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Saturday, October 4, 2014

"मेरो गाम काठा पारे...", सफ़ेद-क्रान्ति की ही तरह यह गीत भी पहुँचा था देश के कोने कोने तक


एक गीत सौ कहानियाँ - 42
 

‘मेरो गाम काठा पारे...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ से, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ - 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 42-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'मंथन' के यादगार गीत "मेरो गाम काठा पारे..." के बारे में।


80 का दशक कलात्मक फ़िल्मों का स्वर्ण-युग रहा। जिन फ़िल्मकारों ने इस जौनर को अपनी अर्थपूर्ण फ़िल्मों से समृद्ध किया, उनमें से एक नाम है श्याम बेनेगल का। उनकी 1977 की फ़िल्म 'मंथन' सफ़ेद-क्रान्ति (Operation Flood - The White Revolution) पर बनी थी। देश के कोने-कोने तक हर घर में रोज़ दूध पहुँचे, हर बच्चे को दूध नसीब हो, समूचे देश भर में दूध की नदियाँ बहने लगे, दूध की प्रचुरता हो, यही उद्देश्य था सफ़ेद-क्रान्ति का। फ़िल्म की कहानी डॉ. वर्गिस कुरिएन और श्याम बेनेगल ने संयुक्त रूप से लिखी थी। बताना ज़रूरी है कि कुरिएन भारत के सफ़ेद-क्रान्ति के जनक माने जाते हैं। फ़िल्म की पृष्ठभूमि कुछ इस तरह से थी कि गुजरात के खेड़ा ज़िले के कुछ गरीब कृषकों की सोच को सामाजिक कार्यकर्ता त्रिभुवनदास पटेल ने अंजाम दिया और स्थापित हुआ Kaira District Co-operative Milk Producers' Union और जल्दी ही यह गुजरात के अन्य ज़िलों में भी शुरू हो गया जिसने एक आन्दोलन का रूप ले लिया। इसी शुरुआत से आगे चल कर स्थापना हुई डेरी कौपरेटिव 'अमूल' की, गुजरात के आनन्द इलाके में। साल था 1946, और आगे चल कर इस कौपरेटिव में करीब 26 लाख लोगों की भागीदारी हुई। 1970 में इसने 'सफ़ेद-क्रान्ति' की शुरुआत कर दी अपना राष्ट्रव्यापी दूध-ग्रिड बनाकर, और 1973 में बनी ‘Gujarat Co-operative Milk Marketing Federation Ltd.(GCMMF)। इसी संस्था के कुल 5,00,000 सदस्यों ने 2 रुपये प्रति सदस्य योगदान देकर 'मंथन' फ़िल्म को प्रोड्यूस किया, और जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो ट्रक भर भर कर गाँव वाले आये "अपनी" इस फ़िल्म को देखने के लिए। एक कलात्मक और ग़ैर-व्यावसायिक फ़िल्म होते हुए भी इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी के झंडे गाड़ दिये, जो फ़िल्म इतिहास में एक मिसाल है। स्मिता पाटिल, गिरीश करनाड, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबन्दा, अमरीश पुरी प्रमुख अभिनीत 'मंथन' को 1978 में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला; साथ ही सर्वश्रेष्ठ पटकथा का राष्ट्रीय पुरस्कार भी इस फ़िल्म के लिए विजय तेन्दुलकर को ही मिला। भारत की तरफ़ से ऑस्कर के लिए भी यही फ़िल्म मनोनीत हुआ। फ़िल्म के लोकप्रिय गीत "मेरो गाम काठा पारे..." के लिए गायिका प्रीति सागर को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिया गया। इस गीत को बाद में 'अमूल' कम्पनी ने अपने विज्ञापन के लिए प्रयोग किया। गुजराती लोक-धुन की छाया लिये इस गीत में एक महिला के अपने प्रेमी को देखने की आस को दर्शाया गया है। 'अमूल' के विज्ञापन में इस गीत के साथ-साथ स्मिता पाटिल भी नज़र आती हैं और साथ ही स्क्रीन पर नज़र आते हैं ये शब्द - “Every morning 17 lac women across 9,000 villages, bringing in milk worth Rs.4 crores, are now celebrating their economic independence. Thanks to the co-operative movement called Amul.”

वनराज भाटिया
फ़िल्म 'मंथन' के संगीतकार थे कलात्मक फ़िल्मों में संगीत देने के लिए मशहूर वनराज भाटिया। गायिका प्रीति सागर भी उन्हीं की खोज थी। विविध भारती के एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि प्रीति सागर को उन्होंने कैसे खोजा, तो उन्होंने बताया कि प्रीति की माँ ऐन्जेला वनराज जी की क्लासमेट हुआ करती थीं 'न्यू ईरा स्कूल' में। उसके बाद कॉलेज में भी, यहाँ तक कि एम.ए तक दोनो क्लासमेट रहे। इस तरह से वो प्रीति के सम्पर्क में आये। कम बजट की फ़िल्में होने की वजह से वनराज भाटिया ने प्रीति सागर से कई गीत गवाये और प्रीति की अलग हट कर आवाज़ ने हर गीत में एक अलग ही चमक पैदा की। 'मंथन' के इस गीत के बारे में भी वनराज भाटिया ने उस साक्षात्कार में बताया था। "शुरू-शुरू में इस फ़िल्म के लिए किसी गीत की योजना नहीं थी। केवल पार्श्व-संगीत की ही योजना था। पर फ़िल्म के स्क्रिप्ट राइटर सत्यदेव दुबे ने कहा कि कम से कम एक गीत ज़रूर होना चाहिये फ़िल्म में। तब जाकर मैंने एक गीत कम्पोज़ की। यह एक प्रेरित गीत था, an inspired song। मैं, प्रीति और उसकी बहन नीति एक दिन दोपहर को बैठ गये और इस गीत की रचना शुरु हुई। हम तीनो ने मिल कर इस गीत के बोल भी लिखे और गीत को डेवेलप करते गये। नीति ने बोलों को पॉलिश किया। जब गीत बन कर बाहर आया तो मध्यप्रदेश के लोगों ने कहा कि यह उनकी भाषा है, गुजरातियों ने कहा कि यह उनकी भाषा है, राजस्थानियों ने कहा कि यह उनकी भाषा है। पर सच्चाई यही है कि यह स्टुडियो की भाषा थी। जब हमने यह गीत बनाया तो इसका इस्तेमाल फ़िल्म में बतौर पार्श्वसंगीत के रूप में होना था। यह गीत फ़िल्म में कुल सात बार बजता है। ओपेनिंग सीक्वेन्स में 1.5 मिनट के लिए जिसमें नामावली दिखाई जाती है। मैंने पूछा कि टाइटल म्युज़िक 1.5 मिनट का कैसे हो सकता है क्योंकि श्याम बेनेगल उसमें एक अन्तरा भी चाहते थे। मैंने कहा कि अन्तरा कैसे फ़िट होगा इधर? उन्होंने मुझसे गीत का लय बढ़ाकर अन्तरा शामिल करने का सुझाव दिया। और यही वजह है कि इस शुरुआती संस्करण में गीत की रफ़्तार थोड़ी तेज़ है। और फ़िल्मांकन में तेज़ रफ़्तार से जाती हुई ट्रेन के सीन से मैच भी हो गया। उसके बाद स्पीड स्वाभाविक कर दिया जाता है जब गिरिश करनाड जाने लगते हैं और नायिका दौड़ती हुई आती है, उस वक़्त पूरा गीत सही स्पीड में आ जाता है।" वनराज भाटिया ने आगे बताया कि यह किसी लोक गीत की धुन नहीं है, बल्कि उन्होंने ही इसे लोक गीत जैसा कम्पोज़ किया है। उन्हें यह बिल्कुल आभास नहीं था कि यह गीत इतना बड़ा हिट सिद्ध होगा। इस गीत में उन्होंने केवल चार सारंगियों का इस्तेमाल किया था बस।

प्रीति सागर
गायिका प्रीति सागर यह मानती हैं कि यह गीत आज भी उनकी पहचान है और इस गीत ने ही उन्हें अपने चाहनेवालों का बेशुमार प्यार दिया है। "जब हम इस गीत को रेकॉर्ड कर रहे थे, उस समय हमें इतना सा भी अनुमान नहीं था कि यह इतना पॉपुलर होगा। मुझे याद है कि मैं स्टुडियो में 'मंथन' के निर्देशक श्याम बेनेगल और संगीतकार वनराज भाटिया के साथ थी। गीत के बोल कुछ ठीक नहीं जम रहे थे, वनराज जी को अच्छा नहीं लग रहा था। तब मेरी बहन नीति, जो अब अमरीका में है और उस वक़्त वो केवल 15 साल की थी, वो भी हमारे साथ स्टुडियो में बैठी थी। श्याम बाबू ने नीति को गीत के बोलों को लिखने के लिए कहा। इस तरह से नीति ने अपना पहला फ़िल्मी गीत लिखा गुजराती और हिन्दी में, और उस साल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स में भी मनोनित हुई, आनन्द बक्शी और गुलज़ार जैसे स्तम्भ गीतकारों के साथ", प्रीति सागर ने एक साक्षात्कार में बताया। पुरस्कार गुलज़ार साहब को मिला था "दो दीवाने शहर में" गीत के लिए। प्रीति सागर के लिए इस गीत से जुड़ा सबसे ज़्यादा गर्व करने का मुहूर्त वह था जब उन्होंने इस गीत को प्रिन्स चार्ल्स के लिए गाया था। इस घटना को याद करते हुए उन्होंने कहा, "जब प्रिन्स चार्ल्स भारत आये थे 1982 में, उन्होंने 'मंथन' देखी और मेरा गीत उन्हें बहुत पसन्द आया। वो आनन्द गाँव में डॉ. कुरिएन के फ़ार्म में गये और वहीं कुरिएन साहब ने मुझे बुलाया था इस गीत को प्रिन्स चार्ल्स के सामने बैठ कर गाने के लिए। मैं वहाँ गई और गीत गाया, और प्रिन्स चार्ल्स ने मेरी काफ़ी सराहना की।" मिट्टी की ख़ुशबू लिये यह गीत आज भी उतना ही ताज़ा है जितना उस ज़माने में था। क्या है वजह, इसका आप ही कीजिये मंथन। सुनिए, यही उल्लेखनीय गीत-

फिल्म - मन्थन : 'मेरो गाम काठा पारे...'  : गायिका - प्रीति सागर : संगीत - वनराज भाटिया 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Tuesday, October 9, 2012

"ये गाँव प्यारा-प्यारा...", पर नहीं बसा सकीं वर्षा भोसले अपने सपनों का गाँव

गायिका वर्षा भोसले को श्रद्धांजलि



"ये गाँव प्यारा-प्यारा, ये लवली-लवली गाँव, ये हरियाली पीपल की घनी छाँव, राजा बेटा धरती का प्यारा-प्यारा गाँव...", बरसों बरस पहले जब वर्षा भोसले इस गीत को गाते हुए जिस प्यारे से इस गाँव की कल्पना की होगी, तब शायद ही उन्हें इस बात का इल्म हुआ होगा कि वो कभी अपने सपनों का गाँव नहीं बसा पाएँगी। आज जब वर्षा हमारे बीच नहीं रहीं तो उनका गाया हुआ यही गीत बार-बार मन-मस्तिष्क पर हावी हो रहा है। कल जब तक वो इस दुनिया में थीं तब शायद ही हम में से कोई उन्हें दैनन्दिन जीवन में याद किया होगा, पर उनके जाने के बाद दिल यह सोचने पर ज़रूर मजबूर कर रहा है कि उन्होंने यह भयानक क़दम क्यों उठाया होगा? क्यों मानसिक अवसाद ने उन्हें घेर लिया होगा? होश संभालने से पहले ही पिता से दूर हो जाने का दु:ख उनके कोमल मन को कुरेदा होगा? विश्व की श्रेष्ठ गायिकाओं में से एक आशा भोसले की बेटी होकर भी जीवन में कुछ ख़ास न कर पाने का ग़म सताया होगा? अपनी वैवाहिक जीवन की असफलता ने उनकी बची-खुची आशाओं पर भी पानी फेर दिया होगा? सम्पत्ति को लेकर पारिवारिक अशान्ति से वो तंग आ गई होंगी? अगर इन तमाम सवालों को ज़रा करीब से जानने की कोशिश करें तो शायद हम वर्षा के उस मानसिक दर्द के हमदर्द हो पायेंगे। कल वर्षा भोसले की अत्महत्या की ख़बर सुन कर जैसे दिल दहल गया। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से वर्षा भोसले को भावभीनी श्रद्धांजलि और आशा जी व समस्त मंगेशकर परिवार के सदस्यों के लिए कामना कि ईश्वर उन्हें इस दर्दनाक स्थिति से गुज़रने में शक्ति प्रदान करें।

वर्षा भोसले का जन्म सन् 1956 में हुआ था। बतौर गायिका उन्होंने कुछ हिन्दी फ़िल्मों तथा भोजपुरी व मराठी फ़िल्मों में गीत गाए। वो कहते हैं न कि विशाल वटवृक्ष के नीचे अन्य पेड़ों का उगना मुश्किल होता है, वैसे ही वर्षा के लिए आशा भोसले की बेटी होना वरदान से ज़्यादा अभिषाप सिद्ध हुई। वो जो भी गातीं, उसकी तुलना आशा जी से होतीं। आलम कुछ ऐसा हुआ कि वर्षा ने तंग आकर गाना ही छोड़ दिया। विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में अपने संगीतकार बेटे हेमन्त और गायिका बेटी वर्षा का ज़िक्र आशा भोसले ने कुछ इस तरह से किया था -- "कोई कोई क्षण ज़िंदगी के ऐसे होते हैं जो भुलाये नहीं जा सकते, बड़े मज़ेदार होते हैं। मेरा लड़का हेमन्त, आप समझते होंगे माँ के लिए बेटा क्या चीज़ होता है, एक दिन वो म्युज़िक डिरेक्टर बन गया और मेरे पास आकर कहने लगा कि ये मेरा गाना है, तुम गाओ। कैसा लगता है न? जो कल तक इतना सा था, आज वो मुझसे कह रहा है कि मेरा गाना गाओ। फिर उसने अपनी बहन, मेरी बेटी वर्षा से कहने लगा कि तुम्हे भी गाना पड़ेगा। वर्षा बहुत शर्मीली है, उसने कहा कि बड़ी मासी इतना अच्छा गाती है, माँ इतना अच्छा गाती है, मैं नहीं गाऊँगी। लेकिन हेमन्त ने बहुत समझाया और उसका पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। मैं स्टुडियो पहुँची तो देखा कि लड़की माइक के सामने खड़ी है और उसका भाई वन-टू बोल रहा है। ये क्षण मैं कभी नहीं भूल सकती। ये गाना सुनिये फ़िल्म 'जादू-टोना' का"



फ़िल्म 'जादू-टोना' में पहली बार गाने के बाद वर्षा भोसले ने कुछ और हिन्दी फ़िल्मों में भी गीत गाये। संगीतकार सोनिक-ओमी के संगीत में फ़िल्म 'भारत के संतान' में दिलराज कौर के साथ "दे दे तू दस पैसे दान", राम लक्ष्मण के संगीत में फ़िल्म 'तराना' में उषा मंगेशकर के साथ "मेरी आँख फ़ड़कती है" और संगीतकार श्यामजी घनश्याम जी के लिए फ़िल्म 'तीन चेहरे' में "हम हैं इस तरह जनाब के लिए जिस तरह जाम है" जैसे गीत गाये जिनमें कोई ख़ास बात न होने की वजह से लोगों ने अनसुने कर दिए। पर दो गीत उन्होंने और ऐसे भी गाये जिनके बोलों पर आज ग़ौर फ़रमाते हैं तो उनकी ज़िंदगी के साथ इनके विरोधाभास का अहसास होता है। एक गीत है किशोर कुमार के साथ फ़िल्म 'लूटमार' का "हँस तू हरदम, ख़ुशियाँ या ग़म, किसी से डरना नहीं, डर डर के जीना नहीं", और दूसरा गीत है अमित कुमार के साथ फ़िल्म 'आख़िरी इंसाफ़' का "यारों कल किसने देखा है, कल को गोली मारो"। और उन्होंने अपने आप को ही गोली मार ली। इन दोनों गीतों में ज़िन्दगी के प्रति आशावादी होने का संदेश है, जबकि वर्षा ने अपनी ज़िंदगी को निराशाओं से घेर लिया।



एक गायिका होने के अलावा वर्षा भोसले एक लेखिका भी थीं। वो लोकप्रिय वेब-पोर्टल 'रेडिफ़' के लिए 1997 से 2003 तक, 'दि संडे ऑबज़र्वर' के लिए 1994 से 1998 तक, और 'जेन्टलमैन' पत्रिका के लिए 1993 में लिखती रहीं। 'दि टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' और 'रक्षक' पत्रिका के लिए भी कुछ समय तक लिखीं। उन्होंने एक खेल-लेखक हेमन्त केंकड़े से विवाह किया, पर दुर्भाग्यवश 1998 में उनका तलाक हो गया। 9 सितंबर 2008 (आशा भोसले के जन्मदिन के अगले दिन) वर्षा ने ख़ुदकुशी करने की कोशिश की थी, पर उन्हें बचा लिया गया था। पर इस बार काल के क्रूर हाथों ने उन्हें इस धरती से छीन लिया। आज उनकी मृत्यु की ख़बर "आशा भोसले की बेटी ने आत्महत्या की" के रूप में प्रकाशित हो रहा है। जिस निजी पहचान को न बना पाने की वजह से वो अवसाद से गुज़र रही थीं, वह पहचान उनके जाने के बाद भी दुनिया नहीं दे पा रही हैं। अब भी वो पहले आशा भोसले की बेटी हैं, बाद में वर्षा भोसले। आख़िर क्यों??? 

वर्षा भोसले को यह सुरीली श्रद्धांजलि हम समाप्त करते हैं उनकी और आशा जी की गाई फ़िल्म 'जुनून' के वनराज भाटिया के संगीत में "सावन की आई बहार रे" गीत को सुनते हुए....




खोज और आलेख: सुजॉय चटर्जी

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