब, जो अब तक गुरु दत्त के सहायक हुआ करते थे, उन्हे अब 'मिलाप' में निर्देशक बना दिया गया था। तो पहले दिन की शूटिंग के वक़्त जब उन्हे यह बताया गया कि शॉट रेडी है, तो वो अपनी पुरानी आदत के मुताबिक बोल उठे, "गुरु दत्त को बुलाओ"। यह सुनकर के. एन. सिंह, जो पास ही बैठे हुए थे, ज़ोर से हँस पड़े।

'मिलाप' के संगीतकार दत्ता नाइक, जिन्हे हम और आप एन. दत्ता के नाम से जानते हैं, की यह पहली फ़िल्म थी बतौर स्वतंत्र संगीतकार। इससे पहले वो सचिन दा के सहायक हुआ करते थे। उनकी प्रतिभा नज़रंदाज़ नहीं हुई और उन्हे इस फ़िल्म में पहला ब्रेक मिल गया। बर्मन दादा के साथ काम करते वक़्त एन. दत्ता साहिर लुधियानवी के संस्पर्श में भी आये जिनके क्रांतिकारी ख्यालातों से वो काफ़ी मुतासिर भी थे। एन. दत्ता और साहिर की जोड़ी बनी और दोनो ने साथ साथ कई फ़िल्मों का गीत संगीत तैयार किया। 'मिलाप' पहली फ़िल्म थी। आज फ़िल्म 'मिलाप' को याद किया जाता है तो गीता दत्त के गाये "जाते हो तो जाओ तुम जाओगे कहाँ, मेरे जैसा दिल तुम पायोगे कहाँ" गीत की वजह से। हालाँकि इस फ़िल्म के और भी कई गीत उस समय काफ़ी लोकप्रिय हुए थे, लेकिन यह गीत सबसे ज़्यादा चला था। गीता दत्त और रफ़ी साहब की आवाज़ों में जिस गीत का ज़िक्र हमने उपर किया और जिस गीत को आज हम सुनवा रहे हैं वह गीत है "बचना ज़रा ये ज़माना है बुरा, कभी मेरी गली में ना आना". जॉनी वाकर और गीता बाली पर फ़िल्माये गये इस गीत में राज खोंसला और एन. दत्ता ने वही बात पैदा करने की कोशिश की है जो गुरु दत्त और ओ. पी. नय्यर या बर्मन दादा किया करते थे। फ़िल्म 'मिलाप' के संगीत ने एन. दत्ता को फ़िल्म जगत में काफ़ी हद तक स्थापित कर दिया। तो लीजिये आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में संगीतकार एन. दत्ता को याद करते हुए सुनिये यह गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. नायिका की सुन्दरता का बयां है ये गीत.
२. रचा है आनंद बख्शी ने.
३. मुखड़े में शब्द है -"हुस्न".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न मंजूषा जी १० अंकों के लिए बधाई. शरद जी, रचना जी आप सब को भी सही गीत पहचानने के लिए बधाई. पराग जी बहुत अच्छी जानकारी दी आपने, वाकई इस तीनों गायिकाओं का एक फिल्म में गीत होना दुर्लभ ही है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सुनो कहानी: इस्तीफा

मुंशी प्रेमचन्द की "इस्तीफा"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में विष्णु प्रभाकर की कहानी फ़र्क का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं मुंशी प्रेमचंद की कहानी "इस्तीफा", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।
कहानी का कुल प्रसारण समय 21 मिनट 00 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

बेचारे दफ्तर के बाबू को आप चाहे ऑंखे दिखायें, डॉँट बतायें, दुत्कारें या ठोकरें मारों, उसक माथे पर बल न आयेगा। उसे अपने विकारों पर जो अधिपत्य होता हे, वह शायद किसी संयमी साधु में भी न हो। संतोष का पुतला, सब्र की मूर्ति, सच्चा आज्ञाकारी, गरज उसमें तमाम मानवी अच्छाइयाँ मौजूद होती हें।
(प्रेमचंद की "इस्तीफा" से एक अंश)


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#Twenty-sixth Story, Isteefa: Munshi Premchand/Hindi Audio Book/2009/21. Voice: Anurag Sharma

Friday, June 19, 2009

एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन....रंगीन मौसम को और रंगीन किया शमशाद बेगम ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 116

मारी फ़िल्मों में कुछ चरित्र ऐसे होते हैं जो मूल कहानी के पात्र तो नहीं होते लेकिन जिनकी उपस्तिथि फ़िल्म को और ज़्यादा मनोरंजक बना देती है। इस तरह के चरित्र को निभाने में फ़िल्म जगत के कई छोटे बड़े कलाकारों का हमेशा से हाथ रहा है। इनमें से कुछ हास्य कलाकार हैं तो कुछ नृत्यांगनायें, और कुछ सामान्य चरित्र अभिनेतायें। आज हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पहली बार ज़िक्र कर रहे हैं एक ऐसी ही चरित्र अभिनेत्री का जिन्होने अपनी नृत्य कला के ज़रिये, ख़ासकर ४० और ५० के दशकों में, दर्शकों के दिलों पर राज किया। हम बात कर रहे हैं अभिनेत्री कुक्कू (Cuckoo) की। आज सुनिये इन्ही पर फ़िल्माया हुआ राज कपूर की फ़िल्म 'आवारा' का गीत "एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन"। आज जब मौका हाथ लगा है तो क्यों न आपको इस अभिनेत्री और नर्तकी के बारे में थोड़ी विस्तार से बताया जाये! कुक्कू का ३० सितम्बर १९८१ को केवल ५२ वर्ष की आयु में फ़ेफ़ड़े के केन्सर के कारण निधन हो गया था। वो अविवाहित 'प्रोटेस्टेण्ट' थीं। सन् १९४६ की 'अरब का सितारा' एवं 'सर्कस किंग' फ़िल्मों से अपना फ़िल्मी जीवन शुरु करने के बाद सन् १९४७ की 'मिर्ज़ा साहिबाँ' के गीत "सामने गली में मेरा घर है" पर नृत्य करके उनकी ख्याती चारों ओर फैल गयी। और उसके बाद तो कुक्कू ने अनगिनत फ़िल्मों में नृत्य किये। एक समय ऐसा भी था जब उनके नृत्य के बग़ैर बनने वाली फ़िल्म अधूरी समझी जाती थी। सन्‍ '४८ से '५२ तक उन्होने फ़िल्मों में अपने नृत्य की धूम मचा दी थी जिनमें अनोखी अदा, अंदाज़, चांदनी रात, शायर, आरज़ू, परदेस, अफ़साना, आवारा, हलचल, आन, साक़ी तथा अनेकों फ़िल्में शामिल हैं। कुल मिलाकार कुक्कू ने लगभग ११८ फ़िल्मों में अभिनय किया। दोस्तों, ये जानकारियाँ मैने खोज निकाली 'लिस्नर्स बुलेटिन' पत्रिका के एक बहुत ही पुरानी अंक से जो प्रकाशित हुई थी सन् १९८१ में और यह लेख कुक्कू पर छपा था उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप।

फ़िल्म 'आवारा' का प्रस्तुत गीत गाया है शमशाद बेग़म ने। शमशाद बेग़म और राज कपूर के साथ की अगर बात करें तो सन्‍ १९४७ मे जब राज कपूर ने आर.के. फ़िल्म्स की स्थापना की और १९४८ में अपनी पहली फ़िल्म 'आग' बनाने की सोची, तो वो शमशादजी के पास गए और अपना परिचय देते हुए उनसे अपनी फ़िल्म में गाने का अनुरोश किया। शमशादजी राज़ी हो गयीं और संगीतकार राम गांगुली के संगीत में वह मशहूर गीत बनी - "काहे कोयल शोर मचाये रे, मोहे अपना कोई याद आये रे"। यह गीत मशहूर हुआ था और आज भी विविध भारती के 'भूले बिसरे गीत' में अक्सर सुनाई दे जाता है। राज कपूर और शमशाद बेग़म का साथ ज़्यादा दूर तक नहीं चल पाया क्योंकि बहुत जल्द ही राज साहब ने अपनी नयी टीम बना ली और उसमें मुख्य गायिका के रूप में लताजी को उन्होने अपना लिया। यहाँ पे यह बताना भी ज़रूरी है कि नरगिस के लिए शुरु शुरु में शमशादजी की ही आवाज़ ली जाती थी, लेकिन लताजी के आने के बाद लताजी बन गयीं नरगिस की पार्श्व-आवाज़। फ़िल्म 'आवारा' में शमशाद बेग़म ने केवल एक गीत गाया था जिसे जैसा कि हमने बताया, चरित्र अभिनेत्री कुक्कू पर फ़िल्माया गया था। शैलेन्द्र का लिखा यह गीत "एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन" अपने आप में एक अनोखा गीत है क्योंकि शैलेन्द्र ने इस तरह के गाने बहुत कम लिखे हैं, लेकिन शमशाद बेग़म ने इस तरह के गाने ख़ूब गाये हैं। इस गीत का संगीत और बीट्स पाश्चात्य हैं जो आपके पैरों को थिरकने पर मजबूर कर देता है। सुनिए और झूमिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इस फिल्म के संगीतकार ने पहली बार इस फिल्म में स्वतंत्र संगीत निर्देशन किया था.
२. रफी और गीता दत्त की युगल आवाजों में है ये गीत.
३. जॉनी वाकर और गीता बाली पर फिल्माए इस गीत में मुखड़े में शब्द है -"गली".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
कल तो कमाल हो गया. शरद जी और स्वप्न मंजूषा जी ने लगभग एक ही साथ बज्ज़र हिट किया और दोनों ने ही सही जवाब दिया. कुछ सेकंडों के फर्क को दरकिनार करते हुए कल की पहेली के लिए दोनों को विजेता मान कर हम २-२ अंक दे रहे हैं. इस तरह शरद का स्कोर हो गया १६ और मंजूषा जी का ८. आधे अंकों का फर्क रह गया है :). सुमित जी, रचना जी, पराग जी, नीलम जी, राज भाटिया जी, शामिक फ़राज़ जी, आप सब का भी आभार. राज सिंह जी हमें भी उम्मीद है कि शरद जी के पसंदीदा गीत हम सब जल्द ही सुनेंगें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, June 18, 2009

दिल एक फूल है इसे खिलने भी दीजिए......पेश है एक जोड़ी कमाल की

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२२

ह कोई फ़िल्मी किस्सा नहीं है, ना हीं किसी लैला-मजनू, हीर-रांझा की दास्तां, लेकिन जो भी है, इन-सा होकर भी इनसे अलहदा है। सुदूर पश्चिम का "मुंडा" और हजारों कोस दूर पूरब की एक "कुड़ी" , वैसे "कुड़ी" तो नहीं कहना चाहिए क्योंकि यह एक पंजाबी शब्द है और लड़की ठहरी बंगाली, लेकिन क्या करूँ मेरा "बांग्ला" का अल्प-ज्ञान मुझे सही शब्द मुहैया नहीं करा रहा, इसलिए सोचा कि जिस तरह उस फ़नकारा ने शादी के बाद अपना "बंगाली उपनाम" त्याग कर "पंजाबी उपनाम" स्वीकार कर लिया, उसी तरह उसने "कुड़ी" होना भी स्वीकार कर लिया होगा, इसलिए "कुड़ी" कहने में कोई बुराई नहीं है।हाँ तो बात की शुरूआत "पंजाब" से करते हैं। "गेहूँ और धान" की लहलहाती फ़सलों के बीच ६ फ़रवरी १९४० में अमृतसर में जन्मे इस फ़नकार की शुरूआती तालीम अपने पिता प्रोफ़ेसर नाथा सिंह से हुई थी, जो खुद एक प्रशिक्षित गायक और संगीतकार थे। वहीं हमारी फ़नकारा ने "बांग्लादेश" की एक संगीतमय परिवार में जन्म लिया था, जन्म से थी तो वो "मुखर्जी" लेकिन आगे चलकर इन्हें "सिंह" होना पड़ा। इन्होंने पाँच साल की कच्ची उम्र से हीं संगीत की साधना शुरू कर दी थी। कहते हैं कि संगीत की सच्ची साधना तब हीं हो सकती है, जब आप अपने दिन के पूरे २४ घंटे बस उसी पर न्योछावर कर दें। लेकिन कुछ लोगों में ऐसी लगन होती है कि वे "संगीत" के साथ-साथ और भी कुछ "साध" लेते है। हमारी फ़नकारा की कहानी भी कुछ ऐसी हैं है। इन्होंने मुंबई के एस०एन०डी०टी० महाविद्यालय से "एम०फिल०" की डिग्री हासिल की है, जो अपने आप में एक मुकाम है।

१९७७ में रीलिज हुई "गुलज़ार" की फ़िल्म "किनारा" में एक गाना है "नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज़ हीं पहचान है, ग़र याद रहे"। यूँ तो इस गाने के बोल हीं ऐसे हैं कि हर फ़नकार की ज़िंदगी और प्रतिभा का सही परिचय मिल जाता है, लेकिन हमारे आज के फ़नकार के लिए इस गाने का कुछ अलग हीं महत्व है। स्वर-कोकिला "लता मंगेशकर" के साथ पंचम दा की धुनों पर इस फ़नकार की मखमली आवाज़ जब गूँजती है तो संगीत को एक अलग हीं नशा और बोलों को एक अलग हीं अर्थ मिल जाता है। अपनी गायकी के प्रारंभिक दिनों में इन्होंने "आल इंडिया रेडिया, दिल्ली" में कई सारे कार्यक्रम दिए....इसके साथ-साथ ये "दिल्ली दूरदर्शन" से भी जुड़े थे। १९६४ में इनकी किस्मत तब चमकी , जब संगीतकार "मदन मोहन" ने इन्हें रेडियो पर सुना और तुरंत हीं मुंबई (तब कि बंबई) आने की फ़रमाईश कर दी। इनकी आवाज़ से "मदन मोहन" साहब इतने प्रभावित हुए कि इन्हें "चेतन आनंद" की आने वाली फ़िल्म "हक़ीकत" में "मोहम्मद रफ़ी" साहब के साथ "होके मज़बूर मुझे उसने बुलाया होगा" गाने का न्यौता मिल गया। किसी भी फ़नकार के लिए इससे बड़ी शुरूआत क्या हो सकती है कि पहले हैं गाने में आप "गायकी के ध्रुवतारा" के साथ माइक्रोफ़ोन शेयर करें।इतना बड़ा प्लेटफ़ार्म मिलने के बावजूद बाकी के फ़नकार्रों की तरह इनकी किस्मत में भी संघर्ष करना लिखा था। "हक़ीकत" के बाद कई सारी छोटी-मोटी फ़िल्मों मे इनके गाने आए लेकिन किसी भी गाने ने सुल्युलायड पर अपना असर नहीं छोड़ा। इसलिए इन्होंने सोचा कि कुछ नया हीं क्यों न किया जाए। इन्होंने पंचम दा का आर्केस्ट्रा ज्वाईन कर लिया और उनके कई सारे गानों में गिटार पर धुन छेड़ी। "दम मारो दम", "चुरा लिया है", "एक हीं ख्वाब"- न जाने ऐसे कितने हीं गिटार-बेस्ड गाने थे, जो इनकी ऊँगलियों के कमाल से शिखर तक पहुँच गए। अब जब इन्होंने वाद्य-यंत्रों के सहारे संगीत की दुनिया में कदम रख हीं लिया था तो फिर "संगीतकार" बनने में क्या देर थी। "अर्ज़ किया है", "एक हसीं शाम" जैसी सुमधुर गीतों को संगीतबद्ध करके इन्होंने इस क्षेत्र में भी अपने कदम जमा लिए।

"गुलज़ार" की हीं फ़िल्म "परिचय" के गानों "बीती ना बिताए रैना" और "मितवा न बोले" से इन्होंने "गायकी" की सुरीली राहों पर रि-इंट्री की। फिर तो पुरस्कारों और सराहनाओं का दौरा शुरू हो गया। "गुलज़ार" के तो ये इतने प्रिय हो गए कि लगभर हर फ़िल्म में इनका गाना होना लाज़िमी था। "दिल ढूँढता है फिर वही फुरसत के रात दिन", "एक अकेला इस शहर मे" ,"हुज़ूर इस कदर भी न इतराके चलिए" ,"एक हीं ख्वाब कई बार देखा है मैने", "बादलों से काट-काट के", "आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं" ,"मचल कर जब भी आँखों से छलक जाते हैं दो आँसू", "फूले दाना दाना फूले बालियाँ" -जैसे गीत न सिर्फ़ "गुलज़ार" को अमर करते हैं,बल्कि इन गीतों को गाने वाले इस शख्स की भी मकबूलियत और "अमरत्व" में बढोतरी करते है। जब इनकी इतनी बात हो हीं गई तो क्यों ना इनके नाम पर पड़े पर्दे को हटा दिया जाए। हम गज़ल-गायकी के उस सितारे की बात कर रहे हैं,जिन्हें कुछ लोग "भुपिन्दर" कहते हैं तो कुछ "भुपि"। "गुलज़ार" के "चाँद परोसा है" को संगीतबद्ध करने वाले "भूपिन्दर सिंह" साहब की गायकी को संबल देने वाली आज की फ़नकारा का जिक्र भी तो लाजिमी है। भला कौन होगा जिसने "भूपिन्दर-मिताली" की जोड़ी का नाम न सुना हो। न जाने कितनी हीं गज़लों और गीतों की फ़ेहरिश्त इनके नाम से आबाद है। इनकी गूँजती-सी आवाज़ "साहिल","शबनम","शरमाते-शरमाते", "आप के नाम", "अर्ज़ किया है" ,"एक आरज़ू", "कुछ इंतज़ार है", "तू साथ चल", "नशेमन", "गुलमोहर", "रात गुलाबी" और न जाने ऐसी कितनी हीं एलबमों में सुनी जा सकती हैं। चूँकि गुलज़ार इनके प्रिय रहे हैं इसलिए "वो जो शायर था" और "चाँद परोसा है" में कुछ अलग-सी हीं बात है। वैसे भी "गुलज़ार" साहब का नाम आते हीं मुझे न जाने क्या हो जाता है। य़ूँ तो आज की गज़ल किसी और एलबम से है,लेकिन मैं "चाँद परोसा है" से कुछ पंक्तियाँ आपसे शेयर करना चाहता हूँ। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

कोसा-कोसा लगता है,
तेरा भरोसा लगता है।
रात ने अपनी थाली में,
चाँद परोसा लगता है।


कभी यह गज़ल भी आपको सुनाएँगे, आज एक अलग हीं गज़ल की बारी है। "द ग्रेट गज़ल्स: भुपिन्दर एंड मिताली" एलबम से ली गई इस गज़ल में प्यार-मोहब्बत की बड़ी हीं दिलचस्प बातें कहीं गई हैं,कहीं एक गुजारिश है तो कहीं फिर एक अपनापन। आप खुद देखिए और गज़ल में छुपी भावनाओं का लुत्फ़ उठाईये:

अपना कोई मिले तो गले से लगाईये,
क्या-क्या कहेंगे लोग उसे भूल जाईये।

पहले नज़र मिलाईये फिर दिल मिलाईये,
मिल जाए दिल से दिल तो गले से लगाईये।

दिल एक फूल है इसे खिलने भी दीजिये,
आए अगर हँसी तो ज़रा मुस्कुराईये।

सावन की रूत नहीं है तो आ जाएगी अभी,
बाहों में आके आप ज़रा झूल जाईये।

दमभर में पास दिल के चले आएँगे मगर,
खुद को भी ऐतबार के काबिल बनाईये।

हँसकर मिले कोई तो मिलो उससे टूटकर,
ऐसी घड़ी में दिल न किसी का दुखाईये।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

एक हमें ___ कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं,
दुनिया वाले दिलवालों को और बहुत कुछ कहते हैं...

आपके विकल्प हैं -
a) आशिक, b) परवाना, c) आवारा, d) बंजारा

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली पहेली का सही शब्द था -आँख. और शेर कुछ यूँ था -

कहकहा आँख का बरताव बदल देता है,
हंसने वाले तुझे आंसू नज़र आये कैसे...

शरद जी ने के बार फिर सही जवाब दिया सबसे पहले और जो शेर अर्ज किया वो कुछ यूं था -

कभी आँखों से अश्कों का खज़ाना कम नहीं होता
तभी तो हर खुशी, हर ग़म में हम उसको लुटाते हैं

रजिया राज जी महफ़िल में आई पर सही जवाब नहीं दे पायीं इस बार...कोई बात नहीं...पर सुमित जी इस बार नहीं चूके, एक शेर भी याद दिला गए -

अगर आँखे मेरी पुरनम नही है
तो तुम ये ना समझना गम नही है

आशीष जी ने न सिर्फ सही जवाब दिया बल्कि उपरोक्त शेर के ग़ज़लकार का नाम भी बता दिया. जी हाँ वसीम बरेलवी, और शुक्रिया जनाब उनके इन दो शेरों को हम सब के साथ बाँटने का, आप भी गौर फरमायें -

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगा
मेरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा

वाह जनाब समां बांध दिया आपने, पूजा जी आपने सही कहा, सलमा जी ने उन दिनों जैसे सब पर जादू सा कर दिया था. रचना जी भूल चूक मुआफ...आपका जवाब एकदम सही है और आपका शेर भी बहुत बढ़िया -

आँखों से बह के ख्वाब तेरी हथेली सजा गए
लिखा है गैर का नाम वहां चुपके से बता गए

तपन जी, निर्मला कपिला जी, और शामिख फ़राज़ जी आप सब का भी महफिल में आना अच्छा लगा, मनु जी नियमित रहते हैं पर इस बार नहीं दिखे, आचार्य सलिल जी भी काफी दिनों से नदारद हैं, नीलम जी और शन्नो जी की खट्टी मीठी नोंक झोंक भी बहुत दिनों से नहीं हुई, कहाँ हैं आप सब ? महफ़िल का हाजरी रजिस्टर आप सब की खोज में निकल चुका है. स्वप्न मंजूषा जी देखिये इस बार आप छूटते छूटते बची, आपने भी इस बेहद मशहूर शेर की याद दिला कर "ऑंखें" नम से कर दी-

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा,
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा...

जी हाँ दोस्तों वक़्त गुजरता है गुजर जायेगा, बस ऐसे ही कुछ पल याद रह जायेंगें, जो हमने और आपने प्यार से बाँटे हैं. ये प्यार यूहीं बना रहे इसी उम्मीद के साथ अगली महफिल तक के लिए इजाज़त.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

आ नीले गगन तले प्यार हम करें....प्रेम में मगन दो प्रेमियों के दिल की जुबाँ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 115

फ़िल्मकार अमीय चक्रवर्ती और संगीतकार शंकर जयकिशन का बहुत सारी फ़िल्मों में साथ रहा। यह सिलसिला शुरु हुई थी सन् १९५१ में फ़िल्म 'बादल' से। इसके बाद १९५२ में 'दाग़', १९५३ में 'पतिता' और १९५४ में 'बादशाह' जैसी सफल फ़िल्मों में यह सिलसिला जारी रहा। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इसी फ़िल्म 'बादशाह' का एक बेहद ख़ूबसूरत युगल गीत पेश है लता मंगेशकर और हेमन्त कुमार की आवाज़ों में। 'अनारकली' और 'नागिन' जैसी हिट फ़िल्मों के बाद हेमन्त दा की आवाज़ प्रदीप कुमार का 'स्क्रीन वायस' बन चुका था। इसलिए शंकर जयकिशन ने भी इन्ही से प्रदीप कुमार का पार्श्वगायन करवाया। प्रस्तुत गीत "आ नीले गगन तले प्यार हम करें, हिलमिल के प्यार का इक़रार हम करें" एक बेहद नर्मोनाज़ुक रुमानीयत से भरा नग़मा है जिसे सुनते हुए हम जैसे कहीं बह से जाते हैं। रात का सन्नाटा, खोया खोया सा चाँद, धीमी धीमी बहती बयार, नीले आसमान पर चमकते झिलमिलाते सितारे, ऐसे में दो दिल अपने प्यार का इज़हार कर रहे हैं एक दूसरे के बाहों के सहारे। रोमांटिक गीतों के जादूगर गीतकार हसरत जयपुरी ने इस गीत में कुछ ऐसे बोल लिखे हैं, कुछ ऐसा उनका अंदाज़-ए-बयाँ रहा है कि गीत को सुनकर आपके दिल में यक़ीनन एक अजीब सी, मीठी सी, मंद मंद सी हलचल पैदा हो जाती है, दिल जैसे किसी के प्यार में खो जाना चाहता है, डूब जाना चाहता है। फ़िल्म 'बादशाह' में दो बड़ी अभिनेत्रियाँ रहीं, एक उषा किरण और दूसरी माला सिंहा। इस गीत में प्रदीप कुमर और माला सिंहा की जोड़ी नज़र आयी।

शंकर जयकिशन ने इस गीत को राग भीमपलासी ताल दादरा में स्वरबद्ध किया था। अब अगर आप मुझसे यह पूछें कि भीमपलासी राग की क्या विशेषतायें हैं तो मैं बड़ी दुविधा में पड़ जाउँगा क्योंकि रागों की तक़नीकी विशेषज्ञता तो मुझे हासिल नहीं है। हाँ, इतना ज़रूर कर सकता हूँ कि आपको कुछ ऐसे गीत ज़रूर गिनवा सकता हूँ जो आधारित हैं इसी राग पर, ताक़ी इन गीतों को गुनगुनाते हुए आपको इस राग का कुछ आभास हो जाये। ये गानें हैं 'देख कबीरा रोया' फ़िल्म का "हमसे आया न गया, तुमसे बुलाया न गया", 'शर्मिली' फ़िल्म का "खिलते हैं गुल यहाँ, खिलके बिखरने को", 'अनुपमा' फ़िल्म का "कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं", 'चंद्रकांता' फ़िल्म का "मैने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी", 'ग़ज़ल' फ़िल्म का "नग़मा-ओ-शेर की सौग़ात किसे पेश करूँ", 'कोहरा' फ़िल्म का "ओ बेक़रार दिल", और भी न जाने कितने ऐसे हिट गीत हैं जो इस राग पर आधारित हैं। आज के दौर के भी कई गानें इस राग पर आधारित हैं जैसे कि फ़िल्म 'पुकार' में "क़िस्मत से तुम हमको मिले हो", 'दिल से' फ़िल्म में "ऐ अजनबी तु भी कभी आवाज़ दे कहीं से", और 'क्रीमिनल' फ़िल्म में "तुम मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिये"। तो दोस्तों, रागदारी की बातें बहुत हो गयी, अब आप गीत सुनने के लिये उतावले हो रहे होंगे, तो सुनिये।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. अभिनेत्री कूकू पर फिल्माया गया है ये गीत.
२. शमशाद बेगम की आवाज़.
३. तेजाब के हिट गीत की तरह इस गीत के बोल भी गिनती से शुरू होते हैं.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न मंजूषा जी आपके हुए ६ अंक और आपके ठीक पीछे हैं पराग जी ४ अंकों के साथ और बहुत आगे हैं अभी भी शरद जी १४ अंकों के साथ. राज जी बहुत बढ़िया जानकारी दी आपने. धन्यवाद.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

काला ना कोई हो गोरा...एक रंग सभी का रंग दे - सार्थक गीतों के पहरूवा पंकज अवस्थी

ताजा सुर ताल (५)

नए संगीत में आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं, एक ऐसा गीत जो ऑस्ट्रेलिया में घटी ताज़ी घटनाओं के चलते और भी सार्थक हो गया है. इस गीत को स्वरबद्ध और संगीतबद्ध किया है एक ऐसे फनकार ने जिन्हें मुद्दों से जुड़े गीतों को रचने में महारत है. उनके हर गीत का एक मकसद होता है, या कहें कि वो संगीत को एक माध्यम की तरह इस्तेमाल करते हैं अपनी बात को दुनिया तक पहुँचाने के लिए. जी हाँ हम बात कर रहे हैं उभरते हुए संगीतकार और गायक पंकज अवस्थी की. उनका संगीत सरल और शुद्ध होते हुए भी दिल को छूता है और सबसे बड़ी बात ये कि सुनने वालों को सोचने के लिए भी मजबूर करता है. हैरी बवेजा की फिल्म "करम" के शीर्षक गीत "तेरा ही करम..." से भारतीय श्रोताओं ने उन्हें परखा. "खुदा के वास्ते..." गीत और उसके विडियो से पंकज ने जाहिर कर दिया कि वो किस तरह के संगीत को अपना आधार मानते हैं. उनकी एल्बम "नाइन" में भी उनके सूफी अंदाज़ को बेहद सराहा गया. इस एल्बम ने उन्हें देश विदेश में ख्याति दी. हिट गीत "खुदा के वास्ते..." भी इस एल्बम का हिस्सा था, जिसे बाद में जर्मन संगीतकर्मी फ्रेडल लेनोनेक ने अपने एल्बम रिफ्लेक्शन भाग २ के पहले गीत का हिस्सा बनाया.

बॉलीवुड में उन्हें असल पहचान मिली फिल्म "अनवर" के संगीत निर्देशक के रूप में. पंकज एक अंतर्राष्ट्रीय संगीत गठबंधन "मिली भगत" के अहम् घटक भी हैं. प्रस्तुत गीत "ऐ साये मेरे" में भी पंकज अपने उसी चिर परिचित अंदाज़ में हैं. जुनैद वारसी ने बहुत बढ़िया लिखा है इस गीत को तो पंकज ने भी दिल से आवाज़ दी है उनके शब्दों में छुपी गंभीरता को. हिंद युग्म परिवार के वरिष्ठ सदस्य अवनीश गौतम, पंकज अवस्थी के बेहद करीबी मित्रों में हैं, जब अवनीश जी ने उन्हें इस गीत के लिए फ़ोन कर बधाई दी तो पंकज ने इस बात का खुलासा किया कि गीत का रिदम पक्ष मशहूर संगीतकार तौफीक कुरैशी ने संभाला है, यकीनन ये गीत की गुणवत्ता में चार चाँद लगा रहा है। चूँकि अवनीश जी की पंकज से घनिष्ठता रही है, इसलिए हमने उनसे पंकज से जुड़ी और भी बातें जाननी चाहीं। खुद अवनीश जी के शब्दों में:


"जब मैं पहली बार पंकज अवस्थी जी से मिला तो लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं. तब वो दिल्ली में रहते थे और "तेरा ही करम" तथा "खुदा का वास्ता" गा कर चर्चा में आ चुके थे उन दिनों पंकज कुछ प्रयोग धर्मी गाने बनाना चाहते थे और चाहते थे कि वो गाने मैं लिखूं. पंकज के भीतर जीवन और संगीत को ले कर एक गहरा अनुराग हैं और एक गहरी बेचैनी भी वो हमेशा कुछ अर्थपूर्ण करना चाहते हैं यह बात भी पंकज बहुत अच्छी तरह जानते है कि यह आसान नहीं है. उनका जूनून और उनका काम इस बात की गवाही देता है कि उनके काम में एक सच्ची आवाज़ बची हुई है जिस पर इस खतरनाक दौर में भी भरोसा किया जा सकता है."

चलिए अब "न्यू यार्क" पर वापस आते हैं। यश राज फिल्म के बैनर पर बनी फिल्म "न्यू यार्क" इस शहर में हुए ट्विन टावर हादसे को केंद्र में रख बुनी हुई कहानी है जिसमें जॉन अब्राहिम, नील नितिन मुकेश और कैटरिना कैफ ने अभिनय किया है. फिल्म के प्रोमोस देख कर आभास होता है कि फिल्म युवाओं को पसंद आ सकती है. यूं तो फिल्म के मुख्य संगीतकार प्रीतम हैं, पर पंकज का ये सोलो गीत ऐसा लगता है जैसे फिल्म के मूल थीम के साथ चलता हो, बहरहाल ये सब बातें फिल्म के प्रदर्शन के बाद ही पता लग पायेंगीं फिलहाल तो हमें सुनना है फिल्म "न्यू यार्क" का ये दमदार गीत, मगर उससे पहले डालिए जुनैद वारसी के बोलों पर एक नज़र-

आ आजा ऐ साये मेरे,
आ आजा कहीं और चलें,
हर सोच है एक बंद गली,
हर दिल में यहाँ ताले पड़े,

गर मुमकिन हो पाता मैं अपना नाम मिटा दूं,
बस बन जाऊं इंसान मैं हर पहचान मिटा दूं,
जब बरसे पहली बारिश, सब के घर बरसे,
बस पूछे ये इंसान कि अपना नाम घटा दूं...

माथे पे सभी के लिख दे
हाथों पे सभी के लिख दे
ज्यादा ना कोई कम हो,
एक नाम सभी का रख दे....

आ आजा साये मेरे....

इस एक ज़मीन के यार तू इतने टुकड़े ना कर,
जब हो सारे इंसान फर्क फिर उनमें ना कर,
जितना चाहे उन्स मोहब्बत अपनों से रख,
नफरत तो तू यार मगर यूं मुझसे ना कर..

शक्लों को सभी की रंग दे
जिस्मों को सभी के रंग दे,
काला ना हो कोई गोरा,
एक रंग सभी का रंग दे....

आ आजा ऐ साये मेरे...



क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. उपर हमने फिल्म "अनवर" में पंकज अवस्थी के संगीत की बात की है, एक और नए संगीतकार ने इसी फिल्म से अपनी शुरुआत कर धूम मचाई थी, क्या आप जानते हैं उस संगीतकार का नाम ?



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं.

Wednesday, June 17, 2009

आओ हुजूर तुमको सितारों में ले चलूँ....चलिए घूम आये हम और आप भी "आशा" के साथ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 114

१९६८ में कमल मेहरा की बनायी फ़िल्म आयी थी 'क़िस्मत'। मनमोहन देसाई निर्देशित फ़िल्म 'क़िस्मत' की क़िस्मत बुलंद थी। फ़िल्म तो कामयाब रही ही, फ़िल्म के गीतों ने भी खासी धूम मचाई । अपनी दूसरी फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म में भी ओ. पी. नय्यर ने यह सिद्ध किया कि ६० के दशक के अंत में भी वो नयी पीढ़ी के किसी भी लोकप्रिय संगीतकार को सीधी टक्कर दे सकते हैं। उन दिनों नय्यर साहब और रफ़ी साहब के रिश्ते में दरार आयी थी जिसके चलते इस फ़िल्म के गाने महेन्द्र कपूर से गवाये गये। घटना क्या घटी थी यह हम आपको बाद में किसी दिन बतायेंगे जब रफ़ी साहब और नय्यर साहब के किसी गाने की बारी आयेगी। तो साहब, महेन्द्र कपूर ने रफ़ी साहब की कमी को थोड़ा बहुत पूरा भी किया, हालाँकि नय्यर साहब महेन्द्र कपूर को बेसुरा कहकर बुलाते थे। इस फ़िल्म का वह हास्य गीत तो आपको याद है न "कजरा मोहब्बतवाला", जिसमें शमशाद बेग़म ने विश्वजीत का प्लेबैक किया था! फ़िल्म की नायिका बबिता के लिये गीत गाये आशा भोंसले ने। इस फ़िल्म में नय्यर साहब की सबसे ख़ास गायिका आशाजी ने कई अच्छे गीत गाये जिनमें से सबसे लोकप्रिय गीत आज हम इस महफ़िल के लिए चुन लाये हैं। तो चलिये हुज़ूर, देर किस बात की, आपको सितारों की सैर करवा लाते हैं आज!

"आयो हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूँ, दिल झूम जाये ऐसी बहारों में ले चलूँ", यह एक पार्टी गीत है, जिसे नायिका शराब के नशे मे गाती हैं। और आपको पता ही है कि इस तरह के हिचकियों वाले नशीले गीतों को आशाजी किस तरह का अंजाम देती हैं। तो साहब, यह गीत भी उनकी गायिकी और अदायिगी से अमरत्व को प्राप्त हो चुका है। इस गीत के बारे में लिखते हुए मुझे ख़याल आया कि आम तौर पर शराब के नशे में चूर होकर गीत नायक ही गाता है, लेकिन कुछ ऐसी फ़िल्में भी हैं जिनमें नायिका शराब पी कर महफ़िल में गाती हैं। दो गीत जो मुझे अभी के अभी याद आये हैं वो हैं लताजी के गाये हुए फ़िल्म 'ज़िद्दी' का "ये मेरी ज़िंदगी एक पागल हवा" और फ़िल्म 'आस पास' का "हम को भी ग़म ने मारा, तुमको भी ग़म ने मारा"। आप भी कुछ इस तरह के गीत सुझाइये न! ख़ैर, वापस आते हैं 'किस्मत' के इस गीत पर। इस गीत में बबिता का मेक-अप कुछ इस तरह का था कि वो कुछ हद तक करिश्मा कपूर की ९० के दशक के दिनों की तरह लग रहीं थीं। तो चलिये सुनते हैं यह गीत। अरे हाँ, एक ख़ास बात तो हमने बताई ही नहीं! इस फ़िल्म के सभी गीत एस. एच. बिहारी साहब ने लिखे थे सिवाय इस गीत के जिसे एक बहुत ही कमचर्चित गीतकार नूर देवासी ने लिखा था। दशकों बाद १९९४ में ओ.पी. नय्यर के संगीत से सजी एक फ़िल्म आयी थी 'ज़िद' जिसमें नूर देवासी साहब ने एक बार फिर उनके लिए गीत लिखे, जिसे मोहम्मद अज़ीज़ ने गाया था "दर्द-ए-दिल की क्या है दवा"। तो दोस्तों, सुनिये आशाजी की आवाज़ में "आयो हुज़ूर" और बिन पिये ही नशे में डूब जाइये।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. एक खूबसूरत युगल गीत.
२. लता मंगेशकर और हेमंत कुमार की आवाजें.
३. हसरत के लिखे इस गीत की शुरुआत इस शब्द से होती है -"आ..."

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न मंजूषा जी आप ४ अंकों के साथ पराग जी के बराबर आ गयी हैं, शरद जी अभी भी कोसों दूर है. शरद जी आपका सुझाव अपनी जगह बिल्कुल सही है, पर कुछ मजबूरियां हमारी भी है कोशिशें जारी है कोई समाधान निकालने की. बस थोडा सा सब्र रखिये :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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