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Monday, June 29, 2009

रूप कुमार राठोड और साधना सरगम के युगल स्वरों का है ये -"वादा"

बात एक एल्बम की (10)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.


बात एक एल्बम की में इस माह हम चर्चा कर रहे हैं चार बड़े फनकारों से सजी एल्बम "वादा' के बारे में. गीतकार गुलज़ार और संगीतकार उस्ताद अमजद अली खान साहब के बारे में हम बात कर चुके हैं, आज जिक्र करते हैं इस एल्बम के दो गायक कलाकारों का. इनमें से एक हैं शास्त्रीय संगीत के अहम् स्तम्भ माने जाने वाले पंडित चतुर्भुज राठोड के सुपुत्र और श्रवण राठोड (नदीम श्रवण वाले) और विनोद राठोड के भाई, जी हाँ हम बात कर रहे हैं गायक और संगीतकार रूप कुमार राठोड की. अपने पिता (जिन्हें इंडस्ट्री में कल्याणजी आनंदजी और गायक अनवर के गुरु भी कहा जाता है) के पदचिन्हों पर चलते हुए रूप ने तबला वादन सीखने से अपना संगीत सफ़र शुरू किया. पंकज उधास और अनूप जलोटा के साथ उन्होंने संगत की. श्याम बेनेगल की "भारत एक खोज" में भी उन्होंने तबला वादन किया. १९८४ में अपने इस जूनून को एक तरफ रख उन्होंने गायन की दुनिया में खुद को परखने का अहम् निर्णय लिया ये एक बड़ा "यु-टर्न" था उनके जीवन का. उस्ताद नियाज़ अहमद खान से तालीम लेकर उन्होंने ग़ज़ल गायन से शुरुआत की. पार्श्व गायन में उन्हें लाने का श्रेय जाता है संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को, जिन्होंने शशि लाल नायर की फिल्म "अंगार" में उन्हें गाने का मौका दिया. पर असली सफलता उन्हें मिली फिल्म "बॉर्डर" के साथ. अनु मालिक के संगीत निर्देशन में "तो चलूँ" और "संदेसे आते हैं" गीतों ने उन्हें कमियाबी का असली स्वाद चखाया, अनु के साथ उसके बाद भी उन्होंने बहुत बढ़िया और लोकप्रिय गीतों को अपनी आवाज़ से सजाया. "ले चले डोलियों में तुम्हें", "मौला मेरे" और "तुझमें रब दिखता है" उनकी आवाज़ में ढले कुछ ऐसे गीत हैं जिन्हें सुनकर लगता है कि इन्हें इतना सुंदर कोई और गायक गा ही नहीं सकता था. प्राइवेट अल्बम्स में भी उन्होंने जम कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है. हमारी फीचर्ड एल्बम "वादा" भी इसका अपवाद नहीं है. यकीन न हो तो सुनिए हलकी फुल्की शरारतों और छेड़ छाड़ से गुदगुदाता ये नगमा -

चोरी चोरी की वो झाँखियाँ...


और ये सुनिए मखमली एहसासों से सजे गुलज़ार साहब के "ट्रेड मार्क" शब्दों में गुंथे इस गीत को -
ये सुबह साँस लेगी....


एल्बम वादा से रूप कुमार की आवाज़ में ये नायाब गीत भी हैं -

ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था...
डूब रहे हो और बहते हो...
रोजे-अव्वल से ही आवारा हूँ....

बढ़ते हैं इस एल्बम के चौथे फनकार की तरफ. इससे पहले की हम उनके बारे में कुछ कहें सुनिए इसी एल्बम से उनकी आवाज़ में ये दर्द भरी ग़ज़ल -

आँखों की हिचकी रूकती नहीं है,
रोने से कब गम हल्का हुआ है...

सीने में टूटी है चीज़ कोई,
खामोश सा एक खटका हुआ है....


वाह.... सुनिए आँखों में सावन अटका हुआ है.....


ये मधुर और चैन से भरी आवाज़ है साधना सरगम की. एक ऐसी गायिका जिनकी आवाज़ और कला का हमारी फिल्म इंडस्ट्री में कभी भी भरपूर इस्तेमाल नहीं हुआ. पंडित जसराज की इस शिष्या में गजब की प्रतिभा है और उनके कायल संगीतकार ए आर रहमान भी हैं. एक ताज़ा साक्षात्कार में रहमान में स्वीकार किया कि वही एकमात्र भारतीय गायिका हैं जो हमेशा उन्हें उम्मीद से बढ़कर परिणाम देती है अपने हर गीत में. इन पक्तियों के लेखक की राय में भी लता मंगेशकर की गायन विरासत को यदि कोई गायिका निभा पायी है तो वो साधना सरगम ही है. फिल्म "लगान" के गीत "ओ पालनहारे" एल्बम में लता की आवाज़ में है पर फिल्म के परदे पर नायिका के लिए साधना की आवाज़ का इस्तेमाल हुआ है, और देखिये लता जी गाये मुखड़े के बाद साधना की आवाज़ में अंतरा आता है और लगता है जैसे दोनों आवाजें एक दूजे में घुल-मिल ही गयी हों. रहमान ने उस साक्षात्कार में यह भी कहा कि वो हर बार अपनी गायिकी से मुझे चौका देती है. वो दिए हुए निर्देशों से भी बढ़कर हर गीत में कुछ ऐसा कर जाती है कि गीत एक स्तर और उपर हो जाता है. चलिए सुनते हैं साधना की आवाज़ में एक और गीत इसी एल्बम से -

सारा जहाँ चुप चाप है....


और अब सुनिए रूप कुमार और साधना सरगम की युगल आवाजों में ये शानदार गीत -
हर बात पे हैरान है....(उस्ताद अमजद अली खान साहब ने इस गीत में एक कश्मीरी लोक धुन का खूबसूरत सामंजस्य किया है)


एल्बम वादा के अन्य गीत यहाँ सुनें -

दिल का रसिया...
ऐसा कोई -(सरोद पर)



"बात एक एल्बम की" एक मासिक श्रृंखला है जहाँ हम बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

Monday, June 8, 2009

रोज़-ए-अव्वल ही से आवारा हूँ, आवारा रहूंगा...गुलज़ार साहब का ऐलान उस्ताद अमजद अली खान के संगीत में.

बात एक एल्बम की (9)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.


एल्बम "वादा" से अब तक आप तीन रचनायें सुन चुके हैं. आज आपको सुनवाते हैं दो और नायाब गीत इसी एल्बम से. गुलज़ार साहब पर हम आवाज़ पर पहले भी काफी विस्तार से चर्चा कर चुके हैं- मैं इस जमीन पर भटकता रहा हूँ सदियों तक और गुलज़ार - एक परिचय जैसे आलेखों में. महफ़िल-ए-ग़ज़ल में जब भी उनका जिक्र छिड़ा, तख्लीक-ए-गुलज़ार और परवाज़-ए-गुलज़ार से फिजा गुलज़ार नुमा हो गयी. फिल्मों में उनके लिखे ढेरों गीत हमेशा हमेशा संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज़ करेंगें पर ये भी एक सच है कि उन्होंने ढेरों गैर फिल्म संगीत एल्बम को अपनी कलम से प्रेरणा दी. उनके साथ काम कर चुके ढेरों कलाकारों ने जब भी कभी फिल्मों से इतर अपनी कला का मुजाहरा करने का मन बनाया गुलज़ार साहब की कविताओं/ ग़ज़लों ने उन्हें अपने प्रेम पाश में बाँध लिया. फिर चाहे वो भूपेंद्र सिंह हो, सुरेश वाडेकर, भूपेन हजारिका, विशाल भारद्वाज हो या फिर जगजीत सिंह, कोई भी उनकी कविताओं के नर्मो-नाज़ुक जादू से बच नहीं पाया. गुलज़ार साहब खुद जिन फनकारों के मुरीद रहे उनके काम को जन जन तक पहुंचाने में भी उनकी अहम् भूमिका रही. मिर्जा ग़ालिब और अमृता प्रीतम के नाम इनमें प्रमुख हैं. अमृता प्रीतम की कविताओं को जिस एल्बम के माध्यम से गुलज़ार ने नयी सांसें दी उस एल्बम का भी हम आवाज़ पर ज़िक्र कर चुके हैं.

अब इसे दुर्भाग्य ही कहिये कि उनके बहुत से उन्दा काम पर्याप्त प्रचार और स्टार वेल्यू के अभाव में उतनी कमियाबी को नहीं पा सके जिसके कि वो हक़दार थे. "बूढे पहाडों पर" और "वादा" उनकी ऐसी ही कुछ अल्बम्स हैं. हाँ पर उनके दीवानों की कहीं कोई कमी नहीं है, जो हर उस एल्बम को अपने संग्रह का हिस्सा बनाते हैं जिनसे उनका नाम जुड़ जाता है. अक्सर उनकी कवितायें गहरे भाव और सरल शब्दों में गुंथी होने के कारण संगीतकारों को उन्हें स्वरबद्ध करने के लिए प्रेरित करती ही है. विशाल ने उनकी कविता "यार जुलाहे" को बहुत खूबसूरत रूप से स्वरबद्ध किया था. ऐसे में उस्ताद अमजद अली खान साहब भी कहाँ पीछे रहते भला. वादा एल्बम में भी गुलज़ार साहब के लिखे कुछ बेहद गहरे उतरते शब्दों को खान साहब ने बहुत प्यार से सुरों में पिरो कर पेश किया है.

"रोजे-अव्वल ही से आवारा हूँ आवारा रहूँगा..." कहानी है एक अनजाने अजनबी खला में भटकते यायावर की. गीत से पहले और बीच बीच में गुलज़ार साहब की आवाज़ में कुछ पंक्तियाँ है, संगीत ऐसा है कि यदि ऑंखें बंद सुनेंगें तो आप खुद को इतना हल्का महसूस करेंगे कि कहीं अन्तरिक्ष की खलाओं में भ्रमण करते हुए पायेंगें, जहाँ गुलज़ार साहब आपको चेताते मिलेंगें -"उल्काओं से बच के गुजरना, कॉमेट हो तो पंख पकड़ना..." तो चलिए हमारे साथ आज इस सफ़र में सुनिए ये गीत एल्बम "वादा" से.



अब सुनिए एक और डूबता गीत, जो पहले गीत से बिलकुल अलग रंग का है. रूप कुमार राठोड के गाये बहतरीन गीतों में इसका शुमार है. सुनिए इसी एल्बम से -"डूब रहे हो और बहते हो..." जहाँ गुलज़ार साहब लिखते हैं - "याद आते हैं वादे जिनके, तेज़ हवा में सूखे तिनके, उनकी बातें क्यों कहते हो....."



(जारी....)



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

Wednesday, June 3, 2009

"ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था..."- उस्ताद अमजद अली खान के संगीत का सतरंगी वादा

बात एक एल्बम की (८)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.

"बात एक एल्बम की" का एक नया महीना है और हम हाज़िर हैं एक नयी एल्बम के साथ. इस माह की एल्बम में हैं चार दिग्गज फनकार, जो सभी के सभी अपने अपने क्षेत्र में महारत रखते हैं. जहाँ संगीतकार हों उस्ताद अमजद अली खान जैसे, गीतकार हों गुलज़ार साहब जैसे, गायक हों रूप कुमार राठोड और गायिका हों साधना सरगम जैसी तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एल्बम किस स्तर की होगी. जी हाँ ये एल्बम है -"वादा". सच्चे और अच्छे संगीत का वादा ही तो है ये नायाब एल्बम जिसका एक एक गीत हमारा दावा है, आपके अन्तर्मन में कुछ यूं उतर जायेगा कि उसका खुमार उम्र भर नहीं उतरेगा.

दरअसल इस पूरी टीम में जो नाम सबसे ज्यादा चौंकाता है वो निसंदेह उस्ताद अमजद अली खान साहब का ही है. अपने सरोद वादन से लगभग ४० सालों से भी अधिक समय से दुनिया भर के संगीत के कद्रदानों को मंत्रमुग्ध करने वाला ये महान फनकार एक व्यावसायिक एल्बम का हिस्सा बने, जरा विचित्र लगता है. पर खान साहब के क्या कहने, इतने मधुर संगीत से सजाया है पूरी एल्बम को जैसे मोती चुन लाये हो अपने सुरों के अद्भुत लोक से. खुद उन्हीं के शब्दों में -"कोई मूलभूत फर्क नहीं है शास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत में. संगीत संगीत है. मेरा मकसद अपने श्रोताओं से जुड़ना है...". ग्वालियर के हाफिज़ अली खान के शिष्य रहे खान साहब ने ६ साल की उम्र में पहली बार मंच पर सरोद वादन किया था, कितने लोगों को उस वक़्त ये ख़्याल आया होगा कि ये बालक एक दिन सरोद को हिमालय सी ऊँच्चाईयों पर पहुंचा देगा. देश विदेश में जाने कितने कंसर्ट, जाने कितने सम्मान (जिसमें पद्म विभूषण भी शामिल है), ढेरों नए प्रयोग, इस बात पे शायद ही कोई शक होगा कि खान साहब ने अफगान के घोडों के व्यापारी मोहम्मद हाशमी खान बंगेश द्वारा हिंदुस्तान लाये गए इस वाध्य को जन जन तक पहुँचाने में अहम् भूमिका निभाई है, जिस परंपरा को उनको दोनों सुपत्र बहुत खूबी से आगे ले जा रहे हैं.

उस्ताद पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, पर फिलहाल हमारा मकसद है उनके सगीत से सजे इस एल्बम से कुछ गीत आपको सुनवाना. तो चलिए शुरुआत करते हैं इस शीर्षक गीत से. गुलज़ार साहब के शब्दों को स्वर दिया है रूप कुमार राठोड ने. "ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था...तेरे बिना जीने का इरादा तो नहीं था....". आनंद लीजिये इतना सार्थक आरंभिक संगीत(prelude) बहुत कम गीतों में सुनने को मिलता है-



दूसरी आवाज़ है इस एल्बम में साधना सरगम की. उनकी आवाज़ में सुनिए एक बेहद खूबसूरत सा गीत इस लाजवाब एल्बम से. जहाँ पहले गीत में दर्द और तन्हाईयों की असीम गहराईयाँ थी वहीँ इस गीत एक मीठा सा चुलबुलापन है, साधना की आवाज़ में ये गीत बार बार सुनने जाने लायक है. "दिल का रसिया और कहाँ होगा..."



और अब सुनिए इन दोनों गीतों को खान साहब के सरोद पर. स्वरों की मधुर स्वरलहरियों में गोते खाईये और डूब जाईये उस्ताद के बेमिसाल सरोद वादन के सुर सागर में -



(जारी....)



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

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