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Sunday, February 23, 2020

राग काफी : SWARGOSHTHI – 457 : RAG KAFI






स्वरगोष्ठी – 457 में आज

काफी थाट के राग – 1 : राग और थाट काफी

विदुषी गिरिजा देवी से राग काफी में होरी और मुहम्मद रफी व साथियों से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी गिरिजा देवी
मुहम्मद रफी
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा करेंगे। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी थाट के जनक अथवा आश्रय जन्य राग काफी पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की पहली कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी गिरिजा देवी के स्वर में राग काफी में निबद्ध एक होरी ठुमरी रचना का रसास्वादन कराएंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक पुरानी हिन्दी फिल्म का गीत मुहम्मद रफी और साथियों के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। 1963 में प्रदर्शित सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास “गोदान” पर आधारित फिल्म के गीतकार अनजान और संगीतकार पण्डित रविशंकर हैं।


काफी थाट में गान्धार और निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग काफी, काफी थाट का जनक अथवा आश्रय राग माना जाता है। राग काफी में उसके थाट के अनुकूल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इसकी जाति सम्पूर्ण होती है। इस राग के गायन अथवा वादन का अनुकूल समय मध्यरात्रि माना जाता है, किन्तु फाल्गुन मास में किसी भी समय गायन या वादन किया जा सकता है। राग काफी और काफी थाट के अन्य जन्य रागों में भारतीय पर्व होली की रचनाएँ भरपूर मिलती हैं। होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक पर्व होता है। यह ऋतु परिवर्तन और नई फसल के तैयार होने का प्रतीक पर्व भी माना जाता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में पाया जाता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी, दादरा विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी रंग से रँगी होली में परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधाकृष्ण की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, राग काफी में निबद्ध यह मनमोहक होरी।

काफी होरी : “तुम तो करत बरजोरी...” : विदुषी गिरिजा देवी



राग काफी चंचल प्रकृति का राग है। अतः इस राग में अधिकतर छोटा खयाल और ठुमरी गायी जाती है। अधिकांश ठुमरियों में ब्रज की होली का चित्रण मिलता है। ऐसी ठुमरियों को होली के आसपास फाल्गुन मास में हर समय गाया जा सकता है। दरअसल राग काफी ऋतु प्रधान राग है। अब हम आपको सुनवाते है, राग काफी पर आधारित एक फिल्मी गीत। 1963 में मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास पर आधारित फिल्म “गोदान” प्रदर्शित हुई थी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित इस फिल्म के संगीतकार थे विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल की विभिन्न लोक संगीत शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। यह गीत कहरवा ताल में है, जिसमें ब्रज की होली का चित्रण है। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म “गोदान” के इस होली गीत का। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग काफी : “होली खेलत नन्दलाल बिरज में...” मुहम्मद रफी और साथी : फिल्म – गोदान



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 457वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1997 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 460वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका का स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 29 फरवरी, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 459 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 455वें अंक में हमने आपको 2015 में प्रदर्शित मराठी फिल्म “कटयार कालजात घुसली” से एक राग आधारित नाट्य गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पूरिया कल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – शंकर महादेवन और महेश काले

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की पहली कड़ी में आज आपने काफी थाट और उसके आश्रय अथवा जनक राग काफी राग का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के उपशास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी के स्वर में इस राग की एक होरी ठुमरी का रसास्वादन किया। राग काफी के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए 1963 में प्रदर्शित फिल्म “गोदान” का एक गीत मुहम्मद रफी और साथियों के स्वर में प्रस्तुत किया। फिल्म के संगीतकार पण्डित रविशंकर हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
 राग काफी : SWARGOSHTHI – 457 : RAG KAFI : 23 फरवरी, 2020 


Sunday, December 15, 2019

राग पीलू : SWARGOSHTHI – 447 : RAG PILU






स्वरगोष्ठी – 447 में आज

नौशाद की जन्मशती पर उनके राग – 3 : राग पीलू

लता मंगेशकर के स्वर में सुनिए; “मोरे सइयाँ जी उतरेंगे पार हो नदिया धीरे बहो...”





नौशाद और लता मंगेशकर
विदुषी गिरजा देवी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला – “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान रहे नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद अली का जन्म हुआ था। इस तिथि के अनुसार दिसम्बर, 2019 को नौशाद का एक सौवाँ जन्मदिन पड़ता है। इस उपलक्ष्य में हम “स्वरगोष्ठी” के दिसम्बर मास के प्रत्येक अंक में नौशाद के कुछ राग आधारित ऐतिहासिक गीत प्रस्तुत करेंगे। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठने लगे। वहाँ वह साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घरवालों की फटकार बदस्तूर जारी रही। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए मायानगरी बम्बई (अब मुम्बई) की ओर रुख किया।


अपने सांगीतिक फिल्मी जीवन के पहले दशक में नौशाद ने कड़े संघर्ष के बाद उस समय के प्रथम श्रेणी के संगीतकारों में अपना नाम शामिल कराया था। 1944 की फिल्म ‘रतन’ के संगीत की व्यावसायिक सफलता से तमाम फिल्म कम्पनी उनकी ओर आकर्षित होने लगी थी। फिल्म की सफलता का अनुमान इस तथ्य से आँका जा सकता है कि फिल्म के नेगेटिव की कीमत पचहत्तर हजार रुपये थी जबकि फिल्म के गीतों की रायल्टी से तीन लाख, पचास हजार रुपये आए। इस आय से फिल्म ‘खजांची’ के संगीत का व्यावसायिक कीर्तिमान टूट गया। 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘अन्दाज’ के ट्रेलर में ऊँचे स्वर में यह उद्घोषणा सुनाई देती थी –“चालीस करोड़ में एक ही नौशाद”। किसी संगीतकार को फिल्म जगत में इतनी प्रतिष्ठा उस समय तक कभी नहीं मिली थी। नौशाद पहले संगीतकार थे जिन्होने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के बल पर संगीतकार का दर्जा भी फिल्म के नायक और निर्देशक के समकक्ष ला खड़ा किया। नौशाद ऐसे संगीतकार थे जिन्होने अपनी फिल्मों की धुने भारतीय संगीत पद्यति के अन्तर्गत ही विकसित की और राग आधारित संगीत का सरलतम रूप प्रस्तुत किया। अपने सांगीतिक जीवन के पहले दशक की फिल्मों में विभिन्न रागों के सरल और गुनगुनाने योग्य धुने ही रचीं। विशुद्ध शास्त्रीय बन्दिशों को आधार बना कर फिल्मी गीतों की रचना उनके सांगीतिक जीवन के दूसरे दशक में रची गई। आज के अंक में हम नौशाद के फिल्मी सफर के दूसरे दशक के पूर्वार्द्ध का एक राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। 1955 में फिल्म “उड़न खटोला” प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में लोक और हल्के शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत शामिल किये गए थे। इसी फिल्म का एक गीत; “मोरे सइयाँ जी उतरेंगे पार हो नदिया धीरे बहो...” राग पीलू पर आधारित है। दादरा ताल में निबद्ध यह गीत सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका लता मंगेशकर और साथियों की आवाज़ में सुनवा रहे हैं। यह गीत शकील बदायूनी का लिखा हुआ है और इसे नौशाद ने संगीतबद्ध किया था। फिल्म में इस गीत को माँझी गीत के रूप में फिल्माया गया है।

राग पीलू : “मोरे सइयाँ जी उतरेंगे पार...” : लता मंगेशकर : फिल्म – उड़न खटोला


आज हम आपसे दिन के तीसरे प्रहर के अत्यन्त प्रचलित राग “पीलू” पर चर्चा कर रहे हैं। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न 12 से अपराह्न 3 बजे के बीच का समय माना जाता है। इस प्रहर के रागों का वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग के स्वर में से कोई एक स्वर होता है। इस प्रहर का एक बेहद लोकप्रिय राग पीलू है। राग पीलू में उपशास्त्रीय रचनाएँ खूब निखरती हैं। अब हम आपको राग पीलू में निबद्ध एक ठुमरी विदुषी गिरिजा देवी की आवाज़ में सुनवाते हैं। पीलू काफी थाट और सम्पूर्ण जाति का राग है। साधारणतया राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित करते हुए अवरोह में सभी स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के दोनों रूप, शुद्ध और कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग पीलू में अनेक रागों की छाया प्रायः दिखाई पड़ती है, इसीलिए इसे संकीर्ण जाति का राग माना जाता है। यह चंचल और श्रृंगारिक प्रकृति का राग है, अतः इसमें ठुमरी, दादरा, टप्पा, भजन आदि बेहद जनप्रिय है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इसमें पूर्वांग के स्वर इतने प्रमुख रहते हैं कि लोग मध्यम को अपना षडज मान कर गाते-बजाते है, जिससे मंडरा सप्तक के स्वरों में निर्वाह सरल और सुविधाजनक हो जाता है। अब आप राग पीलू की ठुमरी- ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’ सुनिए, जिसे विदुषी गिरिजा देवी ने गाया है।

राग पीलू ठुमरी : “पपीहरा पी की बोल न बोल...” : विदुषी गिरिजा देवी




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 447वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का प्रभाव है?

2 – इस गीत को किस ताल में निबद्ध किया गया है, हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किन दो संगीतज्ञों के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार, 21 दिसम्बर, 2019 की मध्यरात्रि तक अपने पते के साथ भेज सकते हैं। इसके बाद आपका उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 449 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 445वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मुल्तानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – उस्ताद अमीर खाँ

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।

एक संवाद

पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी की स्मृति में संगीत संध्या

आज के अंक में हम आपको लखनऊ में आयोजित संगीत के एक महत्त्वपूर्ण आयोजन की जानकारी देना चाहते हैं। पिछली शताब्दी में सक्रिय संगीतज्ञ, लोकसंगीत के शोधकर्त्ता, स्वरलिपिकार और स्वरलिपि सहित लोकसंगीत के संकलनकर्त्ता पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी की स्मृति में सांस्कृतिक संस्था “अल्पिका” और पण्डित जी के शिष्य-शिष्याओं द्वारा गत 3 दिसम्बर को लखनऊ में एक संगीत संध्या और संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगीत संध्या में पण्डित राधाबल्लभ चतुर्वेदी के शिष्य-शिष्याओं ने उनसे सीखे और उनके द्वारा संकलित ग्रन्थ “ऊँची अटरिया रंग भरी” के स्वरबद्ध गीतों का गायन प्रस्तुत किया। 
वीणा दुग्गल और प्रो. कमला श्रीवास्तव
मुख्य आकर्षण की केन्द्र रहीं चतुर्वेदी जी की 90 वर्षीया शिष्या और पूर्व विधायक वीणा दुग्गल। विदुषी वीणा दुग्गल ने पहले एक कजरी; “बदरिया बरसे रस कै बूँद किवड़िया खोलो री सजनी...” और फिर एक मनरंजना गीत प्रस्तुत किया। इस गीत में लव और कुश के जन्म-प्रसंग का चित्रण था। गीत के बोल थे; “सिया सोचे विपिन के बीच भरे जल नैना...”। इन गीतों की प्रस्तुति की प्रमुख विशेषता यह थी कि पण्डित जी की 90 वर्षीया शिष्या विदुषी वीणा दुग्गल के स्वर इस आयु में सधे हुए थे। चतुर्वेदी जी की दूसरी वयोवृद्ध लगभग 87 वर्षीया शिष्या प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव ने स्वयं और अपनी शिष्याओं द्वारा पण्डित जी के ग्रन्थ के स्वरबद्ध किये गीतों का प्रस्तुतिकरण किया। लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय से सेवानृवित्त प्रोफेसर विदुषी कमला जी ने पहले डेढ़ ताल में निबद्ध होली गीत “सखि फागुन मास नियराए, मोरे प्रियतम नहीं आए...” प्रस्तुत किया। इस गीत में विरहिणी नायिका का सहज चित्रण था। विदुषी कमला जी ने अपनी शिष्याओं; रत्ना शुक्ला, अरुणा उपाध्याय, नीरा मिश्रा और मीतू मिश्रा के साथ कई समूह गीत भी प्रस्तुत किये। इन गीतों में “गंगा तोरी निर्मल धार...” और लोकप्रिय गीत “नन्दबाबा जी को छइयाँ...” को श्रोताओं ने सराहा। आयोजक संस्था की प्रमुख कथक नृत्यांगना विदुषी रेणु शर्मा ने पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी के गीतों पर कथक की भंगिमाओं से युक्त आकर्षक नृत्य प्रस्तुत किया। पहले एक बधाई गीत; “बधइया बाजे आंगने में...” पर एकल नृत्य प्रस्तुत किया गया। इसके बाद ननद-भौजाई के सवाल-जवाब वाले गीत; “कौने रंग मूँगवा कौने रंग मोतिया...” से दृश्यात्मक अन्विति साकार हुई। इस प्रस्तुति में नृत्यांगना रेणु शर्मा का नृत्य में साथ गायिका अरुणा उपाध्याय ने दिया। राम वनगमन के प्रसंग पर आधारित गीत; “रघुवर संग जाब हम ना अवध में रहिबे...” पर रेणु शर्मा ने अत्यन्त भावपूर्ण नर्तन किया। संगीत संध्या में पण्डित राधावल्लभ जी के एक और शिष्य रमेश पाण्डेय ने भी अपने गुरु के दो गीत प्रस्तुत कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। पहला गीत ग्रामीण परिवेश का चित्रण करता एक खलिहान गीत है, जिसके बोल हैं; “खलिहान से सज गए गाँव...”। दूसरे गीत “काले मेघा पानी दे...” में वर्षा ऋतु का आह्वान किया गया है। आकाशवाणी, लखनऊ में रहे केवल कुमार भी चतुर्वेदी जी के प्रिय शिष्य रहे है। अपने गायक पुत्र अमिताभ केवल के साथ उन्होने इस संध्या में अपने गुरु से सीखे हुए चार गीत प्रस्तुत किये। उन्होने पहले “मोरे मदन मुरारी घनश्याम...’, एक निर्गुण “चुनरिया काहे न रंगाए...’, एक बिरहा “नहीं मारो नैनवां के बान...’ और अन्त में एक घाटो “रामा चैत अयोध्या रामजी जन्में...”। 
कार्यक्रम में सभी शिष्य-शिष्याओं को सम्मानित किया गया। इस संगीत संध्या से पूर्व पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व को उजागर करती एक संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया, जिसमें चतुर्वेदी जी की सुपुत्री नीलम चतुर्वेदी, प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव, इतिहासकार योगेश प्रवीण, उमा त्रिगुनायत और विद्याविन्दु सिंह ने संगीत जगत को पण्डित जी के योगदान पर चर्चा की।

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने राग पीलू का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात संगीत विदुषी गिरिजा देवी के स्व्क़र में प्रस्तुत एक ठुमरी रचना का रसास्वादन किया। नौशाद के राग पीलू के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए लता मंगेशकर और साथियों के स्वर में फिल्म “उड़न खटोला” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम श्रृंखला की अगली कड़ी में एक अन्य गीत प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग पीलू : SWARGOSHTHI – 447 : RAG PILU : 15 दिसम्बर, 2019
 

Sunday, September 1, 2019

कजरी गीत : SWARGOSHTHI – 433 : KAJARI SONGS






स्वरगोष्ठी – 433 में आज

वर्षा ऋतु के राग – 7 : उपशास्त्रीय संगीत में कजरी

वाराणसी के संगीतज्ञ बड़े रामदास जी की रचना – “बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...”





विदुषी गिरिजा देवी
पण्डित छन्नूलाल मिश्र 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “वर्षा ऋतु के राग” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि केवल मल्हार नाम से कोई राग नहीं है। दरअसल मल्हार एक अंग का नाम है। जब कोई राग इस अंग से संचालित होता है तब इसे मल्हार अंग का राग कहलाता है। राग मेघ मल्हार, मियाँ मल्हार, गौड़ मल्हार सूर मल्हार, रामदासी मल्हार आदि मल्हार अंग के प्रचलित राग हैं। इस श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज हम आपसे कजरी गायन शैली पर चर्चा करेंगे। कजरी अथवा कजली मूलतः लोक संगीत की विधा है, किन्तु इसके कुछ विशेष गुणों के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी यह प्रतिष्ठित हुई। आज के अंक में हम कजरी गीतों के उपशास्त्रीय रूप की चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको काशी के सुविख्यात विद्वान बड़े रामदास की एक कजरी रचना को चार सुप्रसिद्ध संगीतज्ञों; विदुषी गिरजा देवी, पण्डित रवि किचलू, पण्डित छन्नूलाल मिश्र और पण्डित विद्याधर मिश्र के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे।




पण्डित विद्याधर मिश्र
भारतीय संगीत की प्रत्येक विधाओं में वर्षा ऋतु के गीत-संगीत उपस्थित हैं। लोक संगीत के क्षेत्र में कजरी एक सशक्त विधा है। भारतीय पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास से लेकर आश्विन मास तक पूरे चार महीने उत्तर प्रदेश के ब्रज, बुन्देलखण्ड, अवध और पूरे पूर्वांचल और बिहार के प्रायः सभी हिस्से में कजरी गीतों की धूम मची रहती है। मूल रूप से कजरी लोक-संगीत की विधा है, किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में जब बनारस (अब वाराणसी) के संगीतकारों ने ठुमरी को एक शैली के रूप में अपनाया, उसके पहले से ही कजरी परम्परागत लोकशैली के रूप विद्यमान रही। उपशास्त्रीय संगीत के रूप में अपना लिये जाने पर कजरी, ठुमरी का एक अटूट हिस्सा बनी। इस प्रकार कजरी के मूल लोक-संगीत का स्वररोप और ठुमरी के साथ रागदारी संगीत का हिस्सा बने स्वररोप का समानान्तर विकास हुआ। आज के अंक में हम आपसे कजरी के रागदारी संगीत के कलासाधकों द्वारा अपनाए गए स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

भारतीय लोक-संगीत के समृद्ध भण्डार में कुछ ऐसी संगीत शैलियाँ हैं, जिनका विस्तार क्षेत्रीयता की सीमा से बाहर निकल कर, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुआ है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी और मीरजापुर जनपद तथा उसके आसपास के पूरे पूर्वाञ्चल क्षेत्र में कजरी गीतों की बहुलता है। वर्षा ऋतु के परिवेश और इस मौसम में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की अभियक्ति में कजरी गीत पूर्ण समर्थ लोक-शैली है। शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के कलासाधकों द्वारा इस लोक-शैली को अपना लिये जाने से कजरी गीत आज राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सुशोभित है। आज की संगोष्ठी का प्रारम्भ हम विश्वविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी, वर्षा ऋतु के रस-रंग से अभिसिंचित एक कजरी से करते है। यह प्रस्तुति युगल गीत रूप में है, जिसमें विदुषी गिरिजा देवी के साथ गायक पण्डित रवि किचलू के स्वर भी है।

कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित रवि किचलू



मूलतः लोक-परम्परा से विकसित कजरी आज गाँव के चौपाल से लेकर प्रतिष्ठित शास्त्रीय मंचों पर सुशोभित है। कजरी-गायकी को ऊँचाई पर पहुँचाने में अनेक लोक-कवियों, साहित्यकारों और संगीतज्ञों का स्तुत्य योगदान है। कजरी गीतों की प्राचीनता पर विचार करते समय जो सबसे पहला उदाहरण हमें उपलब्ध है, वह है- तेरहवीं शताब्दी में हज़रत अमीर खुसरो रचित कजरी-‘अम्मा मोरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया...’। अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की एक रचना- ‘झूला किन डारो रे अमरैया...’, आज भी गायी जाती है। कजरी को समृद्ध करने में कवियों और संगीतज्ञों योगदान रहा है। भोजपुरी के सन्त कवि लक्ष्मीसखि, रसिक किशोरी, शायर सैयद अली मुहम्मद ‘शाद’, हिन्दी के कवि अम्बिकादत्त व्यास, श्रीधर पाठक, द्विज बलदेव, बदरीनारायण उपाध्याय ‘प्रेमधन’ की कजरी रचनाएँ उच्चकोटि की हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने तो ब्रज, भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कजरियों की रचना की है। भारतेन्दु की कजरियाँ विदुषी गिरिजा देवी के स्वर में आज भी सुरक्षित है। आज के अंक में जो कजरी हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उसे बनारस घराने के विद्वान पण्डित बड़े रामदास ने रचा है। विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित रवि किचलू के युगल स्वरों में आपने बड़े रामदास की रचना का रसास्वादन किया है। यही कजरी अब आप वर्तमान में विख्यात गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र से सुनिए। श्री मिश्र ने अन्तिम अन्तरे में मल्हार अंग की झलक भी दिखाई है।

कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : पण्डित छन्नूलाल मिश्र



कवियों और शायरों के अलावा कजरी को प्रतिष्ठित करने में अनेक संगीतज्ञों की स्तुत्य भूमिका रही है। वाराणसी की संगीत परम्परा में बड़े रामदास जी का नाम पूरे आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होने भी अनेक कजरियों की रचना की थी। अब हम आपको बड़े रामदास जी द्वारा रचित उसी कजरी का एक बार फिर रसास्वादन कराते है। इस कजरी को उन्हीं के प्रपौत्र और गायक पण्डित विद्याधर मिश्र प्रस्तुत कर रहे हैं। विद्याधर जी बनारस घराने के सुप्रसिद्ध विद्वान, बड़े रामदास जी के पौत्र और भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र के पुत्र हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। अब आप पण्डित विद्याधर मिश्र से दादरा ताल में निबद्ध अपने प्रपितामह बड़े रामदास की यह कजरी सुनिए। इस कजरी में आपको राग देस के साथ ही अन्य रागों की झलक भी मिलेगी आप यह कजरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग खमाज : “चुनरिया कटती जाए रे...” : मन्ना डे : फिल्म – मदर इण्डिया

संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 433वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय वाद्य संगीत की एक रचना अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 440वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस संगीतांश को सुन कर बताइए कि यह भारतीय संगीत का कौन सा वाद्य है?

2 – इस संगीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – यह संगीत किस विश्वविख्यात वादक द्वारा बजाया गया है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 31 अगस्त, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 435 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 431वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1976 में प्रदर्शित फिल्म “शक” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – जयन्त मल्हार अथवा जयन्ती मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” की सातवीं कड़ी में आज आपने वर्षा ऋतु में गाये जाने वाली संगीत शैली “कजरी” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के उपशास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपको काशी के सुविख्यात विद्वान बड़े रामदास की एक कजरी रचना को चार सुप्रसिद्ध संगीतज्ञों; विदुषी गिरजा देवी, पण्डित रवि किचलू, पण्डित छन्नूलाल मिश्र और पण्डित विद्याधर मिश्र के स्वरों में रसास्वादन किया। अगले अंक में हम कजरी गीतों अन्य विविध रूप की चर्चा करेंगे। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिय
 कजरी गीत : SWARGOSHTHI – 433 : KAJARI SONGS : 1 सितम्बर, 2019 

Wednesday, October 25, 2017

संगीत-साम्राज्ञी विदुषी गिरिजा देवी की स्मृतियों को सादर नमन


स्वरगोष्ठी – विशेष अंक में आज


विदुषी गिरिजा देवी को भावपूर्ण स्वरांजलि

“बाबुल मोरा नैहर छूटल जाए...”

याल, ठुमरी, चैती, कजरी आदि की अप्रतिम गायिका विदुषी गिरिजा देवी का गत 24 अक्टूबर, मंगलवार को कोलकाता के एक निजी चिकित्सालय में निधन हो गया। वे 88 वर्ष की थी। पिछले कुछ दिनो से वे अस्वस्थ थी। उनके निधन से पूरब अंग ठुमरी का एक महत्वपूर्ण स्थान रिक्त हो गया। उप-शास्त्रीय संगीत को वर्तमान में संगीत के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कराने में विदुषी गिरिजा देवी के योगदान को सदियों तक स्मरण किया जाता रहेगा। आयु के नौवें दशक में भी सक्रिय गिरिजा देवी का जन्म 8 मई, 1929 को कला और संस्कृति की राजधानी वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में हुआ था। पिता रामदेव राय जमींदार थे और संगीत से उनका विशेष लगाव था। मात्र पाँच वर्ष की गिरिजा के लिए उन्होने संगीत-शिक्षा की व्यवस्था कर दी थी। एक साक्षात्कार में गिरिजा देवी ने स्वीकार किया है कि उनके प्रथम गुरु उनके पिता ही थे। गिरिजा देवी के प्रारम्भिक संगीत-गुरु पण्डित सरयूप्रसाद मिश्र थे। नौ वर्ष की आयु में पण्डित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त की। नौ वर्ष की आयु में ही एक हिन्दी फिल्म ‘याद रहे’ में गिरिजा देवी ने अभिनय भी किया था। गिरिजा देवी का विवाह 1946 में एक व्यवसायी परिवार में हुआ था। उनके पति मधुसूदन जैन भी संगीत और काव्य-प्रेमी थे। उन्होने गिरिजा देवी की कला को सदा प्रोत्साहित किया। उन दिनों कुलीन विवाहिता स्त्रियों द्वारा मंच प्रदर्शन अच्छा नहीं माना जाता था। परन्तु सृजनात्मक प्रतिभा का प्रवाह भला कौन रोक सका है? 1949 में गिरिजा देवी ने अपना पहला प्रदर्शन इलाहाबाद के आकाशवाणी केन्द्र से दिया। यह देश की स्वतंत्रता के तत्काल बाद का उन्मुक्त परिवेश था, जिसमें अनेक रूढ़ियाँ टूट रहीं थीं। संगीत के क्षेत्र में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने स्वतंत्रता से पहले ही भारतीय संगीत को जनमानस में प्रतिष्ठित करने का जो अभियान छेड़ा था, उसका सार्थक परिणाम आज़ादी के बाद नज़र आने लगा था। गिरिजा देवी को भी अपने युग की रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। 1949 में रेडियो से अपने गायन का प्रदर्शन करने के बाद गिरिजा देवी ने 1951 में बिहार के आरा में आयोजित एक संगीत सम्मेलन में अपना गायन प्रस्तुत किया। इसके बाद गिरिजा देवी की अनवरत संगीत-यात्रा जो आरम्भ हुई, वह आज तक जारी है। गिरिजा देवी ने स्वयं को केवल मंच-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि संगीत के शैक्षणिक और शोध कार्यों में भी अपना योगदान किया। 80 के दशक में उन्हें कोलकाता स्थित आई.टी.सी. संगीत रिसर्च अकादमी ने आमंत्रित किया। वहाँ रह कर उन्होने न केवल कई योग्य शिष्य तैयार किये, बल्कि शोधकार्य भी कराये। इसी प्रकार 90 के दशक में गिरिजा देवी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ीं और अनेक विद्यार्थियों को प्राचीन संगीत परम्परा की दीक्षा दी। गिरिजा देवी को 1972 में ‘पद्मश्री’, 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1999 में ‘पद्मभूषण’ और 2010 में संगीत नाटक अकादमी का फेलोशिप जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किये गए। गिरिजा देवी आधुनिक और स्वतन्त्रता से पूर्व काल के संगीत की विशेषज्ञ और संवाहिका रही हैं। ऐसी विदुषी को सभी संगीत-प्रेमियों की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हम आपको उन्हीं के स्वरों में पहले एक चैती गीत और फिर नवाब वाजिद अली शाह की एक ठुमरी राग भैरवी में पिरोयी हुई सुनवा रहे हैं। चैती गीत की भाव-भूमि लोक जीवन से प्रेरित है, किन्तु प्रस्तुति ठुमरी अंग से की गई है। आप उनकी स्मृतियों को नमन करते हुए यह चैती गीत ठुमरी सुनिए।

चैती गीत : ‘चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा...’ : स्वर - विदुषी गिरिजा देवी



ठुमरी भैरवी : "बाबुल मोरा नैहर छूटल जाए..." : स्वर - विदुषी गिरिजा देवी



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, August 27, 2017

उपशास्त्रीय कजरी : SWARGOSHTHI – 332 : KAJARI SONGS



स्वरगोष्ठी – 332 में आज

पावस ऋतु के राग – 7 : कजरी गीतों का उपशास्त्रीय स्वरूप

पण्डित बड़े रामदास की कजरी रचना को चार प्रख्यात कलासाधकों से सुनिए




पण्डित  बड़े  रामदास  मिश्र
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज हम आपसे कजरी गायन शैली पर चर्चा करेंगे। कजरी अथवा कजली मूलतः लोक संगीत की विधा है, किन्तु इसके कुछ विशेष गुणों के कारण यह उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी यह प्रतिष्ठित हुई। आज के अंक में हम कजरी गीतों के उपशास्त्रीय रूप की चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपके लिए काशी के मूर्धन्य विद्वान बड़े रामदास की एक कजरी रचना को विदुषी गिरिजा देवी, पण्डित रवि किचलू, पण्डित छन्नूलाल मिश्र और पण्डित विद्याधर मिश्र जैसे सुप्रसिद्ध गायक कलाकारों के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे।


(बाएँ से) विदुषी गिरिजा देवी, पं.रवि किचालू, पं.छन्नूलाल मिश्र और पं.विद्याधर मिश्र

कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित रवि किचलू
कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : पण्डित छन्नूलाल मिश्र
कजरी : ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ : पण्डित विद्याधर मिश्र




संगीत पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 332वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक वाद्यसंगीत की धुन का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह कौन सा संगीत-वाद्य है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल अथवा तालों के नाम बताइए।

3 – इस वाद्य-संगीत को किस सुविख्यात वादक ने बजाया है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 2 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 334वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 330वीं कड़ी की पहेली में हमने आपसे 1976 में प्रदर्शित फिल्म “शक” से राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – जयन्त मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – आशा भोसले

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” जारी है। इस श्रृंखला में ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया जा रहा है। आज की इस कड़ी में हमने आपके लिए कजरी गीत का उपशास्त्रीय स्वरूप से साक्षात्कार कराया और बनारस संगीत घराने के सुप्रसिद्ध विद्वान बड़े रामदास महाराज की एक कजरी रचना को चार सुविख्यात कलासाधकों के स्वरों में प्रस्तुत किया। आगामी अंक में भी हम वर्षा ऋतु में गायी जाने वाली इस विशेष संगीत शैली पर चर्चा करेंगे और इस संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी जारी श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, April 16, 2017

चैत्र की चैती : SWARGOSHTHI – 313 : CHAITRA KI CHAITI




स्वरगोष्ठी – 313 में आज

फागुन के रंग – 5 : चैती गीतों का लालित्य

विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में सुनिए – “चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा, पिया घर लइहें...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखला “फागुन के रंग” की पाँचवीं और समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम आपसे फाल्गुनी संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ऋतु के अनुकूल गायन-वादन का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। इस ऋतु में राग बसन्त और राग बहार आदि का गायन-वादन किया जाता है। होलिका दहन के साथ ही रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। पिछले दिनों हमने हर्षोल्लास से होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों का पर्व मनाया था। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। अब तो चैत्र, शुक्ल प्रतिपदा अर्थात भारतीय नववर्ष और नवरात्रि का पर्व भी हम माना चुके हैं। इस परिवेश में लोक और उप-शास्त्रीय शैली में चैती गीतों का गायन किया जाता है। पिछले अंक में हमने धमार गीतों में होली की चर्चा की थी। आज के अंक में हम चैती गीतों की चर्चा करेंगे। आज हम विदुषी गिरिजा देवी और विदुषी निर्मला देवी के स्वरों में उपशास्त्रीय चैती और पार्श्वगायक मुकेश की आवाज़ में एक फिल्मी चैती प्रस्तुत कर रहे हैं।



ज हम आपसे संगीत की एक ऐसी शैली पर चर्चा करेंगे जो मूलतः ऋतु प्रधान लोक संगीत की शैली है, किन्तु अपनी सांगीतिक गुणबत्ता के कारण इस शैली को उपशास्त्रीय मंचों पर भी अपार लोकप्रियता प्राप्त है। भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत के रूप में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र मास से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में चैती गीतों का गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मन्दिरों में चैती के स्वर गूँजने लगते हैं। उत्तर भारत में इस गीत के प्रकारों को चैती, चैता और घाटो के नाम से जाना जाता है। चैती गीतों की प्रकृति-प्रेरित धुनें, इनका श्रृंगार रस से ओतप्रोत साहित्य और चाँचर ताल के स्पन्दन में निबद्ध होने के कारण यह लोक गायकों के साथ-साथ उपशास्त्रीय गायक-वादकों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है।

गिरिजा देवी
चैती गीतों का मूल स्रोत लोक संगीत ही है, किन्तु स्वर, लय और ताल की कुछ विशेषताओं के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी बेहद लोकप्रिय है। इन गीतों के वर्ण्य विषय में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग, दोनों पक्ष प्रमुख होते हैं। अनेक चैती गीतों में भक्ति रस की प्रधानता होती है। चैत्र मास की नौमी तिथि को राम-जन्म का पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही बासन्ती नवरात्र के पहले दिन अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भारतीय पंचांग के नए वर्ष का आरम्भ भी होता है। इसलिए चैती गीतों में रामजन्म, राम की बाल लीला, शक्ति-स्वरूपा देवी दुर्गा तथा नए संवत् के आरम्भ का उल्लास भी होता है। इन गीतों को जब महिला या पुरुष एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है, परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है। इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं। 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी भिन्न हो जाती है। इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं। कभी-कभी गायकों को दो दलों में बाँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में भी इन गीतों को प्रस्तुत किया जाता है, जिसे ‘चैता दंगल' कहा जाता है। आइए, सबसे पहले चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप पर एक दृष्टिपात करते है। सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी एक चर्चित चैती से हम आज की इस संगीत सभा का शुभारम्भ करते हैं। यह श्रृंगार रस प्रधान चैती है जिसमें नायिका परदेश गए नायक के वापस घर लौटने की प्रतीक्षा करती है। इस चैती की भाव-भूमि तो लोक जीवन से प्रेरित है, किन्तु प्रस्तुति ठुमरी अंग से की गई है।

चैती गीत : ‘चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा...’ : विदुषी गिरिजा देवी और साथी



निर्मला  देवी
यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि ‘लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है।‘ श्लोक का अर्थ है कि ‘इस चर-अचर की दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं।‘ चैती गीतों के लोक-रंजक-स्वरुप तथा स्वर और ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उपशास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका। लोक परम्परा में चैती 14 मात्रा के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा ताल का प्रयोग होता है। पूरब अंग के बोल-बनाव की ठुमरी भी 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है। सम्भवतः चैती के इन्हीं गुणों ने ही उपशास्त्रीय गायक-वादकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा| आइए अब हम आपको एक ऐसी चैती सुनवाते हैं, जिसे अपने समय की सुप्रसिद्ध उपशास्त्रीय गायिका निर्मला देवी ने स्वर दिया है। निर्मला देवी ने उपशास्त्रीय मंचों पर ही नहीं बल्कि फिल्मी पार्श्वगायन के क्षेत्र में भी खूब यश प्राप्त किया था। आज के विख्यात फिल्म अभिनेता गोविन्दा, गायिका निर्मला देवी आहूजा के सुपुत्र हैं। उनकी गायी इस चैती में आपको लोक और शास्त्रीय, दोनों रंग की अनुभूति होगी।

चैती गीत : ‘यही ठइयाँ मोतिया हेरा गइल रामा...’ : गायिका निर्मला देवी



मुकेश
चैती गीतों की प्रचलित धुनों का जब सांगीतिक विश्लेषण किया जाता है तो हमे स्पष्ट अनुभव होता है कि प्राचीन चैती की धुन और राग बिलावल के स्वरों में पर्याप्त समानता है। आजकल गायी जाने वाली चैती में तीव्र मध्यम के प्रयोग की अधिकता के कारण यह राग यमनी बिलावल की अनुभूति कराता है। उपशास्त्रीय स्वरूप में चैती का गायन प्रायः राग तिलक कामोद के स्वरों में भी किया जाता है। परम्परागत लोक-संगीत के रूप में चैती गीतों का गायन चाँचर ताल में होता है, जबकि पूरब अंग की अधिकतर ठुमरियाँ 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती हैं। दोनों तालों की मात्राओं में समानता के कारण भी चैती गीत लोक और उपशास्त्रीय, दोनों स्वरूपों में लोकप्रिय है। भारतीय फिल्मों में चैती धुन का प्रयोग तो कई गीतों में किया गया है, किन्तु धुन के साथ-साथ ऋतु के अनुकूल साहित्य का प्रयोग कुछ गिनीचुनी फिल्मी गीतों में मिलता है। 1963 में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के बहुचर्चित उपन्यास ‘गोदान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इस फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर थे, जिन्होंने फिल्म के गीतों को पूर्वी भारत की लोकधुनों में निबद्ध किया था। लोकगीतों के विशेषज्ञ गीतकार अनजान ने फिल्म के कथानक, परिवेश और चरित्रों के अनुरूप गीतों की रचना की थी। इन्हीं गीतों में एक चैती गीत भी था, जिसे मुकेश के स्वर में रिकार्ड किया गया था। गीत के बोल हैं- ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा…’। इस गीत में आपको चैती गीतों के समस्त लक्षण परिलक्षित होंगे। इस गीत में राग तिलक कामोद का आधार और दीपचन्दी ताल का स्पन्दन भी मिलेगा। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में हम एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे।

चैती गीत : ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा...’ : मुकेश : फिल्म – गोदान



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 313वें अंक की पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 22 अप्रैल, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 315वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 311वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको ध्रुपद गायक पण्डित आशीष सांकृत्यायन के स्वर में धमार गायकी का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – मिश्र खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – धमार (14 मात्रा) और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, शैली – धमार

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर देकर इस सप्ताह विजयी हुए हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला ‘फागुन के रंग’ का यह समापन अंक था। इस अंक में हमने आपके लिए चैती गीतों का एक खूबसूरत गुलदस्ता प्रस्तुत किया। श्रृंखला में हमने आपसे बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा की। आगामी अंक में हम संगीत जगत की एक महान विदुषी श्रीमती किशोरी अमोनकर को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। इसके उपरान्त आगामी 30 अप्रैल,2017 से हम एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम फिल्म जगत के गुणी संगीतकार रोशन के राग आधारित गीतो पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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