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Thursday, July 28, 2011

मेघा बरसने लगा है आज की रात...राग "जयन्ती मल्हार" पर आधारित एक आकर्षक गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 710/2011/150

र्षा गीतों पर आधारित श्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" की समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ| इस श्रृंखला का समापन हम राग "जयन्ती मल्हार" और इस राग पर आधारित एक आकर्षक गीत से करेंगे| परन्तु आज के राग और गीत पर चर्चा करने से पहले संगीत के रागों और फिल्म-संगीत के बारे में एक तथ्य की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है| शास्त्रीय संगीत में रागानुकुल स्वरों की शुद्धता आवश्यक होती है| परन्तु सुगम और फिल्म संगीत में रागानुकुल स्वरों की शुद्धता पर कड़े प्रतिबन्ध नहीं होते| फिल्मों के संगीतकार का ज्यादा ध्यान फिल्म के प्रसंग और चरित्र की ओर होता है| इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये गए दो गीतों को छोड़ कर शेष गीतों में एकाध स्थान पर राग के निर्धारित स्वरों में आंशिक मिलावट की गई है; इसके बावजूद राग का स्पष्ट स्वरुप इन गीतों में नज़र आता है| गीतों को चुनने में यही सावधानी बरती गई है|


आज हमारी चर्चा में राग "जयन्ती मल्हार" है| वर्षा ऋतु में गाये-बजाये जाने वाले रागों में "जयन्ती मल्हार" भी एक प्रमुख राग है| राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह "जयजयवन्ती" और "मल्हार" के मेल से बनता है| वैसे राग "जयजयवन्ती" स्वतंत्र रूप से वर्षा ऋतु के परिवेश को रचने में समर्थ है| राग "जयजयवन्ती" की विलम्बित त्रिताल की एक प्रचलित रचना के शब्दों पर ध्यान दीजिए, इससे आपको राग की क्षमता का अनुमान हो जाएगा|

दामिनि दमके, डर मोहे लागे| उमगे दल-बादल श्याम घटा|
लिख भेजो सखि, उस नंदन को, मेरी खोल किताब देखो बिथा|


"जयजयवन्ती" के साथ जब "मल्हार" का मेल हो जाता है, तब इस राग से अनुभूति और अधिक मुखर हो जाती है| राग "जयन्ती मल्हार" के पूर्वांग में "जयजयवन्ती" और उत्तरांग में "मल्हार" की प्रधानता रहती है| इस राग के आरोह-अवरोह में कोमल और शुद्ध, दोनों निषाद का प्रयोग होता है| अवरोह में कोमल और शुद्ध गान्धार का प्रयोग "मल्हार"का गुण प्रदर्शित करता है| "जयजयवन्ती" की तरह "जयन्ती मल्हार" का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है|

आज हम राग "जयन्ती मल्हार" पर आधारित एक प्यारा सा गीत, जिसे हम आपके लिए लेकर आए हैं वह 1976 में प्रदर्शित फिल्म "शक" से लिया गया है| विकास देसाई और अरुणा राजे द्वारा निर्देशित इस फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे| इस श्रृंखला में बसन्त देसाई द्वारा संगीतबद्ध किया यह तीसरा गीत है| श्रृंखला की सातवीं कड़ी में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्षाकालीन रागों पर आधारित सर्वाधिक गीत बसन्त देसाई ने ही संगीतबद्ध किया है| हालाँकि जिस दौर की यह फिल्म है, उस अवधि में बसन्त देसाई का रुझान फिल्म संगीत से हट कर शिक्षण संस्थाओं में संगीत के प्रचार-प्रसार की ओर अधिक हो गया था| फिल्म संगीत का मिजाज़ भी बदल गया था| परन्तु उन्होंने बदले हुए दौर में भी अपने संगीत में रागों का आधार नहीं छोड़ा| फिल्म "शक" बसन्त देसाई की अन्तिम फिल्म साबित हुई| फिल्म के प्रदर्शित होने से पहले एक लिफ्ट दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया| फिल्म "शक" का राग "जयन्ती मल्हार" के स्वरों पर आधारित जो गीत हम सुनवाने जा रहे हैं, उसके गीतकार हैं गुलज़ार और इस गीत को स्वर दिया है आशा भोसले ने| आइए सुनते हैं यह रसपूर्ण गीत-



इसी गीत के साथ "ओल्ड इज गोल्ड" की श्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" को यहीं विराम लेने के लिए कृष्णमोहन मिश्र को अनुमति दीजिए| इस श्रृंखला में जिन वर्षाकालीन रागों को हमने सम्मिलित किया है, उनके परिचय में सहयोग देने के लिए मैं जाने-माने "इसराज" वादक, वैदिककालीन वाद्य "मयूर वीणा" के अन्वेषक-वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र का ह्रदय से आभारी हूँ| आपको यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें अवगत अवश्य कराएँ|

क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार बसन्त देसाई ने कई वृत्तचित्रों में भी संगीत दिया था| फारेस्ट जड के चर्चित वृत्तचित्र "मानसून" में मल्हार-प्रेमी बसन्त देसाई ने संगीत देकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की थी|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - ये फिल्म एक क्लास्सिक का दर्जा रखती है हिंदी फिल्म इतिहास में.
सूत्र २ - एक मशहूर लेखक की किताब पर आधारित इस फिल्म के इस गीत को स्वर दिया था रफ़ी साहब ने.
सूत्र ३ - इस दर्द भरे गीत का पहला अंतरा शुरू होता है इस शब्द से - "प्यार"

अब बताएं -
गीतकार बताएं - २ अंक
फिल्म के निर्देशक बताएं - ३ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
कड़े मुकाबले में एक बार फिर अमित जी विजयी बनकर निकले हैं, बहुत बधाई, साथ में क्षति जी को भी बधाई जिन्होंने जम कर मुकाबला किया, इस बार की पहेली में भाग लेने के लिए सभी श्रोताओं का आभार, ये अब तक का सबसे रोचक मुकाबला रहा.

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, July 27, 2011

अंग लग जा बालमा..."मेघ मल्हार" के सुरों से वशीभूत नायिका का मनुहार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 709/2011/149

"ओल्ड इज गोल्ड" पर जारी वर्षाकालीन रागों पर आधारित गीतों की श्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार फिर उपस्थित हूँ| आज एक बार फिर हम राग "मेघ मल्हार" पर चर्चा करेंगे और उसके बाद इसी राग पर आधारित, श्रृंगार रस से सराबोर संगीतकार शंकर-जयकिशन की एक संगीत रचना का आनन्द लेंगे| श्रृंखला की पहली कड़ी में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि राग "मेघ मल्हार" एक प्राचीन राग है| संगीत शास्त्र के प्राचीन ग्रन्थों में इस राग को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है| आचार्य लोचन के ग्रन्थ "राग तरंगिणी" में रागों के वर्गीकरण के लिए जिन 12 थाटों का वर्णन है, उनमे एक थाट "मेघ" भी है| प्राचीन राग-रागिनी पद्यति में भी छह मुख्य रागों में "मेघ" भी है| पण्डित विष्णु नारायण भातखंडे द्वारा वर्गीकृत थाट व्यवस्था में यह राग काफी थाट के अन्तर्गत आता है| भातखंडे जी ने "संगीत शास्त्र" के चौथे खण्ड में लिखा है कि राग "मेघ मल्हार" उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में बहुत कम विद्वानों द्वारा प्रयोग किया जाता था, जबकि यह जटिल राग नहीं है| विदुषी शोभा राव ने अपनी पुस्तक "राग निधि" के तीसरे खण्ड में राग "मेघ" और "मेघ मल्हार" को एक ही राग का दो नाम माना है| वर्षाकालीन रागों में यह राग सबसे गम्भीर प्रकृति का होने से विरह-वेदना की अभिव्यक्ति के लिए इस राग के स्वर उपयुक्त होते हैं| कविवर बिहारी ने अपने एक दोहे में राग "मेघ मल्हार" के स्वभाव का बड़ा सटीक चित्रण किया है-

पावक झर तें मेह झर, दाहक दुसह बिसेख,
दहै देह वाके परस, याहि दृगन ही देख |


दोस्तों; बिहारी के इस दोहे की नायिका जिस प्रकार विरह की अग्नि से पीड़ित है, ठीक वैसी ही दशा आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत के नायिका की भी है| आज का गीत हमने 1970 में प्रदर्शित राज कपूर की बेहद महत्वाकांक्षी फिल्म "मेरा नाम जोकर" से लिया है| हसरत जयपुरी के शब्दों और शंकर-जयकिशन द्वारा राग "मेघ मल्हार" के स्वरों का आधार लेकर संगीतबद्ध किये गीत -"कारे कारे बदरा, सुनी सुनी रतियाँ..." को आशा भोसले ने स्वर दिया| सातवें दशक के अन्तिम वर्षों में जब फिल्म "मेरा नाम जोकर" का निर्माण हुआ था, उन दिनों फिल्म संगीत के क्षेत्र में शंकर-जयकिशन यश के शिखर पर थे| फिल्म में उन्होंने एक से एक बढ़ कर सदाबहार गीतों की रचना की थी, इसके बावजूद राज कपूर की यह भव्य परिकल्पना टिकट खिड़की पर असफल ही रही| इस गीत के अलावा फिल्म के अन्य गीतों की रचना भी स्तरीय रही| राग शिवरंजनी पर आधारित -"जाने कहाँ गए वो दिन..." और मन्ना डे की आवाज़ में गाया हुआ गीत -"ऐ भाई जरा देख के चलो..." इस फिल्म के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत थे| "जाने कहाँ गए..." गीत के लिए मन्ना डे को पहला फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ था| आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत "कारे कारे बदरा..." में वर्षा ऋतु की ध्वनियों का बड़ा प्रभावी प्रयोग किया गया है| आइए हम सब आज इसी रसपूर्ण गीत का आनन्द लेते हैं-
राग मेघ मल्हार : "कारे कारे बदरा सूनी सूनी रतियाँ..." : फिल्म - मेरा नाम जोकर



क्या आप जानते हैं...
कि फिल्म "मेरा नाम जोकर" का यह गीत आर.के. कैम्प की सर्वप्रमुख गायिका लता मंगेशकर को ही गाना था, किन्तु लता जी ने गीत के शब्दों पर आपत्ति की थी| राज कपूर ने गीत या गीत के शब्द तो नहीं बदले, हाँ; पहली बार ("आग" को छोड़ कर) अपनी फिल्म में लता जी की आवाज़ नहीं ली|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - एक सुरीले संगीतकार (इनके दो गीत पहले ही इस शृंखला में बज चुके हैं)की अंतिम फिल्म थी ये.
सूत्र २ - गायिका आशा जी हैं.
सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "रात"

अब बताएं -
गीतकार बताएं - २ अंक
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
शृंखला खतम होने की कगार पर है, और अमित जी एक अंक से आगे निकल गए हैं, देखना दिलचस्प होगा कि क्या क्षिति जी इस बार उन्हें मात दे पाती है या नहीं

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, July 26, 2011

छाई बरखा बहार...राग सूर मल्हार के स्वरों का जादू

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 708/2011/148

र्षा ऋतु के रागों पर आधारित गीतों की श्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" की आठवीं कड़ी में एक बार फिर आपका हार्दिक स्वागत है| दोस्तों; इन दिनों हम प्रकृति के रंग-रस से सराबोर ऐसे गीतों की महफ़िल सजा रहें हैं, जो शब्दों और स्वरों के माध्यम से बाहर हो रही वर्षा के साथ जुगलबन्दी कर रहें हैं| यह पावस के रागों का सामर्थ्य ही है कि इनके गायन-वादन से परिवेश आँखों के सामने उपस्थित हो जाता है| वर्षा ऋतु का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करने वाला एक और राग है- "सूर मल्हार"| आज हम आपको इसी राग का संक्षिप्त परिचय कराते हुए राग आधारित गीत भी सुनवाने जा रहें हैं|

यह मान्यता है कि राग "सूर मल्हार" के स्वरों की संरचना भक्त कवि सूरदास ने की थी| इस राग को "सूरदासी मल्हार" भी कहा जाता है| इस राग में सारंग और मल्हार का मेल होता है| काफी थाट के इस राग की गणना मल्हार रागों के अन्तर्गत ही की जाती है| यह औडव-षाडव जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों का प्रयोग होता है| आरोह में शुद्ध गन्धार और शुद्ध धैवत का प्रयोग नहीं होता, किन्तु शुद्ध निषाद का प्रयोग होता है| अवरोह शुद्ध गन्धार रहित होता है, किन्तु कोमल निषाद और धैवत का अल्प प्रयोग किया जाता है| यदि राग "देस" के आरोह-अवरोह से शुद्ध गान्धार हटा दिया जाए तो राग "सूर मल्हार" स्पष्ट परिलक्षित होने लगता है, किन्तु ऐसी स्थिति में वादी-संवादी स्वर षडज-माध्यम के स्थान पर पंचम-ऋषभ हो जाता है|

राग "सूर मल्हार" के अविष्कारक भक्त कवि सूरदास के साहित्य में वात्सल्य के साथ-साथ श्रृंगार रस का अधिकाधिक प्रयोग मिलता है| श्रृंगार के संयोग पक्ष के लिए कृष्ण का अपार सौन्दर्य-युक्त मधुर रूप और रासलीला कारक है; वहीं वियोग पक्ष की अभिव्यक्ति के लिए कृष्ण का गोकुल से मथुरा जाना कारक है| जब गोपियों की आँखों से आँसू-वर्षा हो रही है, तब सूरदास ने मल्हार का सफल प्रयोग किया| नैनों के नीर की उपमा वर्षा ऋतु से कर सूर ने अद्भुत कल्पनाशीलता का परिचय दिया है| सूर-साहित्य से लिए गये ये दो उदाहरण देखें-

सखी इन नैननि तै घन हारे |
बिनहीं रितु बरसत निसि-वासर, सदा मलिन दोउ तारे |

इन नैनन के नीर सखी री, सेज भई घर नाँव,
चाहत हौं ताही पर चढ़ीके हरिजू के ढिंग जाँव|


आइए, अब कुछ चर्चा करते हैं राग "सूर मल्हार" पर आधारित आज के गीत के बारे में| आज का गीत 1969 में प्रदर्शित फिल्म "चिराग" का है| संगीतकार मदनमोहन यूँ तो ग़ज़लों की संगीत रचना में अद्वितीय थे परन्तु उनके संगीतबद्ध राग आधारित गीत भी गुणबत्ता की दृष्टि से अत्यन्त उत्कृष्ट हैं| आरम्भिक वर्षों में मदनमोहन ने राग "भैरवी" पर आधारित कई अच्छे गीतों की रचना की थी| इसके अलावा राग "पीलू" पर आधारित गीत -"मैंने रंग ली आज चुनरिया...", राग "मिश्र खमाज" पर आधारित गीत -"खनक गयो हाय बैरी कंगना...", राग "भीमपलासी" पर आधारित श्रेष्ठतम गीत -"नैनो में बदरा छाए..." आदि कभी न भुलाए जाने वाली रचनाएँ हैं| फिल्म "चिराग" के आज के गीत -"छाई बरखा बहार..." में भी मदनमोहन ने राग "सूर मल्हार" के स्वरों का बेहद आकर्षक प्रयोग किया है| मजरुह सुल्तानपुरी के लिखे, लता मंगेशकर और साथियों द्वारा गाये इस गीत की दो और विशेषताएँ भी हैं| इस गीत में शास्त्रीयता के साथ-साथ लोकरंग की छाया भी मौजूद है| दूसरी विशेषता यह है कि गीत में "कहरवा" ताल का चटक और फैलाव लिये हुए जैसा प्रयोग है वह गीत के श्रोता को थिरकने के लिए विवश कर देने में समर्थ है| यह गीत अभिनेत्री आशा पारेख और लोक नर्तकियों के समूह पर फिल्माया गया है| फिल्म के नायक सुनील दत्त हैं| आप रिमझिम फुहारों के बीच इस गीत का आनन्द लीजिए और आज मुझे यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए|



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार मदनमोहन को पहला राष्ट्रीय पुरस्कार शास्त्रीय राग आधारित एक गीत पर ही मिला था| 1970 की फिल्म "दस्तक" के राग "चारुकेशी" की ठुमरी -"बैंया ना धरो..." की संगीत रचना के लिए उन्हें यह पुरस्कार प्रदान किया गया था|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - आशा जी का आग्रहपूर्ण स्वर है गीत में.
सूत्र २ - एक महान निर्देशक की महत्वकांक्षी फिल्म थी ये.
सूत्र ३ - पहला अंतरा शुरू होता है इस शब्द से - "आज"

अब बताएं -
गीतकार बताएं - ३ अंक
किस राग पर आधारित है ये गीत - २ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
हिन्दुस्तानी जी, वैसे तो ये जरूरी नहीं है कि रागों के नाम अमित जी या क्षिति जी को ही पता हों, पर फिर भी खास आपके लिए आज हमने राग के नाम को २ अंकों का प्रश्न बनाया है, गौर कीजिये कि पिछले कई अंकों से अमित जी राग के नाम से बचकर सेफ खेल रहे हैं, दरअसल ये शृंखला कृष्णमोहन जी खास रूप से वर्षा के रागों पर आधारित बनायीं है इसलिए वो अहम प्रश्न बनकर आता है. कल की पहेली में राग को लेकर कुछ शंकाएं थी, जिसे खुद कृष्ण मोहन जी दूर करना चाहते हैं अपने निम्न सन्देश के माध्यम से-
"सजीव जी,
फडके जी की प्रतिक्रिया को पढ़ा. उनके दिये विवरण का खण्डन या समर्थन न करते हुए केवल इतना ही कहना चाहता हूँ कि फिल्म गीतों में राग के स्वरों की शुद्धता कम ही होती है. मैंने अपने आलेख में जो सन्दर्भ सामग्री ली है उन पृष्ठों की jpg copy और उसके लिंक भेज रहा हूँ. श्री एस.एन. टाटा ने राग आधारित फ़िल्मी गीतों पर महत्वपूर्ण शोध किया है. उनके कार्य को देखते हुए उन्हें सरलता से नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता.

Raga-based Hindi Film Songs
http://www.indiapicks.com/SNT_Hindi/P-361.htm
http://www.indiapicks.com/SNT_Hindi/P-362.htm
"
चूँकि गीत का आरंभिक हिस्सा राग मल्हार (मियां की) पर है और मुख्या गाना सुर मल्हार पर, और हो सकता है कि अविनाश जी और सत्येंदर जी ने शुरू के हिस्से को सुनकर अनुमान लगाया हो, हम अविनाश जी और क्षिति जी दोनों को ही पूरे अंक देना चाहेंगें. अमित जी और सत्यजीत जी को भी बधाई.

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, July 25, 2011

झिर झिर बरसे सावनी अँखियाँ...बरसती बौछारों में तन और मन का अंतरद्वंद

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 707/2011/147

पावस ऋतु के रागों पर आधारित फिल्म-गीतों की श्रृंखला "उमड़ घुमड़ का आई रे घटा" की सातवीं कड़ी में सभी संगीतप्रेमी पाठकों-श्रोताओं का एक बार फिर; मैं कृष्णमोहन मिश्र सहर्ष अभिनन्दन करता हूँ| दोस्तों; इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी में हमने आपको राग "गौड़ मल्हार" में निबद्ध एक बन्दिश का रसास्वादन कराया था| आज पुनः हम राग "गौड़ मल्हार" की विशेषताओं और प्रवृत्ति पर चर्चा करेंगे और इस राग पर आधारित एक मधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे|

तीसरी कड़ी में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि राग "गौड़ मल्हार" की संरचना सारंग और मल्हार अंग के मेल से हुई है| श्रावण (सावन) मास में अचानक आकाश पर बादल छा जाते हैं और मल्हार अंग के स्वाभाव के अनुरूप रिमझिम फुहारें मानव-मन को तृप्त करने में संलग्न हो जातीं हैं| कुछ ही देर में आकाश मेघ रहित हो जाता है और खुला आकाश सारंग अंग के अनुकूल अनुभूति कराने लगता है| अर्थात राग "गौड़ मल्हार" में दोनों प्रवृत्तियाँ मौजूद रहतीं हैं| इस राग के थाट के बारे में विद्वानों के बीच थोड़ा मतभेद है| कुछ विद्वान इसे खमाज थाट का, तो कुछ इसे काफी थाट के अन्तर्गत मानते हैं| इलाहाबाद के वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा राग "गौड़ मल्हार" को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं| राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है| राग में शुद्ध मध्यम के साथ कोमल निषाद का प्रयोग आनन्ददायक होता है|

इस राग की एक बड़ी प्यारी सी बन्दिश है जिसे कई सुप्रसिद्ध संगीतज्ञों ने तीनताल में निबद्ध कर प्रभावी ढंग से गाया है-
आए बदरा कारे कारे, हमरे कन्त निपट भए बारे,
ऐसे समय परदेश सिधारे |
एक तो मुरला वन में पुकारे, मोहे जरी को अधिक जरावे |
है कोई ऐसो, पियु को मिलावे; उड़जा पंछी, कौन बिसारे |


राग "गौड़ मल्हार" के इस द्रुत ख़याल में जैसा भाव व्यक्त होता है; ठीक वैसा ही भाव 1968 में प्रदर्शित फिल्म "आशीर्वाद" के हिट गीत -"झिर झिर बरसे सावनी अँखियाँ..." में भी उपस्थित है| इस फिल्म के संगीतकार बसन्त देसाई द्वारा राग "वृन्दावनी सारंग" के स्वरों में संगीतबद्ध एक गीत आप इस श्रृंखला की चौथी कड़ी में सुन चुके हैं| इस श्रृंखला के लिए गीतों का चयन करते समय मेरे लिए यह आश्चर्य का विषय रहा है कि वर्षाकालीन रागों पर आधारित फ़िल्मी गीतों में सर्वाधिक संख्या बसन्त देसाई के संगीतबद्ध किये गीतों की है| वह एक ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने संगीत की गुणबत्ता से कभी समझौता नहीं किया| सातवाँ दशक फिल्म संगीत के परिवर्तन का दौर था| इस दशक के अन्तिम वर्षों में बसन्त देसाई द्वारा संगीतबद्ध दो फ़िल्में- "रामराज्य" (1967) और "आशीर्वाद" (1968) प्रदर्शित हुई थी| इन दोनों फिल्मों में बसन्त देसाई ने बदलते दौर के बावजूद न तो शास्त्रीय और लोक संगीत का आधार छोड़ा और न वर्षा ऋतु के रागों के प्रति अपने मोह का त्याग कर पाए| फिल्म "रामराज्य" का राग "सूर मल्हार" पर आधारित गीत -"डर लागे चमके बिजुरिया..." तथा फिल्म "आशीर्वाद" का राग "गौड़ मल्हार" पर आधारित गीत -"झिर झिर बरसे सावनी अँखियाँ..." अपने दशक में जितने लोकप्रिय थे उतनी ही ताजगी से भरे आज भी लगते हैं|

आज हम आपको फिल्म "आशीर्वाद" का राग "गौड़ मल्हार" पर आधारित गीत सुनवाएँगे| गीतकार गुलज़ार के शब्द कहरवा ताल में निबद्ध है और इस गीत को लता मंगेशकर ने स्वर दिया है| फिल्म के निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी और संगीतकार बसन्त देसाई ने इस गीत के फिल्मांकन में अनूठा प्रयोग किया था| फिल्म के प्रसंग के अनुसार नायिका सुमिता सान्याल बाहर हो रही बरसात में नायक संजीव कुमार की प्रतीक्षा कर रही है| वह इसी गीत का रिकार्ड सुनना आरम्भ करती है और बीच बीच में कुछ पंक्तियाँ स्वयं भी गाती है| रिकार्ड का पूरा गीत तो लता मंगेशकर की आवाज़ में है ही; नायिका द्वारा दुहराई पंक्तियाँ भी उन्हीं की आवाज़ में है; जिसे मूल गीत के साथ जोड़ा गया है| आइए सुनते हैं, श्रावण मास का यथार्थ चित्र उकेरने वाला यह गीत-



क्या आप जानते हैं...
क्या आप जानते हैं...कि फिल्म "आशीर्वाद" के एक अन्य गीत -"एक था बचपन..." को लता जी ने बसन्त देसाई की इच्छानुसार नहीं गाया| इसके बाद 1971 की फिल्म "गुड्डी" में बिलकुल नई गायिका वाणी जयराम से महत्वाकांक्षी गीत -"बोले रे पपीहरा..." गवा कर बसन्त देसाई ने अपने ढंग से उस घटना का प्रतिवाद किया| कहने की आवश्यकता नहीं कि "गुड्डी" का यह गीत मल्हार अंग के रागों पर आधारित गीतों की सूची में सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित है|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - फिल्म के नायक है सुनील दत्त.
सूत्र २ - गीत फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री और उनकी सहेलियों पर फिल्माया गया है.
सूत्र ३ - आरंभ कोरस से होता है जिसमें शब्द आता है -"अंगना"

अब बताएं -
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक
गीतकार कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी अब एक अंक से ही आगे हैं मात्र, अमित जी बढ़िया खेल रहे हैं...पंकज जी क्या बात है क्या पकड़ा है आपने :)

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, July 24, 2011

नाच मेरे मोर जरा नाच...कम चर्चित संगीतकार शान्ति कुमार देसाई की रचना

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 706/2011/146

"ओल्ड इज गोल्ड" पर जारी श्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" की छठीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः उपस्थित हूँ| आज हम आपके लिए एक बेहद मधुर राग और उतना ही मधुर गीत लेकर आए हैं| दोस्तों; आज का राग है "मियाँ की मल्हार" | इस राग पर आधारित कुछ चर्चित गीत -"बोले रे पपीहरा..." (फिल्म - गुड्डी) और -"भय भंजना वन्दना सुन हमारी..." (फिल्म - बसन्त बहार) आप "ओल्ड इज गोल्ड" की पूर्व श्रृंखलाओं में सुन चुके हैं| इसी राग पर आधारित एक और सुरीला गीत आज हम आपको सुनवाएँगे, परन्तु उससे पहले थोड़ी चर्चा राग "मियाँ की मल्हार" पर करते हैं|

राग "मियाँ की मल्हार" एक प्राचीन राग है| यह तानसेन के प्रिय रागों में से एक है| कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था| यह राग काफी थाट का और षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है| अर्थात; आरोह में छह और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं| आरोह में शुद्ध गान्धार का त्याग, अवरोह में कोमल गान्धार का प्रयोग तथा आरोह-अवरोह दोनों में शुद्ध और कोमल दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है| आरोह में शुद्ध निषाद से पहले कोमल निषाद तथा अवरोह में शुद्ध निषाद के बाद कोमल निषाद का प्रयोग होता है| राग "मियाँ की मल्हार", राग "बहार" के काफी निकट है| इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार ऐसा प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था| राग "मियाँ की मल्हार" के स्वरों में प्रकृति के मनमोहक चित्रण की तथा विरह-पीड़ा हर लेने की अद्भुत क्षमता है| महाकवि कालिदास रचित "मेघदूत" के पूर्वमेघ, नौवें श्लोक का काव्यानुवाद करते हुए हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि डा. ब्रजेन्द्र अवस्थी कहते हैं-

गिनती दिन जोहती बार जो व्याकुल अर्पित जीवन सारा लिए
प्रिया को लखोगे घन निश्चय ही गतिमुक्त अबाधित धारा लिए
सुमनों-सा मिला ललनाओं को है मन प्रीतिमरंद जो प्यारा लिए
विरहानल में जल के रहता मिलनाशा का एक सहारा लिए |


वास्तव में पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ, विरह से व्याकुल नायक- नायिकाओं की विरहाग्नि को शान्त करते हैं और मिलन की आशा जगाते हैं| वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण करने की अद्भुत क्षमता भी राग "मियाँ की मल्हार" के स्वरों में है| इस राग पर आधारित और वर्षाकालीन परिवेश का कल्पनाशील चित्रण करता आज का गीत हमने 1964 में प्रदर्शित फिल्म "तेरे द्वार खड़ा भगवान" से चुना है| इस फिल्म की संगीत रचना शान्ति कुमार देसाई नामक एक ऐसे संगीतकार ने की थी, जिनके बारे में आज की पीढ़ी प्रायः अनजान ही होगी| 1934 में चुन्नीलाल पारिख द्वारा निर्देशित फिल्म "नवभारत" से संगीतकार शान्ति कुमार देसाई का फिल्मों में पदार्पण हुआ था| उनके संगीत निर्देशन में कई देशभक्ति गीत अपने समय में बेहद लोकप्रिय हुए थे| शान्ति कुमार देसाई ने अधिकतर स्टंट और धार्मिक फिल्मों में संगीत रचनाएँ की थी| पाँचवें दशक के अन्तिम वर्षों में नई धारा के वेग में उखड़ जाने वाले संगीतकारों में श्री देसाई भी थे| लगभग एक दशक तक गुमनाम रहने के बाद 1964 में फिल्म "तेरे द्वार खड़ा भगवान" के गीतों में फिर एक बार उनकी प्रतिभा के दर्शन हुए| अभिनेता शाहू मोदक और अभिनेत्री सुलोचना अभिनीत इस फिल्म में शान्ति कुमार देसाई ने राग "मियाँ कि मल्हार" के स्वरों में बेहद कर्णप्रिय गीत -"नाच मेरे मोर जरा नाच..." की संगीत रचना की थी| वर्षाकालीन प्रकृति का मनमोहक चित्रण करते पण्डित मधुर के शब्दों को श्री देसाई ने सहज-सरल धुन में बाँधा था| पूरा गीत दादरा ताल में निबद्ध है; किन्तु अन्त में द्रुत लय के तीनताल का टुकड़ा गीत का मुख्य आकर्षण है| मींड और गमक से परिपूर्ण मन्नाडे के स्वर तथा सितार, ढोलक और बाँसुरी का प्रयोग भी गीत की गुणबत्ता को बढ़ाता है| आइए; सुनते हैं, राग "मियाँ की मल्हार" पर आधारित फिल्म "तेरे द्वार खड़ा भगवान" का यह गीत-



क्या आप जानते हैं...
कि मराठी फिल्म "रायगढ़" (१९४०) में शान्ति कुमार देसाई ने लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर के साथ संगीत निर्देशन किया था|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - फिल्म के नायक है संजीव कुमार.
सूत्र २ - लता की आवाज़ में है गीत.
सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है -"बसंती".

अब बताएं -
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक
फिल्म की नायिका कौन है - २ अंक
गीतकार कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी, अविनाश जी और हिन्दुस्तानी जी बहुत बधाई

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, July 21, 2011

राही कोई भूला हुआ, तूफानों में खोया हुआ राह पे आ जाता है...राग "देस मल्हार" के सुरों में बँधा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 705/2011/145

पावस की रिमझिम फुहारों के बीच वर्षाकालीन रागों में निबद्ध गीतों की हमारी श्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" जारी है| आज श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र पुनः आपका स्वागत करता हूँ| दोस्तों आज का राग है- "देस मल्हार"| श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने कुछ ऐसे रागों की चर्चा की थी जो मल्हार अंग के नहीं हैं इसके बावजूद उन रागों से हमें वर्षा ऋतु की सार्थक अनुभूति होती है| ऐसा ही एक राग है "देस", जिसके गायन-वादन से वर्षा ऋतु का सजीव चित्र हमारे सामने उपस्थित हो जाता है| और यदि इसमें मल्हार अंग का मेल हो जाए तो फिर 'सोने पर सुहागा' हो जाता है| आज हम आपको राग "देस मल्हार" का थोड़ा सा परिचय और फिर इसी राग पर आधारित एक मनमोहक गीत सुनवाएँगे|

राग "देस मल्हार" के नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें स्वतंत्र राग "देस" में "मल्हार" अंग का मेल होता है| राग "देस" अत्यन्त प्रचलित और सार्वकालिक होते हुए भी वर्षा ऋतु के परिवेश का चित्रण करने में समर्थ है| एक तो इस राग के स्वर संयोजन ऋतु के अनुकूल है, दूसरे इस राग में वर्षा ऋतु का चित्रण करने वाली रचनाएँ बहुत अधिक संख्या में मिलते हैं| राग "देस" औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसमे कोमल निषाद के साथ सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है| "देस मल्हार" राग में "देस" का प्रभाव अधिक होता है| दोनों का आरोह- अवरोह एक सा होता है| मल्हार अंग के चलन और म रे प, रे म, स रे स्वरों के अनेक विविधता के साथ किये जाने वाले प्रयोग से राग विशिष्ट हो जाता है| राग "देस" की तरह "देस मल्हार" में भी कोमल गान्धार का अल्प प्रयोग किया जाता है| राग का यह स्वरुप पावस के परिवेश को जीवन्त कर देता है| परिवेश-चित्रण के साथ-साथ मानव के अन्तर्मन में मिलन की आतुरता को यह राग बढ़ा देता है| कुछ ऐसे ही मनोभावों का सजीव चित्रण पूर्वांचल के एक भोजपुरी लोकगीत में किया गया है|

हरी हरी भीजे चुनर मोरी धानी, बरस रहे पानी रे हरी |
बादर गरजे चमके बिजुरिया रामा, नहीं आए सैंया मोरा तरसे उमिरिया रामा |
हरी हरी काहे करत मनमानी, बरस रहे पानी रे हरी |
बारह बरिसवा पर अईलन बनिजरवा रामा, चनन बिरिछ तले डारलन डेरवा रामा |
हरी हरी चली मिलन को दीवानी, बरस रहे पानी रे हरी |


इस लोकगीत की नायिका अपने साजन के विरह में व्याकुल है, तभी वर्षा ऋतु का आगमन हो जाता है| गरजते बादल और चमकती बिजली उसे और अधिक व्याकुल कर देते हैं| ऐसे ही मौसम में अचानक उसका साजन बारह वर्ष बाद घर आता है| बाग़ में चन्दन के वृक्ष के नीचे उसने डेरा डाल रखा है और नायिका बरसते पानी में दीवानी की भाँति मिलाने चली है| पावस ऋतु में मानवीय मनोभावों का ऐसा मोहक चित्रण आपको लोकगीतों के अलावा अन्यत्र शायद कहीं न मिले| आज का राग "देस मल्हार" भी इसी प्रकार के भावों का सृजन करता है| राग "देस मल्हार" पर आधारित आज प्रस्तुत किया जाने वाला गीत है, जिसे हमने 1962 में प्रदर्शित फिल्म "प्रेमपत्र" से लिया है| फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी हैं जिनके आजादी से पहले के संगीत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का स्वर मुखरित होता था तो आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द हुआ करता था| सलिल चौधरी भारतीय शास्त्रीय संगीत, बंगाल और असम के लोक संगीत के जानकार थे तो पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था| उनके संगीत में इन संगीत शैलियों का अत्यन्त संतुलित और प्रभावी प्रयोग मिलता है| आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत -"सावन की रातों में ऐसा भी होता है..." में राग "देस मल्हार" के स्वरों का प्रयोग कर उन्होंने राग के स्वरुप का सहज और सटीक चित्रण किया है| इस गीत को परदे पर अभिनेत्री साधना और नायक शशि कपूर पर फिल्माया गया है| फिल्म के निर्देशक हैं विमल रोंय, गीतकार हैं गुलज़ार तथा झपताल में निबद्ध गीत को स्वर दिया है लता मंगेशकर और तलत महमूद ने| इस गीत में सितार का अत्यन्त मोहक प्रयोग किया गया है| लीजिए आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए| रविवार की शाम हम और आप यहीं मिलेंगे एक और वर्षाकालीन गीत के साथ|



क्या आप जानते हैं...
कि फिल्म "प्रेमपत्र" का यह गीत गुलज़ार के लिए सलिल चौधरी की पहली रचना थी| बाद में इस जोड़ी ने संगीत प्रेमियों को अनेक मनमोहक गीतों का उपहार दिया था|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - इस गीत के संगीतकार की पहली फिल्म थी "नवभारत".
सूत्र २ - प्रश्न जिस गीत के बारे में है उस फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री थी सुलोचना.
सूत्र ३ - मुखड़े में एक पक्षी को संबोधन है जिसका वर्षा से खास सम्बन्ध है.

अब बताएं -
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक
फिल्म का नाम बताएं - २ अंक
गायक कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी ने कल एक बार बाज़ी मारी, शरद जी और अमित जी सेफ खेल कर २ अंक कमा गए. प्रतीक जी एक अंक आपको दे देते हैं, क्या याद करेंगे :) हिन्दुस्तानी जी और दादी को भी आभार सहित १ अंक मिलता है. नीरज जी ये रेडियो आवाज़ की ही एक नयी पहल है, प्रोमोशन के इरादे से कुछ दिनों तक इसे लाईव रखा गया है, जल्द ही इसे एच्छिक कर देंगें. वैसे इसे बहुत आसानी से बंद किया जा सकता है.

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, July 20, 2011

उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा...उत्साह, उल्लास और उमंग से भरपूर राग वृन्दावनी सारंग का एक अलग रंग

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 704/2011/144

"उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" श्रृंखला की चौथी कड़ी में एक और वर्षागीत लेकर मैं कृष्णमोहन मिश्र आपके बीच उपस्थित हूँ| दोस्तों; श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हमने आपके लिए राग "वृन्दावनी सारंग" का परिचय और इसी राग पर आधारित गीत प्रस्तुत किया था| आज के गीत में हम आपको राग "वृन्दावनी सारंग" का एक दूसरा पहलू दिखाने का प्रयत्न कर रहे हैं| हम यह चर्चा कर चुके हैं कि यह राग गम्भीर प्रकृति का होने के कारण विरह भाव की सृष्टि करता है| ऐसे परिवेश के सृजन के लिए राग "वृन्दावनी सारंग" का गायन-वादन पूर्वांग में किया जाता है| परन्तु जब राग के स्वर-समूहों को हम पूर्वांग से उत्तरांग में ले जाते हैं, तब राग का भाव बदल जाता है और हमें उल्लास, उत्साह और प्रकृति के आनन्द की सार्थक अनुभूति होने लगती है| दोस्तों; आज हम आपको राग "वृन्दावनी सारंग" पर आधारित जो गीत सुनवाने जा रहे हैं, उसमे आपको प्रकृति का नैसर्गिक आनन्द तो मिलेगा ही, साथ ही आलस्य त्याग कर कर्म करने की प्रेरणा देने में भी यह गीत सक्षम है| कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' ने सम्भवतः ऐसे ही परिवेश के लिए यह पंक्तियाँ लिखी होगी -

आली, घिर आए घन पावस के |
लख ये काले-काले बादल, नील सिन्धु में खिले कमल-दल,
हरित ज्योति चपला अति चंचल, सौरभ के रस के |
द्रुत समीर काँपे थर-थर-थर, धाराएँ झरतीं फर-फर-फर,
जगती के प्राणों में समर भर, बेध गए कस के |


दोस्तों; आज जो गीत हम आपको सुनवाने जा रहे हैं, वह भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध एक ऐसे संगीतकार की रचना है, जिन्होंने अपनी पहली फिल्म "शोभा" (1942) से लेकर अन्तिम फिल्म "शक" (1976) तक संगीत की शुद्धता को कायम रखा| आप अनुमान तो लगा ही चुके होंगे- मेरा संकेत निश्चित रूप से संगीतकार बसन्त देसाई की ओर ही है| 1957 में राजकमल कला मन्दिर की फिल्म "दो ऑंखें बारह हाथ" प्रदर्शित हुई थी| इस फिल्म के निर्देशक व्ही. शान्ताराम ने अपनी पिछली फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी बसन्त देसाई को संगीत निर्देशन का दायित्व दिया| कहने की आवश्यकता नहीं कि फिल्म के साथ-साथ इसके गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए| फिल्म "दो आँखें बारह हाथ" का निर्माण बिलकुल नये और अनूठे विषय पर किया गया था| निर्माता-निर्देशक शान्ताराम जी ने आजीवन कारावास का दण्ड भुगत रहे क्रूर और हत्यारे बन्दियों के सुधार और उन्हें समाज की मुख्य धारा में वापस लाने का आग्रह इस फिल्म के माध्यम से किया था|

एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि जब इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ था उन दिनों विख्यात शिक्षाविद और राजनीतिज्ञ डा. सम्पूर्णानन्द उत्तर प्रदेश के मुखमंत्री थे| इसके बाद 1962 से 1967 तक वे राजस्थान के राज्यपाल पद पर भी रहे| उन्हीं के कार्यकाल में भारत का पहला बन्दी सुधारगृह अर्थात खुली जेल 1963 में राजस्थान के सांगानेर में स्थापित हुआ था| सम्भवतः व्ही. शान्ताराम कि फिल्म से प्रेरित होकर डा. सम्पूर्णानन्द ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में यह योजना बनाई थी, जो राज्यपाल बनने की अवधि में कार्यान्वित हुई थी| राजस्थान के बाद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी बन्दी सुधार गृह की स्थापना की गई थी| आजकल इसे सम्पूर्णानन्द आदर्श कारागार के नाम से जाना जाता है| बहरहाल; फिल्म "दो आँखें बारह हाथ" का गाँधीवादी विचारधारा, जैसा अनूठा विषय था; वैसा ही संगीत बसन्त देसाई ने भी दिया था| शास्त्रीय और लोक संगीत में रचे-बसे फिल्म के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे| फिल्म का एक गीत -"ऐ मलिक तेरे बन्दे हम..." तो आज भी अनेक विद्यालयों की प्रातःकालीन प्रार्थना के रूप में गाया जाता है| इस फिल्म का एक अन्य गीत -"उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा..." आज हमने आपको सुनवाने के लिए चुना है| फिल्म "दो आँखें बारह हाथ" का यह गीत राग "वृन्दावनी सारंग" पर आधारित है| मन्ना डे और लता मंगेशकर के युगल स्वरों में यह गीत है और इसके गीतकार हैं भरत व्यास| लीजिए आप भी सुनिए उत्साह, उल्लास और उमंग से भरपूर यह गीत-



क्या आप जानते हैं...
कि फिल्म "दो आँखें बारह हाथ" का कथानक ब्रिटिश शासनकाल में एक भारतीय रियासत की सत्य घटना पर आधारित था| फिल्म के आरम्भ में यह घोषणा व्ही. शान्ताराम ने की थी

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - फिल्म की नायिका साधना है.
सूत्र २ - पुरुष स्वर है तलत महमूद का.
सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "राही"

अब बताएं -
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक
गीतकार कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी सबसे आगे चल रही हैं, पर बढ़त कब तक रख पाएंगीं ये देखना दिलचस्प होगा, नए नियमों के चलते शृंखला का मज़ा दुगना हो गया है, बाज़ी किसी के भी हाथ आ सकती है

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, July 19, 2011

गरजत बरसत भीजत आई लो...राग गौड़ मल्हार और लता जी के स्वरों में मिलन की आतुरता

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 703/2011/143

र्षा ऋतु के गीतों पर आधारित श्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब पाठकों-श्रोताओं का हार्दिक स्वागत करता हूँ| आज का राग है- "गौड़ मल्हार"| पावस ऋतु का यह एक ऐसा राग है जिसके गायन-वादन से सावन मास की प्रकृति का यथार्थ चित्रण किया जा सकता है| आकाश पर कभी मेघ छा जाते हैं तो कभी आकाश मेघ रहित हो जाता है| इस राग के स्वर-समूह उल्लास, प्रसन्नता, शान्त और मिलन की लालसा का भाव जागृत करते हैं| मिलन की आतुरता को उत्प्रेरित करने में यह राग समर्थ होता है| आज के अंक में हम आपको ऐसे ही भावों से भरा फिल्म "मल्हार" का मनमोहक गीत सुनवाएँगे; किन्तु उससे पहले राग "गौड़ मल्हार" के स्वर-संरचना की एक संक्षिप्त जानकारी आपसे बाँटना आवश्यक है|

राग "गौड़ मल्हार" की रचना राग "गौड़ सारंग" और "मल्हार" के मेल से हुई है| यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसमें सात स्वरों का प्रयोग होता है| शुद्ध और कोमल, दोनों निषाद का प्रयोग राग के सौन्दर्य बढ़ा देते हैं| शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं| गन्धार स्वर का बड़ा विशिष्ठ प्रयोग होता है| इस राग की तीनताल की एक बन्दिश -"कारी बदरिया घिर घिर आई..." का सुमधुर गायन पण्डित ओमकारनाथ ठाकुर के स्वरों में बेहद लोकप्रिय हुआ था| राग "गौड़ मल्हार" के परिवेश का यथार्थ चित्रण महाकवि कालिदास की कृति "ऋतुसंहार" के एक श्लोक में किया गया है| "ऋतुसंहार" के द्वितीय सर्ग के दसवें श्लोक में महाकवि ने वर्षाऋतु के ऐसे ही परिवेश का वर्णन किया है, जिसका भावार्थ है -"बार-बार गरजने वाले मेघों से आच्छन्न आकाश और घनी अँधेरी रात में चमकने वाली बिजली के प्रकाश में रास्ता देखती हुई, प्रेम से वशीभूत नायिका तेजी से अपने प्रियतम से मिलने के लिए आतुर हो जाती है| सच तो यही है कि राग "गौड़ मल्हार" वर्षाऋतु के रागों में श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ है| आज के अंक में प्रस्तुत किये जाने वाले गीत में श्रृंगार के संयोग पक्ष का भावपूर्ण चित्रण किया गया है| इस राग का दूसरा पहलू है श्रृंगार का विरह पक्ष, जिसकी चर्चा हम इसी श्रृंखला की आगामी एक कड़ी में करेंगे|

आज हमने आपके लिए 1951 में प्रदर्शित फिल्म "मल्हार" का गीत -"गरजत बरसत भीजत आई लो, तुम्हरे मिलन को अपने प्रेम पियरवा..." का चयन किया है| वास्तव में यह गीत राग "गौड़ मल्हार" पर आधारित गीत नहीं बल्कि इसी राग में निबद्ध तीनताल की एक पारम्परिक बन्दिश है| संगीतकार रोशन ने फिल्म के शीर्षक गीत के रूप में इस बन्दिश का प्रयोग किया था| गीत को लता मंगेशकर ने अपने मनमोहक स्वरों से सँवारा है| फिल्म "मल्हार" का निर्माण पार्श्वगायक मुकेश ने किया था| मुकेश और रोशन अभिन्न मित्र थे और कहने की आवश्यकता नहीं कि जब फिल्म के निर्माता मुकेश होंगे तो संगीत निर्देशक निश्चित रूप से रोशन ही होंगे| फिल्म "मल्हार"के गीत बड़े मधुर थे किन्तु दुर्भाग्य से फिल्म चली नहीं और गीत भी चर्चित नहीं हो पाए| राग "गौड़ मल्हार" के स्वरों से सजी यही संगीत रचना रोशन ने एक दशक बाद थोड़े शाब्दिक परिवर्तन के साथ फिल्म "बरसात की रात" में दुहराया और इस बार फिल्म के साथ-साथ गीत भी हिट हो गया| आइए सुना जाए फिल्म "मल्हार" का शीर्षक गीत, राग "गौड़ मल्हार" की तीनताल में निबद्ध बन्दिश के रूप में|



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार रोशन ने अपने प्रारम्भिक दौर की असफल फिल्मों के कुछ सुरीले धुनों को लगभग एक दशक बाद दोबारा सफल प्रयोग किया| फिल्म 'आरती (१९६२)' के गीत -'कभी तो मिलेगी...' की धुन प्रारम्भिक दौर की फिल्म 'घर घर में दीवाली' के गीत -'कहाँ खो गई...' की धुन का दूसरा संस्करण है| इसी प्रकार 1957 की फिल्म 'दो रोटी' के गीत -'तुम्हारे कारण...' और 1959 की फिल्म 'मधु' के गीत -'काहे बनो जी अनजान...' की धुनों को रोशन ने 1966 की फिल्म 'देवर' में क्रमशः -'रूठे सैंया हमारे...' और -'दुनियाँ में ऐसा कहाँ...' की धुनों में सफलतापूर्वक दुहराया था|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - सावन के इस युगल गीत में एक स्वर लता का है.
सूत्र २ - इस फिल्म के निर्देशक "हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ" शृंखला में फीचर्ड ४ निर्देशकों में से एक थे.
सूत्र ३ - लता के स्वरों में जो पहला बंद है उसमें शब्द है - "दुल्हनिया"

अब बताएं -
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक
साथी गायक कौन हैं - २ अंक
गीतकार कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
हालंकि अमित जी और प्रतीक जी ने के ही समय पर जवाब दिया, पर प्रतीक जी का जवाब ही पूर्ण माना जायेगा. पर अमित जी आपने जो विस्तृत जानकारी दी राग के बारे में उसके लिए धन्येवाद, आपको हम १ अंक अवश्य देंगें. अविनाश जी, शरद जी बधाई. हिन्दुस्तानी जी, क्षिति जी, और और अवध जी को भी बधाई १-१ अंकों के लिए

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, July 18, 2011

सावन के बादलों उनसे जा कहो...रिमझिम फुहारों के बीच विरह के दर्द में भींगे जोहरा बाई और करण दीवान के स्वर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 702/2011/142

"ओश्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" की दूसरी कड़ी में आपका पुनः स्वागत है| कल की कड़ी में आपने वर्षा ऋतु के आगमन की सार्थक अनुभूति कराने वाले राग "मेघ मल्हार" पर आधारित गीत का रसास्वादन किया था| आज हम जिस वर्षाकालीन राग और उस पर आधारित फ़िल्मी गीत सुनने जा रहे हैं, वह "मल्हार" के किसी प्रकार के अन्तर्गत नहीं आता; बल्कि "सारंग" के अन्तर्गत आता है| परन्तु इसका स्वर संयोजन ऐसा है कि इसके गायन-वादन से वर्षाकालीन परिवेश सहज रूप में उपस्थित हो जाता है| दोस्तों, आज का राग है- "वृन्दावनी सारंग"| कल के अंक में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि मल्हार अंग के रागों के अलावा "वृन्दावनी सारंग", "देस" और "जयजयवन्ती" भी ऐसे राग हैं; जो स्वतंत्र रूप से और "मल्हार" के मेल से भी वर्षा ऋतु के परिवेश की सृष्टि करने में सक्षम हैं| मल्हार के मिश्र रागों पर आधारित गीत हम आपको श्रृंखला की अगली कड़ियों में सुनवाएँगे; परन्तु आज हम आपको राग "वृन्दावनी सारंग" का संक्षिप्त परिचय और उस पर आधारित एक विरह गीत सुनवाने जा रहे हैं|

यह राग वर्षा ऋतु में नायक-नायिका के विरह भाव को उत्प्रेरित करता है| राग "मेघ मल्हार" की तरह "वृन्दावनी सारंग" भी गान्धार और धैवत रहित औडव-औडव जाति का राग है तथा शुद्ध और कोमल- दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है| शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं| राग "वृन्दावनी सारंग" में ऋषभ पर आन्दोलन ना करने से यह "मेघ मल्हार" से अलग हो जाता है| गम्भीर प्रकृति का राग होने के कारण यह श्रृंगार रस के विरह पक्ष को उभारता है| राग की प्रकृति के एकदम अनुकूल रीतिकालीन सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी की यह पंक्तियाँ हैं, जिसमें रानी नागमती का विरह वर्णन है-

चढ़ा असाढ़ गगन घन गाजा, साजा बिरह दुन्द दल बाजा |
सावन बरस मेंह अतवानी, मरन परी हौं बिरह झुरानी |

आज का गीत भी नायक-नायिका के बीच की दूरी और विरह भाव को व्यक्त करता है| 1944 में प्रदर्शित फिल्म "रतन" के लिए संगीतकार नौशाद ने दीनानाथ मधोक के गीत को राग "वृन्दावनी सारंग" पर आधारित संगीतबद्ध किया था| इस गीत को अपने समय की चर्चित गायिका जोहरा बाई और गायक-अभिनेता करण दीवान ने युगल गीत के रूप में गाया है| फिल्मांकन में नायक-नायिका के बीच परस्पर दूरी है और वे आकाश में छाए बादलों को लक्ष्य करके अपनी-अपनी विरह व्यथा को व्यक्त करते हैं| उस समय तक नौशाद द्वारा संगीतबद्ध किये गए फिल्मों में "रतन" सर्वाधिक सफल फिल्म थी| इस फिल्म के संगीत की सफलता आकलन इस तथ्य से ही किया जा सकता है कि फिल्म की निगेटिव का मूल्य पचहत्तर हजार रुपए था; जबकि गीतों की रायल्टी साढ़े तीन लाख रुपए आई थी| रायल्टी की इस राशि ने उस समय तक के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे| यही नहीं फिल्म "रतन" के गीतों के कारण ही गायिका जोहरा बाई चोटी की गायिका बन गईं थीं| आप सुनिए राग "वृन्दावनी सारंग" पर आधारित यह गीत और मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिये, कल के नए अंक में, एक नए राग और एक नए गीत के साथ आपसे फिर मिलूँगा|



क्या आप जानते हैं...
कि फिल्म "रतन" की संगीत रचना के लिए संगीतकार नौशाद को 50 रुपए प्रति गीत के हिसाब से कुल 800 रुपए मानदेय प्राप्त हुआ था|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - संगीतकार के अभिन्न मित्र थे फिल्म के निर्माता गायक.
सूत्र २ - स्वर है लता जी का.
सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "गरवा"

अब बताएं -
किस वर्षा के राग की ताल पर स्वरबद्ध रचना है ये - ३ अंक
फिल्म के निर्माता का नाम बताएं - २ अंक
संगीतकार कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी ने एक बार फिर शानदार शुरुआत की है. अमित जी और अविनाश जी ने २ -२ अंक बटोरे. कल के सभी टिप्पणीकारों को हम १-१ अंक दे रहे हैं, पर याद रहे आज से ये १ अंक किसी रचनात्मक टिपण्णी के ही मिलेंगें, गलत जवाब देने पर नहीं.

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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