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Sunday, August 28, 2016

मियाँ मल्हार : SWARGOSHTHI – 281 : MIYAN MALHAR




स्वरगोष्ठी – 281 में आज

पावस ऋतु के राग – 2 : तानसेन की अमर कृति – मियाँ मल्हार

“बिजुरी चमके बरसे मेहरवा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हम राग मियाँ की मल्हार पर चर्चा करेंगे। राग मियाँ मल्हार मल्हार अंग का सबसे लोकप्रिय राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु का यथार्थ परिवेश का सृजन किया जा सकता है। इस राग में आज हम आपको सबसे पहले राग मियाँ की मल्हार के स्वरों पर आधारित 1998 में प्रदर्शित फिल्म ‘साज’ से गायक सुरेश वाडकर की आवाज़ में गाया गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में राग मियाँ की मल्हार में प्रस्तुत एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं।



ल्हार अंग के रागों में राग मेघ मल्हार, मेघों का आह्वान करने, मेघाच्छन्न आकाश का चित्रण करने और वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने में सक्षम राग माना जाता है। वहीं दूसरी ओर राग मियाँ मल्हार, वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। इसराज और मयूर वीणा के सुप्रसिद्ध वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार- राग मियाँ मल्हार की सशक्त स्वरात्मक परमाणु शक्ति, बादलों के परमाणुओं को झकझोरने में समर्थ है। राग मियाँ मल्हार के बारे में जानकारी देते हुए पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने हमें बताया कि यह राग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह और अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग मियाँ की मल्हार के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है। राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है। वास्तव में पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ विरह से व्याकुल नायक-नायिकाओं की विरहाग्नि को शान्त करते हैं और मिलन की आशा जगाते हैं। कई फिल्मों में संगीतकारों ने इस राग पर आधारित यादगार गीतों की रचना की है। अब हम आपको 1998 में प्रदर्शित एक संगीत-प्रधान फिल्म ‘साज’ का मियाँ की मल्हार राग पर आधारित गीत सुप्रसिद्ध गायक सुरेश वाडकर की आवाज़ में सुनवाते हैं। इस फिल्म का संगीत विश्वविख्यात तबला-वादक उस्ताद ज़ाकिर हुसेन ने तैयार किया था। फिल्म में इसी गीत का एक अन्य संस्करण भी है, जिसे गायिका कविता कृष्णमूर्ति ने स्वर दिया है।

राग मियाँ की मल्हार : “बादल घुमड़ बढ़ आए...” : सुरेश वाडकर : फिल्म – साज


राग मियाँ मल्हार में वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अनूठी क्षमता होती है। इसके साथ ही इस राग का स्वर-संयोजन, पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ द्वारा विरहिणी नायिका के हृदय में मिलन की आशा जागृत होने की अनुभूति भी कराते हैं। यह काफी थाट का और सम्पूर्ण-षाड़व जाति का राग है। अर्थात; आरोह में सात और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध गान्धार का त्याग, अवरोह में कोमल गान्धार का प्रयोग तथा आरोह और अवरोह दोनों में शुद्ध और कोमल दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में शुद्ध निषाद से पहले कोमल निषाद तथा अवरोह में शुद्ध निषाद के बाद कोमल निषाद का प्रयोग होता है। राग के स्वरों में प्रकृति के मनमोहक चित्रण की और विरह की पीड़ा को हर लेने की अनूठी क्षमता होती है।

राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ मल्हार’ कहा जाने लगा। आइए सुनते हैं, राग मियाँ की मल्हार में एक भावपूर्ण रचना। आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं, उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में तीनताल में निबद्ध, मियाँ मल्हार की एक मनमोहक रचना। आप यह मनमोहक रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मियाँ की मल्हार : ‘बिजुरी चमके बरसे मेहरवा...’ : उस्ताद राशिद खाँ




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 281वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक से अधिक पुरानी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 3 सितम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 283वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 279 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मेघ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- अभिनेत्री और गायिका – खुर्शीद बानो

इस बार की संगीत पहेली में छः प्रतिभागियों ने प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। इस बार की पहेली में पहली बार भाग लेकर विजेता बनने का गौरव मिला है, नई दिल्ली की रेखा एन. देशमुख को। हमारे अन्य नियमित विजेता प्रतिभागी हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी छः विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ की आज यह दूसरी कड़ी है। मेरे अस्वस्थ हो जाने और भारत संचार निगम की इन्टरनेट सेवा में व्यवधान के कारण 24 जुलाई, 7, 14 और 21 अगस्त, 2016 की ‘स्वरगोष्ठी’ का हम प्रकाशन नहीं कर सके, जिसके लिए हमें खेद है। आज की कड़ी में आपने राग मियाँ की मल्हार का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले मल्हार अंग के कुछ रागों को चुन कर आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी कड़ी में वर्षा ऋतु का ही एक राग प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Thursday, February 26, 2009

बाजे मुरलिया बाजे (पंडित हरिपसाद चौरसिया जी पर विशेष आलेख)


बाँसुरी ......वंसी ,वेणु ,वंशिका कई सुंदर नामो से सुसज्जित हैं बाँसुरी का इतिहास, प्राचीनकाल में लोक संगीत का प्रमुख वाद्य था बाँसुरी । अधर धरे मोहन मुरली पर, होंठ पे माया विराजे, बाजे मुरलियां बाजे ..................

मुरली और श्री कृष्ण एक दुसरे के पर्याय रहे हैं । मुरली के बिना श्री कृष्ण की कल्पना भी नही की जा सकती । उनकी मुरली के नाद रूपी ब्रह्म ने सम्पूर्ण चराचर सृष्टि को आलोकित और सम्मोहित किया । कृष्ण के बाद भी भारत में बाँसुरी रही, पर कुछ खोयी खोयी सी, मौन सी. मानो श्री कृष्ण की याद में उसने स्वयं को भुला दिया हो, उसका अस्तित्व तो भारत वर्ष में सदैव रहा. हो भी कैसे न ? आख़िर वह कृष्ण प्रिया थी. किंतु श्री हरी के विरह में जो हाल उनके गोप गोपिकाओ का हुआ कुछ वैसा ही बाँसुरी का भी हुआ, कुछ भूली -बिसरी, कुछ उपेक्षित सी बाँसुरी किसी विरहन की तरह तलाश रही थी अपने मुरलीधर को, अपने हरी को ।

युग बदल गए, बाँसुरी की अवस्था जस की तस् रही, युगों बाद कलियुग में पंडित पन्नालाल घोष जी ने अपने अथक परिश्रम से बांसुरी वाद्य में अनेक परिवर्तन कर, उसकी वादन शैली में परिवर्तन कर बाँसुरी को पुनः भारतीय संगीत में सम्माननीय स्थान दिलाया। लेकिन उनके बाद पुनः: बाँसुरी एकाकी हो गई ।

हरी बिन जग सुना मेरा ,कौन गीत सुनाऊ सखी री?
सुर,शबद खो गए हैं मेरे, कौन गीत बजाऊ सखी री ॥


बाँसुरी की इस अवस्था पर अब श्री कृष्ण को तरस आया और उसे उद्धारने को कलियुग में जहाँ श्री विजय राघव राव और रघुनाथ सेठ जैसे महान कलाकारों ने महान योगदान दिया, वही अवतार लिया स्वयं श्री हरी ने, अपनी प्रिय बाँसुरी को पुनः जन जन में प्रचारित करने, उसके सुर में प्राण फूँकने, उसकी गरिमा पुनः लौटाने श्री हरी अवतरित हुए हरी प्रसाद चौरसिया जी के रूप में । पंडित हरीप्रसाद चौरसिया जी......एक ऐसा नामजो भारतीय शास्त्रीयसंगीत में बाँसुरी की पहचान बन गया ।एक ऐसा नाम जिसने श्री कृष्ण की प्राणप्रिय बाँसुरी को, पुनः: भारत वर्ष में ही नही बल्कि सम्पूर्ण विश्व में सम्पूर्ण चराचर जगत में प्रतिष्ठित किया, प्रतिस्थापित किया, प्रचारित किया । गुंजारित कियासम्पूर्ण सृष्टि को बाँसुरी के नाद देव से । आलोकित किया बाँसुरी के तम्हरण ब्रह्म नाद रूपी प्रकाश से ब्रह्माण्ड को ।

श्री कृष्ण का जन्म हुआ था मथुरा नगरी के कारावास में, मथुरा नगरी यानी यमुना की नगरी, उसके पावन जल के सानिध्य में श्री कृष्ण का बालपन, कुछ यौवन भी गुजरा. पंडित हरीप्रसाद जी का जन्म १ जुलाई १९३८ के दिन गंगा,यमुना सरस्वती नदी के संगम पर बसी पुण्य पावननगरी इलाहाबाद में हुआ,पहलवान पिता की संतान पंडित हरी प्रसादजी को उनके पिताजी पहलवान ही बनाना चाहते थे, किंतु उनका प्रेम तो भारतीय संगीत से था, बाँसुरी से था । शास्त्रीय गायन की शिक्षा पंडित राजाराम जी से प्राप्त की और बाँसुरी वादन की शिक्षा पंडित भोलानाथ जी से प्राप्त की । संगीत साधना से पंडित हरिप्रसादजी का बाँसुरी वादन सतेज होने लगा । बाँसुरी वादन की परीक्षा में सफल होने के बाद पंडितजी आकाशवाणी पर बाँसुरी के कार्यक्रम देने लगे। कुछ समय पश्चात् आकाशवाणी के कटक केन्द्र पर इनकी नियुक्ति हुई और इनके उत्कृष्ट कार्य के कारण ५ वर्ष के भीतर ही आकाशवाणी के मुख्यालय मुंबई में इनका तबादला हो गया।

पहले पंडित जी सीधी बाँसुरी बजाते थे, तत्पश्चात उन्होंने आडी बाँसुरी पर संगीत साधना शुरू की, बाँसुरी में गायकी अंग, तंत्र वाद्यों का आलाप आदि अंगो के समागम की साधना पंडित जी करने लगे । उसी समय इनका संगीत प्रशिक्षण आदरणीय अन्नपूर्णा देवी जी के सानिध्य में प्रारम्भ हुआ, विदुषी अन्नपूर्णा जी के संगीत शिक्षा से इनकी बाँसुरी और भी आलोकित हुई ।आइये सुनते हैं पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी का बांसुरी वादन, तबले पर है उस्ताद जाकिर हुसैन. ये दुर्लभ विडियो लगभग ९३ मिनट का है. हमें यकीन है इसे देखना-सुनना आपके लिए भी एक सम्पूर्ण अनुभव रहेगा.



अगली कड़ी में पंडित हरिप्रसाद चौरासियाँ जी की बांसुरी यात्रा सविस्तार

आलेख प्रस्तुतिकरण
वीणा साधिका
राधिका बुधकर
विडियो साभार - राजश्री डॉट कॉम



Sunday, February 15, 2009

बिल्लू को कहना नही कोई हज्ज़ाम...

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (11)
नामांकन में आना भी एक उपलब्धि है - पंडित रवि शंकर
ग्रैमी पुरस्कार विजेता उस्ताद जाकिर हुसैन को बधाई देने वालों में तीन बार ग्रैमी हुए पंडित रवि शंकर भी हैं. एक ताज़ा इंटरव्यू में पंडित जी ने कहा-"विश्व मोहन भट्ट को जब ग्रैमी मिला तब इस बाबत मीडिया में जग्रता आयी. मेरे पहले दो सम्मानों के बारे में तो मुझे भी ख़बर नही लगी देशवासियों की बात तो दूर है. कई बार जूरी के सदस्यों के वोट न मिल पाने के कारण कोई अच्छा संगीतकार विजयी होने से रह जाता है पर इससे उसके संगीत की महत्ता कम नही होती, मेरा मानना है कि नामांकन में आना भी एक बड़े सम्मान की बात है. मुझे दुःख है कि लक्ष्मी शंकर ग्रैमी नही जीत पायी, वे बेहद प्रतिभाशाली हैं.पर खुशी इस बात की है कि जाकिर ने इसे जीता." गौरतलब है कि मोहन वीणा वादक पंडित विश्व मोहन भट्ट भी पंडित रवि शंकर जी के ही शिष्य हैं. भारत रत्न पंडित रवि शंकर ऐ आर रहमान को भी बधाई देना नही भूले-"मैं हिन्दी फ़िल्म संगीतकारों का सालों से प्रशंसक रहा हूँ, सी रामचंद्र, सलिल चौधरी, एस डी और आर डी बर्मन, इल्ल्याराजा और अब ऐ आर रहमान जो निरंतर इतनी सुंदर धुनों से संगीत को संवार रहे हैं. फिल्मों के लिए उनका पार्श्व संगीत भी सराहनीय रहा है. विदेशों में भी अब उन्हें ख्याति प्राप्त करते देख खुशी हो रही है." दुनिया भर से ढेरों सम्मान पाने वाले पंडित रवि शंकर के लिया सबसे बड़ा सम्मान क्या है ? -"जो कुछ भी मिला है उसके लिए मैं ईश्वर, अपने गुरु और अपने प्रशंसकों को धन्येवाद देना चाहता हूँ, पर जब मैं परफोर्म करता हूँ और अपने संगीत में डूबे हुए किसी श्रोता का गर दिल भर आए और उसकी आँख से आंसू का एक कतरा गिरे, तो वो मेरे लिए सर्वोत्तम पुरस्कार है..". आपको नमन है ऐ संगीत शिरोमणि.



मैं एक खिलाड़ी जैसा महसूस कर रहा हूँ - ऐ आर रहमान

बाफ्टा की फ़तेह के बाद अब रहमान चले हैं एक और गढ़ जीतने न्यू यार्क शहर को. मनीष के ख़ास निर्मित बंद गले के सूट पहने रहमान इस समय ख़ुद को एक खिलाड़ी सा महसूस कर रहे हैं जिस पर सारे देश की नज़र है और जिससे ओलंपिक गोल्ड की पूरी पूरी उम्मीद की जा रही है -"ओलंपिक के लिए निकलते किसी खिलाड़ी से जिसपर पूरे देश को स्वर्ण लेकर आने की उम्मीद रहती है, मैं ख़ुद को इस वक्त उस खिलाड़ी सा महसूस कर रहा हूँ, पता नही मैं उनकी उम्मीदों पर खरा उतरूंगा या नही, खुदा ने मुझे पहले ही मेरी काबिलियत से अधिक दिया है, इसलिए मैं कभी भी ज्यादा की महत्वकांक्षा नही कर पाता, ये मेरा स्वाभाविक गुण है...".


भारतीय संगीत एल्बम के लिए ग्रैमी जीतना चाहता हूँ - उस्ताद जाकिर हुसैन

"जब कोई दूसरा देश आपकी कला को सम्मान देता है, सबकी निगाहें आपकी तरफ़ उठ जाती है, पर जब आपका गुरु आपको शाबाशी दे कोई गौर नही करता. पर मेरे लिए दूसरी बात अधिक मायने रखती है", ग्रैमी जीतने वाले उस्ताद जाकिर हुसैन ने एक ताज़ा इंटरव्यू में ये बात कही -"मेरे गुरु और पिता मरहूम उस्ताद अल्लाह रखा खान ने मात्र दो बार मुझसे ये कहा कि मैंने अच्छा बजाया. दो बार उनके इन शब्दों से मिला सम्मान मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है. मैं कभी एक पूरी तरह से भारतीय शास्त्रीय संगीत के किसी एल्बम के लिए ग्रैमी जीतना चाहता हूँ, जैसा कि पंडित रवि शंकर जी ने कर दिखाया था. विदेशी संगीतकारों के साथ गठबंधन ग्रैमी तक पहुँचने का आसान रास्ता बना देता है...".


बिल्लू को कहना नही कोई हज्ज़ाम

एक और बड़ी फ़िल्म और एक और नया विवाद, अब तो जैसे ये एक परम्परा ही हो गई है...खैर हम विवादों की तरफ़ न जाकर सुनते हैं सप्ताह का सॉलिड गीत फ़िल्म "बिल्लू" से. ठेठ देसी अंदाज़ के इस गीत में गुलज़ार साहब ने कमाल के शब्द चुने हैं. "लोशन खुसबुदार" और "उस्तरे की धार" जैसे शब्दों ने गीत को खासा नया पन दे दिया है. प्रीतम ने भी बहुत बढ़िया धुन और संयोजन किया है. आवाजें हैं रघुबीर यादव, अजय जिन्गरान और कल्पना की...हाँ ...और गाने का अन्तिम हिस्सा सबसे शानदार है....सुनिए और आनन्द लीजिये.





Tuesday, February 10, 2009

रहमान के बाद अब बाज़ी मारी उस्ताद जाकिर हुसैन ने भी...


भारतीय संगीत की थाप विश्व पटल पर सुनाई दे रही है, लॉस एन्जेलेंस और लन्दन में भारत के दो संगीत महारथियों ने अपने अन्य प्रतियोगियों पर विजय पाते हुए शीर्ष पुरस्कारों पर कब्जा जमाया. जहाँ चार अन्य प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए रहमान ने एक बार फ़िर "स्लम डोग मिलिनिअर" के लिए बाफ्टा (ब्रिटिश एकेडमी ऑफ़ फ़िल्म एंड टेलिविज़न आर्ट) जीता तो वहीँ तबला उस्ताद जाकिर हुसैन ने दूसरी बार ग्रैमी पुरस्कार जिसे संगीत का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है, पर अपनी विजयी मोहर लगायी.जाकिर ने अपनी एल्बम "ग्लोबल ड्रम प्रोजेक्ट" के लिए कंटेम्पररी वर्ल्ड म्यूजिक अल्बम श्रेणी में ये पुरस्कार जीता. गोल्डन ड्रम प्रोजेक्ट में हुसैन ने रॉक बैंड "ग्रेटफुल डेड" के मिकी हार्ट के साथ जुगलबंदी की है और उनका साथ दिया नईजीरियन पर्काशानिस्ट सिकिरू एडेपोजू और जैज़ पर्काशानिस्ट प्युरेटो रिकोन ने. ये इस समूह का और ख़ुद हुसैन का दूसरा ग्रैमी है. पहली बार भी १९९१ में उन्होंने मिकी हार्ट ही के साथ टीम अप कर "प्लेनट ड्रम" नाम का एल्बम किया था जिसे १९९२ में ग्रैमी सम्मान हासिल हुआ था.

दूसरी तरफ़ लन्दन में हुए बाफ्टा समारोह में भी गोल्डन ग्लोब की तर्ज पर एक बार फ़िर स्लम डोग पूरी तरह से छाई रही. फ़िल्म को कुल ७ बाफ्टा अवार्ड मिले जिसमें रहमान के आलावा एक भारतीय और भी है. जी हाँ, केरल निवासी और फ़िल्म के साउंड निर्देशक रसूल पुकुट्टी ने भी अपने फन से भारतीय संगीत प्रेमियों का सर गर्व से ऊंचा किया. पहली बार बाफ्टा में भारतीय नाम आए हैं, पुरस्कार पाने वालों में. हालाँकि बाफ्टा ने फिल्मों में उनके योगदान के लिए निर्देशक यश चोपडा का सम्मान किया था सन २००६ में. इसके आलावा संजय लीला बंसाली की "देवदास" को विदेशी फिल्मों की श्रेणी में नामांकन मिला था २००२ में, पर स्पेनिश फ़िल्म "टॉल्क टू हर" ने बाज़ी मार ली थी.

बाफ्टा ने बेशक भारतीय कलाकारों को देर में पहचाना पर ग्रैमी पुरस्कारों में भारतीय पहले भी अपना जलवा दिखा चुके हैं. उस्ताद जाकिर हुसैन के आलावा पंडित रवि शंकर और मोहन वीणा वादक विश्व मोहन भट्ट की कला को भी ग्रैमी ने सम्मानित किया है बारम्बार. पंडित रवि शंकर ने तो ३ बार ये सम्मान जीता है. दरअसल पंडित जी पहले ग्रैमी सम्मान पाने वाले भारतीय कलाकार बने थे जब १९६७ में मशहूर वोइलानिस्ट येहुदी मेनुहिन के साथ वेस्ट मीट ईस्ट कंसर्ट के लिए उन्हें बेस्ट चेंबर म्यूजिक पर्फोर्मांस श्रेणी में पुरस्कृत किया गया था.

खुशी की बात ये भी है की इस बार ग्रैमी की दौड़ में और भी ४ श्रेणियों में ३ अन्य भारतीय भी शामिल रहे. लुईस बैंक को जैज़ एल्बम श्रेणी में दो नामांकन मिले (एल्बम माइल्स फ्रॉम इंडिया, और फ्लोटिंग पॉइंट), कोलकत्ता के संगीतकार को उनकी एल्बम "कोलकत्ता क्रोनिकल" के लिए तो मशहूर शास्त्रीय गायक लक्ष्मी शंकर को "डांसिंग इन दा लाइट" के लिए नामांकन मिला. गोल्डन ग्लोब, बाफ्टा और ग्रैमी के बाद अब सबकी नज़रें २२ तारीख को होने वाले ऑस्कर पर टिकी हैं. उम्मीद है यहाँ भी तिरंगा लहराएगा पूरे आन बान और शान के साथ. अभी के लिए तो उस्ताद जाकिर हुसैन, रहमान, और रसूल पुकुट्टी को हम सब की ढेरो बधाईयाँ. आईये सुनते हैं उस्ताद का तबला वादन १९९९ में आई उनकी जैज़ फुयूज़न एल्बम "दा बिलीवर" से ये ट्रैक "फईन्डिंग दा वे...". साथ में हैं जॉन मेक्लिंग, यू श्रीनिवास, और वी सेल्वागणेश.



धीमे कनेक्शन वाले यहाँ से सुनें-






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