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Sunday, April 1, 2018

राग बिलावल और बिहाग : SWARGOSHTHI – 363 : RAG BILAWAL & BIHAG




स्वरगोष्ठी – 363 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 2 : बिलावल थाट

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ से राग बिलावल और लता मंगेशकर से बिहाग पर आधारित फिल्मी गीत 





उस्ताद अब्दुल करीम खाँ
लता मंगेशकर
'रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से दूसरा थाट बिलावल है। आज के अंक में बिलावल थाट के आश्रय राग बिलावल और इस थाट के जन्य राग बिहाग पर चर्चा करेंगे।



भारतीय संगीत के रागों को उनमें लगने वाले स्वरों के अनुसार वर्गीकृत करने की प्रणाली को थाट कहा जाता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने कुल दस थाट के अन्तर्गत सभी रागों का वर्गीकरण किया था। उन्होने थाट के कुछ लक्षण बताए हैं। किसी भी थाट में कम से कम सात स्वरों का प्रयोग ज़रूरी है। थाट में ये सात स्वर स्वाभाविक क्रम में रहने चाहिये। अर्थात सा के बाद रे, रे के बाद ग आदि। थाट को गाया-बजाया नहीं जा सकता। इसके स्वरों के अनुकूल किसी राग की रचना की जा सकती है, जिसे गाया बजाया जा सकता है। एक थाट से कई रागों की रचना हो सकती है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने आपको ‘कल्याण’ थाट का परिचय दिया था। आज का दूसरा थाट है- ‘बिलावल’। इस थाट में प्रयोग होने वाले स्वर हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि अर्थात सभी शुद्ध स्वर का प्रयोग होता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे कृत ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ (भाग-1) के अनुसार ‘बिलावल’ थाट का आश्रय राग ‘बिलावल’ ही है। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले अन्य प्रमुख राग हैं- अल्हैया बिलावल, बिहाग, देशकार, हेमकल्याण, दुर्गा, शंकरा, पहाड़ी, भिन्न षडज, हंसध्वनि, माँड़ आदि।

अब हम आपको राग ‘बिलावल’ पर आधारित एक खयाल रचना सुनवाते हैं। यह रचना एक ऐसे महान संगीतज्ञ की आवाज़ में है, जो उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। किराना घराने के इस महान कलासाधक को हम उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के नाम से जानते हैं। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। सुप्रसिद्ध गायिका रोशन आरा बेग़म सबसे छोटे भाई अब्दुल हक़ की सुपुत्री थीं। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत की सभाओं गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। आइए, खाँ साहब की आवाज़ में सुनते हैं, राग बिलावल की एक दुर्लभ रिकार्डिंग।

राग बिलावल : ‘चारा नज़र नहीं आवे...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ


बिलावल थाट के अन्तर्गत आने वाले रागों में एक प्रमुख राग बिहाग भी है, जिसमे सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। बिहाग, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग बिहाग के आरोह के स्वर हैं- सा, ग, म, प, नि, सां और अवरोह के स्वर हैं- सां, नि, ध, प, म, ग, रे, सा। यह राग रात्रि के दूसरे प्रहर में गाया-बजाया जाता है। अब हम आपको राग बिहाग में पिरोया एक आकर्षक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1959 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से लिया है। भरत व्यास के लिखे गीत को संगीतकार बसन्त देसाई ने राग बिहाग के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। गीत के बोल हैं- ‘तेरे सुर और मेरे गीत, दोनों मिल कर बनेगे प्रीत...’ जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बिहाग : ‘तेरे सुर और मेरे गीत...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गूँज उठी शहनाई


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 363वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 7 अप्रैल 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 365वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 361वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “संजोग” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – कल्याण अथवा यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, धनबाद, झारखण्ड से जॉय शंकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की दूसरी कड़ी में आपने बिलावल थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग बिलावल में पिरोया एक खयाल सुविख्यात गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही बिलावल थाट के जन्य राग बिहाग पर आधारित एक फिल्मी गीत पार्श्वगायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


Sunday, February 25, 2018

राग चन्द्रकौंस : SWARGOSHTHI – 358 : RAG CHANDRAKAUNS




स्वरगोष्ठी – 358 में आज


पाँच स्वर के राग – 6 : “सन सनन सनन जा री ओ पवन…”


प्रभा अत्रे से राग चन्द्रकौंस की बन्दिश और लता मंगेशकर से फिल्म का गीत सुनिए




डॉ. प्रभा अत्रे
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की छठी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग चन्द्रकौंस का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात गायिका विदुषी प्रभा अत्रे के स्वरों में राग चन्द्रकौंस की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग चन्द्रकौंस के स्वरों का फिल्मी गीतों में बहुत कम उपयोग किया गया है। राग चन्द्रकौंस के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” से वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया एक गीत –“सन सनन सनन जा री ओ पवन…”, लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



आज का राग “चन्द्रकौंस” है। इस राग में हम आपको दो रचनाएँ सुनवाएँगे। सबसे पहले आप 1961 में प्रदर्शित “सम्पूर्ण रामायण” फिल्म से राग चन्द्रकौंस पर आधारित एक मोहक गीत सुनेंगे। गीतकार भरत व्यास का लिखा और संगीतकार वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया यह गीत है। फिल्मी गीतों में रागों का प्रयोग और इस मामले में कभी भी समझौता न करने में संगीतकर वसन्त देसाई अग्रणी थे। फिल्म संगीत की बदलती प्रवृत्तियों के बावजूद उन्होने अपने शुरुआती दौर से लेकर वर्ष 1975 तक अपनी अन्तिम फिल्म “शक” तक अपने संगीत में रागों का साथ नहीं छोड़ा। इस प्रतिबद्धता के कारण लोकप्रियता को एक कसौटी के र्रोप में बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा गया और यही कारण है कि उनके लोकप्रिय गीतों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। आज का गीत लता मंगेशकर का गाया हुआ है। परन्तु वसन्त देसाई कभी भी लता मंगेशकर पर आश्रित नहीं थे। लता मंगेशकर के बिना भी उनके राग आधारित संगीत के बल पर आठवें दशक की फिल्म “गुड्डी” का गीत –“बोले रे पपीहरा...” वाणी जयराम के स्वर में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। ऐसे ही सिद्धान्तवादी, स्वाभिमानी और आत्मविश्वास से परिपूर्ण संगीतकार वसन्त देसाई द्वारा स्वरबद्ध राग चन्द्रकौंस पर आधारित गीत –“सन सनन सनन जा री ओ पवन...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनिए।

राग चन्द्रकौंस : “सन सनन सनन जा री ओ पवन...” : लता मंगेशकर : फिल्म – सम्पूर्ण रामायण



रे प वर्जित, कोमल ग नि, औड़व कर विस्तार,
म स वादी-संवादी सों, चन्द्रकौंस तैयार।
राग चन्द्रकौंस को भैरवी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर कोमल लगाए जाते हैं। ऋषभ और पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। केवल पाँच स्वर का राग होने से इस राग की जाति औड़व-औड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग चन्द्रकौंस का गायन-वादन मध्यरात्रि के समय सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। राग मधुवन्ती की तरह यह भी आधुनिक राग है जिसकी रचना राग मालकौंस के कोमल निषाद को शुद्ध निषाद में परिवर्तित करने से हुई है। यह राग भैरवी थाट के अन्तर्गत माना जाता है, किन्तु सत्य तो यह है की राग चन्द्रकौंस पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित दस थाट में से किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आता। उच्चस्तर के कई राग हैं, जैसे अहीर भैरव, आनन्द भैरव, मधुवन्ती, चन्द्रकौंस आदि, जो दस थाट में से किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आते। राग चन्द्रकौंस तीनों सप्तकों में समान रूप से प्रयोग किया जाता है और तीनों सप्तकों में खिलता है। इस राग में विलम्बित व द्रुत खयाल, तराना आदि गाया जाता है, किन्तु ठुमरी नहीं गायी जाती। इस राग को गाते-बजाते समय बीच-बीच में शुद्ध निषाद प्रयोग करने की आवश्यकता होती है, इससे एक ओर राग चन्द्रकौंस के स्वरूप की स्थापना होती है तो दूसरी ओर राग मालकौंस से बचाव भी होता रहता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी प्रभा अत्रे के स्वर में भक्तिरस से परिपूर्ण एक खयाल रचना। यह रचना एकताल में निबद्ध है। आप इस खयाल रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग चन्द्रकौंस : “सगुण स्वरूप नन्दलाल...” : डॉ. प्रभा अत्रे


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 358वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 3 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 360वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 356वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – वृन्दावनी सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल व कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले और मुहम्मद रफी

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में आपने राग चन्द्रकौंस का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में राग चन्द्रकौंस के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन किया था। साथ ही आपने फिल्म “सम्पूर्ण रामायण” से राग चन्द्रकौंस के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में सुना। पिछले अंक में संगीतकार चाँद परदेशी का चित्र हम सबके लिए उपलब्ध कराने वाले पाठक बीकानेर, राजस्थान के लक्ष्मीनारायण सोनी अब हमारे नियमित पाठक बन गए हैं। हमें विश्वास है कि श्री सोनी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, August 20, 2017

राग जयन्त मल्हार : SWARGOSHTHI – 331 : RAG JAYANT MALHAR





स्वरगोष्ठी – 331 में आज

पावस ऋतु के राग – 6 : राग जयन्त मल्हार

पण्डित विनायक राव पटवर्धन और आशा भोसले से राग जयन्त मल्हार की रचनाएँ सुनिए





विनायक राव  पटवर्धन
आशा भोसले
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की छठी कड़ी में हम मल्हार अंग के राग जयन्त मल्हार पर चर्चा करेंगे। यह राग जयजयवन्ती और मल्हार अंग के मेल से बनता है। वैसे राग जयजयवन्ती स्वतंत्र रूप से भी वर्षा ऋतु के परिवेश को रचने में समर्थ है। परन्तु जब राग जयजयवन्ती के साथ मल्हार अंग का मेल हो जाता है तब इस राग से अनुभूति और अधिक मुखर हो जाती है। आज हम आपको राग जयन्त मल्हार पर आधारित एक मोहक फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं। गायिका आशा भोसले की आवाज़ में यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है। इसके साथ ही राग जयन्त मल्हार का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक और शिक्षक पण्डित विनायक राव पटवर्धन के स्वर में एक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं।

राग जयन्त मल्हार : ‘मेहा बरसने लगा है आज...’ : आशा भोसले : फिल्म – शक
राग जयन्त मल्हार : ‘ऋतु आई सावन की...’ : पण्डित विनायक राव पटवर्धन




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 331वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्षा ऋतु में प्रचलित एक विशेष गायन शैली के लोकप्रिय गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह वर्षा-ऋतु में गायी जाने वाली कौन सी संगीत शैली है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस सुविख्यात गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 26 अगस्त, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 333वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 329वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1979 में प्रदर्शित फिल्म “मीरा” से राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – मीरा मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा / तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – वाणी जयराम

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में हमारी एक नई प्रतिभागी, लखनऊ से मीरा पन्त, भी विजेता हैं। हम उनका हार्दिक स्वागत करता हैं। पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” जारी है। इस श्रृंखला में ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया जा रहा है। आज की इस कड़ी में हमने आपके लिए राग जयन्त मल्हार पर चर्चा की। आगामी अंक में हम वर्षा ऋतु में गायी जाने वाली एक विशेष संगीत शैली पर चर्चा करेंगे और इस संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी जारी श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, March 5, 2017

मध्यरात्रि बाद के राग : SWARGOSHTHI – 307 : RAGAS AFTER MIDNIGHT





स्वरगोष्ठी – 307 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 7 : रात के तीसरे प्रहर के राग

राग मालकौंस - “नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला – “राग और गाने-बजाने का समय” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं अथवा प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों के प्रयोग का एक निर्धारित समय होता है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग मालकौंस की मध्यलय की एक खयाल रचना सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से इसी प्रहर के राग अड़ाना पर आधारित एक गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



भारतीय संगीत के रागों का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ नियम बनाए हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हमने कुछ नियमों का उल्लेख किया था। आज हम आपसे ऋषभ और गान्धार स्वरों के आधार पर रागों के समय निर्धारण की प्रक्रिया पर बात करेंगे और सातवें प्रहर अर्थात रात के तीसरे प्रहर के कुछ रागों की रचनाएँ भी सुनवाएँगे। ऋषभ और गान्धार स्वरों वाले रागों के तीन वर्ग होते हैं। प्रथम वर्ग के रागों में कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर उपस्थित होते हैं। इस वर्ग के रागों का गायन-वादन दिन और रात के अन्तिम प्रहर में किया जाता है। इस वर्ग के राग भैरव, पूर्वी और मारवा थाट के अन्तर्गत आते हैं। दूसरे वर्ग के रागों में शुद्ध ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर होते हैं। इस वर्ग के रागों के गायन-वादन प्रथम प्रहर में किया जाता है। बिलावल, खमाज और कल्याण थाट के राग इसी श्रेणी में आते हैं। तीसरा वर्ग कोमल गान्धार स्वर का होता है। इस वर्ग के राग दूसरे, तीसरे और चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाते हैं। तीसरे वर्ग में काफी, आसावरी, भैरवी तोड़ी थाट के सभी राग आते हैं। इस कड़ी में हम रात्रि के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। तीसरे प्रहर के दो प्रमुख राग, मालकौंस और अड़ाना में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल होते हैं। भैरवी थाट का एक प्रमुख राग मालकौस है। राग मालकौंस औडव-औडव जाति का राग है, अर्थात आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग मालकौंस में ऋषभ और पंचम स्वरों का प्रयोग नहीं होता। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग के आरोह में नि(कोमल) सा (कोमल) म (कोमल) नि(कोमल) सां और अवरोह में सां नि(कोमल) (कोमल) म (कोमल) म (कोमल) सा स्वर लगते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप किया जाता है। गम्भीर और शान्त प्रकृति का राग होने के कारण यह मींड़ प्रधान होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में इस राग का सौन्दर्य खूब निखर उठता है।

विदुषी अश्विनी  भिड़े  देशपांडे 
अब हम आपको राग मालकौंस के मध्यलय में खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे। डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया था। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग मालकौंस का एक मध्यलय खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।

राग मालकौंस : “नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...” : डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे


रात्रि के तीसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- आनन्द भैरवी, शहाना, धवलश्री, मधुकंस, मंजरी, यशरंजनी, नागनंदिनी, नवरसकान्हड़ा, नायकी, बागेश्रीकान्हड़ा, मियाँकान्हड़ा, नन्दकौंस, अड़ाना आदि। अब हम आपको राग अड़ाना में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। राग अड़ाना, आसावरी थाट का राग है। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है, जिसमें कोमल गान्धार और कोमल धैवत तथा दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध धैवत का प्रयोग वर्जित होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने वाले राग अड़ाना का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है।

उस्ताद अमीर  खाँ 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष को निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और सन्तूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था। संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा का सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म झनक झनक पायल बाजे : उस्ताद अमीर खाँ और साथी


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 307वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छठे दशक की फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के प्रथम सत्र की पहेली-श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायक और गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 11 मार्च, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 309वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 305 की संगीत पहेली में हमने 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘सीमा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयजयवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल एकताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर। इस बार की पहेली में हमारे एक नये पाठक आशीष पँवार शामिल हुए हैं। आशीष जी का हार्दिक स्वागत है। उन्होने तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर दिये है। इनके अलावा हमारी नियमित प्रतिभागी पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का यह सातवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के अन्तिम प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 7, 2017

चित्रकथा - 1: उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ का हिन्दी फ़िल्म-संगीत में योगदान


अंक - 1

उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ का हिन्दी फ़िल्म-संगीत में योगदान

“मधुबन में राधिका नाची रे...”



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

4 जनवरी 2017 को सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद अब्दुल हालीम जाफ़र ख़ाँ साहब के निधन से भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत का एक उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया। पद्मभूषण, पद्मश्री, और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का शास्त्रीय-संगीत जगत के साथ-साथ फ़िल्म-संगीत जगत में भी योगदान स्मरणीय है। आइए आज ’चित्रकथा’ के माध्यम से याद करें कुछ ऐसे प्रसिद्ध गीतों को जिन्हें ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगा दिए।





"बहुत गुणी सितार वादक उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का आज देहान्त हुआ। मुझे बहुत दुख हुआ, हमने साथ में बहुत काम किया है। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे! मेरी उनको भावभीनी श्रद्धांजली।"
-- लता मंगेशकर
4 जनवरी 2017


भारतीय सिने संगीत को समृद्ध करने में जितना योगदान संगीतकारों, गीतकारों और गायक-
गायिकाओं का रहा है, उतना ही अमूल्य योगदान रहा है शास्त्रीय संगीत के महान कलाकारों का, जिन्होंने अपने संगीत ज्ञान और असामान्य कौशल से बहुत से फ़िल्मी गीतों को बुलन्दी प्रदान किए हैं, जो अच्छे संगीत रसिकों के लिए किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं। उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ के निधन से सितार जगत का एक चमकता सितारा डूब गया। अब्दुल हलीम साहब का जन्म इन्दौर के पास जावरा ग्राम में सन् 1929 में हुआ था। कुछ समय बाद इनका परिवार बम्बई स्थानान्तरित हो गया। अब्दुल हलीम के पिता उस्ताद जाफ़र खाँ भी सितार के अच्छे ज्ञाता थे। बचपन से ही सांगीतिक वातावरण मिलने के कारण हलीम साहब का संगीत के प्रति लगाव हो जाना स्वाभाविक था। उनकी प्रारंभिक सितार-शिक्षा प्रसिद्ध बीनकार उस्ताद बाबू खाँ से शुरू हुई। उसके बाद उस्ताद महबूब खाँ साहब से सितार की उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्त की। अच्छी शिक्षा और अपने आप में लगन, धैर्य और समर्पण से उन्होंने जल्दी ही अपनी कला में पूरी दक्षता प्राप्त कर ली।

फ़िल्मों में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब का प्रवेश उनकी इच्छा नहीं बल्कि उनकी ज़रूरत थी। पिता की मृत्यु के कारण उनके सामने आर्थिक समस्या आन पड़ी, और घर का चुल्हा जलता रहे, इस उद्येश्य से उन्हें फ़िल्म जगत में जाना ही पड़ा। कलाकार में कला हो तो वो किसी भी क्षेत्र में कामयाब होता है। हलीम साहब को फ़िल्म-संगीत में कामयाबी मिली और पूरे देश में लोग उन्हें जानने लगे, फ़िल्मी गीतों में उनके बजाए सितार के टुकड़ों को सुन कर भाव-विभोर होने लगे। कहा जाता है कि फ़िल्मों में उन्हें लाने का श्रेय संगीतकार ख़्वाजा ख़ुरशीद अनवर को जाता है जिन्होंने 1947 की फ़िल्म ’परवाना’ के गीतों में उन्हें सितार के टुकड़े बजाने का मौका दिया। यह फ़िल्म पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुन्दन लाल सहगल की अन्तिम फ़िल्म थी। सहगल साहब की आवाज़ में "मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पायी जाती है" और "टूट गए सब सपने मेरे" गीतों और इस फ़िल्म के कुछ और गीतों में हलीम साहब का सितार सुनाई दिया।

1952 में ख़्वाजा ख़ुरशीद अनवर के पाक़िस्तान स्थानान्तरित हो जाने के बाद हलीम साहब और
संगीतकार वसन्त देसाई ने साथ में ’राजकमल कलामन्दिर’ के लिए काफ़ी काम किया। मधुरा पंडित जसराज की पुस्तक ’V. Shantaram - The Man who changed Indian Cinema' में हलीम जाफ़र ख़ान को फ़िल्मों में लाने का श्रेय संगीतकार वसन्त देसाई को दिया है। इस पुस्तक में प्रकशित शब्दों के अनुसार - "Vasant Desai travelled across North India and familiarized himself with many folk styles of singing and music. He invited to Bombay tabla maestro Samta Prasad from Benaras, Sudarshan Dheer from Calcutta to play the Dhol, Ustad Abdul Haleem Jafar Khan, a virtuoso with the sitar, and many more musicians." 1951 में ’राजकमल’ की मराठी फ़िल्म ’अमर भोपाली’ में संगीत देकर वसन्त देसाई को काफ़ी ख्याति मिली। 1955 में शान्ताराम ने बनाई एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’झनक झनक पायल बाजे’, जिसके लिए उन्होंने पूरे देश भर में घूम-घूम कर एक से एक बेहतरीन संगीतज्ञों का चयन किया। संगीत-नृत्य प्रधान इस फ़िल्म के लिए उन्होंने शामता प्रसाद (तबला), शिव कुमार शर्मा (संतूर) और अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ (सितार) को चुना। अभिनेत्री संध्या और विख्यात नृत्यशिल्पी गोपी कृष्ण के जानदार अभिनय और नृत्यों से, शान्ताराम की प्रतिभा से तथा वसन्त देसाई व शास्त्रीय संगीत के उन महान दिग्गजों की धुनों से इस फ़िल्म ने एक इतिहास की रचना की। बताना ज़रूरी है कि केवल इस फ़िल्म के गीतों में ही नहीं बल्कि फ़िल्म के पूरे पार्श्वसंगीत में भी हलीम साहब ने सितार बजाया है।

वसन्त देसाई के यूं तो बहुत से गीतों में हलीम साहब ने सितार बजाए हैं, पर जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही वह थी 1959 की ’गूंज उठी शहनाई’। यह फ़िल्म एक शहनाई वादक के जीवन की कहानी है और इस फ़िल्म के गीतों और पार्श्वसंगीत में शहनाई बजाने वाले और कोई नहीं ख़ुद उस्ताद बिस्मिलाह ख़ाँ साहब थे। ऐसे में सितार के लिए अब्दुल हलीम साहब को लिया गया। यही नहीं इस फ़िल्म में ख़ास तौर से एक जुगलबन्दी रखी गई इन दो महान फ़नकारों की। शहनाई और सितार की ऐसी जुगलबन्दी और वह भी ऐसे दो बड़े कलाकारों की, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था किसी फ़िल्म में। यह जुगलबन्दी राग चाँदनी केदार पर आधारित थी।

संगीतकार सी. रामचन्द्र के गीतों को भी अपनी सुरीली सितार के तानों से सुसज्जित किया अब्दुल हलीम साहब ने। इसका श्रेष्ठ उदाहरण है 1953 की प्रसिद्ध फ़िल्म ’अनारकली’ के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "ये ज़िन्दगी उसी की है जो किसी का हो गया"। यह गीत लता मंगेशकर के पसन्दीदा गीतों में शामिल है। लता जी का ही चुना हुआ एक और पसन्दीदा गीत है सलिल चौधरी के संगीत में "ओ सजना बरखा बहार आई"। इस लोकप्रिय गीत में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब के सितार के कहने ही क्या! कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनमें बजने वाले म्युज़िकल पीसेस याद रह जाते हैं। और जब जब ऐसे गीतों को गाया जाता है, तो इस म्युज़िकल पीसेस को भी साथ में गुनगुनाया जाता है, वरना गीत अधूरा लगता है। इस पूरे गीत में हलीम साहब का सितार ऐसा गूंजा है कि इसके तमाम पीसेस श्रोताओं के दिल-ओ-दिमाग़ में रच बस गए हैं। ज़रा याद कीजिए लता जी के मुखड़े में "ओ सजना" गाने के बाद बजने वाले सितार के पीस को। 1960 की इस फ़िल्म ’परख’ के इस गीत के बारे में बताते हुए लता जी ने हलीम साहब को भी याद किया था - "मुझे इस गीत से प्यार है। सलिल ने बहुत सुन्दरता से इसकी धुन बनाई है और शैलेन्द्र जी के बोलों को बहुत सुन्दर तरीके से इसमे मिलाया है। बिमल रॉय का साधना पर कैमरा वर्क और बारिश का कोज़-अप अपने आप में अद्भुत है। इस गीत की मेलडी अविस्मरणीय इस कारण से भी है कि इसे अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब जैसे गुणी कलाकार ने सितार के सुन्दर संगीत से सजाया है।"

शास्त्रीय संगीत को अपने फ़िल्मी गीतों में उच्चस्तरीय जगह देने में संगीतकार नौशाद का कोई सानी
नहीं। नौशाद साहब ने भी हलीम साहब के सितार का कई महत्वपूर्ण फ़िल्मों में प्रयोग किया। ’मुग़ल-ए-आज़म’ जैसी महत्वपूर्ण फ़िल्म के समूचे पार्श्वसंगीत में सितार बजाने का दायित्व हलीम साहब को देकर के. आसिफ़ ने अपनी फ़िल्म को इज़्ज़त बख्शी। नौशाद साहब के ही शब्दों में - "उन्होंने (हलीम साहब ने) ना केवल फ़िल्म-संगीत को समृद्ध किया बल्कि मेरे गीतों को इज़्ज़त बक्शी"। 1960 की ही एक और फ़िल्म थी ’कोहिनूर’ जिसमें नौशाद का संगीत था। इस फ़िल्म का मशहूर गीत "मधुबन में राधिका नाची रे" हलीम साहब के सितार के लिए भी जाना जाता है। इस गीत से जुड़ा एक रोचक प्रसंग का उल्लेख किया जाए! नौशाद साहब के शब्दों में, "राग हमीर पर फ़िल्म ’कोहिनूर’ का एक गाना था जिसमें दिलीप साहब सितार बजाते हैं। दिलीप साहब एक दिन मुझसे कहने लगे कि यह क्या पीस बनाया है आपने, मैं फ़िल्म में कैसे अपनी उंगलियों को म्युज़िक के साथ मिला पायूंगा? मैंने कहा कि घबराइए नहीं, क्लोज़-अप वाले शॉट्स में उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ साहब की उंगलियों के क्लोज़-अप ले लेंगे, किसी को पता नहीं चलेगा। तो दिलीप साहब ने कहा कि फिर आप ऐक्टिंग् भी उन्हीं से करवा लीजिए! फिर कहने लगे कि मैं ख़ुद यह शॉट दूंगा। फिर वो ख़ुद सितार सीखने लग गए हलीम जाफ़र साहब से। वो तीन-चार महीनों तक सीखे, उन्होंने कह रखा था कि ये सब क्लोज़-अप शॉट्स बाद में फ़िल्माने के लिए। तो जिस दिन यह फ़िल्माया गया मेहबूब स्टुडियो में, शूटिंग् के बाद वो मुझसे आकर कहने लगे कि चलिए साथ में खाना खाते हैं। मैंने कहा बेहतर है। मैंने देखा कि उनके हाथ में टेप बंधा हुआ है। मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो बोले कि आप की ही वजह से यह हुआ है, इतना मुश्किल पीस दे दी आपने, उंगलियाँ कट गईं मेरी शॉट देते देते। तो साहब, ऐसे फ़नकारों की मैं क्या तारीफ़ करूँ!" तो इस तरह से हलीम साहब ने दिलीप कुमार को सितार की शिक्षा दी, और रफ़ी साहब और उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब की आवाज़ों में यह कालजयी रचना रेकॉर्ड हुई।

इन्टरनेट पर प्रकाशित कुछ सूत्रों में हलीम साहब द्वारा संगीतकार मदन मोहन के गीतों में सितार बजाए जाने की बात कही गई है जो सत्य नहीं है। मदन मोहन जी की सुपुत्री संगीता गुप्ता जी से पूछने पर पता चला कि मदन मोहन जी के गीतों में अधिकतर उस्ताद रईस ख़ाँ, उस्ताद विलायत ख़ाँ, और बाद के बरसों में शमिम अहमद ने सितार बजाए।

उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ सितार के एक किंवदन्ती हैं। उनकी मृत्यु से शास्त्रीय संगीत जगत के सितार के क्षेत्र में जो शून्य पैदा हुई है उसे भर पाना मुश्किल है। फ़िल्म-संगीत के रसिक आभारी रहेंगे हलीम साहब के जिन्होंने अपने सितार के जादू से फ़िल्मी गीतों को एक अलग ही मुकाम दी।


आपकी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, October 4, 2015

मध्यरात्रि बाद के राग : SWARGOSHTHI – 238 : RAGAS OF AFTER MIDNIGHT



स्वरगोष्ठी – 238 में आज

रागों का समय प्रबन्धन – 7 : रात के तीसरे प्रहर के राग

राग मालकौंस - “नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं अथवा प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों के प्रयोग का एक निर्धारित समय होता है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग मालकौंस की मध्यलय की एक खयाल रचना सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से इसी प्रहर के राग अड़ाना पर आधारित एक गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।


भारतीय संगीत के रागों का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ नियम बनाए हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हमने कुछ नियमों का उल्लेख किया था। आज हम आपसे ऋषभ और गान्धार स्वरों के आधार पर रागों के समय निर्धारण की प्रक्रिया पर बात करेंगे और सातवें प्रहर अर्थात रात के तीसरे प्रहर के कुछ रागों की रचनाएँ भी सुनवाएँगे। ऋषभ और गान्धार स्वरों वाले रागों के तीन वर्ग होते हैं। प्रथम वर्ग के रागों में कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर उपस्थित होते हैं। इस वर्ग के रागों का गायन-वादन दिन और रात के अन्तिम प्रहर में किया जाता है। इस वर्ग के राग भैरव, पूर्वी और मारवा थाट के अन्तर्गत आते हैं। दूसरे वर्ग के रागों में शुद्ध ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर होते हैं। इस वर्ग के रागों के गायन-वादन प्रथम प्रहर में किया जाता है। बिलावल, खमाज और कल्याण थाट के राग इसी श्रेणी में आते हैं। तीसरा वर्ग कोमल गान्धार स्वर का होता है। इस वर्ग के राग दूसरे, तीसरे और चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाते हैं। तीसरे वर्ग में काफी, आसावरी, भैरवी तोड़ी थाट के सभी राग आते हैं। इस कड़ी में हम रात्रि के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। तीसरे प्रहर के दो प्रमुख राग, मालकौंस और अड़ाना में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल होते हैं। भैरवी थाट का एक प्रमुख राग मालकौस है। राग मालकौंस औडव-औडव जाति का राग है, अर्थात आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग मालकौंस में ऋषभ और पंचम स्वरों का प्रयोग नहीं होता। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग के आरोह में निसा निसां और अवरोह में सांनिधसा स्वर लगते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप किया जाता है। गम्भीर और शान्त प्रकृति का राग होने के कारण यह मींड़ प्रधान होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में इस राग का सौन्दर्य खूब निखर उठता है। 

डॉ. अश्विनी भिड़े देशपांडे
अब हम आपको राग मालकौंस के मध्यलय में खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे। डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया था। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग मालकौंस का एक मध्यलय खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।

राग मालकौंस : “नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...” : डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे




रात्रि के तीसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- आनन्द भैरवी, शाहाना, धवलश्री, मधुकंस, मंजरी, यशरंजनी, नागनंदिनी, नवरसकान्हड़ा, नायकी, बागेश्रीकान्हड़ा, मियाँकान्हड़ा, नन्दकौंस, अड़ाना आदि। आज हम आपको राग अड़ाना में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। राग अड़ाना, आसावरी थाट का राग है। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है, जिसमें कोमल गान्धार और कोमल धैवत तथा दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध धैवत का प्रयोग वर्जित होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने वाले राग अड़ाना का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है।

उस्ताद अमीर खाँ 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष को निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और सन्तूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था। संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म झनक झनक पायल बाजे : उस्ताद अमीर खाँ और साथी




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 238वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छठे दशक की फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायक और गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 10 अक्टूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 



‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 236 की संगीत पहेली में हमने 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘सीमा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयजयवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल एकताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर। 

इस बार की पहेली में हमारे एक नये पाठक करवार, कर्नाटक से सुधीर हेगड़े शामिल हुए हैं। सुधीर जी का हार्दिक स्वागत है। उन्होने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये है। इनके अलावा हमारी नियमित प्रतिभागी जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह सातवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के अन्तिम प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




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