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Saturday, September 17, 2016

"तुम जो आओ तो प्यार आ जाए...", कैसा कम्युनिकेशन गैप हुआ था गीतकार योगेश और संगीतकार रॉबिन बनर्जी के बीच?



एक गीत सौ कहानियाँ - 92
'तुम जो आओ तो प्यार आ जाए ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 92-वीं कड़ी में आज जानिए 1962 की फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ के मशहूर गीत "तुम जो आओ तो प्यार आ जाए..." के बारे में जिसे मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर ने गाया था। बोल योगेश के और संगीत रॉबिन बनर्जी का। 

गीतकार योगेश
खनऊ के रहने वाले योगेश गौड़, यानी कि गीतकार योगेश पिता की मृत्यु के बाद भाग्य आजमाने और काम की तलाश में चले आए बम्बई। प्रसिद्ध लेखक बृजेन्द्र गौड़ उनके रिश्तेदार थे, इस वजह से उनसे जाकर मिले। लेकिन बृजेन्द्र गौड़ से योगेश को कोई मदद नहीं मिली। अलबत्ता गौड़ साहब के असिस्टैण्ट ने ज़रूर लेखन की बारीकियाँ सीखने में उनकी मदद की। चीज़ें समझ आईं तो योगेश भी लिखने की कोशिशें करने लगे। उन्हें एक-आध फ़िल्मों में गाना लिखने का मौक़ा मिला। लेकिन ये वो फ़िल्में थीं जो कभी पूरी तरह से बन ही नहीं पाई। फिर एक दिन योगेश की मुलाक़ात हुई संगीतकार रॉबिन बनर्जी से। रॉबिन बनर्जी ने योगेश की रचनाएँ सुनी, बहुत प्रभावित हुए, और उन्होंने योगेश को रोज़ाना सुबह उनके घर रियाज़ करने के वक़्त आने को कहा। अब योगेश रोज़ाना रॉबिन बनर्जी के घर पहुँच जाते। बैठकें होती, और इन बैठकों में योगेश रॉबिन बनर्जी की धुनें सुनते और रॉबिन बनर्जी योगेश की कविताएँ और गीत सुनते। लेकिन यह सिलसिला कई दिनों तक चलने के बावजूद कुछ बात बन नहीं पा रही थी और बेचैनी थी कि बढ़ती ही जा रही थी। बेचैनी इसलिए कि अभी तक रॉबिन बनर्जी ने योगेश की उन रचनाओँ पर एक भी धुन नहीं बनाई थी जिन रचनाओं से रॉबिन बनर्जी प्रभावित हो गए थे। आख़िर एक रोज़ योगेश ने रॉबिन बनर्जी से पूछ ही डाला, "दादा, आप मेरे गीतों पर धुन कब बनाएँगे?" रॉबिन बनर्जी चौंक गए। उल्टा उन्होंने योगेश से ही सवाल दाग डाला, "अरे इतने दिनों से तुम यहाँ आ रहे हो, मैं रोज़ नई नई धुनें सुना रहा हूँ, और तुमने आज तक एक भी धुन पर गीत नहीं लिखा?" तब जाकर योगेश को समझ आई कि अमूमन फ़िल्म जगत में धुन पहले बनाई जाती है और उस धुन पर गीत या शब्द बाद में लिखे जाते हैं। दरसल रॉबिन बनर्जी ने योगेश को बुलाया ही इसलिए था कि वो कम्पोज़िशन सुनें और उसके हिसाब से बोल लिखे, गीत लिखे। और योगेश इस उम्मीद में बैठे रहे कि आज नहीं तो कल जो मैंने पहले से ही लिख रखा है, उसकी वो धुन बनाएँगे। यह था कम्युनिकेशन गैप। बहरहाल इसके बाद यह गैप गैप नहीं रहा, दोनों की ग़लतफ़हमी दूर हुई और रॉबिन बनर्जी द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ से योगेश का करीअर शुरु हुआ।



रॉबिन बनर्जी का शुमार कमचर्चित संगीतकारों में होता है। 50 के दशक के अन्त से लेकर 70 के दशक के मध्य तक वो सक्रीय थे फ़िल्म जगत में। लेकिन अधिकतर स्टण्ट फ़िल्मों में संगीत देने का ही उन्हें मौक़े मिले, जिस वजह से वो कभी भी पहली श्रेणी के संगीतकारों में शामिल नहीं हो सके। संगीत देने के साथ साथ वो एक अच्छे गायक भी रहे। उनके संगीत से सजी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं "तुम जो आओ तो प्यार आ जाए" (’सखी रॉबिन’, 1962), "देश का प्यारा सबका दुलारा" (’मासूम’, 1960, "दग़ाबाज़ क्यों तूने" (’वज़िर-ए-आज़म’, 1961), "आँखों आँखों में" ('Marvel Man', 1964) आदि। गायक के रूप में उनके कुछ परिचित गानें हैं "इधर तो आ" (’Tarzan And Kingkong' 1965), "ये नशा क्या हुआ है" (’फिर आया तूफ़ान’, 1973) और दो गीत 1964 की फ़िल्म ’हुकुम का इक्का’ के - "चोरी चोरी गली मोरी" और "किया है हुस्न को बदनाम"। उनके करीअर का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत वही है जो योगेश का लिखा पहला गीत है, यानी कि फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ का "तुम जो आओ तो प्यार आ जाए, ज़िन्दगी में बहार आ जाए"। इसे मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर ने गाया था। 60 के दशक में कम बजट की फ़िल्मों के निर्माताओं और संगीतकारों के लिए लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ें पाना ख़्वाब समान हुआ करता था। मन्ना डे की भी यह नाराज़गी रही कि बड़ी बजट की फ़िल्मों में उन्हें केवल शास्त्रीय राग आधारित गीत गाने के लिए ही बुलवाए जाते या फिर किसी बूढ़े किरदार पर फ़िल्माये जाने वाले गीत के लिए। लेकिन उन्हें कम बजट की फ़िल्मों में नायक पर फ़िल्माए जाने वाले बहुत से गीत मिले और यह गीत उन्हीं में से एक है। 

उधर गायिकाओं में सुमन कल्याणपुर को ’ग़रीबों की लता’ कहा जाता था। यह उल्लेखनीय तथ्य है कि रॉबिन
मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर
बनर्जी ने अपने करीअर में कभी भी लता से कोई गीत नहीं गवाया (या यह भी संभव है कि उन्हें मौक़ा नहीं मिला)। उनकी 95% गीत सुमन कल्याणपुर ने गाए। प्रस्तुत गीत मन्ना डे के दिल के बहुत करीब था, तभी तो विविध भारती के ’विशेष जयमाला’ कार्यक्रम में उन्होंने इसे चुना और गीत पेश करते हुए कहा - "अब एक ऐसे म्युज़िक डिरेक्टर मुझे याद आ रहे हैं जिन्होंने बहुत धिक फ़िल्मों में म्युज़िक तो नहीं दिया, लेकिन जो भी काम किया अच्छे ढंग से किया। इस म्युज़िक डिरेक्टर का नाम है रॉबिन बनर्जी। मैंने एक युगल गीत रॉबिन के निर्देशन में गाया था फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ के लिए। बहुत मधुर है यह गीत जिसे मेरे साथ सुमन कल्याणपुर जी ने गाया है। सुमन जी का भी जवाब नहीं है, बड़ी अच्छी गायिका हैं, बहुत समझ कर गाती हैं। इतनी अच्छी गायिका की आवाज़ में आजकल नए फ़िल्मों के गाने सुनाई नहीं देते।" मन्ना डे ने सुमन कल्याणपुर के साथ बहुत से युगल गीत गाए हैं। इसी साल अर्थात् 1962 में दत्ताराम के संगीत में इस जोड़ी ने गाया फ़िल्म ’नीली आँखें’ का गीत "ये नशीली हवा, छा रहा है नशा"। दत्ताराम के लिए पहली बार 1960 में मन्ना दा और सुमन जी ने फ़िल्म ’श्रीमान सत्यवादी’ में "भीगी हवाओं में, तेरी अदाओं में" गाया था। वैसे मन्ना-सुमन का गाया पहला डुएट 1958 की फ़िल्म ’अल-हिलाल’ में था "बिगड़ी है बात बना दे" और "तुम हो दिल के चोर"; संगीतकार थे बुलो सी. रानी। उसके बाद 1961 में ’ज़िन्दगी और ख़्वाब’ में इनका गाया "न जाने कहाँ तुम थे, न जाने कहाँ हम थे" बेहद लोकप्रिय हुआ था। यह भी दत्ताराम की ही रचना थी। मीना कुमारी पर फ़िल्माया यह गीत सुन कर बहुत से लोगों को यह धोखा भी हो गया कि यह लता मंगेशकर की आवाज़ है। 1961 में ही संगीतकार बाबुल ने भी इस जोड़ी से फ़िल्म ’रेशमी रूमाल’ में गवाया "आँख में शोख़ी, लब पे तबस्सुम"। और दत्ताराम ने फिर एक बार 1963 में इनसे गवाया फ़िल्म ’जब से तुम्हें देखा है’ में "ये दिन, दिन हैं ख़ुशी के, आजा रे आजा मेरे साथी ज़िन्दगी के"। 1962 में ’सखी रॉबिन’ के अलावा मन्ना-सुमन ने ’रॉकेट गर्ल’ फ़िल्म में भी एक गीत गाया था "आजा चले पिया चाँद वाले देस में", संगीत था चित्रगुप्त का। 1966 में ’अफ़साना’, 1971 में ’जाने अनजाने’, 1975 में ’दफ़ा 302' और 1978 में ’काला आदमी’ जैसी फ़िल्मों में भी मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर के गाये युगल गीत थे।

और अब इस गीत को सुनते हैं जो रंजन और शालिनी पर फ़िल्माया गया था।


अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Thursday, March 24, 2016

"रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा...", होली में आज सराबोर हो जाइए प्रेम-रंग में



कहकशाँ - 5
मन्ना डे, योगेश, श्याम सागर की एक रंगरेज़ रचना
"रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा..."




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है होली के इस ख़ास मौक़े पर मन्ना डे की आवाज़ में योगेश की एक रचना।




गर आपसे कहूँ कि हमारे आज के फ़नकार "श्री प्रबोध चंद्र जी" हैं तो लगभग १ या २ फीसदी लोग ही होंगे जो इन्हें जानने का दावा करेंगे या फिर उतने लोग भी न होंगे। लेकिन यह सच है। अरे-अरे डरिये मत.. मैं किसी अजनबी की बात नहीं कर रहा; जिनकी भी बात कर रहा हूँ उन्हें आप सब जानते हैं। जैसे श्री हरिहर ज़रिवाला को लोग संजीव कुमार कहते हैं, वैसे ही हमारे प्रबोध चंद्र जी यानि कि प्रबोध चंद्र डे को लोग उनके उपनाम मन्ना डे के नाम से बेहतर जानते हैं। मन्ना दा ने फिल्म-संगीत को कई कालजयी गीत दिए हैं। चाहे "चोरी-चोरी" का लता के साथ "आजा सनम मधुर चाँदनी में हम" हो या फिर "उपकार" का कल्याण जी-आनंद जी की धुनों पर "कसमें-वादे प्यार वफ़ा" हो या फिर सलिल चौधरी के संगीत से सजी "आनंद" फिल्म की "ज़िंदगी कैसी है पहेली" हो, मन्ना दा ने हर एक गाने में ही अपनी गलाकारी का अनूठा नमूना पेश किया है, उनके गाये शास्त्रीय-संगीत आधारित रचनाओं की तो बात ही छोड़ दीजिए!

चलिये अब आज के गाने की ओर रूख करते हैं। 2005 में रीलिज़ हुई "सावन की रिमझिम में" नाम के एक ऐल्बम में मन्ना दा के लाजवाब पंद्रह गीतों को संजोया गया था। यह गाना भी उसी ऐल्बम से है। वैसे मैंने यह पता करने की बहुत कोशिश की कि यह गाना मूलत: किस ग़ैर-फिल्मी ऐल्बम या ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड से है ,लेकिन मैं इसमें सफल नहीं हो पाया। तो आज हम जिस गाने की बात कर रहे हैं उसे लिखा है योगेश ने और अपने सुरों से सजाया है श्याम सागर ने और वह गाना है: "ओ रंगरेजवा रंग दे ऐसी चुनरिया"। वैसे इस ऐल्बम में इस तिकड़ी के एक और गाने को स्थान दिया गया था- "कुछ ऐसे भी पल होते हैं..." । संयोग देखिए कि जिस तरह हिन्दी फिल्मों में मन्ना दा की प्रतिभा की सही कद्र नहीं हुई उसी तरह कुछ एक संगीतकारों को छोड़ दें तो बाकी संगीतकारों ने योगेश क्या हैं, यह नहीं समझा। भला कौन "जिंदगी कैसी है पहेली" या फिर "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" में छिपी भावनाओं के सम्मोहन से बाहर आ सकता है भला!

लोग माने या ना मानें लेकिन इस गाने और मन्ना दा के एक और गाने "लागा चुनरी में दाग" में गहरा साम्य है। साहिर का वह गाना या फिर योगेश का यह गाना निर्गुण की श्रेणी में आता है, जैसा कबीर लिखा करते थे, जैसे सूफियों के कलाम होते हैं। प्रेमिका जब ख़ुदा या ईश्वर में तब्दील हो जाए या फिर जब ख़ुदा या ईश्वर में आपको अपना पिया/अपनी प्रिया दिखने लगे, तब ही ऐसे नज़्म सीने से निकलते हैं। मेरे मुताबिक इस गाने में भी वैसी ही कुछ बातें कही गई हैं। और सच कहूँ तो कई बार सुनकर भी मैं इस गाने में छुपे गहरे भावों को पूरी तरह नहीं समझ पाया हूँ। राधा का नाम लेकर योगेश अगर सांसारिक प्रेम की बातें कर रहे हैं तो फिर मीरा या कबीर का नाम लेकर वो दिव्य/स्वर्गीय प्रेम की ओर इशारा भी कर रहे हैं। वैसे प्रेम सांसारिक हो या फिर दिव्य, प्रेम तो प्रेम है और प्रेम से बड़ा अनुभव कुछ भी नहीं।

हुलस हुलस हरसे हिया, हुलक हुलक हद खोए,
उमड़ घुमड़ बरसे पिया, सुघड़ सुघड़ मन होए।

दर-असल प्रेम वह कोहिनूर है, जिसके सामने सारे नूर फीके हैं। प्रेम के बारे में कुछ कहने से अच्छा है कि हम ख़ुद ही प्रेम के रंग में रंग जाएँ। तो चलिए आप भी हमारे साथ रंगरेज के पास और गुहार लगाइये कि:

ओ रंगरेजवा रंग दे ऐसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा....

पग-पग पर लाखों ही ठग थे तन रंगने की धुन में,
सबसे सब दिन बच निकला मन पर बच ना सका फागुन में।
तो... जग में ये तन ये मेरा मन रह ना सका बैरागी,
कोरी-कोरी चुनरी मोरी हो गई हाय रे दागी।
अब जिया धड़के, अब जिया भड़के
इस चुनरी पे सबकी नजरिया गड़े,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....

रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा,
उसी रंग में सब रंग डूबे कह गए दास कबीरा।
तो... नीले पीले लाल सब्ज रंग तू ना मुझे दीखला रे,
मैं समझा दूँ भेद तुझे ये , तू ना मुझे समझा रे।
प्रेम है रंग वो, प्रेम है रंग वो,
चढ़ जाए तो रंग ना दूजा चढ़े,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऐसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....








’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’ 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, April 14, 2011

चलो हसीन गीत एक बनायें.....सुनिए कैसे 'शौक़ीन' दादामुनि अशोक कुमार ने स्वर दिया इस मजेदार गीत को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 635/2010/335

सितारों की सरगम', 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला में इन दिनों आप सुन रहे हैं फ़िल्म अभिनेता-अभिनेत्रियों द्वारा गाये गये फ़िल्मी गीत। राज कपूर, दिलीप कुमार, मीना कुमारी और नूतन के बाद आज बारी हम सब के चहेते अभिनेता दादामुनि अशोक कुमार की। दोस्तों, आपको शायद याद होगा कि इस शृंखला की पहली कड़ी में हमनें यह कहा था कि इस शंखला में हम 'सिंगिंग् स्टार्स' को शामिल नहीं कर रहे हैं। इसलिए दादामुनि का नाम सुन कर शायद आप यह सवाल करें कि दादामुनि तो फ़िल्मों के पहले दशक में अभिनय के साथ साथ गायन भी किया करते थे, तो फिर उनका नाम कैसे इस शृंखला में शामिल हो रहा है? दरअसल बात ऐसी है दोस्तों कि भले ही अशोक कुमार नें उस दौर में अपने पर फ़िल्माये गानें ख़ुद ही गाया करते थे, लेकिन उनका नाम 'सिंगिंग् स्टार्स' की श्रेणी में दर्ज करवाना शायद सही नहीं होगा। दादामुनि की ही तरह उस दौर में बहुत से ऐसे अभिनेता थे जिन्हें प्लेबैक की तकनीक के न होने की वजह से अपने गानें ख़ुद ही गाने पड़ते थे, जिनमें मोतीलाल, पहाड़ी सान्याल जैसे नाम उल्लेखनीय है। यानी कि गायन उस ज़माने के अभिनेताओं की मजबूरी थी। और फिर दादामुनि नें स्वयं ही इस बात को स्वीकारा था विविध भारती के एक इंटरव्यु में, जिसमें उन्होंने कहा था, "जब मैं फ़िल्मों में आया था सन् १९३४-३५ के आसपास, उस समय गायक-अभिनेता सहगल ज़िंदा थे। उन्होंने फ़िल्मी गानों को एक शक्ल दी और मेरा ख़याल है उन्हीं की वजह से फ़िल्मों में गानों को एक महत्वपूर्ण जगह मिली। आज उन्हीं की बुनियाद पर यहाँ की फ़िल्में बनाई जाती हैं, यानि बॊक्स ऒफ़िस सक्सेस के लिए गानों को सब से ऊँची जगह दी जाती है। मेरे वक़्त में प्लेबैक के तकनीक की तैयारियां हो रही थी। तलत, रफ़ी, मुकेश फ़िल्मी दुनिया में आये नहीं थे, लता तो पैदा भी नहीं हुई होगी। अभिनेताओं को गाना पड़ता था चाहे उनके गले में सुर हो या नहीं। इसलिए ज़्यादातर गानें सीधे सीधे और सरल बंदिश में बनाये जाते थे ताकि हम जैसे गाने वाले आसानी से गा सके। मेरा अपना गाया हुआ एक गाना था "पीर पीर क्या करता रे तेरी पीर न जाने कोई"। मुझे याद है इस गाने को रेकॊर्ड में भरना मुश्किल पड़ गया था क्योंकि यह गाना था आधे मिनट का और इस आधे मिनट को तीन मिनट का बनाने के मुझे धीरे धीरे गाना पड़ा था। और उस रेकॊर्ड को सुन कर मैं रो दिया था। उसी वक़्त मैंने तय कर लिया था कि अगर मुझे फ़िल्मों में रहना है तो गाना सीखना ही पड़ेगा। मैं आठ महीनों तक राग यमन सीखता रहा।" दोस्तों, पार्श्वगायन की प्रथा लोकप्रिय होने के बाद अशोक कुमार को फ़िल्मों में गाने की ज़रूरत नहीं पड़ी और उनके गीत रफ़ी, मन्ना डे जैसे गायकों नें गाये, और वो एक अभिनेता के रूप में ही मशहूर हुए, न कि 'गायक-अभिनेता' के रूप में। इसलिए 'सितारों की सरगम' शृंखला में दादामुनि अशोक कुमार को शामिल करने में कोई वादा-ख़िलाफ़ी नहीं होगी।

आज की कड़ी के लिए अशोक कुमार के गाये गीतों में कौन सा गीत सुनवायें? जी नहीं, हम ३० के दशक का कोई गीत नहीं सुनवायेंगे। इसके चार दशक बाद दादामुनि की एक बेहद चर्चित फ़िल्म आयी थी 'आशीर्वाद', जिसमें उनका मुख्य चरित्र था फ़िल्म में। एक मानसिक रोगी की भूमिका में बच्चों के लिए उनके गाये "रेल गाड़ी" और "नानी की नाव चली" गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। लेकिन ये दोनों ही गीतों में गीत की विशेषता कम और नर्सरी राइम की महक ज़्यादा थी। कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में दादामुनि नें फ़िल्म 'कंगन' में एक गीत गाया था "प्रभुजी मेरे अवगुण चित ना धरो"। साल १९८२ में बासु चटर्जी की एक हास्य फ़िल्म आयी थी 'शौकीन', जिसके मुख्य चरित्रों में थे तीन वृद्ध, जिन्हें पर्दे पर साकार किया था हिंदी सिनेमा के तीन स्तंभ अभिनेता - ए. के. हंगल, उत्पल दत्त और दादामुनि अशोक कुमार नें। साथ में थे मिथुन चक्रवर्ती और रति अग्निहोत्री। इस फ़िल्म में दादामुनि की आवाज़ में एक बड़ा ही अनूठा गीत था जिसे उन्होंने गायिका चिरश्री भट्टाचार्य के साथ मिल कर गाया था। राहुल देव बर्मन का संगीत था और गीतकार थे योगेश। मारुति राव और मनोहारी सिंह संगीत सहायक के रूप में काम किया था इस फ़िल्म में। हाँ तो दादामुनि और चिरश्री की युगल आवाज़ों में यह गीत था "चलो हसीन गीत एक बनाये, वह गीत फिर बनाके गुनगुनायें, ख़यालों को चलो ज़रा सजायें, नशे में क्यों न झूम झूम जायें"। फ़िल्मांकन में दादामुनि और रति अग्निहोत्री पियानो पे बैठ कर एक गीत बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बड़ा ही गुदगुदाने वाला गीत है और दादामुनि का अंदाज़-ए-बयाँ भी क्या ख़ूब है। ३० के दशक में जो यमन उन्होंने सीखा था, शायद उसी का नतीजा था कि इस उम्र में भी उन्होंने इस गीत को इतने अच्छे तरीके से निभाया। और गीत तो गीत, वो इसके फ़िल्मांकन में रति को नृत्य भी सिखाते हुए नज़र आते हैं। लाल कोट पहनें दादामुनि पर फ़िल्माया यह गीत निस्संदेह एक अनोखा गीत है और यही गीत है आज के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कड़ी की शान। दादामुनि के अभिनय के साथ साथ उनकी गायन प्रतिभा को भी सलाम करते हुए आइए सुनें 'सितारों की सरगम' लघु शृंखला की पाँचवीं कड़ी का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि दादामुनि अशोक कुमार का असली नाम था कुमुद लाल गंगोपाध्याय। फ़िल्मों के पहले दौर में उनके अभिनय व गायन से सजी कुछ महत्वपूर्ण फ़िल्मों के नाम हैं - जीवन नैया, अछूत कन्या, झूला, बंधन, कंगन, किस्मत।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 6/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान है, चलिए आज इसी अभिनेता के बारे में कुछ सवाल हो जाए

सवाल १ - ये अपनी धरम पत्नी की पहली में फिल्म में हीरो चुने जाने वाले थे, पर नहीं चुने गए, किस एक्टर की झोली में गया ये रोल - ३ अंक
सवाल २ - किस अभिनेता के साथ दो बार काम करते हुए इन्हें फिल्म फेयर सह अभिनेता का पुरस्कार मिला - 2 अंक
सवाल ३ - इस कलाकार ने सबसे पहली बार किस फिल्म में पार्श्वगायन किया था और वो गीत कौन सा था - 2 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह कल तो अमित जी बाज़ी मार गए, वैसे आधे पड़ाव तक अभी भी अनजाना जी खासी बढ़त बनाये हुए हैं, पर इस बार प्रतीक जी भी अच्छा मुकाबला पेश कर रहे हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, May 19, 2010

भारतीय और पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत, दोनों में ही माहिर थे सलिल दा

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २९

'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में आज प्रस्तुत है गीतकार योगेश का लिखा, सलिल चौधरी का संगीतबद्ध किया हुआ फ़िल्म 'छोटी सी बात' का शीर्षक गीत। इस गीत को आप '१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में सुन चुके हैं। गीतकार योगेश द्वारा प्रस्तुत 'जयमाला' कार्यक्रम का एक अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं - "मेरे पिताजी की मृत्यु के बाद मुझे लखनऊ छोड़ना पड़ा। हमारे एक आत्मीय संबंधी बम्बई में फ़िल्म लाइन में थे, सोचा कि कहीं ना कहीं लगा देंगे, पर ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। बल्कि मेरा एक दोस्त जो मेरे साथ क्लास-५ से साथ में है, वह मेरे साथ बम्बई आ गया। उसी ने मुझसे कहा कि तुम्हे फ़िल्म-लाइन में ही जाना है। यहाँ आकर पहले ३ सालों तक तो भटकते रहे। ३ सालों तक कई संगीतकारों से 'कल आइए परसों आइए' ही सुनता रहा। ऐसे करते करते एक दिन रोबिन बनर्जी ने मुझे बुलाया और कहा कि एक लो बजट फ़िल्म है, जिसके लिए मैं गानें बना रहा हूँ। एक साल तक हम गानें बनाते रहे और गानें स्टॊक होते गए। तो जब 'सखी रॊबिन' फ़िल्म के लिए निर्माता ने गानें मँगवाए, एक ही दिन में ६ गानें उन्हे पसंद आ गए क्योंकि गानें हमारे पास स्टॊक में ही थे, और हर गाने के लिए २५ रुपय मिले।" तो इस तरह से शुरु हुई थी योगेश जी की फ़िल्मी यात्रा। आज के प्रस्तुत गीत के संगीत के बारे में यही कह सकते हैं कि सलिल दा ने इस तरह का वेस्टर्ण रीदम कई गीतों में इस्तेमाल किया है, एक तरफ़ गीत के बोल भारतीय शास्त्रीय संगीत के आधार पर खड़े हैं, लेकिन जो रीदम है, या ऒर्केस्ट्रेशन है उसमें लाइट वेस्टर्ण म्युज़िक सुनाई देती है। भारतीय और पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत, दोनों में ही माहिर थे सलिल दा।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -न जाने क्यों...
कवर गायन -रश्मि नायर




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रश्मि नायर
इन्टरनेट पर बेहद सक्रिय और चर्चित रश्मि मूलत केरल से ताल्लुक रखती हैं पर मुंबई में जन्मी, चेन्नई में पढ़ी, पुणे से कॉलेज करने वाली रश्मि इन दिनों अमेरिका में निवास कर रही हैं और हर तरह के संगीत में रूचि रखती हैं, पर पुराने फ़िल्मी गीतों से विशेष लगाव है. संगीत के अलावा इन्हें छायाकारी, घूमने फिरने और फिल्मों का भी शौक है


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Saturday, March 13, 2010

न जाने क्यों होता है ये जिंदगी के साथ...कि कुछ गीत कभी दिलो-जेहन से उतरते ही नहीं

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 372/2010/72

लीग से हट के फ़िल्मों की बात करें तो ऐसी फ़िल्मों में बासु चटर्जी का योगदान उल्लेखनीय रहा है। मध्यम वर्गीय परिवारों की छोटी छोटी ख़ुशियों, तक़लीफ़ों और उनकी ज़िंदगियों को असरदार तरीके से प्रस्तुत करने में बासु चटर्जी और ऋषिकेश मुखर्जी का अच्छा ख़ासा नाम रहा है। आज हम '१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में जिस फ़िल्म क गीत सुनेंगे, उसे बी. आर. चोपड़ा ने बनायी थी और बासु दा का निर्देशन था। यह फ़िल्म थी १९७५ की 'छोटी सी बात'। याद है ना आपको अमोल पालेकर की वो भोली अदाएँ, और साथ में विद्या सिंहा और अशोक कुमार। क्या कहा, याद नहीं? चलिए हम आपको इस फ़िल्म की थोड़ी भूमिका बता देते हैं। अरुण (अमोल पालेकर) एक शर्मीला क़िस्म का लड़का, जो बम्बई में अकाउंटैण्ट का काम करता है, प्रभा (विद्या सिंहा) नाम की लड़की से इश्क़ लड़ाने के सपने देखा करता है। लेकिन वह कभी प्रभा से अपनी दिल की बात नहीं कह पाता। उधर नागेश (असरानी) अरुण को उकसाता है कि वह 'रोमांस स्पेशियलिस्ट' जुलियस नागेन्द्रनाथ (अशोक कुमार) से प्रेम शास्त्र की तालीम ले प्रभा को हासिल करने के लिए। इस तरह से हास्यप्रद मोड़ों से गुज़रती हुई कहानी आगे बढ़ती है। इस तरह के भोले भाले हास्य किरदर अमोल पालेकर बख़ूबी निभाते थे। 'गोलमाल' एक और ऐसी फ़िल्म थी। ख़ैर, आज तो 'छोटी सी बात' की बारी है। तो आइए आज इस फ़िल्म से सुना जाए लता मंगेशकर की आवाज़ में फ़िल्म का शीर्षक गीत, "न जाने क्यो होता है यह ज़िंदगी के साथ, अचानक यह मन किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद छोटी छोटी सी बात"। हमें उम्मीद ही नहीं, पूरा यक़ीन है कि आपको भी यह गीत उतना ही पसंद होगा जितना कि मुझे और सजीव जी को है। सलिल चौधरी का संगीत और योगेश की गीत रचना। दोस्तों, फ़िल्म 'आनंद' का गीत सुनवाते हुए हमने यह ज़िक्र किया था कि योगेश ऐसे गीतकार रहे हैं जिन्होने अपने गीतों में शुद्ध हिंदी भाषा का बहुत ही सुंदरता से प्रयोग किया, जो सुनने में अत्यंत कर्णप्रिय बन पड़े। और आज का गीत भी उन्ही में से एक है। युं तो योगेश जी ने कई संगीतकारों के साथ काम किया पर सब से ज़्यादा काम उन्होने संगीतकार सलिल चौधरी के साथ किया, और ऐसा किया कि हर गीत अमर हो गया।

दोस्तों, बात जब योगेश साहब की छिड़ ही चुकी है तो क्यों ना उन्ही के बारे में कुछ और बातें की जाए। विविध भारती के एक मुलाक़ात में योगेश जी ने अपने जीवन का हाल सुनाया था, तो चलिए उन्ही की ज़ुबानी जान लें उनके शुरुआती दिनों का हाल। "मेरे पिताजी की मृत्यु के बाद मुझे लखनऊ छोड़ना पड़ा। हमारे एक आत्मीय संबम्धी बम्बई में फ़िल्म लाइन में थे, सोचा कि कहीं ना कहीं लगा देंगे, पर ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। बल्कि मेरा एक दोस्त जो मेरे साथ क्लास-५ से साथ में है, वह मेरे साथ बम्बई आ गया। उसी ने मुझसे कहा कि तुम्हे फ़िल्म-लाइन में ही जाना है। यहाँ आकर पहले ३ सालों तक तो भटकते रहे। ३ सालों तक कई संगीतकारों से 'कल आइए परसों आइए' ही सुनता रहा। ऐसे करते करते एक दिन रोबिन बनर्जी ने मुझे बुलाया और कहा कि एक लो बजट फ़िल्म है, जिसके लिए मैं गानें बना रहा हूँ। एक साल तक हम गानें बनाते रहे और गानें स्टॊक होते गए। तो जब 'सखी रॊबिन' फ़िल्म के लिए निर्माता ने गानें मँगवाए, एक ही दिन में ६ गानें उन्हे पसंद आ गए क्योंकि गानें हमारे पास स्टॊक में ही थे, और हर गाने के लिए २५ रुपय मिले।" तो इस तरह से शुरु हुई थी योगेश जी की फ़िल्मी यात्रा। आज के प्रस्तुत गीत के संगीत के बारे में यही कह सकते हैं कि सलिल दा ने इस तरह का वेस्टर्ण रीदम कई गीतों में इस्तेमाल किया है, एक तरफ़ गीत के बोल भारतीय शास्त्रीय संगीत के आधार पर खड़े हैं, लेकिन जो रीदम है, या ऒर्केस्ट्रेशन है उसमें लाइट वेस्टर्ण म्युज़िक सुनाई देता है। भारतीय और पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत, दोनों में ही माहिर थे सलिल दा। तो दोस्तों, आइए अब गीत का आनंद उठाया जाए योगेश जी कहे इन शब्दों के साथ कि "मेरे गीत गाते रहना, मेरे गीत गुनगुनाते रहना, मैं अगर भूल भी जाऊँ गीतों का सफ़र, तुम मुझे याद दिलाते रहना"!



क्या आप जानते हैं...
कि श्याम सागर के संगीत निर्देशन में मन्ना डे के ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम 'मयूरपंखी सपने' में योगेश ने दो गीत लिखे थे। श्याम सागर द्वारा स्वरबद्ध सुमन कल्याणपुर की ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम 'स्वर बहार' के लिए योगेश ने ३ गीत लिखे थे।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखडा शुरू होता है इस शब्द से -"तुम्हें", गीत पहचानें -३ अंक.
2. गुलज़ार साहब का ही लिखा हुआ है ये गीत भी, गायिका का नाम बताएं- २ अंक.
3. संगीतकार कौन हैं -२ अंक.
4. जरीना वहाब पर फिल्माए इस गीत की फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी ३ अंक मिले आपको, इंदु जी और अवध जी जवाब लेकर आये, चौथा जवाब सुबह ९.३० तक नहीं मिला मुझे क्यों ?
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, October 13, 2009

आये तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन...जब याद आये किशोर और अशोक एक साथ तो क्यों न ऐसा हो

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 231

ज है १३ अक्तुबर का दिन। फ़िल्म जगत के लिए आज का दिन बड़ा मायने रखता है, क्योंकि आज का दिन एक नहीं बल्कि दो ऐसे कलाकारों को याद करने का दिन है जिन्होने इस फ़िल्म जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। ये दो लेजेंडरी फ़नकार अपने अपने क्षेत्र के महारथी तो थे ही, वे एक दूसरे के सगे भाई भी थे। इनमें से एक का आज जन्मदिन है और दूसरे की पुण्यतिथि। कितनी अजीब बात है कि दादामुनि अशोक कुमार का जन्मदिन और किशोर कुमार की पुण्यतिथि एक ही है, १३ अक्तुबर। १३ अक्तुबर १९११ को अशोक कुमार का जन्म हुआ था और १३ अक्तुबर १९८७ को किशोर दा हमें छोड़ गए थे हमेशा के लिए। जी हाँ, १३ अक्तुबर १९८७। अपने बड़े भाई के जन्मदिन पर अनूप कुमार के साथ मिलकर किशोर दा उन्हे एक सरप्राइज़ देना चाहते थे, जिसके लिए वे शाम को ५:३० बजे मिलने वाले थे। पर यह हो ना सका और समय ने ही सारी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। नियति अपने दस्तावेज़ पर किशोर का नाम लिख कर चला गया, और वो मदहोश करने वाली आवाज़ हमेशा के लिए ख़ामोश हो गयी, और तब से लेकर आज तक वो आवाज़ बसी हुई है हमारी यादों में, हमारे दिलों में, हमारी ज़िंदगियों में। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम दादामुनि और किशोर दा को एक साथ याद कर रहे हैं एक ऐसे फ़िल्म के ज़रिए जिसमें इन दोनों ने अपने अपने क्षेत्र का लोहा मनवाया है। फ़िल्म 'मिली' का यह गीत है "आए तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन, ख़ुशबू लाई पवन, महका चंदन"। सचिन देव बर्मन का संगीत है और गीत रचना है योगेश की।

फ़िल्म 'मिली' की कहानी कुछ इस तरह की थी कि मिली (जया बच्चन) एक बहुत ही हँसमुख और ज़िंदादिल लड़की है, जो अपने पिता (अशोक कुमार) के साथ एक हाउसिंग् कॊम्प्लेक्स में रहती है। उसे उस कॊम्प्लेक्स के बच्चों से बहुत लगाव है और वो उन्ही के दल में भिड़ कर दिन भर सारी शैतानियाँ करती रहती हैं। याद है ना लता जी का गाया "मैने कहा फूलों से" गीत? तो साहब, ऐसे में उस बिल्डिंग में आ बसते हैं हमारे अमिताभ बच्चन साहब (किरदार का नाम मुझे याद नहीं), जो एक निहायती गम्भीर, बद-मिज़ाज नौजवान है जिसके चेहरे पर शायद ही कभी मुस्कुराहट आयी हो! किस तरह से मिली उसका दिल जीत लेती है, और उसके दिल पर क्या असर होता है जब उसे पता चलता है कि मिली को कैन्सर है, यही है इस फ़िल्म की कहानी। कहानी के अंत में मिली को अपने पिता के साथ चिकित्सा के लिए अमेरिका जाते हुए दिखाया जाता है, और वहीं पर फ़िल्म समाप्त हो जाती है। एक पिता को जब पता चलता है कि उसकी एकलौती बेटी को कैन्सर है, तो उन पर क्या बीतता है, दादामुनि के सशक्त अभिनय प्रतिभा ने उस किरदार में जान डाल दी है। नैचरल ऐक्टिंग् की जब बात आती है, तो दादामुनि का नाम शुरुआती नामों में ही लिया जाता है। और इस फ़िल्म में गुरुगम्भीर अमिताभ बच्चन के चरित्र के अनुसार किशोर दा ने दो गीत ऐसे गाए हैं कि बस पूछिए मत। अपने हास्य गीतों और मैनरिज़्म्स से गुदगुदानेवाले किशोर दा जब भी ऐसे संजीदे गीत गाते थे तब उनका रूप ही बिल्कुल बदल जाता था। यकीन ही नहीं होता कि ये दोनों रूप एक ही इंसान के हैं। आज के इस प्रस्तुत गीत के अलावा किशोर दा का गाया "बड़ी सूनी सूनी है ज़िंदगी" ना केवल इस फ़िल्म के चरित्र को जीवंत करता है, बल्कि किशोर दा के निजी ज़िंदगी में भी जो सूनापन उन्होने हमेशा महसूस किया है (उनकी माँ की मृत्यु के बाद से), उसका दर्द भी उनकी आवाज़ में उभर आई है। आज १३ अक्तुबर २००९, किशोर दा के गए २२ साल हो गए हैं, लेकिन उनके गाए गानों में आज भी वही ताज़गी बरककार है, और हमेशा ही किशोर दा सदाबहार रहेंगे। दादामुनि और किशोर दा के लिए चलते चलते हम बस यही कहेंगे कि "आए तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन, ख़ुशबू लाई पवन, महका चंदन"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. खुद संगीतकार की आवाज़ है इस गीत में.
२. हालाँकि गीतकार के रूप में प्रेम धवन का नाम दर्ज है पर असल में गीत को लिखा है खुद संगीतकार ने.
३. मुखड़े में शब्द है- "खेल".

पिछली पहेली का परिणाम -

हमारी पिछली पहेली के विजेता आज के गीत का शीर्षक देख कर कुछ हैरान परेशान हो गए होंगें, दरअसल कल जिस गीत के बाबत हमने पहेली पूछी थी वो गीत हम जल्द ही आपको सुन्वायेंगें, चूँकि आज के दिन की महत्ता को ध्यान में रख कर हमें आखिर लम्हों में निर्धारित गीत को इस गीत से बदलना पड़ा, रोहित जी आप बेफिक्र रहें आपके २ अंक सुरक्षित हैं. आपका जवाब "ये दिल है मुश्किल जीना यहाँ" एकदम सही है, ये गीत २२ अक्तूबर को प्रसारित होगा, और २१ अक्तूबर की पहेली में आपके लिए कुछ विशेष होगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, July 4, 2009

कहीं दूर जब जब दिन ढल जाए....ऐसे मधुर गीत होठों पे आये....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 131

ल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप ने १९६१ में बनी फ़िल्म 'प्यासे पंछी' का गीत सुना था। आइये आज एक लम्बी छलांग लगा कर १० साल आगे को निकल आते हैं। यानी कि सन् १९७१ में। दोस्तों, यही वह साल था जिसमें बनी थी ऋषिकेश मुखर्जी की कालजयी फ़िल्म 'आनंद'। इस फ़िल्म ने लोगों के दिलों पर कुछ इस क़दर छाप छोड़ी है कि आज लगभग ४ दशक बाद भी जब यह फ़िल्म टी.वी. पर आती है तो लोग उसे बड़े प्यार और भावुकता से देखते हैं। 'आनंद' कहानी है आनंद सहगल (राजेश खन्ना) की, जो एक कैंसर का मरीज़ हैं, और यह जानते हुए भी कि वह यहाँ पर चंद रोज़ का ही मेहमान है, न केवल अपनी बची हुई ज़िंदगी को पूरे जोश और आनंद से जीता है बल्कि दूसरों को भी उतना ही आनंद प्रदान करता है। ठीक विपरीत स्वभाव के हैं भास्कर बैनर्जी (अमिताभ बच्चन), जो उनके डौक्टर हैं, जो देश की दुरवस्था को देख कर हमेशा नाराज़ रहते हैं। आनंद से रोज़ रोज़ की मुलाक़ातें और नोंक-झोंक डा. भास्कर को ज़िंदगी के दुख तक़लीफ़ों के पीछे छुपी हुई ख़ुशियों के रंगों से अवगत कराती है। अपनी चारों तरफ़ ढेर सारी ख़ुशियाँ बिखेर कर, अपने आस पास के कई ज़िंदगियों को आबाद कर, आनंद इस दुनिया को छोड़ जाता है, जो डा. भास्कर को उस पर एक क़िताब लिखने की प्रेरणा देता है। 'आनंद' की मूल कहानी को लिखा था ख़ुद ऋषिकेश मुखर्जी ने, और फ़िल्म के लिये विस्तृत लेखन का काम किया था बिमल दत्त, डी. एन. मुखर्जी, बीरेन त्रिपाठी और गुलज़ार ने। फ़िल्म का निर्माण एन. सी. सिप्पी और ऋषि दा ने मिलकर किया था। फ़िल्म के संगीतकार थे सलिल दा, यानी कि सलिल चौधरी। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि इसमें ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं थी। ज़बरदस्ती अगर गानें डाले जाते तो वह फ़िल्म के हित में नहीं होते। इसलिए ऋषि दा ने फ़िल्म में केवल चार गानें रखे, और उल्लेखनीय बात यह है कि इन चारों गीतों ने अपार लोकप्रियता हासिल की। ये चारों गानें ऐसे हैं कि इन्हे लोकप्रियता या गुणवत्ता की दृष्टि से क्रम नहीं दिया जा सकता। तो जनाब, आज के लिए हमें इस फ़िल्म का एक गीत चुनना था, तो हम ने चुना, उम्मीद है आप भी शायद इसी गीत को सुनना चाह रहे होंगे।

"कहीं दूर जब दिन ढल जाये, चाँद सी दुल्हन बदन चुराये चुपके से आये"। मुकेश की आवाज़ में यह गीत लिखा था गीतकार योगेश ने। शुद्ध हिंदी में गीत लिखने में माहिर गीतकारों की बात करें तो जो परम्परा कवि प्रदीप, पं. नरेन्द्र शर्मा, जी. एस. नेपाली और भरत व्यास जैसे गीतकारों ने शुरु की थी, आगे चलकर योगेश ने भी वही राह अपनाई। वैसे 'आनंद' फ़िल्म के जो दो गीत उन्होने लिखे (दूसरा गीत था "ना जिया लागे ना"), उनमें शुद्ध हिंदी का क्यों प्रयोग हुआ, वह बात योगेश जी ने विविध भारती के एक पुराने कार्यक्रम में कहा था, उन्ही के शब्दों में पढ़िये - "सलिल दा के जो काम्पोसिशन्स होते थे, उनमें उर्दू के शब्दों की गुंजाइश नहीं होती थी। उनकी धुनें ऐसी होती थीं कि उर्दू के शब्द उसमें फ़िट नहीं हो सकते। पहले वहाँ शैलेन्द्र जी लिखते थे, जो सीधे सरल शब्दों में गहरी बात कह जाते थे। एक और बात, मैं तो सलिल दा से यह कह चुका हूँ कि अगर वे संगीत के बजाये लेखन की तरफ़ ध्यान देते तो रबींद्रनाथ ठाकुर के बाद उन्ही की कवितायें जगह जगह गूँजते।" दोस्तों, प्रस्तुत गीत भी किसी ख़ूबसूरत कविता से कम नहीं है। इसके बारे में और ज़्यादा कुछ कहने से बेहतर यही है कि इसे तुरंत सुना जाये!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. गिनी चुनी महिला संगीतकारों में से एक उषा खन्ना का स्वरबद्ध है ये गीत.
2. बहुत खूबसूरत लिखा है इसे जावेद अनवर ने.
3. एक अंतरे की पहली चार पंक्तियों में ये दो शब्द हैं - "तस्कीन" और "जिन्दगी".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी 34 अंकों के लिए एक बार फिर बधाई. एकदम सही जवाब. स्वप्न जी बस जरा सा पीछे रह गयी. आज महिला संगीतकार की बात है आज देखते हैं कौन बाज़ी मारता है. मुकाबला बहुत दिलचस्प हो चुका है. दिशा जी, पराग जी, संगीता जी, और मनु जी आप सब को भी बधाईयाँ.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, April 16, 2009

सावन की रिमझिम में उमड़-घुमड़ बरसे पिया......महफ़िल-ए-गज़ल और मन्ना डे

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०५

गर आपसे कहूँ कि हमारे आज के फ़नकार "श्री प्रबोध चंद्र जी" हैं तो लगभग १ या २ फीसदी लोग हीं होंगे जो इन्हें जानने का दावा करेंगे या फिर उतने लोग भी न होंगे। लेकिन यह सच है । अरे-अरे डरिये मत..मैं किसी अजनबी की बात नहीं कर रहा ...जिनकी भी बात कर रहा हूँ उन्हें आप सब जानते हैं। जैसे श्री हरिहर जरिवाला को लोग संजीव कुमार कहते हैं, वैसे हीं हमारे प्रबोध चंद्र जी यानि कि प्रबोध चंद्र डे को लोग उनके उपनाम मन्ना डे के नाम से बेहतर जानते हैं। मन्ना दा ने फिल्म-संगीत को कई कालजयी गीत दिए हैं। चाहे "चोरी-चोरी" का लता के साथ "आजा सनम मधुर चाँदनी में हम" हो तो चाहे "उपकार" का कल्याण जी-आनंद जी की धुनों पर "कसमें-वादे प्यार वफ़ा" हो या फिर सलिल चौधरी के संगीत से सजी "आनंद" फिल्म की "ज़िंदगी कैसी है पहेली" हो, मन्ना दा ने हर एक गाने में हीं अपनी गलाकारी का अनूठा नमूना पेश किया है।

चलिये अब आज के गाने की ओर रूख करते हैं। २००५ में रीलिज हुई "सावन की रिमझिम मे" नाम के एक एलबम में मन्ना दा के लाजवाब पंद्रह गीतों को संजोया गया था। यह गाना भी उसी एलबम से है। वैसे मैने यह पता करने की बहुत कोशिश की कि यह गाना मूलत: किस फिल्म या किस गैर-फिल्मी एलबम से है ,लेकिन मैं इसमें सफल नहीं हो पाया। तो आज हम जिस गाने की बात कर रहे हैं उसे लिखा है योगेश ने और अपने सुरों से सजाया है श्याम शर्मा ने और वह गाना है: "ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया"। वैसे इस एलबम में इस तिकड़ी के एक और गाने को स्थान दिया गया था- "कुछ ऎसे भी पल होते हैं" । संयोग देखिए कि जिस तरह हिन्दी फिल्मों में मन्ना दा की प्रतिभा की सही कद्र नहीं हुई उसी तरह कुछ एक संगीतकारों को छोड़ दें तो बाकी संगीतकारों ने योगेश क्या हैं, यह नहीं समझा। भला कौन "जिंदगी कैसी है पहेली" या फिर "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" में छिपी भावनाओं के सम्मोहन से बाहर आ सकता है।

लोग माने या ना मानें लेकिन इस गाने और मन्ना दा के एक और गाने "लागा चुनरी में दाग" में गहरा साम्य है। साहिर का वह गाना या फिर योगेश का यह गाना निर्गुण की श्रेणी में आता है, जैसा कबीर लिखा करते थे, जैसे सूफियों के कलाम होते हैं। प्रेमिका जब खुदा या ईश्वर में तब्दील हो जाए या फिर जब खुदा या ईश्वर में आपको अपना पिया/अपनी प्रिया दिखने लगे, तब हीं ऎसे नज़्म सीने से निकलते हैं। मेरे मुताबिक इस गाने में भी वैसी हीं कुछ बातें कहीं गई है। और सच कहूँ तो कई बार सुनकर भी मैं इस गाने में छुपे गहरे भावों को पूरी तरह नहीं समझ पाया हूँ। राधा का नाम लेकर योगेश अगर सांसारिक प्रेम की बातें कर रहे हैं तो फिर मीरा या कबीर का नाम लेकर वो दिव्य/स्वर्गीय प्रेम की ओर इशारा कर रहे हैं। वैसे प्रेम सांसारिक हो या फिर दिव्य, प्रेम तो प्रेम है और प्रेम से बड़ा अनुभव कुछ भी नहीं।

हुलस हुलस हरसे हिया, हुलक हुलक हद खोए,
उमड़ घुमड़ बरसे पिया, सुघड़ सुघड़ मन होए।


दर-असल प्रेम वह कोहिनूर है ,जिसके सामने सारे नूर फीके हैं। प्रेम के बारे में कुछ कहने से अच्छा है कि हम खुद हीं प्रेम के रंग में रंग जाएँ। तो चलिए आप भी हमारे साथ रंगरेज के पास और गुहार लगाईये कि:

ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा....

पग-पग पर लाखों हीं ठग थे तन रंगने की धुन में,
सबसे सब दिन बच निकला मन पर बच ना सका फागुन में।
तो... जग में ये तन ये मेरा मन रह ना सका बैरागी,
कोरी-कोरी चुनरी मोरी हो गई हाय रे दागी।
अब जिया धड़के , अब जिया भड़के
इस चुनरी पे सबकी नज़रिया गड़े,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....

रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा,
उसी रंग में सब रंग डूबे कह गए दास कबीरा।
तो... नीले पीले लाल सब्ज रंग तू ना मुझे दीखला रे,
मैं समझा दूँ भेद तुझे ये , तू ना मुझे समझा रे।
प्रेम है रंग वो , प्रेम है रंग वो,
चढ जाए तो रंग ना दूजा चढे,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग क्या हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

सब हवायें ले गया मेरे समुन्दर की कोई,
और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया...

इरशाद ....


पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल में आपके लिए शब्द था -"खुदा" और सुजोई ने पेश की ये ग़ज़ल -

खुदा ने सोचा था कि रहेंगे सब इंसान प्यार से,
ज़मीन पे देखा तो अरमान लुटे नज़र आते हैं.
कुछ तो रहम किया होता खुदा पर इंसानों,
हाथ में तलवार लिए सरे-आम नज़र आते हैं.

नीलम जी भी उतर आई मैदान में इस शेर के साथ-

खुदा खुदी और तू,
सबमें शामिल है तेरी जुस्तजू,
वाह क्या बात है

और कमलप्रीत जी ने तो रंग ही जमा दिया ये कहकर कि -
उनकी आँखों में वो सुरूरे-इबादत है,
कि काफिर भी उठा ले अल्लाह का हलफ.

शन्नो जी, सजीव जी और आचार्य जी का भी महफिल में आने का आभार.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -'शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, September 11, 2008

जिन्होंने सजाये यहाँ मेले...कुछ यादें अमर संगीतकार सलिल दा की

आज आवाज़ पर, हमारे स्थायी श्रोता, और गजब के संगीत प्रेमी, इंदौर के दिलीप दिलीप कवठेकर लेकर आए हैं महान संगीतकार सलिल चौधरी के दो अदभुत गीतों से जुड़ी कुछ अनमोल यादें.

अपनी कहानी छोड़ जा, कुछ तो निशानी छोड़ जा..

सलिल चौधरी- इस क्रान्तिकारी और प्रयोगवादी संगीतकार को जब हम पुण्यतिथि पर याद करते हैं तो अनायास ही ये बोल जेहन में उभरते है, और साथ में कई यादें ताज़ा होती हैं. अपने विविध रंगों में रचे गानों के रूप में जो निशानी वो छोड गये हैं, उन्हें याद करने का और कराने का जो उपक्रम हम सुर-जगत के साथी कर लेते हैं, वह उनके प्रति हमारी छोटी सी श्रद्धांजली ही तो है.


गीतकार योगेश लिख गये है- जिन्होंने सजाये यहां मेले, सुख-दुख संग-संग झेले, वही चुन कर खामोशी, यूँ चले जाये अकेले कहां?

आनंद के इस गीत के आशय को सार्थक करते हुए यह प्रतिभाशाली गुलुकार महज चालीस साल की अपने संगीतयात्रा को सजाकर अकेले कहीं दूर निकल गया.

गीतकार योगेश की बात चल पड़ी है तो आयें, कुछ उनके संस्मरण सुनें, जो हमें शायद सलिलदा के और करीब ले जाये.

आनंद फ़िल्म में योगेश को पहले सिर्फ़ एक ही गीत दिया गया था, सलिलदा के आग्रह पर- कहीं दूर जब दिन ढल जाये. उसके बाद, एक दिन दादा ने एक बंगाली गीत की रिकॉर्ड योगेश के हाथ में रखी, और उसपर बोल लिखने को कहा. यह उस प्रसिद्ध गीत का मूल बंगाली संस्करण था - ना, जिया लागे ना.. योगेश के पास तो ग्रमोफ़ोन तक नहीं था. खैर, कुछ जुगाड़ कर उन्होंने यह मूल गीत सुना और बैठ गये बोल बिठाने.

उधर एक और ग़फ़लत हो गयी थी. फ़िल्म के निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने यह गीत गुलज़ार को भी लिखने दे दिया. उन्होंने लिखा - ना ,जिया लागे ना, और योगेश ने लिखा - ना, ना रो अखियां. संयोग से गुलज़ार का गीत रिकॉर्ड हो गया, योगेश का गीत रह ही गया.

एक दिन हृषिकेश दा ने उन्हें बुलाकर उनके हाथ में चेक रख दिया. योगेश ने अचंभित हो कहा- कहीं दूर के तो पैसे मिल गये है. ये फिर किसके लिये? 'ये ना, ना रो अंखियां के पैसे' हृषि दा बोले। "यदि गाना रिकॉर्ड होता तो पैसे ले लेता , मगर यूँ लेना अच्छा नहीं लगता." योगेश ने संकोचवश कहा. अब दादा तो मान नहीं रहे थे, तो सलिलदा ने एक उपाय सुझाया. हम लोग फ़िल्म के टाईटल गीत के लिये एक गाना और लिखवा लेते है योगेश से, तो कैसा रहेगा. योगेश मान गये, और तैयार हुई एक कालजयी, आसमान से भी उत्तुंग संगीत रचना-

ज़िंदगी , कैसी है पहेली हाये, कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये....

जब बाद में राजेश खन्ना ने यह गीत सुना तो उन्होंने हृषि दा को मनाया के यह गीत इतना अच्छा बन पड़ा है तो इसे टाईटल पर जाया ना करें, मगर उन पर पिक्चराईज़ करें. हृषि दा बोले, सिच्युएशन कहां है इस गीत के लिये. राजेश खन्ना ने हठ नहीं छोड़ा, कहा "पैदा कीजिये" . वैसे इस गाने को सिर्फ़ एक दिन में ही चित्रित कर लिया गया.

यहां सलिल दा ने कोरस का जो प्रयोग किया है, उसके बारे में भी आर.डी. बर्मन बोले थे - झकास... ऐसे प्रयोग शंकर जयकिशन ने भी कहीं किये थे. सलिलदा ने उससे भी आगे जा कर एक अलग शैली विकसित की, जिसकी बानगी मिलेगी इन गीतों में -

मेरे मन के दिये (परख), जाने वाले सिपाही से पूछो ( उसने कहा था), ए दिल कहां तेरी मंज़िल (माया), न जाने क्यूं होता है ये (छोटी सी बात), जागो मोहन प्यारे (जागते रहो)

तो यूँ हुआ उस बेहतरीन गीत का आगमन हमारे दिल में. आईये सुनते है:



इसी तरह रजनीगंधा फ़िल्म के प्रसिद्ध गीत 'रजनी गंधा फूल हमारे, यूँ ही महके जीवन में ' लिखने के बाद जब ध्वनिमुद्रित किया गया तो सुन कर फ़िल्म के निर्देशक बासु चटर्जी बोले, सलिल दा, इस गाने को थोड़ा १०-१५ सेकंड छोटा करो. सलील दा को समझ नहीं आया . उन्होंने कहा- तो शूटिंग थोड़ी ज्यादा कर लेना. तो बासु दा बोले - दादा, यह गाना तो पहले ही शूट हो चुका है. दरसल यह गाना बैकग्राऊंड में था!!!

पूरी रिकॉर्डिंग फिर से करने का निश्चय किया गया. मगर एक अंतरे में कुछ अलग बोल थे, जो गाने के सिचुयेशन से मेल नहीं खाते थे. योगेश ने लिखा था-

अपना उनको क्या दूं परिचय
पिछले जन्मों के नाते हैं,
हर बार बदल कर ये काया,
हम दोनो मिलने आते है..
धरती के इस आंगन में.....


फ़िल्म के रशेस देखकर सलिल दा को लगा की नायिका के मन के अंतर्द्वंद का, दो नायकों के बीच फ़ंसी हुई उसकी मनस्थिती का यहां वर्णन जम नहीं रहा है. उन्होंने योगेश से फ़िर लिखने को कहा, और बना यह अंतरा..

हर पल मेरी इन आंखों में
अब रहते है सपने उनके ,
मन कहता है कि मै रंगूँ
एक प्यार भरी बदली बन के,
बरसूं उनके आंगन में....

तो यह गीत भी सुनें, सुरों की सिम्फ़नी के बागा़नों से छन कर आती हुई खुशबू का लुत्फ़ उठाएं-



चलते चलते एक पहेली-
माया फ़िल्म का गीत - ऐ दिल! कहां तेरी मंज़िल, ना कोई दीपक है ,ना कोई तारा है, गु़म है ज़मीं, दूर आसमां.. गीत किसने गाया है?

हमें लगता है दिलीप जी का ये सवाल हमारे संगीत प्रेमियों के लिए बेहद आसान होगा, तो जल्दी से लिख भेजिए हमें, अपने जवाब टिप्पणियों के माध्यम से.

प्रस्तुति - दिलीप कवठेकर
चित्र "रजनीगंधा फूल तुम्हारे" गीत की रिकॉर्डिंग के दौरान का है

Wednesday, August 27, 2008

मैं तो दीवाना...दीवाना...दीवाना...मुकेश, एक परिचय

इससे पहले आपने पढ़ा हृदय नाथ मंगेशकर द्वारा लिखित संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰' और सुने मुकेश के गाये ९ हिट गीत। संजय पटेल का आलेख 'दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश'। अब जानिए मुकेश के बारे में तपन शर्मा से।


मुकेश चंद्र माथुर का जन्म दिल्ली के एक मध्यम-वर्गीय परिवार में जुलाई २२, १९२३ को हुआ। उन्हें अभिनय व गायन का बचपन से ही शौक था और वे के.एल. सहगल के प्रशंसक थे। मात्र दसवीं तक पढ़ने के बावजूद उन्हें लोक निर्माण कार्य में सहायक सर्वेक्षक विभाग में नौकरी मिल गई, जहाँ पर उन्होंने सात महीने तक काम किया। पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। दिल्ली में उन्होंने चुपके से कईं गैर-फिल्मी गानों की रिकार्डिंग करी। उसके बाद तो वे भाग कर मुम्बई में फिल्म-स्टार बनने के लिये जा पहुँचे। वे अपने रिश्तेदार व प्रसिद्ध कलाकार मोतीलाल के यहाँ ठहरने लगे।

मोतीलाल की मदद से वे फिल्मों में काम करने लगे। एक गायक के तौर पर उनका पहला गीत "निर्दोष" में "दिल ही बुझा हुआ..." रहा, उसके बाद उनका पहला युगल गीत फिल्म "उस पार" में गायिका कुसुम के साथ "ज़रा बोली री हो.." था। फिर उन्होंने फिल्म "मूर्ति" में "बदरिया बरस गई उस पार.." खुर्शीद के साथ गाया। उस समय तक उन्होंने सुनने वालों के मन में अपनी एक जगह बना ली थी। तब उनके जीवन में महत्त्व पूर्ण घटना घटी। साल था १९४५, जब अनिल बिस्वास ने उनसे फिल्म 'पहली नज़र' के लिये 'दिल जलता है तो जलने दे....' गाने के लिये कहा। ये वो गीत था जो मुकेश को पूरी तरह से लोगों की नजरों व प्रसिद्धि में ले आया। वे किंवदंति बन चुके थे और आने वाले कईं दशकों तक उनकी जादुई आवाज़ को पूरे देश ने ‘आग’, ‘अनोखी अदा’ और ‘मेला’ के गानों में सुना।


१९४९ में उन्होंने एक और मील का पत्थर पार किया। वो था उनका राज कपूर और शंकर-जयकिशन के साथ मिलन। राजकपूर उनसे और शंकर-जयकिशन से अपने आर.के. फिल्म्स के लिये गानों की फरमाईश करते रहते। उसके बाद तो 'आवारा' और 'श्री ४२०" जैसी फिल्मों में गाये गये 'आवारा हूँ..' व ' मेरा जूता है जापानी..' से उनकी आवाज़ ने देश ही नहीं विदेश में भी शोहरत पाई। रूस में तो "आवारा हूँ..." सड़कों पर सुनाई देने लगा था। राज कपूर जैसे चतुर निर्देशक व संगीत प्रेमी के साथ काम करने का मुकेश को फायदा मिला। राज कपूर फिल्मों में अच्छे गानों के पक्षधर रहे। शंकर जयकिशन की हर एक धुन को वे सुनते थे व उनके पास करने पर ही वो धुन रिकार्डिंग के लिये जाया करती थी। राज कपूर हर गाने की रिकार्डिंग के वक्त स्टूडियो में ही रहते थे व आर्केस्ट्रा की हौंसला अफजाई करते रहते। उनके संगीत के प्रति इसी समर्पण का असर आने वाली हर पीढी पर दिखा जो जब भी राज कपूर के गाने सुनती है तो हर बार नई ताज़गी सी मिलती है। ‘आह’, ‘आवारा’, ‘बरसात’, ‘श्री ४२०’, ‘अनाड़ी’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’, ‘मेरा नाम जोकर’ व अन्य कईं फिल्मों के गाने आज भी तरो-ताज़ा से लगते हैं। राज कपूर की सफलता के साथ मुकेश व शंकर जयकिशन की सफलता भी शामिल रही।

लेकिन उनका जीवन हमेशा आसान नहीं रहा। 'आवारा' की सफलता के बाद मुकेश ने दोबारा अभिनय के क्षेत्र में अपने आपको आजमाने का प्रयास किया और अपने गायन के करियर को हाशिये पर धकेल दिया। सुरैया के साथ ‘माशूका’ (१९५३) व ऊषा किरोन के साथ ‘अनुराग’ (१९५६) बहुत बुरी तरह से पिटी। उन्होंने राज कपूर की फिल्म ‘आह’ (१९५३) में एक तांगे वाले की छोटी सी भूमिका निभाई। उसी फिल्म के एक गाने- ‘छोटी सी ज़िन्दगानी’ को उन्होंने गाया भी। कठिन परिस्थितियों को देखते हुए मुकेश ने पार्श्व गायन में दोबारा हाथ आजमाने का निश्चय किया। परन्तु तब उन्हें न के बराबर ही काम मिल रहा था। स्थिति इतनी गम्भीर हो चुकी थी कि उनके दोनों बच्चे नितिन और रितु को स्कूल छोड़ना पड़ा।

आखिरकार उन्होंने ‘यहूदी’ (१९५८) के गाने 'ये मेरा दीवानापन है..' से जोरदार वापसी करी। उसी साल आई ‘मधुमति’, ‘परवरिश’ और ‘फिर सुबह होगी’ के गाने इतने जबर्दस्त थे कि मुकेश ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। एस.डी बर्मन जिन्होंने तब तक मुकेश को अपने गानों में मौका नहीं दिया था, उनसे दो उत्कृष्ट गीत गवाये। वे गीत थे- फिल्म 'बम्बई का बाबू' (१९६०) से 'चल री सजनी...' और बन्दिनि (१९६३) से 'ऒ जाने वाले हो सके तो लौट के आना...'। उसके बाद तो मुकेश ६० और ७० के दशक में चमके रहे और उन्होंने 'हिमालय की गोद में'(१९६५) से 'मैं तो एक ख्वाब हूँ...', मेरा नाम जोकर से 'जीना यहाँ मरना यहाँ..' आनंद(१९७०) से 'मैंने तेरे लिये ही सात रंग के..' 'रोटी कपड़ा और मकान' से ' मैं न भूलूँगा..'जैसे असंख्य मधुर और दिल व आत्मा को छू जाने वाले गीत गाये। और उनके ‘कभी कभी’ (१९७६) के दो गानों 'मैं पल दो पल का शायर...' और 'कभी कभी मेरे दिल में..' को कौन भूल सकता है।

अन्य संगीत निर्देशक जिनके लिये मुकेश ने बेहतरीन गाने गाये, वे थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी, सलिल चौधरी, ऊषा खन्ना, आर.डी.बर्मन वगैरह। फिल्म 'कभी कभी' में तो खय्याम के संगीत, साहिर लुधियानवी के गीत और मुकेश की आवाज़ ने तो जादू बिखेर दिया था।

१९७४ में मुकेश ने सलिल चौधरी द्वारा संगीतबद्ध, फिल्म रजनीगंधा में 'कईं बार यूँ भी देखा है...' गाया जिसके लिये उन्हें उस साल के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 'सत्यम शिवम सुंदरम'(१९७८) का गीत 'चंचल शीतल, कोमल' उनका आखिरी रिकार्ड किया गया गाना था। २७ अगस्त १९७६ में अमरीका के डेट्रोएट में संगीत समारोह के दौरान आये दिल के दौरे से उनका देहांत हो गया। मुकेश आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी अमर आवाज़ हमेशा हमेशा संगीत प्रेमियों को अपना दीवाना बनाती रहेगी, आज उनकी पुण्यतिथि पर हम याद करें उस अमर फनकार को, उनके यादगार गीतों को सुनकर, आईये, चलते चलते सुनें एक बार वही गीत जिसके लिए उन्हें रास्ट्रीय पुरस्कार मिला, फ़िल्म 'रजनीगंधा' के इस गीत को लिखा है योगेश ने, और संगीत है सलील दा का, इन दोनों के बारे में हम आगे बात करेंगे, फिलहाल सुनें मुकेश को, जिन्होंने इस गीत को भावनाओं के चरम शिखर पर बिठा दिया है अपनी आवाज़ के जादू से.



जानकारी सोत्र - इन्टरनेट.
संकलन - तपन शर्मा "चिन्तक"



इससे पहले आपने पढ़ा हृदय नाथ मंगेशकर द्वारा लिखित संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰' और सुने मुकेश के गाये ९ हिट गीत। संजय पटेल का आलेख 'दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश'। अब जानिए मुकेश के बारे में तपन शर्मा से।

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